श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 291–300
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 291–300
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अधि ० ८ सू ० ३० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २५७ भवतीत्येतद्युतिस्मृतिवादेवसकृदनुश्रूयमाणं न शक्यं नास्तीति वदितुम् । ततश्चातीत-कल्पानुष्ठितप्रकृष्टज्ञान कर्मणामीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां वर्तमानकल्पादौ प्रादुर्भवतां परमेश्वरानुगृहीतानां सुप्तप्रतिबुद्धवत्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तिः । तथा च श्रुतिः-' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षु शरणमहं प्रपद्ये ' ( श्वे ० ६ १८ ) इति । स्मरन्ति च शौनकादयः ' मधुच्छन्द प्रभृतिभिर्ऋषिभि-दशतय्यो दृष्टाः ' इति । प्रतिवेदं चैवमेव काण्डर्ष्यादयः स्मर्यन्ते । * श्रुतिरप्युबिज्ञानपूर्वकमेव मन्त्रेणानुष्ठानं दर्शयति- ' यो ह वा अविदितार्षेय च्छन्दोदैवत नाह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वच्र्च्छति गर्तं वा प्रतिपद्यते ' ( सर्वानु ० परि ० ) इत्युपक्रम्य ' तस्मादेतानि मन्त्रे मन्त्रे विद्यात् ' इति । प्राणिनां च सुखप्राप्तये धर्मो विधीयते । दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते । दृष्टानुश्रवि सुखदुःखविषयौ च रागद्वेषौ भवतः, न विलक्षणविषयावित्यतो धर्माधर्मफल-भूतोत्तरा सृष्टिर्निष्पद्यमाना पूर्वसृष्टिसदृश्येव निष्पद्यते । स्मृतिश्च भवति - ' तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्य ं प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ हिंस्राहिंत्रे मृदुक्रूरे धर्मा-होती है । ऐसा श्रुति और स्मृतिके वचनोंसे वार वार सुना हुआ है । वह नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते । इसलिए अतीत कल्पमें जिन्होंने सर्वोत्तम ज्ञान और [ आधानसे लेकर अश्वमेध पर्यन्त ] कर्मोंका अनुष्ठान किया है और वर्तमान कल्पके प्रारम्भमें जो प्रादुर्भूत हुए हैं तथा परमेश्वरसे अनुगृहीत हुए हिरण्यगर्भादि ईश्वरोंको सुषुप्तिसे जागे पुरुषके समान पूर्वकल्पके व्यवहारोंका अनुसन्धान होना युक्त है । क्योंकि ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व ० ' ( जो सृष्टिके आरम्भ में ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो उसकी बुद्धिमें वेदोंका आविर्भाव करता है अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ ) ऐसी श्रुति है । और ' मधुच्छन्दः प्रभृतिभि ० ' ( मधुच्छन्द आदि ऋषियोंने + दस मण्डलवाले ऋग्वेदकी ऋचाएँ देखीं ) इसप्रकार शौनकादि ऋषि भी कहते हैं । तथा बोधायन आदि ऋषियोंने भी प्रत्येक वेदमें काण्ड आदिके द्रष्टा ऋषियोंका स्मरण किया है । ' यो हवा अविदिता ० ' ( जिस मन्त्रके छन्द, ऋषि, देवता तथा विनियोगका ज्ञान नहीं है उससे जो यज्ञ कराता है या अध्यापन करता है वह स्थाणु हो जाता है अथवा नरकको प्राप्त होता है ) ऐसा उपक्रम कर ' तस्मादेतानि ० ' ( इसलिए प्रत्येक मन्त्रमें ऋषि आदिको जाने ) इस प्रकार श्रुति भी ऋषिज्ञानपूर्वक ही मन्त्रसे अनुष्ठान दिखलाती है । प्राणियोंके सुखकी प्राप्तिके लिए धर्मका विधान है और दुःख परिहार के लिए अधर्मका प्रतिषेध है । ऐहिक और पारलौकिक सुख दुःख विषयक राग और द्वेष होते हैं, अन्य विषयोंमें नहीं होते । इसलिए धर्म और अधर्मके फलभूत उत्पन्न हुई उत्तरोत्तर सृष्टि पूर्वसृष्टि के सदृश ही निष्पन्न होती है । ' तेषां ये ० ' ( प्राणियों में से जिन प्राणियोंने जो जो कम प्रथम सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वं कल्पमें उत्तमज्ञान और उत्तम कर्मों के अनुष्ठानके आधार पर जिस - जिस पर परमेश्वर का अनुग्रह होता है उस उसको उतना उतना अधिक ज्ञान और ऐश्वर्य आदि प्राप्त होते हैं इसमें किसी प्रकार के सन्देहका अवकाश नहीं है । इसमें उद्धृत श्रुति स्मृति भी प्रमाण हैं । सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भ में पूर्वं कल्प के समस्त संस्कार जाग्रत् होते हैं जिससे वह उत्तर कल्पकी सृष्टि करनेमें समर्थ होता है । + ऋक् संहिता शाकल और शष्कल भेदसे दो प्रकार की है । उसमें दस मण्डल हैं । इस-लिए उसको दशतय्य कहते हैं । इसमें पठित ऋचाओं को दाशतय्य कहा जाता है । ऋक् संहिताका दूसरा नाम अष्टक भी है, क्योंकि इसमें मण्डल दस हैं और अष्टक आठ हैं ।
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२५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ धर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ ' इति । प्रलीयमानमपि चेदं जगच्छ-क्त्यवशेषमेव प्रलीयते । शक्तिमूलमेव च प्रभवतिः इतरथाऽऽकस्मिकत्वप्रसङ्गात् । * न चानेकाकाराः शक्तयः शक्याः कल्पयितुम् । ततश्च विच्छिद्य विच्छिद्याप्युद्भवतां भूरादि-लोकप्रवाहाणां देवतिर्यङ्मनुष्यलक्षणानां च प्राणिनिकाय प्रवाहाणां वर्णाश्रमधर्मफलव्यव स्थानां चानादौ संसारे नियतत्वमिन्द्रियविषय संबन्धनियतत्ववत्प्रत्येतव्यम् । न हीन्द्रिय-विषयसंबन्धादेर्व्यवहारस्य प्रतिसर्गमन्यथात्वं षष्ठेन्द्रियविषयकल्पं शक्यमुत्प्रेक्षितुम् । अत सर्वकल्पानां तुल्यव्यवहारत्वात्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानक्षमत्वाच्चेश्वराणां समाननामरूपा एव प्रतिसर्ग विशेषाः प्रादुर्भवन्ति । समाननामरूपत्वा वृत्तावपि महा-सर्गमहाप्रलयलक्षणायां जगतोऽभ्युपगम्यमानाया न कश्चिच्छन्दप्रामाण्यादिविरोधः । समाननामरूपतां च श्रुतिस्मृती दर्शयतः - ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' ( ऋ ० सं ० १० १ ९ ० । ३ ) इति । यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सूर्याचन्द्रमःप्रभृति जगत्क्लुप्तं तथास्मिन्नपि कल्पे परमेश्वरोऽकल्पयदित्यर्थः । * तथा ' अग्निर्वा अकामयत । सृष्टिमे किये उन कर्मोंको वे पुनः पुनः उत्पन्न होकर प्राप्त करते हैं ) ' हिंस्राहिंखे ० ' ( हिंसा अहिंसा, मृदु क्रूर, धर्मं अधर्म, सत्य असत्य इत्यादि धर्मोसे भावित हुए उत्पन्न होकर उन्हीं को प्राप्त करते हैं और वे ही उनको रुचिकर होते हैं ) ऐसी स्मृति भी है । प्रलीयमान होता हुआ भी यह जगत् शक्ति अवशिष्ट प्रलीन होता है, फिर शक्ति से ही उत्पन्न होता है अन्यथा जगत् में अकारणत्व प्रसङ्ग उपस्थित होगा । अविद्यारूप उपादान कारणमें लीन, कार्यरूप संस्कारसे भिन्न अनेक प्रकारकी शक्तियों-की कल्पना नहीं कर सकते [ क्योंकि ऐसी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है ] इसलिए पृथक् - पृथक् उत्पन्न होनेवाले भू आदि लोकप्रवाह और देव, पशु, मनुष्यरूप प्राणी समूहका प्रवाह, वर्ण, आश्रम, धमं और फलकी व्यवस्थाओंका नियतत्व अनादि संसारमें विषयेन्द्रिय सम्बन्धके नियतत्व के समान समझना चाहिए । छठी इन्द्रिय ( मन ) के विषयके समान प्रत्येक सृष्टिमें इन्द्रिय विषय सम्बन्ध आदि व्यवहारके भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती । इस कारण सब कल्पों में तुल्य व्यवहार होनेसे और हिरण्यगर्भ जादि ईश्वरोंको अन्य कल्पके व्यवहारका अनुसन्धान करनेमें समर्थ होनें से प्रत्येक सृष्टिमें समान नाम रूपवाले भिन्न - भिन्न व्यक्ति प्रादुर्भूत होते हैं । नाम और रूपके समान होनेसे जगत् की महासृष्टि और महाप्रलयरूप आवृत्ति स्वीकार करनेपर भी शब्द प्रामाण्यादिमें कोई विरोध नहीं है | श्रुति और स्मृति भी सब कल्पों में नामरूपकी समानता दिखलाती हैं - ' सूर्याचन्द्रमसौ ० ' ( ब्रह्माने पूर्वकल्प के समान ही सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्गकी रचना की ) पूर्वकल्प में सूर्य चन्द्रमा आदि जगत्को जैसो कल्पनाकी थी, वैसी इस कल्पमें भी परमेश्वरने उनकी कल्पना की । ऐसा अर्थ है । इसप्रकार ' अग्निर्वा अकामयत ० ' ( यजमानने कामनाको कि मैं देवोंके मध्यमें अन्न सत्यानन्दी- दीपिका * यहाँ विलयका अर्थ नाश नहीं है, किन्तु कारणरूपसे विद्यमानता और कार्यरूपसे लीन होना है, इसलिए संस्कारके बलसे ही पुरुषको पुण्य पाप रुचिकर होते हैं । यदि संस्कारका मी नाश मानें तो जगत्में सुख दुःख आदिको जो विचित्रता प्रतीत होती है वह विना कारणके ही होगी । इससे कृतहान - अकृतभ्यागम दोष भी प्रसक्त होगा । * ब्रह्माकी सुषुप्ति अवस्थाको अवान्तर प्रलय कहते हैं । ब्रह्माकी पूर्ण आयुकी समाप्ति होनेको महाप्रलय कहा जाता है । महाप्रलय के अनन्तर जो नवीन सृष्टि उत्पन्न होती है वह महासर्ग है । इसप्रकार जगत् की वारम्वार आवृत्ति होनेपर भी वेद निष्ठ स्वतः प्रमाण्यका विरोध नहीं है । * इस पूर्वोक्त रीतिसे पूर्वसृष्टिके समान यह नवीनसृष्टि भी उत्पन्न होती है । इससे सिद्ध हुआ
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अधि ० ८ सू ० ३१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित अन्नादो देवानाँ स्यामिति । स एतमनये कृत्तिकाभ्यः पुरोडाशमष्टाकपालं निरवपत् ' ( तै ० ब्रा ० ३ | १ | ४ | १ ) इति नक्षत्रेष्टिविधौ योऽग्निर्निरवपद्यस्मै वाऽग्नये निरवपत्तयोः समाननाम-रूपतां दर्शयतीत्येवंजातीयका श्रुतिरिहोदाहर्तव्या । स्मृतिरपि - ' ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः । शर्वर्यन्ते प्रसूवानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ॥ यथावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ यथाभिमानिनोऽतीतास्तुल्यास्ते सांप्रतैरिह | देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च ॥ ' इत्येवंजातीयका द्रष्टव्या ॥ ३० ॥
मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ ३१ ॥
पदच्छेद - मध्वादिषु, असंभवात्, अनधिकारम्, जैमिनिः । सूत्रार्थ - ( मध्वादिषु ) ' असो वा आदित्यो देवमधु ' इत्यादि मनुष्याधिकारक मध्वादि उपासनाओंमें ( असंभवात् ) देवादिके अधिकारका असंभव होनेसे ( अनधिकारम् ) ब्रह्मविद्या में भी देवादिका अधिकार नहीं है, ( जैमिनिः ) ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं । * इह देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामस्त्यधिकार इति यत्प्रतिज्ञातं तत्पर्यावर्त्यते । देवादीनामनधिकारं जैमिनिराचार्यो मन्यते । कस्मात्? मध्वादिष्वसंभवात् । ब्रह्मविद्याया-मधिकाराभ्युपगमे हि विद्यात्वाविशेषान्मध्वादिविद्या स्वप्यधिकारोऽभ्युपगम्येत । न चैवं संभवति । कथम्? ' असौ वा आदित्यो देवमधु ' ( छा ० ३ | १ | १ ) इत्यत्र मनुष्या आदित्यं मध्वध्यासेनोपासीरन् । देवादिषु ह्युपासकेष्वभ्युपगम्यमानेष्वादित्यः कमन्यमादित्यमुपा-भक्षक अग्निरूप होऊं । उसने कृत्तिका नक्षत्रोंके अभिमानी अग्निके लिए आठ कपालोंमें बनाया गया पुरोडाश ( हविष्य ) अर्पण किया ) यह श्रुति नक्षत्रेष्टि विधिमें जिस यजमानरूप अग्निने जिस अग्निके लिए हविष्य अर्पण किया उन दोनोंके नामरूपकी समानताको दिखलाती है और यहाँ इस प्रकारकी श्रुतियोंको उदाहरणरूपसे समझना चाहिए । ' ऋषीणां ० ' ( पूर्वकल्पमें जो - जो ऋषियोंके नाम थे और जो जो वेद बिषयक दृष्टि थी प्रलयके अन्तमें पुनः उनके उत्पन्न होनेपर ब्रह्माने उन्हीं नामों और शक्तियों को उन ऋषियोंको दिया । जैसे वसन्त आदि भिन्न - भिन्न ऋतुओं में भिन्न - भिन्न उनके नवपल्ल-वादि चिह्न होते हैं और वे उन ऋतुओंके आनेपर फिर दिखाई देते हैं, वैसे ही सृष्टिके आदिमें पदार्थं दिखाई देते हैं । चक्षु आदि इन्द्रियोंके अभिमानीजो अतीत कल्प में देवता थे उनके समान इसी कल्पमें भी वही सूर्य आदि देवता हैं । और अतीत देवताओंके नामरूपके समान ही उनके नामरूप भी हैं ) इसप्रकारकी स्मृति भी नामरूपकी समानतामें प्रमाणरूपसे समझनी चाहिए ॥ ३० ॥
यह जो प्रतिज्ञा की गई है कि यहाँ ब्रह्मविद्यामें देवादिका भी अधिकार है, उस पर आक्षेप करते हैं । जैमिनि आचार्यका मत है कि देव आदिका ब्रह्मविद्यां में अधिकार नहीं है, किससे? इससे कि मधु आदिमें उनके अधिकारका संभव नहीं है । ब्रह्मविद्यामें उनका अधिकार स्वीकार करनेपर विद्यात्व दोनों में समान होनेके कारण मधु आदि विद्याओं में भी उनका अधिकार मानना पड़ेगा । परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि ' असौ वा आदित्यो ० ' ( निश्चय यह आदित्य देवोंका मधु है ) इसमें मधुके अध्याससे आदित्यको मनुष्य उपासना करें । परन्तु देव आदिको उपासकरूपसे स्वीकार किये जानेपर आदित्य किस अन्य आदित्यकी उपासना करे? और आदित्यके आश्रित रोहित आदि पाँच किरण सत्यानन्दी - दीपिका कि जन्म और मरणवाले शरीरके अङ्गीकार करनेपर भी देधादिका कर्म और शब्दमें विरोध नहीं है अर्थात् नित्य वेदसे अनित्य देवादि व्यक्तियों की उत्पत्ति माननेपर भी वेदमें नित्यत्वका विरोध नहीं है || ३० || * सूर्यको मधुका रूपक बतलाते हैं - चारों वेदों में प्रतिपादित चार प्रकारके कर्म और प्रणव ये पाँच पुष्प हैं । इन पुष्पोंसे होममन्त्ररूप मधुमक्खियाँ हवन किये गये सोम, घृत आदि पदार्थं रूप
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२६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ सीत? पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य वसवो रुद्रा आदित्या मरुतः साध्याश्च पञ्च देवगणाः क्रमेण तत्तदमृतमुपजीवन्तीत्युपदिश्य स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेत्रैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृष्यति ' इत्यादिना वस्वाद्युपजीव्यान्यमृ-तानि विजानतां वस्त्रादिमहिमप्राप्तिं दर्शयति । * वस्वादयस्तु कानन्यान्वस्वादीनमृतो-पजीविनो विजानीयुः? कं वाऽन्यं वस्वादिमहिमानं प्रप्सेयुः? तथा ' अग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पादः ' ( छा ० ३।१८।२ ), ' वायुर्वाव संवर्ग: ' ( छा ० ४ | ३ | १ ) ‘ आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ’ ( छा ० ३ | ११1१ ) इत्यादिषु देवतात्मोपासनेषु न तेषामेव देवतात्म-नामधिकारः संभवति । तथा ' इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः ' ( बृ ० २: २।४ ) इत्यादिष्वप्यपि संबन्धेषूपासनेषु न तेषामेवर्षीणामधिकारः संभवति ॥ ३१ ॥
कुतश्च देवादीनामनधिकारः-ज्योतिषि भावाच्च ॥ ३२ ॥
पदच्छेद - ज्योतिषि, भावात् " च । सूत्रार्थ - ( ज्योतिषि ) दृश्यमान ज्योतिमण्डलमें ( भावाच्च ) आदित्य शब्दका प्रयोग और आदित्य प्रत्यय होता है । वे मण्डल अचेतन हैं | उनसे भिन्न शरीरादि युक्त चेतन प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे अज्ञात है, इसलिए शरीर रहित होनेके कारण देवतादि ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं । अमृत हैं ऐसा उपक्रम कर वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्य ये पाँच देवगण क्रमसे उस उस अमृतका उपभोग करते हैं ऐसा उपदेश कर ' स य एतदेवममृतं ० ' ( वह जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है अर्थात् उपासना करता है वह वसुओं में से ही कोई एक होकर अग्निरूप मुखसे इसी अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति वसु आदिके उपजीव्य अमृतोंको जाननेवालेके लिए वसु आदिकी महिमाकी प्राप्ति दिखलाती है । यदि वसु आदिको उपासक मानें तो वसु आदि अमृतोपजीवी किन अन्य वसु आदिको जानेंगे? अथवा किन अन्य वसु आदिकी महिमाको प्राप्त करना चाहेंगे? तथा ' अग्निः पादो ० ' ( अग्नि पाद है, वायु पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद है ) ' वायुर्वा संवर्ग: ० ' ( निश्चय वायु संवर्ग है ) ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ० ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा आदेश है ) इत्यादि देव-तात्मक उपासनाओंमें उन्हीं देवताओंका अधिकार सम्भव नहीं है । इसी प्रकार ' इमावेव ' ( ये दोनों [ श्रोत्र ] ही गौतम और भरद्वाज हैं । यही गौतम है और यह दूसरा भरद्वाज है ) इत्वादि ऋषि सम्बन्धी उपासनाओं में उन्हीं ऋषियोंका अधिकार सम्भव नहीं है ॥ ३१ ॥
और किस हेतुसे देवतादिका अनधिकार है? सत्यानन्दी - दीपिका लोहित, शुक्ल, कृष्ण, अतिकृष्ण, गोप्य नामके ये पाँच अमृतोंको होममन्त्रों द्वारा पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊर्ध्वं इन पाँचों दिशाओं में स्थित मधु मक्खियोंके छत्तेके छिद्ररूप सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यमण्डलमें ले जाती हैं; और वहाँ वे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्यं और अन्नरूपमें परिणत होकर पाँच दिशाओं में स्थित वसु आदि देवताओंसे उपजीव्य होते हैं । इस प्रकार सूर्यकी मधुरूपसे उपासना करनी चाहिए | इस प्रकार ध्यान करनेवाले मनुष्यके लिए वसु आदिकी प्राप्ति कहीं गई है । * इस आकाशरूप ब्रह्मके अग्नि आदि चार पाद हैं । इसलिए वायु आदि उपासक नहीं हो सकते, क्योंकि ब्रह्मके पादरूपसे इनकी उपासनाका विधान किया गया है । दो श्रोत्र, दो नेन्न, दो नासिका, . एक वाणि रूप सात इन्द्रियोंमें सप्त ऋषियोंका ध्यान करे । यह दक्षिण श्रोत्र गोतम है और वाम श्रोत्र भरद्वाज है, दक्षिण नेत्र विश्वामित्र है, दक्षिण नासिका वसिष्ठ है, वाम नेत्र जमदग्नि है
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अधि ० ८ सू ० ३२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २६१ * यदिदं ज्योतिर्मण्डलं द्युस्थानमहोरात्राभ्यां बम्भ्रमज्जगदवभासयति, तस्मिन्ना-दित्यादयो देवतावचनाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते । लोकप्रसिद्धेर्वाक्यशेषप्रसिद्धेश्च । न च ज्योति-मण्डलस्य हृदयादिना विग्रहेण चेतनतयाऽर्थित्वादिना वा योगोऽवगन्तुं शक्यते; मृदादि-वदचेतनत्वावगमात् । एतेनाग्न्यादयो व्याख्याताः । स्यादेतत् - मन्त्रार्थवादेतिहासपुराण-लोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमादयमदौष इति, नेत्युच्यते; नहि तावल्लोको नाम किंचित्स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति । प्रत्यक्षादिभ्य एव हाविचारितविशेषेभ्यः प्रमाणेभ्यः प्रसिद्ध एवार्थी लोकात्प्रसिद्ध इत्युच्यते । न चात्र प्रत्यक्षादीनामन्यतमं प्रमाणमस्ति । इतिहास-पुराणमपि पौरुषेयत्वात्प्रमाणान्तरं मूलमाकाङ्क्षति । अर्थवादा अपि विधिनैकवाक्यत्वा-स्तुत्यर्थाः सन्तो न पार्थगर्थ्येन देवादीनां विग्रहादिसद्भावे कारणभावं प्रतिपद्यन्ते । मन्त्रा अपि श्रुत्यादिविनियुक्ताः प्रयोगसमवायिनोऽभिधानार्था न कस्यचिदर्थस्य प्रमाणमित्या-चक्षते । तस्मादभावो देवादीनामधिकारस्य ॥३२ ॥
द्युलोक में स्थित यह जो ज्योतिर्मण्डल दिन रात पुनः पुनः भ्रमण करता हुआ जगत्को ' प्रकाशित करता है उसमें आदित्य आदि देवतावाचक शब्द प्रयुक्त होते हैं, क्योंकि यह लोक प्रसिद्धि और वाक्यशेष प्रसिद्धि है । ज्योतिर्मण्डलका हृदयादि शरीर के साथ अथवा चेतनता और अर्थित्वादिके साथ सम्बन्ध नहीं जाना जा सकता, क्योंकि मृद् आदिके समान वे अचेतन ज्ञात होते हैं । इसी प्रकार अग्नि आदि भी समझ लेने चाहिए । ऐसा ही हो, परन्तु यदि ऐसा कहो कि मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक व्यवहारसे भी यह प्रतीत होता है कि देवादिमें विग्रहवत्त्वादिका ज्ञान होनेसे यह अनधिकाररूप दोष नहीं है, तो इस पर कहते हैं - यह युक्त नहीं है, क्योंकि लोक कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है । जिसके विशेष विषयमें विचार नहीं किया गया है ऐसे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे प्रसिद्ध हुआ अर्थ ही लोकसे प्रसिद्ध होता है ऐसा कहा जाता है । देवताका शरीर होता है इस विषय में प्रत्यक्ष आदिमें से कोई भी प्रमाण नहीं है । इतिहास, पुराण भी पुरुष प्रणीत होनेसे मूलभूत अन्य प्रमाणकी अपेक्षा रखते हैं | अर्थवाद वाक्य भी विधिके साथ एक वाक्यता [ एकार्थं प्रति-पादकता ] के कारण स्तुति अर्थक होकर विधिवाक्यके अर्थसे भिन्न स्वतन्त्ररूपसे देवतादिके शरीरके सद्भावमें कारणत्वको प्राप्त नहीं हो सकते । श्रुति आदि द्वारा विगियोगको प्राप्त हुए वे मन्त्र भी प्रयोगके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अर्थका अभिधान करते हैं, स्वतन्त्ररूपसे किसी अर्थ में प्रमाण नहीं हैं, ऐसा मीमांसक कहते हैं । इसलिए शरीर आदिके अभाव होनेसे ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है ॥ ३२ ॥
सत्यानन्दी -दीपिका और वाम नासिका कश्यप है, वाणी अत्रि है, इस प्रकार अध्यात्मोपासनाओंमें ऋषियोंको ध्येय कहा गया है अर्थात् तत् तत् स्थानमें तत् तत् ऋषिकी उपासना करनेका विधान है । अतः इन उपास्य देवता और ऋषियोंका उक्त उपासनाओं में अधिकार नहीं है ॥ ३१ ॥
* मोमांसक लोग देवताको मन्त्रात्मक मानते । इसलिए शरीर न होने से देवतादिका ब्रह्म-विद्या में अधिकार नहीं है । ' आदित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता ' [ छा ० ३ | ४ | ६ ] ( आदित्य पूर्व दिशामें उदय होता है और पश्चिममें अस्त होता है ) इस मधुविद्या वाक्यशेषमें आदित्य शब्दका प्रयोग जड़ ज्योतिर्मण्डलमें प्रसिद्ध है । अतः शरीर रहित होनेसे शब्दात्मक देवताका विद्यामें अधिकार नहीं । * ‘ वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( हाथमें वज्र लिया हुआ इन्द्र ) इत्यादि मन्त्र हैं । ' सोऽरोदीत ' ( वह अग्नि रोया ) इत्यादि अर्थवाद हैं । ' इष्टान् भोगान् हि वो देवाः दास्यन्ते यज्ञभाविताः । ते तृप्तास्तर्प-यन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः ॥ ' ( यज्ञसे प्रसन्न हुए देवता तुम्हें इष्ट भोग देंगे । तृप्त हुए देवता सब
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२६२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ ३३ ॥
पदच्छेद - भावम्, तु, बादरायणः, अस्ति, हि । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वं पक्षको व्यावृत्तिके लिए है, ( बादरायणः ) बादरायण आचार्यका मत है कि ( भावम् ) शरीरधारी होनेसे देवादिका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है, ( हि ) यतः - क्योंकि ( अस्ति ) उनमें अथित्व आदि अधिकारका कारण है । * तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । बादरायणस्त्वाचार्यो मावमधिकारस्य देवादीनमपि मन्यते । यद्यपि मध्वादिविद्यासु देवतादिव्यामिश्रास्वसंभवोऽधिकारस्यः तथाप्यस्ति हि शुद्धायां ब्रह्मविद्यायां संभवः । अर्थित्वसामर्थ्याप्रतिषेधाद्यपेक्षत्वादधिकारस्य । न च कचिद-संभव इत्येतावता यत्र संभवस्तत्राप्यधिकारोऽपोद्येत । मनुष्याणामपि न सर्वेषां ब्राह्मणा-दीनां सर्वेषु राजसूयादिष्वधिकारः संभवति । तत्र यो न्यायः सोऽत्रापि भविष्यति । ब्रह्मविद्यां च प्रकृत्य भवति दर्शनं श्रौतं देवाद्यधिकारस्य सूचकम् – ' तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् ' ( वृ ० १।४।१० ) इति । ' ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् ' इति । ' इन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवब्राज विरोचनोऽसुराणाम् ' ( छा ० ८/७/२ ) इत्यादि च । स्मार्तमपि गन्धर्वयाज्ञवल्क्यसंवादादि । सूत्रस्य ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । बादरायणाचार्य तो ऐसा मानते हैं कि देवता आदिका भी ब्रह्मविद्या में अधिकार है । यद्यपि देवता आदिसे सम्बन्धित मध्वादि विद्याओंमें उनके अधिकारका असम्भव हैं, तो भी शुद्ध ब्रह्मविद्या में अथित्व, सामर्थ्य, अप्रतिषेध आदिकी अपेक्षासे अधिकारका सम्भव है । यदि कहीं ( मध्वादि विद्या में ) अधिकारका असंभव है तो इतने मात्र से जहाँ ( ब्रह्मविद्या ) सम्भव है वहाँ भी अधिकारका निषेध नहीं हो सकता । मनुष्यों में भी सब ब्राह्मण आदिका सम्पूर्ण राजसूय आदिमें अधिकार सम्भव नहीं है, वहाँ जो न्याय है वह यहाँ भी लागू होगा । ब्रह्म-विद्याको प्रस्तुतकर देवता आदिके अधिकारका सूचक ' तद्यो यो ० ' ( उसे देवोंमेंसे जिस जिसने ( आत्मरूप से ) जाना वही तद्रूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे मी जिस जिसने जाना वह तद्रूप ब्रह्म-रूप हो गया ) और ' ते होचुर्हन्त ० ' ( वे कहने लगे- हम उस आत्मा को जानना चाहते हैं जिसके जानने पर जीव सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है, ऐसा निश्चय कर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा विरोचन ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथमें समिधाएँ लेकर प्रजा-पतिके पास आये ) इत्यादि श्रौत लिङ्गदर्शन भी है । तथा गन्धर्व और याज्ञवल्क्यका संवाद आदि सत्यानन्दी - दीपिका कामनाओंके शुभ फलोंते इसको तृप्त करेंगे ) इत्यादि इतिहास और पुराण वाक्य हैं । इससे देवताओंका शरीर सिद्ध होता है । परन्तु इन मन्त्र अर्थवाद आदिका स्वतन्त्र अर्थ नहीं है, क्योंकि यह सब अर्थवाद आदि वाक्य विधिवाक्योंके अङ्ग होकर प्रशंसा • आदि परक हैं, अतः शरीर न होनेसे देवतादिका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है ॥ ३२ ॥
पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ' ब्रह्मविद्या, देवादीन् नाधिकरोति, विद्यात्वात्, मध्वादि-विद्यावत् ' " ब्रह्मविद्या देवादिको अधिकृत नहीं करतो, विद्या होनेसे मध्वादि विद्याके समान " यह हेतु अप्रयोजक है अर्थात् यह कोई अव्यभिचरित नियम नहीं है कि जिसका कहीं पर अधिकारका असम्भव हो तो सर्वत्र उसका असंभव हो, जैसे कि राजसूय आदि यागोंमें सब ब्राह्मण आदिका अधिकार नहीं है । ' दर्शादिकं न ब्राह्मणमधिकरोति कर्मत्वात् राजसूयादिवत् ' ( दर्शादि कर्म ब्राह्मणको अधिकृत नहीं करते, कर्म होने से, राजसूय आदि कर्मके समान ) जैसे राजसूय आदि कर्म में ब्राह्मणका अधिकार
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अधि ० ८ सू ० ३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २६३ * यदप्युक्तम् - - ' ' ज्योतिषि भावाच्चेति । अत्र ब्रूमः - ज्योतिरादिविषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाश्चेतनावन्तमैश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयन्तिः मन्त्रार्थवादादिषु तथा व्यवहारात् । अस्ति हौश्वर्ययोगाद्देवतानां ज्योतिराद्यात्मभिश्वावस्थातुम्, यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतुं सामर्थ्यम् । तथा हि श्रूयते सुब्रह्मण्यार्थवादे - मेधातिथेर्मेषेति । ' मेधातिथि ह काण्वायनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार ' ( षड्विंश ० ब्रा ० १1१ ) इति । स्मर्यते च - ' - ' आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुम्तीमुपजगाम ह ' इति । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्तेः ' मृदब्रवीदा-पोऽब्रुवन् ' इत्यादिदर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतधातोरादित्यादिष्व चेतनत्वमभ्युपगम्यते । चेतनास्त्वधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादिव्यवहारादित्युक्तम् । यदप्युक्तम्- मन्त्रार्थ-वादयोरन्यार्थत्वान्न देवताविग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यमिति । अत्र ब्रूमः -प्रत्ययाप्रत्ययौ हि स्मृति लिङ्ग भी है | किश्च ' ज्योतिषि भावाच्च ' इस सूत्र में जो कहा गया है, अब उसपर हम कहते हैं— ज्योतिर्मण्डल आदि विषयक होनेपर भी देवता वाचक आदित्य आदि शब्द चेतनावाले ऐश्वर्य आदि युक्तं उस उस देवताका बोध कराते हैं, क्योंकि मन्त्र, अर्थवाद आदि में ऐसा व्यवहार है । ऐश्वयंके योग से देवताओं का ज्योति आदिरूपसे अवस्थान हो सकता है और यथेष्ट उस - उस विग्रहके धारण करनेकी भी उनमें सामर्थ्यं है । उसी प्रकार सुब्रह्मण्यार्थवाद में ' मेधातिथि ० ' ( इन्द्रने भेड़ बनकर कण्वके पुत्र मेधातिथिका अपहरण किया ) इस श्रुतिमें इन्द्रके प्रति ' मेधातिथिका मेष ' ऐसा सम्बोधन है । ' आदित्य ० ' ( आदित्य पुरुष बनकर कुन्तिके पास गया ) ऐसा स्मृति भी है । मृत्तिका आदिमें भी चेतन अधिष्ठाता स्वीकार किए गए हैं, क्योंकि ' मृदब्रवीत् ० ' ( मृत्तिका बोली, जल बोला ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं | आदित्य आदिमें ज्योतिर्मण्डल आदि भौतिक वस्तुका अचेतन स्वीकार किया जाता है । मन्त्र अर्थवाद आदिके व्यवहारसे - ज्योतिर्नण्डलादिके अधिष्ठाता देवता चेतन हैं ऐसा कहा गया है । जो यह कहा गया है कि मन्त्र और अर्थवादमें अन्यार्थकत्व होनेसे देवताके विग्रह प्रकाशनकी सामर्थ्य नहीं है । उसपर हम कहते हैं - वस्तुके सद्भाव और असद्भावमें उसका प्रत्यय एवं अत्यय ही सत्यानन्दी दीपिका नहीं है, वैसे दर्श आदि कर्ममें भी ब्राह्मणका अधिकार नहीं है, क्योंकि यह भी कर्म है । यहाँ मी अप्रयोजक हेतु है अर्थात् साध्यको सिद्ध करनेमें असमर्थ है । ' राजा राजसूयेन यजेत ' ' ब्राह्मणो बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( राजा राजसूय नामक यागसे इष्टकी भावनाकरे, ब्राह्मण बृहस्पतिसव नामक यज्ञसे इष्टकी भावना करे ) यहाँ दोनों यागों में कर्मत्व समान होने पर भी जिसमें जिसका अधिकार है उसमें उसका ही अधिकार है अन्यमें नहीं । जैसे ब्राह्मणका राजसूय यागमें अधिकार न होनेपर भी बृहस्पतिसव में अधिकार है । क्षत्रिय राजाका राजसूयमें अधिकार होनेपर भी बृहस्पतिसव यागमें अधिकार नहीं है । वैसे देवता आदिका मध्वादि विद्यामें अधिकार न होनेपर भी ब्रह्मविद्या में अधिकार है । यहाँ अधिकारका कारण अर्थीत्व, सामर्थ्य, अप्रतिषेध आदि हैं । वे उनमें हैं, क्योंकि उनमें कामना, सामर्थ्य है उनका कहीं निषेध भी नहीं है कि उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है । उद्धृत श्रुतियोंसे भी यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है । विश्वासु गन्धर्वने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न किया कि ' किमत्र ब्रह्मामृतम् '? याज्ञवल्क्यने उसका उत्तर दिया । यह स्मार्तं संवाद of a इस बातको दृढ़ करता है कि देवादिका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है । * मन्त्र, अर्थवाद, पुराण, इतिहास आदिसे आदित्य आदिके भी दो - दो अंश सिद्ध होते हैं । एक तो भूतोंका कार्य ज्योतिर्मण्डल आदिरूप अचेतन अंश और दूसरा दृश्यमान ज्योतिर्मंण्डल आदिके अधिष्ठाता देवतारूप चेतन अंश, जिसका ब्रह्मविद्या में अधिकार सिद्ध किया जाता है । इन दोनोंमें
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२६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ सद्भावासद्भावयोः कारणं, नान्यार्थत्वमनन्यार्थत्वं वा । तथाह्यन्यार्थमपि प्रस्थितः पथि पतितं तृणपर्णाद्यस्तीत्येव प्रतिपद्यते । अत्राह - विषम उपन्यासः । तत्र हि तृणपर्णादिविषयं प्रत्यक्षं प्रवृत्तमस्ति, येन तदस्तित्वं प्रतिपद्यते । अत्र पुनर्विभ्युद्दे शैकवाक्यभावेन स्तुत्यर्थे ऽर्थवादे न पार्थगर्थ्येन वृत्तान्तविषया प्रवृत्तिः शक्याऽध्यवसातुम् । नहि महावाक्येऽर्थप्रत्यायके ऽ-वान्तरवाक्यस्य पृथक्प्रत्यायकत्वमस्ति; यथा ' न सुरां पिबेत् ' इति नञ्वति वाक्ये पदत्रयसं-बन्धात्सुरापानप्रतिषेध एवैकोऽर्थोऽवगम्यते, न पुनः सुरां पिवेदिति पदद्वयसंबन्धात्सुरा-पानविधिरपीति । अत्रोच्यते - विषम उपन्यासः । युक्तं यत्सुरापानप्रतिषेधे पदान्वयस्यैक-त्वादवान्तरवाक्यार्थस्याग्रहणम् । विध्युद्देशार्थवादयोस्त्वर्थवादस्थानि पदानि पृथगन्वय वृत्तान्तविषयं प्रतिपद्यानन्तरं कैमर्थ्यवशेन कामं विधेः स्तावकत्वं प्रतिपद्यन्ते । यथा हि-' वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः ' इत्यत्र विध्युद्देशवर्तिनां वायव्यादिपदानां विधिना सम्बन्धः, नैवं ' वायु क्षेपिष्टा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति ' इत्येषामर्थ -वादगतानां पदानाम् । न हि भवति वायुर्वा आलभेतेति क्षेपिष्टा देवता वा आलभेतेत्यादि । वायुस्वभाव संकीर्तनेन त्ववान्तरमन्वये प्रतिपद्यैवं विशिष्टदैवत्यमिदं कर्मेति विधि स्तुवन्ति । * तद्यत्र सोऽवान्तरवाक्यार्थः प्रमाणान्तरगोचरो भवति, तत्र तदनुवादेनार्थवादः प्रवर्तते । कारण है, अन्यार्थकत्व अथवा अनन्यार्थकत्व कारण नहीं है । जैसे कि किसी अन्य प्रयोजनके लिए प्रस्थान किया हुआ पुरुष मार्ग में पड़े तृण पत्ते आदिके अस्तित्वको प्रतिपन्न होता है । इसपर कहते हैं — यह दृष्टान्त विषम है । वहाँ तो तृण पर्णादि विषयक प्रत्यक्ष प्रवृत्त है, जिससे उनके अस्तित्वको प्रतिपन्न होता है । परन्तु यहाँ तो विधि वाक्यके साथ एकवाक्यता प्राप्त करनेसे स्तुति अर्थक अर्थं-वादमें स्वतन्त्ररूपसे भूतार्थं विषयक प्रवृत्तिका निश्चय नहीं किया जा सकता । व्यर्थ बोधक महावाक्यों में अवान्तर वाक्यको पृथक् अर्थबोधकत्व नहीं है । जैसे ' न सुरां पिबेत् ' ( सुरा न पिए ) इस नकार वाले वाक्य में तीन पदोंके सम्बन्धसे सुरापानका प्रतिषेधरूप एक ही अर्थ अवगत होता है, न कि ' सुरां पिबेत् ' इन दो पदोंके सम्बन्धसे पुनः सुरापान विधि मी । इस विषय में कहते हैं - हटा विषम है । सुरापानके प्रतिषेधमें पदान्वय एक होनेके कारण [ सुरां पिबेत् ] इस अवान्तर वाक्यार्थ-का ग्रहण करना युक्त नहीं है । परन्तु विधिवाक्य और अर्थवादमेंसे अर्थवादस्थ पद भूतार्थं विषयक पृथक् अन्वित होकर अनन्तर कैमर्थ्य से [ इस अर्थवादका क्या प्रयोजन है, किसलिए है? ] यथेष्ट विधिवाक्यके स्तावक होते हैं । जैसे ' वायव्यं श्वेतमा ० ' ( ऐश्वर्यं चाहनेवाला वायव्य श्वेत पशुका आलभन करे ) इसमें विधिवाक्यगत वायु आदि पदों का विधिके साथ सम्बन्ध है, वैसे ' वायुवै क्षेपिष्ठा देवता ० ' ( निश्चित वायु शीघ्रगामी देवता है । जो यजमान हविको वायुके लिए देता है । अर्थात् वायु के लिए हविका भाग करता है वह उसको ऐश्वर्य देता है ) इन अर्थवाद वाक्यगत पदोंका विधिके साथ सम्बन्ध नहीं है । ' वायुर्वा आलभेत ' अथवा ' क्षेपिष्ठा देवता वा आलभेत ' इत्यादि वाक्योंका विधिके साथ सम्बन्ध नहीं होता । किन्तु वायु स्वभावके कथनद्वारा अवान्तर अन्वय प्राप्त-कर इसप्रकार विशिष्ट देवता सम्बन्धी यह कर्म है, इसप्रकार विधिको स्तुति करते हैं । यहाँ जो अवान्तर वाक्यार्थं प्रमाणान्तरका विषय होता है, वहाँ उसके अनुवाद से अर्थवाद प्रवृत्त होता है । सत्यानन्दी- दीपिका आदित्य शब्दका प्रयोग होता है । इस विषयको आगे ' अभिमानिव्यपदेशस्तु ० ' ( ब्र ० सू ० २1१14 ) इस सूत्र में स्पष्ट करेंगे । * ' विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते । भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः ॥ ' ( प्रत्य-क्षादिसे विरोध होनेपर गुणवाद और प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अर्थ अवगत होनेपर अनुवाद और जहाँ
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अधि ० ८ सू ० ३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २६५ यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादेन । यत्र तु तदुभयं नास्ति तत्र किं प्रमाणान्तराभावा-दगुणवादः स्यात्, आहोस्वित्प्रमाणान्तराविरोधाद्विद्यमानवाद इति प्रतीतिशरणैर्विद्यमा-नवाद आश्रयणीयोन गुणवादः । एतेन मन्त्रो व्याख्यातः । अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैव-त्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम् । न हि स्वरूपरहिता इन्द्रादयश्चेत-स्यारोपयितुं शक्यन्ते । न च चेतस्यनारूढायै तस्यै तस्यै देवतायै हविः प्रदातुं शक्यते । श्राव-यति - ' तस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट करिष्यन् ' ( ऐ ० ब्रा ० ३1८1१ ) इति । नच शब्दमात्रमर्थस्वरूपं संभवति शब्दार्थयोर्भेदात् । तत्र यादृशं मन्त्रार्थवादयोरिन्द्रादीनां स्वरूपमवगतं न तत्तादृशं शब्दप्रमाणकेन प्रत्याख्यातुं युक्तम् । इतिहासपुराणमपि व्याख्या-तेन मार्गेण संभवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात्प्रभवति देवता विग्रहादि साधयितुम् । प्रत्यक्षादिमूल जहाँ प्रमाणान्तरसे विरोध है वहाँ गुणवादसे । जहाँ ये दोनों नहीं हैं वहाँ प्रमाणान्तरके अभावसे गुणवाद हो अथवा प्रमाणान्तर के अविरोधसे विद्यमान अर्थवाद हो ऐसा सन्देह उपस्थित होनेपर प्रतीतिशरण पुरुषोंसे विद्यमान अर्थवाद ] भूतार्थवाद ] आश्रयणीय है, गुणवाद नहीं । इसप्रकार मन्त्रों में भी समझना चाहिए अर्थात् मन्त्र भी प्रमाणान्तरके संवाद और विसंवादके अमावसे स्वार्थमें प्रमाणभूत हैं । और इन्द्रादि देवता सम्बन्धी विष्य देनेकी प्रेरणा करनेवाली विधियां मी इन्द्रादिके स्वरूपकी अपेक्षा रखती हैं । वस्तुतः स्वरूप रहित इन्द्रादि देवताओंका चित्तमें आरोप- ध्यान नहीं किया जा सकता । चित्तमें अनारूढ उस उस देवताके लिए हविष्य देनेके लिए समर्थ नहीं हो सकता । ' यस्यै देवतायै ० ' ( जिस देवताके लिए हविका ग्रहण किया हुआ हो उस देवताका ' वषट् ' इस शब्दका उच्चारण कर पहले ध्यान करे ) ऐसा श्रुति कहती है । और केवल शब्द अर्थस्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द और अर्थ में भेद है । उन मन्त्र और अर्थवाद में इन्द्रादिका जैसा स्वरूप अवगत होता है बैसा स्वरूप शब्दप्रमाणकों द्वारा प्रत्याख्यान करना युक्त नहीं है । इतिहास और पुराण भी मन्त्र और अर्थवाद मूलक होने के कारण प्रमाण होकर उक्त रीतिसे देवतादिके विग्रह आदि सिद्ध करनेमें सत्यानन्दी - दीपिका पर दोनों ही नहीं वहाँ भूतार्थवाद, इसप्रकार अर्थवाद तीन प्रकारका है ) जिंस वाक्यका अर्थ प्रत्य-क्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध हो वहाँ विरोध परिहारार्थं गौणीवृत्ति मानकर समाधान किया जाता है । यथा ' आदित्यो यूपः ' इस स्थलमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे यूप और आदित्य दोनोंका भेद प्रतीत होता है, इससे दोनोंमें अभेद विरुद्ध है । यूपमें आदित्यका जो तेजसित्व गुण है, उस गुणसे यह अर्थवाद प्रवृत्त होता है, तो यहाँ ' आदित्यो यूपः ' का ' आदित्यसदृशो यूपः ' यह अर्थ है । ' वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता ' इत्यादि स्थलोंमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे वायुका शीघ्रगामित्व प्रसिद्ध है, उसका अनुवाद कर यह अर्थ -वाद प्रवृत्त होता है, अतः इस अर्थवादकां नाम अनुवाद है । ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( जिसके हाथमें वज्र है वह इन्द्र है ) श्रुति आदि प्रमाणसे ज्ञात होता है और प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अज्ञात है, अतः यह अर्थं भूतार्थवाद कहलाता है । वाक्यके दो तात्पर्य होते हैं -- अवान्तर तात्पर्यं और महातात्पर्यं । गुणवाद और अनुवाद दोनोंका अवान्तर तात्पर्य विषयभूत अर्थ में प्रामाण्य नहीं होता केवल महा-तात्पर्य विषयभूतमें ही प्रामाण्य है । भूतार्थवादका दोनोंमें प्रामाण्य रहता हैं । प्रमालक्षणमें अनधि-गतत्व और अबाधितत्व दो विशेषण दिए गए हैं । गुणवादमें अबाधितत्व नहीं है, अनुवादमें अनधि -गतत्व नहीं है, इसलिए गुणवाद और अनुवाद दोनोंका अवान्तर तात्पर्य विषयमें प्रामाण्य नहीं है । भूतार्थवादका दोनों में प्रामाण्य रहता है, क्योंकि शब्दका तात्पर्यं विषयीभूत अर्थ में प्रामाण्य होता है । शब्दसे जो अर्थ प्रतीत हो उसमें नहीं । शब्दका आकार तो नहीं होता, तब उसका ध्यान भी कैसे होगा? इसलिए विधि आदिकी सिद्धिके लिए देवताका विग्रह मानना युक्त है ।
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२६६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ मपि संभवति । भवति ह्यस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यक्षम् । तथा च व्यासादयो देवा-दिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते । यस्तु ब्रूयादिदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवादि-दिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति, स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधेत् । इदानीमिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात् । ततश्च राजसूयादिचोदनापरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरेऽ-प्यव्यवस्थितप्रायान्वर्णाश्रमधर्मान्प्रतिजानीत । ततश्च व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद्धर्मोत्कर्षवशाश्चिरन्तना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह रिति श्लिष्यते । अपि च स्मरन्ति — ' स्वाध्यायादिष्टदेवतासं प्रयोगः ' ( यो ० सू ० २।४४ ) इत्यादि । योगोऽप्यणिमाद्यैश्वर्यप्रा-तिफलः स्मर्यमाणो न शक्यते साहसमात्रेण प्रत्याख्यातुम् । श्रुतिश्च योगमाहात्म्यं प्रख्याप-यति - ' पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ' ( श्वे ०२।१२ ) इति । ऋषीणामपि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनां सामर्थ्यं नास्मदीयेन सामर्थ्येनोपमातुं युक्तम् । तस्मात्समूलमितिहासपुराणम् । लोकप्रसिद्धिरपि न सति संभवे निरालम्बनाऽध्यवसातुं युक्ता । तस्मादुपपन्नो मन्त्रादिभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमः । ततश्चार्थित्वादिसंभवादुपपन्नो देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारः । क्रममुक्तिदर्शनान्य-प्येवमेवोपपद्यन्ते ॥ ३३ ॥
समर्थ होते हैं । और देवताके शरीर आदिमें प्रत्यक्ष आदि मूलत्व भी संभव है । हम लोगों को अप्रत्यक्ष मी चिरन्तनों - प्राचीनोंको प्रत्यक्ष है 1 । जैसे व्यास आदि देवताओंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते हैं, ऐसी स्मृति है । जो ऐसा कहे कि आजकलके समान प्राचीन लोगोंकी मी देवादिके साथ व्यवहार करनेकी सामर्थ्यं नहीं थी, वह जगत् की विचित्रताका प्रतिषेध करता है और इदानींके समान अन्य समयमें मी सार्वभौम क्षत्रिय नहीं थे ऐसा कहे, तो राजसूय आदि विधियाँ बाधित हो जायँगी । किश्व आजकलके समान अन्य समयमें भी वर्णाश्रम धर्म अव्यवस्थितप्राय थे ऐसी प्रतिज्ञा करे तो ऐसी स्थिति में व्यवस्था विधायक शास्त्र अनर्थक हो जायगा, इससे सिद्ध होता है कि धर्मके उत्कर्षके कारण प्राचीन लोग देवादिके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे यह युक्त है । ' स्वाध्यायादिष्ट ० ' ( स्वाध्यायसे - मन्त्र जपसे इष्ट देवताका सान्निध्य और उसके साथ संभाषण होता है ) इत्यादि स्मृति भी है । अणिमा आदि ऐश्वर्यं प्राप्ति फलवाले और स्मृति सिद्ध योगका भो साहसमात्र से निषेध नहीं किया जा सकता । ' पृथ्व्य-प्तेजो ० ' ( पृथिवी, अल, तेज, वायु, आकाश इन पांच भूतोंके अपने वश में होनेसे और अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति होनेसे अभिव्यक तेजोमय देहको प्राप्त हुए योगीको रोग, जरा और मृत्यु नहीं होती ) इत्यादि श्रुति भी योगकी महिमाका वर्णन करती है । मन्त्र तथा ब्राह्मणरूप वेदके द्रष्टा ऋषियोंकी सामर्थ्यंकी अपनी सामर्थ्यंसे तुलना करना युक्त नहीं है । इससे इतिहास, पुराण समूलप्रमाणभूत हैं । लोक प्रसिद्धि भी श्रुति, स्मृति आदि आलम्बनके होनेपर निराधार निश्चित करना युक्त नहीं है । इस -लिए मन्त्रादिसे देवादिमें विग्रहवत्त्व आदि प्रतीति युक्त है । उनमें अथित्व आदिके सम्भव होने के कारण देवता आदिका भी ब्रह्मविद्या में अधिकार उपपन्न है । इसप्रकार क्रममुक्ति प्रतिपादक शास्त्र भी उपपन्न होते हैं ॥ ३३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * कलाकारों द्वारा निर्मित देवादि विग्रह भीतिचित्र आदि श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण,
लोक अनुभव आदिके विद्यमान होनेसे निराधार नहीं कहे जा सकते ।
विग्रहो हविषां मोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता । फलदातृत्वमित्येत्पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥
( शरीरधारी होना, हविष्यका ग्रहण, ऐश्वर्य, हविष्य आदिसे प्रसन्नता, प्रसन्न होकर यजमान-को फल देना इस कार पाँच विग्रह होते हैं ) । ‘ विग्रहो हविः स्वीकारः तद्द्मोजनं तृप्तिः । प्रसादश्चेत्येतच्चेतनस्योचितं पञ्चकम् ॥ '