श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 261–270
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 261–270
पृष्ठ 261
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० ५ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २२७ पहतपाप्मत्वादयो धर्माः संभवन्ति । प्रपञ्चितं चैतत्प्रथमसूत्रे । अतिरेकाशङ्कापरिहारायात्र तु पुनरुपन्यस्तम् । पठिष्यति चोपरिष्टात् ' अन्यार्थश्च परामर्श: ' ( ब्र ० १ ३ | १० ) इति ॥१८ ॥
उत्तराश्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - उत्तराद्, चेत्, आविर्भूतस्वरूपः, तु । सूत्रार्थ - ( उत्तराद् ) ' य एषोऽक्षिणि ' इत्यादि प्रजापति वाक्यसे जाग्रत् आदि अवस्थापन जीव में पापरहितत्व आदि धर्मो का संभव होनेसे जीव दहराकाश है, ( चेत् ) यदि ऐसा कहो तो ( आविर्भूतस्वरूपः ) परमार्थरूपसे जीव विवक्षित है जीवरूपसे नहीं, इसलिए जोव दहराकाश नहीं है, अपितु, ब्रह्म है । ( तु ) शब्द पूर्वपक्ष व्यावृत्त्यर्थक है । * इतरपरामर्शाद्या जीवाशङ्का जाता साऽसंभवान्निराकृता । अथेदानीं मृतस्येवामृत-सेकात्पुनः समुत्थानं जीवाशङ्कायाः क्रियते - - उत्तरस्मात्प्राजापत्याद्वाक्यात् । तत्र हि ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इत्यपहतपाप्मत्वादिगुणकमात्मानमन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं च प्रतिज्ञाय ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' ( छा ० ८/७/४ ) इति ब्रुवन्नक्षिस्थं द्रष्टारं जीवमात्मानं निर्दिशति । ' एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' ( छा ० ८ | ९ | ३ ) इति च तमेव पुनः पुनः परामृश्य ' य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा ' ( छा ० ५।१०।१ ) इति ' तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मा ' ( छा ० ८ | ११ | १ ) इति च जीवमेवावस्थान्तरगतं तो वक्ष्यमाण अधिक आशङ्काके परिहार के लिए इसका पुनः उपन्यास किया गया है । और आगे ' अन्यार्थश्च परामर्श: ' इस सूत्र में जीवपरामर्शका प्रयोजन कहेंगे ॥ १८ ॥
अन्यके परामर्शसे जो जीव विषयक आशङ्का उत्पन्न हुई थी, उसका परिहार जोवमें पाप-रहितत्व आदि धर्मोके असम्भव होनेसे किया जा चुका है । अब अमृतसेक ( छिड़कने ) से जैसे मृतक पुन: जी उठता है, वैसे हो अनन्तरोक्त प्रजापतिवाक्यसे जीव विषयक आशङ्काका पुनः उत्थान करते हैं, क्योंकि वहाँ ' य आत्मापहतपाप्मा ० ' ( जो आत्मा है वह पापरहित है ) इस श्रुतिवाक्यसे पानरहितत्व आदि धर्मोवाले आत्माका अन्वेषण करना चाहिए, विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए, इस प्रकारकी प्रतिज्ञा कर ' य एषोऽक्षिणि ० ' ( जो यह अक्षिमें पुरुष दिखाई देता है वह आत्मा है ) इस प्रकार कहते हुए प्रजापति अक्षिस्य द्रष्टा जीवका आत्मरूपसे निर्देश करते हैं । ' एतं त्वेव ० ' ( इस आत्माको ही मैं तुमसे पुनः कहता हूँ ) उसका ही पुनः पुनः परामर्श कर ' य एष स्वप्ने ० ' ( जो यह स्वप्न में महीयमान स्त्री आदिसे पूजित हुआ विचरता है अर्थात् भोगोंका! अनुभव करता है वह आत्मा है ) ' तद्यत्रैतत्सुतः ० ' ( जिस सुषुप्ति अवस्था में यह सोया हुआ दर्शन आदि वृत्तिसे रहित और सम्यक्रूपसे आनन्दित हो स्नप्नका अनुभव नहीं करता वह सत्यानन्दी - दीपिका * ' य आत्मापहतपाप्मा ० ' ( छा ० ३।७।१ ) ( प्रजापतिने कहा कि जो [ धर्माधर्मादि रूप ] पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, विशोक, क्षुधा रहित, पिपासा रहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, उसे खोजना चाहिए, उसकी विशेषरूपसे जानने की इच्छा करनी चाहिए । जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर प्रत्यगभिन्नरूपसे अनुभव कर लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामों- मोगों को प्राप्त कर लेता है ) इस प्रकार प्रजापतिको समामें आत्माकी महिमा सुनकर देवों और असुरोंने विचार किया कि हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसके जाननेसे सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग उपलब्ध हो जाते हैं । तब देवोंकी ओरसे देवराज इन्द्र और असुरों की ओर
पृष्ठ 262
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
I ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ व्याचष्टे । * तस्यैव चापहतपाप्मत्वादि दर्शयति - ' एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म ' इति । ' नाह खल्व-यमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि ' ( छा ० ८।११।१,२ ) इति च सुषुप्तावस्थायां दोषमुपलभ्य एवं वेब ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात् ' इति चोपक्रम्य, शरीरसंबंध निन्दापूर्वकं ' एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः ' इति जीवमेव शरीरात्समुत्थितमुत्तमपुरुषं दर्शयति । तस्मादस्ति संभवो जीवे पारमेश्वराणां धर्माणाम् । अतः ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश: ' इति जीव एवोक्त इति चेत्कश्चिद्ब्रूयात्, * तं प्रति ब्रूयात्- ' आविर्भूतस्वरूपस्तु ' इति । तुशब्दः पूर्वपक्ष-आत्मा है ) इस प्रकार अवस्थान्तरगत जीवका ही व्याख्यान करते हैं । ' एतदमृतम् ० ', ( यह अमृत, अभय और ब्रह्म है ) इसप्रकार उसीको पापरहितत्वादिरूपसे दिखलाते हैं । ' नाह खल्वयमेव ' ( निश्चय यह सुषुप्ति अवस्था में यह मैं हूँ इसप्रकार न आत्मा अपनेको जानता है और न यह इन अन्य प्राणियोंको ही जानता हैं ) इसप्रकार सुषुप्ति अवस्थामें दोष देखकर ' एतं त्वेव ते ० ' ( इसीको ही मैं तुमसे पुन: कहता हूँ, इससे अन्यको नहीं ) ऐसा उपक्रम कर शरीर सम्बन्धकी निन्दा पूर्वक ' एष सम्प्रसादो ० ' ( यह सम्प्रसाद - जीव इस शरीरसे उठकर [ अभिमानका त्यागकर ] पर ज्योतिको प्राप्तकर पुनः अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है ) इसप्रकार शरीरसे समुत्थित जीवको ही उत्तम पुरुषरूपसे दिखलाता है । इसलिए परमेश्वरके धर्मोका जीवमें सम्भव है । अतः ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश: ' इस वाक्यसे दहराकाश जीव ही कहा गया है । यदि कोई ऐसा कहे, तो उसके प्रति सिद्धान्ती कहे कि ' आविर्भूतस्वरूपस्तु ' इस सूत्र में ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके सत्यानन्दी - दीपिका असुरराट् विरोचन ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएं लेकर प्रजापतिके पास आये । ' तौ हं द्वात्रिं शतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच ' ( उन्होंने बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्यवास किया, तब उनसे प्रजापतिने कहा -- तुम यहाँ किस इच्छासे ठहरे हो? ) उन्होंने कहा कि आत्माको जाननेके लिए हम यहाँ ठहरे हुए हैं । ' तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा ० ' ( तब उनसे प्रजापतिने कहा- यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखाई देता है यह आत्मा है, यह अमृत, अभय और ब्रह्म है ) इत्यादि प्रजापति वाक्योंके आधार पर इस जीव विषयक शङ्काका पुनः उत्थान हुआ है कि पापरहितत्व आदि घर्मो का जीवमें असम्भव नहीं है, इसलिए जीव दहराकाश हो सकता है । परमेश्वरके अन्य धर्मोका भी जीवमें ' तस्यैव ' आदि भाष्यसे उल्लेख करते हैं । * इसप्रकार इन्द्र और प्रजापतिके उपाख्यानसे यह प्रतीत होता है कि दहरवाक्यके कथना-नन्तर इन्द्रके प्रश्नके उत्तर में प्रजापतिने ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा ' यह प्रथम वार और य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा ' यह द्वितीय वार और ' तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मा ' यह तृतीय वार और ' अथ य एष सम्प्रसादो अस्माच्छरीरात्समुत्थाय ' यह चतुर्थं वार पापरहितत्व आदि स्वरूप जीवका उपदेश किया है, क्योंकि सर्वगत ब्रह्म में परिच्छिन्न नेत्रस्थान, स्वप्न अवस्थाका सम्बन्ध और शरीरसे उत्थान आदि सम्भव नहीं हैं । इसलिए नेत्रमें स्थिति, स्वप्न अवस्थाका सम्बन्ध, सुषुप्ति अवस्था में शरीरसे समुत्थान इत्यादि लिङ्ग जिसमें सम्भव हैं उसीका प्रजापतिने पापरहितत्व आदि रूपसे वर्णन किया है । नेत्रमें स्थिति आदि सबका जीवमें सम्भव है । इसप्रकार पूर्वोक्तरीतिसे ब्रह्माने जीवका ही वर्णन किया है, और ' एतदमृतमभयमेतद्-ब्रह्म ० ' ( यह अमृत, अभय और ब्रह्म है ) इस प्रजापति वाक्यसे परमेश्वरके पापरहितत्व, अमृतत्व, अमयत्व आदि धर्मं जीवमें सम्भव हैं । अतः ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश: ' इस वाक्य घटित पापरहितत्वादि धर्म जीव में सम्भव होनेसे दहराकाश शब्दसे जीवका ग्रहण किया जा सकता है ब्रह्मका नहीं ।
पृष्ठ 263
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० ५ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २१ ९ व्यावृत्त्यर्थः नोत्तरस्मादपि वाक्यादिह जीवस्याशङ्का संभवतीत्यर्थः । कस्मात्? यतस्तत्रा-प्याविर्भूतरवरूपो जीवो विवक्ष्यते । आविर्भूतं स्वरूपमस्येत्याविर्भूतस्वरूपः । भूतपूर्व गत्या जीववचनम् । एतदुक्तं भवति - ' य एषोऽक्षिणि ' इत्यक्षिलक्षितं द्रष्टारं निर्दिश्योदशराव-ब्राह्मणेनैनं शरीरात्मताया व्युत्थाप्य ' एतं त्वेव ते ' इति पुनः पुनस्तमेव व्याख्येयत्वेनाकृष्य स्वप्नसुषुप्तोपन्यासक्रमेण ' परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' इति यदस्य पारमार्थिकं स्वरूपं परं ब्रह्म तद्रूपतयैनं जीवं व्याचष्टे, न जैवेन रूपेण । यत्परं ज्योतिरुपसंपत्तव्यं श्रुतं तत्परं ब्रह्म । तच्चापहतपाप्मत्वादिधर्मकं, तदेव च जीवस्य पारमार्थिकं स्वरूपं ' तत्त्वमसि ' इत्यादिशास्त्रेभ्यः, नेतरदुपाधिकल्पितम् । यावदेव हि स्थाणाविव पुरुषबुद्धि द्वैतलक्षणाम विद्यां निवर्तयन्कूटस्थनित्यदृक्स्वरूपमात्मानमहं ब्रह्मास्मीति न प्रतिपद्यते तावज्जीवस्य जीवत्वम् । यदा तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघाताद्वयुत्थाप्य श्रुत्या प्रतिबोध्यते, नासि त्वं देहेन्द्रि-लिए है । उत्तरवाक्यसे भी यहाँ जीवको आशङ्का सम्भव नहीं है, ऐसा अर्थ है, क्यों? क्योंकि उसमें भी आविर्भूतस्वरूप जीव विवक्षित है । जाग्रतादि अवस्थाओंसे शोधनकर अभिव्यक्त हुआ है निज प्रत्यग-मिन्न ब्रह्मस्वरूप जिसको वह आविर्भूतस्वरूप है । भूत पूर्व अज्ञान अवस्थाकी अपेक्षा यह जीववचन | अभिप्राय यह है कि ' य एषोऽक्षिणि ' इसप्रकार नेत्रसे उपलक्षित [ विश्वरूप ] द्रष्टाका निर्देश कर उदशरावब्राह्मण द्वारा शरीरमें आत्मत्वसे इस जीवको अलगकर ' एतं वेव ते ० ' ( इसीको ही मैं तुमसे फिर कहता हूँ ) इसप्रकार पुनः पुनः उसीका व्याख्येयरूपसे ग्रहणकर स्वप्न और सुषुप्तिके उपन्यासके क्रमसे ‘ परं ज्योतिरूपसम्पद्य ० ' ( परं ज्योतिः स्वरूपको प्राप्तकर अपनेरूपसे अभिनिष्पन्न होता है ) इस प्रकारसे इस जीवका यथार्थ- पारमार्थिकरूप परब्रह्म है उस रूपसे इस जीवका व्याख्यान करते हैं जीवके रूपसे नहीं । प्राप्तव्य जो परज्योतिः श्रुति प्रतिपादित है वह परब्रह्म है और वह पाप-रहितत्व आदि धर्मवाला है । वही जीवका ' तत्त्वमसि ' इत्यादि शास्त्रोंसे ज्ञातव्य पारमार्थिक स्वरूप है, इससे भिन्न उपाधि कल्पित स्वरूप पारमार्थिक नहीं है । जब तक स्थाणु में पुरुषबुद्धि के समान द्वैतलक्षण अविद्याकी निवृत्तिकर कूटस्थ, नित्य, ज्ञानस्वरूप आत्माको ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार नहीं जान लेता तब तक जीव में जीवत्व है । परन्तु जब देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिके संघातसे पृथक् कर तू ! सत्यानन्दी - दीपिका * एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' इसप्रकार प्रजापतिने इन्द्र और विरोचनको उपदेश देकर कहा कि जलसे पूर्ण शराव [ सिकोरा ] में अपनेको देखो, विरोचन छायाको शरीरके अधीन देखकर अन्वय - व्यतिरेकसे शरीर आत्मा है ऐसा निश्चयकर लौट गया । किन्तु इन्द्र शरीरको विनाशी निश्चितकर प्रजापति के पास आया । इसप्रकार ब्रह्माने इन्द्रकी शरीरादिमें आत्मबुद्धिको हटा -कर जीवका यथार्थस्वरूप [ ब्रह्म ] बतलाने के लिए कहा कि ' एतं वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो ` एवान्यत्रैतस्मात् ० ' ( इसीको ही मैं तुमसे फिर कहता हूँ, इससे अन्यको नहीं ) इत्यादि वाक्योंसे यहाँ प्रजापति औपाधिक जीवरूपसे जीवका व्याख्यान नहीं करते, क्योंकि वह तो लोक प्रसिद्ध है | अपितु उसका अनुवाद कर जाग्रत, स्वप्न सुयुप्ति इन परस्पर विलक्षण अवस्थाओं से विवेचन कर ब्रह्मस्वरूपका ज्ञान कराते हैं । उपाधि रहित जीवका स्वरूप ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, किन्तु ब्रह्म ही है । ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ० ' ( इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ अभेदका प्रतिपादन करती हैं । इस आधारपर परमेश्वरके पापरहितत्वादि धर्मोंका जीवमें निर्देश किया है । इसप्रकार जातादि अवस्थाओं का कथन भी ब्रह्म स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए है, जीवके प्रतिपादनके लिए नहीं । ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुति वाक्य मी जीवके पारमार्थिकस्वरूप ( ब्रह्म ) का ही प्रतिपादन करते हैं अविद्यादि उपाधिक जीवका नहीं ।
पृष्ठ 264
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ यमनोबुद्धिसंघातः; नासि संसारी, किं तर्हि? तद्यत्सत्यं स आत्मा चैतन्यमात्रस्वरूपस्त-मसीति तदा कूटस्थनित्यदृक्स्व रूपमात्मानं प्रतिबुध्यास्माच्छरीराद्यभिमाननात्समुत्ति-ष्ट्रन्स एव कूटस्थनत्यदृक्स्वरूप आत्मा भवति, ' स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मुण्ड ० ३।२।९ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तदेव चास्य पारमार्थिकं स्वरूपं येन शरीरात्समुत्थाय स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । कथं पुनः स्वं च रूपं स्वेनैव च निष्पद्यत इति संभवति कूटस्थ-नित्यस्य? सुवर्णादीनां तु द्रव्यान्तर संपर्कादभिभूतस्वरूपाणामनभिव्यक्त्ता साधारणविशेषाणां क्षारप्रक्षेपादिभिः शोध्यामानानां स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात् । तथा नक्षत्रादीनामहन्यभि-भूतप्रकाशानामभिभावकवियोगे रात्रौ स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात् । न तु तथात्म चैतन्य-ज्योतिषो नित्यस्य केनचिदभिभवः संभवत्यसंसर्गित्वाद्व योग्न इव, दृष्टविरोधाच्च । दृष्टिश्रुति-मतिविज्ञात्तयो हि जीवस्य स्वरूपम् । तच्च शरीरादसमुत्थितस्यापि जीवस्य सदा निष्पन्नमेव दृश्यते । सर्वो हि जीवः पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्व्यवहरति; अन्यथा व्यवहारानु-पपत्तेः । तच्चेच्छरीरात्समुत्थितस्य निष्पद्येत, प्राक्समुत्थानाद्दष्टो व्यवहारो विरुध्येत । अतः किमात्मकमिदं शरीरात्समुत्थानम्, किमात्मिका वा स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिरित? अत्रोच्यते-देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप संघात नहीं, तू संसारी भी नहीं है, किन्तु जो सत्य है वह चैतन्य-स्वरूप आत्मा है ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) इसप्रकार श्रुति द्वारा प्रतिबोधित होता है । तब कूटस्थ, नित्य, ज्ञानस्वरूप आत्माको जानकर इस शरीर आदि अभिमानका परित्यागकर वही कूटस्थ, निला, ज्ञान-स्वरूप आत्मा होता है, क्योंकि ' स यो ह वै ० ' ( जो उस परम ब्रह्मको जानता है निस्सन्देह वह ब्रह्म होता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । शरीरसे आत्माभिमानको त्यागकर जो परम ज्योतिस्वरूपको प्राप्त करता है वही उसका पारमार्थिक स्वरूप है । परन्तु अपने हो रूपको आप ही निष्पन्न होता है यह नित्य कूटस्थमें किस प्रकार सम्भव है? अन्य द्रव्यके संसर्गसे जिनका स्वरूप अभिभूत हो गया है, तथा असाधारण विशेषगुण अभिव्यक्त नहीं है, क्षारप्रक्षेपादिसे शोधन किए हुए उन सुवर्णादिकी तो स्वरूपसे अभिव्यक्ति होती है । तथा दिनमें जिनके प्रकाशका अभिभव हो जाता है, उन नक्षत्र आदिकी रात्रि में अभिभव करने वालेके अभाव में स्वरूपसे अभिव्यक्ति होती है, यह सम्भव है | परन्तु आत्मा चैतन्यरूप नित्य ज्योतिका इसप्रकार किसीसे • अभिभव सम्भव नहीं है, क्योंकि आकाशके समान वह संसर्ग रहित है और प्रत्यक्ष विरोध भी है । कारण कि दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान ही जीवका स्वरूप है । वह शरीरसे अभिमानका न त्याग करनेवाले जीव में भी सदा रहते हैं । सभी जीव देखते 1 सुनते, विचार करते और समझते हुए व्यवहार करते हैं, अन्यथा व्यवहारको उपपत्ति नहीं होगी । वह स्वरूप यदि शरीरसे अभिमान त्याग करनेसे निष्पन्न होता हो तो समुत्थानसे पूर्व देखा गया व्यवहार बाधित हो जायगा, अतः शरीरसे समुत्थानका स्वरूप क्या है और स्वरूपसे अभिव्यक्तिका स्वरूप क्या है? सिद्धान्ती - इसके उत्तरमें कहते हैं -- जैसे शुद्ध स्फटिककी स्वच्छता सत्यानन्दी - दीपिका पूर्वपक्षी - ' शरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( शरीरसे आत्माभिमानका त्यागकर परं ज्योतिको प्राप्तकर स्वरूपसे - आत्मरूप से अभिव्यक्त होता है ) यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा तो नित्य ज्ञानस्वरूप है और वह आकाशके समान असंग है ' तो उसके स्वरूपका किसीसे भी अभिभव सम्भव नहीं है और जीवके प्रत्यक्ष दर्शन आदि व्यवहारसे भी यह प्रतीत होता है, अज्ञपुरुषका चैतन्यस्वरूप भी वृत्ति में अभिव्यक्त होता है, अन्यथा केवल वृत्तिके जड़ होने से कोई भी व्यवहार नहीं होगा । अस्तु, परन्तु शरीर से समुत्थान और अपने से अपनी अभिव्यक्तिका स्वरूप क्या है?
पृष्ठ 265
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० ५ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित -२३१ प्राग्विवेकविज्ञानोत्पत्तेः शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनोपाधिभिरविविक्तमिव जीवस्य दृष्ट्यादिज्योतिः स्वरूपं भवति । यथा शुद्धस्य स्फटिकस्य स्वाच्छ्यं शौक्ल्यं च स्वरूपं प्राग्विवेक प्रहणाद्रक्तनीलाद्युपाधिभिरविविक्तमिव भवति । प्रमाणजनितविवेकग्रहणात्त पराचीनः स्फटिकः स्वाच्छयेन शौक्ल्येन च स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत इत्युच्यते प्रागपि तथैव सन् । तथा देहाद्युपाध्य विविक्तस्यैव सतो जीवस्य श्रुतिकृतं विवेक विज्ञानं शरीरात्स-मुत्थानम्, विवेकविज्ञानफलं स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः केवलात्मस्वरूपावगतिः । तथा विवेका-विवेकमात्रेणैवात्मनोऽशरीरत्वं सशरीत्वं च मन्त्रवर्णात् ' अशरीरं शरीरेषु ' ( का ० १।२।२२ ) इति, ' शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ' ( गी ० १३ | ३१ ) इति च सशरीरत्वाशरीरत्व-विशेषाभावस्मरणात् । तस्माद्विवेक विज्ञानाभावादनाविर्भूतस्वरूपः सन्धिवेकविज्ञानादा-विर्भूतस्वरूप इत्युच्यते । नत्वन्यादृशावाविर्भावानाविर्भावौ स्वरूपस्य संभवतः स्वरूप-त्वादेव । एवं मिथ्याज्ञानकृत एव जीवपरमेश्वरयोर्भेदो न वस्तुकृतः; व्योमवदसङ्गत्वाविशे-पात् । कुतश्चैतदेवं प्रतिपत्तव्यम्? यतो ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' इत्युपदिश्य ' एतदमृतम-मयमेतद्ब्रह्म ' इत्युपदिशति । यो ऽक्षिणि प्रसिद्धो द्रष्टृत्वेन विभाव्यते सोऽमृताभयलक्षणाद्-ब्रह्मणोऽन्यश्चेत्स्यात्, ततोऽमृताभयब्रह्मसामानाधिकरण्यं न स्यात् । नापि प्रतिच्छायात्मा-ऽयमक्षिलक्षितो निर्दिश्यते; प्रजापतेर्मृषावादित्वप्रसङ्गात् । तथा द्वितीयेऽपि पर्याये य एष और शुक्लरूप. विवेक ज्ञान होनेसे पूर्व रक्त, नील आदि उपाधियोंसे अविविक्त - सा होता है, वैसे विवेक ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे पूर्वं शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय, वेदनारूप उपाधियोंसे जीवकी दृष्टि आदि ज्योति: स्वरूप अविवक्त - सा होता है । यद्यपि विवेक ज्ञानके पूर्व में भी स्फटिक वैसा शुक्ल और स्वच्छ था, तो भी प्रमाण जनित विवेक ज्ञानके अनन्तर तो स्फटिक अपने स्वच्छ और शुक्ल-रूपसे अभिव्यक्त हुआ कहा जाता है । उसी प्रकार देह आदि उपाधियोंसे अविविक्त हुए जीवका श्रुतियोंसे उत्पन्न हुआ विवेक - विज्ञान ही मानो शरीरसे समुत्थान है और इस विवेक विज्ञानका फल केवल आत्मस्वरूपका साक्षात्कार ही स्वरूपाभिव्यक्ति है । इसी प्रकार ' अशरीरं शरीरेषु ' ( जो शरीरोंमें अशरीर है ) इस मन्त्र से विवेक और अविवेकमात्र से ही आत्मा अशरीर और सशरीर है । और ' शरीरस्थोऽपि ० ' ( हे कौन्तेय! वह शरीरमें स्थित हुआ भी वास्तव में न करता है और न किसी कर्मसे लिप्त होता है ) इस प्रकार सशरीरत्व और अशरीरत्व विषयक विशेषाभाव - मावाभावकी स्मृति है । इसलिए विवेकज्ञानके अभाव से अनभिव्यक्त स्वरूप होता हुआ भी जीव विवेकविज्ञानसे अभिव्यक्त स्वरूप होता है ऐसा कहा जाता है । अन्य प्रकारसे अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति स्वरूपमें संभव नहीं हैं, क्योंकि वह स्वरूप है । उसी प्रकार जीव और ईश्वरका भेद मिथ्याज्ञानसे जन्य है वास्तविक नहीं है, क्योंकि आत्मामें आकाशके समान असंगत्व अविशेष है । परन्तु यह कैसे जाना जाय? इससे कि ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ० ' ( नेत्रमें जो यह पुरुष दिखाई देता है ) ऐसा उपदेश कर ' एतदमृतम ० ' ( यह अमृत और अभय है यह ब्रह्म है ) ऐसा उपदेश किया है । नेत्रमें जो प्रसिद्ध विश्वरूप द्रष्टारूपसे ज्ञात होता है यदि वह अमृत और अमय स्वरूप ब्रह्मसे अन्य हो तो अमृत और अभयरूप ब्रह्म के साथ उस [ अक्षिस्थ पुरुष ] का सामानाधिकरण्य नहीं होगा । अक्षि लक्षित यह प्रतिबिम्बात्मा भी निर्दिष्ट नहीं है, क्योंकि प्रजापति मिथ्यावादी हो जायगा । इसी प्रकार ' य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति ० ' ( स्वप्न में जो यह सत्यानन्दी - दीपिका * जिस आत्मा के ज्ञानसे कृतकृत्यता और समस्त भोगोंकी उपलब्धि होती है, उस आत्माको जानने के लिए इन्द्र और विरोचन दोनों प्रजापति के पास आये थे । ब्रह्मा उनके प्रति य एषोऽक्षिणि
पृष्ठ 266
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३२. ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ स्वप्ने महीयमानश्चरति ' इति न प्रथमपर्याय निर्दिष्टाक्षिपुरुषाद्द्रष्टुरन्यो निर्दिष्टः ' एतं स्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' इत्युपक्रमात् । किंचाहमद्य स्वप्ने हस्तिनमद्राक्षम्, नेदानीं तं पश्यामीति दृष्टमेव प्रतिबुद्धः प्रत्याच; द्रष्टारं तु तमेव प्रत्यभिजानाति य एवाहं स्वतमद्राक्षं स एवाहं जागरितं पश्यामि ' इति । तथा तृतीयेऽपि पर्याये ' नहि खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमह-मस्मीति नो एवेमानि भूतानि । ' इति सुषुप्तावस्थायां विशेषविज्ञानाभावमेव दर्शयति न विज्ञातारं प्रतिषेधति । यत्तु तत्र ' विनाशमेदापीतो भवति ' इति तदपि विशेषविज्ञानविनाशाभि-प्रायमेव न विज्ञातृविनाशाभिप्रायम्; ' नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् ' ( वृ ० ४ | ३ | ३० ) इति श्रुत्यन्तरात् । तथा चतुर्थेऽपि पर्याये ' एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात् ' इत्युपक्रम्य ' मघवन् मर्त्यं वा इदं शरीरम् ' इत्यादिना प्रपञ्चेन शरीराद्युपा-धिसंबन्धप्रत्याख्यानेन संप्रसादशब्दोंदितं जीवं ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' इति ब्रह्मस्वरूपापन्नं दर्शयन्न परस्मादब्रह्मणोऽमृताभय स्वरूपादन्यं जीवं दर्शयति । केचित्त - परमात्मविवक्षायां ' एतं त्वेव ते ' इति जीवाकर्षण मन्याय्यं मन्यमाना एतमेव वाक्योपक्रमसूचितमपहतपाप्मत्वा-भोगोंको भोगता हुआ विचारता है वही आत्मा है ) दूसरी वार भी प्रथम वार निर्दिष्ट अक्षि पुरुषरूप द्रष्टासे भिन्न द्रष्टाका निर्देश नहीं है । क्योंकि ' एतं त्वेत ते ० ' ( इसीको मैं तुमसे पुनः कहता हूँ ) ऐसा उपक्रम है । किञ्च आज मैंने स्वप्न में हाथी देखा था, किन्तु अब उसको नहीं देख रहा हूँ, इस प्रकार द्रष्टका ही जागकर निषेध करता है । ' य एवाऽहं स्वममद्राक्षं ० ' ( जिस मैंने स्वप्न अवस्थाका अनुभव किया था वही मैं अब जाग्रत अवस्थाका अनुभव कर रहा हूँ ) इस प्रकार उसी द्रष्टाकी प्रत्यभिज्ञा करता है । इसी प्रकार तृतीयवार में ' नाह खल्व ० ' ( इस अवस्थामें तो निश्चय ही ' यह मैं हूँ ' इस प्रकार न यह आत्मा अपनेको जानता है और न इन प्राणियोंको ही जानता है ) इस प्रकार श्रुति सुषुप्ति अवस्था में विशेष विज्ञानका अभाव ही दिखलाती है विज्ञाताका प्रतिषेध नहीं करती । उसमें ' विनाशमेवा ० ' ( वह विनाशको ही प्राप्त होता है ) यह भी विशेष विज्ञानके विनाशके अभिप्रायसे कहा गया है विज्ञाताके विनाशके अभिप्रायसे नहीं, क्योंकि ' नहि विज्ञातुर्विज्ञाते. ' ( विज्ञाताकी विज्ञप्ति - विज्ञानशक्तिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है ) यह दूसरी श्रुति है । इस प्रकार चौथी वार में भी ' एतं त्वेव ते ० ' ( इसीको मैं तुमसे फिर कहता हूँ इससे अन्यको नहीं ) ऐसा उपक्रम कर ' मघवन्मर्त्य वा ० ' ( हे इन्द्र! निस्सन्देह यह शरीर मरणशील है ) इत्यादिसे विस्तार पूर्वक शरीर आदि उपाधियोंके सम्बन्धका निषेध कर ' सम्प्रसाद ' शब्द से कथित rtant ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता हैं ) इससे ब्रह्मस्वरूप प्राप्ति दिखलाकर प्रजापति अमृत, अभयस्वरूप परब्रह्म से जीवको अन्य नहीं दिखलाते । कुछ एक आचार्य तो परमात्माकी विवक्षा में ' एतं त्वेव ते ' इससे जीवकी अनुवृत्ति अनुचित समझाने वाले [ य आत्मापहतपाप्मा ] इस वाक्योपक्रममें सूचित पापरहितत्व आदि गुण विशिष्ट इसी आत्माको सत्यानन्दी - दीपिका पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' इससे अपहतपाप्मत्व आदि विशिष्ट आत्माके उपदेशकी उपेक्षाकर अनात्म-रूप छायाका यदि उपदेश करें तो निश्चित मिथ्यावादी सिद्ध होंगे । परन्तु ब्रह्माने ' य एषोऽक्षिण ' इस श्रुतिवाक्यसे छायात्माका उपदेश नहीं किया है, अपितु पापरहितत्वादि विशिष्ट आत्माका ही नेत्रस्थ विश्वरूप द्रष्टाका द्रष्टारूपसे उपदेश किया है । उसीको ही दूसरी बार स्वप्न अवस्थाको लेकर उपदेश किया है । क्योंकि ' एतं वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' इस प्रकारकी ब्रह्माने प्रतिज्ञाकी है । * सिद्धान्ती अपने अभिमतको अधिक स्पष्ट करनेके लिए किसी अन्य आचार्य मतका उल्लेख करते हैं - —— इस मतमें जीव और ईश्वर भिन्न - भिन्न हैं और अपहतपाप्मत्व आदि धर्म जीवमें
पृष्ठ 267
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० ५ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २३३ गुणकमात्मानं ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामीति कल्पयन्ति । तेषामेतमिति संनिहितावलम्बिनी सर्वनामश्रुतिर्विप्रकृष्येत । भूयः श्रुतिश्चोपरुध्येत पर्यायान्तराभिहितस्य पर्यायान्तरेऽनभि धीयमानत्वात् । ' एतं त्वेव ते ' इति च प्रतिज्ञाय प्राक्चतुर्थात्पर्यायादन्यमन्यं व्याचक्षाणस्य प्रजापतेः प्रतारकत्वं प्रसज्येत । तस्माद्यदविद्या प्रत्युपस्थापितमपारमार्थिक जैवं रूपं कर्तृभो-करागद्वेषादिदोषकलुषितमनेकानर्थ योगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणकं पारमेश्वरं स्वरूपं विद्यया प्रतिपाद्यते, सर्पादिविलयनेनेव रज्ज्वादीन् । * अपरे तु वादिनः तुम्हारे प्रति पुनः पुनः कहूँगा ऐसे अर्थकी कल्पना करते हैं । उनके मतमें संनिहित ज्ञान करानेवाली ' एतम् ' यह सर्वनाम श्रुति दूरान्वित हो जायगी अर्थात् जीवका प्रतिपादन न कर अब परमात्माका प्रतिपादन करने लगेगी । और ' भूय: ' इस श्रुतिका बाध भी हो जायगा, क्योंकि [ ' य एषोऽक्षिणि ' ] एक पर्याय में अभिहितका द्वितीय पर्यायमें अभिधान नहीं है 1 । किञ्च ' एतं त्वेव ते ' इसप्रकारकी प्रतिज्ञा-कर चतुर्थ पर्यायके पूर्व तक अन्यान्य पदार्थोंका व्याख्यान करनेवाले प्रजापतिको प्रतारकत्व - मिथ्या-वादित्व दोष प्रसक्त हो जायगा । अतः जैसे सर्पादिके बाध होनेसे रज्जु आदिके यथार्थं स्वरूपका प्रति-पादन होता है, वैसे अविद्यासे उपस्थापित कर्तृत्व भोक्तृत्व, राग द्वेष आदि दोषोंसे दूषित अनेक अनर्थोंसे युक्त जीवके अपारमार्थिक स्वरूपका बाधकर विद्या उसके विपरीत पापरहितत्व आदि गुण विशिष्ट परमेश्वरके स्वरूपका प्रतिपादन करती है । परन्तु दूसरे वादी और कुछ हमारे सिद्धान्त पक्ष सत्यानन्दी दीपिका सम्भव नहीं है, इसलिए ' एतं त्वेव ते ' इस श्रुतिस्थ ' एतम् ' पंदसे जीवकी अनुवृत्ति करना उचित नहीं है, किन्तु पापरहितत्व आदि गुणविशिष्ट परमात्माका ग्रहण करना चाहिए | परन्तु यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि प्रजापतिने ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ऐसा आरम्भ किया है । इन्द्र और विरोचन के आनेपर उनके प्रति प्रथम वार प्रजापतिने जाग्रत् अवस्थाके अभिमानी नेत्रस्थ विश्वपुरुषका ' य एषोऽ-क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' इस प्रकार उपदेश किया । दूसरी वार इन्द्र के प्रति स्वप्न अवस्थाके अभिमानी तैजस पुरुषका ' य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति एष आत्मा ' इसप्रकार उपदेश किया है । तृतीय वार सुषुप्ति अवस्थाके अभिमानी प्राज्ञका ' तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नःस्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाच ' ( छा ० ८।११।१ ) ( जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनादि वृत्तिसे रहित और सम्यक् -रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है ऐसा प्रजापतिने कहा, यह अमृत, अमय है और यह ब्रह्म है ) ऐसा उपदेश किया है । परन्तु इन्द्रने प्रत्येक अवस्थाका दोष वर्णन किया । किन्तु ' एतं त्वेव ते ० ' ( जिसको तुमसे पहले कहा है उसीको मैं अब फिर कहूँगा ) ऐसा प्रजापतिकी प्रतिज्ञा रही है । जिस पापरहितत्वादि विशिष्ट आत्माको प्रजापतिने इन्द्रके प्रति पहले कहा है उसको अन्त तक कहते रहे हैं । चतुर्थं वारमें ' एवमेव एष सम्प्रसादो ० ' ( छा ० ८।१२।३ ) ( उसीप्रकार यह सम्प्रसाद इसी शरीर से समुत्थानकर परमज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे अभि-व्यक्त होता है, वह उत्तम पुरुष है ) यहाँपर उसी आत्माका सम्प्रसादरूपसे उपदेश किया है । इसलिए अवस्थाके भेदसे आत्माका भेद नहीं है । उसी जीवका ' एतम् ' पदसे प्रजापतिने उपदेश किया है । यदि ' एतम् ' पदसे परमात्माका ग्रहण होता तो चतुर्थवारमें इसका ग्रहण होता, परन्तु ब्रह्माने ‘ एतं त्वेव ते ' इसका वार - वार उपदेश किया है, वह युक्त न होता । क्योंकि जब पूर्वोक्तिका पुनः कथन होता है तभी ' भूय: ' पदका प्रयोग किया जाता है । परमेश्वरका स्वरूप तो चतुर्थवारमें कहा है । इससे ' भूयः ' पदका भी बांध होगा । इसलिए ' एतम् ' पदसे सन्निहित जीवका ग्रहण करना युक्त है ईश्वरका नहीं । * जो लोग संसार तथा जीव और ईश्वरके भेदको सत्य मानते हैं अर्थात् जीवका कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिरूप और परमेश्वरका पापरहितत्व, अकर्तृत्व, सत्यकामत्व आदिरूप सत्य मानकर
पृष्ठ 268
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ पारमार्थिकमेव जैवं रूपमिति मन्यन्तेऽस्मदीयाश्च केचित् । तेषां सर्वेषामात्मैकत्वसम्यग्दर्श नप्रतिपक्षभूतानां प्रतिषेधायेदं शारीरकमारब्धम् । एक एव परमेश्वरः कूटस्थ नित्यो विज्ञान-धातुरविद्यया मायया मायाविवदनेकधा विभाव्यते नान्यो विज्ञानधातुरस्तीति । यत्विदं परमेश्वरवाक्ये जीवमाशङ्कय प्रतिषेधति सूत्रकारः - ' नासंभवात् ( ब ० || ३ | १८ ) इत्यादिना । तत्रायमभिप्रायः- नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावे कूटस्थनित्ये एकस्मिन्नसके परमात्मनि तद्विपरीतं जैवं रूपं व्योम्नीव तलमलादि परिकल्पितम् । तदात्मैकत्वप्रतिपादनपरैर्वाक्यैन्ययोपेतैद्वैत-वादप्रतिषेधैश्चापनेष्यामीति परमात्मनो जीवादन्यत्वं द्रढयति । जीवस्य तु न परस्मादम्यत्वं प्रतिपिपादयिषति किंत्वनुवदत्येवाविद्याकल्पितं लोकप्रसिद्ध जीवभेदम् । एवं हि स्वाभा-विककर्तृत्वभोक्तृत्वानुवादेन प्रवृत्ताः कर्मविधयो न विरुध्यन्त इति सभ्यते । प्रतिपाद्यं तु शास्त्रार्थमात्मैकत्वमेव दर्शयति-- ' शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ' ( ब ० १ | १ | ३० ) इत्या-दिना । वर्णितश्चास्माभिर्विद्वदविद्वद्भ देन कर्मविधिविरोधपरिहारः ॥ १ ९ ॥ अन्यार्थश्च परामर्शः ॥ २० ॥
पदच्छेद - अन्यार्थः, च, परामर्शः । सूत्रार्थ - ( परामर्शश्च ) ' अथ य एष सम्प्रसाद: ' इस श्रुतिमें सम्प्रसाद शब्दसे जो जीवका परामर्श किया गया है, वह ( अन्यार्थ: ) अन्यके लिए ( परमात्माका प्रतिपादन करने के लिए ) है | : * अथ यो दहरवाक्यशेषे जीवपरामर्शो दर्शितः - ' अथ य एष संप्रसादः ' ( छा ० आचार्य भी जीवका रूप पारमार्थिक है, ऐसा मानते हैं । आत्मैकत्व सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षीभूत उन सभी वादियोंके निराकरण के लिए यह शारीरकशास्त्र आरम्भ किया गया है । एक हो परमेश्वर कूटस्थ, नित्य, विज्ञानस्वरूप अविद्यारूपी मायासे मायावीके समान अनेक हुआ जैसा प्रतीत होता है, उससे अन्य विज्ञानस्वरूप कोई वस्तु नहीं है । [ य आत्माऽपहतपाप्मा ] इस परमेश्वर वाक्य में जीवकी आशङ्काकर ‘ नासम्मवात् ' इत्यादिसे सूत्रकार उसका प्रतिषेध करते हैं । उसका अभिप्राय यह है कि नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव कूटस्थ नित्य एक असंग परमात्मा में उससे विपरीत, जीवरूप, आकाशमें मलिनतादिके समान परिकल्पित है । न्यायसे युक्त द्वैतवाद के प्रतिषेधक एवं आत्मैकत्व प्रतिपादनपरक वाक्योंसे उसका अपनयन करूँगा, इस आशयसे परमात्माका जीवात्मासे भेद दृढ़ करते हैं । जीवका परमात्मासे भेद प्रतिपादन करना नहीं चाहते किन्तु अविद्यासे कल्पित लोकप्रसिद्ध जीवभेदका केवल अनुवाद करते हैं । इसप्रकार स्वाभाविक - आविद्यक कर्तृत्व भोक्तृत्वका अनुवाद करनेसे प्रवृत्त हुई कर्म-विधियाँ विरुद्ध ( बाधित ) नहीं होतीं, ऐसा मानते हैं । ' शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ' इत्यादिसे सूत्रकार यह दिखलाते हैं कि वेदान्तशास्त्रका प्रतिपाद्य विषय तो आत्मैकत्व ही है । हमने तो विद्वान् और अविद्वान्के भेदसे कर्मविधिके विरोध के परिहारका वर्णन किया है ॥ १ ९ ॥ अब जो दहर वाक्यशेषमें ' अथ य एष सम्प्रसादः ' इत्यादिसे जीवका परामर्श दिखलाया गया है । सत्यानन्दी - दीपिका जीवब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हैं उनके मतका परिहार करने और यथार्थ आत्मैकत्वका ज्ञान कराने के लिए इस शारीरकशास्त्रका आरम्भ किया गया है । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' ' तत्त्वमसि ' ' अहं ' ब्रह्मास्मि ' इत्यादि अद्वैतपरक वाक्य और ' नेति नेत्यात्मा ' इत्यादि द्वैतनिषेध परक वाक्योंद्वारा लोक.. प्रसिद्ध अविद्या कल्पित भेदका इस ग्रन्थमें निराकरण किया जाता है । ब्रह्म ही अविद्यासे संसारी जीव है, अतः वह उससे अन्य कोई वस्तु नहीं, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ऐसी श्रुति है । यह शारीरकशास्त्रका प्रतिपाद्य विषय है । कल्पित वस्तुकी अधिष्ठानज्ञानसे निवृत्ति होती है । जीव तथा ब्रह्मका अविद्यासे कल्पित भेद भी ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे निवृत्त हो जाता है ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 269
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधि ० ५ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २३५ ८ | ३ | ३ ) इत्यादिः स दहरे परमेश्वरे व्याख्यायमाने न जीवोपासनोपदेशोन प्रकृतविशेषो-पदेश इत्यनर्थकत्वं प्राप्नोतीति । अत आह - अन्यार्थोऽयं जीवपरामर्शो न जीवस्वरूपपर्यंव-साथी । किं तर्हि? परमेश्वरस्वरूपपर्यवसायी । कथम्? संप्रसादशब्दोदितो जीवो जाग-रितव्यवहारे देहेन्द्रियपञ्जराध्यक्षो भूत्वा तद्वासनानिर्मितांश्च स्वप्नान्नाडीचरोऽनुभूय श्रान्तः शरणं प्रेप्सुरुभयरूपादपि शरीराभिमानात्समुत्थाय सुषुप्तावस्थायां परं ज्योति-राकाशशब्दितं परं ज्योतिर्येन स्वेन रूपेणायमभिनिष्पद्यते स एव आत्माऽपहतपाप्म-त्वादिगुण उपास्य इत्येवमर्थोऽयं जीवपरामर्शः परमेश्वरवादिनोऽप्युपपद्यते ॥ २० ॥
अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ २१ ॥
पदच्छेद - अल्पश्रुतेः, इति चेत्, तत्, उक्तम् । सूत्रार्थ - ( अल्पश्रुतेः ) ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश: ' इससे आकाश में अल्पत्वका श्रवण है, अतः दहराकाश परमेश्वर नहीं है, किन्तु जीव है, ( इति चेत् ) यदि ऐसा कहो तो ( तदुक्तम् ) इसका ' अभं-कौकस्त्वात् ' ( ब्र ० सू ० १/२/७ ) इस सूत्र में समाधान कहा गया है, इसलिए दहराकाश परमेश्वर ही है । * यदप्युक्तम्- ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ' इत्याकाशस्याल्पत्वं श्रूयमाणं परमेश्वरे नोपपद्यते, जीवस्य त्वारा ग्रोपमितस्याल्पत्वमवकल्पत इति, तस्य परिहारो वक्तव्यः । उक्तो ह्यस्य परिहारः परमेश्वरस्यापेक्षिकमल्पत्वमवकल्पत इति ' अर्भकौकस्त्वात्तद्वयपदेशाच्चनेति चेन्न यदि ऐसा व्याख्यान करें कि वह दहर परमेश्वर है तो जीवकी उपासनाका उपदेश न करने और प्रकृत दहराकाशके विशेषके उपदेश न करनेके कारण अनर्थक हो जायगा । इसलिए कहते हैं - यह जीवका परामर्श अन्यार्थक है -- जीवके स्वरूप में पर्यवसायी नहीं है, किन्तु परमेश्वरके स्वरूपमें पर्यवसायी है । कैसे? सम्प्रसाद शब्द से उक्त जीव जाग्रत् अवस्थामें देह, इन्द्रियके पञ्जरका अध्यक्ष होकर नाड़ीमें जाकर जाग्रत् अवस्था अनुभव जन्य वासनाओंसे उत्पन्न हुए स्वप्न पदार्थोंका अनुभवकर जब श्रांत हो जाता है तब विश्राम स्थान प्राप्त करनेको इच्छासे दोनों प्रकारके शरीर अभिमानोंसे उठकर सुषुप्ति अवस्थामें आकाश शब्दसे प्रतिपाद्य पर ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मको प्राप्तकर विशेष विज्ञानवत्त्वका परित्यागकर अपने स्वरूप से अभिव्यक्त होता है । जो इसके प्राप्त करने योग्य परम ज्योति है वह जिस अपने परमार्थं स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है वह यह आत्मा पापरहितत्वादिगुण विशिष्ट उपास्य है, इस अभिप्राय से किया हुआ यह जीवका परामर्श परमेश्वरवादीके मत में भी उपपन्न होता है ॥ २० ॥
' दहरोऽस्मिन्नन्त अन्तराकाश: ' इस प्रकार आकाशमें श्रूयमाण अल्पत्व परमेश्वरमें उपपन्न नहीं होता, किन्तु आरके अग्रभाग के सदृश जीव में अल्पत्व उपपन्न होता है, ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार करना चाहिए | इसका परिहार तो ' अर्भकौकस्त्वात् ' इस सूत्र में कहा गया है कि परमेश्वरका अल्पत्व आपेक्षिक हो सकता है । उसी परिहारका अनुसन्धान यहाँ भी करना चाहिए । इस प्रकार सत्यानन्दी - दीपिका * प्रजापति वाक्यमें जीवके अनुवादसे ब्रह्मके ही धर्म कहे गये हैं वे कर्मभोगी जीवमें सम्भव नहीं हैं, इसलिए जीव दहराकाश नहीं है । दहर वाक्य में जोवका परामर्श इसलिए किया गया है कि उसके परामर्शविना ब्रह्मभावका उपदेश सम्भव नहीं है, अत: इन तीनों अवस्थाओं में जीवका ग्रहण किया गया है । वस्तुतः नित्य आनन्द स्वरूप संप्रसाद तो परमेश्वर ही है, उस स्वरूपको सुषुप्ति अवस्थामें प्राप्त करनेसे जीवका भी सम्प्रसाद शब्दसे श्रुतियोंमें प्रतिपादन है ॥ २० ॥
* इस उक्त हेतुसे भी दहराकाश जीव नहीं है, किन्तु परमेश्वर ही है । ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ’ इस दहरवाक्य और ' आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म ' इस प्रजापति वाक्यका क्रमशः सगुण
पृष्ठ 270
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ' ( ब्र ० सू ० १ | २ | ७ ) इत्यत्र । स एवेह परिहारोऽनुसंधातव्य इति सूच-यति । श्रुत्यैव चेदमल्पत्वं प्रत्युक्तं प्रसिद्धेनाकाशेनोपमिमानया ' यावान्वा अयमाकाशस्ता वानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः ' इति ॥ २१ ॥
( ६ अनुकृत्यधिकरणम् सू ० २२-२३ ) अनुकृतेस्तस्य च ॥ २२ ॥:
पदच्छेद -- अनुकृतेः, तस्य च । सूत्रार्थ - ( अनुकृतेः ) ' न तन्त्र सूर्यो भाति ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतिपादित वस्तु कोई तेज विशेष नहीं है किन्तु निर्विशेष ब्रह्म ही है, क्योंकि ' अनुमाति ' उसके प्रकाशका ही सब अनुकरण करते हैं, ( च ) और ( तस्य ) उसके प्रकाशसे ही यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है । * ‘ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु-भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' ( मु ० २/२/१० ) इति समामनन्ति । यत्र यं भान्त-मनुभाति सर्वं यस्य च भासा सर्वमिदं विभाति स किं तेजोधातुः कश्चिदुत प्राज्ञ आत्मेति विचिकित्सायां तेजोधातुरिति तावत्प्राप्तम् । कुतः? तेजोधातूनामेव सूर्यादीनां भानप्रति-षेधात् । तेजःस्वभावकं चन्द्रतारकादि तेजःस्वभावक एंव सूर्ये भासमानेऽहनि न भासत इति प्रसिद्धम् । तथा सह सूर्येण सर्वमिदं चन्द्रतारिका यस्मिन्न भासते, सोऽपि तेज: -सूत्रकार सूचित करते हैं । और ' यावान्वा ० ' ( जितना यह बाह्याकाश है उतना हृदयान्तर्गत यह आकाश है ) प्रसिद्ध आकाशके साथ उपमा देनेवाली इस श्रुतिसे दहराकाशमें इस अल्पत्वका निरास किया गया है ॥ २१ ॥
' न तत्र सूर्यो भाति ' ( वहाँ उस आत्मस्वरूप ब्रह्ममें न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा तथा तारे । वहाँ यह बिजली भी प्रकाशित नहीं होती फिर यह निरन्तर दृष्टिमें आनेवाली अग्नि किस गिनती में है? उसके प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ) ऐसी श्रुति है । इस श्रुति वाक्यमें जिसके प्रकाशित होनेसे ये सब सूर्य, चन्द्रमा आदि प्रकाशित होते हैं और जिसके प्रकाश से यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है । इस विषयमें सन्देह होता है कि क्या यह कोई तेजस्वी पदार्थ है अथवा परमात्मा? पूर्वपक्षी - यह तेजस्वी पदार्थ है ऐसा प्राप्त होता है, किससे? इससे कि सूर्य आदि तेजस्वी पदार्थोंके ही भानका प्रतिषेध किया । यह प्रसिद्ध है कि दिनमें स्वाभाविक तेजस्वी सूर्यके प्रकाशित होनेपर तेज स्वभाव चन्द्रमा तारा आदि प्रकाशित नहीं होते । तथा ऐसा ज्ञात होता है कि सूर्यके साथ यह सब चन्द्र, तारा आदि जिसमें सत्यानन्दी - दीपिका और निर्गुण ब्रह्म में समन्वय सिद्ध होता है । नाभिसे एक वितस्ती ऊपर और कण्ठसे चार अङ्गुल नीचे वाम भाग में स्थित हृदय सर्वलोक प्रसिद्ध है । उसके अन्तर स्थित आकाशको दहर आकाश कहा जाता है ॥ २१ ॥
' न तत्र सूर्यो माति ' यह मुण्डक श्रुति इस अधिकरणका विषयवाक्य है, इस श्रुतिमें ' अनुमाति ’ ( अनु - अनन्तर, माति- प्रकाश करना ) यह पद तभी संगत होगा जब तेज: स्वभाववाला कोई एक विशेष पदार्थ माना जाय, अन्यथा नहीं; समान स्वभाववालोंमें ही ' अनुकरण ' देखनेमें आता है ' जैसे गौ गौके पीछे दौड़ते हैं ' पक्षी समान जातीय पशीके पीछे उड़ता है । परन्तु अतुल्य स्वभाववालोंमें ' अनुकरण ' नहीं देखा जाता, अतः सूर्य आदिके समान वह भी तेज: स्वभाव पदार्थ होना चाहिए । यद्यपि ' यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम् ' ( जिसमें द्यु, पृथिवी और अन्तरिक्ष ओत-व्याप्त हैं ) यहाँ ब्रह्म प्रकृत है, तो भी अभिभव और अनुकारात्मक लिङ्गसे प्रकरणका वाध होकर कोई