श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 251–260
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 251–260
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अधि ० ४ सू ० १३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २१७ त्वात् । नहि परब्रह्मविद्देशपरिच्छिन्नं फलमश्नुवीतेति युक्तमः सर्वगतत्वात् परस्य ब्रह्मणः । नन्वपरब्रह्मपरिग्रहे परं पुरुषमिति विशेषणं नोपपद्यते । नैष दोषः पिण्डापेक्षया प्राणस्य परत्वोपपत्तेः । इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते - परमेव ब्रह्म हाभिध्यातव्यमुपदिश्यते । कस्मात्? ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् । ईक्षतिदर्शनम् । दर्शनव्याप्यमीक्षतिकर्म । ईक्षतिकर्मत्वेनास्याभि-ध्यातव्यस्य पुरुषस्य वाक्यशेषे व्यपदेशो भवति - स एतस्माजीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष-मीक्षते ' इति । तत्राभिध्यायतेरतथाभूतमपि वस्तु कर्म भवति मनोरथकल्पितस्याप्यभिध्याय-तिकर्मत्वात् । ईक्षतेस्तु तथाभूतमेव वस्तु लोके कर्म दृष्टमित्यतः परमात्मैवायं सम्यग्दर्शन-विषयभूत ईक्ष ' तकर्मत्वेन व्यपदिष्ट इति गम्यते । स एव चेह परपुरुषशब्दाभ्यामभिध्यातव्यः प्रत्यभिज्ञायते । नन्वभिज्ञाने परः पुरुष उक्तः, ईक्षणे तु परात्परः, कथमितर इतरत्र प्रत्य-भिज्ञायत इति 1 । अत्रोच्यते - परपुरुषशब्दौ तावदुभयत्र साधारणौ नचात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिध्यातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते, येन तस्मात्परात्परोऽयमीक्षितव्यः पुरुषोऽन्यः स्यात् । कस्तर्हि जीवधन इति? उच्यते - घनो मूर्तिः । जीवलक्षणो घनो जीवघनः । सैन्धवखिल्यवद्यः परमात्मनो जीवरूपः खिल्यभाव उपाधिकृतः परश्च विषयेन्द्रियेभ्यः ले जाया जाता है ) इसप्रकार ॐकारको जानने वालेके लिए देशपरिच्छिन्न ( सूर्यलोक और ब्रह्म-लोक गमनरूप सीमित ) फल कहा जाता है, परब्रह्मवेत्ता देशपरिच्छिन्न फलका भोग करे यह युक्त नहीं है, क्योंकि परब्रह्म सर्वगत है । परन्तु अपर ब्रह्मका ग्रहण करनेपर तो ' परं पुरुषम् ' यह विशेषण संगत नहीं होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि पिण्ड ( विराट ) की अपेक्षा प्राणमें भी परत्व हो सकता है | सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - [ यः पुनरेतं ] इस वाक्यमें परब्रह्मका ही अभि-ध्यातव्य ( ध्यान करने योग्य ) रूपसे उपदेश है, क्योंकि ईक्षतिका कर्म कहा गया है । ईक्षति अर्थात् दर्शन, ईक्षतिकर्म अर्थात् दर्शनविषय | इस अभिध्यातव्यपुरुषका वाक्यशेषमें दर्शनविषयरूपसे व्यपदेश है - ‘ स एतस्माज्जीवघानात् ० ' ( ओंकारका उपासक जीवधन - हिरण्यगर्भरूप परसे पर शरीरमें प्रविष्ट हुए पुरुष - परमात्माको ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार देखता है ) यहाँपर अतथाभूत - मिथ्यावस्तु भी अभियानका विषय होता है, क्योंकि मनोरथसे कल्पित वस्तु भी अभिध्यानका विषय होती है । परन्तु ईक्षतिका कर्म तो सत्य वस्तु ही लोकमें देखी गई हैं, इसलिए यथार्थ ज्ञानका विषयरूप यह परमात्मा ही ईक्षति कर्मरूपसे उपदिष्ट है ऐसा ज्ञात होता है । और यहाँ वही पर और पुरुष शब्दोंसे अभिध्यातव्य -रूपसे प्रत्यभिज्ञात होता है । परन्तु अभिध्यानमें परपुरुष कहां गया है और दर्शनमें परसे पर, ऐसी परिस्थितिमें एककी इतरत्र ( दूसरेमें ) प्रत्यभिज्ञा कैसे होगी? इसपर कहते हैं — पर और पुरुष शब्द तो | ' अक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत ' ' स एतस्माज्जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ' ] इन दोनों वाक्योंमें समान है । यहाँ जीवधन शब्दसे प्रकृत, अभिध्यातव्य पर पुरुषका परामर्श नहीं होता, जिससे कि उस परसे पर यह दर्शनीय पुरुष भिन्न हो । तो जीवधन कौन है? कहते हैं — घन माने मूर्ति । जीवरूप घन वह जीवधन । लवणपिण्डके समान परमात्माका उपाधिकृत जीवरूप अल्पभाव जो सत्यानन्दी- दीपिका * ' यः पुनरेतं ' इस वाक्य में ओंकाररूपसे अमिध्यानका विषय परमात्मा ही है, हिरण्यगर्भरूप अपर ब्रह्म नहीं, क्योंकि ' स एतस्माज्जीवधनात् ' इस वाक्यशेषमें जीवघन अर्थात् जीव समूहरूप हिरण्यगर्भसे भिन्न पर पुरुष ही साक्षात् करने योग्य है । इस श्रुतिमें ' स ' शब्दसे पूर्वं श्रुतिमें कथित परब्रह्मकी ही प्रत्यभिज्ञा होती है । इसलिए परमात्मा ही यहाँ अभिध्यातव्य है । * यद्यपि ब्रह्मलोक जीवधन नहीं है, तो भी जीव समुदायका समष्टिरूप हिरण्यगर्भं ब्रह्मलोकका स्वामी है, इसलिए परम्परा सम्बन्धरूप लक्षणावृत्ति से ब्रह्मलोकको भी जीवधन कहा जाता है ।
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२१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ सोऽत्र जीवघन इति । अपर आह - ' स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् ' इत्यतीतानन्तरवाक्य निर्दिष्टो यो ब्रह्मलोकः परश्च लोकान्तरेभ्यः सोऽत्र जीवधन इत्युच्यते । जीवानां हि सर्वेषां करण-परिवृत्तानां सर्वकरणात्मनि हिरण्यगर्भे ब्रह्मलोकनिवासिनि संघातोपपत्तेर्भवति ब्रह्मलोको जीवघनः । तस्मात्परो यः परमात्मेक्षणकर्मभूतः स एवाभिध्यानेऽपि कर्मभूत इति गम्यते । * परं पुरुषमिति च विशेषणं परमात्मपरिग्रह एवावकल्पते । परो हि पुरुषः परमात्मैव भवति, यस्मात्परं किंचिदन्यन्नास्ति; ' पुरुषान्न परं किंचत् सा काष्ठा सा परा गतिः ' इति च श्रुत्यन्तरात् । ' परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः ' इति च विभज्य, अनन्तरमकारेण परं पुरुषम-भिध्यातव्यं ब्रुवन्परमेव ब्रह्म परं पुरुषं गमयति । ' यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह बै स पाप्मना विनिर्मुच्यते ' इति पाप्मविनिर्मोकफलवचनं परमात्मानमिहाभिध्यातव्यं सूचयति । अथ यदुक्तं - परमात्माभिध्यायिनो न देशपरिच्छिन्नफलं युज्यत इति, अत्रोच्यते- त्रिमात्रेणों-कारेणालम्बनेन परमात्मानममिध्यायतः फलं ब्रह्मलोकप्राप्तिः, क्रमेण च सम्यग्दर्शनोत्प-त्तिरिति क्रममुक्त्यभिप्रायमेतद्भविष्यतीत्यदोषः ॥ १३ ॥
विषय और इन्द्रियोंसे पर है वही यहाँ जीवधन कहलाता है । दूसरा इस विषयपर कहता है- ' स सामभिः ' ० ( वह उपासक साम अभिमानी देवता द्वारा ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है ) इस अव्यवहित पूर्ववाक्यसे निर्दिष्ट ब्रह्मलोक जो अन्य लोकोंसे पर है वही यहाँ जीवघन कहा जाता है । ब्रह्मलोक निवासी सर्वेन्द्रियात्मक हिरण्यगर्भ इन्द्रियोंसे घिरे हुए सभी जीवोंका समष्टिरूप है, इसलिए ब्रह्मलोक जीवधन है, इससे ऐसा ज्ञात होता है कि पर पुरुष जो परमात्मा दर्शनका • विषयभूत है वही अभि-ध्यानमें मी कर्मभूत है । और ' परं पुरुषं ' यह विशेषण परमात्माका ग्रहण करनेसे ही संगत होता है, क्योंकि परपुरुष परमात्मा ही है जिससे पर और कुछ नहीं है, ' पुरुषानं परं ० ' ( पुरुषसे पर कुछ नहीं है वह परम अवधि और परम गति है ) यह दूसरी श्रुति है । ' परं चापरं ० ' ( जो ओंकार है वह पर और अपर ब्रह्म ) ऐसा विभाग करके अनन्तर ओंकार द्वारा परपुरुषको अभिध्यातव्य कहती हुई परब्रह्मको ही परपुरुषरूपसे ज्ञान कराती है । ' यथा पादोदरस्त्वचा ० ' ( जैसे सर्प काँचुलीसे विनिर्मुक्त होता है वैसे वह उपासक पापसे मुक्त हो जाता है ) इसप्रकार पापसे विनिर्मुक्तिरूपी फलका कथन यहाँ परमात्माको अभिध्यातव्यरूपसे सूचित करता है । जो यह कहा गया है कि परमात्माका अभि-ध्यान करनेवाले के लिए देश परिच्छिन्न फल युक्त नहीं है, तो इसपर कहते हैं - तीन मात्रावाले ओंकाररूप आलम्बनसे परमात्माका अभिध्यान करनेवाले उपासकको ब्रह्म लोककी प्राप्ति और क्रमसे तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिरूप फल प्राप्त होता है । यहाँ क्रम मुक्तिके अभिप्रायसे यह हो जायगा । इसलिए [ देशपरिच्छिन्न फल प्राप्ति ] कोई दोष नहीं है ॥ १३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * ओङ्काररूपसे परमात्माका अभिध्यान करनेवाले उपासक स्वर्गलोकसे होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं, वहाँ ब्रह्माकी अवस्थिति पर्यन्त ऐश्वयं सुखका अनुभव करते हैं । साथ - साथ ब्रह्म-जिज्ञासुओंको ब्रह्माद्वारा ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे आत्मैकत्वरूप उपदेश प्राप्त होता है । जिससे आत्मसाक्षात्कारकर महाप्रलयमें ब्रह्मा के साथ कैवल्य मुक्तिको प्राप्त करते हैं । इस विषय में ' ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ' ( मुण्ड ० ३।२१६ ) ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है । इसप्रकार ओङ्काररूपसे परमात्माका अभिध्यान करनेवाले उपासकोंके लिए क्रम मुक्तिके अभिप्रायसे ब्रह्मलोककी प्राप्तिरूप परिच्छिन्न फल श्रुतियों में कहा गया है । इसलिए ओङ्कारसे परमेश्वरका ही अभिध्यान करना चाहिए हिरण्यगर्भका नहीं । पूर्वपक्ष में मोङ्कारसे अपर ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) की उपासना फल है, सिद्धान्त में परब्रह्म ( ईश्वर ) की उपासना फल है ॥ १३ ॥
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अधि ० ५ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २१ ९ ( ५ दहराधिकरणम् सू ० १४-२१ ) दहर उत्तरेभ्यः ॥ १४ ॥
पदच्छेद – दहरः, उत्तरेभ्यः । सूत्रार्थ - ( दहर: ) ' अथ यदिदमस्मिन् ' इत्यादि श्रुतिमें पठित दहराकाश परमात्मा ही है, ( उत्तरेभ्यः ) क्योंकि ' यावान्वा अयमाकाशस्तावानोषोऽन्तर्हृदय ' इत्यादि वाक्यशेषगत आकाशोप-मानत्वादिहेतुओंका प्रतिपादन है । * ' अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वे-ष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम् ' ( छा ० ८ | १ | १ ) इत्यादिवाक्यं समाम्नायते । तत्र योऽयं दहरे हृदयपुण्डरीके दहर आकाशः श्रुतः स किंभूताकाशः, अथवा परमात्मेति संशय्यते । कुतः संशयः? आकाशब्रह्मपुरशब्दाभ्याम् । आकाशशब्दो हायं भूताकाशे पर स्मिथ प्रयुज्यमानो दृश्यते । तत्र किं भूताकाश एव दहरः स्यात्, किंवा पर इति संशयः । तथा ब्रह्मपुरमिति-किं जीवोऽत्र ब्रह्मनामा तस्येदं पुरं शरीरं ब्रह्मपुरम्, अथवा पर स्यैव ब्रह्मणः पुरं ब्रह्मपुर मिति । तत्र जीवस्य परस्य वाऽन्यतरस्य पुरस्वामिनो दहराकाशत्वे संशयः । तत्राकाशशब्दस्य भूताकाशे रूढत्वाद्भूताकाश एव च दहरशब्द इति प्राप्तम् । तस्य च दहरायतनापेक्षया दहरत्वम् । ‘ यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः ' इति च बाह्याभ्यन्तरभावकृत-भेदस्योपमानोपमेयभावः, द्यावापृथिव्यादि च तस्मिन्नन्तः समाहितम्; अवकाशात्मनाका-‘ अथ यदिदमस्मिन् ० ' ( अब इस ब्रह्मपुर - शरीरमें जो यह सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिए उसकी विशेष जिज्ञासा करनी चाहिए ) इत्यादि श्रुति वाक्य हैं । यहाँ सूक्ष्म हृदय कमलमें जो यह दहर - अल्प आकाश सुना जाता है । क्या वह भूताकाश है वा विज्ञानात्मा है अथवा परमात्मा है, ऐसा संशय होता है । संशय क्यों होता है? इससे कि श्रुतिमें आकाश और ब्रह्मपुर शब्द हैं । यह आकाश शब्द ही भूताकाश और परब्रह्ममें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । इससे संशय होता है कि क्या यहाँ दहर भूताकाश ही है अथवा परब्रह्म? उसीप्रकार ' ब्रह्मपुरम् ' क्या यहाँ जीवका ही नाम ब्रह्म है, उसका पुर होनेसे यह शरीर ब्रह्मपुर है, अथवा परब्रह्मका ही पुर होने से ब्रह्मपुर है? यहाँ संशय होता है कि जीव और परब्रह्म इन दोनोंमें से कौन पुरस्वामी दहराकाश है? पूर्वपक्षी - यहाँ आकाश शब्द भूताकाशमें रूढ़ है, इससे दहर शब्द भूताकाशका वाचक है ऐसा प्राप्त होता है । अल्प आयतनकी अपेक्षा उसमें दहरत्व- अल्पत्व है । ' यावान्वा ० ' ( जितना यह भूताकाश है उतना ही हृदयके भीतर यह दहराकाश है ) इस प्रकार बाह्य और आभ्यन्तरभाव कृत भेदको लेकर अर्थात् कल्पित भेदको लेकर उपमानोपमेयभाव है और द्यु, पृथिवी आदि उसके भीतर स्थित हैं, क्योंकि अवकाश-सत्यानन्दी- दीपिका * ' अथ यदिदमस्मिन् ' ' इस श्रुतिस्थ ' अथ ' शब्द भूमा विद्याके अनन्तर दहरविद्याको सूचित करता है । ब्रह्मकी अभिव्यक्तिका स्थान होनेसे इस शरीरको ब्रह्मपुर कहा जाता है । जैसे पूर्वाधि-करणमें ' पर पुरुष ' शब्द ब्रह्म में रूढ़ होने से परब्रह्म उपास्य कहा गया है, वैसे ' अथ यदिदमस्मिन् ' यहाँ आकाशशब्द भूताकाशमें रूढ़ होनेसे भूताकाश उपास्य होना चाहिए इसप्रकार दृष्टान्तसंगतिसे पूर्वपक्ष करते हैं । * भूताकाश दहराकाश है, ऐसा पूर्वपक्षीके द्वारा मानमेपर शङ्का होती है -भूताकाश अल्प कैसे हो सकता है? एक होनेसे उसमें उपमान- उपमेयभाव कैसे? और ' उभे अस्मिम् द्यावापृथिवी
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२२० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ शस्यैकत्वात्, अथवा जीवो दहर इति प्राप्तम्; ब्रह्मपुरशब्दात् । जीवस्य हीदं पुरं सच्छरीरं ब्रह्मपुरमित्युच्यते; तस्य स्वकर्मणोपार्जितत्वात् । भक्त्या च तस्य ब्रह्मशब्दवाच्यत्वम् । नहि परस्य ब्रह्मणः शरीरेण स्वस्वामिभावः संबन्धोऽस्ति । तत्र पुरस्वामिनः पुरैकदेशेऽवस्थानं दृष्टम्, यथा राज्ञः । मनउपाधिकश्च जीवः, मनश्च प्रायेण हृदये प्रतिष्ठितमित्यतो जीवस्यैवेदं हृदयेऽन्तरावस्थानं स्यात् । दहरत्वमपि तस्यैव आराग्रोपमितत्वादवकल्पते । आकाशोपमि-तत्वादि च ब्रह्माभेदविवक्षया भविष्यति । न चात्र दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजिज्ञासित-व्यत्वं च श्रूयते । ' तस्मिन्यदन्तः ' इति परविशेषणत्वेनोपादानादिति । अत उत्तरं ब्रूमः-परमेश्वर एवात्र दहराकाशो भवितुमर्हति, न भूताकाशो जोवो वा । कस्मात्? उत्तरेभ्यो वाक्यशेषगतेभ्यो हेतुभ्यः । तथाहि - अन्वेष्टव्यतयाभिहितस्य दहरस्याकाशस्य ' तं चेद्ब्रूयुः ' इत्युपक्रम्य ‘ किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम् ' इत्येवमाक्षेपपूर्वकं प्रतिसमा-धान वचनं भवति - ' स ब्रूयाद्यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावा-पृथिवी अन्तरेव समाहिते ' ( छा ० ८।१।३ ) इत्यादि । तत्र पुण्डरीकदहरत्वेन प्राप्तदहरत्वस्या-काशस्य प्रसिद्धाकाशौपम्येन दहरत्वं निवर्तयन्भूताकाशत्वं दहरस्याकाशस्य निवर्तयतीति रूपसे आकाश एक है । अथवा जीव दहर शब्द वाच्य है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि ब्रह्मपुर शब्द है । जीवका ही पुर होता हुआ यह शरीर ब्रह्मपुर है, ऐसा कहा जाता है, कारण कि जीव उसे अपने कर्मोंसे उपार्जित करता है । और गौणवृत्तिसे जीव ब्रह्म शब्द वाच्य है | परब्रह्मका तो शरीर के साथ स्वस्वामिभाव सम्बन्ध भी नहीं है । लोकमें भी देखा जाता है कि नगरका स्वामी नगरके एक भाग में रहता है, जैसे राजा राजधानोके एक भाग राजगृहमें रहता है । मन उपाधिक जीव है, मन प्रायः हृदयमें रहता है, इससे जीवका ही हृदयके भीतर अवस्थान हो सकता है । आराग्र भागसे उपमित होनेसे उसमें ही दहरत्व भी उपपन्न होता है । आकाश के साथ उसकी उपमा आदि तो ब्रह्म के साथ अभेद विवक्षासे होगी । और ' तस्मिन्यदन्तः ' यहाँ दहर आकाश में अन्वेष्टव्यत्व तथा विजिज्ञासितव्यत्व भी नहीं सुना जाता । किन्तु परके विशेषणरूपसे उसका ग्रहण है अर्थात् आभ्यन्तर वस्तुके आधाररूपसे दहराकाशका ग्रहण किया गया है । सिद्धान्ती -- इसके उत्तरमें हम कहते हैं — यहाँ परमेश्वर ही दहराकाश होने योग्य है, भूताकाश अथवा जीव नहीं, किससे? इससे कि वाक्यशेष गत इस प्रकारके हेतु हैं । जैसे कि अन्वेष्टव्यरूपसे अभिहित दराकाशका ' तं चेद्ब्रूयुः ' ( उस आचार्यसे यदि शिष्य गण कहें ) ऐसा उपक्रमकर ' किं तदत्र विद्यते ० ' ( यहाँ वह क्या है जो अन्वेष्टव्य और विशेषरूपसे जिज्ञासितव्य है ) इस प्रकार आक्षेपपूर्वक उसका ( वह कहे कि हे शिष्य! जितना यह बाह्य आकाश है उतना ही हृदयके आभ्यन्तर यह आकाश है द्युलोक और पृथिवी दोनों उसके अन्तर स्थित हैं ) इत्यादि प्रतिसमाधान वचन है । इस वाक्यसे यह ज्ञात होता है कि हृदय कमलके अल्पत्वसे जिसको अल्पत्व प्राप्त हुआ है उस आकाश में प्रसिद्ध आकाशके सादृश्यसे अल्पत्वकी निवृत्ति करते हुए आचार्यं दहराकाशमें भूताकाशत्वकी भी निवृत्ति करते हैं । यद्यपि आकाश शब्द भूताकाशमें सत्यानन्दी - दीपिका अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च ' ( छा ० ८ | १ | ३ ) ( इसमें द्यु और पृथिवी दोनों अन्तर रहते ही हैं एवं अग्नि और वायु दोनों आभ्यन्तर रहते हैं ) इस प्रकार आकाश सबका आश्रय किस प्रकार है? इन तीन शङ्काओं का समाधान ' तस्य ' इत्यादि भाष्यसे पूर्वपक्षीने किया है । जैसे हृदय रूप अल्प आश्रयकी अपेक्षा भूताकाशमें दहरत्व अल्पत्व है, ध्यानके लिए कल्पित भेदको लेकर उपमान-उपमेयभाव है, और स्वयं एक होनेसे सबका आश्रय भी है । परन्तु ' एष आत्मा ' ( यह आत्मा है ) आत्मशब्द भूताकाशमें नहीं है, इस अरुचिसे ' अथवा ' से पूर्वपक्षीने जीव पक्षका ग्रहण किया हैं ।
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अधि ० ५ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २२१ गम्यते । यद्यप्याकाशशब्दो भूतकाशे रूढः तथापि तेनैव तस्योपमा नोपपद्यत इति भूता-काशशङ्का निवर्तिता भवति । नन्वेकस्याप्याकाशस्य बाह्याभ्यन्तरत्वकल्पितेन भेदेनोपमानो-पमेयभावः संभवतीत्युक्तम् । नैवं संभवति, अगतिका हीयं गतिः यत्काल्पनिकभेदाश्रयणम् । अपि च कल्पयित्वापि भेदमुपमानोपमेयभावं वर्णयतः परिच्छिन्नत्वादभ्यन्तराकाशस्य न बाह्याकाशपरिमाणत्वमुपपद्येत । ननु परमेश्वर स्यापि ' ज्यायानाकाशात् ' ( शत ० ब्रा ० १०।६।३।२ ) इति श्रुत्यन्तराने वाकाशपरिमाणत्वमुपपद्यते । नैष दोषः पुण्डरीकवेष्टन प्राप्तदहरत्व निवृत्ति परत्वाद्वाक्यस्य न तावत्त्वप्रतिपादनपरत्वम् । उभयप्रतिपादने हि वाक्यं भिद्येत । नच कल्पितभेदे पुण्डरीकवेष्टित आकाशैकदेशे द्यावापृथिव्यादीनामन्तःसमाधानमुपपद्यते । एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपास सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' इति चात्म-त्वापहतपाप्मत्वादयश्च गुणा न भूताकाशे संभवन्ति । * यद्यप्यात्मशब्दो जीवे संभवति, तथा-पीतरेभ्यः कारणेभ्यो जीवाशङ्कापि निवर्तिता भवति । न ह्युपाधिपरिच्छिन्न स्याराग्रोपमितस्य जीवस्य पुण्डरीकवेष्टनकृतं दहरत्वं शक्यं निवर्तयितुम् | ब्रह्माभेदविवक्षया जीवस्य सर्वगतत्वादि विवक्ष्येतेति चेत् - यदात्मतया जीवस्य सर्वगतत्वादि विवक्ष्येत, तस्यैव ब्रह्मणः रूढ है, तो भी उसीके साथ उसकी उपमा उपपन्न नहीं होती अर्थात् किसी भी वस्तुकी अपने ही साथ उपमा नहीं हो सकती । दहर आकाश भूताकाश है यह शङ्का भी निवृत्त होती है । पूर्वपक्षाने यह. कहा है कि एक आकाशमें भी बाह्य और आभ्यन्तर कल्पित भेदसे उपमान- उपमेयभाव हो सकता है, परन्तु ऐसा सम्भव नहीं हैं, क्योंकि जो काल्पनिक भेदका आश्रय है यह तो अगतिका गति है | और दूसरी बात यह भी है कि भेदकी कल्पना करके उपमान- उपमेयभावका वर्णन करनेवाले मतमें आभ्यन्तर आकाश परिच्छिन्न होनेसे बाह्याकाशके समान परिमाणवाला नहीं हो सकता । परन्तु ' ज्यायानाकाशात् ० ' ( आकाशसे भी अधिक ) इस दूसरी श्रुतिसे परमेश्वरमें भी आकाशके समान परिमाणत्व युक्त नहीं है । सि ० -- यह दोष नहीं है, क्योंकि यह वाक्य पुण्डरोकके वेष्टनसे प्राप्त अल्पत्वकी निवृत्तिके लिए है भूताकाशमें समान परिमाणका प्रतिपादन करनेके लिए नहीं है । दोनोंके प्रतिपादन में वाक्यभेद हो जाएगा । और पुण्डरीकसे वेष्टित कल्पित भेदवाले आकाश के एक देशमें द्युलोक और पृथिवी आदिका अन्तरवस्थान उपपन्न नहीं होगा ' एष आत्मापहतपाप्मा ० ' ( यह आत्मा पापसे रहित है, जरा, मरण और शोकसे रहित, भूख और प्याससे मुक्त, सत्यकाम, सत्य-संकल्प है ) इस प्रकार आत्मत्व, पापरहितल आदि गुण भूताकाशमें सम्भव नहीं हैं । यद्यपि आत्मशब्दका जीव में प्रयोग सम्भव है, तो भी अन्य कारणोंसे जीव विषयक आशङ्का निवृत्त हो जाती है । उपाधिसे परिच्छिन्न और आरके अग्रभागसे उपमित जीवमें कमलवेष्टनकृत अल्पत्वका निवारण नहीं किया जा सकता । यदि ब्रह्मके साथ अभेदकों विवक्षासे जीव में सर्वगतत्वादिकी विवक्षा करो तो सत्यानन्दी - दीपिका * दहराकाशके अल्पत्वकी निवृत्ति और भूताकाशके समान परिमाण, इस प्रकार एक वाक्य दो अर्थं माननेसे वाक्यभेद रूपी दोष होता है । यह दोष यहाँपर नहीं है, क्योंकि ' ज्यायानाकाशात् ० ' यह वाक्य कमलवेष्टनसे प्राप्त अल्पत्वकी निवृत्ति परक है, आकाशके समान परिमाण प्रतिपादन परक नहीं है, इमलिए दहराकाश परमेश्वर ही है भूताकाश नहीं । * अब सिद्धान्ती जीव विषयक शङ्काको निवृत्त करते हैं - यद्यपि आत्मत्व धर्मं जीव में है, तो मी सत्यकामत्व पापरहितत्व आदि धर्मं उसमें नहीं हैं । इसलिए दहर शब्दसे जीवका ग्रहण सम्भव नहीं है अपितु ब्रह्मा ग्रहण ही सम्भव है । यद्यपि जीवमें हृदयरूप उपाधिसे दहरत्व है तो मी ' ज्यायाना--काशात् ' यह वाक्यार्थं उसमें संगत नहीं हो सकता, क्योंकि जीव परिच्छिन्न है ।
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ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ साक्षात्सर्वगतत्वादि विवक्ष्यतामिति युक्तम् । यदप्युक्तं ब्रह्मपुर मिति जीवेन परस्योपलक्षि-तत्वाद्राज्ञ इव जीवस्यैवेदं पुरस्वामिनः पुरैकदेशवर्तित्वमस्त्विति । अत्र ब्रूमः -- परस्यैवेदं ब्रह्मणः पुरं सच्छरीरं ब्रह्मपुरमित्युच्यते, ब्रह्मशब्दस्य तस्मिन्मुख्यत्वात् । तस्याप्यस्ति पुरेणा-नेन संबन्धः; उपलब्ध्यधिष्ठानत्वात् । ' स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरशियं पुरुषमीक्षते ' ( प्र ० ५/५ ) ' स वा भयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयः ' ( वृ ० २।५।१८ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अथवा जीवपुर एवास्मिन्ब्रह्म संनिहितमुपलक्ष्यते । यथा शालग्रामे विष्णुः संनिहित इति, तद्वत् । ' तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते ' ( छा ० ८।१।६ ) इति च कर्मणा-मन्तवत्फलत्वमुक्त्वा ' अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु काम-चारो मवति ' इति प्रकृतदहराकाशविज्ञानस्यानन्तफत्वं वदन् परमात्मत्वमस्य सूचयति । यदप्येतदुक्तं - न दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्तत्वं विजिज्ञासितव्यत्वं च श्रुतं; परविशेषणत्वेनो-पादानादिति, अत्र ब्रूमः - यद्याकाशो नान्वेष्टव्यत्वेनोक्त स्यात् ' यावान्वा अयमाकाशस्तावा-नेषोऽन्तर्हृदय आकाशः ' इत्याद्याकाशस्वरूपप्रदर्शनं नोपयुज्येत । नन्वेतदप्यन्तर्वर्तिवस्तुसद्भाव-प्रदर्शनायैव प्रददते । ' तं चेद्युर्यदिदमस्मिन्त्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः आत्मरूपसे अर्थात् ब्रह्मके साथ अभेद मानकर जीव में सर्वगतत्वादि धर्मोकी विवक्षा करनेकी अपेक्षासे यही अधिक युक्त है कि उस ब्रह्मके ही साक्षात् सर्वगत्वादि धर्मोकी विवक्षा करो । जो यह कहा गया है कि ' ब्रह्मपुरम् ' में जीवसे शरीर रूपी पुरका सम्बन्ध होनेसे राजाके समान पुरके स्वामी जीवका ही पुरके एक भागमें रहना सम्भव है । इस विषय पर हम कहते हैं - परब्रह्मका ही पुर होता हुआ यह शरीर ब्रह्मपुर है, ऐसा कहा जाता है, क्योंकि परब्रह्ममें ब्रह्म शब्द मुख्य है । उसका भी इस पुरके साथ ( कल्पित ) सम्बन्ध है, कारण कि वह उसके उपलब्धिका स्थान है । ' स एतस्माज्जीवघनात् ० ' ( वह उपासक इस पर जीवधन [ हिरण्यगर्भ ] से भी पर - उत्कृष्ट और शरीर में प्रविष्ट परमात्माका दर्शन करता है ) और ' स वा अयं पुरुषः ० ' ( वह पुरुष सब शरीरोंमें वर्तमान हृदयमें रहनेके कारण पुरिशय कहलाता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । अथवा जैसे शालग्राम में विष्णु संनिहित है, वैसे इस जीवपुरमें ही ब्रह्म संनिहित उपलक्षित होता है । ' तद्यथेह ० ' ( जिस प्रकार यहाँ कर्म से सम्पादित फल क्षीण हो जाता है उसी प्रकार परलोकमें अग्निहोत्र आदि पुण्यसे उपार्जित स्वर्गलोक आदि फल क्षीण हो जाता है ) इसप्रकार कर्मोंका फल नश्वर कहकर ' अथ य इह ० ' ( जो यहाँ आत्मा - दहरका तथा उसके आश्रित सत्यकाम, सत्यसंकल्प आदि गुणका शास्त्र और आचार्यके उपदेशके अनुसार ध्यानसे अनुभवकर परलोकमें जाते हैं वे सार्वभौम राजाके समान सब लोकोंमें यथेच्छ विहार करनेवाले और अभीष्ट वस्तुको प्राप्त करनेवाले. होते हैं ) इसप्रकार प्रकृत दहराकाशके विज्ञानका फल अनन्त कहकर श्रुति दहाराकश परमात्मा है, सूचित करती है । दहराकाशका अन्वेष्टव्य तथा विजिज्ञासितव्य-रूपसे श्रवण नहीं है, क्योंकि परके विशेषणरूपसे उसका ग्रहण है । ऐसा जो पूर्वपक्षीने कहा है, उस-पर हम कहते हैं - यदि दहराकाश अन्वेष्टव्यरूपसे न कहा गया होता, तो ' यावान्वा ० ' ( जितना यह बाह्य आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत वह आकाश है ) इत्यादि आकाश स्वरूपका प्रदर्शन उपयुक्त नहीं होता । परन्तु यह भी अन्तर्वतीं वस्तुके सद्भाव प्रदर्शनके लिए दिखलाया जाता है, क्योंकि ‘ तं चेद् ब्रूयुर्थदिदमस्मिन् ० ' ( उस आचार्यसे यदि शिष्यगण पूछें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार सत्यानन्दी - दीपिका * यहाँ दहर आकाश शब्दसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए । पूर्वपक्ष में भूताकाश आदिकी उपासना फल है और सिद्धान्त में संगुण ब्रह्मकी उपासनाद्वारा निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार फल है || १४ ||
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अधि ० ५ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २२३ किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम् ' इत्याक्षिप्य परिहारावसर आकाशौपम्योप-क्रमेण द्यावापृथिव्यादीनामन्तः समाहितत्वदर्शनात् । नैतदेवम्; एवं हि सति यदन्तः-समाहितं द्यावापृथिव्यादि तदन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं चोक्तं स्यात्, तत्र वाक्यशेषो नोप-पद्येत । ‘ अस्मिन्कामाः समाहिताः ', ' एष आत्माऽपहतपाप्मा ' इति हि प्रकृतं द्यावापृथिव्यादि-समाधानाधारमाकाशमाकृष्य ' अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामान् ' इति समुच्चयार्थेन चशब्देनात्मानं कामाधारमाश्रितांश्च कामान्विज्ञेयान्वाक्यशेषो दर्शयति । तस्माद्वाक्योपक्रमेऽपि दहर एवाकाशो हृदय पुण्डरीकाधिष्ठानः सहान्तःस्थैः समाहितै पृथि व्यादिभिः सत्यैश्च कामैर्विज्ञेय उक्त इति गम्यते । स चोक्तेभ्यो हेतुभ्यः परमेश्वर इति ॥१४ ॥
गतिशब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिङ्ग च ॥ १५ ॥
पदच्छेद–— गतिशब्दाभ्याम्, तथाहि दृष्टम्, लिङ्गम्, च । सूत्रार्थ - ( गतिशब्दाभ्याम् ) ' इमाः सर्वाः प्रजा ' इस श्रुतिमें गमन और ब्रह्मलोक शब्दोंसे ज्ञात होता है कि दहर ब्रह्म ही है । ( तथाहि दृष्टम् ) इसीप्रकार ' सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ' इस अन्य श्रुतिसे मी जीवगम्य ब्रह्म प्रतिपादित होता है । ( लिङ्गं च ) एवं श्रुति प्रतिपादित जीवोंका प्रतिदिन ब्रह्मलोक गमन असम्भव है, इसलिए ' ब्रह्मैव लोकः ब्रह्मलोक ' इस कर्मधारय समाससे सामानाधिकरण्य ग्रहण में प्रतिदिन गमन ही लिङ्ग है, अर्थात् ब्रह्मका ज्ञापक हेतु है । और सूत्रस्थ ' च ' शब्दसे निषादस्थस्पतिन्याय भी सामानाधिकरण्यके ग्रहणमें सूचित होता है । दहरः परमेश्वर उत्तरेभ्यो हेतुभ्य इत्युक्तम् । तु एवोत्तरे हेतव इदानीं प्रपञ्चयन्ते । इतश्च परमेश्वर एव दहर, यस्माद्दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादको गतिशब्दौ भवतः - ' इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गछन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विदन्ति ' ( छा ० ८ | ३ | २ ) इति । तत्र प्रकृतं दहरं ब्रह्मलोकशब्देनाभिधाय तद्विषया गतिः प्रजाशब्दवाच्यानां जीवानामभिधीयमाना गृह है, उसमें जो अल्प अन्तराकाश है उसके भीतर वह क्या वस्तु है जो अन्वेषण करने योग्य और विशेषरूपसे जिज्ञासा करने योग्य है ) ऐसा आक्षेपकर परिहार करते समय [ ' यावान्वा ' इस मन्त्रसे ] आकाश सादृश्यके उपक्रमसे द्युलोक, पृथिवी आदिका अन्तरवस्थान दिखलाया है । सिद्धान्ती-ऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर तो उसके अन्तरवस्थित जो द्युलोक पृथिवी आदि हैं वे अन्वेष्टव्य तथा विजिज्ञासितव्यरूपसे उक्त होंगे, ऐसी स्थितिमें वाक्यशेष उपपन्न नहीं होगा । ' अस्मिन्कामाः ० ' ( उसमें अभिलाषाएँ - कामनाएँ अवस्थित हैं ) ' एष आत्मा ० ' ( यह आत्मा पाप मुक्त है ) इसप्रकार प्रकृत द्युलोक, पृथिवी आदि जिसमें स्थित हैं उस आकाशकी अनुवृत्ति करके ' अथ य इह ० ' ( यहाँ जो आत्माका और इन सत्यकामोंका आचार्यके उपदेशानुसार ध्यान पूर्वक अनुभव कर परलोकमें जाते हैं ) इस तरहसे यह वाक्यशेष समुच्चयवाचक ' च ' शब्दसे कामोंके आधार आत्मको और उसके आश्रित कामोंको विज्ञेयरूपसे दिखलाता है । इससे ऐसा ज्ञात होता है कि वाक्यके उपकममें भी हृदय-कमल जिसका आधार है वह दहराकाश ही अन्तः स्थित हुए पृथिवी आदिके साथ तथा सत्यकामोंके साथ विज्ञेय कहा गया है । अतः इन उक्त हेतुओंसे सिद्ध होता है वह दहराकाश परमेश्वर ही है ॥१४ ॥
वाक्यशेष गत हेतुओंसे दहर परमेश्वर ही है, ऐसा पूर्व कहा गया है । अब उन्हीं आगे आने-वाले हेतुओं का विस्तार से वर्णन किया जाता है । इससे भी परमेश्वर ही दहर हैं, क्योंकि ' इमाः सर्वाः प्रजा ० ' ( ये सब जीव हृदयान्तर्गत दहराकाश नामक ब्रह्मलोकको सुषप्तिमें प्रतिदिन प्राप्त होते हैं किन्तु अनादि अज्ञानसे आवृत्त उसको नहीं जानते ) इसप्रकार दहर वाक्यशेषमें गति और शब्द परमेश्वर के प्रतिपादक हैं । इसमें प्रकृत दहरका ब्रह्मलोक शब्दसे अभिधान कर उसमें प्रजा शब्द वाच्य जीवोंकी कही हुई गति दहरमें ब्रह्मत्वका ज्ञान कराती है अर्थात् यह अवगत होता है कि
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२२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ दहरस्य ब्रह्मतां गमयति । तथा हाहर हजवानां सुषुप्तावस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टं श्रुत्यन्तरे-' सता सोम्य तदा संपन्नो भवति ' ( छा ० ६ ८ १ ) इत्येवमादौ । लोकेऽपि किल गाढं सुषुप्तमा-चक्षते ' ब्रह्मीभूतो ब्रह्मतां गतः ' इति । तथा ब्रह्मलोकशब्दोऽपि प्रकृते दहरे प्रयुज्यमानो जीवभूताकाशशङ्कां निवर्तयन्ब्रह्म तामस्य गमयति । ननु कमलासन लोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत् । गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत, सामानाधिकरण्य-वृत्त्या तु व्युत्पाद्यमानो ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक इति परमेव ब्रह्म गमयिष्यति । एतदेव चाहरहर्ब्रह्मलोकगमनं दृष्टं ब्रह्मलोकशब्दस्य सामानाधिकरण्यवृत्तिपरिग्रहे लिङ्गम् । न ह्यहरहरिमाः प्रजाः कार्यब्रह्मलोकं सत्यलोकाख्यं गच्छन्तीति शक्यं कल्पयितुम् ॥१५ ॥
धृतेश्व महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १६ ॥
पदच्छेद - धृतेः, च; महिम्नः अस्य, अस्मिन्, उपलब्धेः । सूत्रार्थ - ( धृतेः ), ' अथ य आत्मा ० ' इस श्रुतिमें उक्त धृति, ( च ) और ' एष भूतपाल: ' ( अस्य महिम्नः ) सब लोकोंको धारण करनेकी महिमा ( अस्मिन् ) परमात्मामें ( उपलब्ध: ) उपलब्ध होने से दहराकाश परमेश्वर ही है । * धृतेश्व हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः । कथम्? ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ' इति हि प्रकृत्याकाशौपम्यपूर्वकं तस्मिन्सर्व समाधानमुक्त्वा तस्मिन्नेव चात्मशब्दं प्रयुज्यापहतपाप्म-त्वादिगुणयोगं चोपदिश्य तमेवानतिवृत्तप्रकरणं निर्दिशति - ' अथ य आत्मा स सेतुर्विधृति-रेषां लोकानामसंभेदाय ' ( छा ० ८ । ४ । १ ) इति । तत्र विधृतिरित्यात्मशब्दसामानाधिकरण्या-दहराकाश ब्रह्म है । इसी प्रकार ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! जब जीव सोता है तब सत् के साथ सम्पन्न होता है ) इत्यादि अन्य श्रुतियोंमें सुषुप्ति अवस्थामें प्रतिदिन जीवोंका ब्रह्म विषयक गमन देखा जाता है । लोकमें भी गाढ़ सुषुप्त पुरुषको ' ब्रह्मीभूत ' ब्रह्मत्वको प्राप्त हुआ कहा जाता है । इसीप्रकार प्रकृत दहरमें प्रयुक्त हुआ ब्रह्मलोक शब्द भी दहरमें जीव और भूताकाशकी आशङ्काको निवृत्त करता हुआ दहराकाश ब्रह्म है बोध ( ज्ञान ) कराता है । परन्तु ब्रह्मलोक शब्द तो हिरण्यगर्भं --- ब्रह्माके लोकका मी ज्ञान कराता है? हाँ, अवश्य ज्ञान कराए यदि ब्रह्मका लोक ( ब्रह्मलोक ) इस षष्ठी समास वृत्तिसे ब्रह्मलोक शब्द की व्युत्पत्ति की जाय । किन्तु यहाँ तो ( कर्मधारय समास ) से ' ब्रह्मैव लोक: ' ' ब्रह्म ही लोक ब्रह्मलोक है ' इस सामानाधिकण्यवृत्तिसे व्युत्पन्न हुआ ब्रह्मलोक शब्द परब्रह्मका ही ज्ञान करायेगा । परन्तु प्रतिदिन देखा गया यह ब्रह्मलोक गमन ही ब्रह्मलोक शब्दकी सामानाधिकरण्य-वृत्ति के ग्रहण करने में लिङ्ग हेतु है । प्रतिदिन ये जीव सत्यलोक नामक कार्य -ब्रह्मलोक में जाते हैं ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती ॥ १५ ॥
और धृतिरूप हेतुसे भी यह दहर परमेश्वर ही है । क्योंकि ' दहरोऽस्मिन् ० ' ( इसमें दहर अन्तराकाश है ) इस प्रकार प्रस्तुतकर आकाशके साथ सादृश्यपूर्वक उसमें सब वस्तुओं की स्थिति कहकर, उसमें आत्मशब्दका प्रयोग कर और अपहतपाप्मत्वादिगुणोंके सम्बन्धका उपदेशकर असमाप्त हुए उस प्रकरणका ' अथ य आत्मा ० ' ( जो आत्मा है वह सेतु है इन लोकोंकी मर्यादाका साङ्कर्यं न हो इसलिए सबका विधारक है ) यह श्रुति निर्देश करती है । इसमें विधृति शब्दका आत्म-शब्दके साथ सामानाधिकरण्य होनेसे विधारयिता कहा जाता है, क्योंकि ' क्तिच ' प्रत्ययका कर्ता सत्यानन्दी - दीपिका * ' अथ य आत्मा ' इस श्रुतिमें जो ' अथ ' शब्द है वह पूर्वं दहराकाशरूप प्रकरणकी अनुवृत्ति तथा दहराकाशमें धृति आदि गुणोंका प्रारम्भ वाचक है । यहाँ धृति शब्दका अर्थ धारण करनेवाला है ।
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अधि ० ५ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २२५ द्विधारयितोच्यते; क्तिचः कर्तरि स्मरणात् । यथोदकसंतानस्य विधारयिता लोके सेतुः क्षेत्रसंपदामसंभेदाय, एवमयमात्मैषामध्यात्मादिभेदभिन्नानां लोकानां वर्णाश्रमादीनां च विधारयिता सेतुरसंभेदायासंकरायेति । एवमिह प्रकृते दहरे विधारणलक्षणं महिमानं दर्शयति । अयं च महिमा परमेश्वर एव श्रुत्यन्तरादुपलभ्यते ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्दमसौ विष्टतौ तिष्ठतः ' इत्यादेः । तथान्यत्रापि निश्चिते परमेश्वरवाक्ये श्रूयते-' एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ' इति । एवं धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः ॥१६ ॥
प्रसिद्धेश्व ॥ १७ ॥
पदच्छेद - प्रसिद्धः च । सूत्रार्थ - ' आकाशो वै नाम ' इत्यादि श्रुतिमें आकाश शब्द परमात्मामें ही प्रसिद्ध है, इससे भी दहराकाश परमेश्वर ही है । * इतश्च परमेश्वर एव ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ' इत्युच्यते । यत्कारणमाकाशशब्दः परमेश्वरे प्रसिद्धः । ' आकाशो चै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ' ( छा ० ८1१1४ ), ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यकाशादेव समुत्पद्यन्ते ' ( छा ० १।९ ।१ ) इत्यादिप्रयोगदर्शनात् । जीवे तु न क्वचिदाकाशशब्दः प्रयुज्यमानो दृश्यते । भूताकाशस्तु सत्यामध्याकाशशब्दप्रसिद्धावुप-मानोपमेयभावाद्य संभवान्न ग्रहीतव्य इत्युक्तम् ॥ १७ ॥
अर्थ में विधान है I । जैसे जलके अविच्छिन्न प्रवाहका विधारक सेतु लोकमें क्षेत्र सम्पत्तिका मिश्रण न होनेके लिए है, वैसे यह आत्मा अध्यात्म आदि भेदसे भिन्न इन लोकोंका और वर्णाश्रमादिका असंभेदके लिये - संकर न होनेके लिये विधारक सेतु है । इस प्रकार यहाँ प्रकृत दहराकाशमें विधारणरूप महिमा को श्रुति दिखलाती है । और यह महिमा ' एतस्य वा अक्षरस्य ० ' ( हे गार्गी! इसी अक्षरकी आज्ञामें सूर्य. और चन्द्रमा विधारित हुए रहते हैं ) इत्यादि दूसरी श्रुतिसे परमेश्वरमें उपलब्ध होती है और इस प्रकार दूसरे स्थलमें भी ‘ एष सर्वेश्वरः ० ' ( यही सर्वेश्वर है, भूतोंका पालक है, इन लोकोंकी मर्यादाका संकर न हो इसलिए विधारक सेतु है ) इस प्रकार निश्चित परमेश्वरवाक्य में सुना जाता है । इस प्रकार धृतिरूप हेतुसे यह दहर परमेश्वर ही है ॥ १६ ॥
इस हेतु से भी ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश: ' इस वाक्यमें परमेश्वर ही कहा जाता है । क्योंकि ' आकाशो वै नाम ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम रूपात्मक प्रपञ्चका निर्वाहक है ) ' सर्वाणि ह वा ० ' ( ये सब भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि प्रयोगोंके देखनेसे आकाशशब्द परमेश्वर में प्रसिद्ध है । और जीवके लिए तो प्रयुक्त किया हुआ आकाशशब्द कहीं पर भी देखनेंमें नहीं आता । यद्यपि भूताकाशमें आकाशशब्दको प्रसिद्धि है तो भी उपमान उपमेयभावादिके असम्भव होनेसे उसका
ग्रहण करना ठीक नहीं है, ऐसा ( ब्र ० सू ० १।३।१४ ) में कहा गया है ॥ १७ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका और उस दहररूप विधारकको श्रुतिमें आत्मा कहा गया है । अतः धृति आदि हेतुओंसे दहराकाश परमेश्वर ही है ॥ १६ ॥
* ' आ समन्तात् काशते दीप्यते इति आकाश: ' इससे चारों ओर प्रकाशित तथा विभुत्वादि गुण युक्त स्वयं ज्योति ब्रह्म में आकाशशब्द प्रसिद्ध है । इस प्रकार आकाशशब्दके व्युत्पत्ति लभ्य अर्थसे मी परमात्मा ही सिद्ध होता है । यद्यपि आकाशशब्द भूताकाशमें रूढ़ है, तथापि यहाँ उसका ग्रहण करना युक्त नंहीं है, क्योंकि ' यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश: ' इस श्रुतिसे उपमान-उपमेयभावका निर्देश है । वह एक आकाशमें सम्भव नहीं है, इसलिए दहराकाश परमेश्वर ही है ॥ १७ ॥
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२२६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ॥ १८ ॥
पदच्छेद -- इतरपरामर्शात्, सः, इति " चेत्, न असम्भवात् । सूत्रार्थ - ' एष सम्प्रसाद: ' इस प्रकार इस प्रकरणमें सम्प्रसाद शब्दसे ( इतरपरामर्शात् ) जीवका परामर्श होता है । इसलिए ( स ) जीव दहराकाश है, ( इति चेन्न ) यह कथन युक्त नहीं है, ( असम्भवात् ) क्योंकि आकाशके उपमेयत्व, पापरहितत्वादि धर्म जीव में सम्भव नहीं हैं । * यदि वाक्यशेष बलेन दहर इति परमेश्वरः परिगृह्येतास्तीत रस्यापि जीवस्य वाक्य-शेषे परामर्शः - ' अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभि-निष्पद्यत एष आत्मेति होवाच ' ( छा ० ८ | ३ | ४ ) इति । अत्र हि संप्रसादशब्दः श्रुत्यन्तरे सुषु-तावस्थायां दृष्टत्वात्तदवस्थावन्तं जीवं शक्नोत्युपस्थापयितुं नार्थान्तरम् । तथा शरीर-व्यपाश्रयस्यैव जीवस्य शरीरात्समुत्थानं संभवति । यथाकाशव्यपाश्रयाणां वाय्वादीनामा-काशात्समुत्थानं, तद्वत् । यथा चादृष्टोऽपि लोके परमेश्वरविषय आकाशशब्दः परमेश्वरधर्म-समभिव्याहारात् ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ' इत्येवमादौ परमेश्वरविषयोऽभ्यु पगतः, एवं जीवविषयोऽपि भविष्यति । तस्मादितर परामर्शात् ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ' इत्यत्र स एव जीव उच्यत इति चेत् - नैतदेवं स्यात्, कस्मात्? असंभवात् । नहि जीवो बुद्धाद्युपाधिपरिच्छेदाभिमानी सन्नाकाशेनोपमीयेत । नचोपाधिधर्मानभिमन्यमानस्या-वाक्यशेष बलसे यदि यह स्वीकृत हो कि दहर परमेश्वर है, तो ' अथ य एष सम्प्रसादो ० ' ( प्रजापतिने कहा कि जो यह सम्प्रसाद - जीव इस देहेन्द्रिय समूहमें आत्मबुद्धिका त्यागकर आत्म-ज्ञानद्वारा प्रत्यगभिन्न ब्रह्मका साक्षात्कारकर पर ज्योति स्वरूपको प्राप्त करता है और अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है वह आत्मा है ) इस वाक्यशेषमें इतरका - जीवका भी परामर्श होता है । यहाँ पर ही अन्य श्रुतिमें सम्प्रसाद शब्द सुषुप्ति अवस्थामें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, इसलिए यह संप्रसाद शब्द उस अवस्थावाले जीवका उपस्थापन कर सकता है अन्यका नहीं । जैसे आकाश व्यपाश्रय वायु आदिका आकाशसे समुत्थान होता है, वैसे शरीर व्यपाश्रय जीवका शरीरसे समुत्थान सम्भव है | जैसे लोकव्यवहारमें परमेश्वर विषयक आकाशशब्द अदृष्ट - अप्रसिद्ध होनेपर भी ' आकाशो वै नाम ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्माण करनेवाला है ) इत्यादि श्रुतिमें परमेश्वर धर्मके समभिव्यहार - समीप निर्देश होनेसे परमेश्वर विषयक स्वीकृत किया गया है, वैसे जीव विषयक भी हो जायगा । इसलिए इतर - जीवके परामर्श होने से ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश: ' इस वाक्यमें वही जीव कहा जाता है । सिद्धान्ती – ऐसा कहो तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि असम्भव है । बुद्धि आदि उपाधियोंसे परिच्छिन्नत्वाभिमानी हुआ जीव [ यावान्वा अयमाकाशः ] आकाशंसे उपमित नहीं हो सकता, और उपाधिके धर्मोका अभिमान करनेवाले जीवमें पापरहितत्व आदि धर्म भी सम्भव नहीं हैं । इस अधिकरणके प्रथम ( १४ वें ) सूत्रमें इसका विस्तारसे वर्णन किया जा चुका है । यहाँ सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे ' आकाश परमेश्वर है ' ऐसा लोकव्यवहार में परमेश्वरके लिए आकाशशब्दका प्रयोग अप्रसिद्ध है, तो भी ' एष आत्मापहतपाप्मा ' इस वाक्यशेषमें परमेश्वरके अपहतपाप्मत्वादि धर्मोका आकाश श्रुतिके समीप निर्देश होनेसे ' आकाशो वै नाम ' इत्यादि स्थलोंमें परमेश्वरके लिए आकाश शब्दका प्रयोग स्वीकार किया गया है, वैसे ' अथ य एष सम्प्रसादो ' इत्यादि वाक्यशेष गत लिङ्गोंसे आकाश शब्दका जीवके लिए प्रयोग हो सकता है, अतः सम्प्रसाद और उत्थानरूप लिङ्गोंसे ब्रह्मसे भिन्न जीवका भी परामर्श होता है । इससे ' दहरोऽस्मिन् ' यहाँ जिसका शरीर से समुत्थान हो सकता है, उसका ही दहराकाश शब्दसे ग्रहण करना युक्त है, ब्रह्मका नहीं, इसलिए दहराकाश जीव है इसका ' नैतदेवं स्यात् ' से समाधान किया जाता है ॥ १८ ॥