श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 311–320
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 311–320
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अधि ० १२ सू ० ४१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २७७ ( १२ अर्थान्तरत्वव्यपदेशाधिकरणम् सू ० ४१ ) आकाशोऽर्थान्तरत्वा दिव्यपदेशात् ॥ ४१ ॥
पदच्छेद – आकाशः, अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । सूत्रार्थ - ( आकाशः ) ' आकाशो वै नाम - नाम रूपयोनिर्वहिता ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित आकाश ब्रह्म है, ( अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ) क्योंकि ' ते यदन्तरा ' इसमें आकाशका नामरूपसे अर्थान्तरत्व आदि रूपसे व्यपदेश है । ( आदि ) शब्द से ' तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ' इस प्रकार ब्रह्मत्वका व्यपदेश है । * ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ' ( छा ० ८1१ 1१ ) इति श्रूयते । तत्किमाकाशशब्दं परं ब्रह्म, किंवा प्रसिद्धमेव भूताकाशमिति विचारे भूत-परिग्रहो युक्तः; आकाशशब्दस्य तस्मिन्रूढत्वात्, नामरूपनिर्वहणस्य चावकाशदानद्वारेण तस्मिन्योजयितुं शक्यत्वात्, स्रष्टृत्वादेश्व स्पष्टस्य ब्रह्मलिङ्ग स्याश्रवणादिति । एवं प्राप्त इद-मुच्यते - परमेव ब्रह्मे हाकाशशब्दं भवितुमर्हति । कस्मात्? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । ' ते यदन्तरा तद्द्ब्रह्म ' इति हि नामरूपाभ्यामर्थान्तरभूत माकाशं व्यपदिशति । न च ब्रह्मणोऽ-न्यन्नामरूपाभ्यामर्थान्तरं संभवतिः सर्वस्य विकारजातस्य नामरूपाभ्यामेव व्याकृत्वात् । नामरूपयोरपि निर्वहणं निरङकुशं न ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति; ' अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि ' ( छा ० ६।३।२ ) इत्यादिब्रह्मकर्तृकत्वश्रवणात् । ननु जीवस्यापि प्रत्यक्षं नामरूपविषयं निर्वोतृत्वमस्ति । बाढमस्ति । अभेदस्त्विह विवक्षितः । नामरूपनिर्वहणा-भिधानादेव च स्रष्टुत्वादि ब्रह्मलिङ्गमभिहितं भवति । ' तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ' ( छा ० ८।१३ ) इति च ब्रह्मवादस्य लिङ्गानि । ' आकाशस्तल्लिङ्गात् ' ( ब्र ० १।१।२२ ) इत्यस्यैवायं प्रपञ्चः ॥४१ ॥
' आकाशो नै नाम ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है । वे ( नाम रूप ) जिसके अन्तर हैं वह ब्रह्म है, अमृत है, वही आत्मा है ) ऐसी श्रुति है । क्या वह आकाशशब्द परब्रह्म विषयक है? अथवा प्रसिद्ध भूत आकाश विषयक? ऐसा विचार उपस्थित होने पर पूर्वपक्ष में भूत आकाशका ग्रहण युक्त है, क्योंकि उसमें आकाश शब्द रूढ है । अवकाश देनेके कारण नाम रूपके निर्वाहकत्वकी उसमें योजना हो सकती है और श्रुतिमें स्रष्टृत्वादि स्पष्ट ब्रह्म लिङ्ग नहीं हैं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होने पर यह कहते हैं- यहाँ परब्रह्म ही आकाशशब्द वाच्य होना चाहिए, किससे? इससे कि यहाँ अर्थान्तरत्वादिका व्यपदेश है । ' ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ० ' ( वे जिसके अन्तर हैं वह ब्रह्म है ) इस प्रकार नाम रूपसे भिन्न अर्थभूत आकाशका व्यपदेश है । ब्रह्मसे अतिरिक्त नाम और रूपसे भिन्न अन्य पदार्थका संभव नहीं है, क्योंकि समस्त विकार समूह नाम रूपसे ही व्याकृत हैं । उसी प्रकार नाम रूपका स्वतन्त्ररूपसे निर्वहण ब्रह्मसे अन्यत्र सम्भव नहीं है, क्योंकि ' अनेन जीवेनाऽऽत्मना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) इत्यादि ब्रह्मकर्तृत्व श्रुति है । परन्तु जीवमें भी नाम रूपं विषयक निर्वहणकर्तृत्व प्रत्यक्ष है । यह सत्य है, परन्तु यहाँ तो अभेद विवक्षित है । नाम रूपके निर्वाह अभिधानसे हीं स्रष्टृत्वादि ब्रह्मलिङ्गका अभिधान हैं । ' तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ० ' ( वह ब्रह्म है, वह असूत है, वह आत्मा है ) ब्रह्मवाद लिङ्ग हैं | यह सूत्र ' आकाशस्तल्लिङ्गात् ' इस सूत्रका ही विस्तार है ॥४१ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे पूर्वंधिकरणमें ज्योतिः शब्दसे प्रसिद्ध सूर्यादि तेजका बाध कर ब्रह्मका प्रतिपादन किया. गया है, वैसे आकाशशब्दसे प्रसिद्ध भूताकाशका बाध कर भगवान् सूत्रकार ब्रह्मका प्रतिपादन करते हैं । इस प्रकार दृष्टान्तसंगति से इस अधिकरणका आरम्भ है । पूर्वपक्षी - ' आकाशस्तलिङ्गात् ' ( ब्र ० सू ० १।१।२२ ) इस सूत्र में ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्य ( का रा ( देव समुत्पद्यन्ते ' ( छा ० १।९ ।१ ) इस
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२७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ ( १३ सुषुप्त्युत्कान्त्यधिकरणम् सू ० ४२-४३ ) सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥४२ ॥
पदच्छेद- सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः, भेदेन । सूत्रार्थ - ' योऽयं विज्ञानमयः ' इत्यादि श्रुतियों में प्रतिपाद्यमान पुरुष परमात्मा हैं, क्योंकि ( सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः ) ' प्राज्ञेनात्मना ' इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्ति अवस्थाओं में ( भेदेन ) जोवसे भिन्नरूपसे परमात्माका प्राज्ञशब्दसे व्यपदेश है । * व्यपदेशादित्यनुवर्तते । बृहदारण्यके षष्ठे प्रपाठके ' कतम आत्मेति योऽयं विज्ञान-मयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः ' ( वृ ० ४।३।७ ) इत्युपक्रम्य भूयानात्मविषयः प्रपञ्चः कृतः । तत्कि संसारिस्वरूपमात्रान्वाख्यानपरं वाक्यम्, उतासंसारिस्वरूपप्रतिपादनपर मिति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? संसारिस्वरूपमात्र विषयमेवेति । कुतः? उपक्रमोपसंहाराभ्याम् । उपक्रमे योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' इति शारीरलिङ्गात् । उपसंहारे च ' स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ( वृ ० ४।४।२२ ) इति तदपरित्यागात्, मध्येऽपि बुद्धान्ताद्यवस्था-पन्यासेन तस्यैव प्रथञ्चनादिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - परमेश्वरोपदेशपर मेवेदं वाक्यं न शारीरमानान्वाख्यानपरम् । कस्मात्? सुषुप्तावुत्कान्तौ च शारीराद्भेदेन परमेश्वरस्य व्यपदेशात् । सुतौ तावत् ' अयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् ' ' व्यपदेशात् ' इस पदकी पिछले सूत्रसे अनुवृत्ति होती है । बृहदारण्यक के षष्ठ प्रपाठक में ' कतम आत्मेति ०. ( जनक - अहं बुद्धिके विषय देह, इन्द्रिय, मन और प्राण आदिमें से आत्मा कौन है? ' याज्ञ-वल्क्य —— यह जो प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंका साक्षिभूत हृदयके अन्तर्गत विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है वह आत्मा है ) ऐसा उपक्रम कर आत्मविषयक बहुत विस्तार किया गया है । क्या वह वाक्य केवल संसारी जीवके स्वरूप अनुवाद परक है अथवा परमात्मा के स्वरूप प्रतिपादन परक है, ऐसा संशय होता है, तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - [ कतम आत्मेति ] यह वाक्य केवल जीवस्वरूप विषयक है, किससे? इससे कि उपक्रम और उपसंहारसे ऐसा हो ज्ञात होता है । उपक्रम में ' योऽयं विज्ञानमय: ०१ ( यह जो प्राणोंमें विज्ञानमय है ) ऐसा जीवका लिङ्ग है, और ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणों में विज्ञानमय है ) इस उपसंहारमें भी उसका परित्याग नहीं है और मध्यमें भी जाग्रत् आदि अवस्थाओंके उपन्याससे उसका हो विस्तार है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं -- [ कतम आत्मा ] यह वाक्य परमेश्वर उपदेश परक ही है, केवल जीव स्वरूप अनुवाद परक नहीं है, किससे? इससे कि सुषुप्ति और उत्क्रान्ति ( मरण ) में जीवसे भिन्नरूपसे परमेश्वरका व्यपदेश है । सुषुप्ति में सत्यानन्दी - दीपिका प्रकार सर्व जगत् स्रष्टृत्व आदि ब्रह्मके असाधारण लिङ्ग होनेके कारण आकाशब्दसे परमात्माका ग्रहण किया गया है, वैसे ' आकाशो वै नाम ' यहाँ पर जगत् स्रष्टृत्व आदि ब्रह्मके स्पष्ट लिङ्गका श्रवण नहीं है । अतः आकाशशब्दसे ब्रह्मका ग्रहण न कर भूताकाशका ग्रहण करना चाहिए । पूर्वपक्ष में अमृत
आदि रूपसे आकाशकी उपासना है । सिद्धान्तमें निर्गुणब्रह्मका ज्ञान फल है ॥४१ ॥
* पूर्वाधिकरणमें नाम और रूपसे भिन्न होनेके कारण आकाश ब्रह्म कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि ' प्राज्ञेनात्मना ' इत्यादिसे ब्रह्मके साथ जीवका अभेद सिद्ध होने पर भी जैसे भेद कहा जाता है, वैसे औपचारिक भेदका कथन हो सकता है, ऐसी आक्षेपसंगति है । पूर्वाधिकरणमें जगत् स्रष्टृत्व ब्रह्मलिङ्गसे भूताकाशका बाध किया गया है, अब भगवान् सूत्रकार इस अधिकरणमें ब्रह्मके लिङ्गसे जोव के लिङ्गका बाघ दिखाते हैं । पूर्वपक्ष में ' कतम आत्मेति ' इस प्रकार के उपक्रम आदि - वाक्योंसे जीव ही प्रतिपाद्य सिद्ध होता है, ब्रह्म नहीं ।
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अधि ० १३ सू ० ४२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २७ ९ ( वृ ० ४।२।२१ ) इति शारीराद्भेदेन परमेश्वरं व्यपदिशति । तत्र पुरुषः शारीरः स्यात्तस्य वेदितृत्वात् । बाह्याभ्यन्तरवेदनप्रसङ्गे सति तत्प्रतिषेधसंभवात् । प्राज्ञः परमेश्वरः, सर्वशत्वलक्षणया प्रज्ञया नित्यमवियोगात् । तथोत्क्रान्तावपि ' अयं शारीर आत्मा प्राज्ञेना-त्मनान्वारुढ उत्सर्जन्याति ' ( वृ ० ४ | ३ | ३५ ) इति जीवाद्भेदेन परमेश्वरं व्यपदिशति । तत्रापि शारीरो जीवः स्यात्; शरीरस्वामित्वात् । प्राज्ञस्तु स एव परमेश्वरः । तस्मात्सुषुप्त्यु-कान्त्योर्भेदेन व्यपदेशात्परमेश्वर एवात्र विवक्षित इति गम्यते । यदुक्तमाद्यन्तमध्येषु शारीरलिङ्गात्तत्परत्वमस्य वाक्यस्येति । अत्र ब्रूमः - उपक्रमे तावत् ' थोऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' इति न संसारिस्वरूपं विवक्षितम्, किं तहि? अनूद्य संसारिस्वरूपं परेण ब्रह्मणाऽस्यैकतां विवक्षति । यतो ' ध्यायतीव लेलायतीव ' इत्येवमाद्युत्तरग्रन्थप्रवृत्तिः संसारिधर्मनिराकरणपरा लक्ष्यते । तथोपसंहारेऽपि यथोपक्रममेवोपसंहरति - स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' इति । योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु संसारी लक्ष्यते स वा एष महानज आत्मा परमेश्वर एवास्माभिः प्रतिपादित इत्यर्थः । * यस्तु मध्ये बुद्धान्ताद्यवस्थापन्यासात्संसारिस्वरूपविवक्षां मन्यते स प्राचीमपि दिशं प्रस्थापितः तो ' अयं पुरुषः ० ' ( यह पुरुष प्राज्ञात्मासे संस्लिष्ट - एक होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतर का ) यह श्रुति जीवसे भिन्नरूपसे परमेश्वरका व्यपदेश करती हैं । उसमें पुरुषशब्द जीव वाचक है, कारण कि वह वेदिता होनेसे बाह्य और भीतरके पदार्थोंके जाननेके प्रसंगमें उसका प्रतिषेध संभव है । प्राज्ञ परमेश्वर है, क्योंकि सर्वज्ञत्व लक्षण प्रज्ञासे उसका नित्य सम्बन्ध है । उसी प्रकार उत्क्रान्ति में भी ' अयं शारीर आत्मा ० ( उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हो शब्द करता हुआ जाता है ) इस प्रकार श्रुति परमेश्वरका जीवसे भिन्नरूपेण व्यपदेश करती है । उसमें भी शारीर जीव है, क्योंकि वह शरीरका स्वामी है । प्राज्ञ तो वही परमेश्वर है । इससे सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें [ जीव और परमेश्वरका ] भेदसे व्यपदेश होने से ऐसा ज्ञात होता है कि यहाँ परमेश्वर ही विवक्षित है । और यह जो कहा गया है कि आदि, मध्य और अन्तमें शारीरके लिङ्गसे यह वाक्य जीव परक है, तो इसपर हम कहते हैं— उपक्रममें ' योऽयं विज्ञानमय: ० ' ( जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है ) संसारका स्वरूप विविक्षित नहीं है । किन्तु जीवके स्वरूपका अनुवाद कर उसकी परब्रह्म के साथ एकताकी श्रुति विवक्षा करती है, क्योंकि ' ध्यायतीव ० ' ( वह ध्यान करता - सा है, चलता - सा है ) इत्यादि उत्तर ग्रन्थकी प्रवृत्ति | आत्मामें ] संसारी धर्मोंके निराकरण करनेमें लक्षित होती है । उसी प्रकार उपसंहार में भी उपक्रमके अनुसार ही ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है ) यह श्रुति उपसंहार करती है । जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय संसारी लक्षित होता है वह यह महान् अजन्मा आत्मा परमेश्वर ही है, ऐसा हमने प्रदिपादन किया है ऐसा अर्थ है । जो मध्य में जाग्रदादि अवस्थाके उपन्याससे संसारीके स्वरूपकी विवक्षाको मानता है, वह ऐसा है जैसे पूर्वदिशाको भेजा गया पर प्रस्थान पश्चिम दिशाको करता है । [ इस प्रकार परमात्मा परक उपदेशको जीव परक समझे ] क्योंकि जाग्रत् आदि अवस्थाके उपन्याससे आत्मा अवस्थावान् अथवा संसारी है, सत्यानन्दी - दीपिका इस प्रकार उपक्रम और उपसंहार आदि शारीरशब्दसे जीवके स्वरूपका अनुवाद कर प्राज्ञशब्दसे परमेश्वर के स्वरूपको प्रतिपादित करते हैं, जीवके स्वरूपको नहीं, क्योंकि जीव तो उपाधि विशिष्ट है, उसमें जन्म आदि रहितत्व मुख्यरूप से सम्भव नहीं है । अत: ' कतम आत्मेति ' यह श्रुति परमात्मा के स्वरूपका ही प्रतिपादन करती है । * जाग्रदादि अवस्थाओंका उपन्यास जीवके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिए नहीं है । किन्तु
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२८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ प्रतीचीमपि दिशं प्रतिष्ठेत । यतो न बुद्धान्ताद्यवस्थोपन्यासेनावस्थावत्त्वं संसारित्वं वा विवक्षति, किं तर्हि? अवस्थारहितत्वमसंसारित्वं च । कथमेतदवगम्यते? यत् ' अत ऊर्ध्व विमोक्षायैव ब्रूहि ' इति पदे पदे पृच्छति । यच्च ' अनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः ( बृ ० ४ | ३ | १४, १५ ) इति पदे पदे प्रतिवक्ति | ' अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाशोकान्हृदयस्य भवति ' ( बृ ० ४ | ३ | २२ ) इति च । तस्मादसंसारिस्वरूपप्रति-पादन परमेवैतद्वाक्यमित्यवगन्तव्यम् ॥ ४२ ॥
पत्यादिशब्देभ्यः ॥ ४३ ॥
सूत्रार्य -- ' सर्वस्य वशी ० ' इत्यादि श्रुतिस्थ पति आदि शब्दोंसे यही सिद्ध होता है कि यहाँ असंसारी परमेश्वरके स्वरूपका ही निरूपण है । * इतश्चासंसारिस्वरूपप्रतिपादनपर मेवैतद्वाक्यमित्यवगन्तव्यम् । यदस्मिन्वाक्ये पत्यादयः शब्दा असं सारिस्वरूपप्रतिपादनपराः संसारिस्वभावप्रतिषेधनाश्च भवन्ति । ' सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः ' इत्येवंजातीयका असंसारिस्वभावप्रतिपादनतराः । ' सन साधुना कर्मणा भूयान्न एवासाधुना कनीयान् ' इत्येवंजातीयकाः संसारिस्वभावप्रति-षेधनाः । तस्मादसंसारी परमेश्वर इहोक्त इत्यवगम्यते ॥ ४३ ॥
इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥
ऐसी विवक्षा नहीं करती, किन्तु वह अवस्था रहित और असंसारी है ऐसी विवक्षा करती है । परन्तु यह किस प्रकार जापान? इस प्रकार [ जनक और याज्ञवल्क्यका संवाद है ] ' अत ऊर्ध्वं ० ( जनक - अब आगे मुझे मोक्षके लिए उपदेश कीजिए ) इस प्रकार पद पदपर ( वारम्वार ) जनक प्रश्न करते हैं और ' अनन्वागतस्तेन. ' ( उस अवस्थासे वह असम्बद्ध रहता है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है ) याज्ञवल्क्य ऐसा प: पटपर ( वारम्वार ) उत्तर देते हैं । ' अनन्वागतं पुण्येन ० ' ( उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पाप से भी असम्बद्ध होता है हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पारकर लेता है ) ऐसी श्रुति है । इससे ऐसा निश्चय करना चाहिए कि यह वाक्य असंसरीके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिए है ॥४२ ॥
इससे भी यही निश्चय करना चाहिए कि यह वाक्य असंसारीके स्वरूप प्रतिपादन परक हैं, क्योंकि इस वाक्यमें पति आदि शब्द असंसारीके स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं और संसारीके स्वभाव ( धर्मों ) का प्रतिषेध करते हैं ' सबको अपने वशमें रखनेवाला सबका शासन करनेवाला वह सबका अधिपति है ' इस प्रकारके शब्द असंसारीके स्वभाव प्रतिपादन परक हैं । ' स न साधुना ० ' ( वह पुण्य कर्मसे बढ़ता नहीं और न पाप कर्मसे कम ही होता है ) इस प्रकारके शब्द संसारी स्वभावका निषेध करते हैं । इससे ऐसा अवगत होता है कि असंसारी परमेश्वर ही यहाँ कहा गया है ॥ ४३ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवाद के प्रथम अध्यायका तृतीय पाद समाप्त ॥३ ॥
-0000०- ~ सत्यानन्दी - दीपिका ' त्वम् ' पदार्थके शोधन द्वारा जीव - ब्रह्मके अभेद प्रतिपादनके लिए है । इससे वह जीवके स्वरूपका बोधक लिङ्ग नहीं है । राजा जनक और याज्ञवल्क्य के प्रश्नोत्तरसे असंसारी परमेश्वरका ही ज्ञान होता है । अत: ' कतम आत्मेति ' इत्यादि श्रुतिवाक्य मी असंसारी परमेश्वरके स्वरूपका ही प्रतिपादन करते हैं जीवके स्वरूपका नहीं ॥ ४२ ॥
* इससे यह सिद्ध होता है कि शोधित ' तत् ' और ' त्वम् ' अर्थकी एकतामें ही बृहदारण्यकके षष्ठ अध्यायका समन्वय है । इस अधिकरणका पूर्वपक्षमें कर्म कर्ता जीवकी स्तुतिरूप फल है और सिद्धान्त में जीवका अनुवाद कर शोधित ' तत् ' और त्वम् ' [ वह तू है ] अर्थकी एकताका निश्चय फल है ॥४३ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के प्रथय अध्यायका तृतीय पाद समाप्त ॥३ ॥
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २८१ प्रथमाध्याये चतुर्थः पादः । [ अत्र प्रधानविषयत्वेन संदिद्यमानानामव्यक्ताजादिपदानां चिन्तनम् ] प्रधान विषयक हैं ऐसे सन्देहसे युक्त अव्यक्त अजा आदि पदोंका इस पादमें विचार है । ( १ आनुमानिकाधिकरणम् सू ० १-७ ) * ब्रह्मजिज्ञासां प्रतिज्ञाय ब्रह्मणो लक्षणमुक्तम् - जन्माद्यस्य यतः ' ( ब ० सू ० १ । १ । २ ) इति । तलक्षणं प्रधानस्यापि समानमित्याशङ्कय तदशब्दत्वेन निराकृतम् - ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' ( ब्र ० सू ०१।१।५ ) इति । गतिसामान्यं च वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मकारणवादं प्रति विद्यते न प्रधान-कारणवादं प्रतीति प्रपञ्चितं गतेन ग्रन्थेन । इदं त्विदानीमवशिष्टमाशङ्कयते - यदुक्तं, प्रधान-स्याशब्दत्वं तदसिद्धम्, कासुचिच्छाखासु प्रधानसमर्पणाभासानां शब्दानां श्रूयमाणत्वात् । अतः प्रधानख्य कारणत्वं वेदसिद्धमेव महद्भिः परमर्षिभिः कपिलप्रभृतिभिः परिगृहीतमिति प्रसज्यते; तद्यावत्तेषां शब्दानामन्यपरत्वं न प्रतिपाद्यते तावत्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणमिति प्रतिपादितमप्याकुलीभवेत् । अतस्तेषामन्यपरत्वं दर्शयितुं परः संदर्भः प्रवर्तते-आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च ॥१ ॥
पदच्छेद - आनुमानिकम्, अपि, एकेषाम् इति चेत्, न, शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः, दर्शयति च । सूत्रार्थ - ( एकेषाम् ) कुछ शाखावाले ' महतः परमव्यक्तम ० ' इत्यादिमें ( आनुमानिकमपि ) अनुमानगम्य प्रधानको भी अव्यक्त शब्दसे स्वीकार करते हैं, इससे प्रधानमें अशब्दत्व सिद्ध नहीं होता, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( शरीररूपकविन्यस्तगृहिते: ) क्योंकि ' शरीरं रथमेव तु ' इस पूर्ववाक्यमें रथरूपकसे कल्पित शरीरका ग्रहण किया गया है, ( दर्शयति च ) पूर्वापर ग्रन्थका पर्यालोचन प्रकृत शरीरको अव्यक्तशब्द से ग्राह्य दिखलाता है । ' अथातो ' इस प्रथम सूत्रसे ब्रह्मजिज्ञासाकी प्रतिज्ञा कर ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्रसे उसका लक्षण कहा गया है । वह लक्षण प्रधानमें भी समान है, ऐसी आशङ्का कर श्रुति प्रतिपादित न होनेसे ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' इससे उसका निराकरण किया गया है । सभी वेदान्त वाक्योंकी ब्रह्म कारणवादके प्रति समान गति ( ज्ञान ) है; प्रधानकारणवादके प्रति नहीं है, ऐसा पिछले ग्रन्थ [ गतिसामान्यात् ] से विस्तार पूर्वक कहा गया है । अब अवशिष्ट विषयक आशङ्का की जाती है — यह जो कहा गया है । कि प्रधान अशब्द है वह अयुक्त है, क्योंकि कुछ एक शाखाओं में ऐसे शब्द श्रूयमाण हैं जिनके तात्पर्यका आमासं प्रधान परक होता है । अतः ऐसी प्रसक्ति हो रही है कि प्रधानमें कारणत्व वेद सिद्ध है, उसोका कपिलादि महान् परम ऋषियोंने ग्रहण किया । तो जब तक उन शब्दोंका अन्यपरत्व प्रतिपादन न किया जाय तबतक सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है ऐसा जो प्रतिपादन किया है वह बाधित हो जायगा । इसलिए उन शब्दोंका अन्यपरत्व दिखलानेके लिए अग्रिम ग्रन्थ प्रवृत्त होता है -सत्यानन्दी- दीपिका * यहाँ प्रधान विषय यह है कि ' अव्यक्त ' शब्दका अर्थविषयक सन्देह होने पर विचार करते हैं । पहले जैसे प्रसिद्ध जीव विषयक लिङ्गका अप्रसिद्ध ब्रह्मविषयक लिङ्गसे बाध कहा गया है, वैसे यहाँ प्रकरण प्राप्त श्रोत क्रमसे श्रौत क्रमके समान स्मार्तं क्रमका बाध भगवान् सूत्रकार शङ्का पूर्वक दिखाते हैं - ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इत्यादि मन्त्रगत आत्मा, शरीर, बुद्धि आदि यह श्रौत क्रम है । इसीके तुल्य महत्, अव्यक्त, पुरुष यह सांख्य स्मृतिग्रन्थका क्रम है । वहाँ श्रौतक्रमसे स्मार्तंक्रमका बाध— अव्यक्त शब्दसे प्रधानका ग्रहण न कर शरीरका ग्रहण करते हुए भगवान् सूत्रकार दिखाते हैं । ईक्षत्यधिकरणमें यह दिखलाया गया है कि सम्पूर्णं वेदान्त वाक्य जगत् कारणरूप से ब्रह्मका ही
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ * आनुमानिकमप्यनुमाननिरूपितमपि प्रधानमेकेषां शाखिनां शब्दवदुपलभ्यते । काठके हि पठ्यते- - महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ' ( १।३।११ ) इति । तत्र य एव यन्नामानो यत्क्रमाश्च महदव्यक्तपुरुषाः स्मृतिप्रसिद्धास्त एवेह प्रत्यभिज्ञायन्ते । तत्राव्यक्तमिति स्मृति-प्रसिद्धेः, शब्दादिहीनत्वाच्च न व्यक्तमव्यक्तमिति व्युत्पत्तिसंभवात्, स्मृतिप्रसिद्धं प्रधान-मभिधीयते । तस्य शब्दवत्त्वादशब्दत्वमनुपपन्नम् । तदेव च जगतः कारणं श्रुतिस्मृतिन्याय-प्रसिद्धिभ्य इति चेत् - नैतदेवम्, न होतत्काठकं वाक्यं स्मृतिप्रसिद्धयोर्महदव्यक्तयोरस्तित्व-परम् । न ह्यत्र यादृशं स्मृतिप्रसिद्धं स्वतन्त्रं कारणं त्रिगुणं प्रधानं तादृशं प्रत्यभिज्ञायते । शब्दमात्रं ह्यत्राव्यक्तमिति प्रत्यभिज्ञायते । स च शब्दो न व्यक्तमव्यक्तमिति यौगिकत्वा-आनुमानिक — अनुमानसे निरूपित प्रधान भी जगत् कारण कतिपय वैदिक शाखावालोंके मन्त्रोंसे प्रतिपादित उपलब्ध होता है । जैसे कि ' महतः परम ० ' ( महत्से अव्यक्त - मूल प्रकृति पर सूक्ष्मतर है और अव्यक्त से भी पुरुष पर अतिसूक्ष्म है ) काठकमें ही पठित है । वहाँ जो नाम और जो क्रम - महत्, अव्यक्त और पुरुष सांख्यशास्त्रमें प्रसिद्ध हैं वे ही यहाँ कठश्रुतिमें प्रत्यभिज्ञात होते हैं । उनमेंसे अव्यक्त शब्द सांख्य शास्त्रमें प्रसिद्ध होने और शब्द आदि रहित होने तथा ' न व्यक्तं अव्यक्तम् ' ' जो व्यक्त न हो वह अव्यक्त है ' इस व्युत्पत्ति के सम्भव होनेसे सांख्यशास्त्र प्रसिद्ध प्रधानका अभिधान करता है । इसलिए श्रुति प्रतिपादित होने से उसे अशब्द कहना युक्त नहीं है । श्रुति, स्मृति और तर्क से यह सिद्ध है कि वही प्रधान जगत्का कारण है । सिद्धान्ती - यदि ऐसा कहो तो ऐसा नहीं है, क्योंकि यह कठश्रुति सांख्य स्मृति प्रसिद्ध महत् और अव्यक्तके अस्तित्व विषयक नहीं है, कारण कि जैसा सांख्य शास्त्र प्रसिद्ध जगत्का स्वतन्त्र कारण त्रिगुणात्मक प्रधान है, वैसे यहाँ प्रत्यभिज्ञात नहीं होता, किन्तु यहाँ तो केवल अव्यक्त शब्दमात्रकी प्रत्यभिज्ञा होती है, और वह शब्द जो व्यक्त नहीं है वह अव्यक्त है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार यौगिक होनेसे प्रधानसे भिन्न सूक्ष्म एवं अत्यन्त दुर्लक्ष्य पदार्थमें भी सत्यानन्दी - दीपिका प्रतिपादन करते हैं । प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है । सम्पूर्ण वेदान्त वाक्योंका ब्रह्ममें समन्वय है, ऐसा विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है । यहाँ जो यह कहा गया है कि प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है, वह युक्त नहीं है । इससे ईक्ष्त्यधिकरणकी इस अधिकरणके साथ आक्षेप-संगति है । कपिल आदि महर्षि जनोंने अव्यक्त शब्दसे प्रधानको कारणरूपसे स्वीकार किया है । कुछ एक शाखाओं में प्रधान परक शब्दाभास मिलते हैं, अतः कारणता विषयक सन्देह उत्पन्न होता है कि प्रपञ्चका कारण परमेश्वर है अथवा प्रधान? अब इस प्रधान कारण वादका निराकरण करनेके लिए यह अग्रिम ग्रन्थ आरम्भ होता है । * ' कार्य तस्तदुपलब्धेः ' ' कार्यसे कारणकी उपलब्धि होती है ' इससे प्रधानको आनुमानिक-अनुमान गम्य कहा गया है । जो पहले प्रधानको अशब्द - श्रुति अप्रतिपादित कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि ' महतः परमव्यक्तम ' इस कठ श्रुतिमें प्रधानका ही अव्यक्त शब्दसे ग्रहण है । ' अजा-मेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः ' ( श्वेत ० ४।५ ) ( अपने अनुरूप बहुत-सी प्रजा उत्पन्न करने वाली एक लोहित ( रज ) शुक्ल ( सत्त्व ) कृष्ण ( तम ) वर्णा अजा - बकरी - प्रकृति को एक अज ( बकरा - जीव ) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तमोगाको त्याग देता है ) इस अन्य श्रुतिमें प्रधानका अजा ' न जायते इति अजा ' शब्दसें ग्रहण किया गया है । और ' हेतुः प्रकृतिरुच्यते ' ( गी ० १३।२० ) ( प्रकृति - प्रधानको हेतुरूपसे कहा जाता है ) इत्यादि स्मृति है । ' यदल्पं तत् जडप्रकृतिकम् ' ' जो परिच्छिन्न है वह जड़ प्रकृतिसे जन्य है ' यह तर्क है । इसप्रकार उक्त श्रुति, स्मृति और तर्कसे सिद्ध होता है कि प्रधान ही जगत्का कारण है ब्रह्म नहीं |
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २८३. दन्यस्मिन्नपि सूक्ष्मे सुदुर्लक्ष्ये च प्रयुज्यते । न चार्य कस्मिंश्चिद्रढः । या तु प्रधान-वादिनां रूढिः सा तेषामेव पारिभाषिकी सती न वेदार्थनिरूपणे कारणभावं प्रतिपद्यते । न च क्रममात्रसामान्यात्समानार्थप्रतिपत्तिर्भवत्यसति तद्रूपप्रत्यभिज्ञाने । न ह्यश्वस्थाने गां पश्यन्नश्वोऽयमित्यमूढोऽध्यवस्यति । प्रकरणनिरूपणायां चात्र न परपरिकल्पितं प्रधानं प्रतीयते; शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः । शरीरं ह्यत्र रथरूपकविन्यस्तमव्यक्तशब्देन परिगृह्यते । कुतः? प्रकरणात्परिशेषाच्च । तथा धनन्तरातीतो ग्रन्थ आत्मशरीरादीनां रथिरथादिरूपक क्लृप्तिं दर्शयति - ' आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च । इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं मोक्तेत्या-हुर्मनीषिणः ॥ ' ( का ० १ | ३ | ३, ४ ) इति । तैश्चेन्द्रियादिभिरसंयतैः संसारमधिगच्छति । संयतैस्त्वध्वनः पारं तद्विष्णोः परमं पदमाप्नोतीति दर्शयित्वा किं तदध्वनः पारं विष्णोः परमं पदमित्यस्यामाकाङ्क्षायां, तेभ्य एव प्रकृतेभ्य इन्द्रियादिभ्यः परत्वेन परमात्मान-मध्वनः पारं विष्णोः परमं पदं दर्शयति- ' इन्द्रियेभ्यः परा ार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धेरात्मा महान्परः ॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न, परं किंचित् सा काष्ठा सा प्रयुक्त हो सकता है, यह अव्यक्त शब्द किसी अर्थ में रूढ नहीं है, जो प्रधान वादियोंको रूढि है अर्थात् प्रधान ही अव्यक्त शब्दवाच्य है वह उनकी पारिभाषिक होनेसे अपौरुषेय वेदार्थ निरूपण करने में कारणभाव को प्राप्त नहीं हो सकती । वस्तुरूपके प्रत्यभिज्ञान न होनेपर केवल क्रमकी समा-नतासे समान अर्थका ज्ञान नहीं होता । कोई भी बुद्धिमान् पुरुष अश्वके स्थान में वृषभको देखकर ' यह अश्व है ' ऐसा निश्चय नहीं करता, यहाँ प्रकरणका निरूपण करनेपर प्रतिपक्षीसे परिकल्पित प्रधानकी प्रतीति नहीं होती, क्योंकि यहाँ शरीररूपकके विन्यासका ग्रहण है । निस्सन्देह, यहाँ रथ-रूपकसे विन्यस्त शरीरका ही अव्यक्तशब्दसे ग्रहण किया जाता है, क्योंकि प्रकरण और परिशेष हैं । कारण कि उसी प्रकार ‘ आत्मानं रथिनं विद्धि ० ( तू आत्माको रथी और शरीरको रथ जान, बुद्धिको सारथि एवं मनको लगाम समझ, विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको अश्व तथा उनके अश्वरूपसे कल्पित किए जानेपर विषयों को उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ) यह अव्यवहित अतीत ग्रन्थ आत्मा शरीर आदिमें रथी रथ आदि रूपककी क्लृप्ति ( कल्पना ) दिखलाता है । उन असंयत इन्द्रियादिसे वह जन्म - मरण रूप संसारको प्राप्त होता है और उन संयत इन्द्रिय आदिसे जन्म - मरण रहित उस विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है, ऐसा दिखलाकर जन्म मरण रहित वह विष्णुका परम पद क्या है? इस प्रकार नचिकेताकी यह आकांक्षा होनेपर [ यमराज कहते हैं ] ' इन्द्रियेभ्यः परा ० ( इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि पर है और बुद्धिसे भी महान् आत्मा ( महत् ) श्रेष्ठ है । महत्से अव्यक्त ( सूक्ष्म प्रकृति ) श्रेष्ठ है और अव्यक्त से भी पुरुष पर है । पुरुषसे पर और कुछ नहीं है । वही ( सूक्ष्मत्वकी ) पराकाष्ठा - अवधि है, वही परा - उत्कृष्ट गति है ) यह श्रुति उन प्रकृत इन्द्रिय आदिसे पर परमात्माको ही जन्म - मरण रहित सत्यानन्दी - दीपिका * ' महतः परमव्यक्तम् ' यह क्रम भी समान अर्थका बोधक नहीं हो सकता । किसी एक ज्ञात पदार्थके स्थान पर उससे भिन्न पदार्थको देखकर उस ज्ञात अर्थका ज्ञान नहीं होता, जैसे अश्वके स्थान पर गौको देखकर ' यह अश्व है, ऐसा ज्ञान किसी विवेकीको नहीं होता, वैसे श्रुतिस्थक्रममें ' अव्यक्त ' - शब्दको देखकर सांख्य स्मृति कल्पित प्रधानसे भिन्न शरीररूपी अर्थको जानता हुआ बुद्धिमान् पुरुष प्रधान विषयक ज्ञानको प्राप्त नहीं होता । इसलिए प्रकरण धोर परिशेषरूप नियामकके विद्यमान होनेसे शरीरका ही अव्यक्त शब्दरी ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि श्रुतिने शरीर आदिमें रथ आदिकी सादृश्य कल्पना दिखलाई हैं ।
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ परा गतिः ॥ ' ( का ० १।३ | १०, ११ ) इति । तत्र य एवेन्द्रियादयः पूर्वस्यां रथरूपकक-ल्पनायामश्वादिभावेन प्रकृतास्त एवेह परिगृह्यन्ते प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिया परिहाराय । तत्रेन्द्रियमनोबुद्धयस्तावत्पूर्वत्रेह च समानशब्दा एव | अर्था ये शब्दादयो विषया इन्द्रियहयगोचरत्वेन निर्दिष्टास्तेषां चेन्द्रियेभ्यः परत्वम्; ' इन्द्रियाणां ग्रहत्वं विषयाणामति-ग्रहत्वम् ' ( बृ ० ३।२ ) इति श्रुतिप्रसिद्धेः । विषयेभ्यश्च मनसः परत्वं; मनोमूलत्वाद्विष-येन्द्रियव्यवहारस्य । मनसस्तु परा बुद्धिः । वुद्धिं ह्या भोग्यजातं भोक्तारमुपसर्पति । ' बुद्धेरात्मा महान्परः ', यः स ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इति रथित्वेनोपक्षिप्तः । कुतः? आत्म-शब्दात् । भोक्तुश्च भोगोपकरणात्परत्वोपपत्तेः । महत्त्वं चास्य स्वामित्वादुपपन्नम् । * अथवा – ' मनो महान्मतिर्ब्रह्मा पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः । प्रज्ञा संविश्च्चितिश्चैव स्मृतिश्च परिपठ्यते ॥ ' इति स्मृतेः, ‘ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ' ( इवे ० ६।१८ ) इति च विष्णुका परम पद दिखलाती है । उस श्रुति में पहले रथ रूपककी कल्पनामें अश्व आदि रूपसे जो इन्द्रिय आदि प्रकृत हैं इस प्रकृतकी हानि और अप्रकृत ( प्रधान ) के कल्पनारूप दोषके परिहारके लिए उनका ही इस श्रुति वाक्यमें ग्रहण किया जाता है । उनमेंसे इन्द्रिय, मन और बुद्धि तो पूर्वं वाक्य में और यहाँ ( इन्द्रियेभ्यः परा ) समान शब्दों से ही निर्दिष्ट हैं । अर्थ अर्थात् शब्द आदि विषय जो इन्द्रियरूप अश्वोंके मार्गरूपसे निर्दिष्ट हैं, उनमें इन्द्रियोंसे परत्व है क्योंकि ' इन्द्रियाणां ग्रहत्वं ० ' ( घ्राण, रसना, वाक्, नेत्र, श्रोत्र, मन, हस्त, त्वक्, इन आठ इन्द्रियों को श्रुति ग्रह कहा है, क्योंकि पुरुष पशुको ये इन्द्रियाँ अपने वशमें करती हैं, परन्तु ये इन्द्रियाँ भी गन्ध, रस, नाम, रूप, शब्द, काम, कर्म और स्पर्श आदि विषय सम्बन्धके विना स्वतः इस पुरुष पशुको अपने वशमें नहीं कर सकतीं, अतः इन गन्ध आदि आठोंको अतिग्रह कहा है, इसलिए इन्द्रियाँ ग्रह हैं और विषय अतिग्रह हैं ) ऐसा श्रुतिमें प्रसिद्ध है । विषयोंसे मन श्रेष्ठ है, क्योंकि विषय और इन्द्रियोंका सम्पूर्णं व्यवहार मनके अधीन है, बुद्धि मनसे श्रेष्ठ है, कारण कि भोग्य समुदाय बुद्धिपर आरूढ होकर मोक्ता के पास जाता है । जो ' आत्मानं रथिनं ० ' ( आत्माको रथी जान ) इस प्रकार रथीरूपसे निर्दिष्ट महान् आत्मा है वह बुद्धिसे श्रेष्ठ है, क्योंकि श्रुतिमें आत्मशब्द है । भोगकी सामग्री ( बुद्धि आदि ) से भोक्ता उत्कृष्ट हो सकता है । स्वामी होनेसे वह महान् भी हो सकता है । अथवा ' मनो महान्मति ० ' ( समष्टि बुद्धि मनन शक्ति, माविनिश्चय, व्यापिनी, ब्रह्मा आत्मा, भोग्य वर्गका आश्रय, तात्कालिक निश्चय, कीर्ति -शक्ति, नियमन शक्ति, त्रैकालिक निश्चय, संवित् - अभिव्यञ्जिका, चित् एवं स्मृति कही जाती है ) इस स्मृति के अनुसार एवं ' यो ब्रह्माणं ० ' ( जो सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माको उत्पन्न करता है और सत्यानन्दी - दीपिका * ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इस मन्त्रसे रथ रूपककी कल्पनामें अश्व आदि रूपसे जिन इन्द्रिय आदिका ग्रहण है, उनका ही ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ' इत्यादि मन्त्रमें ग्रहण है, इससे वे ही प्रकृत हैं उनका ग्रहण न करनेसे प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रधानका कल्पनारूप दोष प्रसक्त होता है । उसके परिहारके लिए अव्यक्त शब्दसे प्रकृत शरीरका ग्रहण करना युक्त है अप्रकृत प्रधानका नहीं । ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इस पूर्व मन्त्रमें तथा ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ' इस उत्तर मन्त्रमें इन्द्रिय, मन और बुद्धि ये शब्द समान हैं और पूर्व मन्त्रमें ' विषय ' शब्द है एवं उत्तर मन्त्र में ' अर्थ ' शब्द है, इससे शब्द भेदसे अर्थका भेद नहीं है, इसलिए उत्तर मन्त्र में अर्थ शब्दसे भी विषयका ही ग्रहण करना चाहिए । इस प्रकार इन दोनों मन्त्रोंकी एक वाक्यता सिद्ध होती है । श्रुतिस्थ परत्व शब्द मोक्ता विष-I यक है, क्योंकि भोग्य समुदाय मोक्ताके लिये होता है, अतः भोक्ता भोग्य समुदायसे महान् और श्रेष्ठ है । * ' मनो महान्मतिर्ब्रह्मा ० ' ( संकल्परूप शक्तिसे हिरण्यगर्भकी बुद्धिका नाम मन है, व्यष्टि
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २८५ श्रुतेः, या प्रथमजस्य हिरण्यगर्भस्य बुद्धिः सा सर्वासां बुद्धीनां परा प्रतिष्ठा । सेह महा-नात्मेत्युच्यते । सा च पूर्वत्र बुद्धिग्रहणेनैव गृहीता सती हिरुगिहोपदिश्यते; तस्या अप्यस्मदीयाभ्यो बुद्धिभ्यः परत्वोपपत्तेः । एतस्मिंस्तु पक्षे परमात्मविषयेणैव परेण पुरुष ग्रहणेन रथिन आत्मनो ग्रहणं द्रष्टव्यम्; परमार्थतः परमात्मविज्ञानात्मनोर्भेदा-भावात् । तदेवं शरीरमेवैकं परिशिष्यते । इतराणीन्द्रियादीनि प्रकृतान्येव परमपददि-दर्शयिषया समनुक्रामन्परिशिष्यमाणेनेहान्त्येनाव्यक्तशब्देन परिशिष्यमाणं प्रकृतं शरीरं दर्शयतीति गम्यते । शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनासंयुक्तस्य ह्यविद्यावतो भोक्तुः शरीरादीनां रथादिरूपककल्पनया संसारमोक्षगतिनिरूपणेन प्रत्यगात्मब्रह्मावगतिरिह विवक्षिता । तथा च ' एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ ' ( का ० २ | ३ | १२ ) इति वैष्णवस्य परमपदस्य दुरवगमत्वमुक्त्वा तदवगमार्थं योगं दर्शयति- ' यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्य-च्छेच्छान्त आत्मनि ॥ ' ( का ० १ | ३ | १३ ) इति । एतदुक्तं भवति - वाचं मनसि संयच्छेत् जो उसकी बुद्धि में वेदोंका आविर्भाव करता है ) इस श्रुतिके अनुसार प्रथम उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ की जो बुद्धि है, वह सम्पूर्ण बुद्धियोंकी परम प्रतिष्ठा है, वही यहाँ महान् आत्मा है, ऐसी कही जाती है । पहले मन्त्र ( आत्मानं रथिनं विद्धि ) में पठित बुद्धि शब्दके ग्रहणसे वह गृहीत होनेपर भी यहाँ पृथक् उपदिष्ट है, क्योंकि उसमें भी अस्मदादि बुद्धियोंकी अपेक्षासे परत्व उपपन्न है । परन्तु इस पक्ष में अन्तिम आनेवाले परमात्मविषयक पुरुषशब्दके ग्रहणसे ही रथी आत्माका ग्रहण समझना चाहिए । कारण कि परमार्थसे परमात्मा और विज्ञानात्मामें कोई भेद नहीं हैं । इस प्रकार उनमें केवल एक शरीर ही शेष रह जाता है । यहाँ ऐसा ज्ञात होता है कि परम पदको दिखलानेकी इच्छासे पूर्व मन्त्रमें पठित अन्य इन्द्रिय आदिका अनुक्रमसे ग्रहण करती हुई कठ श्रुति यहाँ अवशिष्ट अन्तिम अव्यक्त शब्दसे परिशिष्ट प्रकृत शरीरको ही दिखलाती है । अत: शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय और वेदनासे सम्बद्ध अविद्यावान् भोक्ताके शरीर आदिको रथ आदिके साथ सादृश्य कल्पनाके द्वारा संसार गमन और मोक्ष प्राप्तिका निरूपणकर प्रत्यगात्माका ब्रह्मरूपसे ज्ञान कराना ही यहाँ विवक्षित है । और इसीप्रकार ' एष सर्वेषु ० ' ( सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता, यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषों द्वारा अपनी तीब्र एवं सूक्ष्म बुद्धिसे ही देखा जाता है अर्थात् वे ब्रह्माकार वृत्तिसे साक्षात्कार करते हैं ) इसप्रकार विष्णु के परम पदकी दुर्विज्ञेयता कहकर उसके ज्ञानके लिए ' यच्छे-द्वाङ्मनसी ० ( विवेकी पुरुष वाक् इन्द्रियका मनमें लय करे, उसका प्रकाशस्वरूप बुद्धिमें लय करे, वुद्धिको महान् आत्मामें लीन करे और उसको शान्त आत्मामें नियुक्त करे ) इस प्रकार यह श्रुति योगको दिखलाती है । इसका तात्पर्य यह है - वाणीका मनमें लय करे अर्थात् वाणी आदि बाह्य इन्द्रियों के व्यापारका त्यागकर केवल मनरूपसे अवस्थित रहे । विषयविकल्पाभिमुख मनका भी विकल्पसम्बन्धी सत्यानन्दी -दीपिका मनोंमें व्याप्त होनेसे महान् है, सन्देह निवृत्तिका कारण होनेसे मति है, महत्त्ववाली होने से ब्रह्मा है, भोग्य समुदायका आश्रय होने के कारण नगरी है, निश्चायात्मक होनेसे बुद्धि है, कीर्ति शक्तिवाली होनेसे ख्याति है, नियमन शक्ति होनेसे ईश्वर है, लोकमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप होनेसे प्रज्ञा है, पदार्थों की अभिव्यञ्जिका होनेसे संवित् है, चैतन्य प्रधान होनेसे चिति है, ज्ञात सर्वार्थका अनुसंधान करनेसे स्मृति है, इसप्रकार विद्वानों द्वारा कही जाती है ) इस प्रकार श्रुति एवं स्मृति में प्रसिद्ध हिरण्यगर्भ की बुद्धको महान् आत्मा शब्दसे ग्रहण किया गया है । उसका ग्रहण करनेसे भी श्रुति समन्वित होती है । इसप्रकार प्रकरण और परिशेषसे अव्यक्त शब्दसे शरीरका ग्रहण करना चाहिए । सांख्य स्मृति कल्पित
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२८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ वागादिबाह्येन्द्रियव्यापारमुत्सृज्य मनोमात्रेणावतिष्ठेत । मनोऽपि विषयविकल्पाभिमुखं विकल्पदोषदर्शनेन ज्ञानशब्दोदितायां बुद्धावध्यवसायस्वभावायां धारयेत् । तामपि बुद्धि महत्यात्मनि भोक्तर्यग्रयायां वा बुद्धौ सूक्ष्मतापादनेन नियच्छेत् । महान्तं त्वात्मानं शान्त आत्मनि प्रकरणवति परस्मिन्पुरुषे परस्यां काष्ठायां प्रतिष्ठापयेदिति च । तदेवं पूर्वापरालोचनायां नास्त्यत्र परपरिकल्पितस्य प्रधानस्यावकाशः ॥ १ ॥
सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥२ ॥
पदच्छेद - सूक्ष्मम्, तु, तदर्हत्वात् । सूत्रार्थ - ( सूक्ष्मम् ) स्थूल शरीरके आरम्भक सूक्ष्मभूत ( सूक्ष्म शरीर ) का अव्यक्त शब्दसे ग्रहण है, ( तदर्हत्वात् ) क्योंकि वे अव्यक्त शब्दके योग्य हैं । ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है | * उक्तमेतत्प्रकरणपरिशेषाभ्यां शरीरमव्यक्तशब्दं न प्रधानमिति । इदमिदानीमा-शङ्कयते - कथमव्यक्तशब्दाईत्वं शरीरस्य? यावता स्थूलत्वात्स्पष्टतरमिदं शरीरं व्यक्त-शब्दार्हम स्पष्टवचनस्त्वव्यक्तशब्द इति । अत उत्तरमुच्यते-- सूक्ष्मं त्विह कारणात्मना शरीरं विवक्ष्यते; सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात् । यद्यपि स्थूलमिदं शरीरं न स्वयमव्यक्त-शब्दमर्हति तथापि तस्य त्वारम्भकं भूतसूक्ष्ममव्यक्तशब्दमर्हति । प्रकृतिशब्दश्व विकारे दृष्टः । यथा ‘ गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( ऋ ० सं ० ९ ४६ । ४ ) इति । श्रुतिश्च - ' तद्वेदं तर्ह्यव्या-कृतमासीत् ' ( बृ ० १।४।७ ) इतीदमेव व्याकृतनामरूपविभिन्नं जगत्प्रागवस्थायां परित्यक्त-व्याकृतनामरूपं बीजशक्त्यवस्थ मव्यक्तशब्दयोग्यं दर्शयति ॥ २ ॥
दोष दर्शन से ज्ञानशब्द से कथित निश्चयात्मक बुद्धि में लय करे । उस बुद्धिका भी महान आत्मा भोक्तामें अथवा समाधिके परिपाकसे उत्पन्न बुद्धि में अधिक सूक्ष्मता संपादन द्वारा लय करे । और उस महान् आत्माका प्रकरण प्राप्त अन्तिम काष्ठा - अवधि शान्त आत्मा पर ब्रह्ममें लय करे अर्थात् ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार अभेदरूपसे स्थितिका अनुभव करे । इसप्रकार पूर्वापर वाक्योंकी पर्यालोचना करने पर सिद्ध होता है कि पूर्वपक्षी द्वारा परिकल्पित प्रधानका यहाँ कोई अवकाश ( स्थान ) नहीं है | १ || प्रकरण और परिशेषसे यह कहा गया है कि शरीर अव्यक्त शब्द वाच्य है प्रधान नहीं । अब यह आशङ्का होती है कि जब स्थूल होनेके कारण यह शरीर अतिस्पष्टरूपसे व्यक्त शब्दके योग्य प्रतीत हो रहा है तो वह शरीर अव्यक्त शब्दके योग्य कैसे हो सकता है? अव्यक्त शब्द तो अस्पष्टका वाचक है | सिद्धान्ती — इसके उत्तरमें कहते हैं कि यहाँ अव्यक्त शब्द द्वारा कारणरूप होनेसे सूक्ष्म शरीर ही विवक्षित है, क्योंकि सूक्ष्म अव्यक्त शब्दके योग्य है । यद्यपि यह स्थूल शरीर स्वयं अव्यक्त शब्दके योग्य नहीं है, तो भी उसके आरम्भक [ आकाश आदि ] सूक्ष्मभूत अव्यक्त शब्दके योग्य हैं । प्रकृति शब्द विकार अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, जैसे ' गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( गौके विकार दूधके साथ सोम रसका मिश्रण करे ) तो उसी प्रकार यहाँ श्रुति मी ' तद्धेदं ० ' ( तब - प्रागवस्थामें यह जगत् अव्याकृत- अव्यक्त था ) ऐसा यह परोक्षापरोक्षात्मक व्याकृत भिन्न - भिन्न नाम रूपवाला जगत् मी जो कि सृष्टिके पूर्व अपने व्याकृत नाम रूपको परित्याग किया हुआ बीजशक्ति रूपं ( संस्कार रूप ) से अवस्थित रहता है, उसको ही यहाँ श्रुति अव्यक्त शब्दके योग्य दिखलाती है ॥ २ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका प्रधानका नहीं, क्योंकि प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है । श्रुतिका तात्पर्यं तो केवल जीवको ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादन करने में हैं ॥ १ ॥
* जो वस्तु नेत्र आदि इन्द्रिय द्वारा स्पष्ट प्रतीत होती हो वह व्यक्त और जो स्पष्ट प्रतीत न हो वह अव्यक्त कहलाती है । यह स्थूल शरीर तो नेत्र आदि इन्द्रियोंसे सबको स्पष्टरूपसे प्रत्यक्ष है, मतः