श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 241–250
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 241–250
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अधि ० २ सू ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २०७ यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पभ् ' ( छा ० ७।२३, २४ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किं प्राणो भूमा स्यात्, आहोस्वित्पर-मात्मेति । कुतः संशयः? भूमेति तावद्वहुत्वमभिधीयते; ' बहोर्लोपो भ्रू च बहोः ' ( पा ० ६ | ४ | १५८ ) इति भूमशब्दस्य भावप्रत्ययान्तता स्मरणात् । किमात्मकं पुनस्तद्वहुत्वमिति विशेषा-काङ्क्षायां ' प्राणी वा आशाया भूयान् ' ( छा ० ७ | १५ | १ ) इति संनिधानात्प्राणो भूमेति प्रतिभाति । तथा ' श्रुतं मे भगवद्दृशंभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति । सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवान्शो-कस्थं पारं तारयतु ं ( छा ० ७ | १ | ३ ) इति प्रकरणोत्थानात्परमात्मा भूमेत्यपि प्रतिभाति । तत्र कस्योपादानं न्याय्यं कस्य वा हानमिति भवति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? * प्राणो भूमेति । कस्मात्? भूयः प्रश्नप्रतिवचनपरम्पराऽदर्शनात् । यथा हि ' अस्ति भंगको नाम्नो भूयः ' इति, ' वाग्वाब नाम्नो भूयसी ' इति । तथा ' अस्ति भगवो वाचो भूयः ' इति; ' मनो वाव बाचो भूयः ' इति च नामादिभ्यो ह्या प्राणाद्भूयः प्रश्नप्रतिवचनप्रवाहः प्रवृत्तः । नैवं प्राणात्परं भूयः करनी चाहिए | नारद — हे भगवन्! मैं भूमाको विशेषरूप से जिज्ञासा करता हूँ ) [ तत्र सनत्कुमार ने भूमाके स्वरूपका वर्णन करते हुए कहा ] ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( जिसमें स्थित पुरुष दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता, दूसरेको नहीं जानता वह भूमा है, किन्तु जहाँ कुछ अन्य देखता है, कुछ अन्य सुनता है एवं कुछ अन्य जानता है वह अल्प है ) इत्यादि कहते हैं । यहाँ संशय होता है कि प्राण भूमा है अथवा परमात्मा? संशय क्यों होता है अर्थात् संशयका कारण क्या है? क्योंकि भूमा तो बहुतको कहते हैं । ' बहोलोंपो ० ' इस पाणिनीय सूत्रसे ' भूमा ' शब्दको भावप्रत्ययान्त कहा गया है । तो उसका बहुत्व किमात्मक है? इसप्रकार आशासे अधिककी विशेष आकांक्षाके क्रम में ' प्राणो वाव, ( प्राण ही आशासे अधिक है ) इस तरह सान्निध्यसे प्राण ही भूमा है ऐसा प्रतीत होता है । परन्तु प्रकरणानुसार तो ' श्रुतं ह्येवं ० ' ( नारद - मैंने आप जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पारकर लेता हैं अर्थात् शोकसे मुक्त हो जाता है, और हे भगवन्! मैं शोकयुक्त हूँ, मुझको शोकसे पार कर दीजिए— शोकसे मुक्तकर दीजिए ) परमात्मा ही भूमा है, ऐसा भी प्रतीत होता है । अब इन दोनोंमें किसका ग्रहण और किसका त्याग करना युक्त है । ऐसा संशय प्राप्त होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - प्राण भूमा है किससे? इससे कि इसके आगे - भूय आधिक्य विषयक प्रश्न और उत्तरकी परंपराका दर्शन नहीं होता है । जैसे कि ' अस्ति भगव ० ' ( नारद --- हे भगवन्! क्या नामसे भी कुछ अधिक है? ) ' वावाव ० ' ( सनत्कुमार- वाणी ही नामसे अधिक है ) और ' अस्ति भगवो ० ' ( नारद - हे भगवन्! वाणीसे कोई अधिक है? ) ' मनो वाव ० ' ( सनत्कुमार- —-मन ही वाणीसे अधिक ( बढ़कर ) है | इस प्रकार नाम आदिसे लेकर प्राणतक क्रमशः अधिकता विषयक प्रश्न और उत्तरका प्रवाह प्रवृत्त है, सत्यानन्दी - दीपिका क्योंकि ' तरति शोकमात्मवित् ' यहाँपर अब्रह्म प्राण में आत्मशब्दका प्रयोग है । इस आक्षेप संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है । यहाँ भूमा शब्दका मुख्य अर्थं तो बहुत है, क्योंकि ' बहोर्लोपो भू च बहोः इस पाणिनीय सूत्रसे ' बहु ' के स्थानमें ' भू ' आदेश हुआ है, और ' भू ' शब्दके उत्तर ' पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ' इस सूत्र से मात्र अर्थमें ' इमनिच् ' प्रत्यय होकर ' भूमन् ' ( भूमा ) शब्द निष्पन्न हुआ है । ' भूमन् ' शब्दका अर्थ बहुत है । यहाँ श्रुतिमें प्राण और परमात्मा दोनो में भूमा शब्दका प्रयोग देखनेमें आता है, अतएव सन्देह होता है कि भूमा शब्दसे किसका ग्रहण करना चाहिए । * नारद --हे भगवन्! नामसे अधिक क्या है? सनत्कुमार - वाणी ही नामसे अधिक है । वाणी से अधिकं? मन, मनसे अधिक? चित्त, चित्तसे अधिक? ध्यान, ध्यानसे अधिक? विज्ञान - शास्त्रीय ज्ञान, विज्ञानसे अधिक? बल - शास्त्र के अर्थका प्रतिभास, बलसे अन्न, अन्नसे जल, जलसे तेज, तेजसे
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२०८ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ प्रश्नप्रतिवचनं दृश्यते - अस्ति भगवः प्राणाद्भूय इति, अदो वाव प्राणाद्भूयइति । प्राणमेव तु नामादिभ्य आशान्तेभ्यो भूयांसं ' प्राणो वा आशाया भूयान् ' इत्यादिना सप्रपञ्चमुक्त्वा प्राणदर्शिनश्चातिवादित्वम् — ' अतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नवीत ' इत्यभ्यनुज्ञाय ' एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति ' इति प्राणव्रतमतिवादित्वमनुकृष्या परित्यज्यैव प्राणं ' सत्यादिपरम्परया भूमानमवतारयन्प्राणमेव भूमानं मन्यत इति गम्यते कथं पुनः प्राणे भूमनि व्याख्यायमाने ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इत्येतद्भूम्नो लक्षणपरं वचनं व्याख्यायेतेति? उच्यते- सुषुप्त्यवस्थायां प्राणग्रस्तेषु करणेषु दर्शनादिव्यहारनिवृत्तिदर्शनात्संभवति प्राण-ख्यापि ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इत्येतल्लक्षणम् । तथा च श्रुतिः ' न शृणोति न पश्यति ' इत्यादिना सर्वकरणव्यापार प्रत्यस्तमयरूपां सुषुप्त्यवस्थामुक्त्वा ' प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति ' ( प्र ०४ । २। १ ) इति तस्यामेवावस्थायां पञ्चवृत्तेः प्राणस्य जागरणं ब्रुवती प्राणप्रधानां सुषुप्त्यवस्थां दर्शयति । यच्चैतद्भूम्नः सुखत्वं श्रुतम् – ' यो वै भूमा तत्सुखम् ' ( छा ० ४।२३ ) इति, तदप्य-विरुद्धम्; ‘ अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ यदेतस्मिञ्शरीरे सुखं भवति ' ( प्र ० ४।४ ) इति सुषुप्त्य-किन्तु प्राणके आगे ' हे भगवन्! प्राणसे अधिक कुछ है? ' निश्चय, यह प्राणसे अधिक है; इस प्रकार और आगे अधिकका प्रश्न और प्रतिवचन क्रम नहीं दिखाई देता । परन्तु ' प्राणो वा ० ' ( प्राण हो आशासे अधिक है ) इत्यादिसे विस्तारपूर्वक प्राणको ही नाम आदिसे लेकर आशा पर्यन्त समस्त पदार्थोंसे अधिक कहकर ' अतिवाद्यसी ० ' ( तुम अतिवादी हो? किसीके ऐसा प्रश्न करनेपर ' मैं श्रेष्ठ-वादी हूँ ' ऐसा कहे, अपने अतिवादी होनेका निषेध न करे ) इस प्रकार प्राणदर्शीमें अतिवादिता स्वीकार कर ' एष तु वा ० ' ( निश्चय यह अतिवादी होता है जो सत्यसे अतिवादी होता है ) इस प्रकार अतिवादित्व प्राणव्रतकी अनुवृत्ति करके प्राणका परित्याग किये विना ही सत्य आदि परम्परासे भूमाका अवतरण करते हुए सनत्कुमार प्राणको ही भूमा मानते हैं, ऐसा ज्ञात होता है । यदि प्राणका ही भूमारूप से व्याख्यान करें तो ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' भूमाके लक्षण परक इस वाक्यका किस प्रकार व्याख्यान करोगे? तो इसके उत्तर में पूर्वपक्षी कहता है कि सुषुप्ति अवस्था में प्राणमें लीन हुए इन्द्रियोंका दर्शनादि व्यवहार निवृत्त हुआ देखा जाता है । इसलिए ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( जहाँ अन्यको नहीं देखता ) इस प्रकार भूमाका स्वरूप प्रतिपादक यह लक्षण प्राणमें मी सम्भव है । क्योंकि ' न शृणेति न पश्यति ' ( सुषुप्त पुरुष देखता नहीं सुनता नहीं ) इत्यादिसे श्रुति जिसमें सब इन्द्रियों के व्यापार अस्त हो जाते हैं उस अस्तमय रूप सुषुप्ति अवस्थाको कहकर ' प्राणाग्नय ' ( प्राणरूप अग्नियाँ ही इस शरीर में जागती हैं- स्व व्यापार करती हैं ) इस प्रकार उसी अवस्थामें पाँच वृत्तिवाले प्राणका जागरण - कहती हुई प्राण प्रधान सुषुप्ति अवस्थाको दिखलाती है । और ' यो वै भूमा ० " ' ( निश्चय जो भूमा है वह सुख है ) इस प्रकार श्रुति भूमाको सुखरूप कहती है वह भी विरुद्ध नहीं. है, क्योंकि ' अत्रैष देवः ० ' ( उस समय यह देव - जीव स्वप्न नहीं देखता, उस समय शरीर में यह सुख सत्यानन्दी - दीपिका आकाश, आकाशसे स्मृति, क्योंकि स्मृति होनेपर ही ईश्वरसे आकाश आदिकी उत्पत्ति होती है । स्मृतिसे अधिक आशा है; आशाके होनेपर ही स्मृति बनी रहती है । ' प्राणो वा आशाया भूयान् ' ( प्राण ही आशासे महान् है ) प्राणके होनेपर ही आशा रहती है । इस प्रकार नारद और सनत्कुमारका आधिक्य विषयक प्रश्नोत्तर प्राण पर्यंन्त ही हुआ है आगे नहीं । प्रणवेत्ताको ही श्रेष्ठ-वादी कहा गया है । इसलिए सबसे महान् होनेसे प्राण भूमा है । * ' गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचन आहवनीयः प्राणः ' ( यह अपान गार्हपत्य, व्यान अन्वाहार्यपचन और प्राण आहवनीय है ) इस श्रुतिमें प्राण आदिका अग्निरूपसे प्रतिपादन
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अधि ० २ सू ० ८ ] भावानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २० ९ वस्थायामेव सुखश्रवणात् । यच्च ' यो वै भुमा तदमृतम् ( छा ० ७।२४ । १ ) इति, तदपि प्राणस्या-विरुद्धं; ‘ प्राणो वा अमृतम् ' ( कौ ० ३।२ ) इति श्रुतेः । कथं पुनः प्राणं भूमानं मन्यमानस्य ' तरति शोकमात्मवित् ' इत्यात्मविविदिषया प्रकरणस्योत्थानमुपपद्यते? प्राण एवेहात्मा विवक्षित इति ब्रूमः । तथा हि - ' प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्य: प्राणो ब्राह्मणः ' छा ० ७।१५।१ ) इति प्राणमेव सर्वात्मानं करोति । ' यथा वा अरा नाम समर्पिता एवभस्मिन्प्राणे सर्व समर्पितम् ' इति च सर्वात्मत्वारनाभिनिदर्शनाभ्यां च संभवति वैपुल्यात्मिका भूमरूपता प्राणस्य । तस्मात्प्राणो भूसेत्येवं प्राप्तम् । * तत इद-मुच्यते - परमात्मैवेह भूमा भवितुमर्हति न प्राणः । कस्मात्? संप्रसादादभ्युपदेशात् । संप्रसाद इति सुषुप्तं स्थानमुच्यतेः सम्यक्प्रसीदत्यस्मिन्निति निर्वचनात् । बृहदारण्यकेच स्वप्नजागरित स्थानाभ्यां सह पाठात्, तस्यां च संप्रसादावस्थायां प्राणो जागतीति प्राणोऽत्र संप्रसादोऽभिप्रेयते । प्राणादूर्ध्वं भूम्न उपदिश्यमानत्वादित्यर्थः । प्राण एव चेद्भूमा स्यात्स एव तस्मादूर्ध्वमुपदिश्येतेत्यश्लिष्टमेवैतत्स्यात् । नहि नामैव नाम्नो भूय इति नास्न ऊर्ध्वमुप-दिष्टम् । किं तर्हि? नाम्नोऽन्यदर्थान्तरमुपदिष्टं वागाख्यम्- ' दाग्बाव नाम्नो भूयसी ' इति । सम्पन्न होता है ) इस प्रकार सुषुप्ति अवस्थामें सुखका श्रवण होता है । और ' यो वै भूमा ० ' ( निश्चय जो भूमा है वह अमृत है ) वह अमृतत्व भी प्राण में विरुद्ध नहीं है, क्योंकि ' प्राणो वा ० ' ( प्राण ही अमृत है ) ऐसी श्रुति है । सि ० परन्तु प्राणको भूमा माननेवालेके पक्ष में ' तरति शोक ० ' ( आत्मवेत्ता शोकसे मुक्त हो जाता है ) इस आत्मविज्ञानकी इच्छासे प्रकरणका आरम्भ कैसे उपपन्न होगा? पू ० - ऐसा हम कहते हैं कि यहाँ प्राण ही आत्मरूप से विवक्षित है, क्योंकि ' प्राणो ह पिता ० ' ( प्राण ही पता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है ) यह श्रुति प्राणको ही सर्वस्वरूप ( सबका आत्मा ) कहती है । और ' यथा वा अरा ० ' ( जैसे नाभि अरा अर्पित हैं, वैसे प्राण में सब समर्पित है ) इस प्रकार सर्वात्मकता और अर नाभिके दृष्टान्तसे प्राणमें विपुलस्वरूपता - भूमरूपता सम्भव है । इसलिए प्राण भूमा है ऐसा प्राप्त होता है । सिद्धान्ती — इसपर यह कहते हैं - परमात्मा ही यहाँ भूमा होना युक्त है प्राण नहीं, क्योंकि संप्रसादके अनन्तर भूमाका उपदेश है । जिसमें अच्छी तरहसे प्रसन्न होता है वह संप्रसाद है, इस व्युत्पत्ति संप्रसाद सुषुप्ति स्थानको कहा जाता है । वृहदारण्यकमें स्वप्न और जाग्रत्स्थानोंके साथ इसका भी पाठ है । और उस संप्रसाद अवस्था में प्राण जागता - स्वव्यापार करता है, इसलिए यहाँ संप्रसादशब्दसे [ लक्षणावृत्तिसे ] प्राण अभिप्रेत है । प्राणके अनन्तर भूमाका उपदेश किये जानेसे भूमा परमात्मा है, ऐसा अर्थ है । यदि प्राण ही भूमा हो तो वही प्राणके अनन्तर उपदिष्ट हो यह असंगत हो जायगा, क्योंकि नाम ही नामसे अधिक है इस प्रकार नामके अनन्तर नामका उपदेश नहीं है, किन्तु ' वाग्वाव ' ( वाणी ही नामसे अधिक है ) इस प्रकार नामसे भिन्न वाग्नामक अर्थान्तर सत्यानन्दी - दीपिका किया गया है, इसलिए सुषुप्ति अवस्था में मन आदि सब इन्द्रियों का दर्शन आदि व्यापार न रहनेपर भी प्राणरूप अग्नियाँ शरीर में अपना व्यापार करती रहती हैं । इस प्रकार ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इस श्रुति प्रतिपादित भूमा लक्षणका प्राणमें समन्वय होता है । और जो ' यो वै भूमा तदमृत, प्राणो वा अमृतम् ' इत्यादि श्रुतियाँ प्राणको अमृतरूप कहती हैं, इसलिए प्राण में भूमा शब्द विरुद्ध नहीं है । * ‘ ब्रह्म भूमा मवितुमर्हति संप्रसादादध्युपदेशात् ' यन्नैवं तन्नैतं यथा घटः ' ' ब्रह्म भूमा होना युक्त है, क्योंकि संप्रसाद - प्राणके अनन्तर उसका उपदेश है, जहाँ हेतु नहीं है वहाँ साध्य भी नहीं है, जैसे घट ' यह व्यतिरेक दृष्टान्त है । इस प्रकार इस अनुमानसे भी ब्रह्म भूमा सिद्ध होता है ।
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२१० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ तथा वागादिभ्योऽप्या प्राणादर्थान्तरमेव तत्र तत्रोर्ध्वमुपदिष्टम्, तद्वत्प्राणादूर्ध्वमुपदिश्यमानो भूमा प्राणादर्थान्तरभूतो भवितुमर्हति । नन्विह नास्ति प्रश्नः - ' अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः ' इति, नापि प्रतिवचनमस्ति प्राणाद्वाव भूयोऽस्तीति, कथं प्राणादधि भूमोपदिश्यत इत्युच्यते? प्राणविषयमेव चातिवादित्वमुत्तरत्रानुकृष्यमाणं पश्यामः - ' एष तु वा अतिवदति यः सत्येना-तिवदति ' इति । तस्मान्नास्ति प्राणादध्युपदेश इति । अत्रोच्यते न तावत्प्राणविषयस्यैवाति-वादित्वस्यैतदनुकर्षणमिति शक्यं वक्तुं विशेषवादात् - ' यः सत्येनातिवदति ' इति । ननु विशेषवादोऽप्ययं प्राणविषय एव भविष्यति । कथम्? यथैषोऽग्निहोत्री यः सत्यं वदतीत्युक्ते न सत्यवदनेनाग्निहोत्रत्वं केन तर्हि? अग्निहोत्रेणैव, तत्सत्यवदनं त्वग्निहोत्रणो विशेष उच्यते । तथा ' एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति ' इत्युक्ते, न सत्यवदनेनातिवादित्वम् । केन तर्हि? प्रकृतेन प्राणविज्ञानेनैव । सत्यवदनं तु प्राणविदो विशेषो विवक्ष्यत इति । * नेति ब्रूमः; श्रुत्यर्थपरित्यागप्रसङ्गात् । श्रुत्या ात्र सत्यवदनेनातिवादित्वं प्रतीयते — ' यः सत्येनातिवदति सोऽतिवदति ' इति । नात्र प्राणविज्ञानस्य संकीर्तनमस्ति । प्रकरणान्तु प्राण-विज्ञानं संबध्येत । तत्र प्रकरणानुरोधेन श्रुतिः परित्यक्ता स्यात् । प्रकृतव्यावृत्त्यर्थश्च तुशब्दो न संगच्छेत ' एष तु वा अतिवदति ' इति । ' सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् ' ( छा ० ७११६ ) इति च प्रयत्नान्तरकरणमर्थान्तरविवक्षां सूचयति । तस्माद्यथैक वेदप्रशंसायां प्रकृतायामेष तु महा-उपदिष्ट है । तथा वाणी आदिसे लेकर प्राण पर्यन्त तत् तत् स्थलपर आगे - आगे अन्यान्य पदार्थका ही उपदेश किया गया है । उसीके समान प्राणके अनन्तर उपदिश्यमान भूमा प्राणसे अन्य पदार्थ होना युक्त है । पू ० – परन्तु यहाँ ' हे भगवन्! प्राणसे अधिक क्या है? ' ऐसा प्रश्न नहीं है और ' प्राणसे यह अधिक है ' इस प्रकारका कोई उत्तर भी नहीं है, तो प्राणके अनन्तर भूमाका उपदेश है यह कैसे कहते हो? और ' एष तु वा ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है वही अतिवादी है ) इस प्रकार प्राण-विषयक अतिवादित्वकी ही आगे अनुवृत्ति हम देखते हैं, इसलिए प्राणके अनन्तर किसी अन्य पदार्थका उपदेश नहीं है । सि ० – इस विषय में कहते हैं - प्राण विषयक अतिवादित्वका ही यह अनुकर्षण है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' यः सत्येन ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है ) इस तरहका विशेषवाद है । पू ० – परन्तु यह विशेषवाद भी प्राण विषयक ही होगा । कैसे? जैसे कि ' यह afrat है जो सत्य बोलता है ' ऐसा कहनेसे सत्यवदनसे अग्निहोत्रत्व नहीं होता, किन्तु अग्निहोत्रसे. ही होता है, सत्यवाद तो अग्निहोत्रीकी विशेषता कही जाती है । उसी प्रकार ' एष तु वा ० ' ( जो सत्यवादी है वह निश्चित अतिवादी है ) ऐसा कहने से सत्यभाषणसे कोई अतिवादी नहीं होता किन्तु प्रकृत प्राणविज्ञानसे ही अतिवादी होता है । सत्यवाद तो प्राणवेत्ताका विशेषरूप विवक्षित है । सिद्धान्ती - हम कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे तो श्रुतिके अर्थके परित्यागका प्रसंग उपस्थित होगा । ' यः सत्येन ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है वह अतिवादी है ) इसप्रकार यहाँ श्रुति द्वारा सत्यवादसे ही अतिवादित्व प्रतीत होता है । यहाँ प्राणविज्ञानका संकीर्तन भी नहीं है । यदि प्रकरण से प्राणविज्ञानका सम्बन्ध करें तो प्रकरणके बलसे श्रुतिका परित्याग हो जायगा । और ' एष तु वा अतिवदति ' ( यह तो अतिवादी है ) इसमें प्रकृतकी व्यावृनिके लिए ' तु ' शब्द संगत नहीं होगा । ' सत्यं त्वेव ० ' ( सनत्कुमार - सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए ) इस तरहसे अन्य प्रयत्न ( विचार ) का विधान अन्य अर्थकी विवक्षाको सूचित करता है, जैसे एक वेदकी सत्यानन्दी दीपिका * ' सत्येन अतिवदति ' यहाँ सत्यशब्द से सत्यब्रह्मको लेकर ही अतिवादित्व कहा गया है । किञ्च सत्यके जिज्ञासारूप लिङ्गसे भी प्राणके प्रकरणका बाध होता है । जो यह कहा गया है कि
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अधि ० २ सू ० ८ ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २११ ब्राह्मणो यश्चतुरो वेदानधीत इत्येकवेदेभ्योऽर्थान्तरभूतश्चतुर्वेदः प्रशस्यते, ताहगेतद्द्र-व्यम् । नच प्रश्नप्रतिवचनरूपयैवार्थान्तरविवक्षया भवितव्यमिति नियमो ऽस्ति; प्रकृत-संबन्धासंभवकारितत्वादर्थान्तरविवक्षायाः । तत्र प्राणान्तमनुशासनं श्रुत्वा तूष्णींभूतं नारदं स्वयमेव सनत्कुमारो व्युत्पादयति । यत्प्राणविज्ञानेन विकारानृतविषयेणातिवादित्वमनति-वादित्वमेव तत् ' एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति ' इति । तत्र सत्यमिति परं ब्रह्मोच्यते; परमार्थरूपत्वात् । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २1१ ) इति च श्रुत्यन्तरात् । तथा व्युत्पादिताय नारदाय ‘ सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानि ' इत्येवं प्रवृत्ताय विज्ञानादिसाधनपरम्परया भूमान-मुपदिशति । तत्र यत्प्राणादधि सत्यं वक्तव्यं प्रतिज्ञातम्, तदेवेह भूमेत्युच्यत इति गम्यते । तस्मादस्ति प्राणादधि भूम्न उपदेश इत्यतः प्राणादन्यः परमात्मा भूमा भवितुमर्हति । एवं चेहात्मविविदिषया प्रकरणस्योत्थानमुपपन्नं भविष्यति । * प्राण एवेहात्मा विवक्षित इत्येत-दपि नोपपद्यते । नहि प्राणस्य मुख्यया वृत्त्या SS त्मत्वमस्ति । न चान्यत्र परमात्मज्ञानाच्छो-कविनिवृत्तिरस्ति; ‘ नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( वे ० ६ । १५ ) इति श्रुत्यन्तरात् । ' तं मा भगवा-न्शोकस्य पारं तारयतु ' ( छा ० ७।१।३ ) इति चोपक्रम्योपसंहरति- ' तस्मै मृदितकषायाय तमसः प्रशंसा प्रस्तुत होनेपर जो चार वेदोंका अध्ययन करता है ' यह तो महाब्राह्मण है ' इसमें एक वेद अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणोंसे अर्थान्तर चतुर्वेदवेत्ताकी प्रशंसा होती है । उसीप्रकार प्रकरण में सत्यकी जिज्ञासा भी प्राणसे भिन्न भूमाको हो समझनी चाहिए । प्रश्न और उत्तरके रूपमें अन्य अर्थ विवक्षा होनी चाहिए यह नियम नहीं है, क्योंकि अन्य अर्थको विवक्षा तो प्रकृत पदार्थका सम्बन्ध न होने से होती है । अर्थान्तरकी विवक्षा रहनेपर भी नामादिसे लेकर प्राणपर्यन्त उपदेश सुनकर तूष्णीं-भूत नारदको स्वयं हो सनत्कुमार समझाते हैं कि ' एष तु वा ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है वही अतिवादी है ) जो विकार और अनृत विषयक प्राणविज्ञानसे ' सत्यम् ' इससे परब्रह्म कहा जाता है, क्योंकि वह ( ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है ) इसप्रकार यह सावधान हुए और ' सो s हं भगवः ० ' ( हे भगवन्! व्युत्पादित ( समझाये गये ) नारदके प्रति विज्ञानादि भूमाका उपदेश करते हैं । भूमाका उपदेश प्रस्तुत त्वेव विजिज्ञासितव्यम् ] की प्रतिज्ञा की गई है ज्ञात होता है, अत: प्राणके अनन्तर भूमाका अतिवादित्व है वह अतिवादित्व नहीं है, इस श्रुतिमें परमार्थरूप है । कारण कि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' दूसरी श्रुति भी है । [ सत्य ब्रह्म है ] यह जानकर मैं सत्यसे अतिवादी होऊँ ) इसप्रकार प्रवृत्त हुए ( निदिध्यासनादि ) साधन परम्परासे [ सनत्कुमार ] होनेपर प्राणके अनन्तर जिस सत्य वक्तव्य [ सत्यं वही यहाँ विषयवाक्यमें भूमा कहा गया है ऐसा उपदेश है । इसलिए प्राणसे भिन्न परमात्मा ही भूमा होना युक्त है । इसप्रकार यहाँ आत्माका विज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकरणका आरम्भ भी संगत हो होगा । प्राण ही यहाँ आत्मरूपसे विवक्षित है यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि मुख्य-वृत्ति प्राण आत्मा नहीं है । परमात्मा के ज्ञानके विना अन्य किसी प्रकारसे शोककी निवृत्ति नहीं होती, कारण कि ' नान्य: ० ' ( इससे भिन्न मोक्ष प्राप्तिके लिए कोई अन्य मार्ग - साधन नहीं है ) ऐसी दूसरी श्रुति है । तं मा भगवान् ० ' ( ऐसे शोक युक्त मुझे आप शोकसे पार कर दीजिए ) ऐसा आरम्मकर ' तस्मै मृदितकषायाय ० ' ( राग, द्वेष आदि दोषोंसे रहित नारदको भगवान् सनत्कुमारने सत्यानन्दी - दीपिका के भेद अर्थका भेद होता है यह नियम नहीं हैं, क्योंकि एक ही आत्मा के विषय में मैत्रयीने बहुत वार प्रश्न किये हैं । इसके अतिरिक्त भगवान् माष्यकार द्वारा उदाहृत चतुर्वेदवित् प्रकृत एक वेदवित्से मिन है यह प्रश्न के विना भी सिद्ध होता है । * ' आत्मतः प्राणः ' इत्यादि श्रुतिमें प्राणको उत्पत्ति कही गई है, इसलिए वह मुख्यवृत्तिसे
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२१२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः ' ( छा ० ७।२६।२ ) इति । तम इति शोकादिकारणमविद्योच्यते । प्राणान्ते चानुशासने न प्राणस्यान्यायत्ततोच्येत । ' आत्मतः प्राणः ' ( छा ० ७।२६।१ ) इति च ब्राह्मणम् । प्रकरणान्ते परमात्मविवक्षा भविष्यति, भूमा तु प्राण एवेति चेत् - न; ' स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि ' ( छा ० ७।२४।१ ) इत्यादिना भूम्न एवा प्रकरणसमाप्तेरनु-कर्षणात् । वैपुल्यात्मिका च भूमरूपता सर्वकारणत्वात्परमात्मनः सुतरामुपपद्यते || ८ || धर्मोपपत्तेश्व ॥ ९ ॥:
पदच्छेद -- धर्मोपपत्तेः च । सूत्रार्थ - ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित दर्शन आदि व्यवहारका अभावरूप भूमाके धर्मोकी परमात्मामें उपपत्ति होनेसे भूमा परमात्मा ही है । * अपि च ये भूम्नि श्रूयन्ते धर्मास्ते परमात्मन्युपपद्यन्ते । ' यत्र नान्यत्पश्यति नान्य-च्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा ' इति दर्शनादिव्यवहाराभावं भूमन्यवगमयति । परमात्मनि चायं दर्शनादिव्यवहाराभावोऽवगतः ' ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृ ० ४/५ १५ ) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । योऽप्यसौ सुषुप्तावस्थायां दर्शनादिव्यवहाराभाव उक्तः सोऽप्यात्मन एवासङ्गत्वविवक्षयोक्तो न प्राणस्वभावविवक्षया; परमात्मप्रकरणात् । यदपि तस्यामवस्थायां अविद्यारूप तमसे पार परमार्थतत्त्वको दिखलाया ) इसप्रकार उपसंहार करते हैं । ‘ तमः ’ इस शब्दसे शोकादिक कारणभूत अविद्या कही जाती है । यदि प्राण पर्यन्त ही उपदेश होता तो प्राण में अन्यकी अधीनता न कही होती, और ' आत्मतः प्राणः ' ( आत्मासे प्राण उत्पन्न हुआ ) यह ब्राह्मणवाक्य है । प्रकरण के अन्त में परमात्माकी विवक्षा होगी । भूमा तो प्राण ही है, यदि ऐसा कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ' स भगवः ० ' ( नारद - हे भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? सनत्कुमार — अपनी महिमा में ) इत्यादि प्रकरणको समाप्ति पर्यन्त भूमाकी ही अनुवृत्ति है । विपुलात्मकतारूप भूमरूपता भी सबका कारण होने से परमात्मामें ही सुतरां उपपन्न होती है ॥ ८ ॥
और दूसरी बात यह है कि भूमाके जो धर्मं श्रुतिमें प्रतिपादित हैं वे परमात्मामें उपपन्न होते हैं । ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( जहाँ दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता और दूसरेको नहीं जानता वह भूमा है ) यह श्रुति भूमामें दर्शन आदि व्यवहारके अभावको अवगत कराती है । ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ इस विद्वान् के लिए सब आत्मा ही हो गया वहाँ किस करण से किस विषयको देखे ) इस दूसरी श्रुतिसे परमात्मामें दर्शन आदि व्यवहारका अभाव प्रतीत होता है । सुषुप्त अवस्था में जो वह दर्शनादि व्यवहारका अभाव कहा गया है वह भी आत्माकी असंगताकी विवक्षासे कहा गया है, सत्यानन्दी - दीपिका आत्मा नहीं है । इसप्रकार श्रुति और लिङ्गके वलसे अर्थात् महाप्रकरणसे
बाधित है । अतः प्राण भूमा नहीं है किन्तु वस्तुतः परमात्मा ही भूमा है ।
फल है और सिद्धान्तमें ब्रह्मज्ञान फल है ॥ ८ ॥
* वादीने सुषुप्त अवस्थाको लेकर सुख आदि प्राणके धर्म माने हैं, बुद्धि आदि उपाधि रहनेपर आत्मामें द्रष्टृत्व आदि व्यवहार होता है । होनेपर आत्मामें द्रष्टृत्व आदि व्यवहार नहीं होता । इसप्रकार आत्माको प्रश्नोपनिषद् में परमात्माको लक्ष्यकर ' न शृणोति ' इत्यादि वर्णन किया प्राणका अवान्तर प्रकरण पूर्वपक्ष में प्राणकी उपासना वह भी अयुक्त है, क्योंकि सुषुप्ति में उपाधिके विलय असंग सिद्ध करनेके लिए गया है एवं आत्माको ही सुखरूप कहा गया है प्राणको नहीं । इस बातको स्पष्ट करनेके लिए भगवान् भाष्यकार ' यत आह ' आदि अन्य श्रुतियोंको भी उद्धृत करते हैं ।
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अधि ० ३ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २१३ सुखमुक्तं, तदात्मन एव सुखरूपत्वविवक्षयोक्तम् । यत आह- ' एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ' ( वृ ० ४ | ३ | ३२ ) इति । इहापि ' यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखम् ' इति सामय सुखनिराकरणेन ब्रह्मैव सुखं भूमानं दर्शयति । ‘ यो वै भूमा तदमृतम् ' इत्यमृतत्वमपीह श्रूयमाणं परमकारणं गमयति । विकाराणाममृतत्व-स्यापेक्षिकत्वात्, ‘ अतोऽन्यदार्तम् ' ( वृ ३।४।२ ) इति च श्रुत्यन्तरात् । तथा च सत्यत्वं स्वमहिम प्रतिष्ठितत्वं सर्वगतत्वं सर्वात्मत्वमिति चैते धर्माः श्रूयमाणाः परमात्मन्येवो -पपद्यन्ते, नान्यत्र । तस्माद्भूमा परमात्मेति सिद्धम् ॥ ९ ॥
( ३ अक्षराधिकरणम् सू ० १०-१२ ) अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १० ॥
पदच्छेद – अक्षरम्, अम्बरान्तधृतेः । सूत्रार्थ - ( अक्षरम् ) ' एतद्वै तदक्षरं गार्गि ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित अक्षर ब्रह्म ही है, ( अम्बरान्तधृतेः ) क्योंकि पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त सब विकारोंको वही धारण करता है । * ‘ कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्य-स्थूलमनणु ' ( बृ ० ३।८।७, ८ ) इत्यादि श्रूयते । तत्र संशयः - किमक्षरशब्देन वर्ण उच्यते न कि प्राण स्वभावकी विवक्षासे, क्योंकि परमात्माका प्रकरण है । उस अवस्था में जो भी सुख कहा गया है वह भी आत्मा सुख स्वरूप है इस विवक्षा से ही कहा गया है । क्योंकि कहते हैं - ' एषोऽस्य ० ' ( यह इसका परम आनन्द है, इस आनन्दके अंशके आश्रित अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ) यहाँ भी ' यो वै भूमा ० ' ( निश्चय जो भूमा है वह सुख है, अल्पमें सुख नहीं है, भूमा ही सुखरूप है ) इसप्रकार सामयसुख ( नाश आदि दोषयुक्त - सामयसुख ) के निराकरणसे सुखरूप भूमा ब्रह्मको ही दिखलाती है । ' यो वै भूमा ० ' ( निश्चय जो भूमा है वह अमृत है ) इस श्रुति में श्रूयमाण अमृतत्व भी परमकारणका ज्ञान कराता है, क्योंकि [ प्राण आदि ] विकारोंका अमृतत्व आपेक्षिक है । जैसे ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( इस आत्मासे भिन्न सब विनाशी - मिथ्या है ) यह दूसरी श्रुति है । इसप्रकार सत्यत्व, अपनी महिमामें प्रतिष्ठा, सर्वगतत्व और सर्वात्मत्व ये श्रूयमाण धर्म परमात्मा में ही उपपन्न होते हैं, दूसरे में नहीं । इससे सिद्ध हुआ कि भूमा परमात्मा हो है ॥। ९ ॥ * ' कस्मिन्नु खल्वाकाश • ( गार्गी - किन्तु आकाश किसमें ओत प्रोत है? उस याज्ञवल्क्यने कहा— हे गार्गि! जिसे तुम पूछती हो, उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं, वह न स्थूल है न सूक्ष्म ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । यहाँ पर संशय होता है कि अक्षर शब्दसे वर्णका कथन है अथवा सत्यानन्दी - दीपिका ' सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् ' इस श्रुतिमें सत्यत्व, ' स भगवः कस्मिन्प्रतिष्टित इति स्व-महिम्नि ' इस मन्त्रमें श्रूयमाण स्वमहिमामें प्रतिष्ठितत्व, ' स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् ' ( छा ० ७।२५।१ ) ( वही नीचे और वही ऊपर है ) इत्यादि में सर्वगतत्त्र, ' स एवेदं सर्वम् ' ( छा ० ७।५।१ ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि मन्त्रमें श्रूयमाण सर्वात्मत्व, ये सब धर्मं मुख्यवृत्तिसे परमात्मामें युक्त हैं, प्राणादिमें नहीं । इससे यह सिद्ध हुआ कि भूमा परमात्मा ही है ॥ ९ ॥
* लोक प्रसिद्धिके अनुसार वर्ण, और ' न क्षरतीति अक्षरः ' अर्थात् अविनाशी, इस विग्रहके अनुसार परमात्मा इन दो अर्थों में अक्षर शब्दका प्रयोग किया जाता है । अतः अक्षरशब्दसे वर्णका ग्रहण करना चाहिए अथवा परमात्माका पूर्वपक्षी - अक्षरशब्द से वर्णका ही ग्रहण करना चाहिए । यद्यपि ' नक्षरतीति अक्षर: ' इस विग्रहके अनुसार नित्य पदार्थका भी ग्रहण किया जा सकता है,
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२१४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ किंवा परमेश्वर इति । ' तत्राक्षरसमाम्नाय ' इत्यादावक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वात्, प्रसिद्ध्यतिक्रमस्य चायुक्तत्वात् ' ॐकार एवेदं सर्वम् ' ( छा ० २।२३।३ ) इत्यादौ च श्रुत्यन्तरे वर्णास्याप्युपास्यत्वेन सर्वात्मकत्वावधारणात्, वर्ण एवाक्षरशब्द इति, * एवं प्राप्त उच्यते— पर एवात्माऽक्षरशब्दवाच्यः । कस्मात्? अम्बरान्तधृतेः-पृथिव्यादेराकाशान्तस्य विकारजातस्य धारणात् । तत्र हि पृथिव्यादेः समस्तविकार-जातस्य कालत्रयविभक्तस्य ' आकाश एव तदोतं च प्रोतं चं ' इत्याकाशे प्रतिष्ठितत्वमुक्त्वा ' कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च ' इत्यनेन प्रश्नेनेदमक्षरमवतारितम् । तथा चोपसंहृतम्-‘ एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च ' इति । न चेयमम्बरान्तधृतिर्ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति । यदपि — ॐ कार एवेदं सर्वम् ' इति, तदपि ब्रह्मप्रतिपत्तिसाधनत्वात्स्तुत्यर्थं द्रष्टव्यम् । तस्मान्न क्षरत्यश्नुते चेति नित्यत्वव्यापित्वाभ्यामक्षरं परमेव ब्रह्म ॥ १० ॥
परमेश्वरका? पूर्वपक्षी— ' तत्राक्षरसमाम्नाय ' इत्यादिमें अक्षर शब्द वर्ण में प्रसद्धि है; प्रसिद्धिका अति-क्रमण करना युक्त नहीं है, और ' ॐकार एवेदं ० ' ( यह सब ओंकार ही है ) इत्यादि अन्य श्रुतियोंमें उपास्यरूपसे वर्णंमें भी सर्वात्मकत्वका अवधारण है । इसलिए अक्षरशब्द वर्णवाचक ही है । सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - परमात्मा ही अक्षर शब्द वाच्य है, किससे? इससे कि वह आकाशपर्यंन्तको धारण करता है अर्थात् पृथिवी आदिसे लेकर आकाशपर्यंन्त विकार समूहको धारण करता है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीन कालोंमें विभक्त हुए पृथिवी आदि समस्त विकार समूहको ' आकाश एव ' ( आकाश में ही वह ओत प्रोत है ) इस प्रकार आकाश में प्रतिष्ठितत्वको कहकर ‘ कस्मिन्न खल्वाकाशः ० ' ( आकाश किसमें ओत प्रोत है? ) इस प्रश्नसे इस अक्षरका उपनिषद् में अवतरण कियाँ गया है । और ' एतस्मिन्नु ० ' ( हे गागि! इस अक्षरमें आकाश ओत प्रोत है ) इस प्रकार उपसंहार किया है । इस आकाश पर्यन्तको धारण करना ब्रह्मको छोड़कर अन्यमें सम्भव नहीं । ॐकार एवेदं ० ' ( ओंकार यह सब है ) वह कथन भी ब्रह्मज्ञानका साधन होनेसे स्तुति के लिए समझना चाहिए । इसलिए ' न क्षरत्यश्नुते ० ' ( नष्ट नहीं होता और सर्वव्यापक है ) इस व्युत्पत्ति से सिद्ध होता है कि नित्य और व्यापक होनेके कारण अक्षर पर ब्रह्म ही है ॥ १० ॥
सत्यानन्दी - दीपिका तो मी योगसे रूढ़ि बलवती होनेसे वर्णका हो ग्रहण करना ठीक है । ' ओंकार एव इदं सर्वम् ' इस श्रुति के आधार पर अक्षर सर्वात्मक सिद्ध होता है । दूसरी बात यह भी है कि लोक में वर्णोंमें ही अक्षर शब्द प्रसिद्ध है । संशयका कारण यह है कि अक्षरशब्द वेदोंमें ब्रह्म और ओंकार में प्रसिद्ध है और लोकमें वर्णोंमें । अतः इस आधार पर भगवान् भाष्यकारने ओंकारका अक्षरशब्दसे ग्रहणकर आगे निराकरण भी किया है । पूर्वं अधिकरण में सत्य शब्द ब्रह्ममें रूढ़ होनेसे भूमा ब्रह्म है, यह कहा गया है, उसी प्रकार यहाँ अक्षरशब्द वर्ण में रूढ होनेसे वर्ण ही अक्षर होना चाहिए, इस प्रकार दृष्टान्तसंगति से पूर्वपक्ष करते हैं । पूर्वपक्ष में ओंकारकी उपासना फल है, सिद्धान्तमें निर्गुण ब्रह्मका ज्ञानफल है । * सिद्धान्ती - गार्गी और याज्ञवल्क्य इन दोनोंके प्रश्न और प्रतिवचनके विचार करनेसे यह निश्चय होता है कि रूढ़िको बाधकर यौगिक अक्षरशब्दसे परमात्मा ही सिद्ध होता है, क्योंकि परमात्मा ही आकाश आदि सर्व प्रपञ्चको धारण कर सकता है, अन्य सामान्य अक्षर शब्द वाच्य वर्ण नहीं । ' ॐकार एवेदं सर्वम् ' इस मन्त्रमें जो ॐकारको सर्वात्मक कहा गया है वह भी परमात्माका वाचक होनेके कारण नाम और नामीमें अभेद मानकर कहा गया है । समस्त मिथ्याप्रपञ्चान्तर्वर्ती वर्णात्मक स्वयं ॐकार मी ब्रह्म में अध्यस्त है, अतः अक्षरशब्दसे परब्रह्मका ही ग्रहण करना चाहिए वर्णात्मक ओंकारका नहीं ॥ १० ॥
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अधि ० ३ ० ११-१२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २१५ स्यादेतत् - कार्यस्य चेत्कारणाधीनत्वमम्बरान्तधृतिरभ्युपगम्यते, प्रधानकारण-वादिनोऽपीयमुपपद्यते । कथमम्बरान्तधृतेर्ब्रह्मत्वप्रतिपत्तिरिति? अत उत्तरं पठति-सा च प्रशासनात् ॥११ ॥
पदच्छेद - सा, च, प्रशासनात् । सूत्रार्थ - - ( सा च ) और वह अम्बरान्तधृति परमेश्वरका ही कर्म है, ( प्रशासनात् ) क्योंकि ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ० ' इस श्रुतिमें प्रशासनका कथन है । * सा चाम्बरान्तधृतिः परमेश्वरस्यैव कर्म । कस्मात्? प्रशासनात् । प्रशासनं हीह श्रूयते - ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विष्टतौ तिष्ठतः ' ( बृ ० ३।८।९ ) इत्यादि । प्रशासनं च पारमेश्वरं कर्म, नाचेतनस्य प्रधानस्य प्रशासनं भवति । न चेतनानां घटादिकारणानां मृदादीनां घटादिविषयं प्रशासनमस्ति ॥११ ॥
अन्यभावव्यावृत्तेश्व ॥ १२ ॥
पदच्छेद – अन्यभावव्यावृत्तेः, च । सूत्रार्थ - प्रधानादिके धर्म - अचेतनत्वादि रहित होनेसे मी अक्षर परब्रह्म ही है प्रधान नहीं । अन्यभावव्यावृत्तेश्च कारणाद्ब्रह्मवाक्षर शब्दवाच्यम् । तस्यैवाम्बरान्त धृतिः कर्म नान्य-स्य कस्यचित् । किमिदमन्यभावव्यावृत्तेरिति? अन्यस्य भावोऽन्यभावः, तस्माद्वयावृत्ति-रन्यभावव्यावृत्तिरिति तस्याः । एतदुक्तं भवति यदन्यद्ब्रह्मणोऽक्षरशब्दवाच्यमिहाशङ्कयते तद्भावादिदमम्बरान्तविधारणमक्षरं व्यावर्तयति श्रुतिः- ' तद्वा एतदक्षरं गार्ग्य दृष्टं द्रष्टृश्रुतं श्रोत्रमतं यह शङ्का होती है कि आकाश पर्यन्त कार्यको कारणके अधीन रहना ही यदि अम्बरान्तधृतिका अर्थं है यह स्वीकार किया जाय तो प्रधान कारणवादीके प्रधानमें भी अम्बरान्तधृति उपपन्न हो सकती है । आकाश पर्यन्त धारण करनेसे अक्षर ब्रह्म ही है यह प्रतिपत्ति कैसे होती है? इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं-और यह आकाश पर्यंन्तका धारण करना परमेश्वरका ही कर्म है, क्योंकि श्रुति में प्रशासनका कथन है । ‘ एतस्य वा अक्षरस्य ० ' ( हे गार्गि! इस अक्षर के अनुशासनमें सूर्य, चन्द्रमा विशेषरूपसे धारित हुए स्थित रहते हैं ) इत्यादि यहाँ प्रशासनकी ही श्रुति है । प्रशासन परमेश्वरका कर्म है । अचेतन प्रधानमें प्रशासनका सम्भव नहीं है, क्योंकि घटादिके कारणभूत अचेतन मृदादिमें घटादि विषयक अनुशासन नहीं है ॥ ११ ॥
अन्यभाव व्यावृत्तिरूप कारणसे भी ब्रह्म ही अक्षर शब्द वाच्य है । आकाश पर्यन्त धारण करना उसका ही कर्म है किसी अन्यका नहीं । यह अन्यभावव्यावृत्ति क्या है? अन्यका भाव अन्यभाव अर्थात् दूसरेका धर्मं, उससे जो भेद, उसे अन्यभावव्यावृत्ति कहते हैं । तात्पर्य यह है कि ब्रह्मसे भिन्न दूसरा अर्थं अक्षर शब्द वाच्य है ऐसी जो यहाँ आयका की जाती है, परन्तु ' तद्वा एतदक्षरं ० ' ( हे गार्गि! वह यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं है किन्तु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं किन्तु सत्यानन्दी - दीपिका * गार्गीके प्रथम प्रश्नके उत्तर में सम्पूर्ण कार्य प्रपञ्च का आश्रय आकाश बतलाया गया है । परन्तु आकाश तो स्वयं भी कार्य होनेसे यावत्कार्यका आश्रय नहीं हो सकता और आत्माश्रय दोष भी होता है, अतः यहाँ आकाशशब्दसे जगत् के मूल कारण अज्ञानका ग्रहण करना चाहिए, उस अज्ञानको एक प्रकारसे सांख्य लोग प्रधान कहते हैं । अतः इस प्रकरण में अक्षरको प्रधानका भी आश्रय कहा गया है, इसलिए परमात्मा ही उसका अधिष्ठान है ॥ ११ ॥
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२१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ ' ( त्रृ ० ३।८।११ ) इति । तत्रादृछ्रुत्वादिव्यपदेशः प्रधानस्यापि संभवति द्रष्टृत्वा-दिव्यपदेशस्तु न संभवति; अचेतनत्वात् । तथा ' नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यद-तोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ ' इत्यात्मभेदप्रतिषेधात् । न शारीरस्याप्युपाधिमतोऽक्षर-शब्दवाच्यत्वम्; ‘ अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः ' ( वृ ० ३/८/८ ) इति चोपाधिमत्ताप्रतिषेधात् ।
नहि निरुपाधिकः शारीरो नाम भवति । तस्मात्परमेव ब्रह्माक्षरमिति निश्चयः ॥ १२ ॥
( ४ ईक्षतिकर्मव्यपदेशाधिकरणम् सू ० १३ ) ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ॥ १३ ॥
पदच्छेद - ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः । सूत्रार्थ - ( स ) ' यः पुनरेतं ' इस श्रुतिमें वह ध्यातव्य परब्रह्म ही है, ( ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् ) क्योंकि ' परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ' इस वाक्यशेष में ध्येयका दर्शन विषयरूपसे उपदेश है । * ' एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्विद्वानेते ने वायतनेनैकतरमन्वेति ' इति प्रकृत्य श्रूयते - ' यः पुनरेतं त्रिमात्रेणो मित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत ' ( प्र ० ५१२, ५ ) इति । किमस्मिन्वाक्ये परं ब्रह्माभिध्यातव्यमुपदिश्यते आहोस्विदपरमिति । एतेनैवायतनेन परमपरं वैकतरमन्वेतीति प्रकृत्वात्संशयः । तत्रापरमिदं ब्रह्मेति प्राप्तम् । कस्मात्? ' स तेजसि सूर्य संपन्नः ', ' स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् ' इति च तद्विदो देशपरिच्छिन्नस्य फलस्योच्यमान: श्रोता है, मननका विषय नहीं किन्तु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है ) यह श्रुति अन्यके स्वरूपसे उस आकाश पर्यन्त धारण करनेवाले अक्षरकी व्यावृत्ति करती है । इसमें अदृष्टत्वादि व्यपदेश प्रधानमें भी सम्भव है । परन्तु द्रष्टृत्वादि व्यपदेश इसमें सम्भव नहीं है, क्योंकि वह अचेतन है । इसी प्रकार ' नान्यदतोऽस्ति ० ' ( इस प्रकृत अक्षरसे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं ) यह श्रुति आत्मासे मिन वस्तुका प्रतिषेध करती है । इसलिए उपाधियुक्त जीव भी अक्षर शब्द वाच्य नहीं है । क्योंकि ' अचक्षुष्क ० ' ( वह चक्षु रहित, श्रोत्र रहित, वाणी रहित तथा मन रहित है ) इस प्रकार श्रुति अक्षरमें उपाधिमत्त्वका प्रतिषेध किया है । उपाधिके विना जीवभाव सम्भव नहीं । इससे निश्चित होता है कि अक्षर शब्द वाच्य परब्रह्म ही है ॥ १२ । ' एतद्वै सत्यकाम ० ' ( पिप्पलाद - हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है, अतः विद्वान् इसी ओंकार ध्यानरूप प्राप्ति साधनसे उनमेंसे एकको प्राप्त हो जाता है ). इसप्रकार प्रस्तुतकर ' यः पुनरेतं ० ' ( किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ' ॐ ' इस अक्षर द्वारा इस परमपुरुषका ध्यान करता है ) ऐसा श्रुति कहती है । क्या इस वाक्यमें ध्यातव्यरूपसे परब्रह्मका उपदेश है अथवा अपर ब्रह्मका? इसी ॐ रूप प्राप्तिके साधनसे पर और अपर दोनों में से एक ब्रह्मको प्राप्त होता है, इसप्रकार प्रकृत होनेसे संशय होता है । पूर्वपक्षी -- ऐसा संशय होनेपर ऐसा प्राप्त होता है कि यह ओंकार अपर ब्रह्म है, क्योंकि ' स तेजसि ० ' ( वह तेजोमय सूर्य लोकको प्राप्त होता है ) ' स साममि ० ' ( वहाँ से वह सामश्रुतियों द्वारा ब्रह्मलोक में सत्यानन्दी - दीपिका * गत अधिकरणमें वर्णमें रूढ अक्षर शब्दको जगत्को धारण करना इस लिङ्गसे ' न क्षरति ' इस योग वृत्तिका आश्रयण कर ब्रह्मविषयक स्वीकार किया गया है । इसप्रकार यहाँ भी देशपरिच्छिन्न फल श्रुति लिङ्गसे परशब्दकी किसीकी अपेक्षा परत्व विशिष्ट हिरण्यगर्भ में वृत्ति हो, इस दृष्टान्तसंगतिसे पूर्वपक्ष है | यहाँ अक्षरात्मक ओंकार विषयक विचार है कि ओंकारसे किसकी उपासना करनी चाहिए ।