श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 281–290
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 281–290
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अधि ० ८ सू ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २४७ यावता वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इत्येतेऽर्था अनित्या एवोत्पत्तिमत्त्वात् । तदनित्यत्वे च तद्वाचिनां वैदिकानां वस्वादिशब्दानामनित्यत्वं केन निवार्यते? प्रसिद्धं हि लोके देवदत्तस्य पुत्र उत्पन्न यज्ञदत्त इति तस्य नाम क्रियत इति । तस्माद्विरोध एव शब्द इति चेत्, न गवादिशब्दार्थ संबन्धनित्यत्वदर्शनात् । न हि गवादिव्यक्तीनामुत्पत्तिमत्त्वे तदाकृतीनामप्युत्पत्तिमत्त्वं स्यात् । द्रव्यगुणकर्मणां हि व्यक्तय एवोत्पद्यन्ते, नाकृतयः । आकृतिभिश्च शब्दानां संबन्धः, न व्यक्तिभिः; व्यक्तीनामानन्त्यात्संबन्धग्रहणानुपपत्तेः । व्यक्तिवृत्पद्यमानास्वप्याकृतीनां नित्यत्वान्न गवादिशब्देषु कश्रिद्विरोधो दृश्यते । तथा देवा-दिव्यक्तिप्रभावाभ्युपगमेऽप्याकृतिनित्यत्वान्न कश्चिद्वस्वादिशब्दे षु विरोध इति द्रष्टव्यम् । आकृतिविशेषस्तु देवादीनां मन्त्रार्थवादादिभ्यो विग्रहवत्त्वाद्यवगमादवगन्तव्यः । स्थान-विशेष संबन्धनिमित्ताश्चेन्द्रादिशब्दाः सेनापत्यादिशब्दवत् । ततश्च यो यस्तत्तत्स्थानमधि-अनित्यत्व कौन निवारण कर सकता है । लोक में यह प्रसिद्ध ही है कि देवदत्तके पुत्र होनेपर ही उसका नाम यज्ञदत्त रखा जाता हैं । इसलिए शब्दमें विरोध ही है । af ऐसा कहो तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि गो आदि शब्दों और अर्थोका सम्बन्ध नित्य दिखाई देता है । गो आदि व्यक्तियोंको उत्पत्ति होनेपर उनके आकृतियों ( जाति ) की उत्पत्ति नहीं होती । द्रव्य गुण और कर्म ये व्यक्तियाँ ही उत्पन्न होती हैं आकृतियाँ नहीं । शब्दोंका सम्बन्ध आकृतियों के साथ होता है व्यक्तियोंके साथ नहीं, क्योंकि व्यक्तियाँ अनन्त हैं, अतः उनके साथ शब्दों का सम्बन्ध ग्रहण नहीं हो सकता । व्यक्तियोंके उत्पद्यमान होनेपर भी आकुतियोंके नित्य होने के कारण गो आदि शब्दों में कोई विरोध नहीं देखा जाता । उसी प्रकार देवादि व्यक्तियोंकी उत्पत्ति स्वीकार करनेपर भी आकृतिके नित्य होने से वसु आदि शब्दोंमें कोई विरोध नहीं है ऐसा समझना चाहिए । मन्त्र अर्थवाद आदिसे देवोंके शरीरधारण आदिकी अवगति होनेसे उनकी आकृति विशेष भी है । ऐसा समझना चाहिए । सेनापति आदि शब्दोंके समान स्थानविशेषके सम्बन्धसे इन्द्र आदि शब्द सत्यानन्दी - दीपिका * मीमांसक लोग गो आदि शब्दोंकों गोत्व आदिका वाचक मानते हैं । नैयायिक लोग गो आदि शब्दोंको व्यक्ति वाचक मानते हैं । यहाँ दो निकल्प हैं - एक व्यक्तिमें एक शक्ति है अथवा अनन्त व्यक्तियोंमें अनन्त शक्तियाँ हैं? प्रथम पक्ष युक्त नहीं हैं, क्योंकि शुक्ल व्यक्तिका शक्तिग्रह ( शक्तिज्ञान ) होनेपर कृष्ण व्यक्तिका शक्तिग्रह न होगा, किन्तु होता है, अत: प्रथम पक्षमें व्यतिरेक-व्यभिचार है । दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि अतीत, अनागत और वर्तमान भेदसे अनन्त व्यक्तियों में अनन्त शक्तियाँ माननेसे अनन्तशक्ति कल्पना गौरव है । और व्यक्तिकी उत्पत्ति और नाशसे शक्तियों की भी उत्पत्ति और विनाश मानना पड़ेगा, इत्यादि दोषोंकी प्रसक्ति है । इसलिए गो आदि पदोंको गोत्व आदि जातिमें शक्ति माननेसे लाघव है । इस शाब्दबोध प्रणालीके अनुसार जैसे गो आदि शब्दों का अर्थं गोत्व आदि जाति है, वैसे वसु आदि शब्दोंका अर्थं वसुत्व आदि जाति है व्यक्ति नहीं । यद्यपि शुक्ल पीत नीलादि भेदसे व्यक्ति नाना और अनित्य हैं तो भी गोत्व अर्थं नित्य है, इसलिए शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य हो सिद्ध होता है । कहीं व्यक्ति में शब्दकी प्रवृत्तिका कारण जाति होती है, जैसे गो आदि व्यक्ति में गो आदि शब्दकी प्रवृत्तिका कारण गोत्व आदि जाति है । कहीं प्रवृत्ति में उपाधि कारण होती है, जैसे स्थानविशेष सम्बन्धरूप उपाधिको लेकर सेनापति आदि शब्दकी प्रवृत्ति होती है, वैसे इन्द्रादि भी स्थानविशेष है जो उस पदपर आरूढ़ होते हैं, वे इन्द्रादि कहलाते हैं, अतः व्यक्तिके न रहने पर भी जाति रहती है, वह नित्य है, इसलिए शब्द अर्थका सम्बन्ध भी नित्य है । इसलिए शब्दप्रामाण्यमें कोई विरोध नहीं है ।
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२४८ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ रोहति स स इन्द्रादिशब्दैरभिधीयत इति न दोषो भवति । * न चेदं शब्दप्रभवत्वं ब्रह्म-प्रभवत्ववदुपादानकारणाभिप्रायेणोच्यते । कथं तर्हि? स्थिते वाचक त्मना नित्ये शब्दे नित्यार्थसंबन्धिनि शब्दव्यवहार योग्यार्थ व्यक्तिनिप्पत्तिः ' अतः प्रभवः ' इत्युच्यते । कथं पुनरवगम्यते शब्दात्प्रभवति जगदिति? प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् । प्रत्यक्षं श्रुतिः प्रामाण्यं प्रत्यनपेक्षत्वात् । अनुमानं स्मृतिः; प्रामाण्यं प्रति सापेक्षत्वात् । ते हि शब्दपूर्वां सृष्टि दर्शयतः । ' एत इति वै प्रजापतिर्देवानसृजतासृग्रमिति मनुष्यानिन्दव इति पितृस्तिरः पवित्रमिति ग्रहानाशव इति स्तोत्रं विश्वानीति शस्त्रमभिसौभगेत्यन्याः प्रजाः ' इति श्रुतिः । तथाऽन्यत्रापि ' स मनसा वाचं मिथुनं समभवत् ' ( वृ ० ११२/४ ) इत्यादिना तत्र तत्र शब्दपूर्विका सृष्टिः श्राव्यते । * स्मृतिरपि - ' अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा । आदौ वेदमयी दिव्या यत सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ ’ ( म. भा. शा. २३३ । २४ ) इति । उत्सर्गोऽप्यं वाचः संप्रदाय प्रवर्तनात्मको द्रष्टव्यः, अनादिनिधनाया प्रवृत्त होते हैं । इसलिए जो जो उस उस स्थान पर आरुढ़ होता है वह वह इन्द्र आदि शब्दोंसे कहा जाता है, अतः कोई दोष नहीं है । और यह शब्दप्रभवत्व ब्रह्मप्रभवत्व के समान उपादानकारणत्वके अभिप्रायसे नहीं कहा जाता । तब कैसे? नित्य अर्थ के साथ सम्बन्ध रखनेवाला जब नित्य शब्द वाचक-रूपसे स्थित रहता है तभी शब्द व्यवहार योग्य अर्थ व्यक्तिकी निष्पत्ति होती है इस अभिप्रायसे शब्दसे प्रभव- उत्पत्ति होती है ऐसा कहा जाता है । परन्तु यह कैसे अवगत हो कि शब्दसे जगत् उत्पन्न होता है? प्रत्यक्ष और अनुमानसे । प्रत्यक्ष -श्रुति, क्योंकि अपने प्रामाण्यके प्रति उसे किसी अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती । अनुमान -स्मृति, क्योंकि उसे अपनी प्रमाणता के लिए मूल भूत श्रुतिकी अपेक्षा होती है । ये दोनों ही शब्दपूर्वक सृष्टिको दिखलाते हैं, ' एत इति वै प्रजापति ० ' ( ' एते ' इस पदसे देवोंका स्मरण कर प्रजापतिने देवोंकी, ' असृग्रम् ' इस पदसे मनुष्यों का स्मरण कर मनुष्योंकी, ' इन्दव ' से पितरोंका स्मरणकर पितरोंकी ' तिरः पवित्रम् ' से ग्रहोंका स्मरणकर ग्रहोंकी, ' आशव ' पदसे स्तोत्रका स्मरण कर स्तोत्रकी ' विश्वानि ' पदसे शस्त्रका स्मरणकर शस्त्रकी, ' अभिसौभगा ' इससे अन्य प्रजाओं का स्मरणकर अन्य प्रजाओंकी सृष्टिकी ) यह श्रुति है । इस प्रकार अन्य स्थलमें भी ' स मनसा ० ' ( उस प्रजपतिने वेद त्रयीरूपा वाणीकी द्वन्द्वभावसे भावनाको अर्थात् मनके द्वारा वेद त्रयीकी आलोचनाकी ) इत्यादिसे स्थल - स्थलपर शब्द पूर्वक सृष्टिका श्रवण कराती है— प्रतिपादन करती है । ' अनादि निधना ० ' ( सृष्टि के आरम्भ में स्वयंभूने अनादि, अनन्त, नित्य और दिव्य वेदमयी वाणीको उत्सर्ग - अभिव्यक्त किया जिससे अन्य सम्पूर्ण प्रवृत्तियां हुईं ) यह स्मृति भी है । वाणीका यह उत्सर्ग ( उत्पत्ति ) भी गुरु-शिष्यपरम्परासे अध्ययनरूप संप्रदायका प्रवर्तनरूप ही समझना चाहिए | क्योंकि अनादि और सत्यानन्दी -दीपिका * जैके ब्रह्म जगत् की उत्पत्तिमें उपादानकारण है, वैसे शब्द जगत्को उत्पत्ति में उपादान-कारण नहीं है, किन्तु निमित्तकारण है इसप्रकार पूर्वापरका पर्यालोचन करनेसे कारण विषयक कोई विरोध नहीं है । ' नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं जाति: ' ( नित्य और देह, मनुष्य, पशु आदि अनेक व्यक्तियोंमें समवाय सम्बन्धसे रहनेवाला धर्म जाति कहलाता है जैसे मनुष्यत्व ) मनुष्य आदि शब्दोंका सम्बन्ध मनुष्यत्व आदि जातिसे है हाथ पैर आदि संघातसे नहीं । इस प्रकार शब्द नित्य है, और उससे जगत् की उत्पत्ति होती है । इस विषयमें यह श्रुति प्रमाण भी है । ' ए इति वै प्रजापति ० ' इस श्रुतिस्थ ' एते ' पद देवताओंका स्मारक है । ' असृग्रम् ' पद ' असृग् रुधर, रम- रमण, अथांन्त् रुधर प्रधान देहमें रमण करनेवाले मनुष्योंका स्मारक है । चन्द्रमण्डल में स्थित पितरोंका स्मारक ' इन्दु ' शब्द है ।
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अधि ० ८ सू ० २८ ] भाषानुवाद - - र सत्यानन्दी - दीपिकासहित २४ ९ अन्यादृशस्योत्सर्गस्यासंभवात् । तथा - नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् । वेदशब्देभ्य ' एवादौ निर्मसे स महेश्वरः ॥ ' ( मनु ० १२१ ) इति सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥ ' इति च । अपिच चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठस्तस्य वाचकं शब्द पूर्व स्मृत्वा पश्चात्तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षमेतत् । तथा प्रजापतेरपि ' स्रष्टुः सृष्टेः पूर्व वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्बभूवुः, पश्चात्तदनुगतानर्थान्ससर्जेति गम्यते । तथा च श्रुतिः - स भूरिति व्याहरत्स भूमिमसृजत ' ( तै ० ब्रा ० २।२।४।२ ) इत्येवमादिका भूरादि-शब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान्सृष्टान्दर्शयति । किमात्मकं पुनः शब्दम-भिप्रेत्येदं शब्दप्रभवत्वमुच्यते? स्फोटमित्याह । वर्णपक्षे हि तेषामुत्पन्नप्रध्वंसित्वान्नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यनुपपन्नं स्यात् । उत्पन्नध्वंसिनश्च वर्णाः प्रत्युच्चारण-मन्यथा चान्यथा च प्रतीयमानत्वात् । तथाहि - अदृश्य मानोऽपि पुरुषविशेषोऽध्ययनध्वनि-श्रवणादेव विशेषतो निर्धार्यते देवदत्तोऽयमधीते यज्ञदत्तोऽयमधीते इति । न चायं वर्ण-विषयोऽन्यथात्वप्रत्ययो मिथ्याज्ञानं; बाधकप्रत्ययाभावात् । न च वर्णेभ्योऽर्थावगतिर्युक्ता । नोकैको वर्णोऽर्थ प्रत्याययेत्; व्यभिचारात् । न च वर्णसमुदायप्रत्ययोऽस्ति, क्रमवत्त्वा-अनन्त वाणीका अन्य प्रकारसे उत्सर्ग सम्भव नहीं है । तथा ' नामरूपे ० ' ( उस महेश्वरने सृष्टि आरम्भ में वैदिक शब्दोंसे ही भूतोंके नाम, रूप और सत्कर्मों के अनुष्ठानकी प्रवृत्ति निर्माण - उत्पन्न की ) और ' सर्वेषां तु ० ' ( उसने आरम्भ में सम्पूर्ण भूतोंके पृथक् पृथक् नाम, रूप, कर्म एवं अवस्थाओं का वेद-शब्दोंसे निर्माण किया ) ये स्मृतियाँ भी वेद शब्दसे ही सृष्टि दिखलाती हैं । और हम सबका यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि जब कोई पुरुष किसी अमीष्ट वस्तुको बनाना चाहता है तो प्रथम उस वस्तुके वाचक शब्दको स्मरण कर पश्चात् उस वस्तुका अनुष्ठान करता है अर्थात् उसे बनाता है । उसी प्रकार स्रष्टा प्रजापतिके मनमें भी सृष्टिसे पहले वैदिक शब्द प्रादुर्भूत हुए, अनन्तर शब्दके अनुगत अर्थोंकी उसने रचनाकी, ऐसा ज्ञात होता है । तथा ' स भूरिति ० ' ( उसने भू ऐसा उच्चारणकर पृथिवीको सृष्टिकी ) इत्यादि श्रुति मनमें प्रादुर्भूत हुए भू आदि शब्दों से उत्पन्न हुए भू आदि लोकोंको दिखलाती है । पुनः किमात्मक शब्दोंको अभिप्रेत कर यह शब्द प्रभवत्व कहते हो? स्फोटात्मक, ऐसा कहा है अर्थात् शब्द वर्णात्मक है अथवा स्फोटात्मक? वैयाकरणमतमें स्फोटात्मक है, यदि वर्णात्मक शब्दसे सृष्टि मानें तो उनके उत्पन्न और नष्ट होनेके कारण नित्य शब्दोंसे देव आदि व्यक्ति उत्पन्न होते हैं यह कथन अनुपपन्न होगा । वर्णं उत्पन्न और विनष्ट होते हैं, क्योंकि प्रत्येक उच्चारणमें ये भिन्न - भिन्न प्रतीत होते हैं । जैसे कि अध्ययन ध्वनिके श्रवणसे अदृश्यमान पुरुष विशेष भी विशेष -रूपसे निर्धारित हो जाता है कि यह देवदत्त अध्ययन करता है, यह यज्ञदत्त अध्ययन करता है । और वर्णं विषयक यह अन्यथात्व ( भिन्न ) प्रतीति मिथ्याज्ञान नहीं है, क्योंकि उसका कोई बाधक ज्ञान नहीं है । किञ्च वर्णो से अर्थज्ञान युक्त नहीं है, कारण कि एक - एक वर्ण अर्थका प्रत्यायक- बोधक नहीं होता, क्योंकि व्यभिचार है । तथा वर्णं समुदाय भी अर्थं प्रत्यायक नहीं होता, कारण कि वर्ण क्रम-सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे महाभारत आदि वाक्य समुदाय किसी महापुरुषद्वारा निर्मित है, वैसे वैदिक शब्दों की उत्पत्ति नहीं है, किन्तु आचार्यं शिष्य परम्परासे प्रवृत्त हुआ अध्ययन है, यही सम्प्रदाय है । इस प्रकारकी वेद वाणीकी उत्पत्ति समझनी चाहिए । जैसे कुम्हार घट आदिके बनानेसे पहले उस वस्तुके नामका मनमें स्मरण कर तथा आकारको मनमें विचार कर पश्चात् उस अमीष्ट वस्तुको बनाता है, वैसे प्रजापति मी पूर्वकल्पोंके संस्कारोंसे उस वस्तुके नामका मनमें स्मरण कर उस वस्तुका उस शब्दसे निर्माण करता है । इस प्रकार वैदिकशब्दोंसे जगत् उत्पन्न होता है ।
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२५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ द्वर्णानाम् । पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनित संस्कारसहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति यद्युच्येत । तन्न । संबन्धग्रहणापेक्षो हि शब्दः स्वयं प्रतीयमानोऽर्थं प्रत्याययेत्, धूमादिवत् । न च पूर्वपूर्ववर्णानुभव जनित संस्कार सहित तस्यान्त्यवर्णस्य प्रतीतिरस्ति; अप्रत्यक्षत्वा-त्संस्काराणाम् । कार्यप्रत्यायितैः संस्कारैः सहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति चेत्, न; संस्कारकार्यस्यापि स्मरणस्य क्रमवर्तित्वात् । तस्मात्स्फोट एव शब्दः । स चैकैकवर्ण-प्रत्ययाहितसंस्कारबीजे ऽन्त्यवर्णप्रत्ययजनितपरिपाके प्रत्ययिन्येकप्रत्ययविषयतया झटिति प्रत्यवभासते । न चायमेकप्रत्ययो वर्णविषया स्मृतिः; वर्णानामनेकत्वादेकप्रत्ययविषय-त्वानुपपत्तेः । तस्य च प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वान्नित्यत्वम्ः भेदप्रत्ययस्य वर्णविषय-त्वात् । तस्मान्नित्याच्छन्दात् स्फोट रूपादभिधायकात्क्रियाकार कफललक्षणं जगदभिधेयभूतं प्रभवतीति । ' वर्णा एव तु शब्दः ' इति भगवानुपवर्षः । ननूत्पन्न प्रध्वंसित्वं वर्णानामुक्तम्, तन्न; वाले हैं । यदि ऐसा कहो कि पूर्व पूर्व वर्णोंके अनुभवसे जन्य संस्कार सहित अन्त्य वर्ण अर्थका बोध करायेगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि शब्द सम्बन्ध ग्रहणकी अपेक्षा रखता हुआ वह शब्द धूमादिके समान स्वयं प्रतीयमान होकर अर्थका बोध करा सकता है । पूर्वं पूर्व वर्णके अनुभव जन्य संस्कार सहित अन्तिम वर्णकी प्रतीति नहीं होती, क्योंकि संस्कार अप्रत्यक्ष हैं । यदि कहो कि शाब्दबोधरूप कार्यसे ज्ञापित संस्कारोंसे युक्त अन्त्य वर्ण अर्थकी प्रतीति करायेगा, यह युक्त नहीं, क्योंकि संस्कारका कार्यरूप स्मरण भी क्रमवाला है । इस प्रकार वर्णों में अर्थप्रतीतिका अभाव होनेसे स्फोट ही शब्द है । एक - एक ajit प्रतीतिने जिसमें संस्काररूप बीज डाला है और अन्तिम वर्णकी प्रतीतिने जिसमें परिपाक - अन्तिम संस्कार उत्पन्न किया है, ऐसे चित्तमें एक प्रतीतिके विषयरूपसे यह स्फोट झट अवभासित- अभिव्यक्त होता है । [ एकं पदम् ] यह एक प्रत्यय वर्णं विषयक स्मृति नहीं है, क्योंकि वर्णं अनेक होनेसे एक प्रत्यय के विषय नहीं हो सकते । उसका प्रत्येक उच्चारण प्रत्यभिज्ञाका विषय होनेसे नित्य है । भेदप्रत्यय तो वर्ण विषयक है, इसलिए स्फोटरूप नित्य वाचक शब्दसे क्रिया, कारक और फलरूप अभिधेय भूत जगत् उत्पन्न होता है । भगवान् उपवर्ष कहते हैं - वर्ण ही शब्द है । परन्तु यह जो कहा गया है । सत्यानन्दी - दीपिका # यद्यपि पूर्वोक्तरीति से वर्णोंका समुदाय नहीं हो सकता, फिर भी जैसे ' आग्नेय ' आदि यागोंका अपूर्व ( पुण्य - पाप ) द्वारा समुदाय होता है, वैसे संस्काररूप अपूर्वं द्वारा वर्णोंका समुदाय संभव है । क्या वह संस्कार वर्णोंसे उत्पन्न अपूर्व संज्ञक संस्कार हैं अथवा वर्णानुमवसे जन्य भावना नामका संस्कार है? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है । क्या वह संस्कार अज्ञात होकर अर्थका ज्ञान कराता है अथवा ज्ञात होकर? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि संस्कार सहित शब्द ज्ञात होकर ही अर्थकी प्रतीति कराता है, कारण कि वह धूम आदिके समान सम्बन्ध ग्रहणकी अपेक्षा रखकर ही बोधक होता है । द्वितीय पक्ष ( ज्ञात होकर ) तो क्या वह प्रत्यक्षसे होता है अथवा कार्यरूप लिङ्गसे? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि संस्कार अप्रत्यक्ष हैं । यदि दूसरा पक्ष कहो तो अर्थज्ञान होनेपर संस्कारज्ञान होता है और संस्कारज्ञान होनेपर अर्थज्ञान होता है इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होता है, अतः यह भी युक्त नहीं है । पदार्थ स्मरण पदज्ञानके अनन्तर होता है, अतः संस्कार सहित अन्त्य वर्णात्मक पदका ज्ञान स्मरणसे नहीं होता, इससे भावना नामक संस्कारका भी निवारण हो गया, क्योंकि उससे केवल वर्णस्मृति होती है । इसलिए वह अर्थ प्रतिपत्तिका हेतु नहीं हो सकता । इस प्रकार वर्ण अर्थके बोधक नहीं हैं किन्तु स्फोट है । * ' राम ' यह एक पद है, यह एक प्रतीति वर्णोंको विषय नहीं करती, क्योंकि वर्ण अनेक हैं वे एक प्रत्ययके विषय नहीं हो सकते, इसलिए इस एक प्रत्ययका विषय स्फोट है वह नित्य है ।
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अधि ० ८ सू ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २५१ त एवेतिप्रत्यभिज्ञानात् । सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विवेति चेत्, -न; प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरेण बाधानुपपत्तेः । प्रत्यभिज्ञानमाकृतिनिमित्तमिति चेत्, न; व्यक्तिप्रत्यभिज्ञानात् । यदि हि प्रत्युच्चारणं गवादिव्यक्तिवदन्या अन्या वर्णव्यक्तयः प्रतीयेरंस्तत आकृतिनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानं स्यात्, नत्वेतदस्ति; वर्णव्यक्तय एव हि प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायन्ते । द्विगशब्द उच्चारित इति हि प्रतिपत्तिर्न तु द्वौ गोशब्दाविति । * ननु वर्णा अप्युच्चारणभेदेन भिन्नाः प्रतीयन्ते देवदत्तयज्ञदत्तयोरध्ययनध्वनिश्रवणादेव भेदप्रतीतेरित्युक्तम् । अत्राभिधीयते-सति वर्णविषये निश्चिते प्रत्यभिज्ञाने संयोगविभागाभिव्यङ्गयत्वाद्वर्णानामभिव्यञ्जकवैचित्र्य-निमित्तोऽयं वर्णविषयो विचित्रः प्रत्ययो य स्वरूपनिमित्तः । अपि च वर्णव्यक्तिभेदवादि-नापि प्रत्यभिज्ञानसिद्धये वर्णाकृतयः कल्पयितव्याः । तासु च परोपाधिको भेदप्रत्यय इत्यभ्युपगन्तव्यम् । तद्वरं वर्णव्यक्तिष्वेव परोपाधिको भेदप्रत्ययः स्वरूपनिमित्तं च प्रत्य-भिज्ञानमिति कल्पनालाघवम् । एष एव च वर्णविषयस्य भेदप्रत्ययस्य बाधकः प्रत्ययो कि वर्ण उत्पत्ति और विनाशशील हैं, यह युक्त नहीं है, क्योंकि वे ही वर्ण हैं, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । यदि ऐसा कहो कि जैसे काटे जानेके पश्चात् उत्पन्न हुए केशादिमें सादृश्यसे ' वे ही केश हैं ' ऐसी [ भ्रमात्मक ] प्रत्यभिज्ञा होती है, वैसे हीं वर्णोंमें भी प्रत्यभिज्ञा होती है, तो यह ठीक नहीं है, कारण कि यहाँ प्रत्यभिज्ञाका प्रमाणान्तरसे बाध अनुपपन्न है । यदि कहो कि यहाँ प्रत्यभिज्ञा आकृति -जाति निमित्त है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि व्यक्तिकी प्रत्यभिज्ञा होती है । यदि प्रत्येक उच्चा-रणमें गो आदि व्यक्ति समान अन्य अन्य वर्ण व्यक्ति प्रतीत होते तो आकृति निमित्तक प्रत्यभिज्ञा होती, परन्तु यह ऐसा नहीं है, क्योकि प्रत्येक उच्चारण में वर्ण व्यक्ति ही प्रत्यभिज्ञात होते हैं । दोवार ' गो ' शब्दका उच्चारण किया ऐसी प्रतीति होती है न कि दो गो शब्दोंका उच्चारण । परन्तु जो कहा गया है कि उच्चारण के भेद से वर्ण भिन्न प्रतीत होते हैं, क्योंकि देवदत्त और यज्ञदत्तकी अ ययन ध्वनिके श्रवण से भेद प्रतीत होता है । इसपर कहते हैं - वर्ण विषयक प्रत्याभिज्ञान निश्चित होनेपर यह प्रतीत होता कि [ कण्ठ तालू आदि स्थानोंके साथ कोष्ठस्थ वायुके ] संयोग और विभाग से अभि-व्यङ्ग्य होनेके कारण वर्णोंमें अभिव्यञ्जक वैचित्र्य निमित्तक ही यह वर्णं विषयक विचित्र प्रत्यय है स्वरूपसे नहीं । और वर्ण व्यक्तियोंको भिन्न मानने वालोंको भी प्रत्यभिज्ञा सिद्धिके लिए वर्णो आकृति - जातिकी कल्पना करनी पड़ेगी और उनमें ( उदात्त आदि ) भेद प्रत्यय अन्य उपाधिसे हैं, ऐसो स्वीकार करना पड़ेगा । इससे तो यही मानना अच्छा है कि वर्ण व्यक्तियों में भेद प्रतीति अन्य उपाधि से है और प्रत्यभिज्ञा स्वरूपसे है, इसमें कल्पना लाघव है । यह जो वर्ण विषयक प्रत्यभिज्ञा है वही वर्ण विषयक भेदप्रत्ययका बाधकप्रत्यय है । एक ही समय में बहुत लोगोंसे उच्चारित एक सत्यानन्दी - दीपिका ' स्फुटयते वर्णैव्यज्यते इति स्फोट: ' वर्णोंसे व्यक्त होनेवाला और अर्थ की अभिव्यक्ति करनेवाला जो गो आदि शब्द हैं वही स्फोट है वह एक और नित्य है । पद और वाक्यभेदसे स्फोट दो प्रकारका है । इनमें भी वाक्यस्फोट प्रधान है और पदस्फोट गौण । इस स्फोट वादका ' वर्णा एव तु शब्दः ' आदिसे खण्डन करते हैं । * उच्चारण भेदसे वर्णोंको भिन्न - भिन्न माननेमें कल्पना गौरव है, एक तो ' ग ' वर्णं विषयक प्रत्यभिज्ञाको ' गोत्व ' जाति विषयक मानना, वर्णं भेद प्रतीतिके लिए उपाधिकी कल्पना करना, उत्पत्ति और विष्ट होने से अनन्त वर्णोंकी कल्पना करना, इत्यादि कल्पना गौरव है । उच्चारण भेदसे वर्णोंमें भेद स्वीकार करनेकी अपेक्षा उनमें भेद औपाधिक है और प्रत्यभिज्ञा स्वरूपसे है, ऐसा माननेमें कल्पना लाघव है ।
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२५२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ यत्प्रत्यभिज्ञानम् । कथं हो कस्मिन्काले वहनामुच्चारयतामेक एव सन्गकारो युगपदनेकरूपः स्यात्? उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च सानुनासिकश्च निरनुनासिकश्चेति । अथवा-ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदोन वर्णकृत इत्यदोषः । कः पुनरयं ध्वनिर्नाम? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति । प्रत्यासीदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वास-अयति । तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो विशेषा न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः; वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् । एवं च सति सालम्वना एवैते उदात्तादिप्रत्ययाभविष्यन्ति । इतरथा हि वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां निर्भेदत्वात्संयोगविभागकृता उदात्तादिविशेषाः कल्पेरन् । संयोग विभागानां चाप्रत्यक्षत्वान्न तदाश्रया विशेषा वर्णेष्वध्यवसातुं शक्यन्त इत्यतो निरा-लम्बना एवैत उदात्तादिप्रत्ययाः स्युः । अपि च नैवैतदभिनिवेष्टव्यमुदात्तादिभेदेन वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां भेदो भवेदिति । न हान्यस्य भेदेनान्यस्याभिद्यमानस्य भेदो भवितुम-र्हति । नहि व्यक्तिभेदेन जातिं भिन्नां मन्यन्ते । वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात्स्फोटकल्पनाऽ-नार्थिका । न कल्पयाम्यहं स्फोटम्, प्रत्यक्षमेव त्वेनमवगच्छामि; एकैकवर्णग्रहणाहितसंस्का-बुद्ध झटिति प्रत्यवभासनादिति चेत्, नः अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात् । एकैकवर्ण-होता हुआ ही ' गकार- ' ग ' युगपत् उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, सानुनासिक और अननुनासिक भेदसे अनेकरूप किस प्रकार हो सकेगा? अथवा यह भेद प्रत्यय ध्वनिकृत है वर्णकृत नहीं । इसलिए कोई दोष नहीं है । तो यह ध्वनि नामकी वस्तु क्या है? दूरसे सुनने वाले और अलग - अलग वर्णों को न जाननेवाले पुरुषके कानमें जो प्रवेश करती है और समीपसे सुनने वालेके लिए पटुत्व मृदुत्व आदि भेदों का वर्णों में आरोप करती है वह ध्वनि है । उदात्त आदि विशेष उससे होते हैं वर्णस्वरूपसे नहीं होते, क्योंकि प्रत्येक उच्चारणमें वर्ण प्रत्यभिज्ञाके विषय होते हैं । ऐसा होनेपर ये उदात आदि प्रत्यय अवलम्बन सहित होते हैं । अन्यथा प्रत्यभिज्ञाके विषयभूत वर्णोंमें भेदके न होनेसे उदात्त आदि विशेष संयोग विभागसे होते हैं ऐसी कल्पना करनी पड़ेगी । संयोग विभाग अप्रत्यक्ष हैं, अतः तदाश्रय उदात्त आदि विशेष वर्णों में आरोपित नहीं किए जा सकते, इससे ये उदात्तादि प्रत्यय निराधार ही हो जायेंगे । किञ्च स्फोटवादीको ऐसा आग्रह भी नहीं करना चाहिए कि उदात्त आदि भेदसे प्रत्यभिज्ञायमान वर्णोंका भेद होगा, क्योंकि किसी एकके भेदसे अन्य अभिद्यमान पदार्थका भेद नहीं हो सकता । व्यक्तिके भेदसे जातिका भेद कोई भी नहीं मानते । और वर्णोंसे अर्थकी प्रतीतिका संभव होनेसे [ विवादग्रस्त ] स्फोटकी कल्पना व्यर्थ है । पूर्वपक्षी - मैं केवल स्फोटकी कल्पना ही नहीं करता किन्तु उसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है, क्योंकि एक - एक वर्णके ग्रहणसे अनुभव जन्य संस्कार सहित बुद्ध शीघ्र स्फोटका प्रत्यवभास होता है । ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है । क्योंकि यह बुद्धि मी वर्ण विषयक है । एक - एक वर्णका ग्रहण होनेके अनन्तर ' गो ' यह जो एक बुद्धि होती है वह समस्त सत्यानन्दी - दीपिका # वायुके संयोग आदि अप्रत्यक्ष होनेसे उसमें रहनेवाली उदात्त आदि विचित्रताका वर्णों में प्रत्यक्ष आरोप असंभव है, इस अरुचिसे ' अथवा ' इत्यादि भाष्यसे स्वमतको उपस्थित करते हैं । वर्णोंमें ध्वनिका अभेदाध्यास होनेसे ध्वनिके उदात्त आदि धर्म वर्णोंमें प्रतीत होते हैं । श्रोताके कर्ण में दूरसे आनेवाला मृदु, कठिन शब्द ध्वनि है । वह वर्णोंसे भिन्न है । वर्णोंकी प्रत्येक उच्चारणमें अनुवृत्ति होती है किन्तु ध्वनिकी अनुवृत्ति नहीं होती । ध्वनिके उदात्त आदि धर्म वर्णोंमें आरोपित for जाते हैं । # जैसे परस्पर भिन्न अनेक गो व्यक्तियोंमें गोत्व जाति अभिन्न है अर्थात् व्यक्ति के भेदसे जातिका भेद नहीं होता, वैसे ध्वनिके भेदसे वर्णं भी भिन्न नहीं होते । जिस ज्ञानमें जो अर्थ भासता
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अधि ० ८ ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २५३ ग्रहणोत्तरकाला हीयमेका बुद्धिगौरिति समस्तवर्णविषया, नार्थान्तरविषया । कथमेतदव-गम्यते? यतोऽस्यामपि बुद्धौ गकारादयो वर्णा अनुवर्तन्ते, नतु दकारादयः । यदि हास्या बुद्धेर्गकारादिभ्योऽर्थान्तरं स्फोटो विषयः स्यात्ततो दकारादय इव गकारादयोऽप्यस्या बुद्धेर्यावर्तेरन्; नतु तथास्ति । तस्मादियमेकबुद्धिर्वर्णविषयैव स्मृतिः । * नन्वनेकत्वाद्व-र्णानां नै बुद्धिविषयतोपपद्यत इत्युकम् - तत्प्रतिब्रूमः संभवत्यनेकस्याप्येकबुद्धिविषयत्वम् । पंक्तिर्वनं सेना शतं सहस्रमित्यादिदर्शनात् । या तु गौरित्येकोऽयं शब्द इति बुद्धिः, सा बहुष्वेव वर्णेकार्थावच्छेद निबन्धनोपचारिकी वनसेनादिवुद्धिवदेव । अत्राह - यदि वर्णा एव सामस्त्येनै बुद्धिविषयतामापद्यमानाः पदं स्युस्ततो जारा - राजा कपिः पिक इत्यादिषु पदविशेषप्रतिपत्तिर्न स्यात् । त एव हि वर्णा इतरत्र चेतरत्र च प्रत्यवभासन्त इति । अत्र वदामः - सत्यपि समस्तवर्णप्रत्यवमर्शे यथा क्रमानुरोधिन्य एव पिपीलिकाः पंक्तिबुद्धिमारो-हन्ति एवं क्रमानुरोधिन एव वर्णाः पदबुद्धिमारोक्ष्यन्ति । तत्र वर्णानामविशेषेऽपि क्रम-विशेषकृता पदविशेषप्रतिपत्तिर्न विरुध्यते । वृद्धव्यवहारे चेमे वर्णाः क्रमाद्यनुगृहीता गृही-वर्ण विषयक है अर्थान्तर ( स्फोट ) विषयक नहीं है । भला यह कैसे ज्ञात हो? तो ऐसे ज्ञात होगा कि इस बुद्धिमें मी गकारादि वर्णोंकी ही अनुवृत्ति होती है दकारादिको नहीं । यदि इस बुद्धिका गका-रादिसे भिन्न स्फोटरूप अर्थ विषय होगा तो दकारादिके समान गकारादि मी उस बुद्धिसे व्यावृत्त हो जायेंगे अर्थात् जैसे पूर्व कार विषयक बुद्धिमें दकारादि विषयक अनुवृत्ति नहीं होती, वैसे स्फोट विषयक बुद्धि में गकारादिकी भी अनुवृत्ति नहीं होगी, किन्तु ऐसा होता नहीं है । इसलिए यह एक बुद्धि वर्ण विषयक ही स्मृति है । किञ्च यह जो कहा गया है कि वर्णोंके अनेक होने से उनमें एक बुद्धिकी विषयता उपपन्न नहीं होती, तो इसके विषय में हम कहते हैं - अनेक भी एक बुद्धिके विषय हो सकते हैं, जैसे पंक्ति, वन, सेना, दश, शत, सहस्र इत्यादि स्थलों में एक बुद्धि विषयता देखी जाती है । ' गौ ' यह एक शब्द, ऐसी जो बुद्धि है वह वन, सेना आदि बुद्धि के समान बहुत वर्षों में एकार्थ-बोधक सम्बन्धसे औपचारिकरूपसे प्रयुक्त होती है | स्फोटवादी यहाँ कहते हैं - यदि वर्णं हीं सब मिलकर एक बुद्धिकी विषयताको प्राप्त होकर पद बनते हों तो जारा, राजा, कपि, पिक इत्यादिमें पद विशेषकी प्रतीति नहीं होगो, क्योंकि वे ही वर्णं इधर उधर प्रत्यवभासित होते हैं । इसपर हम कहते हैं -- शब्दमें सब वर्णोंका प्रत्यवमर्श - स्मृति होनेपर भी जैसे क्रमके अनुसार ही पिपीलिकाओंमें ( चींटियोंमें ) पंक्ति बुद्धि होती है, वैसे ही क्रमके अनुसार वर्णं मी पदबुद्धि में आरूढ़ होते हैं । वर्णोंके अभिन्न होनेपर भी क्रम विशेष कृत पद विशेषकी प्रतीति विरुद्ध नहीं होती । क्रम आदिके अनुसार गृहीत उन वर्णोंका वृद्धव्यवहारमें ( शक्तिग्रहदशा में ) भिन्न - भिन्न अर्थों के साथ सम्बन्ध सत्यानन्दी - दीपिका है वह ज्ञान उसमें प्रमाण होता है । यह ' गो ' है, इस एक बुद्धिमें वर्ण ही प्रतीत होते हैं स्फोट नहीं । इसलिए स्फोट माननेमें कोई प्रमाण नहीं । अतः पद वर्णरूप है, स्फोटरूप नहीं । * अनेक वर्ण एक बुद्धिके विषय होते हैं, अब इसको स्पष्ट करते हैं - जिसकी एक अर्थमें शक्ति हो वह एक पद कहा जाता है, जैसे राम । एक प्रधानार्थ में जिसका तात्पर्य हो वह एक वाक्य होता है, जैसे ' रामम् आनय ' ( रामको ले आओ ) । इसप्रकार अनेक वर्णों तथा अनेक पदोंका एक अर्थके साथ सम्बन्ध होनेसे अनेक में एकत्का उपचार होता है अर्थात् यद्यपि वर्ण अनेक हैं तो मी एकार्थ वोधकत्वरूप उपाधिको लेकर उनमें एक पदत्व व्यवहार उनचारसे होता है । यथा गौ, वन, सेना आदि ऐसे लोकमें अनेक उदाहरण मिलतें हैं । * क्रमशः संमिलित वर्णं इस प्रकार एकार्थकी प्रतीति कराते हैं - व्युत्पत्ति ' दशामें बालक
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२५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० ३ तार्थविशेषसंबन्धाः सन्तः स्वव्य वह ( रे ऽप्येकै कवर्णग्रहणानन्तरं समस्त प्रत्यवमर्शिन्यां बुद्धौ तादृशा एव प्रत्यवभासमानास्तं तमर्थमव्यभिचारेण प्रत्याययिष्यन्तीति वर्णवादिनो लघी-यसी कल्पना; स्फोटवादिनस्तु दृष्टहानिरदृष्टकल्पनाच, वर्णाश्चेमे क्रमेण गृह्यमाणाः स्फोटं व्यञ्जयन्ति स स्फोटोऽर्थं व्यनक्तोति गरीयसी कल्पना स्यात्, अथापि नाम प्रत्युच्चारण-मन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि प्रत्यभिज्ञालम्बनभावेन वर्णसामान्यानामवश्याभ्युपगन्तव्य-त्वाद्या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता सा सामान्येषु संचारयितव्या । ततश्च नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यविरुद्धम् ॥ २८ ॥
अत एव च नित्यत्वम् ॥ २ ९ ॥ पदच्छेद - अतः, एव, च, नित्यत्वम् । सूत्रार्थ - ( अतएव च ) और देव आदि समस्त जगत् वेद शब्दोंसे उत्पन्न होनेके कारण ( नित्यत्वम् ) वेदमें नित्यत्व है अर्थात् वेद नित्य है । स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिभिः स्थिते वेदस्य नित्यत्वे देवादिव्यक्तिप्रभवाभ्युपगमेन तस्य विरोधमाशङ्कय ' अतः प्रभवात् ' इति परिहृत्येदानीं तदेव वेदनित्यत्वं स्थितं द्रढयति-ग्रहण किया जाता है, अतः अपने मध्यम व्यवहारमें भी एक एक वर्णका ग्रहण होनेपर समस्त वर्णोंको विषय करनेवाली बुद्धि में वैसे ही अवभासित हुए उस उस अर्थको अव्यभिचाररूपसे ज्ञान कराते हैं, इसप्रकार वर्णवादीको कल्पनामें लाघव है । स्फोटवादीको तो दृष्ट हानि और अदृष्टकल्पना होगी । क्रमसे ग्रहण किए हुए वे वर्ण स्फोटको व्यक्त करते हैं, वह स्फोट अर्थको व्यक्त करता है, इसप्रकार कल्पना गौरव है । यदि यह मान लें कि प्रत्येक उच्चारण में भिन्न - भिन्न वर्ण होते हैं तो भी प्रत्यभिज्ञा-के आधाररूपसे वर्णगत जातियोंको अवश्य स्वीकार्य होनेसे वर्णोंमें जो अर्थ प्रतिपादन प्रक्रिया रची गई है, उसका वर्णगत जातियोंमें संचार करना चाहिए । इस कारण नित्य शब्दोंसे देव आदि व्यक्तियोंकी उत्पत्ति होती है, अतः कोई विरोध नहीं है ॥ २८ ॥
[ वेदापौरुषेयत्वाधिकरण में ] वेदके स्वतन्त्र कर्ताके स्मरण आदि न होनेसे वेदमें नित्यत्व सिद्ध होनेपर देव आदि व्यक्तियोंका प्रभव स्वीकार करनेसे [ देव आदिके वाचक इन्द्र आदि शब्दोंकी मी उत्पत्ति माननी पड़ेगी ] वेदमें नित्यत्व अयुक्त है, इस विरोधकी आशङ्काको ' अतः प्रभवात् ' इस ' सत्यानन्दी -दीपिका ' गामानय ' ( गौ ले आओ ) इस वृद्ध व्यवहारको देखकर ' गाम् ' इस उच्चारण क्रमसे उपलब्ध क्रमका वर्णोंमें आरोप कर ये वर्ण जब इस क्रमले ' गा, म, आ, न, य ' इस प्रकार ही हों, तो इस अर्थंके वाचक हो सकते हैं । इस प्रकार अर्थ सम्बन्ध आदि रूपसे ज्ञात हुए वर्णं श्रोताके प्रवृत्तिकालमें और इस प्रकार स्मृतिमें आरूढ होकर अपने - अपने अर्थका बोध कराते हैं । इस प्रकार वर्णवादी के मतमें महान् लाघव है 1 । और स्फोटवादीके मतमें दृष्टहानि - वर्ण अर्थके बोधक हैं, इसका त्याग और अदृष्ट - स्फोट अर्थका बोधक है यह अदृष्ट कल्पना है । अभी तक तो वर्णोंको नित्य स्वीकार कर स्फोटका खण्डन किया गया । अब वर्णोंको अनित्य स्वीकार कर तर्कसे स्फोटका खण्डन ' अथापि ' इत्यादि भाष्यसे करते हैं । नित्य तथा क्रम विशेषवाले तथा गृहीत संगतिवाले अर्थके बोधक जो निश्चित गोत्व आदि सामान्य हैं, उन सामान्यों में भी वर्णगत प्रक्रियाका संचार करना चाहिए । किन्तु अनिश्चित स्फोटकी कल्पना युक्त नहीं है । इस प्रकार वर्ण नित्य और वाचक सिद्ध होनेपर नित्य शब्दोंसे देवादि व्यक्तियोंकी उत्पत्ति सर्वथा अविरुद्ध है ॥ २८ ॥
* ‘ अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामगेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुरा विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राणि ' ( वृ ० २।४।१० ) ( याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी! ये जो ऋग्वेद,
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अधि ० ८ सू ० ३० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २५० अतएव च नित्यत्वमिति । अतएव नियताकृतेदेवादेर्जगतो वेदशब्दप्रभवत्याद्वेदशब्दे नित्य-त्वमपि प्रत्येतव्यम् । तथा च मन्त्रवर्णः - ' यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम् ' ( ऋ ० सं ० १०।७१।३ ) इति स्थितामेव वाचमनुविन्नां दर्शयति । वेदव्यासश्चैवमेव स्मरति-' युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा ' इति ॥ २ ९ ॥ समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्स्मृतेश्व ॥ ३० ॥
पदच्छेद - समाननामरूपवात्, च, आवृत्ती, अपि, अविरोधः, दर्शनात्, स्मृतेः, च । सूत्रार्थ - ( आवृत्तावपि ) सृष्टि और प्रलयकी आवृत्ति होनेपर भी ( अविरोधः ) शब्द और अर्थ सम्बन्ध में अनित्यतारूप विरोध नहीं है, ( समाननामरूपत्वाच्च ) क्योंकि उत्तर - कल्पप्रपञ्च पूर्वकल्प प्रपञ्चके समान नाम रूप वाला है । कैसे? ( दर्शनात् ) ' धाता यथापूर्व मकल्पयत् ' इत्यादि श्रुति और ( स्मृतेः ) ' यथातुंष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ' इत्यादि स्मृति हैं । अथापि स्यात् - यदि पश्वादिव्यक्तिवद्देवादिव्यक्तयोऽपि संतत्यैवोत्पद्येर न्निरुध्येरंश्च ततोऽभिधानाभिधेयाभिधातृव्यवहाराविच्छेदात्संबन्धनित्यत्वेन विरोधः शब्दे परिहियेत । यदा तु खलु सकलं त्रैलोक्यं परित्यक्तनामरूपं निर्लेपं प्रलीयते, प्रभवति चाभिनवमिति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति तदा कथमविरोध इति? तत्रेदमभिधीयते - समाननामरूपत्वा-दिति । तदापि संसारस्यानादित्वं तावदभ्युपगन्तव्यम् । प्रतिपादयिष्यति चाचार्यः संसार-स्यानादित्वम् –'उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ' ( ब्र ० २।१।३६ ) इति । अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः प्रलयप्रभवश्रवणेऽपि पूर्वप्रबोधवदुत्तरप्रबोधेऽपि व्यवहारान्न कश्चिद्विरोधः, सूत्रसे परिहारकर अब पूर्व सिद्ध उसी वेद नित्यत्वको ' अतएव च नित्यत्वम् ' इससे दृढ करते हैं । इसीसे नियत आकृति विशिष्ट देव आदि जगत्को वेदशब्दसे उत्पत्ति होनेके कारण वेदशब्द में नित्यत्व समझना चाहिए । तथा ‘ यज्ञेन वाच: ० ' ( पूर्व सुकृत पूण्य कर्म से वेदके लाभकी योग्यताको प्राप्त हुए याज्ञिक पुरुषोंने ऋषियोंमें स्थित उस वेदमयी वाणीको प्राप्त किया ) यह मन्त्र पूर्वकल्प सिद्ध वेदमयी वाणीकी उपलब्धि दिखलाता है । भगवान् वेदव्यास भी ऐसा ही कहते हैं - ' युगान्ते ' ( अवान्तर प्रलय के अनन्तर महर्षियोंने ब्रह्माकी अनुज्ञा पाकर युगके अन्तमें तिरोभूत इतिहास सहित वेदोंको तपसे प्राप्त किया ) यह स्मृति भी है ॥ २ ९ ॥ किञ्च ऐसा होता हुआ भी यदि पशु आदि व्यक्तियोंके समान देवादि व्यक्तियोंके मी सन्तत जन्म और विनाश होते तो नाम, विषय, वक्ता के व्यवहारका विच्छेद न होनेके कारण सम्बन्ध नित्य रहने से शब्द में विरोधका परिहार हो जाता, परन्तु जब श्रुतियाँ और स्मृतियाँ उद्घोषित करती हैं कि सम्पूर्ण त्रैलोक्य नाम रूपका परित्याग कर समूल नष्ट हो जाता है और फिर नवीन उत्पन्न होता है, तब अविरोध कैसे? इसके उत्तर में यह कहते हैं — तो भी संसारको अनादि मानना चाहिए, क्योंकि ' समाननामरूपत्वात् ' इत्यादि कहा है 1 । और आचार्य - ' उपपद्यते ' इस सूत्र से संसार में अनादित्वका प्रतिपादन करेंगे 1 । संसारको अनादि माननेपर सुषुप्ति और जाग्रत् में उत्पत्ति और प्रलयके श्रवण होनेपर भी जैसे पूर्व प्रबोधके समान उत्तर जाग्रत अवस्था में व्यवहार होने से कोई विरोध नहीं होता, वैसे पूर्व कल्पके लय और उत्तरकल्पके उत्पत्ति में भी वैदिक नित्यतामें कोई विरोध नहीं है, ऐसा समझना सत्यानन्दी -दीपिका यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक - ब्राह्मणमन्त्र सब इसी परमात्मा के निःश्वास हैं ) इत्यादि श्रुतिके पर्यालोचनसे यह स्पष्ट होता है कि आकाश आदिके समान वेदको परमेश्वर सृष्ट मानने पर भी वेदके नित्यत्वमें कोई विरोध नहीं है ॥ २ ९ ॥
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२५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ एवं कल्पान्तरप्रभवप्रल्ययोरपीति द्रष्टव्यम् । स्वापप्रबोधयोश्च प्रलयप्रभवौ श्रूयेते- ' यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहायेति श्रोत्रं सर्वैः शब्दः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्टेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः ( कौ ० ३।३ ) इति । स्थादेतत् - स्वापे पुरुषान्तरव्यवहाराविच्छे-दात्स्वयं च सुप्तप्रबुद्धस्य पूर्वप्रबोधव्यवहारानुसंधान संभवादविरुद्धम् । महाप्रलये तु सर्व-व्यवहारोच्छेद्राजन्मान्तरव्यवहारवच्च कल्पान्तरव्यवहारस्यानुसंधातुमशक्यत्वाद्वैषम्य-मिति । नैष दोषः; सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेश्वरानुग्रहादीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तेः । यद्यपि प्राकृताः प्राणिनो न जन्मा-न्तरव्यवहारमनुसंधाता दृश्यन्त इति, तथापि न प्राकृतवदीश्वराणां भवितव्यम् । यथा हि प्राणित्वाविशेषेऽपि मनुष्यादिस्तम्ब पर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्यादिप्रतिबन्धः परेण परेण भूयान्भवन् दृश्यते, तथा मनुष्यादिष्वेव हिरण्यगर्भपर्यन्तषु ज्ञानैश्वर्याद्यभिव्यक्तिरपि परेण परेण भूयसी चाहिए ' यदा सुप्तः ० ' ( जब वह सुप्त पुरुष किसी मो स्वप्नको नहीं देखता तब वह उस प्राणरूप परमात्मामें एक हो जाता है अर्थात् अभिन्नरूपसे प्राप्त हो जाता है । तब सब नामोंके साथ वाणी मी उसमें लीन हो जाती है, नेत्र सब रूपोंके साथ उसमें लीन हो जाता है, श्रोत्र सब शब्दों के साथ उसमें लीन हो जाता है, मन सब संकल्पोंके साथ उसमें लीन हो जाता है, जब वह जागता है तब जलती हुई अग्निसे जैसे चिनगारियाँ सब दिशाओंमें फैलती हैं, वैसे इस आत्मासे सब इन्द्रियरूप प्राण अपने - अपने गोलकरूप स्थानोंको प्राप्त होते हैं । इन्द्रियोंके अनन्तर सूर्यादि देवता और देवताओंके अनन्तर विषयरूप लोक प्रकट होते हैं ) इसप्रकार श्रुतिमें सुषुप्ति और जाग्रत् अवस्थामें जगत्के प्रलय और उत्पत्ति कहे गए हैं । यह ठीक है, परन्तु सुषुप्तिमें अन्य पुरुषोंका व्यवहार विच्छिन्न न होनेके कारण सुषुप्ति से प्रबुद्ध पुरुषको स्वयं पूर्व जाग्रत् अवस्थाके व्यवहारका अनुसन्धान हो सकता है, इसलिए कोई विरोध नहीं है । किन्तु महाप्रलय में तो सब व्यवहारोंका उच्छेद हो जानेसे जन्मान्तर व्यवहारके समान कल्पान्तर व्यवहारका अनुसन्धान नहीं हो सकता, इसलिए ( दृष्टान्त और दान्तिक में ) विषमता है । यह दोष नहीं है । सर्वव्यवहार के उच्छेद करनेवाले महाप्रलयके होनेपर भी परमेश्वरके अनुग्रहसे हिरण्यगर्भादि ईश्वरोंको कल्पान्तरके व्यवहारका अनुसन्धान ( स्मरण ) हो सकता है । यद्यपि प्राकृत प्राणी जन्मान्तरके व्यवहारोंका अनुसन्धान करते हुए नहीं देखे जाते, तो भी ईश्वरोंको उन प्राकृत प्राणियोंके समान नहीं समझ लेना चाहिए । जैसे प्राणित्व समान होनेपर भी मनुष्यत्वादिसे लेकर स्तम्भ ( वृक्षादि ) पर्यन्त प्राणियोमें ज्ञान ऐश्वर्यादिका प्रतिबन्ध उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ देखा जाता है, वैसे मनुष्यादिसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त ज्ञान, ऐश्वर्य आदिकी अभिव्यक्ति उत्तरोत्तर अधिक सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि महाप्रलयमें अन्तःकरणादि स्थूलरूपसं विद्यमान नहीं होते, तो भी सूक्ष्म वासनारूपसे अविद्या में तो विद्यमान रहते ही हैं, अतः पूर्व वासनाके बलसे ईश्वरेच्छासे सम्पूर्ण जगत् पूर्वं कल्पके सदृश नाम रूपात्मक ही उत्पन्न होता है, अतएव शब्दादिमें अनित्यत्व सम्भव नहीं । अभिव्यक्त पदार्थ पूर्वकल्प के समान नामरूपात्मक होते हैं । इसलिए किसी पुरुषके संकेतकी अपेक्षा नहीं । यद्यपि विषम-सृष्टिमें संकेतकी आवश्यकता होती है, तो भी समान सृष्टिमें उसकी कोई अपेक्षा नहीं । महासर्ग तथा महाप्रलय स्वीकार करनेपर भी संसार प्रवाहरूपसे अनादि ही स्वीकार्य है । जैसे जाग्रत् के संस्कार सुषुप्ति के अनन्तर स्मरणको उत्पन्न करते हैं, वैसे पूर्व कल्पके संस्कार महाप्रलय के अनन्तर भी स्मरणको उत्पन्न करते हैं । तदनुसार सृष्टिका आरम्भ होता है । इसमें कोई विरोध नहीं है ।