श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 301–310
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 301–310
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अधि ० ९ सू ० ३४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २६७ ( ९ अपशूद्राधिकरणम् सू ० ३४-३८ ) शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥ ३४ ॥
पदच्छेद – शुक्, अस्य, तदनादरश्रवणात्, तदाद्रवणात्, सूच्यते हि । सूत्रार्थ - ( अस्य ) जानश्रुतिको ( तदनादरश्रवणात् ) इससे अपना अनादर श्रवण करनेसे ( शुक् ) शोक उत्पन्न हुआ, वह ( सूच्यते हि ) शुद्र से सूचित किया गया है, ( तदाद्रवणात् ) शोकसे ही रैक्वके पास गमन किया, इससे शुद्र कहा गया है । * यथा मनुष्याधिकार नियममपोद्य देवादीनामपि विद्यास्वधिकार उक्तस्तथैव द्विजा-त्यधिकारनियमापवादेन शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादित्येतामाशङ्कां निवर्तयितुमिदमधिकरण-मारभ्यते । तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादिति तावत्प्राप्तम्; अर्थित्वसामर्थ्ययोः संभवात्, ‘ तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लुस: ' ( तै ० सं ० ७ | १ | १ | ६ ) इतिवत् ' शुद्रो विद्यायामन वक्लृप्तः ' इति च निषे-धाश्रवणात् । यच्च कर्मस्वनधिकारकारणं शूद्रस्यानग्नित्वम्, न तद्विद्यास्वाधिकारस्यापवा-दकं लिङ्गम् । न ह्याहवनीयादिरहितेन विद्या वेदितुं न शक्यते । भवति च लिङ्गं शूद्राधि-कारस्योपोद्वलकम् । संवर्गविद्यायां हि जानश्रुति पौत्रायणं शुश्रूषं शूद्रशब्देन परामृशति-' अह हारे त्वा शूद्र तवैव सह गोभिस्तु ' ( छा ० ४। २ । ३ ) इति । विदुरप्रभृतयश्च शूद्रयोनिप्रभवाअपि . केवल मनुष्यका ही ब्रह्मविद्या में अधिकार है, इस नियमका निषेधकर जैसे देवतादिका भी ब्रह्मविद्या में अधिकार कहा गया है, वैसे ही द्विजातिमात्र ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) का विद्यामें अधिकार है, इस नियमका अपवादकर कहीं शूद्रका मी विद्या में अधिकार हो, तो इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिए इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है । पूर्वपक्षी - ब्रह्मविद्या में शूद्रका भी अधिकार हो ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि अथित्व और सामथ्यं उसमें भी सम्भव हैं । किञ्च ' तस्माच्छूद्रो ० ' ( अग्नि रहित होने से शूद्र यज्ञमें असमर्थ है ) इसके समान, शुद्रो विद्यायां ० ' ( शूद्र विद्या में असमर्थ है ) इस प्रकार निषेधका श्रवण नहीं अर्थात् निषेधक श्रुति नहीं है 1 । कर्मों में अनधिकारका कारण जो अग्नि-रहितत्व है वह ब्रह्मविद्यामें अधिकारका अपवादक लिङ्ग नहीं है । आहवनीय आदि अग्नियोंसे रहित पुरुषसे विद्या संपादन नहीं की जा सकती, यह बात नहीं है । शूद्र के अधिकारका समर्थक श्रोत लिङ्ग - श्रुति है । संवर्गविद्या में श्रवण करनेकी इच्छा रखनेवाले पौत्रायण जानश्रुतिका रैक्वने ' अह हारे व्वा ० ( हे शूद्र! गौ सहित यह हार युक्त रथ तेरे ही पास रहे ) इस प्रकार शूद्र शब्दसे परामर्श किया है । ऐसी सत्यानन्दी - दीपिका ( विग्रह, हविष्यका स्वीकार, उसको भोगमा, तृप्ति, प्रसन्न होकर यजमानको फल देना ये पाँच चेतनके लिए ही उचित हैं शब्दात्मक जड़ देवताकें लिए नहीं ) इत्यादिसे यह सिद्ध होता है कि देवताका विग्रह होता है, इससे उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार भी सिद्ध होता है । इससे क्रम मुक्ति प्रतिपादक शास्त्र भी संगत होते हैं । अहंग्रह उपासना आदि से ब्रह्मलोक में जाकर दिव्य शरीरको पाकर दिव्य मोगोंका अनुभव करता है । संत्कारबलसे वहाँ ब्रह्माद्वारा ज्ञान प्राप्तकर आत्मसाक्षात्कार होनेसे मुक्त हो जाता है, इसप्रकार उसकी क्रममुक्ति होती है । इसलिए देवादिको शरीरधारी मानकर ब्रह्मविद्यामें अधिकार मानना श्रुति संगत है ॥ ३३ ॥
* ' तद्यो यो देवानाम् ' इस श्रुतिमें देवशब्दसे जैसे ब्रह्मविद्या में केवल मनुष्यके अधिकारको हटाकर देवादिका भी अधिकार कहा गया है, वैसे श्रुतिमें शूद्र शब्दसे द्विज जातिके अधिकार नियमको हटाकर शूद्र का भी अधिकार है । इसप्रकार दृष्टान्तसंगति से इस अधिकरणका आरम्भ है । देवतादिका जो ब्रह्मविद्या में अधिकार निश्चित किया है, उसीसे ब्रह्मविद्यामें शूद्रका भी अधिकार है कि नहीं?
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२६८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ विशिष्टविज्ञानसंपन्नाः स्मर्यन्ते । तस्मादधिक्रियते शूद्रो विद्यास्थिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - न शूद्रस्याधिकारः; वेदाध्ययनाभावात् । अधीतवेदो हि विदितवेदार्थो वेदार्थेष्वधिक्रियते । नच शूद्रस्य वेदाध्ययनमस्ति; उपनयनपूर्वकत्वाद्वेदाध्ययनस्य । उपनयनस्य च वर्णत्रय-विषयत्वात् । यत्त्वर्थित्वं न तदसति सामर्थ्येऽधिकारकारणं भवति । सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति, शास्त्रीयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्यापेक्षितत्वात्, शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्याध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात् । यश्चेदं ' शूट्टो यज्ञेऽनचक्लृप्तः ' इति तन्न्याय-पूर्वकत्वाद्विद्यायामप्यनवक्लृप्तत्वं द्योतयति; न्यायस्य साधारणत्वात् । यत्पुनः संवर्ग विद्यायां शूद्र शब्दश्रवणं लिङ्गं मन्य से, न तलिङ्गम्, न्यायाभावात् । न्यायोक्ते हि लिङ्गदर्शनं द्योतकं भवति । न चात्र न्यायोऽस्ति । कामं चायं शूद्रशब्द संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात् तद्विषयत्वात् न सर्वासु विद्यासु । अर्थवादस्थत्वात्तु न कचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते । स्मृति भी है कि विदुर आदि शूद्र योनिमें उत्पन्न हुए भी विज्ञान सम्पन्न थे । इसलिए शूद्र विद्याओंका अधिकारी है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वेदाध्ययनके न होने कारण शूद्रका विद्या में अधिकार नहीं है । अधीत वेद और विदित वेदार्थं पुरुषका ही वेदार्थं विचारमें अधिकार है । शूद्रके लिए तो वेदाध्ययन ही नहीं है, क्योंकि वेदाध्ययन तो उपनयनपूर्वक किया जाता है । और उपनयन वर्णत्रय ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) विषयक होता है । जो अर्थित्व है, वह सामर्थ्यंके न होनेपर अधिकारका कारण नहीं हो सकता । केवल लौकिक सामर्थ्य भी अधिकारका कारण नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय अर्थ में शास्त्रीय सामथ्यँकी अपेक्षा होती है, और अध्ययनके निरा-. करणसे शास्त्रीय सामर्थ्यका मी निराकरण हुआ समझना चाहिए । किञ्च ' शूद्रो यज्ञ े ऽनवक्लृप्तः ' यह Satara न्यायपूर्वक होनेसे विद्या में मी असामर्थ्यको सूचित करता है, क्योंकि न्याय दोनोंमें समान है । और संवर्गविद्या में शूद्रशब्द श्रवणको तुम लिङ्ग मानते हो वस्तुतः वह लिङ्ग नहीं है । क्योंकि वेदार्थ ज्ञानात्मकसामर्थ्यं रूप अनुकूल न्याय नहीं है । लिङ्गदर्शन तो न्याय संगत विषयका ही सूचक होता है, परन्तु यहाँ तो उक्त न्याय नहीं है । भले ही यह शूद्रशब्द केवल एक संवर्ग-विद्यामें शूद्रको अधिकार दे, क्योंकि यह शूद्र शब्द संवर्गविद्या में पठित है, सब विद्याओंमें उसका अधिकार नहीं है । और शूद्रशब्द अर्थबाद वाक्योंमें पठित होनेके कारण किसी भी विद्यामें सत्यानन्दी - दीपिका इस प्रश्नका निर्णय करते हैं । पूर्वपक्षी - शूद्रका ब्रह्मविद्या में अधिकार है । इसमें एक उदाहरण कहते हैं --- राजा जानश्रुतिने ६०० गायें और रथ आदि गुरु रैक्वको देकर यह प्रार्थना की कि मुझे संवर्ग-विद्याका उपदेश कीजिए । तब कन्याके साथ विवाह करनेकी इच्छा रखनेवाले विधुर रैक्वने उससे कहा ' अह हारे त्वा शूद्र तवैव सह गोमिस्तु ' इस प्रकार जानश्रुतिके प्रति रैक्वने शूद्र शब्दका प्रयोग किया है । तदनन्तर राजाने बहुत धनादिके साथ अपनी कन्याको अर्पण किया । उससे प्रसन्न होकर रैक्वने राजाको संवर्गविद्याका उपदेश किया । इससे सिद्ध होता है कि अथित्व और सामर्थ्य से युक्त शूद्रका मी विद्या अधिकार है । जैसे अग्नि रहित होनेसे कर्मोंमें शूद्र के अधिकारका निषेध है, वैसे ब्रह्मविद्या में अधिकारका निषेध नहीं । अतः ब्रह्मविद्या में शूद्रका अधिकार मानना चाहिए । पूर्वपक्ष में द्विज के समान शूद्रकी भी श्रौत ब्रह्मविद्या में प्रवृत्ति है, सिद्धान्तमें नहीं है । * उपनयन संस्कारके अनन्तर ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' इस अध्ययनविधिके अनुसार आचार्य से जिसने अपात वेदार्थ जान लिया है । उसका वेदार्थ विचारमें अधिकार है अन्यका नहीं । अध्ययन-विधिसे अधीत वेदार्थ ज्ञानरूप सामर्थ्य शूद्र में नहीं है, क्योकि उसके लिए उपनयनका विधान ही नहीं है । इससे उनका वेदाध्ययनमें अधिकार न होनेसे ब्रह्मविद्या में भी अधिकार नहीं है ।
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अधि ० ९ सू ० ३५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २६ ९ शक्यते चायं शूद्र शब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम् । कथमित्युच्यते? ' कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ ' ( छा ० ४। १ ३ ) इत्य हमार्द्धसवाक्यादात्मनोऽनादरं श्रुतवतो जानश्रुतेः पौत्रायणस्य शुगुत्पेतामृबी रैक शूद्रशब्देनानेन सूचयांवभूवात्मनः परोक्षज्ञताख्यापना-येति गम्यते; जातिशूद्रस्यानधिकारात् । कथं पुनः शूद्रशब्देन शुगुत्पन्ना सूच्यत इति उच्यते-तदाद्रवणात् । शुचमभिदुद्राव शुचा वाऽभिदुद्रुवे, II शुचा वा रेक्कमभिदुद्रावेति शूद्रः;
अवयवार्थ संभवाद्व्यर्थस्य चासंभवात् । दृश्यते चायमर्थोऽस्यामाख्यायिकायाम् ॥३४ ॥
क्षत्रियत्वगतेश्वोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ ३५ ॥
पदच्छेद - क्षत्रियत्वगतेः, च, उत्तरत्र, चैत्ररथेन, लिङ्गात् । सूत्रार्थ - ( क्षत्रियत्वगतेश्च ) क्षत्रियत्व ज्ञान होने ले जानश्रुति मुख्य शूद्र नहीं है, क्योंकि ( उत्तरत्र ) संवर्गविद्या वाक्यशेषमें ( चैत्ररथेन ) प्रसिद्ध क्षत्रिय चैत्ररथ अभिप्रतारीके साथ ( लिङ्गात् ) समभिव्याहाररूप लिङ्गसे जानश्रुति क्षत्रिय ज्ञात होता है, इससे विद्या में शूद्रका अधिकार नहीं है । इतश्च न जातिशूद्रो जानश्रुतिः । यत्कारणं प्रकरणनिरूपणेन क्षत्रियत्वमस्योत्तरत्र चैत्ररथेनाभिप्रतारिणा क्षत्रियेण समभिव्याहारालिङ्गाद्गम्यते । उत्तरत्र हि संवर्गविद्यावाक्य-शेषे चैत्ररथिरभिप्रतारी क्षत्रियः संकीर्त्यते— ' अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं शुद्रको अधिकार नहीं दिला सकता । और यह शूद्र शब्द अधिकृत विषयक ( द्विजाति ) पुरुषके लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है । किस प्रकार? कहते हैं - ' कम्वर एनमे ० ' ( अरे! तू किस महत्त्व -से युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है? क्या तू उसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है? ) इस हंस वाक्यसे अपने अनादरको सुननेवाले पौत्रायण जानश्रुतिको शोक उत्पन्न हुआ । यह प्रतीत होता है कि रैक्व ऋषिने अपनी परोक्षज्ञताको जतलानेके लिए इस शूद्रशब्दसे उस शोकको सूचित किया । क्योंकि यहाँ जातिगत शूद्रका अधिकार नहीं है । तो राजाको उत्पन्न हुआ शोक ही यहां शूद्रशब्द से कैसे सूचित किया गया है? कहते हैं - उसके आद्रवणसे, वह शोककी ओर अग्रसर हुआ अर्थात् शोकसे व्याप्त हुआ अथवा शोकसे रैक्वके पास गया, इसलिए उसे शूद्र कहा गया, क्योंकि यहाँपर अवयव ( यौगिक ) अर्थका सम्भव है रूढि अर्थका सम्भव नहीं है । इस आख्यायिका में यही अर्थ देखा जाता है ॥ ३४ ॥
और इस हेतुसे भी जानश्रुति जातिसे शुद्र नहीं है, क्योंकि प्रकरणके निरूपणसे आगे चैत्ररथ अभिप्रतारी ही क्षत्रियके साथ सममिव्यवहाररूप लिङ्गसे ज्ञात होता है । उत्तरत्र - संवर्गविद्या के वाक्य-सत्यानन्दी - दीपिका * ( छान्दो ० ४।१ ) – एक समय राजा जानश्रुति ग्रीष्म ऋतुमें रात्रि के समय महलकी छत पर सोया हुआ था । उसके अन्नदानादि अनेक गुणोंसे सन्तुष्ट हुए ऋषि गण उसके कल्याणके लिए हंसका रूप धारणकर पंक्तिरूपसे उसके ऊपर उड़ते हुए आये । उनमें से पिछले हंसने आगेवाले हंससे कहा ‘ हो होऽयि मलाक्ष भलाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्-क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति । ' ( ओ ओ भलाक्ष! ओ मलाक्ष!! देख पौत्रायण जानश्रुतिका तेज लोकके समान फैला हुआ है । तू उसका स्पर्श न कर । वह तुझे भस्म न कर डाले ) तब उस पिछले हंसको आगे के हंसने उत्तर दिया- अरे! यह विचारा विद्याहीन है । इसके लिए तुम उन वचनोंका प्रयोग कर रहे हो जिनका कि गाड़ी के साथ रहनेवाले रैक्वके लिए किया जाता है अर्थात् रैक्वका तेज दुर्लङ्घय है । इस आत्मज्ञान रहित जानश्रुतिका तेज वैसा नहीं है । इन वचनोंसे खिन्न होकर गाड़ीरूप चिह्न से युक्त रैक्वके पास जाकर राजा ब्रह्मज्ञानको प्राप्त करे ऐसा हंसोंका अभिप्राय था । उन हंसोंसे अनादर वाक्य सुनकर राजाको शोक उत्पन्न हुआ था ॥ ३४ ॥
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२७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ [ सूदेन ] परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी त्रिमिक्षे ' ( छा ० ४।३।५ ) इति । चैत्ररथित्वं चाभिप्रतारिणः कापेय-योगादवगन्तव्यम् । कापेययोगो हि चित्ररथस्यावगतः ' एतेन वै चित्ररथं कापेया अयाजयन् ' ( ताण्ड्य ब्रा ० २०।१२।५ ) इति । समानान्वयानां च प्रायेण समानान्वया याजका भवन्ति । ' तस्माच्चैत्ररथिर्नामैकः क्षत्रपतिरजायत ' इति च क्षत्रपतित्वावगमात्क्षत्रियत्वमस्यावगन्तव्यम् । तेन क्षत्रियेणाभिप्रतारिणा सह समानायां संवर्ग विद्यायां संकीर्तनं जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वं सूचयति । समानानामेव हि प्रायेण समभिव्याहारा भवन्ति । क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाश्च
जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः । अतो न शूद्रस्याधिकारः ॥ ३५ ॥
संस्कार परामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ ३६ ॥
पदच्छेद – संस्कारपरामर्शात्, तदभावाभिलापात् च । सूत्रार्थ - ( संस्कारपरामर्शात् ) ब्रह्मविद्या में उपनयन आदि संस्कारोंका परामर्श है ( च ) और ( तदभावाभिलापात् ) शूद्रके लिए उपनयन आदि संस्कारोंके अभावका कथन है, इससे ब्रह्म-विद्या शूद्रका अधिकार नहीं है । * इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यद्विद्या प्रदेशेषूपनयनादयः संस्काराः परामृश्यन्ते-' तं होपनिन्ये ' ( श ० ब्रा ० ११ | ५ | ३ | १३ ) । ' अधीहि भगव इति होपससाद ' ( छा ० ७ १ । १ ) ' ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुप-सन्नाः ' ( प्र ० १।१ ) इति च । ' तान्हानुपनीयैव ' ( छा ० ५/११/७ ) इत्यपि प्रदर्शितैवोपनयनप्राप्ति-शेषमें चैत्ररथि अभित्रतारी क्षत्रियका ' अथ ह शौनकं ० ' ( एक वार कपिगोत्रज शौनक और कक्ष सेनके पुत्र अमितासे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था, एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी ) इस प्रकार कथन है । अभिप्रतारीमें चैत्ररथित्व कापेयके सम्बन्ध से समझना चाहिए | ' एतेन वै चित्ररथं ० ' ( इस द्विरात्रेष्टिसे कापेयोंने चित्ररथको यज्ञ कराया ) इससे चित्ररथका कापेयके साथ सम्बन्ध अवगत होता है । प्रायः समान वंशवाले समान वंशवालोंके याजक होते हैं अर्थात् राजवंशियोंके प्रायः पुरोहितवंश्य याजक होते हैं । ‘ तस्माच्चैतरथिर्नामैकः ० ' ( उससे चित्ररथसे चैत्ररथि नामका एक क्षत्रपति उत्पन्न हुआ ) इस प्रकार क्षत्रपतित्वकी अवगतिसे उस चैत्ररथमें क्षत्रियत्व समझना चाहिए । उस क्षत्रिय अभिप्रतारीके साथ एक संवर्गविद्यामें संकीर्तन जानश्रुतिको भी क्षत्रियत्व सूचित करता है । समानोंके ही प्रायः समभिव्याहार होते हैं । सारथि प्रेषण ( भेजना ) आदि ऐश्वर्यंके योगसे जानश्रुतिमें क्षत्रियत्व अवगत होता है । इसलिए श्रीविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है ॥ ३५ ॥
और इससे भी शूद्रका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं हैं, क्योंकि ' तं होपनि ये ० ( उसका उप-नयन किया ) ' अधीहि भगव ० ' ( हे भगवन्! मुझे उपदेश कीजिए, ऐसा कहते हुए नारद सन-कुमार के पास गए ) ' ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठा: ० ' ( ये अपरब्रह्मकी उपासना करनेवाले और तदनुकूल अनुष्ठानमें तत्पर मारद्वाज़ आदि छ: ऋषिगण परब्रह्म के जिज्ञासु होकर भगवान् पिप्पलादके पास, यह सोचकर कि ये हमें उसके विषयमें सब कुछ बतला देंगे, हाथमें समिधा लेकर गये ) इस प्रकार विद्याके प्रकरणों में उपनयन आदि संस्कारोंका परामर्श है । ' तान्हानु ० ' ( उनका उपनयन किए विना सत्यानन्दी - दीपिका * शङ्का - राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छः ऋषिजनोंको उपनयन संस्कार किए विना ही विद्याका उपदेश किया है, इससे सिद्ध होता है कि उपनयन रहितका भी विद्यामें अधिकार है, तो संस्कार रहित शूद्रका भी विद्यामें अधिकार होना चाहिए? समाधान - वस्तुतः उपनयन दो प्रकारका होता है, एक वेदाध्ययन के लिए विधि पूर्वक यज्ञोपवीत आदिका धारणरूप, दूसरा ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति-
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अधि ० १ सू ० ३७-३८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २७१ र्भवति । शूद्रस्य संस्काराभावोऽभिलप्यते, ' शूद्रश्रतुर्थो वर्ण एकजातिः ' ( मनु ० १०।४ ) इत्येक-जातित्वस्मरणात् । ' न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमहीत ' ( मनु ० १० | १२ | ६ ) इत्यादिभिश्च ॥३६ ॥
तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्त ेः ॥ ३७ ॥
पदच्छेद - तदभावनिर्धारणे, च, प्रवृत्तेः । सूत्रार्थ - ( तदभावनिर्धारणे ) सत्यकाममें सत्यकथनसे शूद्रत्वाभाव निर्धारित करने पर ( प्रवृत्तेः ) गौतम सत्यकाम के लिए उपदेश आदि करने में प्रवृत्त हुए । इससे ( च ) भी विद्यामें शूद्रका अनधिकार है । इतश्च न शूद्रस्याधिकारः । यत्सत्यवचनेन शूद्रत्वाभावे निर्धारिते जाबालं गौतम उपनेतुमनुशासितुं च प्रववृतेः ' नैतदब्राह्मणो विवन्तुमर्हति समिधं
सत्यादगाः ' ( छा ० ४।४।५ ) इति श्रुतिलिङ्गात् ॥३७ ॥
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्स्मृतेश्च ॥ ३८ ॥
पदच्छेद- श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेः च । सूत्रार्थ – ( स्मृतेः ) ' अथास्य वेदमुपशृण्वतः ' इत्यादि स्मृतिसे शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन, अर्थज्ञान एवं अनुष्ठानका प्रतिषेध किया शूद्रा विद्या अधिकार नहीं है । ही राजाने उस विद्याका उपदेश किया ) इसमें भी उपनयनकी प्राप्ति सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न ( श्रवणाध्ययनार्थं प्रतिषेधात् ) गया है, इससे ( च ) भी दिखलाई गई है । परन्तु ' शूद्रश्चतुर्थो वर्ण ० ' ( शूद्र चतुर्थ वर्ण एवं उपनयन रहित है ) इसप्रकार स्मृति में वह एक जाति कहा गया है । ' न शूद्रे पातकं ० ' ( शूद्रको अमक्ष्य लशुनादि भक्षण से कुछ पाप नहीं है और वह उपनयन आदि संस्कार के योग्य नहीं है ) इत्यादि स्मृति से भी शूद्र में संस्कारोंके अभावका कथन है || ३६ ॥ और इस हेतुसे भी शूद्रका विद्यामें अधिकार नहीं है, क्योंकि सत्य बोलनेसे शूद्रत्व अभावका निर्धारण होनेपर गौतम सत्यकामका उपनयन करने और उसे विद्याका उपदेश करनेके लिए प्रवृत्त हुए ' नैतदब्राह्मणो ० ' ( उससे गौतमने कहा – ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता, अतः हे सोम्य! तू समिधा ले आ, मैं तुम्हारा उपनयन करूँगा, क्योंकि तुमने सत्यका त्याग नहीं किया ) यह श्रुतिलिङ्ग है ॥ ३७ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका के लिए उपसदनरूप । उपसदन भी दो प्रकारका होता है- एक तो विद्यार्थीका आचार्यके पास सादर गमन और दूसरा आचार्य द्वारा उसे शिष्यरूपसे स्वीकार करना तथा बहुत कालतक अपने सान्निध्यमें रखकर अपनी सेवादिकी अनुमति देना आदि । वेद वेदाङ्गोंमें पारंगत ऋषिजनोंमें वेदाध्ययनसे पूर्वं ही यज्ञोपवीत संस्कार सिद्ध है, इसलिए ' तान्हानुपनीयैव ' इस श्रुतिसे उपनयनका निषेध करना अयुक्त है । उपनयन किए हुएके लिए पुनः उपनयन प्राप्त ही नहीं है । और दूसरा विद्यार्थीका आचार्यके पास सादर गमनरूप उपसदन वह उन ऋषियोंनें भी सिद्ध है । तो फिर ' तान्हानुपनीयैव ' इस श्रुति से किए गए उपनयन निषेधका क्या तात्पर्य है? इसका तात्पर्य यह है कि आचार्य द्वारा शिष्यभावसे स्वीकार कर अपने सान्निध्य में रखकर सेवा आदिके अनुमतिरूप उपनयनका निषेध है, क्योंकि उत्तमवर्णवाले विद्यार्थीके प्रति निम्नवर्णवाले गुरुको सेवा लिए विना विद्या देनी चाहिए इस अभिप्रायसे श्रुतिमें ऐसा कहा गया है । अतः उपनयन आदि संस्कार रहित होनेसे शूद्रका विद्यामें अधिकार नहीं है ॥ ३६ ॥
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२७२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ इतश्च न शूद्रस्याधिकारः यदस्य स्मृतेः श्रवणाध्ययनार्थप्रतिपेधो भवति । वेद-श्रवणप्रतिषेधो वेदाध्ययन प्रतिषेधस्तदर्थज्ञानानुष्ठानयोश्च प्रतिषेधः शूद्रस्य स्मर्यते । श्रुवणप्रतिषेधस्तावत् ' अथास्य वेदमुपशृण्वतत्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम् ' इति । ' पशु ह वा एत-च्छ्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् ' इति च । अत एवाध्ययनप्रतिषेधः । यस्य हि समीपेऽपि नाध्येतव्यं भवति, स कथमश्रुतमधीयीत? भवति च वेदोच्चारणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेद इति । अत एव चार्थादर्थज्ञानानुष्ठानयोः प्रतिषेधो भवति - ' न शूद्राय मतिं दद्यात् ' इति, ' द्विजातीनासध्ययन भिज्या दानम् ' इति च । येषां पुनः पूर्वकृत संस्कारवशा-द्विदुरधर्मव्याधप्रभृतीनां ज्ञानोत्पत्तिस्तेषां न शक्यते फलप्राप्तिः प्रतिषेद्ध; ज्ञानस्यै-कान्तिकफलत्वात् । ' श्रावयेधतुरो वर्णान् ' इति चेतिहासपुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्यस्याधिकार-स्मरणात् । वेदपूर्वकस्तु नास्त्यधिकारः शूद्राणामिति स्थितम् ॥३८ ॥
( १० कम्पनाधिकरणम् सू ० ३ ९ ) कम्पनात् ॥३९ ॥
सूत्रार्थ -- ' यदिदं किञ्च ' ( यह सारा जगत् प्राणसे उत्पन्न हुआ चेष्टा करता है ) इस कम्पनसे प्रतीयमान प्राण परमात्मा ही है । अवसितः प्रासङ्गिकोऽधिकारविचारः । प्रकृतामेवेदानीं वाक्यार्थविचारणां प्रवर्त-यिष्यामः । ' यदिदं किंच जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते इससे मी शूद्रका विद्यामें अधिकार नहीं है, क्योंकि स्मृतिमें उसके लिए श्रवण, अध्ययन और अर्थज्ञानका प्रतिषेध है । स्मृतिमें शूद्रके लिये वेदके श्रवण, वेदके अध्ययन और वेदार्थज्ञान एवं अनुष्ठानका निषेध है । ' अथास्य ' ( समीपसे वेदोंका श्रवण करनेवाले शूद्रके दोनों कान रांगा और लाखसे भर दे ) और ' पशु ह वा ० ' ( शूद्र निस्सन्देह पादयुक्त ( जंगम ) श्मशान है, इसलिए शूद्रके समीप वेदका अध्ययन नहीं करना चाहिए ) इसप्रकार वेदके श्रवणका प्रतिषेध है | श्रवणके निषेधसे अध्ययनका निषेध भी सिद्ध होता है, क्योंकि जिसके समीपमें भी अ ययन करना युक्त नहीं है वह अश्रु वेदका अध्ययन कैसे करेगा? वेदके उच्चारण करनेपर शूद्रकी जिह्वाके उच्छेद और धारण करनेपर शरीर के भेदनका विधान है । वेदाध्ययनके अभाव होनेसे शूद्रके लिए अर्थ ज्ञान और अनुष्ठानका निषेध अर्थसे सिद्ध होता है । ' न शूद्राय मतिं दद्यात् ' ( ब्राह्मणको चाहिये कि शूद्रको वेदार्थज्ञान न दे ) और ' द्विजातीनाम ० ' ( द्विजाति- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके लिये ही अध्ययन, यज्ञ तथा दानका विधान है ) । परन्तु विदुर धर्मव्याध आदि जिनको पूर्वकर्मके संस्कारोंसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है, उनके लिये फलप्राप्तिका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि ज्ञान अव्यभिचरित फल वाला होता हैं । ' श्रावयेच्चतुरो वर्णानू ' ( चारों वर्णोंको सुनावे ) इसप्रकार यह स्मृति इतिहास -पुराणके ज्ञान करनेमें चारों वर्णोंका अधिकार बतलाती है । इससे सिद्ध हुआ कि वेदाध्ययन पूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेका शूद्रको अधिकार नहीं है ॥ ३८ ॥
प्रासङ्गिक अधिकार विषयक विचार समाप्त हुआ । अब आगे प्रकृत वाक्यार्थं विचारको ही करेंगे । ' यदिदं किञ्च जगत्सर्व ० ' ( यह जो कुछ सारा जगत् है प्राण ब्रह्ममें, उदित होकर, उसीसे चेष्टा कर रहा है । वह ब्रह्म महान् भयरूप और हाथमें उठाए हुये वज्रके समान है । जो इसे जानते सत्यानन्दी - दीपिका * ' शब्दादेव प्रमितः ' इत्यादि तृतीय पादके सप्तम प्रमिताधिकरण में ' अंगुष्ठमात्रः पुरुषः ' इस श्रुतिका विचार करते हुए ' हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ' इस सूत्र से शास्त्र में मनुष्यका अधिकार
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अधि ०१० सू ० ३ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २७३ भवन्ति ' ( का ० २।६।२ ) इति । एतद्वाक्यं ' एज कम्पने इति धात्वर्थानुगमालक्षितम् । अस्मिन्वाक्ये सर्वमिदं जगत्प्राणाश्रयं स्पन्दते, महच्च किंचिद्भयकारणं वज्रशब्दितसुद्यतम्, तद्विज्ञानाच्चामृतत्वप्राप्तिरिति श्रूयते । तत्र कोऽसौ प्राणः, किं तद्भयानकं वज्रमित्यप्रतिपत्ते-विचारे क्रियमाणे प्राप्तं तावत्प्रसिद्धेः पञ्चवृत्तिर्वायुः प्राण इति । प्रसिद्धेरेव चाशनिर्वज्रं स्यात् । वायोश्चेदं माहात्म्यं संकीर्त्यते । कथम्? सर्वमिदं जगत्पञ्चवृत्तौ वायौ प्राणशब्दिते प्रतिष्ठायैजति । वायुनिमित्तमेव च महद्भयानकं वज्रमुद्यम्यते । वायौ हि पर्जन्यभावेन विवर्तमाने विद्युत्स्तनयित्नुवृष्टयशनयो विवर्तन्त इत्याचक्षते । वायुविज्ञानादेव चेदममृत-त्वम् । तथा हि श्रुत्यन्तरम् -'वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ' इति । तस्मा-द्वायुरयमिह प्रतिपत्तव्य इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः ब्रह्मैवेदमिह प्रतिपत्तव्यम् । कुतः? पूर्वोत्तरा-लोचनात् । पूर्वोत्तरयोर्हि ग्रन्थभागयोर्ब्रह्मैव निर्दिश्यमानमुपलभामहे । इहैव कथमकस्मा-दन्तराले वायुं निर्दिश्यमानं प्रतिपद्येमहि? पूर्वत्र तावत् ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ' ( का ० २।६।१ ) इति ब्रह्म निर्दिष्टम्, तदेवेहापि, हैं वे अमर हो जाते हैं ) ‘ एज़ कम्पने ' ( एज़ धातुका अर्थ कम्पन है ) यह वाक्य इस धातु अर्थके अनुगमसे लक्षित है । इस वाक्य में यह सम्पूर्ण जगत् प्राणके आश्रित चेष्टा करता है, वह उद्यत वज्रके समान भयानक कोई महान् है । उसके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है, ऐसी श्रुति है । उसमें यह प्राण कौन है? और वह भयानक वज्र क्या है? इसके निश्चय न होने के कारण विचार करने पर लोक प्रसिद्धिसे ऐसा ज्ञात होता है कि पाँच वृत्तिवाला वायु प्राण है 1 । और लोक प्रसिद्धि से वज्र अशनि ( वज्र ) ही है । यह वायुका ही महात्म्य कहा गया है । कैसे? यह सम्पूर्णं जगत् पाँच वृत्तिवाले प्राणनामक वायुमें रहकर व्यापार करता है । वायु से ही वह महान् भयानक वज्र उठाया जाता है । वायु पर्जन्यभावसे विवर्तमान होने पर विद्युत्, मेघ, वृष्टि और अशनिरूपमें भी विवर्तित होता है, ऐसा कहते हैं । वायु के ज्ञानसे भी यह अमृत्व है । ' वायुरेव व्यष्टिर्वायुः ० ' ( वायु ही व्यष्टि है, वायु ही समष्टि है जो ऐसा जानता है वह अपमृत्युको जीतता है ) ऐसी दूसरी श्रुति है । इसलिए यहाँ प्राणको वायु समझना चाहिए । सिद्धान्ती – ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर हम कहते हैं-यहाँ प्राणशब्दसे ब्रह्म ही समझना युक्त है, किससे? इससे कि पूर्व और उत्तर वाक्योंकी पर्यालोचना करने से यही स्पष्ट होता है [ यदिदं किञ्च ] इस वाक्यके पूर्व तथा उत्तर ग्रन्थ भागों में हमें ब्रह्म ही निर्दिश्यमान उपलब्ध होता है । तो हम यहीं पर मध्यमें अकस्मात् वायुको निर्दिश्यमान कैसे समझ लें । ' तदेव शुक्रं ० ' ( यही जो इस संसार वृक्षका मूल है, विशुद्ध ज्योति: स्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है | सम्पूर्ण लोक उसीमें आश्रित हैं, कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता । यही निश्चय वह - ब्रह्म है ) इस पूर्वं वाक्यमें ब्रह्म निर्दिष्ट है । यहाँ भी ऐसा ज्ञात होता है कि संनिधानसे ' सम्पूर्ण सत्यानन्दी - दीपिका है । इससे मनुष्यके हृदयकी अपेक्षांसे सर्वगत ब्रह्ममें भी अंगुष्ठमात्रत्वकी उपपत्ति कही गई है । इस अधिकरण के प्रसङ्गसे ' तदुपयपि बादरायणः ' इत्यादि आठ सूत्रोंसे अष्टम देवताधिकरणमें देवताओंका मी ब्रह्मविद्या में अधिकार कहा गया है । पुनः प्रसङ्गसे ' शुगस्य तदनादर ० ' इत्यादि पाँच सूत्रोंसे नवम अधिकरणमें शूद्रका वेदविद्यामें अधिकारका निषेध किया गया है । इसप्रकार प्रासंगिक अधिकार विचार समाप्त हुआ । अब प्रकृत विचारको आरम्भ करतें हैं । यद्यपि ' अत एव प्राण: ' इस अधिकरण सूत्रसे ही इस कम्पन अधिकरण सूत्रका विषय चरितार्थ हो जाता है, तो भी ' यदिदं किञ्च जगत् सर्व ० ' इस वाक्यमें ब्रह्मका स्पष्ट लिङ्ग नहीं है अथवा ' अत एव प्राण: ' इस अधिकरणका भी यह कम्पन अधिकरण विस्तार है, इसलिए इस अधिकरणकी पृथक् रचना करनेमें कोई दोष नहीं है । ' शब्दादेव
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२७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ संनिधानातू, जगत्सर्व प्राण एजतीति च लोकाश्रयत्वप्रत्यभिज्ञानान्निर्दि प्रमिति गम्यते । प्राणशब्दोप्ययं परमात्मन्येव प्रयुक्तः, ' प्राणस्य प्राणम् ' ( वृ ० ४ | ४ | १८ ) इति दर्शनात् । एजयितृत्वमपीदं परमात्मन एवोपपद्यते न वायुमात्रस्य । तथा चोक्तम्- ' न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ' ( का ० २।५।५ ) इति । उत्तरत्रापि ' भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ' ( का ० २ | ६ | ३ ) इति ब्रह्मैव निर्देक्ष्यते न वायुः । सवायुकस्य जगतो भयहेतुत्वाभिधानात् । तदेवेहापि संनिधानात् ' महद्भयं वज्रमुद्यतम् ' इति च भयहेतुत्वप्रत्यभिज्ञानान्निर्दिष्टमिति गम्यते । वज्र-शब्दोऽप्ययं भयहेतुत्वसामान्यात्प्रयुक्तः । यथा हि वज्रमुद्यतं ममैव शिरसि निपतेद्यद्यहमस्य शासनं न कुर्यामित्यनेन भयेन जनो नियमेन राजादिशासने प्रवर्तत एवमिदमग्निवायु-सूर्यादिकं जगदस्मादेव ब्रह्मणो बिभ्यन्नियमेन स्वव्यापारे प्रवर्तत इति भयानकं वज्रोपमितं ब्रह्म । तथा च ब्रह्मविषयं श्रुत्यन्तरम् -'भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्नि-श्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम: ' ( तै ० ८1१ ) इति । अमृतत्वफलश्रवणादपि ब्रह्मवेदमिति गम्यते । ब्रह्मज्ञानाद्व्यमृतत्वप्राप्तिः । ' तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( वे ० ६।१५ ) इति मन्त्रवर्णात् । यत्तु वायुविज्ञानात्वचिदमृतत्वमभिहितम्, तदापेक्षिकम् । जगत् प्राणमें चेष्टा करता है ' इस तरह लोकाश्रयरूप से प्रत्यभिज्ञान होने से वही निर्दिष्ट है । यह प्राण शब्द भी परमात्मामें ही प्रयुक्त है, क्योंकि ' प्राणस्य प्राणाम् ० ' ( प्राणका प्राण है ) ऐसा देखा जाता है । और यह एजयितृत्व- कम्पनकर्तृत्व भी परमात्मामें ही उपपन्न होता है, वायुमात्रमें नहीं, क्योंकि ' न प्राणेन नापानेन ० ' ( कोई भी मनुष्य प्राणी न प्राणसे और न अपानसे जीवित रहता है, किन्तु वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ) ऐसा कहा गया है । आगे मी ' भयादस्य ० ' ( इस - परमेश्वर के भयसे अग्नि तपता है, इसीके मयसे सूर्य तपता है तथा इसीके मयसे इन्द्र, वायु और पाँचवीं मृत्यु दौड़ती हैं अर्थात् नियमत: अपने अपने व्यापारमें प्रवृत्त होते हैं ) इस प्रकार ब्रह्मका ही निर्देश करेंगे वायुका नहीं, क्योंकि इसमें वायु सहित जगत् के भय हेतुत्वका अभिधान है । यहाँ भी ऐसा ज्ञात होता है कि संनिधान - प्रकरणसे और ' महद्भयं ० ' ( उद्यत वज्रके समान महान् भयका हेतु है ) इस प्रकार भय हेतुत्वरूप प्रत्यभिज्ञान होनेसे वही निर्दिष्ट है । यह वज्र शब्द भी भय हेतुत्व सादृश्यसे उसमें प्रयुक्त है । यदि मैं इसकी आज्ञा का पालन नहीं करूंगा तो यह उठा हुआ वज्र मेरे ही शिरपर पड़ेगा, इस भयसे जैसे लोग राजा आदिके शासन में प्रवृत्त होते है, वैसे अग्नि, वायु, सूर्यादि यह जगत् इसी ब्रह्मसे डरता हुआ नियमसे अपने व्यापारमें प्रवृत्त होता है, इससे मयानक वज्ज्रके साथ ब्रह्म की उपमा- तुलना की गई है । और ' भीषास्माद्वातः ० ' ( इसके भय से वायु चलता है, इसके मयसे सूर्य उदय होता है, तथा इसके मयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवीं मृत्यु दौड़ती हैं अर्थात् नियमतः अपना अपना व्यापार करते हैं ) इस प्रकार ब्रह्म विषयक यह दूसरी श्रुति है और अमृतत्व फलके श्रवणसे भी यही ज्ञात होता है कि प्राण ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानसे ही अमृतत्वकी प्राप्ति होती है, कारण कि ' तमेव विदित्वा ० ( उसोको जानकर मनुष्य मृत्युका अतिक्रमण कर जाता है, इससे भिन्न मोक्ष प्राप्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है ) यह मन्त्र है । किसी स्थलपर सत्यानन्दी - दीपिका प्रमित: ' इस ब्रह्मवाक्य में ब्रह्मज्ञानके लिए जीवका अनुवाद किया गया है । उसी प्रकार यहाँ ' यदिदं ' इस वाक्यमे प्राणानुवाद युक्त नहीं है, क्योंकि वह काल्पत है, इसलिए उसमें ब्रह्मकत्व युक्त नहीं है । इस प्रत्युदाहरण संगातस ' प्रसिद्ध: ' आदि पूर्वपक्ष करते हैं । • पूर्वपक्षमें प्राणकी उपासना है, सिद्धान्तमे ब्रह्मका ज्ञान ॥ ३ ९ ॥
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अधि ० ११ सू ० ४० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २७५ तत्रैव प्रकरणान्तरकरणेन परमात्मानमभिधाय ' अतोऽन्यदार्तम् ( वृ ० ३।४ ) इति वाय्वा-देरार्तत्वाभिधानात् । प्रकरणादध्यत्र परमात्मनिश्चयः, ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृता-कृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ' ( का ० १ | २ | १४ ) इति परमात्मनः पृष्टत्वात् ॥३ ९ ॥ ( ११ ज्योतिरधिकरणम् सू ० ४० ) ज्योतिदर्शनात् ॥ ४० ॥
पदच्छेद - ज्योतिः, दर्शनात् 1 सूत्रार्थ - ( ज्योतिः ) ' एष सम्प्रसादो ० ' इस श्रुतिमें ज्योतिः शब्दसे ब्रह्म ही प्रतिपाद्य है, ( दर्शनात् ) क्योंकि ' य आत्मा ' इस उपक्रम वाक्य के पर्यालोचनसे ब्रह्मकी ही प्रतिपाद्यरूपसे अनुवृत्ति देखी जाती है | * एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( छा ० ८।१२।३ ) इति श्रूयते । तत्र संशय्यते - किं ज्योतिःशब्दं चक्षुर्विषयतमोपहं तेजः, किंवा परं ब्रह्मेति 1 । किं तावत्प्राप्तम्? प्रसिद्धमेव तेजो ज्योतिःशब्दमिति । कुतः? तत्र ज्योतिःशब्दस्य रूढत्वात् । ' ज्योतिश्वरणाभिधानात् ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | २४ ) इत्यत्र हि प्रकरणा-ज्ज्योतिः शब्दः स्वार्थं परित्यज्य ब्रह्मणि वर्तते । न चेह तद्वत्किचित्स्वार्थपरित्यागे कारणं दृश्यते । तथा च नाडीखण्डे - ' अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते ' ( छा ० ८/६/५ ) इति मुमुक्षोरादित्यप्राप्तिरभिहिता । तस्मात्प्रसिद्धमेव तेजो ज्यतिःशब्दमिति । वायु विज्ञानसे जो अमृतत्व अभिहित है वह सापेक्षिक है, क्योंकि वही दूसरे प्रकारणमें परमात्माका अभिधान कर ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( इससे भिन्न आर्त - विनाशी है ) इस प्रकार वायु आदिको नाशवान् अभिधान किया है । प्रकरणसे भी यहाँ परमात्माका ही निश्चय होता है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्मसे भिन्न, अधर्मसे भिन्न तथा इस कार्यकारणरूप प्रपञ्चसे भिन्न है और जो भूत एवं भविष्यत् से भिन्न है, ऐसा जिसे देखते अनुभव करते हैं उसका ही मुझे उपदेश कीजिए ) इस प्रकार नचिकेता द्वारा परमात्मा ही पूछा गया है ॥ ३ ९ ॥ ' एष सम्प्रसादो ० ' ( यह सम्प्रसाद - जीव अविद्या दशामें देहात्मभावापन्न हुआ ब्रह्मनिष्ठ आचार्यके उपदेशसे देहमें आत्माभिमानको छोड़कर परम ज्योतिः को प्राप्तकर अपने स्वरूपसे अभिनिष्पन्न होता है ) ऐसी श्रुति है । यहाँ संशय होता है कि ज्योतिः शब्द वाच्य चक्षु विषय घट आदि पदार्थोके आवरक अन्धकारका नाशक सूर्यादि तेज है अथवा परब्रह्म है? तब यहाँ क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - प्रसिद्ध तेज ही ज्योतिः शब्द वाच्य है, किससे? इससे कि उसमें ज्योतिः शब्द रूढ है । ' ज्योति-श्वरणाभिधानात् ' इस सूत्र में तो प्रकरणसे ज्योतिः शब्द अपने अर्थका परित्याग कर ब्रह्मपरक है, परन्तु यहाँ उसके समान अपने प्रसिद्ध तेजरूप अर्थके परित्याग करनेमें कोई कारण दिखाई नहीं देता । इसी प्रकार नाडीखण्डमें ' अथ यन्त्र ० ' ( फिर जिस समय यह इस शरीर से उत्क्रमण करता है उस समय नाड़ियों में फैली रश्मियोंसे ऊपरकी और चढ़ता है ) इस प्रकार मुमुक्षुके लिए आदित्य की प्राप्तिका अभिधान है । इससे प्रसिद्ध तेज ही ज्योतिः शब्द वाच्य है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्व अधिकरणमें ब्रह्म प्रकरणके समर्थक सर्व जगत् व्यापार हेतुत्वरूप लिङ्गके सम्बन्धसे प्राणशब्द प्रसिद्ध वायु अर्थको छोड़कर ब्रह्मके लिए माना गया है । परन्तु उसीप्रकार ' य आत्मा ' इस प्रकारका अनुग्राहक कोई लिङ्ग नहीं है जिससे ज्योतिःशब्द प्रसिद्ध तेजको छोड़कर ब्रह्म परक हो । इस तरह प्रत्युदाहरण संगति से यह पूर्वपक्ष है । अतः यहां ज्योतिशब्दसे प्रसिद्ध सूर्यादि ज्योतिका ग्रहण करना चाहिए ।
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२७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ०३ * एवं प्राप्ते ब्रूमः - परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दम् । कस्मात्? दर्शनात् । तस्य हीह प्रकरणे वक्तव्यत्वेनानुवृत्तिर्दृश्यते, ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८।७।१ ) इत्यपहतपाप्मत्वादि-गुणकस्यात्मनः प्रकरणादावन्वेष्टव्यत्वेन विजिज्ञासितव्यत्वेन च प्रतिज्ञानात् । ' एतं स्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' ( छा ० ८ | ९ | ३ ) इति चानुसंधानात् । ' अशरीरं वात्र सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ' ( छा ० ८ १२ ।१ ) इति चाशरीरतायै ज्योतिःसंपत्तेरस्याभिधानात् " ब्रह्मभावाच्चान्यत्राशरीरतानुपपत्तेः, ' परं ज्योतिः ', ' स उत्तमः पुरुषः ' ( छा ० ८।१२१३ ) इति च विशेषणात् । यत्त्क्तं मुमुक्षोरादित्यप्राप्तिरभिहितेति, नासावात्यन्तिको मोक्षो गत्यु-त्क्रान्तिसंबन्धात् । न ह्यात्यन्तिके मोक्षे गत्युत्क्रान्ती स्त इति वक्ष्यामः ॥ ४० ॥
हम कहते हैं - परब्रह्म ही ज्योतिःशब्द वाच्य है, किससे? इससे कि उसका ही दर्शन ( अनुवृत्ति ) है | इस प्रकरण में वक्तव्यरूपसे उसकी ही अनुवृत्ति दिखाई देती है । क्योंकि ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( जो आत्मा पाप रहित है ) इस प्रकार पाप रहितत्व आदि गुण विशिष्ट आत्माकी प्रकरणसे अन्वेष्टव्यरूपसे और विजिज्ञासितव्यरूपसे प्रतिज्ञा की है । ' एतं त्वेव ते भूयो ० ' ( मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा ) इस प्रकार आत्माका अनुसन्धान है । ' अशरीरं वाच सन्तं ० ' ( अशरीर होनेपर प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते ) इस प्रकार शरीररहित स्वरूपके लिए इस जीवको ज्योतिः स्वरूपताका अभिधान है; ब्रह्मभावके बिना अशरीरत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती । ' परं ज्योतिः ० ' ( जो पर ज्योति है वह उत्तम पुरुष है ) ऐसा विशेषण है । जो यह कहा गया है कि मुमुक्षुके लिए आदित्य प्राप्तिका अभिधान है वह आत्यन्तिक मोक्ष नहीं, क्योंकि उसमें गति और उत्क्रान्तिका सम्बन्ध है । ऐसा आगे कहेंगे कि आत्यन्तिक मोक्षमें गति और उत्क्रान्ति नहीं होतीं ॥ ४० ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * प्रकरणका प्रधान प्रतिपाद्य अर्थ वही होता है जिसकी उपक्रममें प्रतिज्ञा, मध्यमें अनुसन्धान और अन्तमें उपसंहार हो, अतः मध्यगतवाक्य भी उस वस्तुका प्रतिपादन करता है, यह शास्त्रको मर्यादा है | छान्दोग्यके अष्टम अध्यायमें १५ खण्ड हैं - दो प्रकरण हैं । प्रथम प्रकरणमें प्रथम ६ खण्डों में दहरविद्याका प्रतिपादन है । द्वितीय प्रकरणमें ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इस प्रकार सप्तम खण्डसे लेकर समाप्ति पर्यन्त निर्गुणब्रह्मका ही प्रतिपादन है । द्वितीय प्रकरण में ' एष सम्प्रसादः ० ' यह मन्त्र भी निर्गुणब्रह्म परक है । ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इस प्रकरणके आरम्भमें पापरहितत्व आदि गुणविशिष्ट आत्माके जाननेकी प्रतिज्ञा है । ' एतं त्वेव ते ' इस वचनसे प्रजापतिने इन्द्र के प्रति पापरहित आत्माका मध्यमें तीन वार परामर्शकर उपदेश किया है । ' स उत्तमः पुरुषः ' इस वचनसे निर्गुण ब्रह्मका ही उपसंहार किया । ' उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ' ( गी ० १५।१७ ) ( तथा उन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है । उसे अविनाशी परमेश्वर परमात्मा कहा गया है ) इत्यादि गीतावचनसे भी परमात्मा ही उत्तम पुरुष कहा गया है । इसलिए पूर्वोक्त प्रतिज्ञा, परमार्श, उपसंहार और फलरूप लिङ्गसे इस प्रकरण में ब्रह्मकी ही अनुवृत्ति देखी जाती है । ज्योतिःशल्द सूर्यादि तेजका अभिधान नहीं करता किन्तु ब्रह्मका ही करता है । और आदित्य प्राप्तिरूप जो मोक्ष कहा गया है वह भी वास्तव में मोक्ष नहीं है, क्योंकि कैवल्यमोक्ष में गमन आदि नहीं होते । ' न तस्य प्राणाः उत्क्रामन्ति अत्रैव समविलीयन्ते ' ( ब्रह्मवेत्ता के प्राण [ पुर्यष्टका ] उत्क्रमण नही करते किन्तु यहीं विलीन हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुतिमें ब्रह्मवेत्ताके गमनागमनका निषेधकर परज्योतिः स्वरूपमें लीन - सा होना ही मोक्ष कहा गया है । पूर्वपक्ष में सूर्य की उपासना से ब्रह्मलोकद्वारा क्रममुक्तिफल है । सिद्धान्तमें ब्रह्मज्ञानसे साक्षात् मुक्ति ही फल है ॥ ४० ॥