श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 321–330

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 321–330

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अधि ० १ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २८७ तदधीनत्वादर्थवत् ॥ ३ ॥

पदच्छेद - तदधीनत्वात्, अर्थवत् । सूत्रार्थ - ( तदधीनत्वात् ) अव्यक्त ईश्वर के अधीन होनेसे स्वतन्त्र नहीं है, ( अर्थवत् ). जगत् की उत्पत्ति में ईश्वरका सहायक होनेसे सार्थक भी है । अत्राह - यदि जगदिदमनभिव्यक्तनामरूपं बीजात्मकं प्रागवस्थमव्यक्तशब्दाह-मभ्युपगम्येत, तदात्मना च शरीरस्याप्यव्यक्तशब्दार्हत्वं प्रतिज्ञायेत, स एव तर्हि प्रधानकारणवाद एवं सत्यापद्येत । अस्यैव जगतः प्रागवस्थायाः प्रधानत्वेनाभ्युपग-मादिति । अत्रोच्यते - यदि वयं स्वतन्त्रां कांचित्प्रागवस्थां जगतः कारणत्वेनाभ्यु-पगच्छेम प्रसञ्जयेम तदा प्रधानकारणवादम् । परमेश्वराधीना त्वियमस्माभिः प्राग-वस्था जगतोऽभ्युपगम्यते, न स्वतन्त्रा । सा चावश्याभ्युपगन्तव्या । अर्थवती हि सा । न हि तया विना परमेश्वरस्य स्रुष्टुत्वं सिद्धयति; शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । मुक्तानां च पुनरनुत्पत्तिः । कुतः? विद्यया तस्या बीजशक्तेर्दाहात् | अविद्यात्मिका हि यहाँ पूर्वपक्षी कहते हैं— अनभिव्यक्त नामरूप वाला, पूर्वावस्थामें स्थित बीजात्मक यह जगत् यदि अव्यक्त शब्दके योग्य माना जाय और उसरूपसे शरीरमें भी अव्यक्त शब्दकी प्रयुक्तिको प्रतिज्ञा की जाय तो ऐसा माननेसे उसी प्रधान कारणवादकी प्रसक्ति हो जायगी, क्योंकि सांख्यवादीने इस जगत् की प्रागवस्था ( कारणवस्था ) को ही प्रधानरूपसे स्वीकार किया है । सिद्धान्ती - इस विषयमें कहते हैं- यदि हम जगत् के कारणरूपसे किसी एक स्वतन्त्र प्रागवस्थाको स्वीकार करें तो हम प्रधान कारणवादके अनुयायी हो सकते हैं, परन्तु हम तो जगत्की इस प्राणवस्था ( कारणावस्था ) को परमेश्वरके अधीन स्वीकार करते हैं, स्वतन्त्र नहीं, वह तो अवश्य स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि वह प्रयोजन वाली है | उसके विना निर्गुण निष्क्रिय परमेश्वर स्रष्टा सिद्ध नहीं हो सकता, कारण सत्यानन्दी - दीपिका उसे अव्यक्त नहीं कहा जा सकता । यह पूर्वपक्षीका आशय है । सिद्धान्ती - यद्यपि यह ठीक है, तो भी कार्यं और कारणके अभिन्न होने से मूल प्रकृति वाचक अव्यक्त शब्दसे कार्य लक्ष्य होता है । जैसे ' गोमिः श्रीणीत मत्सरम् ' इस उद्धृत श्रुतिसे यह दिखलाया गया है कि प्रकृति वाचक गौ शब्द अपने विकार दूध में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है अन्यथा प्रकृति गौके साथ सोम रसका मिश्रण होना असंभव है । जैसे यहाँ प्रकृति गौ शब्द समानरूपसे गौ और स्व विकार दूधमें प्रयुक्त होता है, वैसे आकाश आदि सूक्ष्म भूतात्मक सूक्ष्म शरीर जो स्थूल शरीरका कारण है, उसमें अव्यक्त शब्दका प्रयोग होता है तो यहाँ भी प्रकृति वाचक अव्यक्तशब्द समानरूपसे सूक्ष्मशरीर और स्वविकार स्थूलशरीरमें प्रयुक्त होना युक्त है ॥ २ ॥

* यह जो सुख दुःख मोहात्मक जगत् है, वह सुखदुःखमोहात्मक कारणसे ही उत्पन्न होने योग्य है, क्योंकि कार्य कारणात्मक होता है । इसमें सुखात्मकता सत्त्वसे, दुःखात्मकता रजसे और मोहात्मकता तमसे है । सत्त्व, रज और तमोमय कारणावस्थाका नाम सांख्यमतमें प्रधान है । जगत्-की कारणावस्था मायाके स्वीकार करनेसे प्रधान कारणवादकी प्रसक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त में माया अनित्य, अनिर्वचनीय, मिथ्या और परतन्त्र है, जब कि सांख्यमतमें प्रधान नित्य निर्वचनीय, सत्य और स्वतन्त्र है । कारणावस्था अव्यक्त मायाको हम स्वतन्त्र कारण नहीं मानते तो प्रधान कारणवादकी प्रसक्ति कैसे हो सकती है? किन्तु अव्याकृत नामरूपात्मक कारणावस्था मायाको हम परमेश्वर के अधीन मानते हैं, बन्ध और मोक्षकी व्यवस्थाके लिए भी मायाको मानते हैं, अन्यथा असङ्ग एक आत्मामें बन्ध मोक्ष व्यवस्था अनुपपन्न है ।

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२८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० ४ बीजशक्तिरव्यक्तशब्दनिर्देश्या परमेश्वराश्रया मायामयी महासुषुप्तिः यस्यां स्वरूप-प्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः । तदेतदव्यक्तं कचिदाकाशशब्द निर्दिष्टम्-' एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च ' ( बृ ०० / ८ / ११ ) इति श्रुतेः । क्वचिदक्षरशब्दो-दितम्; ' अक्षरात्परतः परः ' ( मु ० २।११२ ) इति श्रुतेः । क्वचिन्मायेति सूचितम्; ' मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ' ( श्वे ० ४ । १० ) इति मन्त्रवर्णात् । अव्यक्ता हि सा माया, तत्त्वान्यत्वनिरूपणस्याशक्यत्वात् । तदिदं ' महतः परमव्यक्तम् ' इत्युक्तम् अव्यक्तप्रभ-वत्वान्महतः, यदा हैरण्यगर्भी बुद्धिर्महान्, यदा तु जीवो महान्, तदाप्यव्यक्ताधीन-त्वाज्जीवभावस्य ' महतः परमव्यक्तम् ' इत्युक्तम् | अविद्या ह्यव्यक्तम् | अविद्यावत्त्वेनैव जीवस्य सर्वः संव्यवहारः संततो वर्तते । तच्चाव्यक्तगतं महतः परत्वमभेदोपचारात्त-द्विकारे शरीरे परिकल्प्यते । सत्यपि शरीरवदिन्द्रयादीनां तद्विकारत्वाविशेषे शरीर स्यै-वाभेदोपचारादव्यक्तशब्देन ग्रहणम्, इन्द्रियादीनां स्वशब्दैरेव गृहीतत्वात्परिशिष्टत्वाच्च शरीरस्य । अन्ये तु वर्णयन्ति - द्विविधं हि शरीरं स्थूलं सूक्ष्मं च | स्थूलं यदिदमुप-लभ्यते । सूक्ष्मं यदुत्तरत्र वक्ष्यते - ' तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ’ ( वृ ० ३ । १ । १ ) इति । तच्चोभयमपि शरीरमविशेषात्पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितम् । इह तु सूक्ष्ममव्यक्तशब्देन परिगृह्यते; सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात् । तदधीन-त्वाच्च बन्धमोक्षव्यवहारस्य जीवात्तस्य परत्वम् । यथार्थाधीनत्वादिन्द्रियव्यापा-कि शक्ति रहित परमेश्वर में प्रवृत्ति उपपन्न नहीं हो सकती । मुक्त पुरुषोंके बन्धकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि विद्यासे उस बीज शक्तिका नाश ( बाध ) हो जाता है । अविद्यात्मक यह बीजशक्ति अव्यक्तशब्द से निर्दिष्ट है, परमेश्वरके आश्रित मायामयी एवं महासुषुप्ति है, जिसमें स्वरूप ज्ञानसे रहित संसारी जीव सोते हैं । वह अव्यक्त कहीं पर ' एतस्मिन्नु ० ( हे गार्गि! इस अक्षरमें ही आकाश ओत - प्रोत है ) इस श्रुतिमें आकाश शब्दसे निर्दिष्ट है । और कहीं पर ' अक्षरात्परतः परः ० ( सर्वश्रेष्ठ अक्षरसे भी उत्कृष्ट है ) इस श्रुतिसे अक्षर शब्दसे वर्णित है । कहीं पर ' मायां तु ० ( प्रकृतिको तो माया जाने और महेश्वरको मायावी ) इस मन्त्र में माया शब्दसे सूचित है । वह माया अव्यक्त ही है, क्योंकि वह सद्रूप है अथवा असद्रूप है, ब्रह्म से अभिन्न है अथवा भिन्न, इसप्रकार उसका निरूपण नहीं किया जा सकता । यदि महत्का अर्थ हिरण्यगर्भकी बुद्धि हो तो अव्यक्त से महत् उत्पन्न होता है. इसलिए ' महतः परमव्यक्तम् ' ( महत्से अव्यक्त उत्कृष्ट है ) यहाँ पर वही पूर्वास्था कही गई है । यदि महत्का अर्थ जीव हो तो भी जीवभाव अव्यक्तके अधीन होनेसे ' महत्से अव्यक्त श्रेष्ठ है ' अर्थात् अव्यक्तमें जीवसे परत्व कथन युक्त है । निश्चय यह अविद्या अव्यक्त है, अविद्योपाधि युक्त होनेसे ही जीवके सब व्यवहार सदा होते रहते हैं । अव्यक्तमें जो महत्से परत्व है उसकी अभेदोपचारसे उसके विकार शरीरमें कल्पना की जाती है । यद्यपि शरीरके समान इन्द्रिय आदिमें भी [ अव्यक्त ] विकारत्व समान है, तो मी अभेदोपचारसे अव्यक्त शब्दसे शरीरका ही ग्रहण होता है, क्योंकि इन्द्रिय आदिका [ इन्द्रियेभ्यः ] अपने वाचक शब्दसे ही ग्रहण किया गया है । केवल शरीर ही अवशिष्ट है [ अतः उसका अव्यक्त शब्दसे ग्रहण होता है ] । कुछ दूसरे आचार्य तो इस प्रकार वर्णन करते हैं कि शरीर दो प्रकारका है स्थूल और सूक्ष्म । [ नेत्र आदिसे ] जो यह उपलब्ध होता है वह स्थूल है और जो सूक्ष्म है उसे आगे ' तदन्तरप्रतिपत्तौ ० ' इस सूत्र में कहा जायगा । ये दोनों शरीर समानरूर से पूर्व वाक्य ( आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ) में रथरूपसे कहे गये हैं । [ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ] इस उत्तर मन्त्रमें अव्यक्त शब्दसे केवल सूक्ष्म शरीरका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि सूक्ष्म अव्यक्त शब्दके योग्य है । जैसे इन्द्रियोंका व्यापार अर्थों - शब्दादि विषयोंके कधीन होनेसे अर्थों में इन्द्रिय-परत्व है, वैसे बन्ध और मोक्ष व्यवहार सूक्ष्म शरीरके अधीन होने से उसमें जीवसे परत्व है ।

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अधि ० १ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २८ ९ रस्येन्द्रियेभ्यः परत्वमर्थानामिति । * तैस्वेद्वक्तव्यम् - अविशेषेण शरीरद्वयस्य पूर्वत्र रथ-त्वेन संकीर्तितत्वात्समानयोः प्रकृतत्वपरिशिष्टत्वयोः कथं सूक्ष्ममेव शरीर मिह गृह्यते, न पुनः स्थूलमपीति । आम्नातस्यार्थं प्रतिपत्तुं प्रभवामः, नाम्नातं पर्यनुयोक्तुम् । आम्नातं चाव्यक्त-पदं सूक्ष्ममेव प्रतिपादयितुं शक्नोति, नेतरत्; व्यक्तत्वात्तस्येति चेत् - न; एकवाक्यताधी-नत्वादर्थप्रतिपत्तेः: न हीमे पूर्वोत्तरे आम्नाते एकवाक्यतामनापद्य कंचिदर्थं प्रतिपादयतः; प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गात् । न चाकाङ्क्षामन्तरेणैकवाक्यताप्रतिपत्तिरस्ति । तत्राविशि-ष्टायां शरीरद्वयस्य ग्राह्यात्वाकाङ्क्षायां यथाकाङ्क्ष संबन्धेऽनभ्युपगम्यमान एकवाक्यतैव बा-धिता भवति, कुत आम्नातस्यार्थप्रतिपत्तिः? * न चैवं मन्तव्यम् - दुःशोधत्वात्सूक्ष्मस्यैव शरीर-स्येह ग्रहणं स्थूलस्य तु दृष्टबीभत्सतया सुशोधत्वाद ग्रहणमिति । यतो नैवेह शोधनं कस्यचि-द्विवक्ष्यते । न ह्यत्र शोधन विधायि किंचिदाख्यातमस्ति । अनन्तरनिर्दिष्टत्वात्तु किं तद्विष्णोः सिद्धान्ती - वृत्तिकारके मतका निराकरण करते हैं - परन्तु उनसे यह कहना चाहिए कि पूर्ववाक्य [ आत्मनं रथिनं विद्धि ] में रथरूपसे दोनों शरीरोंका समानरूपसे कथन होनेके कारण दोनोंमें प्रकृतत्व परिशिष्टत्व समान है तो यहाँ मव्यक्तशब्दसे केवल सूक्ष्मशरीरका ही ग्रहण क्यों किया जाता है और स्थूलका क्यों नहीं? हम वेदका अर्थ जानने- ग्रहण करने में समर्थ हैं परन्तु वेदपर ( ननु नच ) नहीं कर सकते, वेदोक्त अव्यक्त शब्द सूक्ष्मका ही प्रतिपादन कर सकता है स्थूलका नहीं, क्योंकि वह व्यक्त है, ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, कारण कि अर्थज्ञान एक वाक्यता के अधीन है । ये दोनों पूर्व और उत्तर श्रुति वाक्य एक वाक्यता प्राप्त किये विना किसी भी अर्थका प्रतिपादन नहीं कर सकते, अन्यथा प्रकृतकी हानि और अपकृत प्रक्रियाका प्रसङ्ग होगा अर्थात् अव्यक्त शब्दसे प्रकृत स्थूलशरीरका ग्रहण न करना अप्रकृत सूक्ष्म भूतात्मक सूक्ष्म शरीरका ग्रहण करना, यह प्रकृत हानि अप्रकृत प्रक्रिया रूप दोष प्रसक्त होगा । और आकांक्षाके विना एक वाक्यताका बोध नहीं होता । उन पूर्वोत्तर वाक्योंमें दोनों शरीरोंकी ग्राह्यत्वाकांक्षा समान होनेपर आकांक्षा के अनुसार सम्बन्ध स्वीकार न करें तो एक वाक्यता ही बाधित हो जायगी, तो श्रुत्यर्थंका बोध कैसे होगा? इस प्रकार नहीं मानना चाहिए कि अनात्मत्व निश्चयरूप शोधन दुष्कर होनेसे सूक्ष्म शरीरका ही यहाँ ग्रहण है, नाना दोषों से दूषित प्रत्यक्ष घृणाका विषय होनेसे अनामत्व निश्चयरूप शोधन सुकर होनेके कारण स्थूल शरीरका ग्रहण नहीं है, क्योंकि यहाँ प्रकरणमें किसीका शोधन विवक्षित नहीं है, कारण कि यहाँ शोधनका विधान करनेवाला कोई क्रियापद नहीं है । विष्णुका परम पद क्या है? ( आत्मनं रथिनं विद्धि ) इस वाक्य के अनन्तर निर्दिष्ट होनेसे वही यहाँ विवक्षित है । क्योंकि यह इससे पर है, यह सत्यानन्दी - दीपिका * वाक्योंकी परस्पर आकांक्षा होनेसे ही एक वाक्यता होती है, और उससे अर्थका ज्ञान होता है, अन्यथा अर्थबोध नहीं होगा । अतः ' शरीरं रथमेव तु ' इस प्रकृत शरीर द्वयका ग्रहण ' इन्द्रियेभ्यः परा ' इस मन्त्रमें किस पदसे है और अव्यक्तशब्दसे क्या ग्राह्य है? इस प्रकार दो आकांक्षाओंके होनेसे पूर्वोत्तर वाक्योंमें एक वाक्यता सम्भव है | शरीरशब्दसे प्रकृत दोनों ही शरीर ग्राह्यरूपसे आकांक्षाओंके समान विषय हैं । अव्यक्तशब्दसे दोनों शरीरोंका ग्रहण प्राप्त है । यदि आकांक्षाके अनुसार अन्वय स्वीकार न करें, तो अव्यक्तशब्दसे केवल सूक्ष्मशरीरका ग्रहण होगा स्थूलशरीरका नहीं, फिर तो एक वाक्यताका बाध हो जायगा । इसलिये अव्यक्तशब्दसे प्रकृत स्थूलशरीर ही ग्राह्य है । * यदि वृत्तिकारके मतसे अव्यक्तशब्दसे सूक्ष्म शरीरका भी ग्रहण हो तो हमारी कोई हानि नहीं है, क्योंकि अव्यक्तशब्दसे सूक्ष्मशरीरका ग्रहण करनेपर भी अनुमान निरूपित प्रधानका तो अव्यक्तशब्दसे किसी प्रकार भी ग्रहण नहीं हो सकता है ॥ ३ ॥

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२ ९ ० ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ परमं पदमितीदमिह विवक्ष्यते । तथाहीदमस्मात्परमिदमस्मात्परमित्युक्त्था ' पुरुषानपरं किंचित् ' इत्याह । सर्वथापि त्वानुमानिक निराकरणोपपत्ते स्तथा नामास्तु, न नः किंचिच्छिद्यते ३ ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ ४ ॥

पदच्छेद- ज्ञेयत्वावचनात् च । सूत्रार्थ - इस प्रकरणमें अव्यक्तको ज्ञेय नहीं कहा गया है,. इससे भी इस श्रुतिमें अव्यक्त-शब्दसे प्रधानका ग्रहण नहीं है । * ज्ञेयत्वेन च सांख्यैः प्रधानं स्मर्यते गुणपुरुषान्तरज्ञानात्कैवल्यमिति वदद्भिः । न हि गुणस्वरूपमज्ञात्वा गुणेभ्यः पुरुषस्यान्तरं शक्यं ज्ञातुमिति । क्वचिच्च विभूतिविशेष-प्राप्तये प्रधानं ज्ञेयमिति स्मरन्ति । न चेदमिहाव्यक्तं ज्ञेयत्वेनोच्यते । पदमात्रं ह्यव्यक्तशब्दः । नेहाव्यक्तं ज्ञातव्यमुपासितव्यं चेति वाक्यमस्ति । न चानुपदिष्टं पदार्थज्ञानं पुरुषार्थ -मिति शक्यं प्रतिपत्तुम् । तस्मादपि नाव्यक्तशब्देन प्रधानमभिधीयते । अस्माकं तु रथरूप-कक्लृप्तशरीराद्यनुसरणेन विष्णोरेव परमं पदं दर्शयितुमयमुपन्यास इत्यनवद्यम् ॥४ ॥

वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ ५ ॥

पदच्छेद - वदति, इति चेत्, न प्राज्ञः, हि, प्रकरणात् । सूत्रार्थ - ( वदति ) ' महतः परं ध्रुवं निचाय्य ' यह उत्तर वाक्य प्रधानको ज्ञेय कहता है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, ( प्रकरणात् ) क्योंकि ' पुरुषान्न परं ' इस आत्मप्रक-रणसे ( प्राज्ञो हि ) परमात्मा ही यहाँ ज्ञेयरूपसे निर्दिष्ट है । अत्राह सांख्यः – ‘ ज्ञेयत्वावचनात् इत्यसिद्धम्, कथम्? श्रूयते ह्युत्तरत्राव्यक्तशब्दो-इससे पर है अर्थात् इन्द्रियोंसे उसके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ट है, इस प्रकार कहकर ' पुरुषान्न ० . ( पुरुषसे कुछ श्रेष्ठ नहीं है ) ऐसा श्रुति कहती है । सब प्रकार से अनुमान निरूपित प्रधानका निरा-करण उपपन्न होता है । तो भले ऐसा हो, इससे हमारी कुछ भी हानि नहीं है ॥३ ॥

सत्त्व आदि गुण और पुरुष के भेदज्ञानसे मोक्ष होता है, ऐसा कथन करनेवाले सांख्यमतानुयायी विद्वान् प्रधानका ज्ञेयरूपसे स्मरण करते हैं, क्योंकि सत्त्वादि गुणोंके स्वरूप जाने विना केवल गुणोंसे पुरुषका भेद नहीं जाना जा सकता । अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए प्रधान ज्ञेय है, ऐसा भो कहीं कहीं स्मृति में कहते हैं । परन्तु [ महतः परमव्यक्तम् ] इस मन्त्र में अव्यक्तको ज्ञेयरूपसे नहीं कहा है, यहाँ अव्यक्तशब्द केवल एक पद है । अव्यक्त ज्ञातव्य है वा उपासितव्य है, यहाँ कोई ऐसा विधायक वाक्य नहीं है । और अनुपदिष्ट पदार्थज्ञान पुरुषार्थ है ऐसा नहीं जाना जा सकता । इससे भी श्रुति अव्यक्तशब्दसे प्रधानका अभिधान नहीं करती, हमारे मत में तो रथके सादृश्यसे कल्पित शरीर आदिका अनुसरणकर विष्णुका ही परम पद दिखलाने के लिए यह उपन्यास है, इस प्रकार कोई दोष नहीं है ॥३ ॥

यहाँ सांख्य कहते हैं— ' ज्ञेयत्यावचनात् ' यह हेतु असिद्ध है, क्योंकि ' अशब्दमस्पर्शम ० ' ( जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, रसहीन, नित्य तथा गन्धरहित है । जो अनादि, अनन्त, महत्-सत्यानन्दी दीपिका # प्रधान श्रुति तात्पर्यका विषय न होनेसे ज्ञेय नहीं है और अव्यक्तशब्द वाच्य भी नहीं है । परन्तु शरीर भी तो ज्ञेयरूपसे पठित नहीं है तो उसका यहाँ ग्रहण क्यों किया जाता है? हमारे मतमें तो केवल विष्णुपद ज्ञेय है, उसके दर्शनके लिए अव्यक्तशब्द से स्थूलशरीरका ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है || ४ ||

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अधि ० १ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित २ ९ १ दितस्य प्रधानस्य ज्ञेयत्ववचनम् -- ' अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा s रसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ ' ( का ० २ | ३ | १५ ) इति । अत्र हि यादृशं शब्दादिहीनं प्रधानं महतः परं स्मृतौ निरूपितम्, तादृशमेव निचाय्यत्वेन निर्दिष्टम्, तस्मात्प्रधानमेवेदम्, तदेव चाव्यक्तशब्द निर्दिष्टमिति । अत्र ब्रूमः - नेह प्रधानं निचाय्यत्वेन निर्दिष्टम् । प्राज्ञो हीह परमात्मा निचाय्यत्वेन निर्दिष्ट इति गम्यते । कुतः? प्रकरणात् । प्राज्ञस्य हि प्रकरणं विततं वर्तते; ' पुरुषान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः ' इत्यादिनिर्देशात्, ' एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ' इति च दुर्ज्ञातत्ववचनेन तस्यैव ज्ञेयत्वाकाङ्क्षणात् । ‘ यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः इति च तज्ज्ञानायैव वागादिसंयमस्य विहितत्वात्, मृत्युमुखप्रमोक्ष-णफलत्वाच्च । नहि प्रधानमात्रं निचाय्य मृत्युमुखात्प्रमुच्यत इति सांख्यैरिष्यते । चेतनात्म-विज्ञानाद्धि मृत्युमुखात्प्रमुच्यत इति तेषामभ्युपगमः । सर्वेषु वेदान्तेषु प्राज्ञस्यैवात्मनोऽ-' शब्दादिधर्मत्वमभिलप्यते । तस्मान्न प्रधानस्यात्र ज्ञेयत्वमव्यक्तशब्दनिर्दिष्टत्वं वा ॥५ ॥

त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥ ६ ॥

पदच्छेद - त्रयाणाम्, एव, च, एवम्, उपन्यासः, प्रश्नः, च । सूत्रार्थ - ( एवम् ) पूर्व और उत्तर वाक्योंके पर्यालोचनसे ( त्रयाणामेव ) अग्नि, जीव और परमात्मा इन तीनोंका ही ( उपन्यास ) वक्तव्यरूप से उपन्यास है । ( प्रश्नश्च ) और प्रश्न भी उनके विषयमें है, इसलिए प्रधान अव्यक्तशब्द वाच्य नहीं है । * इतश्च न प्रधानस्याव्यक्तशब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं वा । यस्मात्त्रयाणामेव पदार्थाना-मग्नि जीव परमात्मनामस्मिन्ग्रन्थे कठवल्लीषु वरप्रदानसामर्थ्याद्वक्तव्यतयोपन्यासो दृश्यते । से पर, निश्चल है उस तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर पुरुष मृत्युमुखसे छूट जाता है ) इस उत्तरवाक्यमें अव्यक्तशब्दसे प्रतिपादित प्रधानका ज्ञेयरूपसे कथन है । सांख्यस्मृतिमें शब्द आदि रहित महत्से पर प्रधानका जैसा निरूपण है वैसा ही यहाँ ज्ञेयरूपसे निर्देश है । इसलिए यह प्रधान ही है और वही यहाँ [ महतः परमव्यक्तम् ] अव्यक्तशब्द से निर्दिष्ट है । सिद्धान्ती -- यहाँ हम कहते हैं --- इस मन्त्र [ ' अशब्दमस्पर्शम ' ] में प्रधान ज्ञेयरूपसे निर्दिष्ट नहीं है, किन्तु प्राज्ञ परमात्मा ही यहाँ ज्ञेयरूपसे निर्दिष्ट है ऐसा ज्ञात होता है । किससे? इससे कि उसका प्रकरण है । प्राज्ञका ही विस्तृत प्रकरण चला हुआ है, ' पुरुषान्न ' ( पुरुष से कुछ श्रेष्ठ नहीं है, वह परम सीमा है वह परम गति है ) इत्यादि निर्देश है । ' एष सर्वेषु ० ' ( सम्मूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित नहीं होता ) इस प्रकार दुर्ज्ञानत्व कथनसे उसकी ही ज्ञेयरूपसे आकांक्षा होती है, तथा ' यच्छेद्वाङ्मनसी ० ' ( विवेकी पुरुष वाणीका मनमें लय करे ) इस प्रकार उसके ज्ञानके लिये हो वाणी आदिके संयमका विधान किया है, मृत्युमुखसे छुटकारा पाना ही ज्ञानका फल है । परन्तु सांख्योंने यह स्वीकार नहीं किया कि केवल प्रधानके ज्ञानसे मृत्युमुखसे मुक्त होता है । वे तो यह स्वीकार करते हैं कि चेतन आत्मा के ज्ञानसे ही मृत्युमुखसे मुक्त होता है । सम्पूर्णं वेदान्तोंमें प्राज्ञ परमात्मामें ही अशब्दत्व आदि धर्मोका कथन है । इसलिए यहाँ प्रधान न ज्ञेय है और न अव्यक्तशब्दसे निर्दिष्ट ही है ॥ ५ ॥

और इस कारण से भी प्रधान अव्यक्तशब्द वाच्य अथवा ज्ञेय नहीं है, क्योंकि वर प्रदान सामर्थ्य से इस कठवल्ली ग्रन्थमें वक्तव्यरूपसे अग्नि, जीव और परमात्मा इन तीन पदार्थोंका हो सत्यानन्द - दीपिका * इस कठवल्ली ग्रन्थमें प्रधानके विषयमें न प्रश्न है और न उत्तर ही, इससे भी प्रधान अव्यक्तशब्द वाच्य नहीं है । इसी बात को ' त्रयाणामेव ' इस सूत्र से भगवान् सूत्रकार दिखलाते हैं ।

पृष्ठ 326

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२ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ तद्विषय एव च प्रश्नः । नातोऽन्यस्य प्रश्न उपन्यासो वाऽस्ति । तत्र तावत् ' सत्वमग्निंस्वर्ग्य-मध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ' ( का ० १ | १ | १३ ) इत्यग्निविषयः प्रश्नः । ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ ' ( का ० १ | १ | २० ) इति जीवविषयः प्रश्नः । ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यन्त्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ ' ( का ० १ | २ | १४ ) इति परमात्मविषयः । प्रति-वचनमपि ' लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । ' ( का ० १1१1१५ ) इत्यग्नि-विषयम् । ' हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ' ( का ० २।५।६, ७ ) इति । व्यवहितं जीवविषयम् । ' न जायते म्रियते वा विपश्चित् ' ( का ० १।२।१८ ) इत्यादिबहु-प्रपञ्चं परमात्मविषयम् । नैवं प्रधानविषयः प्रश्नोऽस्ति; अपृष्टत्वाच्चानुपन्यसनीयत्वं तस्येति । अत्राह - योऽयमात्मविषयः प्रश्नो येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीति, किं स एवायम् ‘ अन्यन्त्र धर्मादन्यत्राधर्मात् ' इति पुनरनुकृष्यते, किंवा ततोऽन्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्यत इति । * किंचातः स एवायं प्रश्नः पुनरनुकृष्यत इति यद्युच्येत, द्वयोरात्मविषययोः प्रश्नयोरेकता-उपन्यास देखा जाता है और तद्विषयक ही प्रश्न है, इससे अन्यका प्रश्न अथवा उपन्यास नहीं है । उनमेंसे ‘ स त्वमग्नि ० ' ( नचिकेता - हे मृत्यो! तुम स्वर्गके साधन भूत अग्निको जानते हो, सो मुझ श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन करो ) यह अग्निविषयक प्रश्न है । ' येयं प्रेते ० ' ( मृतक मनुष्य के विषयमें जो यह सन्देह है— कुछ लोग कहते हैं कि देह आदि संघातसे अतिरिक्त देहान्तर सम्बन्धी आत्मा है, कुछ एक कहते हैं कि इस प्रकारका आत्मा नहीं है, तुमसे उपदेशको प्राप्त हुआ मैं इसे जान सकूँ वशेंमें शेष यह तीसरा वर है ) यह जीवविषयक प्रश्न है । ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्मसे भिन्न, अधर्मसे मिन्न, कार्य - कारणसे अन्य भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान से अन्य है ऐसा तुम जिसे देखते हो उसे मुझसे कहो ) यह परमात्मविषयक प्रश्न है । प्रतिवचन भी ' लोकादिमनि ० ' ( तब यमराजने लोकोंके कारणभूत उस अग्निका तथा उसके चयन करनेमें जैसे बौर जितनी ईटें होती हैं और जिस प्रकार स्थण्डिलमें उसका चयन किया जाता है उन सबका नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया ) यह अग्नि विषयक उत्तर है । ' हन्त त इदं ० ' ( हे गौतम! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा, तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे ] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है [ वह भी बताऊँगा ] । अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने देही तो शरीर धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर - भावको प्राप्त हो जाते हैं ) यह व्यवधानसे [ अविद्यासे आच्छादित ] जीव विषयक उत्तर है । ' न जायते ० ' ( यह विद्वान् न उत्पन्न होता है न मरता है ) इत्यादि बहुत विस्तृत परमात्मा विषयक प्रतिवचन है । इस प्रकार प्रधान विषयक प्रश्न नहीं है । अपृष्ट होनेसे उपन्यासके योग्य भी नहीं है । यहाँ पूर्वपक्षी कहते हैं - ' येयं प्रेते ० ' यह जो आत्मविषयक प्रश्न है, क्या उसकी ' अन्यत्र धर्माद ० ' यहाँ पुनः अनुवृत्ति है अथवा उससे अन्य यह अपूर्व - नवीन प्रश्न उठाया जाता है? इससे प्रकरण में क्या आया? [ येयं प्रेते ] उस प्रश्नको [ अन्यत्र धर्माद ] इसमें अनुवृत्ति है, ऐसा यदि कहो, तो आत्मविषयक दो प्रश्नोंमें अभेद होनेसे अग्नि विषयक और आत्मविषयक इस प्रकार दो ही प्रश्न होते हैं, अतः ऐसा नहीं कहना सत्यानन्दी - दीपिका * यमराज और नचिकेताके संवादरूप वाक्योंकी प्रवृत्तिसे यही सिद्ध होता है कि ' येयं प्रेते ० ' ' अन्यत्र धर्माद ० ' इन दोनों मन्त्रों में आत्मविषयक एक ही प्रश्न है दो नहीं, जिसके आधारपर प्रधान विषयक नवीन प्रश्नकी कल्पनाकी जाय । अतः यहाँ प्रधानका अवकाश नहीं है ।

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अधि ० १ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २ ९ ३ पत्तेरग्रिविषय आत्मविषयश्च द्वावेव प्रश्न वित्यतो न वक्तव्यं त्रयाणां प्रश्नोपन्यासाविति । अथान्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्यत इत्युच्येत ततो यथैव वरप्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नकल्प-नाया मदोषः, एवं प्रश्नव्यतिरेकेणापि प्रधानोपन्यासकल्पनायामदोषः स्यादिति । अत्रो-च्यते नैवं वयमिह वरप्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नं कंचित्कल्पयामः; वाक्योपक्रमसामर्थ्यात् । वर-प्रदानोपक्रमा हि मृत्युनचिकेतः संवादरूपा वाक्यप्रवृत्तिरासमाप्तेः कठवल्लीनां लक्ष्यते । * मृत्युः किल नचिकेतसे पित्रा प्रहिताय त्रीन्वरान्प्रददौ । नचिकेताः किल तेषां प्रथमेन वरेण पितुः सौमनस्यं वत्रे, द्वितीयेनाग्निविद्याम्, तृतीयेनात्मविद्याम्, ' येयं प्रेते ' इति ' वराणा-मेष वरस्तृतीयः ' ( का ० १।१।२० ) इति लिङ्गात् । तत्र यद्यन्यत्र धर्मादित्यन्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्येत, ततो वरप्रदानव्यतिरेकेणापि प्रश्नकल्पनाद्वाक्यं बाध्येत । ननु प्रष्टव्यभेदादपूर्वो ऽ-, यं प्रश्नो भवितुमर्हति । पूर्वी हि प्रश्नो जीवविषयः येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्ति -नास्तीतिविचिकित्साभिधानात् । जीवश्च धर्मादिगोचरत्वान्नान्यत्र धर्मादिति प्रश्नमर्हति । प्राज्ञस्तु धर्माद्यतीतत्वादन्यत्र धर्मादिति प्रश्नमर्हति । प्रश्नच्छाया च न समाना लक्ष्यते; पूर्वस्यास्तित्वनारितत्वविषयत्वादुत्तरस्य धर्माद्यतीतवस्तुविषयत्वात् । तस्मात्प्रत्यभिज्ञाना-चाहिए कि तीन पदार्थं विषयक ही प्रश्न और उपन्यास है । ऐसा यदि कहो कि यह अपूर्वं प्रश्न उठाया जाता है तो जैसे वर प्रदानसे अतिरिक्त प्रश्नकी कल्पना में [ तुमको ] दोष नहीं है, वैसे ही प्रश्नके विना भी प्रधानके उपन्यासकी कल्पनामें हमें दोष नहीं है । इस पर सिद्धान्ती कहते - यहाँ हम इस प्रकार वर प्रदान के अतिरिक्त किसी भी प्रश्नकी कल्पना नहीं करते, क्योंकि वाक्यके उपक्रमकी सामर्थ्यं ही ऐसी है । वर प्रदान से लेकर कठवल्लीकी समाप्ति पर्यन्त यमराज और नचिकेताकी संवादरूप वाक्यप्रवृत्ति ऐसी ही लक्षित होती है । पिता द्वारा भेजे हुए नचिकेताको यमराज ने तीन वर दीये | उनमें से प्रथम वरसे नचिकेताने पिताकी प्रसन्नता माँगी, द्वितीयसे अग्निविद्या और तृतीयसे आत्म-विद्या, क्योंकि ' येयं प्रेते ' और ' वराणामेष ' ऐसा श्रुति लिङ्ग है । उनमें ' अन्यत्र धर्मात् ' यदि यह नवीन प्रश्न उठाया जाय तो वर प्रदानसे अतिरिक्त प्रश्नकी कल्पना होनेसे उपक्रम वाक्यका वाघ हो जायगा । परन्तु [ जीव और ईश्वर रूप ] प्रष्टव्य पदार्थ के भेद होनेसे [ ' अन्यत्र धर्मात् ' ] यह प्रश्न नवीन हो सकता है । पूर्वं प्रश्न जीव विषयक है, क्योंकि ' येयं प्रेते ' इस मन्त्रमें मृतक मनुष्यके विषय में देहादि संघातसे भिन्न आत्मा है अथवा नहीं है ' इस प्रकारकी शङ्काका अभिधान है । और जीव धर्म आदिका आश्रय होनेसे ' अन्यत्र धर्मात् ' इस प्रश्नके योग्य नहीं है । प्राज्ञ तो धर्मादिसे संतीत होनेके कारण ' अन्यत्र धर्मात् ' इस प्रश्नके योग्य है । [ केवल प्रष्टव्य भेदसे प्रश्नका भेद नहीं है ] किन्तु दोनों मन्त्रों में प्रश्न सादृश्य भी समान लक्षित नहीं होता, क्योंकि ' येयं प्रेते ' यह पूर्व प्रश्न अस्ति तथा नास्ति ( है या नहीं है ) विषयक है और ' अन्यत्र धर्मात् ' यह उत्तर प्रश्न धर्मादि अतीत वस्तु विषयक है | अतः पूर्वमन्त्र में प्रतिपादित वस्तुके उत्तर मन्त्रमें प्रत्यभिज्ञान के अभाव होनेसे प्रश्नों में सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षी - जीव विषयक प्रश्नमें देहादि संघातसे भिन्न आत्मा है अथवा नहीं है, यह संशय और धर्म आदिका आश्रयत्व प्रतीत होता है और परमात्मा धर्मादि से अतीत है, इस प्रकार प्रष्टव्य के भेदसे प्रश्नोंका परस्पर भेद है । किश्व ' येयं प्रेते ० ' और ' अन्यत्र धर्माद ० ' इन दोनों मन्त्रों में प्रश्नोंके सादृश्यके अमावसे भी प्रश्नोंका भेद है । इससे पिताकी प्रसन्नता, अग्निविद्या, जीवविद्या और परमात्म-विषयक विद्या इन चार प्रश्नोंकी कल्पना करनी पड़ेगी, तदनुसार उत्तर भी चार होंगे, ऐसा मानने से उपक्रम वाक्यका बाध होगा । जैसे यहाँ नवीन चतुर्थ प्रश्नकी कश्पनाकी गई है, वैसे हम भी प्रधानकी सिद्धि मानते हैं । सिद्धान्ती - ' जीवप्राज्ञयोः ' आदिसे समाधान करते हैं ।

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२ ९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य अ ० १ पा ० ४ भावात्प्रश्नभेदः । न पूर्वस्यैवोत्तरत्रानुकर्षणमिति चेत् - नः जीवप्राज्ञयोरेकत्वाभ्युपगमात् । भवेत्प्रष्टव्यभेदात्प्रश्नभेदो यद्यन्यो जीवः प्राज्ञात्स्यात् । न त्वन्यत्वमस्ति । तत्त्वमसीत्यादि-श्रुत्यन्तरेभ्यः । इह च ' अन्यान धर्मात् ' इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनं ' न जायते म्रियते वा विपश्चित् ' इति जन्ममरणप्रतिषेधेन प्रतिपाद्यमानं शारीर परमेश्वरयोरभेदं दर्शयति । सति हि प्रसङ्गे प्रतिषेधो भागी भवति । प्रसङ्गश्च जन्मरणयोः शरीर संस्पर्शाच्छारीरस्य भवति न परमेश्वरस्य । तथा - ' स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ( का ० २।४।४ ) इति स्वप्नजागरितदृशो जीवस्यैव महत्त्वविभुत्वविशेषणस्य मननेन शोकविच्छेदं दर्शयन्न प्राज्ञादन्योजीव इति दर्शयति । प्राज्ञविज्ञानाद्धि शोकविच्छेद इति वेदान्तसिद्धान्तः । * तथाऽग्रे - ' यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ ' ( का ० २।४।१० ) इति जीवप्राज्ञभेददृष्टिमपवदति । तथा जीवविषयस्या-स्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्यानन्तरम् ' अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व ' इत्यारभ्य मृत्युना तैस्तैः कामैः प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता यदा न चचाल, तदैनं मृत्युरभ्युदय निःश्रेयसविभागप्रदर्शनेन विद्याविद्याविभागप्रदर्शनेन च ' विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ' परस्पर भेद हैं, ऐसा यदि कहो कि पूर्व प्रश्नकी उत्तर वाक्यमें अनुवृत्ति नहीं है, तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और प्राज्ञमें एकत्व स्वीकार किया गया है, यदि जीव प्राज्ञसे अन्य होता तो प्रष्टव्यके भेदसे प्रश्नका भेद होता, परन्तु ' तत्त्वमसि ' इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि दोनों भेद नहीं है, यहाँ भी ' अन्यत्र धर्मात् ' इस प्रश्नका ' न जायते म्रियते ० ', ( विद्वान् न जन्मता है न मरता है ) इस प्रकार जन्म - मरणके प्रतिषेधसे प्रतिपाद्यमान प्रतिवचन जीव और परमेश्वरका अभेद दिखलाता है । जन्म - मरणका प्रसङ्ग होनेपर ही प्रतिषेध युक्त होता है । शरीर के साथ सम्बन्धके होनेसे जीवात्मामें जन्म - मरणका प्रसङ्ग होता है परमेश्वरमें नहीं होता । उसी प्रकार ' स्वप्रान्त जागरि-तान्तं ० ' ( जिसके द्वारा स्वप्न में प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत्में दिखाई देनेवाले दोनों प्रकारके पदार्थों को देखता है उस महान् और विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ) इस प्रकार स्वप्न और जाग्रत् पदार्थों को देखनेवाले महत्त्व एवं विभुत्व विशिष्ट जीवके चिन्तनसे ही शोककी अत्यन्त निवृत्ति दिखलाते हुए यमराज प्राज्ञ - परमात्मासे जीव भिन्न नहीं है ऐसा दिखलाते हैं । यह वेदान्त सिद्धान्त है कि प्राज्ञके विज्ञानसे ही शोकका नाश होता है । उसी प्रकार आगे ' यदेवेह ० ' ( जो तत्त्व इस - देहेन्द्रिय संघात में भासता है वही अन्यत्र - देहादिसे परे भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है । जो मनुष्य इस तत्त्वमें नानात्व - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको - जन्म मरणको प्राप्त होता है ) इस प्रकार यह मन्त्र जीव और प्राज्ञमें भेददृष्टिका निषेध करता है । इस प्रकार नचिकेताके जीव विषयक अस्तित्व, नास्तित्व ( है, नहीं है ) प्रश्नके अनन्तर ' अभ्यं वरं ० ' ( हे नचिकेता! आत्मविषयक वरको छोड़कर अन्य वर मांगो ) ऐसा आरम्भकर यमराजद्वारा पुत्र दारा आदि अनेक तत् तत् कामना-ओंसे अत्यन्त प्रलोभित किया गया भी नचिकेता जब अपने वरसे विचलित न हुआ तब धर्मराजने अभ्युदय और मोक्ष के विभाग - भेद के प्रदर्शनसे तथा विद्या और अविद्याके विभागके प्रदर्शन से ' विद्याभीप्सिनं ० ' सत्यानन्दी - दीपिका * यदि जीव परमेश्वरसे भिन्न होता तो ' येयं प्रेते ' इस प्रश्नका परमेश्वर विषयक ' तं दुर्दर्श गूढ़ ० ' यह उत्तर किस प्रकार संगत होता, अतः दोनों मन्त्र एक आत्मविषयक हैं और उनमें आत्मविषयक एक ही प्रश्न है । ' उदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति ' ( जो उस प्रत्यगभिन्न ब्रह्मतत्त्वमें अल्प-सा भेद करता है उसे संसार भय प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियों में भेदकी निन्दा और भेददर्शीको जन्म - मरणमय संसारकी प्राप्ति कही गई है । इसलिए यहाँ जीव - ब्रह्मका अभेद ही विवक्षित है ।

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अधि ० १ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित २ ९ ५ ( का ० १/२/४ ) इति प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसन्यदुवाच तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति || ' ( का ० १/२/१२ ) इति, तेनापि जीवप्राज्ञयोरभेद एवेह विवक्षित इति गम्यते । यत्प्रश्ननिमित्तां च प्रशंसां महतीं मृत्योः प्रत्यपद्यत नचिकेता यदि तं विहाय प्रशंसानन्तरमन्यमेव प्रश्नमुपक्षिपेद-स्थान एव सा सर्वा प्रशंसा प्रसारिता स्यात् । तस्मात् ' येयं प्रेते ' इत्यस्यैव प्रश्नस्यैतद्नु -कर्षणम् ‘ अन्यत्र धर्मात् ' इति । यत्तु प्रश्नच्छाया वैलक्षण्यमुक्तम्, तददूषणम्, तदीयस्यैव विशेषस्य पुनः पृच्छ्यमानत्वात् । पूर्वत्र हि देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मनोऽस्तित्वं पृष्टम्, उत्त-रत्र तु तस्यैवासंसारित्वं पृच्छयत इति यावद्धयविद्या न निवर्तते तावद्धर्मादिगोचरत्वं जीव-स्य जीवत्वं च न निवर्तते । तन्निवृत्तौ तु प्राज्ञ एव तत्त्वमसीति श्रुत्या प्रत्याय्यते । न चाविद्या-वत्त्वे तदपगमे च वस्तुनः कश्चिद्विशेषोऽस्ति । यथा कश्चित्संतमसे पतितां कांचिद्रजुमहिं मन्यमानो भीतो वेपमानः पलायते, तं चापरो ब्रूयान्मा भैषीर्नायमही रज्जुरेवेति । स च तदुपश्रुत्याहिकृतं भयमुत्सृजेद्वेपथुं पलायनं च । न त्वहिबुद्धिकाले तदपगमकाले च वस्तुन कश्चिद्विशेषः स्यात् । तथैवैतदपि द्रष्टव्यम् । ततश्च ' न जायते म्रियते वा ' इत्येवमाद्यपि भवत्य-स्तित्वप्रश्नस्य प्रतिवचनम् । सूत्रं त्वविद्याकल्पितजीवप्राज्ञभेदापेक्षया योजयितव्यम् । ( मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ; क्योंकि तुझे बहुतसे भोगोंने भी नहीं लुभाया ) इस प्रकार नचिकेताकी प्रशंसा कर उसके प्रश्नकी भी प्रशंसा करते हुए ' तं दुर्दर्श ० ' ( उस कठिनतासे दोख पड़नेवाले, गूढ़ स्थानमें अनुप्रविष्ट, गुहा - बुद्धि में स्थित, गह्वर अनेक अनर्थोंसे व्याप्त देहमें स्थित, पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी प्राप्ति द्वारा जानकर धी- बुद्धिमान् पुरुष हर्ष - शोकको त्याग देता है ) ऐसा कहा है । इससे भी ऐसा ज्ञात होता है कि जीव और प्राज्ञ- परमात्माका अभेद ही यहां विवक्षित है । जिस प्रश्नके कारण मृत्युने नचिकेताकी महती प्रशंसाको यदि नचिकेता उसको छोड़कर प्रशंसाके अनन्तर अन्य ही प्रश्नको उठाता तो वह सब प्रशंसा अनुपयुक्त स्थानमें ही प्रसारित होगी अर्थात् अनुपयुक्त स्थानमें की जानेके कारण व्यर्थ हो जायगी, इसलिए ' येयं प्रेते ' इस प्रश्नकी ही ' अन्यत्र धर्मात् ' इस मन्त्रमें अनुवृत्ति है । जो यह कहा गया है कि दोनों प्रश्नों में सादृश्य न होनेके कारण वैलक्षण्य है, वह दोष नहीं है, क्योंकि उसीका विशेष पुनः पूछा गया है । पूर्ववाक्य ' येयं प्रेते, में देहादिसे अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व ही पूछा गया है और उत्तर मन्त्र ( अन्यत्र धर्मात् ) में तो उसीका असंसारित्व पूछा जाता है, इसलिए जब तक अविद्या निवृत्त नहीं होती तब तक जीवमें धर्मादि आश्रयत्व और जीवत्व निवृत्त नहीं होते । उसकी निवृत्ति होने पर तो वह प्राज्ञ ही है, ऐसी ' तत्त्वमसि ' इसप्रकारकी श्रुतिसे प्रतीति कराई जाती है । अविद्याके योगसे अथवा अविद्या के निवृत्त होनेसे वस्तुमें कुछ भी विशेष नहीं आता । जैसे अंधकार में पड़ी किसी रज्जुमें सर्प समझकर कोई पुरुष मयसे काँपता हुआ वहाँसे भागता है । उससे यदि कोई अन्य विज्ञपुरुष कहे कि मय मत करो यह सर्प नहीं है किन्तु रज्जु है, तब वह पुरुष उसका वचन सुनकर सर्पज्ञान जन्य मय, कँपन और पलायन त्याग देता है । परन्तु सर्प बुद्धि कालमें अथवा उसकी निवृत्तिकाल में वस्तु ( रज्जुमें ) कोई विशेषता नहीं है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिए । इसके अतिरिक्त जीव ब्रह्मके अभेद होनेसे ' न जायते म्रियते वा ' इत्यादि भी अस्तित्व प्रश्नका प्रतिवचन है । [ जीव ब्रह्म एक होनेपर भी ] अविद्यासे कल्पित जीव सत्यानन्दी - दीपिका * जीव ब्रह्मका अभेद होने से ब्रह्मविषयक प्रश्नका तृतीय वरमें अन्तर्भाव है । प्रधानकी कल्पना में तो कोई भी वर प्रदानादि नहीं हैं, और प्रधान अनात्मा है, अतः उसका आत्मविषयक तृतीय वरमें अन्तर्भाव भी सम्भव नहीं है, यही प्रधानमें विषमता है । इससे प्रधान अव्यक्त शब्द वाच्य नहीं है || ६ ॥

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२ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ एकत्वेऽपि ह्यात्मविषयस्य प्रश्नस्य प्रायणावस्थायां देहव्यतिरिक्तास्तित्वमात्रविचिकित्स-नात्कर्तृत्वादिसंसारस्वभावानपोहनाच्च पूर्वस्य पर्यायस्य जीवविषयत्वमुत्प्रेक्ष्यते । उत्त-रस्य तु धर्माद्यत्यय संकीर्तनात्प्राज्ञविषयत्वमिति । ततश्च युक्ताऽग्निजीवपरमात्मकल्पना । प्रधान कल्पनायां तु न वरप्रदानं न प्रश्नो न प्रतिवचनमिति वैषम्यम् ॥६ ॥

महद्वच्च || ७ || पदच्छेद - महद्वत् च । सूत्रार्थ - ' बुद्धेरात्मा महान् पर: ' इसमें पठित " महत् " शब्द जैसे सांख्याभिमत तत्त्वका वाचक नहीं है, वैसे वैदिक अव्यक्तशब्द भी प्रधानका वाचक नहीं है । * यथा महच्छब्दः सांख्यैः सत्तामात्रेऽपि प्रथमजे प्रयुक्तो न तमेव वैदिकेऽपि प्रयोगेऽभिधत्ते । ' बुद्धेरात्मा महान्परः ' ( का ० १ | ३ | १० ), ' महान्तं त्रिभुमात्मानम् ' ( का ० १।२।२२ ), ' वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् ' ( श्व े ० ३।८ ) इत्येवमादावात्मशब्द प्रयोगादिभ्यो हेतुभ्यः । तथाऽव्यक्तशब्दोऽपि न वैदिके प्रयोगे प्रधानमयिधातुमर्हति । अतश्च नास्त्या-नुमानिकस्य शब्दवत्रम् ॥७ ॥

( २ चमसाधिकरण सू ० ८-१० ) चमसवदविशेषात् || ८ || पदच्छेद --- चमसवत्, अविशेषात् । सूत्रार्थ - ( चमसवत् ) ' अर्वाग्बिलश्चमसः ' चमस ( यज्ञपात्र ) के समान ( अविशेषात् ) अविशेष होने से श्रुतिपठित अजाशब्द भी प्रधानका वाचक नहीं है अर्थात् जैसे अर्वाग्बिलत्व सामान्य धर्मं हेनेसे चमसका वाचक नहीं है, वैसे अजात्व धर्म मी सामान्य होने से प्रधानका वाचक नहीं है । * पुनरपि प्रधानवाद्यशब्दत्वं प्रधानस्यासिद्धमित्याह । कस्मात्? मन्त्रवर्णात्-' अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्य ेको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां ब्रह्म भेदकी अपेक्षा सूत्रकी योजना करनी चाहिए । यद्यपि आत्मविययक प्रश्न एक ही है तो भी मरणा-वस्था में देहसे भिन्न आत्मा में अस्तित्वमात्रका संशय होने तथा कर्तृत्वादि संसार स्वभावका निषेध न होने से पूर्व पर्याय ( ( प्रश्न ) में जीव विषयक उत्प्रेक्षाकी जाती है । उत्तर पर्याय में तो धर्मादिके राहित्यका प्रतिपादन होनेसे वह प्राज्ञविषयक है । इसलिए अग्नि, जीव और परमात्माकी कल्पना युक्त है । प्रधानकी कल्पना में तो न वर प्रदान है, न प्रश्न है और न प्रतिवचन है, इस प्रकारकी यहाँ विषमता है || ६ || जैसे सांख्याचार्यों द्वारा सत्तामात्र, प्रथमोत्पन्न महत्तत्त्व अर्थ में प्रयुक्त महत् शब्द ' बुद्धेरात्मा ' ' ० ( बुद्धिसे महान आत्मा श्रेष्ठ है ) ' महान्तं ० ' ( महान् विभु आत्माको ) ' वेदाहमेतं ० ' ( मैं इस महान् पुरुषको जानता हूँ ) इत्यादिमें आत्मशब्द प्रयोग आदि हेतुओंसे वैदिक प्रयोगमें उसी अर्थ अभिधान नहीं करता, उसी प्रकार अव्यक्त शब्द मी वैदिक प्रयोगमें प्रधानका अभिधान नहीं कर सकता, इसलिए अनुमानगम्य प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है ॥ ७ ॥

प्रधानवादी फिर भी कहता है कि प्रधानको शब्द - श्रुतिसे अप्रतिपादित कहना असिद्ध है, किससे? इससे कि ' अजामेकां ' ० ( अपने अनुरूप बहुत - सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली, लोहित, शुक्ल, कृष्ण वर्णा एक अजा ( बकरी - प्रकृति ) को एक अज ( बकरा - जीव ) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा सत्यानन्दी - दीपिका * ' श्रौतः अव्यक्तशब्दो न सांख्या साधारणतत्त्वगोचरः वैदिकशब्दत्वात् महच्छब्दवत् ' । ' श्रौत अव्यक्त शब्द सांख्यके असाधारण प्रधानतत्त्वका प्रतिपादन नहीं करता है, क्योंकि वैदिक शब्द है, जैसे महत् शब्द । ' इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है ॥७ ॥