श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 271–280

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 271–280

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अधि ० ६ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित III स्वभाव एव कश्चिदित्यवगम्यते । अनुभानमपि तेजः स्वभावक एवोपपद्यते; समानस्वभाव-केष्वनुकारदर्शनात्, गच्छन्तमनुगच्छतीतिवत् । तस्मात्तेजोधातुः कश्चिदित्येवं प्राप्ते ब्रूमः-प्राज्ञ एवात्मा भवितुमर्हति । कस्मात्? अनुकृतेः । अनुकरणमनुकृतिः । यदेतत् ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वम् ' इत्यनुभानं, तत्प्राज्ञ परिग्रहेऽवकल्पते । ' भारूपः सत्यसंकल्पः ' ( छा ० ३।१४।२ ) इति हि प्राज्ञमात्मानमामनन्ति । न तु तेजोधातुं कंचित्सूर्यादयोऽनुभान्तीति प्रसिद्धम् । समत्वाच्च तेजोधातूनां सूर्यादीनां न तेजोधातुमन्यं प्रत्यपेक्षास्ति, यं भान्तमनुभायुः, न हि प्रदीपः प्रदीपान्तरमनुभाति । यदप्युक्तम् - समानस्वभावकेष्वनुकारो दृश्यत इति । नाय -मेकान्तो नियमः, भिन्नस्वभावकेष्वपि ह्यनुकारो दृश्यते । यथा सुतप्तोऽयः पिण्डोऽग्न्यनु-कृतिरग्निदहन्तमनुदहति, भौमं वा रजो वायु ं वहन्तमनुवहतीति । ' अनुकृतेः ' इत्यनुभानम-सू सुचत् । ' तस्य च ' इति चतुर्थ पादमस्य श्लोकस्य सूचयति । ' तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' इति, तद्ध ेतुकं भानं सूर्यादेरुच्यमानं प्राज्ञमात्मानं गमयति । ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्हो-पासतेऽमृतम् ' ( बृ ० ४। ४ । १६ ) इति हि प्राज्ञमात्मानमामनन्ति; तेजोन्तरेण सूर्यादितेजो विभातीत्यप्रसिद्ध विरुद्ध च; तेजोन्तरेण तेजोन्तरस्य प्रतिघातात् । अथवा - न सूर्यादीना-प्रकाशित नहीं होते वह भी कोई तेजः स्वभाव पदार्थ है । ' अनुमान ' मी तेज: स्वभाव पदार्थके होनेसे ही उपपन्न होता है, क्योंकि समान स्वभाववालोंमें ही अनुकार- अनुकरण देखा जाता है । जैसे जाते हुए पीछे जाता है । इससे ज्ञात होता है कि यह कोई एक तेजस्वी पदार्थ है । सिद्धान्ती —- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह प्रकाशक परमात्मा ही होना युक्त है । किससे? इससे कि अनुकृतिका श्रवण है । अनुकृति अर्थात् अनुकरण | ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वम् ' इसप्रकार यह जो अनुमान है, वह परमात्मा ग्रहण करनेसे ही संगत हो सकता है । ' मारूपः सत्यसङ्कल्पः ' ( वह प्रकाशरूप और सत्यसङ्कल्प है ) यह श्रुति स्वयं प्रकाशरूप परमात्माको ही कहती है और किसी तेजस्वी पदार्थके अनन्तर सूर्यादि प्रकाशित होते हैं ऐसा प्रसिद्ध नहीं है । सूर्यादि तेजस्वी पदार्थोंको दूसरेके प्रकाशसे प्रकाशित होनेके लिए दूसरे तेजस्वी पदार्थों की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि दोनों समान तेजस्वी हैं । प्रदीप किसी दूसरे प्रदीप के अनन्तर प्रकाशित नहीं होता । जो यह कहा गया है कि समान स्वभाव वालोंमें ही अनुकरण देखा जाता है, तो यह कोई अव्यभिचरित नियम नहीं है, क्योंकि भिन्न स्वभाव-वालोंमें भी अनुकरण देखा जाता है । जैसे अच्छी तरह तपा हुआ लोहेका गोला अग्निका अनुकरण करता है जलती हुई अग्निके पीछे जलता है अथवा पार्थिव रज अपने से विलक्षण बहती हुई वायुके पीछे चलती है । ' अनुकृतेः ' यह सूत्रभाग अनुमानको सूचित करता है । ' तस्य च ' यह सूत्रभाग उक्तं श्रुति ' तस्य मासा सर्वमिदं विभाति ' के चौथे पादको सूचित करता है । ' तस्य भासा ' ( उसके प्रकाश से यह सब प्रकाशित होता है ) इस प्रकार सूर्यादिमें कहा हुआ तद्हेतुक प्रकाश परमात्माका ज्ञान कराता है । ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योति ' ( उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिःस्वरूप अमृतकी देवगण आयुरूपसे उपासना करते हैं ) इस प्रकार श्रुति परमात्माको कहती है । सूर्यादि तेज अन्य प्रकाशित होते हैं यह अप्रसिद्ध और विरुद्ध भी है, क्योंकि एक तेजका दूसरे तेजसे प्रतिघात. होता है । अथवा श्रुतिमें परिपठित सूर्यादिमें ही तदहेतुक ( ब्रह्महेतुक ) प्रकाश नहीं कहा जाता, किन्तु जैसे सूर्यादि ज्योतिकी सत्तासे समस्त रूप - समुदायकी अभिव्यक्ति होती हैं, वैसे ही ' सर्वमिदम् ' सत्यानन्दी -दीपिका तेजो विशेष पदार्थ प्रतीत होता है, ब्रह्म नहीं । पूर्वं परं ज्योतिरुपसंपद्य ' इस श्रुति वाक्यार्थविचारके प्रसंगसे ' न तत्र सूर्यो भाति ' इत्यादि वाक्यार्थका विचार करते हैं । इस प्रकार प्रसंगसंग तिसे इस अधिकरणका आरम्भ है ।

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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य अ १ पा ० ३ मेव श्लोकपरिपठितानामिदं तद्धेतुकं विभानमुच्यते । किं तर्हि? ' सर्वमिदम् ' इत्यविशेष-श्रुतेः सर्वस्यैवास्य नामरूप क्रियाकारकफलजातस्य याऽभिव्यक्तिः सा ब्रह्मज्योतिः सत्तानि-मित्ता । यथा सूर्यादिज्योतिः सत्तानिमित्ता सर्वस्य रूपजातस्याभिव्य क्तिस्तद्वत् । ' न तत्र सूर्यो भाति ' इति च ' तत्र ' शब्दमाहरन्प्रकृतग्रहणं दर्शयति । प्रकृतं च ब्रह्म ' यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम् ' ( मु ० २/२/५ ) इत्यादिना । अनन्तरं च ' हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ' इति । कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्यत इदमुत्थितम् - ' न तत्र सूर्यो भाति ' इति । * यदप्युक्तम्- सूर्यादीनां तेजसां भानप्रतिषेधस्ते-जोधा तावेवान्यस्मिन्नवकल्पते सूर्य इवेतरेषामिति । तत्र तु स एव तेजोधातुरन्यो न संभ-वतीत्युपपादितम् । ब्रह्मण्यपि चैषां भानप्रतिषेधोऽवकल्पते । यतः यदुपलभ्यते तत्सर्व ब्रह्मणैव ज्योतिषोपलभ्यते, येन सूर्यादयस्तस्मिन्भायुः ज्योतिषाऽऽस्ते ' ( बृ ० ४।३।६ पदच्छेद - अपि च, इस सामान्य श्रुति से इस समस्त ब्रह्म ज्योतिकी सत्तासे ही होती प्रकृतका ग्रहण दिखलाती है । ब्रह्म तु नान्येन ज्योतिषोपलभ्यते, स्वयंज्योतिः स्वरूपत्वात्, । ब्रह्म ह्यन्यद्वचनक्ति, ), ' अगृह्यो नहि गृह्यते ' ( अपि च स्मर्यते ॥ स्मयते । नाम, रूप, क्रिया, कारक है । ' न तत्र सूर्यो भाति ० और ' यस्मिन् द्यौः ० ' न तु ब्रह्मान्येन व्यज्यते; ' आत्मनैवायं वृ ० ४२।४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२२ ॥

२३ ॥ और फल समुदायकी जो अभिव्यक्ति है वह ' इसमें ' तत्र ' शब्दका कथन करती हुई श्रुति ( जिसमें द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्ष ओत प्रोत हैं ) इत्यादिसे ब्रह्म ही प्रकृत है I । और अनन्तर ' हिरण्मये परे कोशे ० ' ( वह निर्मल और कला -होन ब्रह्म हिरण्यमय - ज्योतिर्मय परमकोश में विद्यमान है । वह शुद्ध और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थोंकी ज्योति है, और वह है जिसे आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं ) यह श्रुति प्रकृत ब्रह्मको ही कहती है | वह ज्योतियोंका ज्योति किस प्रकार है । इस शङ्काके उत्तरमें ' नं तत्र सूर्यो भाति ' यह मन्त्र उपस्थित हुआ । सूर्यमें दूसरे तेजों के प्रतिषेधके समान सूर्य आदि तेजोंके प्रकाशका प्रतिषेध तभी संगत हो सकता है जब कि कोई दूसरा तेजस्वी पदार्थ हो, ऐसा जो कहा गया है, उसके उत्तर में - वह ब्रह्म ही तेजोमय पदार्थं है, उससे अन्य तेजका संभव नहीं है, ऐसा उपपादन किया जा चुका है । ब्रह्ममें मी इन सूर्यादि तेजोंके प्रकाशका प्रतिषेध हो सकता है, क्योंकि जो उपलब्ध होता है वह सब ब्रह्मरूप ज्योतिसे ही उपलब्ध होता है । [ यदि ब्रह्म किसी दूसरे प्रकाशसे प्रकाशित होता तो सूर्य आदि उसके प्रकाशक होते ] किन्तु ब्रह्म तो अन्य ज्योतिसे उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं ज्योतिः स्वरूप है । जिससे सूर्य आदि उसमें प्रकाशमान हों । ' आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते ० ' ( आत्मरूप ज्योतिसे ही यह प्रकाशित है ) ' अगृह्यो नहि गृह्यते ० ' ( वह अगृह्य है, उसका ग्रहण नहीं किया जा सकता ) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि ब्रह्म अन्य पदार्थको व्यक्त करता है, परन्तु ब्रह्म अन्यसे व्यक्त नहीं होता ॥२२ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे घटादि पदार्थं सूर्यादि प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, अतः वह प्रकाश घटादिका प्रकाशक है । घटादि स्वयं अप्रकाशित होनेसे अपनी उपलब्धिमें दूसरे प्रकाशकी अपेक्षा रखते हैं । किन्तु ब्रह्म तो स्वयं ज्योतिःस्वरूप है । किसी बाह्य प्रकाशकी अपनी सिद्धिमें अपेक्षा नहीं रखता, क्योंकि ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' यह श्रुति ब्रह्मको स्वयं ज्योतिरूपसे प्रतिपादित करती है । तेजोमय सूर्यादि पदार्थों-की अभिव्यक्ति भी ब्रह्मसे ही होती है, क्योंकि वे जड़ हैं । स्वप्नावस्था में सूर्यादि प्रकाशके अभाव होनेपर भी उस आत्मज्योति से सबकी प्रतीति होती है, अतः आत्मा स्वयं ज्योति स्वरूप है ॥ २२ ॥

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अधि ० ७ सू ० २३-२४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २३ ९ सूत्रार्थ - ( स्मर्यते ). ' न तद्भासयते सूर्यो ' ' यदादित्यगतं तेजो ' इसप्रकार यह स्मृति ( अपि ) भी प्रकृत ब्रह्मा ज्योतिरूपसे प्रतिपादन करती है । अपि चेदृग्रूपत्वं प्राज्ञस्यैवात्मनः स्मर्यते भगवद्गीतासु शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ' ( गी ० १५/६ ) जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ' ( गी ० ( ७ प्रमिताधिकरणाम् सू ० २४-२५ ) शब्दादेव प्रमितः ॥ २४ ॥

. पदच्छेद -- शब्दाद, एव, प्रमितः । - ' न तद्भासयते सूर्यो न इति, ‘ यदादित्यगतं तेजो १५/१२ ) इति च ॥२३ ॥

सूत्रार्थ - ( प्रमितः ) ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ' इस प्रमितवाक्य में प्रतिपाद्य पुरुष परमात्मा ही है, ( शब्दादेव ) क्योंकि ' ईशानो भूतभव्यस्य ' इस श्रुतिमें ईशानशब्द है । * ‘ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ' इति श्रूयते । तथा ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत् ' ( का ० २।१।१३ ) इति च । तत्र योऽयमङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः श्रूयते स किं विज्ञानात्मा, किंवा परमात्मेति संशयः । तत्र परिमाणोपदेशात्तावद्विज्ञानात्मेति प्राप्तम् । न ह्यनन्तायामविस्तारस्य परमात्मनोऽङ्गष्टपरि-माणमुपपद्यते । विज्ञानात्मनस्तूपाधिमत्त्वात्संभवति कयाचित्कल्पनयाऽङ्गुष्ठमात्रत्वम् । स्मृतेश्च - ' अथ सत्यवतः कायात्पाशबद्धं वशं गतम् । अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात् ॥ ' ( म ० मा ० ३।२ ९ ७।१७ ) इति । नहि परमेश्वरो बलाद्यमेन निष्क्रष्टुं शक्यः । तेन तत्र संसार्य-और भगवद्गीतामें भी ' न तद् भासयते ० ' ( उस परं ज्योतिस्वरूपको न सूर्यं प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है, वही मेरा परम धाम है जिसको प्राप्त होकर मनुष्य फिर संसार में नहीं आता ) और ' यदादित्यागतं ० ' ( जो तेज सूर्यमें स्थित हुआ सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमामें स्थित है और जो तेज अग्निमें स्थित है उसे ' तू मेरा ही तेज समझ ) ऐसा स्वरूप परमात्माका ही कहा गया है ॥ २३ ॥

' अङ्गुष्ठमात्रः ० ' ( जो अङ्गुष्ठ परिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है ) और ' अङ्गुष्ठमात्रः ० ’ ( यह अङ्गुष्ठामात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है । यह भूत भविष्यत्‌का शासक है । यही आज ( वर्तमानकाल में ) है और यही कल ( भविष्यत् में ) मी रहेगा । और निश्चम यही वही ( ब्रह्मतत्त्व ) है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं । इनमें जो यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष सुना जाता है वह क्या जीवात्मा है अथवा क्या वह परमात्मा है? ऐसा संशय होता है । पूर्वपक्षी - इन श्रुतियोंमें परिमाणके उपदेशसे ऐसा प्राप्त होता है कि वह जीवात्मा है, क्योंकि अनन्त आयाम और विस्तारवाला परमात्मा अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला हो यह युक्त नहीं है । किन्तु विज्ञानात्मा तो उपाधि युक्त होनेसे किसी कल्पनासे अङ्गुष्ठ-परिमाणवाला हो सकता है । और ' अथ सत्यवतः ० ' ( इसके अनन्तर यमने सत्यवान्के शरीरसे अपने पाशोंसे बँधे हुए और कर्मवशीभूत अङ्गष्ठमात्र पुरुषको बलपूर्वक खींच लिया ) यह स्मृति भी है । परमेश्वर यमसे बलपूर्वक कदापि नहीं खींचा जा सकता, इससे स्मृतिमें जीव ही अङ्गुष्ठमात्र परिमाण-सत्यानन्दी -दीपिका * पूर्व अधिकरणमें परमात्मा ज्योतिः स्वरूप प्रतिपादित किया गया है और इस अधिकरणमें ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ' इस विषयवाक्यमें ज्योतिः द्वारा उपमीयमान जो पुरुष प्रतीत होता है, वह परमात्मासे भिन्न है । ऐसी आशङ्का की उपस्थितिमें सूत्रकारने इस अधिकरणका आरम्भ किया है । अङ्गुष्ठमात्र हृदयके साथ विज्ञानशब्द वाच्य बुद्धिके साथ तादात्म्याध्यासकी कल्पनासे किसी

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२४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ ङ्गुष्ठमात्रो निश्चितः, स एवेहापीत्येवं प्राप्ते ब्रूमः - परमात्मैवायमङ्गष्ठमात्र परिमितः पुरुषो भवितुमर्हति । कस्मात्? शब्दात् ' ईज्ञानो भूतभव्यस्य ' इति । नान्यः परमेश्वराद्भूत-भव्यस्य निरङ्कुशमीशिता । ' एतद्वै तत् ' इति च प्रकृतं पृष्टमिहानुसंदधाति । एतद्वै तद्यत्पृष्टं ब्रह्मेत्यर्थः । पृष्टं चेह ब्रह्म ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च मव्याच्च यत्तत्पश्यंसि तद्वद ' ( का ० १।२।१४ ) इति । शब्दादेवेति - अभिधानश्रुतेरेवेशान इति परमेश्वरोऽवगम्यत इत्यर्थः ॥ २४ ॥

कथं पुनः सर्वगतस्य परमात्मनः परिमाणोपदेशः? इत्यत्र ब्रूमः -हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ २५ ॥

पदच्छेद - हृदि, अपेक्षया, तु, मनुष्याधिकारत्वात् । सूत्रार्थ - ( मनुष्याधिकारत्वात् ) शास्त्रमें मनुष्य अधिकृत है, मनुष्योंका हृदय स्व स्व अङ्गुष्ट-मात्र होता है । ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थ है । ( हृद्यपेक्षया ) उस हृदयकी अपेक्षा परमेश्वर भी अंगुष्ठमात्र कहा गया हैं । * सर्वगतस्यापि परमात्मनो हृदयेऽवस्थानमपेक्ष्याङ्गष्ठमात्रत्वमिदमुच्यते । आका-शस्येव वंशपर्वापेक्षमर त्रिमात्रत्वम् । नाज्ञ्जसाऽतिमात्रस्य परमात्मनोऽङ्गुष्ठमात्रत्वमुपपद्यते । न चान्यः परमात्मन इह ग्रहण महतीशान शब्दादिभ्य इत्युक्तम् । ननु प्रतिप्राणिभेदं हृदया-नामनवस्थितत्वात्तदपेक्षमप्यङ्गष्ठमात्रत्वं नोपपद्यत इत्यत उत्तर मुच्यते- मनुष्याधिकारत्वा-वाला निश्चित होता है वही यहाँ मी निश्चित होता है । सिद्धान्ती - इसप्रकार प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यहाँ यह अङ्गष्ठमात्र परिमित पुरुष परमात्मा ही हो सकता है, किससे? इससे कि ' ईशानो भूतभव्यस्य ' इस श्रुतिमें ईशानशब्द है । भूत और भविष्यत्का निरङ्कुश ईशिता परमेश्वरसे अन्य नहीं है । ' एतद्वै तत् ० ( यह वही है ) इसप्रकार यहाँ ' एतद् ' शब्दसे प्रकृत पृष्टका यमराज अनुसन्धान करते हैं । नचिकेताने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था यह वही है, ऐसा अर्थ है । ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( धर्म से अन्य, अधर्मसे अन्य तथा इस कार्य - कारणसे अन्य एवं भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान से भिन्न जिसको आप देखते हैं - अनुभव करते हैं उसे कहिये ) इसप्रकार यहाँ ब्रह्मविषयक प्रश्न है । शब्दसे ही अर्थात् [ ईशानो भूतभव्यस्य ] इस अभिधान श्रुतिसे ही यह परमेश्वर ज्ञात होता है, यह अर्थ है ॥ २४ ॥

फिर सर्वत्र व्यापक परमात्मामें अङ्गुष्ठमात्र - परिमाणका उपदेश कैसे है? इस विषय में हम कहते हैं-जैसे बांसके पर्वमें अवस्थित होनेके कारण आकाश अरत्नि हाथ भर कहलाता है, वैसे हृदयमें अवस्थित होनेकी अपेक्षा सर्वगत परमात्मा भी अंगुष्ठमात्र कहा जाता है, क्योंकि परिमाणातीत परमेश्वरका मुख्यरूपसे अंगुष्ठमात्र होना युक्त नहीं है, और ऐसा कहा जा चुका है कि ईशानशब्द आदि हेतुओंके होनेसे परमेश्वरसे अन्यका यहाँ ग्रहण भी नहीं किया जा सकता । परन्तु प्रत्येक प्राणीका हृदय भिन्न - भिन्न परिमाणवाला होता है एक - सा नहीं होता, अत: उसकी अपेक्षासे भी परमात्माका अंगुष्ठ परिमाण होना युक्त नहीं है? इसके उत्तर में कहते हैं - ' मनुष्याधिकारत्वात् ' । सत्यानन्दी -दीपिका प्रकार बुद्धिरूप उपाधि युक्त जीवात्मा अंगुष्ठमात्र हो सकता है, किन्तु सर्वगत परमेश्वर नहीं । यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है । * उद्धृत श्रुतियोंमें अंगुष्ठमात्र पुरुषको जगत्का नियामक कहा गया है । सबका कारण होनेसे परमेश्वर ही सभीका नियामक हो सकता है, इसलिए अंगुष्ठमात्र पुरुष परमेश्वर ही है । पूर्वपक्षमें ब्रह्मदृष्टि से जीवकी उपासना फल है, सिद्धान्तमें जीव ब्रह्मका अभेदज्ञान है ॥ २४ ॥

* यद्यपि परमात्मा व्यापक है तो भी उसकी उपासना में मनुष्यको अधिकारी मानकर और

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अधि ० ७ सू ० २५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २४१ दिति । शास्त्रं ह्यविशेष प्रवृत्तमपि मनुष्यानेवाधिकरोति, शक्तत्वादर्थित्वाद पर्युदस्तत्वादुप-नयनादिशास्त्राच्चेति वर्णितमेतदधिकार लक्षणे ( जै ० ६ | १ ) | मनुष्याणां च नियतपरिमाणः कायः । औचित्येन नियतपरिमाणमेव चैषामङ्गुष्ठमात्रं हृदयम् । अतो मनुष्याधिकारत्वा-च्छास्त्रस्य मनुष्यहृदयावस्थानापेक्ष मङ्गुष्ठमात्रत्वमुपपन्नं परमात्मनः । यदप्युक्तस् - परिमा-णोपदेशात्स्मृतेश्च संसार्येवायमङ्गुष्ठमात्रः प्रत्येतव्य इति, तत्प्रत्युच्यते -'स आत्मा तत्त्वमसि ' इत्यादिवत्संसारिण एवसतोऽङ्गुष्ठमात्रस्य ब्रह्म त्वमिदमुपदिश्यत इति । द्विरूपा हि वेदान्त-वाक्यानां प्रवृत्तिः, कचित्परमात्म स्वरूपनिरूपणपरा, कचिद्विज्ञानात्मनः परमात्मैकत्वोप-शास्त्र सामान्य रीतिसे प्रवृत्त हुआ मी ( त्रैवर्णिक ) मनुष्यों को ही अधिकृत करता है, क्योंकि वे समर्थ हैं, कामना विशेषसे युक्त हैं, श्रुत्युक्त कर्मानुष्ठानमें अनिराकृत हैं और शास्त्र उनके उपनयन आदिका विधान करता है, ऐसा अधिकारलक्षणमें जैनिमि मुनिने वर्णन किया है । मनुष्योंका शरीर निश्चित परिमाण ( अपना - अपना सात वितस्ति परिमाण ) वाला होता है, इसलिए उनके हृदयका परिमाण भी उचितरूपसे नियत अङ्गुष्ठमात्र होना चाहिए । इससे यह सिद्ध होता है कि शास्त्रमें मनुष्योंका अधिकार होनेसे मनुष्यके हृदयमें अवस्थित होने के कारण परमात्माका अङ्गुष्ठपरिमाण होना युक्त है | जो यह कहा गया है कि परिमाणके उपदेश से और [ सत्यवतः कायात् ] इस वक्त स्मृतिसे संसारी पुरुषको ही अङ्गुष्ठमात्र पुरुष समझना चाहिए, उसके उत्तरमें कहते हैं— ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( वह आत्मा है वह तू है ) इत्यादिके समान इस अंगुष्ठमात्र संसारीको ही ब्रह्मरूपसे यह उपदेश किया जाता है, क्योंकि वेदान्तवाक्योंकी दो प्रकारकी प्रवृत्ति है । कहीं परमात्मस्वरूप सत्यानन्दी - दीपिका उसके हृदयको उपासनाका स्थान मानकर अंगुष्ठमात्र हृदयके परिमाणको परमात्माका परिमाण स्वीकार किया गया है । मनुष्यों में भी केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनोंका वैदिक कर्म करनेमें अधिकार है, ये तीनों ही समर्थ, अर्थी, अनिराकृत और उपनयन आदि शास्त्रवाले हैं । ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि सामर्थ्यका प्रतिपादन है । इससे यह सूचित होता है कि कर्मानुष्ठानमें पशु, देव ऋषि आदिका अधिकार निषिद्ध है । कारण कि शास्त्रज्ञान रहित होनेसे पशु अधिकारी नहीं हो सकता । देव आदि के उद्देश्यसे होम आदि किये जाते हैं, इन्द्र आदि देव अपनेको उद्देश्यकर होम आदि नहीं कर सकते, इससे वे वैदिक यज्ञादि कर्म करनेमें असमर्थ हैं । इसप्रकार आर्षेयवरण ऋषियोंके वरणमें अन्य ऋषिके अमावसे ऋषि भी असमर्थ होते हैं । अथित्व कहने से यह सूचित होता है कि कामना रहित मुमुक्षु और पशु, स्थावर आदिका कर्मानुष्ठानमें अधिकार निराकृत है । मुमुक्षु चित्तशुद्धिके लिए निष्कामभावसे नित्य और नैमित्तक कर्म कर सकता है किन्तु काम्यकर्म नहीं । जिसका चित्त शुद्ध है ' उसका कर्म करनेमें अधिकार नहीं है किन्तु मोक्षके साधन वेदान्तश्रवण आदिमें अधिकार है । अपर्युदस्तत्व शब्दसे शूद्रका वैदिक कर्मानुष्ठानमें निषेध सूचित किया गया है, ' शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ' ( तै ० सं ० ७ | १ | १ | ६ ) ( शूद्र यज्ञके योग्य नहीं है ) क्योंकि वह द्विज नहीं है, इसलिए वेदाध्ययनके आरम्भ में उपनयन - यज्ञोपवीत आदि संस्कार उसके नहीं होते । ' उपनयीत ' ' तमध्यापयीत ' ( द्विज उपनयन करे, वेदाध्यापन करे ) ' वसन्ते वसन्ते ब्राह्मणो अग्निनादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः ' ( प्रत्येक वसन्त ऋतुमें ब्राह्मण अग्निका अधान करे, ग्रीष्ममें क्षत्रिय और शरदमें वैश्य ) इसप्रकार तीनों वर्णोंका वैदिक कर्ममें अधिकार है । यहाँ ' पर्युदस्त ' शब्द शूद्रका निराकरण करता है, अतः उससे भिन्न शेष तीन वर्णं अपर्युदस्त कहलाते हैं, इसलिए इन तीनोंका वैदिक कर्म में अधिकार है । * इस पूर्वोक्त रीतिसे ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ' इत्यादि मन्त्र जीव और ब्रह्ममें अभेद कहकर

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ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 276 का मूल पृष्ठ
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ देशपरा । तदत्र विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वमुपदिश्यते, नाङ्गष्ठमात्रत्वं कस्यचित् । एत-मेवार्थं परेण स्फुटीकरिष्यति - ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जदिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतम् ' ( का ० २।६।१७ ) इति || २५ || ( ८ देवताधिकरणम् सू ० २६-३३ ) तदुप पिचादरायणः संभवात् ॥ २६ ॥

पदच्छेद - तदुपरि, अपि, बादरायणः, सम्भवात् । सूत्रार्थ - ( तदुपपि ) मनुष्यसे श्रेष्ठ देवादिमें ( सम्भवात् ) अर्थित्व आदि. अधिकार के कारणका सम्भव होनेसे वे भी ब्रह्मविद्या में अधिकारी हैं, ( बादरायणः ) ऐसा बादरायण आचार्य मानते हैं । * अष्टमात्र श्रुतिर्मनुष्य हृदयापेक्षा मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्येत्युक्तम्, तत्प्रसङ्गे-नेदमुच्यते । बाढम्, मनुष्यानधिकरोति शास्त्रम्ः नतु मनुष्यानेवेतीह ब्रह्मज्ञाने नियमोऽति । तेषां मनुष्याणामुपरिष्टाद्ये देवादयस्तानप्यधिकरोति शास्त्रमिति बादरायण आचार्यों मन्यते । कस्मात्? संभवात् । संभवति हि तेषामप्यर्थित्वाद्यधिकारकारणम् । तत्रार्थित्वं तावन्मोक्षविषयं देवादीनामपि संभवति विकारविषयविभूत्यनित्यत्वालोचनादिनिमिनम् । तथा सामर्थ्यमपि तेषां संभवति; मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्योविग्रहवत्वाद्यवगमात् । नच तेषां कश्चित्प्रतिषेधोऽस्ति । नचोपनयनशास्त्रेणैषामधिकारो निवर्त्येत; उपनयनस्य निरूपण परक है और कहीं पर जीवात्मामें परमात्मैकत्वपरक उपदेश है । यहाँ पर जीवात्माका पर-मात्मा के साथ एकत्वका उपदेश है, किसीका भी अंगुष्ठपरिमाणके उपदेशमें तात्पर्य नहीं है । इसी अर्थको ' अङ्गुष्ठमात्रः ० ' ( अंगुष्ठमात्र पुरुष जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवके हृदय देशमें स्थित है मुञ्जसे सकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले [ अर्थात् शरीरसे पृथक्कर अनुभव करे ] उसे शुक्र ( शुद्ध ) और अमृतरूप समझे ) इस उत्तरवाक्यसे यमराज स्पष्ट करेंगे ॥ २५ ॥

यह कहा गया है कि अंगुष्ठमात्र श्रुति मनुष्यके हृदयकी अपेक्षा रखती है, क्योंकि शास्त्र में मनुष्यका अधिकार है उस प्रसङ्गसे यह कहा जाता है । यह ठीक है कि शास्त्र मनुष्योंको अधिकृत करता है, परन्तु वह केवल मनुष्योंको ही अधिकृत करता है ऐसा यहाँ ब्रह्मज्ञानमें नियम नहीं है । किन्तु बादरायण आचार्यका मत है कि उन मनुष्योंसे श्रेष्ठ जो देवादि हैं उनको भी शास्त्र अधिकृत करता है । किससे? इससे कि ऐसा सम्भव है । कारण कि उनमें भी अर्थित्वादि अधिकारका कारण सम्भव है । क्योंकि विकार विषय विभूति ( ऐश्वर्यसूख ) में अनित्यत्व आलोचन आदि निमित्तक मोक्ष विषयक अर्थित्व देवादिमें भी हो सकता है । उसी प्रकार उनमें सामर्थ्य भी सम्भव है । क्योंकि मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक अनुभवसे यह अवगत होता है कि वे शरीरधारी हैं । उनके लिए कोई प्रतिषेध नहीं है | और उपनयन आदि शास्त्रसे उनका ( ब्रह्मविद्या में ) अधिकार निवृत्त नहीं होता, सत्यानन्दी - दीपिका अंगुष्ठमात्र शब्द सर्वव्यापक परमेश्वरका ही ग्रहण करते हैं सांसारिक जीवका नहीं । पूर्वपक्षमें ब्रह्म-दृष्टिसे जीवकी उपासना फल है, सिद्धान्तमें अन्तरात्मा और ब्रह्मका अभेदज्ञान फल है ॥ २५ ॥

* गत अधिकरण के अनुसार शास्त्रमें यदि मनुष्योंका ही अधिकार है तो देवादिका ब्रह्म-विद्यामें अधिकार नहीं होगा । इस आक्षेप संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है । वैदिक कर्मा-नुष्ठानमें मनुष्यका अधिकार है यह युक्त है । परन्तु ब्रह्मज्ञानमें भी केवल मनुष्योंका ही अधिकार है अन्यका नहीं, यह नियम नहीं है । क्योंकि शास्त्र में अधिकारके कारण सामर्थ्य, अथित्वादि तो देवादिमें भी सम्भव हैं । यद्यपि ऐश्वर्यं सुखमें आसक्त होनेके कारण उनमें वैराग्यादिका होना कठिन है, तो भी भोगोंको परिणामी, नश्वर समझनेवाले और निरतिशयसुखको चाहनेवाले विवेकी देव मोक्षार्थी

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अधि ० ८ सू ० २६-२७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित II वेदाध्ययनार्थत्वात् । तेषां च स्वयंप्रतिभातवेदत्वात् । * अपि चैषां विद्याग्रहणार्थं ब्रह्म-चर्यादि दर्शयति- ' एकशतं ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास ' ( छा ० ८।११।३ ), ' भृगुर्वै वारुणिः वहणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्म ' ( तै ० ३ | १ ) इत्यादि । यदपि कर्मस्वनधिकारकारणमुक्तम्- ' न देवानां देवतान्तराभावात् ' ( जै ० ६ । १।६ ) इति, ' न ऋषीणा-मार्षेयान्तराभावात् ' ( जै ० ६ । १ ७ ) इति । न तद्विद्यास्वस्ति । न हीन्द्रादीनां विद्यास्वधिक्रिय-माणानामिन्द्राद्यद्देशेन किंचित्कृत्यमस्ति । न च भृग्वादीनां भृग्वादिसगोत्रतया । तस्मा-देवादीनामपि विद्यास्वधिकारः केन वार्यते? देवाद्यधिकारेऽप्यङ्गुष्ठमात्रश्रुतिः स्वाङ्गुष्ठा-पेक्षया न विरुध्यते ॥ २६ ॥

विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ २७ ॥

पदच्छेद - विरोध, कर्मणि, इति चेत्, न, अनेकप्रतिपत्तेः, दर्शनात् । सूत्रार्थ - इन्द्र आदि देवोंका यदि शरीर माना जाय तो ( कर्मणि विरोधः ) कर्म में विरोध हो जायगा । ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं, ( अनेकप्रतिपत्तेः ) क्योंकि युगपत् एकको ही अनेक शरीरों की प्राप्ति होती है, ऐसा ( दर्शनात् ) ' स एकधा भवति ' ( वह एक प्रकारका होता है तीन प्रकारका होता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें देखा जाता है । अथवा अनेक कर्मोंमें एकका ही अङ्ग होना लोकमें देखा जाता है, अतः इन्द्र आदिका भी अनेक स्थलोंमें हवि ग्रहण करना युक्त है । * स्यादेतत्, यदि विग्रहत्त्वाद्यभ्युपगमेन देवादीनां विद्यास्वधिकारो वर्ण्यत । विग्रहवत्त्वादृत्विगादिवदिन्द्रादीनामपि स्वरूपसंनिधानेन कर्माङ्गभावोऽभ्युपगम्येत् । तदा कारण कि उपनयन वेद अध्ययनके लिए होता है, उनको वेदका प्रकाश स्वयं ही होता है । और ‘ एकशर्त ह वै ० ' ( इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एकसौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया ) ' भृगुर्वै वारुणिः ' -( वरुणका सुप्रसिद्ध पुत्र भृगु अपने पिता वरुणके पास गया, और बोला- भगवन् मुझे ब्रह्मज्ञानका उपदेश कीजिए ) इत्यादि श्रुति उन देवादिमें विद्या ग्रहणके लिए ब्रह्मचर्य आदि दिखलाती है । ' न देवानां ० ' ( देवताओंको कर्ममें अधिकार नहीं है, क्योंकि अन्य देवताओंका अभाव है अर्थात् इन्द्र से पृथक् अन्य इन्द्रका अभाव है ) और ' न ऋषीणाम् ० ' ( ऋषियोंका कर्ममें अधिकार नहीं है, क्योंकि दूसरे ऋषिका अभाव है अर्थात् तद्नाम और तद्रूपवाला अन्य ऋषि नहीं है जिसके उद्देश्यसे कर्म करे ) इसप्रकार जो उनका कर्ममें अनधिकारका कारण कहा गया है वह विद्याओंमें नहीं है । क्योंकि विद्याओं में अधिकारी हुए इन्द्रादिका इन्द्रादिके उद्देश्यसे कोई भी कृत्य नहीं है । और भृगु आदि ऋषियोंका मी भृगु आदिके सगोत्रके उद्देश्यसे कोई भी कृत्य नहीं है । इससे देवादिका भी विद्याओंमें अधिकार कौन निवारण कर सकता है । देवादिके अधिकारमें भी अंगुष्ठमात्र श्रुति अपने अङ्गुष्ठकी अपेक्षासे विरुद्ध नहीं है ॥ २६ ॥

ऐसा हो, यदि शरीरधारी स्वीकारकर देव आदिका विद्याओंमें अधिकार कहा जाय तो शरीर-वाला होनेसे ऋत्विक् आदिके समान इन्द्र आदिका भी स्वरूप संनिधानसे कर्म में अङ्गभाव स्वीकार करना पड़ेगा तब तो कर्म में विरोध होगा, क्योंकि यागमें स्वरूप सान्निध्यसे इन्द्र आदिका अङ्गमाव सत्यानन्दी - दीपिका हो सकते हैं । इसप्रकार के अनेक उदाहरण शास्त्र आदिमें उपलब्ध होते हैं । * ' तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणाम् ' ( देव, ऋषि और मनुष्यों में से जिस जिसने यह जान लिया कि ' मैं ब्रह्म हूँ ' वह ब्रह्म ही हो गया ) इससे देवोंके ब्रह्मविद्या में अधिकारका कोई प्रतिषेध नहीं कर सकता । यहाँ पूर्वपक्ष में क्रममुक्तिको इच्छावाले पुरुषोंकी दहर आदि उपासनाओं में अप्रवृत्ति फल है, क्योंकि पूर्वपक्ष में जब देवोंका ज्ञानमें अधिकार नहीं है तब

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२४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ च विरोधः कर्मणि स्यात् । नहीन्द्रादीनां स्वरूपसंनिधानेन यागेऽङ्गभावो दृश्यते, नच संभवति; बहुषु यागेषु युगपदेकस्येन्द्रस्य स्वरूपसंनिधानतानुपपत्तेरिति चेत्, नायमस्ति विरोधः । कस्मात्? अनेकप्रतिपत्तेः । एकस्यापि देवतात्मनो युगपदनेकस्वरूपप्रतिपत्तिः संभवति । कथमेतदवगम्यते? दर्शनात् । तथा हि- ' कति देवाः ' इत्युपक्रम्य ' त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रा ' इति निरुच्य ' कतमे ते ' इत्यस्यां पृच्छायाम् ' महिमान एवैषामेते श्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवाः ' ( वृ ० ३ ९ ११, २ ) इति ब्रुवती श्रुतिरेकैकस्य देवतात्मनो युगपदनेकरूपतां दर्शयति । * तथा त्रयस्त्रिंशतोऽपि षडाद्यन्तर्भाविक्रमेण ' कतम एको देव इति प्राण: ' देखने में नहीं आता और सम्भव भी नहीं है, क्योंकि बहुत यागोंमें एक हो समय एक ही इन्द्रकी स्वरूपसे उपस्थिति अनुपपन्न है, ऐसा यदि कहो तो यह विरोध नहीं है, किससे? इससे कि अनेक प्रतिपत्ति है । एक ही समय में एक ही देवतात्मामें अनेक शरीरोंकी प्राप्ति सम्भव है । यह कैसे समझा जाय? दर्शन होनेसे अर्थात् श्रुतिमें ऐसा देखा जाता है, क्योंकि ' कति देवाः ' ( देवता कितने हैं ) ऐसा उपक्रमकर ' त्रयश्च त्री च ० ' ( तीन सौ तीन और तीन हजार तीन अर्थात् तीन सहस्र तीन सौ छ: हैं ) ऐसा निर्वचनकर ‘ कतमे ते ' ( वे कौन हैं ) ऐसा प्रश्न उपस्थित होनेपर ' महिमान एवैष ( ० ' ( याज्ञवल्क्य - ये तो इनकी महिमा ही है । देवता तो आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र और प्रजापति इस प्रकार तैंतीस ही हैं ) इस प्रकार कहती हुई श्रुति एक एक देवतात्माको एक ही समय में अनेक रूपता दिखलाती है । उसीप्रकार उन तैंतीस देवोंका भी क्रमशः छ:, तीन, दो और एकमें अन्तर्भाव दिखलाकर सत्यानन्दी - दीपिका हर आदि उपासनासे देवभावको प्राप्त होनेपर भी वे उपासक क्रम मुक्तिको प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि कैवल्यमुक्ति ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे ही होती है, उनको इस प्रकारका ज्ञान नहीं होता; और सिद्धान्त में क्रम मुक्तिकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंकी दहरादि उपासनाओंमें प्रवृत्ति फल है । क्योंकि देवादिको ज्ञानमें अधिकार है । इस कारण दहरादि उपासना द्वारा क्रमसे मोक्षार्थी पुरुष देवभाव प्राप्तकर ब्रह्मादि लोकोंमें ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान प्राप्तकर मोक्षको प्राप्त हो सकते हैं || २६ ॥ * यदि देवताको देहधारी मानें तो याग आदिमें ऋत्विक् के समान उसका भी वहाँ प्रत्यक्ष दर्शन होना चाहिए, परन्तु होता नहीं है, अतः अर्थं युक्त शब्दको ही देवता मानना युक्त है । शब्दात्मक देवता तो जड़ है, इसलिए उसकी विद्यामें अधिकारकी चर्चा हो असम्भव है | शब्दात्मक देवता मानने से कर्ममें विरोध भी नहीं होगा । सिद्धान्ती - यह युक्त नहीं है, क्योंकि देवताओंके युगपद् अनेक शरीर धारण करनेमें श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, लोक अनुभव आदि अनेक प्रबल प्रमाण हैं । जैसे योगी लोग योगबलसे एक ही समय में अनेक स्वरूपोंको धारण कर अनेक कार्य करते हैं, वैसे देवता भी ऐश्वर्यं आदि बलसे अनेक स्वरूप धारण करते हैं, इसमें कोई विरोधका अवकाश नहीं है । इस विषय में शाकल्य और याज्ञवल्क्यका प्रश्नोत्तर है - शाकल्य - ' कतमे ते ० ' ( वे कितने हैं? ) याज्ञवल्क्य - ' त्रयस्त्रिंशत्त्वेव ० ' ( वे तैंतीस हैं ) ' अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यो, ' चन्द्रमा और नक्षत्र ये आठ वसु हैं, क्योकि यही प्राणियोंके कर्मफलके आश्रय देहादि कार्यकरण संघातरूपसे परिणत होकर सर्व जगत्को बसाते हैं, इसलिए ये वसु कहे जाते हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन ये एकादश रुद्र हैं, क्योंकि मृत्युके समयमें इनके देहसे निकल जानेपर कुटम्बियोंको रुलाने - रुदन करानेसे ये रुद्र कहलाते हैं । वर्ष में द्वादश मास होनेसे द्वादश आदित्य हैं, ये पुनः पुनः परिभ्रमण करते हुए आयु और कर्मफल भोगको हरण करते हैं, अतः ये आदित्य कहे जाते हैं । इन्द्र और प्रजापति ये ही देवता अपनी - अपनी सामर्थ्य से अनेक रूप हो जाते हैं । * वे तैंतीस देवता - अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक इन छ: की

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अधि ० ८ सू ० २७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २४५ इति प्राणैकरूपतां देवानां दर्शयन्ती तस्यैवैकस्य प्राणस्य युगपदनेकरूपतां दर्शयति । तथा स्मृतिरपि - ' आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षम || योगी कुर्याद्वलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥ प्राप्नुयाद्विषयान् कैश्चित्कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ॥ संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥ ' इत्येवंजाती-यका प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेकशरीरयोगं दर्शयति । किमु वक्तव्यमा-जानसिद्धानां देवानाम् | अनेकरूपप्रतिपतिसंभवाच्चैकैका देवता बहुभी रूपैरात्मानं प्रविभज्य बहुषु यागेषु युगपदङ्गभावं गच्छतीति । परैश्च न दृश्यतेऽन्तर्धानादिक्रियायोगा-दित्युपपद्यते । अनेकप्रतिपत्ते दर्शनादित्यस्यापरा व्याख्या-- विग्रहवतामपि कर्माङ्गभाव-चोदनास्वनेका प्रतिपत्तिर्दृश्यते । क्वचिदेकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं न गच्छति, यथा बहुभिर्भोजयद्भिनैको ब्राह्मणो युगपद्भोज्यते । क्वचिच्चैकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपद-ङ्गभावं गच्छति, यथा बहुभिर्नमस्कुर्वाणैरेको ब्राह्मणो युगपन्नमस्क्रियते । तद्वदिहोद्देश-' कतम एको देवः ' ( वह एक देव कौन है? प्राण है ) इसप्रकार देवोंका प्राणरूप एक स्वरूप दिखलाती हुई श्रुति उसी एक प्राणकी युगपत् अनेक रूपता दिखलाती है । तथा ' आत्मनो बै ० ' ( हे भरतकुलमें श्रेष्ठ! योगी योगमहिमासे अपने अनेक शरीर धारण करता है उन सब शरीरोंसे पृथिवीमें विचरण करता है, उनमें से कुछ शरीरोंसे विषयभोग प्राप्त करता है और कुछ शरीरोंसे उग्रतप करता है, और फिर जैसे सूर्य रश्मि समूहको अपनेमें समेट लेता है, वैसे योगी पुरुष उन शरीरोंको अपने में समेट लेता है ) इसप्रकार की स्मृति भी प्राप्त अणिमा आदि ऐश्वर्यवाले योगियोंका भी युगपत् अनेक शरीरोंसे सम्बन्ध दिखलाती है । जन्म सिद्ध देवोंके विषय में तो फिर कहना ही क्या है । अनेकस्वरूप धारणकर सकने के कारण एक - एक देवता बहुत रूपों - शरीरोंसे अपनेको विभक्तकर युगपत् बहुत यागों में बङ्गमानको प्राप्त हो सकता है । अन्तर्धान आदि योग क्रियाको सामर्थ्यसे दूसरे पुरुष उन्हें देख नहीं सकते, इसप्रकार शरीरधारी सिद्ध होनेपर देवोंका ब्रह्मविद्या में अधिकार युक्त है । ' अनेक-प्रतिपत्तेर्दर्शनात् ' अब यह इसकी दूसरो व्याख्या है - देहधारियोंकी भो कर्मके अङ्गभावको विधान करनेवाले विधिवाक्योंमें अनेक प्रतिपत्ति देखी जाती है । कहीं पर एक ही शरीरधारी अनेक स्थलोंमें युगपत् अङ्गभावको प्राप्त नहीं हो सकता, जैसे भोजन करानेवाले बहुत यजमानोंद्वारा युगपत् ( अनेक स्थलों में ) एक ही ब्राह्मणको भोजन नहीं कराया जा सकता । इसीप्रकार कहींपर युगपत् अनेक स्थलोंमें एक भी अङ्गभावको प्राप्त होता है, जैसे बहुत नमस्कार करनेवालोंसे युगपत् एक ब्राह्मण नमस्कृत: भी होता है । तो इसी प्रकार यहाँ भी उद्देश्य द्रव्य परित्यागात्मक याग में एक शरीरी देवताके उद्देश्यसे सत्यानन्दी - दीपिका विभूतियाँ हैं, अतः इनका इन छः में ही अन्तर्भाव है । इनका पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यु इन तीनमें अन्तर्भाव है । ये तीन अन्न और प्राण इन दोमें अन्तर्भूत हैं, और ये दोनों एक प्राणरूप हिरण्य-गर्भ में अन्तर्भूत हैं । इसप्रकार श्रुतिमें अनेकरूपता दिखाई गयी है । इसमें ' अणिमा महिमा चैव लघिमा प्राप्तिरीशिता । प्राकाम्यं च वशित्वं च यत्रकामावसायिता ॥ ' ( मार्कण्डेयपुराण ) ( अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, ईशित्व, प्राकाम्य, वशित्व और यत्रकामावसायिता ) ये आठ ऐश्वर्यं हैं । ' योगी योगबलसे क्षणभर में सूक्ष्म, महान्, भारी और हल्का हो जाता है । प्राप्ति अँगुलीसे चन्द्रमा आदिका स्पर्श करना, ईक्षिता - सृष्टि करनेकी सामर्थ्यं, प्राकाम्य इच्छा शक्तिका नाश न होना, वशित्व-नियमन करनेकी शक्ति, यत्रकामावसायिता - संकल्पमात्र से इष्टकी प्राप्ति । ' ' जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजा सिद्धयः ' ( यो - यू ० ४। १ ) ( जन्म, औषधसेवन, मन्त्रानुष्ठान, तप और समाधिसे सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं ) यह स्मृति प्रमाण भी है । साधनोंसे शरीर, इन्द्रिय और चित्तका मल नष्ट होकर विशेष परिवर्तन होनेसे उनमें अलौकिक शक्तियोंके प्रादुर्भावको सिद्धि कहते हैं । योगबलसे जब योगी एकसे

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२४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ परित्यागात्मकत्वाद्यागस्य विग्रहवतीमध्येकां देवतामुद्दिश्य बहवः स्वं स्वं द्रव्यं युगपत्परि-त्यक्ष्यन्तीति विग्रहत्वेऽपि देवतानां न किंचित्कर्मणि विरुध्यते ॥ २७ ॥

शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ २८ ॥

पदच्छेद - शब्दे, इति चेत्, न, अतः, प्रभवात्, प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् । सूत्रार्थ - ( शब्दे ) वेदवाक्य में विरोध उपस्थित होगा, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि ( अतः ) वैदिक शब्दोंसे ( प्रभवात् ) देव आदि जगत्‌का प्रभव होता है | यह बात ( प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ) प्रत्यक्ष - श्रुति, अनुमान -स्मृतिसे सिद्ध होती है । मा नाम विग्रहवत्त्वे देवादीनामभ्युपगम्याने कर्मणि कश्चिद्विरोधः प्रसञ्जि । शब्दे तु विरोधः प्रसज्येत । कथम्? औत्पत्तिकं हि शब्दस्यार्थेन संबन्धमाश्रित्य ' अनपेक्ष-स्वात् ' इति वेदस्य प्रामाण्यं स्थापितम् । इदानीं तु विग्रहवती देवताऽभ्युपगम्यमाना यद्य-यैश्वर्ययोगाद्युगपदनेक कर्मसंबन्धीनि हवींषि भुञ्जीत, तथापि विग्रहयोगादस्मदादिवज्ज-ननमरणवती सेति नित्यस्य शब्दस्य नित्येनार्थेन नित्ये संबन्धे प्रतीयमाने यद्वैदिके शब्दे प्रामाण्यं स्थितं तस्य विरोधः स्यादिति चेत् — नायमप्यस्ति विरोधः । कस्मात्? अतः प्रभ-वात् । अत एव हि वैदिकाच्छब्दादेवादिकं जगत्प्रभवति । ननु ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १।१।२ ) इत्यत्र ब्रह्मप्रभवत्वं जगतोऽवधारितम्, कथमिह शब्दप्रभवत्वमुच्यते? अपि च यदि नाम वैदिकाच्छन्दादस्य प्रभवोऽभ्युपगतः कथमेतावता विरोधः शब्दे परिहृतः? बहुत याज्ञिक लोग अपने - अपने हविष्यरूप द्रव्यका युगपत् त्यागकर सकते हैं । इसलिए देवोंके शरीर-धारी होनेपर भी कर्ममें कुछ विरोध नहीं है ॥ २७ ॥

देवादिको शरीरधारी स्वीकार करनेमें कर्ममें मले कुछ विरोध प्रसक्त न हो, परन्तु शब्दमें तो विरोध प्रसक्त होगा, क्योंकिं अर्थके साथ शब्दका औत्पत्तिक- स्वाभाविक - नित्य सम्बन्ध मानकर ' अनपेक्षत्वात् ' ( प्रमाणान्तरकी अपेक्षा न होनेसे ) इसप्रकार वेदमें प्रामाण्यका स्थापन किया है । देवता शरीरधारी स्वीकार किए जानेपर यद्यपि ऐश्वर्यंके योगसे युगपत् अनेक कर्म सम्बन्धी हविष्यों-को ग्रहणकर सकते हैं, तो भी शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे हम लोगों के समान वे जन्म - मरणवाले हो जायेंगे । इसलिए नित्य शब्दका नित्यअर्थके साथ नित्य सम्बन्ध प्रतीयमान होनेसे वैदिक शब्दों में प्रमाणान्तर अनपेक्ष्यत्वरूप प्रामाण्य स्थापन किया था उसका विरोध हो जाएगा । यदि ऐसा कहो तो यह विरोध भी नहीं है, क्योंकि उससे देवादिका प्रभव है । उससे ही अर्थात् वैदिक शब्दसे ही देवादि जगत् उत्पन्न होता है । परन्तु ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्रमें यह निश्चय किया गया है कि जगत् की ब्रह्मसे उत्पत्ति होती है, तो यहाँ यह कैसे कहते हो कि शब्दसे जगत् उत्पन्न होता है? जब कि वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुद्गण ये अर्थं उत्पत्तिवाले होनेसे अनित्य ही हैं, यदि यह स्वीकार भी कर लिया जाय कि वैदिकशब्दसे जगत् की उत्पत्ति होती हैं, तो इतने ही से शब्द में विरोधका परिहार कैसे हुआ? वसु आदिके अनित्य होनेसे उनके वाचक वैदिक ' वसु ' आदि शब्दों का सत्यानन्दी - T अनेक शरीर धारणकर सकता है, तो जन्म सिद्ध देवताओंका तो इस विषय में कहना ही क्या है । इसलिए देवता शरीरधारी होते हैं ॥। २७ ॥ * पूर्वपक्षी - प्रश्न करते हैं कि शब्द और अर्थके सम्बन्धमें अनित्यता शब्दके अनित्य होने से होती है अथवा अर्थके अनित्य होनेसे? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि देवादि व्यक्ति शब्दसे उत्पन्न होते हैं, अतः सृष्टिके पहले उनकी स्थिति रहनेसे शब्द अनित्य नहीं हैं 1 । द्वितीय विकल्पको ' न ' आदिसे कहते हैं ।