श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 231–240
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 231–240
पृष्ठ 231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० ७ सू ० ३२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १ ९ ७ समाम्नायते, आदित्यश्च विश्वरूपत्वगुणः । तथापि नैतावता विशेषेण किंचिद्धीयते; प्रादेश-मात्रश्रुतेरविशेषात् । सर्वशाखा प्रत्ययत्वाच्च । संपत्ति निमित्तां प्रादेशमात्र श्रुतिं युक्ततरां जैमिनिराचार्यो मन्यते ॥३१ ॥
आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥३२ ॥
पदच्छेद - आमनन्ति, च, एनम्, अस्मिन् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( आमनन्ति ) जाबालशाखावाले कहते हैं कि ( अस्मिन् ) प्रादेश परिमाणमें मस्तक और ठोड़ीके मध्य में ( एनम् ) परमेश्वरकी उपासना करनी चाहिए । * आमनन्ति चैनं परमेश्वरमस्मिन् मूर्धचुबुकान्तराले जाबाला - ' य एषोऽनन्तोऽ-व्यक्त आत्मा सोऽविमुक्ते प्रतिष्ठित इति । सोऽविमुक्तः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति । वरणायां नास्यां च मध्ये प्रतिष्ठित इति । का वै वरणा का च नासीति ' ( जाबाल ० १ ) तत्र चेमामेव नासिकां या सर्वाणी-न्द्रियकृतानि पापानि वारयतीति सा वरणा, सर्वाणीन्द्रियकृतानि पापानि नाशयतीति सा नासीति वरणा नासीति निरुच्य, पुनरष्यामनन्ति - ' कतमच्चास्य स्थानं भवतीति । भ्रुवोर्घा-णस्य च यः संधिः स एष द्युलोकस्य परस्य च संधिर्भवतीति ' ( जाबा ० १ ) तस्मादुपपन्ना परमेश्वरे प्रादेशमात्र श्रुतिः । अभिविमानश्रुतिः प्रत्यगात्मत्वाभिप्राया । प्रत्यगात्मतया सर्वैः प्राणि-भिरभिविमीयत इत्यभिविमानः । अभिगतो वाऽयं प्रत्यगात्मत्वाद्विमानश्च मानवियोगा-आदित्यको सुतेजस्त्वं गुणवाला कहा गया है । तथा छान्दोग्यमें द्युलोकको सुतेजस्तव गुणवाला और आदित्यको विश्वरूपत्व गुणवाला कहा है, तथापि इतने विशेषसे कुछ हानि नहीं होती, क्योंकि प्रादेश-मात्र श्रुति समान ही है और सब शाखाओं में प्रतीयमान वैश्वानर उपासना समान ( एक ) है, इसलिए प्रादेशमात्र श्रुतिको संपत्ति निमित्तक मानना ही विशेष युक्त है, यह जैमिनि आचार्यका मत है ॥ ३१ ॥
जाबाल शाखावाले इस मस्तक और चिबुकके बीचमें परमेश्वरका स्थान कहते हैं । ' य एषो ० ' ( जो यह अनन्त, अपरिच्छिन्न, अव्यक्त आत्मा है वह जीवमें प्रतिष्ठित है । वह जीव किसमें प्रतिष्ठित है? वरणा और नासिके बीचमें प्रतिष्ठित है । वरणा और नासि क्या है? ) और वहाँ इस भ्रुव सहित नासिकाका ही वरणा नासि ऐसा निर्वचन कर, जो इन्द्रिय कृत सब पापोंका वारण करती है वह वरणा ( ध्रुव ) है और जो इन्द्रिय कृत सब पापोंका नाश करती है वह नासि ( नासिका ) है, ऐसा निर्वचनकर पुनः कहते हैं ' कतमच्चास्य ० ' ( इसका कौन सा स्थान है, भ्रू और नासिकाकी जो संधि है, वह इस द्युलोक और परलोकको सन्धि है ) इसलिए परमेश्वरमें प्रादेशमात्र श्रुति उपपन्न है । अभि-विमान श्रुति प्रत्यगात्मा के अभिप्रायसे है । प्रत्यगात्मरूपसे सब प्राणी जिसको जानें वह अभिविमान है । अथवा प्रत्यगात्मरूपसे अभिगत और विमान ( परिमाण रहित ) होने के कारण वह अभिविमान सत्यानन्दी - दीपिका परमेश्वरमें सम्पत्तिसे प्रादेशमात्र श्रुतिकी उपपन्नता दिखलाकर अब इस विषय में दूसरी श्रुति सम्मति ' आमनन्ति ' आदि भाष्यसे दिखलाते हैं । अत्रिने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न किया कि जीवका स्थान क्या है? याज्ञवल्क्य - भ्रू तथा घ्राणकी जो सन्धि है अर्थात् दो मोंहोंका जो मध्य स्थान है वह स्वर्गलोक और ब्रह्मलोककी सन्धिरूपसे ध्यान करने योग्य है । दोनों लोकोंकी सन्धिका स्थान ही जीवका स्थान है । उसमें स्वर्गलोक तथा ब्रह्मलोकको दृष्टि करनी चाहिए । जीवस्थान में प्रत्यगुरूपसे परमात्मा उपास्य है, अतः परमेश्वरमें प्रादेशमात्र श्रुति सर्वथा उपपन्न है । * अधिदैव द्युमूर्धादिको अध्यात्म मूर्वादिमें सम्पादनकर अवयवोंके अभेदसे अवयवीका अभेद होनेपर द्युर्धादि विशिष्ट वैश्वानरकी आत्मरूप से उपासना करना, यह प्रथम पक्ष है । और वैश्वानरके मूर्धादिको अपने मूर्धासे लेकर चुबुक पर्यन्त छः अङ्गोमं सम्पादनकर सर्वात्मा वैश्वानर ध्येय है, यह
पृष्ठ 232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ दित्यभिविमानः । अभिविमिमीते वा सर्व जगत्कारणत्वादित्यभिविमानः । तस्मात्परः मेश्वरो वैश्वानर इति सिद्धम् ॥ ३२ ॥
इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पादकृतौ शारीरकमीमांसामाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ २ ॥
प्रथमाध्याये तृतीयः पादः । [ अत्रास्पष्टब्रह्मलिङ्गानां प्रायो ज्ञेयब्रह्मविषयाणां विचारः ] ( १ द्युभ्वाद्यधिकरणम् सू ० १-७ ) द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ ॥ पदच्छेद - द्युभ्वाद्यायतनम्, स्वशब्दात् । सूत्रार्थ- ( द्युभ्वाद्यायतनम् ) ' यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम् ' इत्यादि श्रुतिमें कहा गया है कि द्युलोक, भूलोक, अन्तरिक्ष आदि लोक जिसमें कल्पित हैं, वह प्रतीयमान आश्रय ब्रह्म ही है, ( स्वशब्दात् ) क्योंकि ब्रह्मका वाचक आत्मशब्द श्रुतिमें है । * इदं श्रुयते— ' यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ' ( मुण्ड ० २।२।५ ) इति अत्र यदेतद्दयुप्रभृतीनामो-तत्ववचनादायतनं किंचिदवगम्यते, तत्किं परं ब्रह्म स्यात्, आहोस्विदर्थान्तरमिति संदिह्यते तत्रार्थान्तरं किमप्यायतनं स्यादिति प्राप्तम् । कस्मात्? ' अमृतस्यैष सेतुः ' इति श्रवणात् । है | अथवा जगत्का कारण होनेसे वह सबका निर्माता है, अतः अभिविमान है । इससे सिद्ध हुआ कि परमेश्वर ही वैश्वानर है ॥ ३२ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके प्रथम अध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥२ ॥
' यस्मिन् द्यौः पृथिवी ० ' ( जिसमें द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्ष, और सम्पूर्ण प्राणों ( इन्द्रियों ) सहित मन गुंथा हुआ है, उस एक आत्माको ही जानो, और सब बातोंको छोड़ दो, यही अमृत - मोक्ष प्राप्तिका सेतु -साधन है ) ऐसी श्रुति है । इस श्रुतिमें द्युलोक आदिका ' ओतप्रोत ' इस वचनसे जो यह कोई एक आश्रय प्रतीत होता है । क्या वह परब्रह्म है अथवा कोई अन्य पदार्थ, इसप्रकार सन्देह होता है । पूर्वपक्षी - यहाँ कोई अन्य पदार्थ ही आश्रय है, ऐसा प्राप्त होता है, किससे? इससे कि ‘ अमृतस्यैष सेतुः ' ( यह अमृतका सेतु है ) ऐसी श्रुति है । यह लोकमें प्रसिद्ध है कि सत्यानन्दी- दीपिका द्वितीय पक्ष है । और द्युमूर्धादि उपलक्षित अनन्त अव्यक्त चिदात्माकी चिदाभासरूपमें जीवमें स्थितिका सम्पादनकर चिदाभासरूप जीवको नासिका और भ्रूके मध्यमें सम्पादन करे अर्थात् नासिकाके मूल स्थान दो भ्रुवोंके मध्य में स्थित जीवरूप चिदाभासमें बिम्बरूपसे साक्षी व अधिष्ठानरूपसे स्थित चिदात्मा विश्वेश्वररूप वैश्वानरका प्रत्यगात्मरूपसे ध्यान करना चाहिए, यह तृतीय पक्ष है । इन सब पक्षोंका पर्या-लोचन करनेपर यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर हो वैश्वानर है जठराग्नि आदि नहीं । अत वैश्वानर वाक्य उपास्य ब्रह्ममें ही संगत होता है । पूर्वपक्ष में जठराग्नि आदिकी उपासना है, सिद्धान्तमें ब्रह्मकी ॥३२ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के प्रथम अध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥२ ॥
* द्वितीयपादमें ' तस्य ह वा एतस्यात्मनो ० ' ( उन वैश्वानर आत्माका सुदीप्त मूर्धा है और विश्वरूप सूर्य चक्षु है ) इत्यादि सविशेष वस्तुके प्रतिपादक वाक्योंका ब्रह्म में समन्वय दिखलाया गया है । अब निर्विशेष वस्तुके प्रतिपादक वाक्योंका ब्रह्ममें समन्वय दिखलाने के लिए तृतीय पाद आरम्भ
पृष्ठ 233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १ ९९ पारवान्हि लोके सेतुः प्रख्यातः । नच परस्य ब्रह्मणः पारवत्त्वं शक्यमभ्युपगन्तुं ' अनन्तम-पारम् ' ( बृह ० २।४।१२ ) इति श्रवणात् । अर्थान्तरे चायतने परिगृह्यमाणे स्मृतिप्रसिद्धं प्रधानं परिग्रहीतव्यम्; तस्य कारणत्वादायतनत्वोपपत्तेः । श्रुतिप्रसिद्धो वा वायुः स्यात्, ' वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति ' ( बृह ० ३।७।२ ) इति वायोरपि विधारणत्वश्रवणात् । शारीरो वा स्यात् । तस्यापि भोक्तृत्वाद्भोग्यं प्रपञ्चं प्रत्यायतनत्वोपपत्तेरित्येवं * प्राप्त इदमाह- बुभ्वाद्यायतनमिति । द्यौश्च भूश्च द्युभुवौ द्युभुवावादी यस्य तदिदं द्युभ्वादि । यदेतदस्मिन्वाक्ये द्यौः पृथिव्यन्तरिक्षं मनः प्राणा इत्येवमात्मकं जगदोतत्वेन निर्दिष्टं तस्यायतनं परं ब्रह्म भवितुमर्हति । कुतः? स्वशब्दात्, आत्मशब्दादित्यर्थः । आत्मशब्दो हीह भवति - ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इति । आत्मशब्दश्च परमात्मपरिग्रहे सम्यगवकल्पते, नार्थान्तरपरिग्रहे । कचिच्च स्वशब्दे-नैव ब्रह्मण आयतनत्वं श्रूयते- ' सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ' ( छा ० सेतु परतीरसे सम्बद्ध होता है । किन्तु परब्रह्ममें पारवत्त्व स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ' अनन्तमपारम् ' ( वह अनन्त और अपार है ) ऐसी श्रुति है । अन्य पदार्थको आश्रय मानना स्वीकृत हो तो [ सांख्य ] स्मृति प्रसिद्ध प्रधानका ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वह कारण होनेसे सबका आश्रय हो सकता है । अथवा श्रुति प्रसिद्ध वायु आश्रय हो सकता है, कारण कि ' वायुर्वै गोतम ० ' ( ह्वे गौतम! वायु ही वह सूत्र है; वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक परलोक और समस्त भूत समुदाय गुँथे हुए हैं ) इसप्रकार श्रुति वायुको विधारक कहती है । अथवा जीवात्मा आश्रय हो सकता है, क्योंकि भोक्ता होनेसे वह भी मोग्य प्रपञ्चके प्रति आश्रय हो सकता है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं— ' द्युभ्वाद्यायतनम् ' इत्यादि । द्यौश्च भूरच द्यु और भू - द्युभुवो हैं, वे द्यु और भू हैं आदि जिसके वह यह द्युभ्वादि है । इस वाक्यमें [ अस्मिन्द्यौ श्रुतिवाक्यमें ] द्यु, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मन, प्राण आदि स्वरूप जो यह जगत् ओत - प्रोत भावसे ( गुँथा ) निर्दिष्ट है, उसका आश्रय परब्रह्म ही हो सकता है, क्योंकि स्वशब्द है अर्थात् आत्मशब्द है, ऐसा अर्थ है । यहाँ ' तमेवैकं जानथ ० ' ( उस एक आत्माको ही जानो ) इस श्रुतिमें आत्मशब्दका प्रयोग है और आत्मशब्द परमात्माके ग्रहण करनेमें ही ठीक - ठीक उपपन्न होता है । अन्य पदार्थं ( जीव प्रधानादि ) के ग्रहण करनेमें नहीं । और कहीं - कहीं ' सन्मूलाः सोम्येमाः ० ' ( हे सोम्य! इसप्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत्यानन्दी - दीपिका होता है । पूर्व वैश्वानर अधिकरणमें ' तीन लोक - स्वरूप ' वैश्वानर ब्रह्मस्वरूप है, ऐसा वर्णन किया गया है । अब तीनों लोकोंका आयतन ब्रह्मसे भिन्न प्रधान आदिको कहनेके लिए पूर्वपक्षी दृष्टान्त-संगतिसे अपने पक्षका स्थापन करते हैं । ब्रह्म ' अनन्त - अपार ' है इससे वह किसीका आश्रय नहीं हो सकता, आश्रय तो मर्यादित होता है । इसलिए प्रधान ही को आश्रय मानना चाहिए । प्रधान, वायु और जीवात्मा इन तीनोंमें से प्रधान आयतनरूपसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह श्रुति प्रतिपाद्य नहीं है, इसलिए यहाँ वायुको ग्रहण किया गया है, क्योंकि ' वायुर्वै गौतम ' इत्यादि श्रुतिसे प्रसिद्ध हैं । किन्तु प्रधान और वायु इन दोनोंमें श्रुति प्रतिपादित आत्मशब्दको उपपत्ति न होने से जीवात्माका ग्रहण किया गया है, क्योंकि वह भोक्ता होनेसे भोग्य प्रपञ्चके प्रति आश्रय हो सकता है और उसमें श्रुतिप्रतिपाद्य आत्मशब्दका प्रयोग भी होता है, इसलिए जीवका आश्रयरूपसे ग्रहण करना ही युक्त है । * ' द्यौश्च भूश्च द्युभुवौ ' द्युलोक और भूलोक ये ' द्यु भू ' कहे जाते हैं, यह द्वन्द्व समास है, इसके अनन्तर ' द्यु और भू आदि जिसके हैं वह द्युभ्वादि है ' यह बहुब्रीहि समास है । चु, भ
पृष्ठ 234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ ६।८।४ ) इति । * स्वशब्देनैव चेह पुरस्तादुपरिष्टाच्च ब्रह्म संकीर्त्यते - ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ' इति । ' ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ( मुण्ड ० २।२।११ ) इति च । तत्र स्वायतनाय तनवद्भावश्रवणात् । सर्व ब्रह्मेति च सामानाधिकरण्यात् । यथानेकात्म-को वृक्षः शाखा स्कन्धो मूलं चेत्येवं नानारसो विचित्र आत्मेत्याशङ्का संभवति, तां निवर्त-यितुं सावधारणमाह- ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इति । एतदुक्तं भवति - न कार्य प्रपञ्चवि शिष्टो विचित्र आत्मा विज्ञेयः । किं तर्हि? अविद्याकृतं कार्यप्रपञ्चं विद्यया प्रविलापयन्त-स्वमेवैकमायतनभूतमात्मानं जानथैकरसमिति । यथा यस्मिन्नास्ते देवदत्तस्तदानयेत्युक्त आसनमेवानयति न देवदत्तम्, तद्वदायतनभूतस्यैवैकर सस्यात्मनो विज्ञेयत्वमुपदिश्यते । * विकारानृताभिसन्धस्य चापवादः श्रूयते - ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति १० २ | ४ | ११ ) इति । सर्व ब्रह्मेति तु सामानाधिकरण्यं प्रपञ्चविलापनार्थे, नानेकरसता-सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है अर्थात् सत् ही प्रजाकी उत्पत्ति में कारण है, स्थितिमें आश्रय है और लयमें प्रतिष्ठा है ) इसप्रकार श्रुति स्वशब्दसे ही ब्रह्मको आयतन कहती है । ' पुरुष एवेदं ० ' ( पुरुष ही यह सत्र कर्म और तप है, पर और अमृतरूप ब्रह्म है ) ' ब्रह्मैवेदम ० ' ( यह अमृतरूप ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, दक्षिण और उत्तर- दायीं, बाँयी ब्रह्म है ) इन श्रुतियोंमें आगे और पीछे स्वशब्दसे ही ब्रह्मा संकीर्तन है । और इन श्रुतियोंमें आधार याधेयभावसे ब्रह्मका श्रवण होता है, किञ्च सर्व ब्रह्म ' ( सब ब्रह्म है ) ऐसा सामाधिकरण्य है, इसलिए जैसे शाखा, 1 स्कन्ध और मूलके भेदसे वृक्ष अनेकात्मक है, वैसे नानारस ( भिन्न भिन्न स्वरूप ) वाला विचित्र आत्मा है, ऐसी आशङ्का हो सकती है, उसका निवारण करनेके लिए ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इसप्रकार सावधारण श्रुति कहती है । तात्पर्य यह है कि कार्यं प्रपञ्च विशिष्ट विचित्र आत्मा विज्ञेय नहीं है, किन्तु अविद्या कृत कार्य प्रपञ्चका विद्यासे बांध करते हुए आयतनभूत एकरस उसी एक आत्माको जानो । जैसे ‘ जिसपर देवदत्त बैठा है उसे ले आओ ' ऐसा कहनेपर [ श्रोता ] आसनको ही से आता है देवदत्तकों नहीं, वैसे ही आश्रयभूत एकरस आत्मा ही विज्ञेयरूपसे उपदिष्ट है । मिथ्या शरीरादि विकारोंमें आत्माभिमान करनेवालेकी ' मृत्योः स मृत्युमा ० ' ( जो अद्वितोय ब्रह्म में भेद - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्यु- जन्म मरण परम्पराको प्राप्त होता है ) इस प्रकार निन्दा सुनी जाती है । ' सर्व ब्रह्म ' ( सब ब्रह्म है ) यह सामानाधिकरण्य तो प्रपञ्चके बाधके लिए है, ब्रह्मकी अनेकरसता प्रतिपादन सत्यानन्दी - दीपिका आदिमें हैं जिसके ऐसे अन्तरिक्ष, मन, प्राण आदिरूप जगत्का आश्रय पर ब्रह्म ही हो सकता है, क्योंकि ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इत्यादि श्रुतियों में आयतन के लिए आत्मशब्दका प्रयोग किया गया है । यद्यपि आत्मशब्दसे जीव प्रसिद्ध है, तथापि उपाधिसे परिच्छिन्न जीव कार्य - कारणात्मक सम्पूर्ण जगत्का आयतन नहीं हो सकता है, इसलिए आत्मशब्द ठीक - ठीक ब्रह्ममें ही उपपन्न होता है । * ‘ यस्मिन्द्यौ पृथिवी ' इस विषयवाक्यसे पूर्व ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ' इस पूर्व और ' ब्रह्म-वेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म ' इस उत्तरवाक्यमें पुरुषशब्द अथवा ब्रह्मशब्द भी ब्रह्मका ही स्पष्ट वर्णन करता है, अतः ये दोनों मन्त्र ब्रह्मपरक हैं, ' यस्मिन्द्यौ पृथिवी ' यह मध्यवर्ती मन्त्र भी अवश्य ब्रह्मका ही प्रतिपापक है । इस प्रकार ब्रह्म ही स्वर्गादि प्रपञ्चका आयतन सिद्ध होता है । ' तमेवैकं ० ' इस श्रुतिवाक्यमें ' एव ' अवधारणार्थक ( निश्चयार्थक ) है । और श्रुति 6 ' एक ' शब्दसे अनेककी व्यावृत्ति कर आत्माको ही ज्ञेयरूपसे निर्देश करती है । इस प्रकार निर्विशेष ( निर्गुण ) ब्रह्म ही ज्ञेय है, सविशेष ( सगुण ) नहीं । ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति ' यह श्रुति भेदकी निन्दा करती है, और ' सर्वं ब्रह्म ' ( यह सब ब्रह्म है ) यह सामानाधिकरण्य श्रुतिवाक्य ब्रह्म में एकरूपता - एकत्वका प्रतिपादन करता है । जैसे
पृष्ठ 235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २०१ प्रतिपादनार्थम् । स यथा सैन्धवधनोऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽ-बाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ' ( बृह ० ४।५ । १३ ) इत्येकरसताश्रवणात् । तस्माद्दय स्वाद्यायतनं परं ब्रह्म । यत्तूक्तं - सेतुश्रुतेः सेतोच पारवत्त्वोपपत्तेर्ब्रह्मणोऽर्थान्तरेण द्युभ्वाद्यायतन भवितव्यमिति । अत्रोच्यते - विधारणत्वमात्रमत्र सेतुश्रुत्या विवध्यते, न पारवत्त्वादि । नहि मृद्दारुमयोलोके सेतुर्दष्ट इत्यत्रापि मृद्दारुमय एव सेतुरभ्युपगम्यते । सेतुशब्दार्थोऽपि विधारणत्वमात्रमेव न पारवत्त्वादिः षिञो बन्धनकर्मणः सेतुशब्दव्युत्पत्त ेः । अपर आह-' तसेचैलं जानथ आत्मानम् ' इति यदेतत्संकीर्तितमात्मज्ञानं यच्चैतत् ' अन्या वाचो विमुञ्चथ ' इति वाग्विमोचनं, तदत्रामृतत्वसाधनत्वात् ' अमृतस्यैष सेतुः ' इति सेतुश्रुत्या संकीर्त्यते, न तु द्युभ्वा-द्यायतनम् । तत्र तदुक्तं सेतुश्रुते ब्रह्मणोऽर्थान्तरेण युभ्वाद्यायतनेन भाव्यमित्येतदयुक्तम् ॥१ ॥
करने के लिए नहीं है, क्योंकि ' स यथा सैन्धवघनो ' ( जिस प्रकार नमकका डला अन्तर और बाह्य से रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयी! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ज्ञानैकरस ही है ) इस प्रकार आत्मा एकरस ( एकरूप ) सुना जाता है । अव द्युलोक, भूलोक आदिका आयतन परब्रह्म है । और जो यह कहा गया है कि श्रुतिमें सेतु शब्द है और सेतु पारवान् होता है, अतः द्यु भू लोकका आश्रय ब्रह्मसे अन्य पदार्थ होना चाहिए । उसके उत्तरमें कहते हैं —— यहाँ सेतुश्रुति से उसमें केवल विधारणत्व ही विवक्षित है पारवत्त्व आदि नहीं ॥ लोकमें मृत्तिका और लकड़ीका बना हुआ सेतु ( बांध - पुल ) देखने में आता है, परन्तु यहाँ ( प्रकरणमें ) मृत्तिका और दारुमय ही सेतुं स्वीकृत नहीं है, इसलिए सेतुशब्दका अर्थ भी विधारणत्व ही है पारवत्त्व आदि नहीं, कारण कि बन्धनार्थंक ' षिन् ' धातुसे सेतु शब्द निष्पन्न होता है । दूसरा कहता है - ' तमेवैकं ० ' ( उसी एक आत्माको जानो ) इसप्रकार जो आत्मज्ञानका संकीर्तन किया गया है । किञ्च ' अन्या वाचो विमुञ्चथ ' आत्मज्ञानातिरिक्त अनात्मपदार्थ प्रतिपादक जो अन्य वाणियोंके त्यागका वर्णन किया है, वह यहाँ अमृतरूपमोक्षका साधन होनेसे ' अमृतस्यैष सेतुः ' इसप्रकार सेतु श्रुतिसे स्पष्ट कहा जाता है, द्यु भू आदिके आश्रयका कथन नहीं होता है । इसके अतिरिक्त जो यह कहा गया है कि सेतु श्रुति - भू आदिका आयतनरूपसे ब्रह्मसे अन्य पदार्थ होना चाहिए, यह भी ठीक नहीं है ॥ १ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका स्थाणुमें अविद्यासे आरोपित चौर स्थाणुरूप है उससे भिन्न नहीं, वैसे अविद्यासे आरोपित यह सारा प्रपञ्च परमार्थतः ब्रह्म है, यह प्रपञ्चके बाधके लिए है, ' जो ब्रह्म है वह प्रपञ्च है ' इस प्रकार ब्रह्मके भिन्न - भिन्न स्वरूपके प्रतिपादन के लिए नहीं है । इसमें स यथा सैन्धवघनो ' यह नियामक श्रुति है, इसलिए सम्पूर्ण प्रपञ्चका आश्रय - अधिष्ठान ब्रह्म ही है । यद्यपि स्वयं ब्रह्म ही अमृत स्वरूप है, तथापि भेदकी कल्पना कर ' अमृतस्यैष सेतुः ' ऐसा कहा गया है । ' सेतु ' शब्दका अर्थ पारवत्त्व इसलिए भी नहीं हो सकता कि बन्धनार्थक षिञ् ' धातुसे ' तुमुन् ' प्रत्यय होकर सेतु शब्द निष्पन्न हुआ है ' सिनोति बध्नाति इति सेतु: ' इस व्युत्पत्तिसे भी यहाँ सेतु शब्दका अर्थ विधारण है । * द्यु - भू आदिका आश्रयरूप ब्रह्म सेतु शब्दका अर्थ कहकर सेतु श्रुतिकी सार्थकता दिखलायी गयी, अब ' अपर आह ' इत्यादिसे अन्य प्रकार से सेतु श्रुतिका अर्थ करते हैं । इससे पारवत्त्वकी शङ्का और आयतनरूपसे प्रधानादिकी कल्पना नहीं हो सकती । ' अमृतस्यैष सेतुः ' श्रुतिस्थ इस सेतु शब्दका अर्थं ब्रह्म नहीं किन्तु ब्रह्मज्ञान है, क्योंकि वह अमृतरूप मोक्षका हेतु है । यदि द्यु, भू आदिके आश्रय-रूपसे प्रधानको स्वीकार भी किया जाय, तो भी ब्रह्मज्ञानसे उपदिष्ट अमृतरूप फल जड़ प्रधानके ज्ञानसे असम्भव है, इसलिए यहाँ प्रधान आदिके ग्रहणका प्रसंग ही नहीं है ॥ १ ॥
पृष्ठ 236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ २ ॥
सूत्रार्थ - ' तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्त: ' इत्यादि श्रुतियोंसे ' मुक्त पुरुषोंसे ब्रह्म प्राप्य है । ' ऐसा वर्णन किया गया है, अतः द्यु भू आदिका अधिष्ठान ब्रह्म ही है । * इतश्च परमेव ब्रह्म द्युभ्वाद्यायतनम् । यस्मान्मुक्तोपसृष्यताऽस्य व्यपदिश्यमाना दृश्यते । मुक्तैरुपसृष्यं मुक्तोपसृष्यम् । देहादिष्वनात्मस्वहमस्मीत्यात्मबुद्धिरविद्या, ततस्तत्पू जनादौ रागस्तत्परिभवादौ द्वेषस्तदुच्छेददर्शनाद्वयं मोहश्चेत्येवमनन्तभेदोऽनर्थव्रातः संततः सर्वेषां न प्रत्यक्षः । तद्विपर्ययेणाविद्यारागद्वेषादिदोषमुक्तैरुपसृष्यं गम्यमेतदिति भ्वाद्यायतनं प्रकृत्य व्यपदेशो भवति । कथम्? ' भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ' ( मुण्ड ० २१२४ ) इत्युक्त्वा ब्रवीति - ' तथा विद्वान्ना-मरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ' ( मुण्ड ३२२८ ) इति । ब्रह्मणश्च मुक्तोपसृप्यत्वं प्रसिद्धं शास्त्रे - ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ' ( बृह ० ४।४।७ ) इत्येवमादौ । प्रधानादीनां तु न क्वचिन्मुक्तोपसृप्यत्वमस्ति प्रसिद्धम् । * अपि च ' तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ' इति वाग्विमोकपूर्वकं विज्ञेयत्वमिह द्युभ्वाद्यायतनस्योच्यते । तच्च श्रुत्यन्तरे ब्रह्मणो दृष्टम् — ' तमेव धीरो विज्ञाय और इससे द्यु, आदिका आयतन परब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें मुक्तोंसे प्राप्यताका व्यपदेश दृष्ट है अर्थात् वह मुक्तपुरुषोंसे प्राप्य कहा गया है । मुक्तोंसे प्राप्यको मुक्तोपसृप्य कहते हैं । देहादि अनात्मपदाथोंमें ' मैं हूं ' ऐसी आत्मबुद्धि अविद्या है । उससे उन देहादिमें पूजन- सम्मान आदिमें राग, उनके अपमान आदिसे द्वेष, उनके नाशदर्शनसे मय और मोह इस प्रकार यह अनेक प्रकारका निरन्तर वर्तमान सर्वत्र फैला हुआ अनर्थ समुदाय हम सबको प्रत्यक्ष है । परन्तु इसके विपरीत अविद्या, राग, द्वेष आदि दोषोंसे मुक्त हुए पुरुषोंसे यह ब्रह्म उपसृप्य प्राप्य है । द्यु भु आदिके आयतन ( ब्रह्म ) को प्रकृतकर व्यपदेश है । कैसे? ' भिद्यते हृदयग्रन्थि ० ' ( उस परावर ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इस जीवकी हृदय ग्रंथि टूट जाती है; सारे संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इसप्रकार कहकर श्रुति पुन: कहती है ' तथा विद्वान् ० ' ( उसी प्रकार विद्वान् नाम - रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ) और ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते ० ' ( जिस समय इसके हृदयमें आश्रित ऐहिक एवं पारलौकिक भोगकी सम्पूर्ण वासनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं उस समय मरण-धर्मा यह मनुष्य अमृत हो जाता है, इसी शरीरमें उसे ब्रह्मप्राप्ति हो जाती है ) इत्यादि शास्त्रमें ब्रह्म मुक्तपुरुषोंसे प्राप्य है यह प्रसिद्ध ही है । प्रधानादि तो कहीं भी मुक्तपुरुषोंसे वाप्य प्रसिद्ध नहीं हैं । इसके अतिरिक्त ' तमेवैकं जानथ ० ' ( उस एक आत्माको ही जानो और सब बातोंको छोड़ दो । यही अमृत [ मोक्ष प्राप्ति ] का सेतु [ साधन ] है ) इस प्रकार वाणीके त्याग पूर्वक भू आदिका आश्रय ( ब्रह्म ) ही यहाँ विज्ञेयरूप से कहा गया है । ' तमेव धीरो विज्ञाय ० ' ( उसे ही जानकर बुद्धिमान् सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि ब्रह्म सबका अपना स्वरूप होनेसे नित्य प्राप्त है, तो भी अविद्यासे स्वभिन्न- सा प्रतीत होता है । जब ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि. महावाक्यों द्वारा इसे ' मैं ब्रह्म ही हूँ ' ऐसा आत्म-ज्ञान हो जाता है, तब जैसे गङ्गा आदि नदियाँ नाम और रूपको छोड़कर समुद्ररूप हो जाती हैं, वैसे यह विद्वान् नाम - रूपसे मुक्त होकर ज्योतिःस्वरूप आत्माको प्रत्यग्र रूप से प्राप्त होता है । कण्ठभूषण के समान अविद्याकी निवृत्तिसे ब्रह्म प्राप्त - सा प्रतीत होता है, बस इसे ही मुक्त पुरुषोंद्वारा प्राप्य कहा गया है । * ‘ अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा । जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥ ' ( पा ० शि ० १३ ) ( हृदय, कण्ठ, शिर, जिह्वामूल, दांत, नासिका, ओठ, तालु ये आठ वागि-
पृष्ठ 237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० १ सू ० २-३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद्वहून्शब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ' । ( बृह ० तस्मादपि द्युभ्वाद्यायतनं परं ब्रह्म ॥२ ॥
नानुमानमतच्छब्दात् ॥ ३ ॥
पदच्छेद - न, अनुमानम्, अतच्छब्दात् । सूत्रार्थ - ( अनुमानम् ) सांख्प शास्त्रमें कल्पित प्रधान ( न ) द्यु, भू हो सकता, ( अतच्छब्दात् ) क्योंकि श्रुतिमें प्रधान प्रतिपादक कोई शब्द नहीं है । २०३ ४ । ४ । २१ ) इति । आदिका आश्रय नहीं * यथा ब्रह्मणः प्रतिपादको वैशेषिको हेतुरुक्तो नैवमर्थान्तरस्य वैशेषिको हेतुः प्रति-पादकोऽस्तीत्याह । नानुमानिकं सांख्य स्मृतिपरिकल्पितं प्रधानमिह द्युभ्वाद्यायतनत्वेन प्रति-पत्तव्यम् । कस्मात्? अतच्छब्दात् । तस्याचेतनस्य प्रधानस्य प्रतिपादकः शब्दस्तच्छब्दः, न तच्छन्दोऽतच्छब्दः । न ह्यत्राचेतनस्य प्रधानस्य प्रतिपादकः कश्चिच्छन्दोऽस्ति, येनाचेतनं प्रधानं कारणत्वेनायतनत्वेन वाऽवगम्येत । तद्विपरीतस्य चेतनस्य प्रतिपादकशब्दोऽत्रास्ति - ' य ' सर्वज्ञः सर्ववित् ' ( मुण्ड ० १ | १ | ९ ) इत्यादिः । अत एव न वायुरपीह द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रीयते ॥३ ॥
प्राणभृच्च || ४ || पदच्छेद – प्राणभृत्, ' च । सूत्रार्थ - प्राणभृत् - जीव भी द्यु - भू आदिका आश्रय नहीं है, क्योंकि उसका प्रतिपादक शब्द नहीं है । * यदपि प्राणभृतो विज्ञानात्मन आत्मत्वं चेतनत्वं च संभवति, तथाप्युपाधिपरि-ब्राह्मण उसमें प्रज्ञा करे अर्थात् वाक्यार्थं ज्ञानका सम्पादन करे – बहुत शब्दोंका चिन्तन न करे | वह तो वाणीके लिए श्रम है ) इस अन्य श्रुतिमें भी विज्ञेय ब्रह्म है, यह देखा गया है । इससे भी द्यु, भू आदिका आयतन परब्रह्म ही है ॥ २ ॥
उक्त प्रसंग में जैसे ब्रह्मका प्रतिपादक विशेष असाधारण हेतु ( आत्मशब्द आदि ) कहा गया है, वैसे अन्य पदार्थका प्रतिपादक कोई विशेष हेतु नहीं है, इसलिए कहते हैं कि ' नानुमानिकम् ' सांख्य स्मृतिमें कल्पित प्रधानको यहाँ द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे स्वीकार करना युक्त नहीं है, क्योंकि वह अतत् शब्द है । उस अचेतन प्रधानका प्रतिपादक शब्द ' तत् शब्द ' और ' तत् शब्द ' से भिन्न ' अतत् शब्द ' हुआ । यहाँ अचेतन प्रधानका प्रतिपादक ऐसा कोई शब्द नहीं है कि जिससे अचेतन प्रधान कारणरूपसे अथवा आश्रयरूपसे अवगत होता हो, किन्तु यहाँ तो इसके विपरीत चेतनके ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि प्रतिपादक शब्द हैं । इन्हीं कारणोंसे वायुको भी यहाँ छु, भू ' fast आश्रयरूपसे स्वीकार नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥
यद्यपि प्राणधारी जीवमें आत्मत्व और चेतनत्व सम्भव हैं, तो भी उपाधि से परिच्छिन्न. ज्ञानवाले सत्यानन्दी - दीपिका न्द्रियके स्थान हैं इनसे वर्ण आदिका उच्चारण होता है, अतः इन्हें वाक् शब्दसे कहा जाता है, इसलिए आत्मस्वरूपके प्रतिपादक वेदान्त वाक्योंका चिन्तन और कथन करो ऐसा श्रुतिका तात्पर्य है । सुतरां यह सिद्ध होता है कि भू आदिका आयतन परब्रह्म है प्रधान आदि नहीं ॥ २ ॥
* ‘ तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' ' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' इत्यादि श्रुतियोंमें जैसे ब्रह्म के प्रतिपादक आत्मा और चेतन आदि अनेक असाधारण शब्द हैं, वैसे प्रधान वाचक कोई असाधारण शब्द नहीं है, जिसके बलसे वह द्यु, भू आदिका आश्रय हो, अत: श्रुति प्रतिपादित न होनेसे प्रधान और वायु द्यु, भू आदिका आश्रय नहीं हो सकते, किन्तु ब्रह्म ही आश्रय है ॥ ३ ॥ 1
** शङ्का – ' नानुमानप्राणभृतावतच्छब्दात् ' ( प्रधान और जीव द्यु, भू आदिके आश्रय नहीं हैं, क्योंकि श्रुतिमें इसके विपरीत ब्रह्म प्रतिपादक शब्द हैं और दोनोंका प्रतिपादक शब्द श्रुतिमें नहीं है,
पृष्ठ 238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ छिन्नज्ञानस्य सर्वज्ञत्वाद्यसंभवे सत्यस्मादेवातच्छब्दात्प्राणभृदपि न द्यभ्वाद्यायतनत्वेना-श्रयितव्यः । न चोपाधिपरिच्छिन्नस्याविभोः प्राणभृतो द्युभ्वाद्यायतनत्वमपि सम्यक्संभवति । पृथग्योगकरणमुत्तरार्थम् ॥ ४ ॥
कुतश्च न प्राणभृद्दयुभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः-भेदव्यपदेशात् ॥ ५ ॥
सूत्रार्थ - ' तमेकं विजानथ ' ( उसी एक आत्माको जानो ) इस प्रकार श्रुतिमें ज्ञाता और ज्ञेयरूपसे जीव और परमात्मा के भेदका कथन है, अतः जीव द्यु भू आदिका आश्रय नहीं है । भेदव्यपदेशश्चेह भवति - ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इति ज्ञेयज्ञातृभावेन । तत्र प्राणभृत्तावन्मुमुक्षुत्वाज्ज्ञाता, परिशेषादात्मशब्दवाच्यं ब्रह्म ज्ञेयं द्युभ्वाद्यायतनमिति गम्यते, न प्राणभृत् ॥५ ॥
कुतश्च न प्राणभृद्दयुभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः-प्रकरणात् ॥ ६ ॥
सूत्रार्थ - ' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते ० ' इस प्रकार ब्रह्मका प्रकरण होनेसे जीव द्यु भू - आदिका आश्रय नहीं है । प्रकरणं चेदं परमात्मनः; ' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' ( मु ० १ | १ | ३ ) इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानापेक्षणात् । परमात्मनि हि सर्वात्मके विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं स्यान केवले प्राणभृति ॥६ ॥
कुतश्च न प्राणभृद्दयुभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः-जीवमें सर्वज्ञत्व आदिका संभव न होनेके कारण इस ' अतत् शब्दसे ' ही जीवात्माका भी भू आदिके आयतनरूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता है । किच उपाधि परिच्छिन्न अविभू - अव्यापक जीवात्मा -भू आदिका आश्रय भी तो मली - भांति नहीं हो सकता । अग्रिम सूत्र में केवल जीवका ही ग्रहण हो, इस आवृत्तिके लिए ही इस सूत्र की पृथक् रचना की गई है ॥ ४ ॥
और किस कारण से जीवका द्यु भू आदिके आश्रयरूपसे ग्रहण नहीं करना चाहिए? ‘ तमेवैकं जानथ ं ० ( उसी एक आत्माको जानो ) इस प्रकार यहाँ ज्ञेय और ज्ञातृभावसे भेदका कथन है । उसमें जीव मुमुक्षु होनेसे ज्ञाता है, और परिशेषसे - अवशिष्ट होनेसे आत्मशब्दवाच्य ज्ञेय ब्रह्म द्यु, भू आदिका आश्रय है, ऐसा ज्ञात होता है, जीव आश्रय नहीं है ॥ ५ ॥
और किस कारणसे जीवका द्यु भू आदिके माश्रयरूपसे नहीं ग्रहण करना चाहिए? और यह प्रकरण भी परमात्माका है, क्योंकि ' कस्मन्नु भगवो ० ' ( हे भगवन्! किसके विज्ञात होनेपर यह सब ज्ञात हो जाता है ) इस प्रकार एकके ज्ञानसे सबके विज्ञानकी अपेक्षा ( जिज्ञासा ) की गयी है । निश्चय ही सर्वात्मक परमात्मा के विज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात हो जाता है, केवल जीवके विज्ञात होनेपर यह सब विकार मात्र ज्ञात नहीं हो सकता ॥ ६ ॥
और भू आदिके आश्रयरूपसे जीवका ग्रहण क्यों नहीं करना चाहिए? सत्यानन्दी - दीपिका इसलिए दोनों अंतत् शब्द हैं ) इन दोनोंके निराकरण करनेके लिए ऐसे एक ही सुत्रकी रचना क्यों नहीं की गयी है? समाधान - भेदव्यपदेशात् ' इस अगले सूत्रसे जीव और प्रधान दोनोंके ग्रहणका सम्भव है, परन्तु इस सूत्र से प्रधानका भी ग्रहण हो यह सूत्रकारको अभीष्ट नहीं है, सूत्रकारको तो केवल जीवका ग्रहण अभीष्ट है, इसलिए सूत्रकारने ' प्राणभृच्च ' इस सूत्रकी पृथक् रचना की है ॥ ४ ॥
पृष्ठ 239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अघि ० १ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २०५ स्थित्यदनाभ्यां च ॥ ७ ॥
पदच्छेद - स्थित्यदनाभ्याम् च । सूत्रार्थ - ' द्वा सुपर्णा ' इस मन्त्रमें परमेश्वरकी उदासीनमावसे स्थिति और दूसरे - जीवको कर्मफलके भक्षणका निर्देश है, इस तरह स्थिति और मक्षणरूप हेतुओंसे मी द्यु भू. आदिका आश्रय जीव नहीं है, किन्तु ब्रह्म है । * द्युभ्वाद्यायतनं च प्रकृत्य ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया ' ( मु ० ३ | १ | १ ) इत्यत्र स्थित्यदने निर्दिश्येते । ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति ' इति कर्मफलाशनम्, ' अनइनन्नन्योऽभिचाक-शीति ' इत्यौदासीन्येनावस्थानं च । ताभ्यां च स्थित्यदनाभ्यामीश्वरक्षेत्रज्ञौ तत्र गृह्येते । यदि चेश्वरो द्यभ्वाद्यायतनत्वेन विविक्षतस्ततस्तस्य प्रकृतस्येश्वरस्य क्षेत्रज्ञात्पृथग्वचनमवकल्पते । अन्यथा ह्यप्रकृतवचनमाकस्मिकम संबद्धं स्यात् । * ननु तवापि क्षेत्रज्ञस्येश्वरात्पृथग्वचनमा-कस्मिकमेव प्रसज्येत । नः तस्याविवक्षितत्वात् । क्षेत्रज्ञो हि कर्तृत्वेन भोक्तृत्वेन च प्रति-शरीरं बुद्ध्याद्युपाधिसंबद्धो लोकत एव प्रसिद्धो नासौ श्रुत्या तात्पर्येण विवक्ष्यते । ईश्वरस्तु लोकतोऽप्रसिद्धत्वाच्छ्रुत्या तात्पर्येण विवक्ष्यत इति न तस्याकस्मिकं वचनं युक्तम् । गुहां और द्यु भू आदिके आश्रयको प्रस्तुतकर ' द्वा सुपर्णा ० ' ( साथ - साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी शरीररूपी एक वृक्षका आश्रय कर रहते हैं ) इस मन्त्र में स्थिति और भक्षणका निर्देश किया गया है । ' तयोरन्य: ० ' ( उनमें से एक [ जीव ] तो स्वादिष्ट - मधुर कर्मफलका भोग करता है ) इस मन्त्रांश वाक्यमें कर्मफलका उपभोग और ' अनश्नन्नन्यो ० ' ( दूसरा - ईश्वर भोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ) इसमें उदासीनतापूर्वक स्थिति निर्दिष्ट है । इस स्थिति और भक्षणसे इस मन्त्रमें ईश्वर और जीवका ग्रहण किया जाता है । और यदि ईश्वर द्यु भू आदिके आश्रयरूपसे विवक्षित हो तो उस प्रकृत ईश्वरका क्षेत्रज्ञसे पृथक् वचन [ ' अनम्नन्नन्यो ० ' ] उपपन्न होता है, अन्यथा यह अप्रकृत वचन, आकस्मिक और असम्बद्ध हो जायगा । परन्तु तुम्हारा भी क्षेत्रज्ञ - जीवका ईश्वरसे पृथक् कथन आकस्मिक ही प्रसक्त होगा । नहीं, क्योंकि जीव अविवक्षित है । क्षेत्रज्ञ तो कर्ता और भोक्तारूपसे प्रतिशरीरमें बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त है और लोकमें प्रसिद्ध है, इसलिए वह श्रुति तात्पर्यसे विवक्षित नहीं है अर्थात् उसकी विवक्षामें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है । ईश्वर तो लोकमें अप्रसिद्ध होनेसे श्रुतिके तात्पर्यसे विवक्षित है अर्थात् उसके प्रतिपादनमें श्रुतिका तात्पर्य है, इसलिए उसे आकस्मिक कहना युक्त नहीं है । ' गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि ' ( ब्र ० सू ० १ २०११ ) इस सूत्र में भी सत्यानन्दी - दीपिका * ' द्वा सुपर्णा ० ' इस मन्त्रमें स्थिति ( रहना ) से ईश्वर और मक्षणसे जीवका निर्देश है । यहाँ ईश्वर पदसे उपाधि रहित शुद्ध ब्रह्मका ग्रहण युक्त है सर्वज्ञत्व आदि गुण विशिष्टका नहीं; क्योंकि वह यहाँ प्रतिपाद्य नहीं है । प्रतिपाद्य इसलिए नहीं है कि ईश्वरकी उदासीनतापूर्वक स्थिति सम्भव नहीं है । किच अप्रतिपाद्य अर्थका अकस्मात् मध्यमें कथन अप्रकृत, आकस्मिक असम्बद्ध होता है । इससे उसका प्रतिपादक होने से ' अनश्नन्नन्यो ' यह श्रुतिवाक्य भी अप्रकृत, आकस्मिक और असम्बद्ध हो जायगा । जब ईश्वरपदसे शुद्ध ब्रह्मका ग्रहण करते हैं तो ब्रह्मका जीवसे ' अनश्नन्नन्यो ' यह पृथक् वचन संगत होता है । इसलिए ' अनश्नन्नन्यो ० ' यह श्रुति वाक्य शुद्ध ब्रह्मका ही प्रतिपादक है । इस प्रकार इस मन्त्र में स्थिति और भक्षण पदके निर्देशसे जीव और ब्रह्मका भेदपूर्वक वर्णन है । इसलिए जीव नियम्य है और ईश्वर नियामक | ग्रंथकारके आशयको न समझकर पूर्वपक्षी ' ननु ' से शङ्का करते हैं । यदि भायतनरूपसे जीवको विवक्षित न मानें तो तुम्हारे सिद्धान्त में भी ईश्वरके बोधक वचनोंसे भिन्न जीव बोधक ' तयोरन्यः ' इत्यादि वचन आकस्मिक ही होंगे । सिद्धान्ती इस शङ्काका
पृष्ठ 240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ प्रविष्टावात्मानौ हि ' ( ब्र ० १ | २ | ११ | ३ ) इत्यत्राप्येतद्दर्शितं ' द्वा सुपर्णा ' इत्यस्यामृचीश्वर क्षेत्रज्ञा-वुच्येते इति । यदापि पैङ्गयुपनिषत्कृतेन व्याख्यानेनास्यामृचि सत्त्वक्षेत्रज्ञावुच्येते तदापि न विरोधः कश्चित् । कथम्? प्राणभृद्धीह घटादिच्छिद्रवत्सत्त्वाद्युपाध्यभिमानित्वेन प्रति-शरीरं गृह्यमाणो द्युभ्वाद्यायतनं न भवतीति निषिध्यते । यस्तु सर्वशरीरेषुपाधिभिर्विनोप-लक्ष्यते, परमात्मैव स भवति । यथा घटादिच्छिद्राणि घटादिभिरुपाधिभिर्विनोपलक्ष्यमा-णानि महाकाश एव भवन्ति, तद्वत् प्राणभृतः परस्मादन्यत्वानुपपत्तेः प्रतिषेधो नोपपद्यते । तस्मात्सत्त्वाद्युपाध्यभिमानिन एव द्युभ्वाद्यायतनत्वप्रतिषेधः । तस्मात्परमेव ब्रह्म भ्वाद्या यतनम् । तदेतत् ' अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ' ( ज ० सू ० १।२।२१ ) इत्यनेनैव सिद्धम् । तस्यैव हि भूतयोनिवाक्यस्य मध्य इदं पठितम् ' यस्मिन्यौ पृथिवी चान्तरिक्षम् इति । प्रपञ्चार्थं तु पुनरुपन्यस्तम् ॥७ ॥
( २ भूमाधिकरणम् सू ० ८ - ९ ) भूमा संप्रसादादध्युपदेशात् ॥ ८ ॥
पदच्छेद – भूमा, सम्प्रसादाद्, अधि, उपदेशात् । सूत्रार्थ - ( भूमा ) ' भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्यः ' यह श्रुत्युक्त भूमा परमात्मा ही है । ( संप्रसादादधि ) क्योंकि संप्रसाद संज्ञक प्राणके उपदेशके अनन्तर ( उपदेशात् ) उसका उपदेश है । * इदं समामनन्ति - ' भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति । यह ( जीव और परमात्मा ) दिखलाया गया है कि यहाँ ' द्वा सुपर्णा ० ' इस ऋचामें भी ईश्वर और क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं । यद्यपि पैङ्गी उपनिषद् कृत व्याख्यानके अनुसार इस ऋचामें बुद्धि और क्षेत्रज्ञ कहे गये हैं तो भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि यहाँ घटादिच्छिद्र के समान सत्त्व आदि उपा-धियोंके अभिमानिरूपसे प्रतिशरीरमें गृह्यमाण जीवात्मा द्यु, भू आदिका आश्रय नहीं है, इसप्रकार निषेध किया गया है । परन्तु जो सब शरीरोंमें उपाधियोंके विना उपलक्षित होता है, वह परमात्मा ही है । जैसे घटादि उपाधिके विना उपलक्षित होनेवाले घटादि छिद्र ( आकाश ) वस्तुतः महाकाश ही हैं, वैसे परमात्मासे अन्यत्व अनुपपत्ति होनेसे जीवात्माका द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे प्रतिषेध करना युक्त नहीं है । प्रत्युत बुद्धि आदिके अभिमानीका हो द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे प्रतिषेध है । इससे परब्रह्म ही द्यु, भू आदिका आयतन है । यही बात ' अदृश्यत्वादि ० ' ( ब्र ० सू ० १।२।२१ ) इस सूत्र से ही सिद्ध हो चुकी है । उसी भूतयोनि वाक्यके मध्य में ' यस्मिन्द्यौः ० ' यह मन्त्र भी पठित है । यहाँ तो विस्तार के लिए पुनः इसका उपन्यास किया गया है ॥ ७ ॥
छान्दोग्य उपनिषद् में ' भूमा त्वेव ० ' ( सनत्कुमार - हे नारद! भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा सत्यानन्दी -दीपिका ' न ' आदिसे समाधान करते हैं कि यहाँ आयतनरूपसे जीव विवक्षित नहीं है, इसलिए उसके प्रति-पादनमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है । * पैङ्गी उपनिषद्के व्याख्यानमें जीव और ईश्वरके स्थानमें बुद्धि और क्षेत्रज्ञका ग्रहण किया गया है, ऐसा मानने पर भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि यहाँ बुद्धि शब्दसे बुद्धि उपाधि युक्त जीवको समझना चाहिए और क्षेत्रज्ञ शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए । दुर्विज्ञेय ब्रह्मके सम्यग्ज्ञानके लिए सूत्रकारने ' द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ' इस सूत्र की रचना की है । इससे यह सिद्ध हुआ कि परब्रह्म ही, भू आदिका आश्रय - अधिष्ठान है उपाधि युक्त परिच्छिन्न जीव नहीं है ॥ ७ ॥
* पूर्वमें आत्मशब्दके बलसे द्यु, भू आदिका अधिष्ठान ब्रह्म कहा गया है । वह युक्त नहीं है,