श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 221–230

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 221–230

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अधि ० ७ सू ० २४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १८७ त्मनो वैश्वानरस्य मूर्वैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिलमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ' ( छा ० ५।१८।२ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किं वैश्वानरशब्देन जाठरोऽग्निरुपदिश्यते, उत भूताग्निः, अथ तदभिमानिनी देवता, अथवा शारीरः, आहोस्वित् परमेश्वर इति । किं पुनरत्र संशयकारणम्? वैश्वानर इति जाठरभूताग्निदेवतानां साधारणशब्दप्रयोगादात्मेति च शारीरपरमेश्वरथोः । तत्र कस्योपादानं न्याय्यं कस्य वा हानमिति भवति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? जाठरोऽग्निरिति । कुतः? तत्र हि विशेषेण क्वचित्प्रयोगो दृश्यते- ' अयमग्नि-वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते ' ( बृह ० ५१ ९ ) इत्यादौ । अग्निमात्रं वा स्यात्; सामान्येनापि प्रयोगदर्शनात्; ' विश्वस्मा अग्निं भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमहामकृण्वन् ' ( ऋ ० सं ० १०।८८।१२ ) इत्यादौ । अग्निशरीरा वा देवता स्यात्; तस्यामपि प्रयोगदर्शनात् । · उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा ( द्युलोक ) है, चक्षु विश्वरूप ( सूर्यं ) है, प्राण पृथग्वर्त्मा ( वायु ) है, देहका मध्यभाग बहुल ( आकाश ) है, बस्ति - मूत्रस्थान ही रयि ( जल ) है, पृथिवी दोनों चरण है, वक्षस्थल वेदी है, लोम दर्भ है, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है और मुख आहवनीय है ) इत्यादि कहती है । यहाँ संशय होता है कि क्या वैश्वानरशब्दसे जठराग्निका उपदेश किया जाता है अथवा भूताग्निका अथवा तदभिमानी देवताका अथवा जीवका अथवा परमेश्वर-का? परन्तु यहाँ संशय होनेका कारण क्या है? [ संशय होनेका कारण विषयवाक्यमें वैश्वानर और आत्मशब्द हैं ] जठराग्नि, भूताग्नि और देवतामें समानरूपसे वैश्वानर शब्दका प्रयोग है एवं जीव औरं परमेश्वरमें साधारणरूपसे आत्मशब्दका प्रयोग है । उनमेंसे किसका ग्रहण करना उचित है और किसका त्याग, ऐसा संशय होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - उन तीनों में से जठराग्नि-का निश्चय होता है । क्योंकि उसमें ही कहीं - कहीं ' अयमग्निर्वैश्वानरो ० ( यह अग्नि वैश्वानर है, जो यह पुरुषके भीतर है. जिससे कि यह अन्न जो भक्षण किया जाता है वह पकाया जाता है ) इत्यादि श्रुतिमें विशेषरूपसे वैश्वानर शब्दका प्रयोग देखने में आता है, अथवा केवल भूताग्नि हो, क्योंकि उनमें भी ' विश्वस्मा अग्नि ' ( सब भुवनोंके लिए देवताओंने वैश्वानर अग्नि - सूर्यको दिनका चिह्न बनाया, क्योंकि सूर्योदय होनेपर ही दिन व्यवहार होता है ) इत्यादि श्रुतिमें वैश्वानर शब्दका सामान्यरूपसे प्रयोग देखने में आता है । अथवा अग्नि शरीरवाला देवता हो सकता है, क्योंकि उसमें भी वैश्वानर शब्दका प्रयोग देखनेमें आता है, ' वैश्वानरस्य सुमितौ ० ( हम वैश्वानरकी सुमितमें रहें, क्योंकि वह सत्यानन्दी -दीपिका उपन्युकुमार — मैं द्युलोककी उपासना करता हूँ । राजा - यदि मेरे पास नहीं आते तो इस अन्यथा-ग्रहणके दोष से तुम्हारा मस्तक गिर जाता । सत्ययज्ञ --- मैं आदित्यको वैश्वानर समझकर उपासना करता हूँ । अश्वपति – यदि तुम मेरे पास न आते तो इस अन्यथाग्रहण दोषसे अन्धे हो जाते । इसी प्रकार अन्य मुनियोंसे भी पूछा गया और यह देखकर कि उनमेंसे प्रत्येक ही वैश्वानर आत्माके किसी न किसी अङ्गकी ही उपासना करता है, उसने उनकी व्यस्तोपासनाके परिणाममें उनके उस अङ्गके भंग होनेका भयं दिखलाते हुए अन्तमें अठारहवें खण्डमें वैश्वानरके स्वरूपका उपदेश किया है । * जैसे पूर्व अधिकरणमें वाक्यके आरम्भमें ज्ञायमान अदृश्यत्व आदि साधारण ( ब्रह्म और प्रधानमें रहनेवाले ) धर्मं ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इस वाक्यशेषमें स्थित सर्वज्ञत्व आदि लिङ्गोंसे ब्रह्म-परक कहे गये हैं, वैसे यहां भी उपक्रममें स्थित साधारण वैश्वानर शब्द ' उर एव वेदि ' ( छा ० ५।१८।२ ) वाक्यशेष में स्थित होमाधारत्व लिङ्गसे जठराग्नि परक है, इस प्रकार दृष्टान्तसंगतिसे ' किं तावत् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं ।

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१८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ ' वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः ' ( ऋ ० सं ० १ ९ ८१ ) इत्येवमाद्यायाः श्रुतेदेवतायामैश्वर्याद्युपेतायां संभवात् । अथात्मशब्द सामानाधिकर ण्यादुपक्रमे च ' को न आत्मा किं ब्रह्म ' इति केवलात्म शब्द प्रयोगादात्मशब्दवशेन वैश्वानरशब्दः परिणेय इत्युच्यते, तथापि शारीर आत्मा स्यात्; तस्य भोक्तृत्वेन वैश्वानरसंनिकर्षात् । प्रादेशमात्रमिति च विशेषणस्य तस्मिन्नुपाधिपरिच्छिन्ने संभवात् । तस्मान्नेश्वरो वैश्वानरइत्येवंप्राप्ते तत इद-मुच्यते - वैश्वानरः परमात्मा भवितुमर्हतीति । कुतः? साधारणशब्दविशेषात् । साधारण-शब्दयोर्विशेषः साधारणशब्द विशेषः । यद्यप्येतावुभावप्यात्मवैश्वानरशब्दौ साधारणशब्दौ वैश्वानरशब्दस्तु त्रयस्य साधारणः, आत्मशब्दश्च द्वयस्य, तथापि विशेषो दृश्यते; येन पर-मेश्वर परत्वं तयोरभ्युपगम्यते, ' तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूधैव सुतेजाः ' इत्यादि । अत्र हि परमेश्वर एव द्युमूर्धत्वा दिविशिष्टोऽवस्थान्तरगतः प्रत्यगात्मत्वेनोपन्यस्त आध्याना -येति गम्यते; कारणत्वात् । कारणस्य हि सर्वाभिः कार्यगताभिरवस्थाभिरवस्थावत्त्वाद्दयुलो-काद्यवयवत्वमुपपद्यते । ' स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वक्रमत्ति ' इति च सर्वलोकाद्याश्रयं फलं श्रूयमाणं परमकारणपरिग्रहे संभवति । ' एवं हाऽस्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते ' ( छा ० ५। २४ ।३ ) सुख देनेवाला भुवनोंका राजा है और श्री उसके अभिमुख है ) इत्यादि श्रुतिसे ऐश्वर्य आदि युक्त देवता के लिए वैश्वानर शब्दका प्रयोग सम्भव है । यदि [ आत्मानं वैश्वानरमुपास्ते ] आत्मशब्दके सामानाधिकरण्यके और ' को न आत्मा किं ब्रह्म ' इस प्रकार उपक्रममें केवल आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण और आत्मशब्द बलसे वैश्वानर शब्द अग्नि आदिको छोड़कर आत्माके लिए है ऐसा कहो तो भी जीवात्मा आत्मा हो सकता है, क्योंकि भोक्ता होनेके कारण वह वैश्वानरके समीप है । और दूसरी बात यह है कि ' प्रादेशमात्रम् ' इस विशेषणका उस उपाधि परिच्छिन्न जीवमें संभव है, इसलिए वैश्वानर परमेश्वर नहीं है, सिद्धान्ती - ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - वैश्वानर परमात्मा ही हो सकता है । किससे? इससे कि साधारण शब्दोंका विशेष है । [ अग्नि आदि अर्थोंमें समान प्रयोग दिखाई देने पर परमात्माके अर्थ में ] साधारण- समान शब्दोंका विशेष साधारण-शब्दविशेष कहलाता है । यद्यपि ' आत्मा ' और ' वैश्वानर ' ये दोनों शब्द साधारण शब्द हैं । वैश्वानरशब्द तो जठराग्नि, भूताग्नि और देवता इन तीनोंमें समान है और आत्मशब्द जीवात्मा, परमात्मा इन दो अर्थों में समान है, तो भी ' तस्य ह वा ० ' ( उस आत्मा रूपी वैश्वानरका मूर्धा अति-तेजस्वी है ) इत्यादि विशेष देखने में आता है, जिससे कि आत्मशब्द और वैश्वानरशब्द परमेश्वर परक स्वीकार किये जाते हैं । सबका कारण होनेसे द्युमूर्धत्वादि गुण विशिष्ट ( अधिदैव त्रिभुवनरूप ) विराट् अवस्थाको प्राप्त हुआ परमेश्वर ही घ्यान ( उपासना ) के लिए प्रत्यगात्मरूपसे यहाँ उपन्यस्त है ऐसा अवगत होता है, क्योंकि वह कारण है । कारण ही कार्यगत सब अवस्थाओंसे अवस्थावाला होता है, इसलिए परमेश्वरके द्युलोकादि अवयव हो सकते हैं । ' स सर्वेषु ' ( जो कोई इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त लोकोंमें, सब भूतोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है अर्थात् इनके आश्रित सब फलोंको प्राप्त करता है ) इस प्रकार सब लोक आदि आश्रय श्रूयमाण फल परम कारण परमेश्वरके परिग्रहसे ही सम्भव है । ' एवं हास्य सर्वे ० ' ( उसी प्रकार जो इस सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ यस्त्वेतमेवं ० ’ ( जो भी ' यही मैं हूँ ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेश मात्र वैश्वानरकी उपासना करता है उसे सब भोग प्राप्त होते हैं ) इस विषयवाक्य में पूर्वश्रुत ' त्रिभुवन-रूप शरीरवाला ' यह विशेष लिङ्ग है । इससे ' आत्मा ' और ' वैश्वानर ' ये दोनों शब्द परमेश्वरके लिए हैं जठराग्नि आदिके लिए नहीं, क्योंकि त्रिभुवनरूप शरीर तो जठराग्नि, भूताग्नि अथवा देवताका

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अधि ० ७ सू ० २५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १८ ९ इति च तद्विदः सर्वपाप्मप्रदाहश्रवणम् । ' को न आत्मा किं ब्रह्म ' इति चात्मब्रह्मशब्दाभ्या-मुपक्रम इत्येवमेतानि लिङ्गानि परमेश्वर मेवावगमयन्ति । तस्मात्परमेश्वर एव वैश्वानरः ॥ स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ २५ ॥

पदच्छेद - स्मर्यमाणम्, अनुमानम्, स्यात् इति । सूत्रार्थ - - ( स्मर्यमाणम् ) ' यस्याग्निरास्यं ' इत्यादि स्मृति प्रतिपादित त्रैलोक्यात्मकरूप अपनी अपनी मूलभूत श्रुतिका अनुमान कराता हुआ परमात्माका ( अनुमानम् ) ज्ञापक ( स्यात् ) है, ( इति ) अतः वैश्वानर परमात्मा ही है । * तच परमैश्वर एव वैश्वानरः यस्मात्परमेश्वरस्यैवाग्निरास्यं द्यौर्मूर्धतीदृशं त्रैलोक्यात्मकं रूपं स्मर्यते - ' यस्याग्निरास्यं द्योर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥ इति । एतत्स्मर्यमाणं रूपं मूलभूतां श्रुतिमनुमापयदस्य वैश्वानरशब्दस्य परमेश्वरपरत्वेऽनुमानं लिङ्गं गमकं स्यादित्यर्थः । इतिशब्दों हेत्वर्थः । यस्मादिदं गमकं तस्मादपि वैश्वानरः परमात्मैवेत्यर्थः । यद्यपि स्तुतिरियं ‘ तस्मै लोका-त्मने नमः ' इति । स्तुतित्वमपि नासति मूलभूते वेदवाक्ये सम्यगीदृशेन रूपेण संभवति । द्यां मूर्धानं यस्य विप्रा वदन्ति खं वै नामि चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे । दिशः श्रोत्रे विद्धि पादौ क्षितिं च सोऽचिन्त्यात्मा सर्वभूतप्रणेता ॥ ' इत्येवंजातीयका च स्मृतिरिहोदाहर्तव्या ॥ २५ ॥

प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं ) इस प्रकार उस वैश्वानर ज्ञाताके समस्त पाप नाशका श्रवण ( श्रुति ) और ' को न आत्मा किं ब्रह्म ' इस प्रकार आत्मा और ब्रह्म शब्दोंसे उपक्रम ये सब लिङ्ग परमेश्वरका ही ज्ञान कराते हैं । इसलिए परमेश्वर ही वैश्वानर है ॥२४ ॥

और इससे भी परमेश्वर ही वैश्वानर है, क्योंकि ' उसका अग्निमुख है द्युलोक मूर्धा है ' इस प्रकार यह स्मृति भी परमेश्वरके ही त्रैलोक्यात्मक रूपका प्रतिपादन करती है । ' यस्याग्निरास्यं ० ' ( जिसका अग्नि मुख है, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी चरण, सूर्य नेत्र और दिशाएँ श्रोत्र हैं, उस त्रैलोक्यात्माको नमस्कार है ) इस प्रकार यह स्मर्यमाण रूप भी अपनी मूलभूत श्रुतिका अनुमान कराता हुआ उस वैश्वानरशब्दके परमेश्वरपरक होने में अनुमान - लिङ्ग - ज्ञापक है ऐसा अर्थ है और सूत्रमें ' इति ' शब्द हेतु अर्थक है, जिससे वैश्वानर शब्द त्रैलोक्यात्मक रूप परमेश्वरका ज्ञापक है, इससे भी वैश्वानर परमेश्वर ही है, यह अर्थ है 1 । यद्यपि ' तस्मै लोकात्मने नमः ' यह स्तुति है, तथापि मूलभूत वेदवाक्यके अभावमें इस प्रकार सम्यगुरूपसे स्तुति भी नहीं हो सकती । ' द्यां मूर्धानं ० ' ( विद्वान् लोग द्युलोक जिसका मस्तक, आकाश नाभि, चन्द्र सूर्य नेत्र, दिशाएँ श्रोत्र, पृथ्वी पाद - कहते हैं, वह अचिन्त्यात्मा सम्पूर्ण भूतों का प्रणेता है ऐसा जानो ) इस प्रकारकी स्मृति भी यहाँ उदाहरण रूपसे देनी चाहिए ॥ २५ ॥

सत्यानन्दी -दीपिका नहीं हो सकता, कारण कि ये तीनों त्रिभुवनरूप शरीरके तो छोटे - छोटे अङ्गभूत हैं । अङ्ग कमी पूर्णं अङ्गी नहीं हो सकता, जैसे एक नेत्र या मस्तक शरीर नहीं हो सकता । इसलिए त्रिभुवनरूप शरीर परमात्मा का ही हो सकता है, क्योंकि वह सबका कारण है, अतः ' आत्मा ' और ' वैश्वानर ' शब्द परमात्मा परक ही हैं ॥ २४ ॥

* ' अग्निर्मूर्धा चक्षुषि चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयः विश्वमस्य पद्भयां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा || ( मु ० २।१।४ ) ( अग्नि- द्युलोक जिसका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं, दिशाएँ श्रोत्र हैं, प्रसिद्ध वेद वाणी है, वायु प्राण है, सम्पूर्ण विश्व हृदय है और जिसके चरणोंसे पृथ्वी प्रकट हुई है अथवा

पृष्ठ 224

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१ ९ ० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथादृष्ट्युपदेशादसं-भावत्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ २६ ॥

पदच्छेद - शब्दादिभ्यः, अन्तः प्रतिष्ठानात् च, न, इति, चेत्, न, तथा, दृष्टयुपदेशात्, असंभवात्, पुरुषम्, अपि च, एनम्, अधीयते । सूत्रार्थ - ( शब्दादिभ्यः ) ' स एषोऽग्निर्वैश्वानरः ' ' हृदयं गार्हपत्य: ' इस प्रकार वैश्वानर आदि शब्दसे जठराग्नि आदि तीन अग्नियोंकी कल्पना की गई है । वह प्राण आहुतिका आधार कहा गया है । ( च ) और ( अन्तःप्रतिष्ठानात् ) ' पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद ' इस प्रकार श्रुतिसे वैश्वानरकी अन्तर स्थिति कही गई है, अतः ( न ) वैश्वानरशब्दसे परमात्माका ग्रहण युक्त नहीं है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह कथन युक्त नहीं है, ( दृष्टयुपदेशात् ) क्योंकि जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टिका उपदेश है, तथा ( असम्भवात् ) ' उसका द्युलोक मस्तक सूर्य नेत्र है ' यह भी उसमें सम्भव नहीं है, इसके अतिरिक्त वाजसनेयी ( एनम् ) वैश्वानरको ( पुरुषमपि ) पुरुषरूपसे भी ( अधीयते ) वर्णन करते हैं । इसलिए यहाँ वैश्वानरशब्दसे परमेश्वरका ही ग्रहण है । अत्राह - न परमेश्वरो वैश्वानरो भवितुमर्हति? शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च । शब्दस्तावद्वैश्वानरशब्दो न परमेश्वरे संभवति; अर्थान्तरे रूढत्वात् । तथाऽग्निशब्दः ' स एषोऽग्निर्वैश्वानरः ' इति । आदिशब्दात् ' हृदयं गार्हपत्यः ' ( छा ० ५।१८।२ ) इत्याद्यग्नित्रेता-कल्पनम् ।'तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम् ' ( छा ० ५ / १ ९ / १ ) इत्यादिना च प्राणाहुत्यधिक-रणतासंकोर्तनम् । एतेभ्यो हेतुभ्यो जाठरो वैश्वानरः प्रत्येतव्यः । तथाऽन्तःप्रतिष्ठानमपि श्रूयते - ' पुरुषेऽन्तः प्रतिष्टितं वेद ' इति । तच्च जाउरे संभवति । यदप्युक्तम् ' मूधैव सुतेजा ' पूर्वपक्षी कहता है कि वैश्वानर परमेश्वर नहीं हो सकता, किससे? इससे कि शब्दादि और अन्तः प्रतिष्ठान है । प्रथम तो शब्द - वैश्वानर शब्दका परमेश्वर में प्रयोग ही संभव नहीं है, कारण कि वह अन्य अर्थोंमें रूढ है । तथा स एषोऽग्निर्वैश्वानरः ' ( वह यह अग्नि वैश्वानर है ) इस श्रुतिमें अग्नि शब्दके साथ वैश्वानर शब्दका प्रयोग होनेसे अग्निशब्दका प्रयोग परमेश्वरमें सम्भव नहीं है । [ सूत्र भागस्थ ' शब्दादिभ्योः ' इसमें ] आदि शब्दसे ' हृदयं गार्हपत्यः ' ( हृदय गार्हपत्य है ) इत्यादि तीन अग्नियोंकी कल्पना की गई है । और ' तद्यद्भक्तं ' ( भोजनकालमें जो अन्न पहले प्राप्त हो उसका हवन करना चाहिए ) इत्यादिसे प्राणाहुतिकी ( वैश्वानरमें ) अधिकरणता कही गई है । इन हेतुओं से वैश्वानरशब्दसे जठराग्नि समझनी चाहिए । उसी प्रकार ' पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद ' ( पुरुष - देहके मीतर स्थितको वह जानता है ) यह भीतर स्थितिकी श्रुति भी है । वह जठराग्निमें संभव है । ' मूधैव सत्यानन्दी - दीपिका पृथ्वी पाद है वह देव सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है ) यह मुण्डक श्रुति भी ' अन्यार्थदर्शन ' न्यायसे वैश्वानरके स्वरूपके वर्णनमें उपयुक्त समझनी चाहिए । ' अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ ( गी ० १५/१४ ) ( प्राणियोंके देहका आश्रयणकर अर्थात् देहमें स्थिर होकर तथा प्राण तथा अपानको सम्मिलित करता हुआ मैं ही वैश्वानर अग्नि होकर चार प्रकारके अन्नको पंचाता हूँ ) इस प्रकार यह गीता वचन भी परमेश्वरमें ही वैश्वानर शब्दका प्रयोग करता है । इसलिए परमेश्वर ही वैश्वानर शब्दसे ग्राह्य है ॥ २५ ॥

* यद्यपि द्यु मूर्धत्वादि विशेष ईश्वर परक हैं और होमाधारत्वादि विशेष जठराग्नि विषयक है, इस प्रकार दोनों पक्षोंका समानरूपसे भान होता है, तो भी परमेश्वर विषयक विशेषका ही ग्रहण

पृष्ठ 225

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अधि ० ७ सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १ ९ १ इत्यादेर्विशेषात्कारणात्परमात्मा वैश्वानर इति, अत्र ब्रूमः - कुतो ह्येष निर्णयः? यदुभय-थापि विशेषप्रतिभाने सति परमेश्वरविषय एव विशेष आश्रयणीयोन जाठरविषय इति । अथवा भूताग्नेरन्तर्बहिश्चावतिष्ठमानस्यैष निर्देशो भविष्यति । तस्यापि हि द्युलोकादिसंबन्धो मन्त्रवर्णादवगम्यते -'यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम् ' ( ऋ.० सं ० १० । ८८।३ ) इत्यादौ । अथवा तच्छरीराया देवताया ऐश्वर्ययोगाद्दयुलोकाद्यवयवत्वं भविष्यति । तस्मान्न परमेश्वरो वैश्वानर इति अत्रोच्यते - न तथादृष्टयुपदेशादिति । न शब्दादिभ्यः कारणेयः परमेश्वरस्य प्रत्याख्यानं युक्तम् । कुतः? तथा जाठरापरित्यागेन दृष्टयुपदेशात् । परमेश्वरदृष्टिहिं जाठरे वैश्वानर इहोपदिश्यते, ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( छा ० ३ | १८ | १ ) इत्यादि-वत् । अथवा जाठरवैश्वानरोपाधिः परमेश्वर इह द्रष्टव्यत्वेनोपदिश्यते, ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूपः ( छा ० ३।१४।२ ) इत्यादिवत् । यदि चेह परमेश्वरो न विवक्ष्येत, केवल एव जाठरोऽ-ग्निर्विवक्ष्येत, ततो मूर्धंव सुतेजा इत्यादेर्विशेषस्यासंभव एव स्यात् । यथा तु देवताभूताग्नि-व्यपाश्रयेणाप्ययं विशेष उपपादयितुं न शक्यते, तथोत्तरसूत्रे वक्ष्यामः । यदि च केवल एव सुतेजा '? ( जिसकी मूर्धा अति तेजस्वी है ) इत्यादि विशेषरूप कारणसे वैश्वानर परमात्मा है ऐसा जो कहा गया है, इसपर हम ( पूर्वपक्षी ) कहते हैं - परमात्माका विशेष ( मूधर्त्वादि ) तथा जठराग्निका विशेष ( होमाधारत्वादि ) इन दोनों प्रकारके विषयोंका यहाँ प्रतिभान होने से परमेश्वर विषयक विशेषका ही ग्रहण करना चाहिए और जठराग्नि विषयक विशेषका ग्रहण नहीं करना चाहिए, ऐसा निर्णय कैसे किया? अथवा भीतर बाहर रहे हुए भूताग्निका भी यह निर्देश हो सकता है, क्योंकि उसका भी द्युलोक आदिके साथ सम्बन्ध ' यो मानुना पृथिवीं ० ' ( जिसने - भूताग्निने इस पृथ्वी, द्युलोक और अन्तरिक्षको व्याप्त किया है ) इत्यादि मन्त्रसे अवगत होता है । अथवा भूताग्नि जिसका शरीर है उस देवताके ऐश्वर्यं योगसे द्युलोकादि अवयव हो सकते हैं । इसलिए वैश्वानर परमेश्वर नहीं | सिद्धान्ती -- इसपर कहते हैं - यह उक्त कथन ठीक नहीं है, क्योंकि उस प्रकारकी दृष्टिका उपदेश है । श्रुति स्थित वैश्वानर शब्द आदि कारणोंसे परमेश्वरका निराकरण करना ठीक नहीं है, क्योंकि उस प्रकारकी अर्थात् जठराग्निका त्याग न करनेवाली दृष्टिका उपदेश है । ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे ) इत्यादिके समान यहाँ परमेश्वरकी दृष्टिका जाठर वैश्वानरमें उपदेश किया गया है । अथवा ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूप: ' ( वह मनोमय प्राण-शरीर भारूप है ) इत्यादिके समान जाठर वैश्वानर उपाधिवाला परमेश्वर यहाँ द्रष्टव्यरूपसे उपदिष्ट हैं । यदि यहाँ परमेश्वर विवक्षित न हो केवल जठराग्नि ही विवक्षित हो तो ' मूधैव सुतेजा ' इत्यादि विशेषोंका असम्भव ही हो जायगा । किञ्च देवता और भूताग्निका आश्रयण ग्रहण करनेसे भी [ ' द्युमूधर्त्वादि ' ] इस विशेषका उपपादन जिस तरहसे नहीं हो सकता, वह सब अगले सूत्र में कहेंगे । और यदि केवल सत्यानन्दी- दीपिका किया गया है, क्योंकि वह पक्ष बलवान् है । इस अरुचिसे ' अथवा ' से दूसरा पक्ष स्थापन करते हैं । जठराग्निमें द्युलोक मस्तकका सम्भव न होनेके कारण भूताग्नि ( द्वितीय विकल्प ) का ग्रहण किया गया है । परन्तु वह जड़ है, उसकी उपासना कैसे हो, अतः इस पक्षको भी छोड़कर उसके अभिमानी देवताका ग्रहण किया गया है, क्योंकि ऐश्वर्यंके योगसे द्युलोकादि अवयब हो सकते हैं । और चेतन होनेसे वह उपासनाजन्य फलदाता भी है, अतः देवता वैश्वानर है, परमेश्वर नहीं । * परमेश्वर दृष्टिसे उपास्य जठराग्निरूप प्रतीकके वाचक अग्नि और वैश्वानर शब्दोंसे लक्षणा द्वारा मूर्धत्वादि विशिष्ट ईश्वर ही लक्ष्य है । और जठराग्नि आदि उपाधिरूप पक्ष में प्रधानरूपसे ईश्वर उपास्य है । इन दोनोंमें से प्रतीकपक्ष में ईश्वर गौणरूपसे उपास्य है और उपाधिपक्ष में

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१ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ जाठरो विवक्ष्येत् पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितत्वं केवलं तस्य स्यान्नतु पुरुषत्वम् । पुरुषमपि चैनम-धीयते वाजसनेयिनः - ' स एषोऽग्नि वैश्वानरो यत्पुरुष स यो हैतमेवमग्निंवैश्वानरं पुरुषं पुरुषेऽन्तः-प्रतिष्टितं वेद ' ( श ० ब्रा ० १० | ५ | ११ ) इति परमेश्वरस्य तु सर्वात्मत्वात्पुरुषत्वं पुरुषेऽन्तः-प्रतिष्ठितत्वं चोभयमुपपद्यते । ये तु ' पुरुषविधमपि चैनमधीयते ' इति सूत्रावयवं पठन्ति तेषा-मेषोऽर्थः केवलजाठरपरिग्रहे पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितत्वं केवलं स्यान्न पुरुषविधत्वम् । पुरुष-विधमपि चैमनधीयते वाजसनेयिनः - ' पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्टितं वेद ' च प्रकरणाद्यदधिदैवतं युमूर्धत्वादि पृथिवी प्रतिष्ठितत्वान्तम्, घुमूर्धत्वादि चुबुकप्रतिष्ठितत्वान्तं तत्परिगृह्यते ॥ २६ ॥

अत एव न देवता भूतं च ॥ २७ ॥

पदच्छेद - अतः एव न देवता, भूतम्, च । सूत्रार्थ - ( अतएव ) घुमूर्धत्व आदि धर्मोके असंभव होनेसे ही ( अथवा ( भूतम् ) भूताग्नि ( न ) वैश्वानर शब्द वाच्य नहीं हो सकते । इति । पुरुषविधत्वं यचाध्यात्मं प्रसिद्धं देवता ) देवता ( च ) * यत्पुनरुक्तं भूताग्नेरपि मन्त्रवर्णे द्युलोकादि संबन्धदर्शनान्मूधैव सुजेता इत्याद्यवयव-कल्पनं तस्येव भविष्यतीति, तच्छारीराया देवताया वैश्वर्ययोगादिति, तत्परिहर्तव्यम् । अत्रो-जठराग्नि ही विवक्षित हो, तो उसमें पुरुष ( शरीर ) के भीतर स्थिति मात्र संभव हो सकेगी पुरुषत्व नहीं । और ' स एषोऽग्नि ० ' ( जो पुरुष है वह यह वैश्वानर अग्नि है जो इस वैश्वानर अग्निको इस प्रकार पुरुष सदृश और पुरुषके भीतर रहनेवाला जानता है वह सर्वत्र भोग करता है ) इस प्रकार वाजसनेयी शाखावाले वैश्वानरका पुरुषरूपसे भी अध्ययन करते हैं । सर्वात्मक होनेसे परमेश्वरमें पुरुषत्व और पुरुष के अन्दर प्रतिष्ठितत्व ( स्थिति ) ये दोनों उपपन्न होते हैं । और जो लोग ' पुरुष विधमपि ' इस प्रकार सूत्रके अन्तिम भागका पाठ स्वीकार करते हैं उनके मत में यह अर्थ है - केवल जठराग्निका ग्रहण करें तो उसमें पुरुषके अन्दर प्रतिष्ठितत्व मात्र सम्भव होगा पुरुष सदृशत्व नहीं । किन्तु ' पुरुषविधं ० ' ( जो इसे पुरुष सदृश और पुरुष के अन्तर प्रतिष्ठित जानता है ) इस प्रकार वाजस-नेयी शाखावाले इसका पुरुष सदृशरूपसे भी अध्ययन करते हैं । द्युमूर्धत्वादिसे लेकर पृथ्वी प्रतिष्ठितत्व पर्यन्त यह अधिदेव और द्युमूर्धत्वादिसे लेकर चुबुक प्रतिष्ठितत्व पर्यन्त जो प्रसिद्ध अध्यात्म पुरुष-सदृशत्व है वह प्रकरणसे ग्रहण किया जाता है ॥ २६ ॥

मन्त्र में भूताग्निका भी द्युलोक आदिके साथ सम्बन्ध देखनेमें आता है, इसलिये ' मूधैव सुतेजा: ' इत्यादि अवयव कल्पना उसीमें होगी अथवा उस शरीरवाले देवतामें ऐश्वर्यं योगसे उक्त अवयव कल्पना होगी ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार करना चाहिए । इस पर कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका मुख्यरूपसे, इतना दोनों पक्षोंमें अन्तर है । इस प्रकार यहाँ वैश्वानर शब्दसे परमेश्वर ही ग्राह्य है । * पहले ईश्वरका प्रतीकरूपसे और जठराग्निका उपाधिरूपसे ग्रहण किया गया है । परन्तु अब उसका दोनों रूपसे स्वीकार न कर केवल जठराग्निको यदि वैश्वानररूपसे स्वीकार करें तो उसमें पुरुषत्व सम्भव नहीं है, क्योंकि वह जड़ है । अब जठराग्निमें उक्त पुरुष सदृशत्वका भी ' पुरुषत्वमपि ’ आदि निषेध करते हैं । यद्यपि जठराग्निमें देहव्यापित्व पुरुष सदृशत्व है, तो भी प्रकरणके बलसे देहव्यापित्व - पुरुषसदृशत्व यहाँ विवक्षित नहीं है, किन्तु द्युमूर्धत्वादिसे लेकर पृथ्वी प्रतिष्ठितत्व पर्यन्त विराट् देहव्यापित्वरूप अधिदैव पुरुषः सदृशत्व है तथा उपासकके मस्तकसे लेकर चुबुक - ठोड़ी पर्यन्त अङ्गों में ईश्वर संपत्ति अध्यात्म पुरुष सद्दशत्व है, वह यहाँ विवक्षित है । अङ्गोंमें ईश्वर संपत्ति कैसे होता है यह आगे कहेंगे ॥ २६ ॥

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अधि ० ७ सू ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १ ९ ३ च्यते - अत एवोक्तेभ्यो हेतुभ्यो न देवता वैश्वानरः । तथा भूताग्निरपि न वैश्वानरः । नहि भूताग्नेरौष्ण्यप्रकाशमात्रात्मकस्य द्युमूर्धत्वादिकल्पनोपपद्यते; विकारस्य विकारान्तरात्म-त्वासंभवात् । तथा देवतायाः सत्यन्यैश्वर्ययोगे न घुमूर्धत्वादिकल्पना संभवति । अकारणत्वा-त्परमेश्वराधीनैश्वर्यत्वाच्च । आत्मशब्दासंभवश्च सर्वेष्वेषु पक्षेषु स्थित एव ॥ २७ ॥

साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ २८ ॥

पदच्छेद - साक्षाद, अपि, अविरोधम्, जैमिनिः । सूत्रार्थ - ( जैमिनिः ) जैमिनि मुनिका मत है कि ब्रह्ममें ( साक्षादपि ) जठराग्नि रूप उपाधिके विना भी वैश्वानरशब्दका ( अविरोधम् ) विरोध नहीं है अर्थात् वैश्वानरशब्द साक्षात् परमेश्वरका ही वाचक है । * पूर्व जाठराग्निप्रती को जाठराग्न्युपाधिको वा परमेश्वर उपास्य इत्युक्तमन्तः प्रतिष्ठित-त्वाद्यनुरोधेन, इदानीं तु विनैव प्रतीकोपाधिकल्पनाभ्यां साक्षादपि परमेश्वरोपासनपरिग्रहे न कश्चिद्विरोध इति जैमिनिराचार्यो मन्यते । ननु जाठराग्न्यपरिग्रहेऽन्तः प्रतिष्ठितत्ववचनं शब्दादीनि च कारणानि विरुध्येरन्निति । अत्रोच्यते - अन्तः प्रतिष्ठितत्ववचनं तावन्न विरुध्यते । नहीह ' पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद ' इति जाठराग्न्यभिप्रायेणेदमुच्यते; तस्या-प्रकृतत्वादसंशब्दितत्वाच्च । कथं तर्हि? यत्प्रकृतं मूर्धा दिवुबुकान्तेषु पुरुषावयवेषु पुरुषविधत्वं अतएव उक्त हेतुओंसे ही वैश्वानर देवता नहीं है । तथा भूताग्नि भी वैश्वानर नहीं है, क्योंकि औष्ण्यप्रकाश मात्रात्मक भूताग्निमें घुमुर्धत्वादि कल्पना युक्त नहीं है । क्योंकि विकार अन्य विकारका आत्मा ( स्वरूप ) भी नहीं हो सकता । तथा ऐश्वर्यं योग होनेपर भी देवतामें घुमूर्धत्वादि कल्पना संभव नहीं है, कारण कि वह किसीका उपादानकारण नहीं है और उसका ऐश्वर्यं परमेश्वरके अधीन है । इन उक्त सभी पक्षोंमें आत्मशब्दका प्रयोग भी तो असम्भव है ऐसा सिद्ध है || २७ ॥ पहले ' अन्तः प्रतिष्ठितत्व ' आदि वचनके बलसे कहा गया है कि जठराग्नि जिसका प्रतीक है अथवा जठराग्नि जिसकी उपाधि है ऐसा परमेश्वर उपास्य है । किन्तु यहाँ आचार्य जैमिनिका अभि-मत है कि वैश्वानरशब्दसे प्रतीक और उपाधिकी कल्पनाको त्याग कर साक्षात् सीधे ही परमेश्वरकी उपासना स्वीकार करनेमें कोई विरोध नहीं है । यदि जठराग्निको स्वीकार नहीं करें तो [ परमेश्वरमें ] अन्तःप्रतिष्ठितत्व वचन और शब्द आदि कारण बाधित हो जायेंगे? तो इसके उत्तरमें कहा जाता है कि अन्तः प्रतिष्ठितत्व वचन तो विरुद्ध नहीं है, क्योंकि ' पुरुषविधं ० ' ( पुरुषके सदृश और पुरुषके अन्तः प्रतिष्ठितको जो जानता है ) यह कथन जठराग्निके अभित्रायसे नहीं कहा गया है, क्योंकि यहाँ जठराग्निका प्रकरण नहीं है और अग्नि आदि शब्दोंका वाच्य नहीं है । तब किस अभिप्रायसे कहा गया है? मस्तकसे लेकर ठोड़ी तक पुरुषके अवयवोंमें जो प्रकृत पुरुषसदृश्यत्व कल्पित है उसके अभिप्रायसे सत्यानन्दी - दीपिका * ' धुमूर्धा ' इत्यादि अवयवोंका प्रतिपादन, उपासकको सर्वं फल प्राप्ति और उसके सर्वपापका नाश ' को न आत्मा किं ब्रह्म ' ( हमारा आत्मा कौन है ब्रह्म क्या है ) इस प्रकारका उपक्रम इत्यादि हेतु ( लिङ्ग ) भूताग्नि अथवा देवतामें सम्भव नहीं हैं, इसलिए भूताग्नि अथवा देवता ' वैश्वानर ' शब्द-का वाच्यार्थ नहीं है | अतएव ' वैश्वानर ' शब्दसे परमेश्वरका ग्रहण करना ही सर्वथा युक्त है || २७ ॥। * पहले अग्नि और वैश्वानर शब्द ईश्वरके लक्षक कहे गये । अब प्रतीक और उपाधिके त्यागसे विराट पुरुष स्वरूप भगवान् वैश्वानरका मस्तकसे लेकर ठोड़ी पर्यन्त अङ्गोंमें आरोप कर ध्यान ( संपदुपासना ) करना चाहिए, ऐसा स्वीकार करनेपर भी शब्द आदिका विरोध नहीं है, क्योंकि अग्नि और वैश्वानर शब्द योगवृत्तिसे ईश्वर वाचक हैं और ' अन्तः स्थित्व ' आदि धर्म परमेश्वरमें

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१ ९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ कल्पितं तदभिप्रायेणेदमुच्यते - ' पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद ' इति । यथा वृक्षे शाखां प्रतिष्ठितां पश्यतीति तद्वत् । * अथवा यः प्रकृतः परमात्माऽध्यात्ममधिदैवतं च पुरुषविधत्वो-पाधिस्तस्य यत्केवलं साक्षिरूपं तदभिप्रायेणेदमुच्यते- ' पुरुषविधं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद ' इति । निश्चिते च पूर्वापरालोचनवशेन परमात्मपरिग्रहे तद्विषय एव वैश्वानरशब्दः केनचिद्योगेन वर्तिष्यते । विश्वश्चायं नरश्चेति, विश्वेषां वाऽयं नरः, विश्वे वा नरा अस्येति विश्वानरः परमात्मा; सर्वात्मत्वात् । विश्वानर एव वैश्वानरः । तद्धितोऽनन्यार्थः, राक्षसवायसा-दिवत् | अग्निशब्दोऽप्यग्रणीत्वा दियोगाश्रयणेन परमात्मविषय एव भविष्यति । गार्हपत्यादिकल्पनं प्राणाहुत्यधिकरणत्वं च परमात्मनोऽपि सर्वात्मत्वादुपपद्यते ॥ २८ ॥

कथं पुनः परमेश्वरपरिग्रहे प्रादेशमात्रश्रुतिरुपपद्यत इति तां व्याख्यातुमारभते-अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ २ ९ ॥ पदच्छेद - अभिव्यक्तेः, इति, आश्मरथ्यः । सूत्रार्थ - ( आश्मरथ्यः ) आश्मरथ्यका मत है कि इति ( यह ) प्रादेशमात्र श्रुति ( अभि-व्यक्तेः ) अभिव्यक्तिके लिए है अर्थात् अभिव्यक्तिके अभिप्राय से है । अतिमात्रस्यापि परमेश्वरस्य प्रादेशमात्रत्वमभिव्यक्तिनिमित्तं स्यात् । अभिव्यज्यते, ' पुरुष वधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद ' ऐसा कहा गया है । जैसे ' वृक्षमें शाखाको अन्तः प्रतिष्ठित हुआ देखता है ' यह व्यवहार होता है, वैसे प्रकृत में है, अथवा जिस प्रकृत परमात्माकी अधिदेव और अध्यात्म पुरुष सदृश्यत्व उपाधि है उसका उपाधिसे रहित जो केवल साक्षिरूप है उसके अभिप्रायसे ' पुरुषविधं पुरुषे-ऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद ' ऐसा कहा गया है । पूर्वापर पर्यालोचनके बलसे परमात्माका ग्रहण निश्चत होनेपर वैश्वानर शब्द भी किसी योगवृत्तिसे परमेश्वर परक ही होगा । ' विश्वश्चायं नरः च ' ( सकल प्रपञ्च रूप यह नर - पुरुष ) अथवा ' विश्वेषां वाऽयं नरः ' ( सब कार्यका कर्ता ) ' विश्वे नराः ' ( सब जीव हैं इसके ) ' विश्वानरः ' अर्थात् परमात्मा, क्योंकि वह परमात्मा सर्वात्मक है । किञ्च विश्वानर ही वैश्वानर कहलाता है । यहाँपर तद्धित प्रत्यय स्वार्थमें है । राक्षस, वायस आदिके समान | अग्निशब्द भी अग्रणीत्व ( कर्मफल प्राप्ति कराना ) आदिके योगका आश्रयण करनेसे परमात्मा विषयक ही होगा । सर्वात्मक होनेसे परमात्मामें भी गार्हपत्य आदि कल्पना और प्राणाहुतिका अधिकरणत्व युक्त है ॥ २८ ॥

वैश्वानर आदि शब्दोंसे परमेश्वरका परिग्रह करें तो पुनः प्रादेशमात्र श्रुति कैसे उपपन्न होगी? ऐसी आशङ्काके होनेपर उस श्रुतिका व्याख्यान करनेके लिए सूत्र आरम्भ करते हैं— निःसीम सर्वगतः परमेश्वरमें प्रादेशमात्रत्व कथन अभिव्यक्ति के लिए है । उपासकोंके लिए सत्यानन्दी - दीपिका सम्भावित हैं । इसलिए यहाँ ' अन्तःस्थित्व ' शब्दका अर्थ उदर स्थित्त्र नहीं है, किन्तु नखसे लेकर शिखा पर्यन्त अवयव समूहरूप पुरुष शरीर में मस्तक से लेकर ठोड़ी पर्यन्त अङ्ग वृक्षमें शाखाकी तरह स्थित हैं, उन अङ्गोंमें सम्पन्न वैश्वानर पुरुषमें अन्तः प्रतिष्ठित कहलाता है । * रक्ष एवं राक्षसः ' जैसे यहाँ स्वार्थमें तद्धित प्रत्यय है, वैसे ' विश्वानर एव वैश्वानरः ' में भी समझना चाहिए । ' नि ' प्रत्ययान्त गमन अर्थ में अगि धातुसे अग्नि शब्द निष्पन्न हुआ है । ‘ अंगयति गमयत्यग्रं कर्मणः फलं जगतोऽग्रं जन्म वा प्रापयतीत्यग्निरग्रणीरुक्तः ' ( कर्मफलको अथवा जगत् के जन्मको जो प्राप्त कराता है वह अग्रणी या अग्नि कहा जाता है ) इस व्युत्पत्तिके आधारपर कर्मफलको अथवा जगत्को जन्म देनेवाला तो परमात्मा ही है, अत: श्रुति आदि में वैश्वानर अग्नि आदि शब्दोंसे परमात्माका ही ग्रहण करना चाहिए भूताग्नि आदिका नहीं । सर्वात्मक होनेसे परमात्मामें गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियोंकी कल्पना और ' प्राणाय स्वाहा ' इस प्रकार प्राणाहुतिकी अधिकरणता सर्वथा युक्त है ॥२८ ॥

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अधि ० ७ सू ० २ ९ -३० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १ ९ ५ किल प्रादेशमात्रपरिमाणः परमेश्वर उपासकानां कृते । * प्रदेशेषु वा हृदयादिषूपलब्धि-स्थानेषु विशेषेणाभिव्यज्यते । अतः परमेश्वरेऽपि प्रादेशमात्रश्रुतिरभिव्यक्तेरुपपद्यत इत्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते ॥ २ ९ ॥ अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ ३० ॥

पदच्छेद - अनुस्मृतेः, बादरिः । सूत्रार्थ - ( अनुस्मृतेः ) प्रादेश मात्र परिमाणवाले हृदयमें स्थित मनसे ध्येय होनेके कारण परमेश्वर प्रादेशमात्र कहा जाता है, ( बादरि: ) यह आचार्य बादरिका मत है । प्रादेशमात्र हृदयप्रतिष्ठेन वाऽयं मनसाऽनुस्मर्यते तेन प्रादेशमात्र इत्युच्यते । यथा प्रस्थमिता यवाः प्रस्था इत्युच्यन्ते, तद्वत् । यद्यपि च यवेषु स्वगतमेव परिमाणं प्रस्थसम्बन्धाद्वयज्यते । नचेह परमेश्वरगतं किंचित्परिमाणमस्ति यद्धृदयसम्बन्धाद्वय-ज्यते । तथापि प्रयुक्तायाः प्रादेशमात्रश्रुतेः संभवति यथाकथंचिदनुस्मरणमालम्बनमि-त्युच्यते । प्रादेशमात्रत्वेन वायमप्रादेशमात्रोऽप्यनुस्मरणीयः प्रादेशमात्रश्रुत्यर्थवत्तायै । एवमनुस्मृतिनिमित्ता परमेश्वरे प्रादेशमात्र तिरिति बादरिराचार्यों मन्यते ॥ ३० ॥

परमेश्वर प्रादेशमात्र परिणामरूपसे ही अभिव्यक्त होता है । अथवा प्रदेशविशेषोंमें हृदयादि उपलब्धि-स्थानोंमें विशेषरूपसे अभिव्यक्त होता है, इसलिए परमेश्वर में भी प्रादेशमात्र श्रुति अभिव्यक्तिके कारण उपपन्न होती है । ऐसा आचार्य आश्मरथ्य मानते हैं ॥ २ ९ ॥ अथवा प्रादेशमात्र हृदयस्थित मनसे इस परमेश्वरका स्मरण किया जाता है । इसलिए वह परमेश्वर प्रादेशमात्र कहलाता है । जैसे प्रस्थसे नापे हुए यव- जौ प्रस्थ + कहलाते हैं । यद्यपि यवोंका अपना परिमाण ही प्रस्थके सम्बन्धसे अभिव्यक्त होता है, परन्तु यहाँ परमेश्वरगत कुछ भी परिमाण नहीं है जो हृदयके सम्बन्धसे व्यक्त हो, तथापि परमेश्वरके ध्यानमें प्रयुक्त हुई ' प्रादेशमात्र ' श्रुतिका किसी प्रकार आलम्बन हो सकता है, इसलिए ऐसा कहा है । अथवा [ सूत्रका दूसरा अर्थ ] प्रादेश-मात्र श्रुतिकी सार्थकता के लिए प्रादेशमात्र न होनेपर भी उस परमेश्वरका प्रादेशमात्ररूपसे हृदय में स्मरण करना चाहिए । इस प्रकार प्रादेशमात्र श्रुति परमेश्वरके ध्यानके लिए है ऐसा बादरि आचार्य मानते हैं ॥ ३० ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ' ( कठ ० २।१।१२ ) ( जो अङ्गुष्ठमात्र पुरुष शरीरके मध्यमें रहता है ) ' तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः ( कठ ० २।२।१२ ) ( अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्मदेवको जो धीर विवेकी पुरुष देखते हैं ) ' ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ' ( गीता ० १८ | ६१ ) ( हे अर्जुन! ईश्वर सर्व प्राणियोंके हृदयरूपी देशमें रहता है ) इस प्रकार श्रुति और स्मृतिमें परमेश्वरकी अभिव्यक्तिका स्थान हृदय ही कहा गया है, वह हृदय प्रादेश परिमाणवाला है । अङ्गुष्ठ और तर्जनीके फैलाने में जितना स्थान आता हो वह प्रादेश कहलाता है । इसप्रकार परमेश्वरमें प्रदेश उपाधिके कारण प्रादेश परिमाणका व्यवहार होने में कोई विरोध नहीं है ॥ २ ९ ॥ + ' अष्टमुष्टिर्भवेत् कुञ्चिः कुञ्चयोऽष्टौ तु पुष्कलम् । पुष्कलानि च चत्वारि आढ़कः परिकीर्तितः ॥ ' इस मतके अनुसार २५६ मुष्टिका एक आढ़क होता है, उसका चतुर्थांश पुष्कल - प्रस्थ कहलाता है । किसीके मतमें १०२४ मुष्टिका एक आढ़क होता है, उसका चतुर्थांश २५६ मुष्टिका एक प्रस्थ होता है ।

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१ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ संपत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ ३१ ॥

पदच्छेद – सम्पत्तेः, इति, जैमिनि:, तथा, हि, दर्शयति । सूत्रार्थ - ( सम्पत्तेः ) मस्तकसे लेकर ठोड़ी पर्यन्त प्रादेशमात्र स्थान में सम्पत्तिसे वैश्वानरको उपास्य प्रतिपादित करनेसे परमेश्वर में भी प्रादेशमात्रत्व युक्त है । ऐसा ( जैमिनिः ) जैमिनि आचार्य मानते हैं । ( तथाहि दर्शयति ) वैसे ही वाजसनेयिब्राह्मण भी मस्तकादिसे लेकर ठोड़ी पर्यन्त स्थानमें वैश्वानरका सम्पादन करते हुए प्रादेशमात्र सम्पत्तिको परमात्मामें दिखलाता है । * संपत्तिनिमित्ता वा स्यात्प्रादेशमात्र श्रुतिः । कुतः? तथा हि- समानप्रकरणं वाजस-ब्राह्मणं द्युप्रभृतीन्पृथिवीपर्यन्तांस्त्रैलोक्यात्मनो वैश्वानरस्यावयवानध्यात्ममूर्धप्रभृ-तिषु चुबुकपर्यन्तेषु देहावयवेषु संपादयत्प्रादेशमात्र संपत्ति परमेश्वरस्य दर्शयति- ' प्रादेश-मात्रमिव ह वै देवाः सुविदिता अमिसंपन्नास्तथा नु व एतान्वक्ष्यामि यथा प्रादेशमात्रमेवाभिसंपादयि-ष्यामीति । स होवाच मूर्धानमुपदिशन्नुवाचैष वा अतिष्ठा वैश्वानर इति । चक्षुषी उपदिशन्नुवाचैष वै सुतेजा वैश्वानर इति । नासिके उपदिशन्नुवाचैष वै पृथग्वत्र्मात्मा वैश्वानर इति । मुख्यमाकाशमुपदिशन्नु-वाचैष वै बहुलो वैश्वानर इति । मुख्या अप उपदिशन्नुवाचैष वै रयिर्वैश्वानर इति । चुकमुपदिशन्नु-वाचैष वै प्रतिष्ठा वैश्वानर इति । चुबुकमित्यधरं मुखफलकमुच्यते । यद्यपि वाजसनेयके द्यौरतिष्ठात्वगुणा समाम्नायते, आदित्यश्च सुतेजस्त्वगुणः । छान्दोग्ये पुनद्यः सुतेजस्त्वगुणा अथवा प्रादेशमात्र श्रुति सम्पत्ति निमित्तक हो सकती है, क्योंकि इसी प्रकार समान प्रकरण वाला वाजसनेयिब्राह्मण द्यु आदि लोकसे लेकर पृथिवी पर्यन्त त्रैलोक्यस्वरूप वैश्वानरके अवयवोंको अध्यात्म मस्तक आदिसे लेकर चुबुक पर्यन्त दैहिक अवयवोंमें सम्पादन करता हुआ परमेश्वरकी प्रादेश-मात्र सम्पत्ति दिखलाता है । ' प्रादेशमात्रमिव ह वै देवाः ० ' ( पूर्वकालमें देवताओंने अपरिच्छिन्न ईश्वरको भी सम्पत्ति [ उपासना ] से प्रादेशमात्रके समान जानकर प्राप्त किया । जैसे मैं वैश्वानरको प्रादेश-मात्र सम्पादन कर सकूँ वैसे उनको [ द्युलोकादि अवयवोंको ] कहूंगा, ऐसा उनसे कहा, मस्तकका उपदेशकर उसने कहा निश्चय यह मेरा मस्तक भू आदि लोकोंसे ऊपर स्थित है, अतः द्युलोक वैश्वा-नर है । नेत्रोंका उपदेशकर कहा, निश्चय यह अत्यन्त तेजवाला वैश्वानर है । नासिकाका उपदेशकर कहा, निश्चय यह भिन्न - भिन्न गतिवाला वायु वैश्वानर है । मुखस्थ आकाशका उपदेशकर कहा निश्चय यह व्यापक वैश्वानर है । मुखस्थ जलका उपदेशकर कहा, निश्चय यह रयिरूप जल वैश्वानर है । चिबुकका उपदेशकर कहा, निश्चय यह प्रतिष्ठारूप वैश्वानर है ) मुखके नीचे के भागको चिबुक अर्थात् मुखफलक कहते हैं । यद्यपि वाजसनेयकंमें द्युलोकको अतिष्ठात्व ( ऊपर स्थित ) गुणवाला और सत्यानन्दी - दीपिका * इसप्रकार राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि ऋषियोंसे प्रतिज्ञाकर अपने मस्तकको वैश्वा-नरका मस्तक कहा है | अभिप्राय यह है कि अध्यात्ममस्तकका अधिदैवमस्तक के साथ सम्पदुपासन से अभेदकर ध्यान करना चाहिए । इसीप्रकार नेत्रादिमें भी समझना चाहिए अर्थात् अपने नेत्रपर संकेतकर कहा अतितेजस्वी सूर्यं वैश्वानरका नेत्र है । यहाँ नासिका शब्दसे नासिकामें रहनेवाला प्राण ग्राह्य है । अध्यात्मप्राणमें वैश्वानरके अधिदैव प्राण वायुकी दृष्टि करनी चाहिए । मुखस्थ आकाश ( अध्यात्म आकाश ) में अधिदैव आकाशकी दृष्टि करनी चाहिए । मुखस्थ लार ( अध्यात्मजल ) वैश्वानरकी बस्ति में स्थित अधिदैन सरित्समुद्रादिरूप जलकी दृष्टि करनी चाहिए । अध्यात्म चुबुकमें प्रतिष्ठा ( वैश्वानरके पादरूप पृथिवी ) की दृष्टि करनी चाहिए । इसप्रकार प्रत्येक अध्यात्म अङ्गोंमें प्रत्येक अधिदैव अङ्गों की स्थितिरूप सम्पत्ति करके पुनः अधिदैव अङ्गोंसे अभिन्न अध्यात्म अङ्गोंमें अभेदरूपसे समष्टि वैश्वानर परमात्माको स्थापनकर उपासना करे ॥ ३१ ॥