श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 331–340
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 331–340
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अधि ० २ सू ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २ ९ ७ भुक्तमोगामजोऽन्यः ' ( श्वे ० ४।५ ) इति । अत्र हि मन्त्र लोहितशुक्लकृष्णशब्दे रजःसत्त्वतमां-स्यभिधीयन्ते । लोहितं रजः; रञ्जनात्मकत्वात् । शुक्लं सत्त्वं प्रकाशात्मकत्वात् । कृष्णं तमः; आवरणात्मकत्वात् । तेषां साम्यावस्थाऽवयवधर्मैर्व्यपदिश्यते लोहितशुक्लकृष्णेति । न जायत इति चाजा स्यात्; ' मूलप्रकृतिरविकृतिः ' इत्युभ्युपगमात् । नन्वजाशब्दश्छा गायां रूढः । बाढम्; सा तु रूढिरिह नाश्रयितुं शक्या; विद्याप्रकरणात् । सा च बह्रीः प्रजास्त्रै-गुण्यान्विता जनयति । तां प्रकृतिमज एकः पुरुषो जुषमाणः प्रीयमाणः सेवमानो वाऽनु-शेते । तामेवाविद्ययाऽऽत्मत्वेनोपगम्य सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरति । अन्यः पुनरजः पुरुष उत्पन्नविवेकज्ञानो विरक्तो जहात्येनां प्रकृतिं भुक्तभोगां कृतभोगापवर्गां परित्यजति मुच्यत इत्यर्थः । तस्माच्छुतिमूलैव प्रधानादिकल्पना कापिलानामिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - नानेन मन्त्रेण श्रुतिमत्त्वं सांख्यवादस्य शक्यमाश्रयितुम् । न ह्ययं मन्त्रः स्वातन्त्र्येण कंचिदपि वादं समर्थयितुमुत्सहते; सर्वत्रापि यया कयाचित्कल्पनयाऽजात्वादि-संपादनोपपत्तेः, सांख्यवाद एवेहाभिप्रेत इति विशेशवधारणकारणाभावात् । चमसवत् । यथा हि ' अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः ' ( वृ ० २।२३ ) इत्यस्मिन्मन्त्रे स्वातन्त्र्येणायं नामासौ अज उस भुक्त भोगाको त्याग देता है ) ऐसा मन्त्र है । इसी मन्त्रमें लोहित, शुक्ल, और कृष्णशब्दोंसे रज, सत्त्व और तमका अभिधान होता है । लोहित, रागात्मक होनेसे रज, शुक्ल प्रकाशात्मक होनेसे सत्त्व और कृष्ण आवरकात्मक होनेसे तम है । उनके अवयव धर्मोसे लोहित, शुक्ल, कृष्णरूप साम्या-वस्था कही जाती है । ' न जायते इति अजा ' ' जो उत्पन्न नहीं होती वह अजा है ' क्योंकि ' मूलप्रकृतिर-विकृति: ' ( मूलप्रकृति किसीका कार्य नहीं होती ) ऐसा सांख्य लोग स्वीकार करते हैं । परन्तु अजा-शब्द तो बकरीमें रूढ है? यह सत्य है, परन्तु यहाँ उस रूढिका आश्रय ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह विद्याका प्रकरण है । वह अजा अपने अनुरूप त्रिगुणान्वित - सुख, दुःख मोहात्मक देव मनुष्य पशु आदि बहुत प्रजाओंको जन्म देती है । एक अज - पुरुष उस प्रकृति पर प्रेम रखता हुआ और उसका सेवन करता हुआ उसके पास शयन करता है अर्थात् अविद्यासे उसीको आत्मरूप से मानकर ' मैं सुखी ' दुःखी एवं मूढ हूँ ' इस प्रकार अविवेकसे जन्म मरणको प्राप्त होता है । परन्तु उत्पन्न हुए विवेक ज्ञानवाला अन्य अज - विरक्त पुरुष जिसने भोग और अपवर्ग सम्पादनकर लिया है, ऐसी भुक्त मोगा प्रकृतिका परित्याग करता है उससे मुक्त हो जाता है, ऐसा अर्थ है । इसलिए कपिलमतानुयायियों-की प्रधानादि कल्पना श्रुतिमूलक ही है । सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' अजामेकां ' इस मन्त्रसे सांख्यवाद श्रुति प्रतिपादित है ऐसा स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मन्त्र स्वतन्त्ररूप से किसी भी वादका समर्थन करने में उत्साह नहीं करता । सभी वादोंमें जिस किसी कल्पनासे अजात्वादिका सम्पादनः उपपन्न होता है । सांख्यवाद ही यहाँ अभिप्रेत है ऐसा विशेषका निश्चायक कोई कारण प्रमाण नहीं है । चमसके समान । ' अर्वाग्बिलश्चमस ' ( जो नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है ) इस मन्त्र में स्वतन्त्ररूपसे यह चमस नामक यज्ञपात्र सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्तमें पहले अव्यक्तशब्दसे स्थूलशरीरका ग्रहण किया गया है, अब लोहित आदि धर्मवाचक पदोंसे तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) रूप धर्मीको मगवान् सूत्रकार दिखलाते हैं । इस अधिकरणका ' अजा ' पद विषय है । विद्याके प्रकरण में रूढि अर्थका सम्भव न होनेसे यौगिक ' अजा ' पद प्रधान परक है अथवा मायापरक है? ऐसा संशय होनेपर पूर्वाधिकरण में केवल अव्यक्तः शब्दसे प्रधानकी प्रत्यभिज्ञा न होनेपर भी यहाँ तो त्रिगुणत्व आदि लिङ्गोंसे युक्त प्रधानकी प्रत्यभिज्ञा होनी चाहिए । इस प्रकार प्रत्युदाहरणसंगति से ' पुनरपि ' इत्यादिसे पूर्वपक्षको उपस्थित करते हैं ॥ ८ ॥
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३ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ चमसोऽभिप्रेत इति न शक्यते निरूपयितुम् । सर्वत्रापि यथाकथंचिदर्वाग्बिलत्वादि-कल्पनोपपत्तेः ः । एवमिहाप्यविशेषः ' अजामेकाम् ' इत्यस्य मन्त्रस्य । नास्मिन्मन्त्रे प्रधान-मेवाजाऽभिप्रेतेति शक्यते नियन्तुम् ॥८ ॥
तत्र तु ' इदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः ' इति वाक्यशेषाच्चमसविशेष-प्रतिपत्तिर्भवति । इह पुनः केयमजा प्रतिपत्तव्येति? अत्र ब्रूमः -ज्योतिरुपक्रमा तु तथा धीयत एके || ९ || पदच्छेद - ज्योतिरुपक्रमा, तु, तथा, हि, अधीयते, एके । सूत्रार्थ - ( ज्योतिरुपक्रमा ) तेज जिसके उपक्रम - आरम्भ में है उसी तेज, जल और जन्नरूप प्रकृतिका ही अजाशब्दसे निश्चय करना चाहिए, प्रधानका नहीं, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) वैसे ही ( एके ) छान्दोग तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिका रोहित आदि रूप ( अधीयते ) कहते हैं । ( तु ) शब्द अवधारणार्थक है । * परमेश्वरादुत्पन्ना ज्योतिः प्रमुखा तेजोबन्न लक्षणा चतुर्विधस्य भूतग्रामस्य प्रकृति-भूतेयमजा प्रतिपत्तव्या । तुशब्दोऽवधारणार्थः भूतत्रयलक्षणैवेयमजा विशेया, न गुणत्रय-लक्षणा । कस्मात्? तथा ह्येके शाखिनस्तेजोबन्नानां परमेश्वरादुत्पत्तिमाम्नाय तेषामेव रोहितादिरूपतामामनन्ति - ' यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्कं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य ' इति, तान्येवेह तेजोबन्नानि प्रत्यभिज्ञायन्ते रोहितादिशब्दसामान्यात् । रोहितादीनां च शब्दानां रूपविशेषेषु मुख्यत्वाद्भाक्तात्वाच्चगुणविषयत्वस्य । असंदिग्धेन च संदिग्धस्य निगमनं न्याय्यं अभिप्रेत है ऐसा निरूपण नहीं किया जा सकता, क्योंकि सर्वत्र हि किसी न किसी प्रकार अर्वाग्वि-लत्वकी कल्पना हो सकती है; वैसे यहाँ भी ' अजामेकां ' इस मन्त्रमें कोई विशेष अर्थं प्रतिपादित नहीं है, इसलिए इस मन्त्रमें अजाशब्दसे प्रधान ही अभिप्रेत है, ऐसा नियमन नहीं किया जा सकता ॥ ८ ॥
परन्तु उसमें तो ' इदं तच्छिर ' ० ( वह यह सिर है जो कि अधोमुख और ऊपरकी ओर उठा हुआ गोलाकार है ) इस प्रकार वाक्यशेषसे चमस विशेषकी प्रतीति होती है, किन्तु यहाँ अजापदसे किसको समझना चाहिए, इसपर हम कहते हैं--जो परमेश्वरसे उत्पन्न हुई है, तेज प्रमुख तेज, जल एवं अन्नरूप है, जरायुज, आण्डज, स्वेदज, उद्भिज्जरूप चार प्रकारके भूत समूहका कारणरूप है वह यहाँ अजापदसे समझना चाहिए । सूत्रस्थ ' तु ' शब्द अवधारण ( निश्चय ) अर्थमें प्रयुक्त है । यह अजा तेज, जल, अन्न भूत त्रयात्मक समझनी चाहिए न कि गुणत्रयात्मक - प्रधान, क्योंकि उसी प्रकार छन्दोग शाखावाले तेज, जल और अन्नकी परमेश्वरसे उत्पत्ति कहकर ' यदग्नेरोहितं रूपं ० ' ( जो अग्निमें रोहित रक्त रूप है वह तेजका है, जो शुक्लरूप है वह जलका है, जो कृष्णरूप है वह अन्न- पृथिवीका है ) इस प्रकार उन तीनोंके ही रोहित आदि रूप कहते हैं । इस अजामन्त्रमें उन तेज, जल, और अन्नकी ही लोहित, शुक्ल और कृष्णरूपसे प्रत्यभिज्ञा होती है, क्योंकि रोहित आदि शब्द दोनों मन्त्रोंमें समान हैं । रोहितादि शब्द रूपविशेषोंमें मुख्य हैं और गुणविषयमें गौण हैं अर्थात् रोहित आदि शब्दोंका मुख्य अर्थं तो तेज आदिका रूप सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे ‘ अजामेकां ० ' इस मन्त्रमें अजा सम्पूर्ण कार्यकी प्रकृति कही गई है, वैसे छान्दोग्य श्रुतिमें प्रतिपादित तेज, जल और अन्न भी सम्पूर्ण कार्यके कारण कहे गये हैं, क्योंकि दोनों मन्त्रों में रोहित आदि शब्द समानरूपसे पाये जाते हैं, रोहित एवं लोहितका एक ही अर्थ है । छान्दोग्य श्रुति असंदिग्ध ' है, अत: उससे ' अजामेकां ' इस संदिग्ध वाक्यार्थका निर्णय करना न्याय संगत है, इसलिए अजापदसे भूत त्रयात्मक तेज, जल एवं अन्नका ही ग्रहण करना चाहिए, सांख्य अभिमत प्रधानका नहीं ।
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अधि ० २ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २ ९९ मन्यन्ते । * तथेहापि ‘ ब्रह्मवादिनो वदन्ति । किं कारणं ब्रह्म ' ( श्वे ० १1१ ) इत्युपक्रम्य ' ते ध्यान-योगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्ति स्वगुणैर्निगूढाम् ' ( श्वे ० १ ३ ) इति पारमेश्वर्याः शक्तेः समस्त-जगद्विधायिन्या वाक्योपक्रमेऽवगमात् । वाक्यशेषेऽपि ' मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ' इति ‘ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः ' ( श्वे ० ४ १०, ११ ) इति च तस्या एवावग -मान्न स्वतन्त्रा काचित्प्रकृतिः प्रधानं नामाजामन्त्रेणाम्नायत इति शक्यते वक्तुम् । प्रकर-णात् सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मन्त्रेणानायत इत्युच्यते । तस्याश्च स्वविकारविषयेण त्रैरूप्येण त्रैरूप्यमुक्तम् ॥९ ॥
कथं पुनस्तेजोबन्नात्मना त्रैरूप्येण त्रिरूपाऽजा प्रतिपत्तुं शक्यते? यावता न तावत्ते जोबन्नेष्वजाकृतिरस्ति । न च तेजोबन्नानां जातिश्रवणादजातिनिमित्तोऽप्यजा-शब्दः संभवतीति । अत उत्तरं पठति-कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः || १० || पदच्छेद- कल्पनोपदेशात्, च, मध्वादिवत्, अविरोधः । सूत्रार्थ - ( कल्पनोपदेशाच्च ) तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिमें सादृश्य सूचित करनेके लिए कल्पनासे अजात्वका उपदेश किया गया है, ( मध्वादिवत् ) जैसे मधु भिन्न आदित्य में मधुत्वका उपदेश है, वैसे अजा भिन्न प्रकृतिमें अजात्नका उपदेश होनेसे ( अविरोधः ) विरोध नहीं है, अतः प्रधान श्रुति-प्रतिपादित नहीं है । विशेष है सत्त्व आदि गुण तो गौण अर्थ है, और असंदिग्धवाक्यसे संदिग्धवाक्यार्थका निगमन - निर्णय करना न्याय्य संगत मानते हैं । उसी प्रकार यहाँ भी ' ब्रह्मवादिनो ० ' ( ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं--जगत्का कारणभूत ब्रह्म कैसा है? ) ऐसा उपक्रमकर ' ते ध्यानयोगानुगता ० ' ( उन ऋषियोंने ध्यान योगका अनुवर्तनकर अपने गुणोंसे अत्यन्त छिपी हुई देवात्मशक्तिका साक्षात्कार किया ) इस प्रकार वाक्यके उपक्रममें सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाली परमेश्वरकी शक्ति अवगत होती है । वाक्यशेषमें मी ' मायां तु ० ' ( प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायावी ) और ' यो योनिं ० ' ( जो परमात्मा अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है ) इस प्रकार उसी शक्तिकी अवगति होनेसे प्रधान नामकी कोई स्वतन्त्र प्रकृति अजामन्त्रसे कही जाती है ऐसा नहीं कहा जा सकता । ऐसा कहा जाता है कि प्रकरण से तो वही दैवी शक्ति अव्याकृत नामरूपवाली, नाम और रूपकी पूर्वावस्था इस मन्त्र से भी कही जाती है, रूप्य स्वविकार विषय ( आश्रय ) से उसको भी त्रैरूप्य कहा गया है ॥ ९ ॥
[ रूढिको लेकर यहाँ शङ्का है ] जब तेज, जल और अन्नमें अजाकी जाति नहीं है तो तेज, जल एवं अन्न त्रैरूप्य होनेसे अजा त्रिरूप किस प्रकार समझी जा सकती है । [ ' न जायते इति अजा ' इस यौगिकको लेकर कहते हैं ] तेज, जल और अन्नकी उत्पत्तिके श्रवण होनेसे उनमें जन्माभाव निमित्तक अजाशब्दका प्रयोग संभव नहीं है । इसलिए उत्तर सूत्र कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका * ब्रह्मवादियोंने विचार किया कि शुद्ध ब्रह्मसे इस विचित्र नामरूपात्मक जगत्को उत्पत्ति तो असम्भव है, क्योंकि वह निर्विकार है । किञ्च ब्रह्मसे भिन्न केवल जड़से भी जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जड़में कार्य विषयक ज्ञान आदि नहीं होते, अतः मायारूप सहायक कारण सहित ब्रह्म जगत्का कारण है | अनभिव्यक्त नाम - रूप होनेके कारण मायाको अव्याकृत कहा गया है । माया एक होनेपर भी उसकी अविद्यारूप शक्तियाँ अनन्त हैं, वही उपाधि है । इस अविद्यारूप उपाधिसे ब्रह्म ही जीव कहलाता है, वस्तुतः जीव ब्रह्मसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है । मायाके विकार तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) ये क्रमसे रक्त, शुक्ल और कृष्णरूप हैं, इस प्रकार कार्यकी अपेक्षा माया भी
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३०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ नायमजाकृतिनिमित्तोऽजाशब्दः । नापि यौगिकः । किं तर्हि? कल्पनोपदेशोऽयम् । अजारूपक क्लप्तिस्तेजोबन्नलक्षणायाश्चराचरयोनेरुपदिश्यते । यथा हि लोके यदृच्छया काचिदजा लोहितशुक्लकृष्णवर्णा स्याद्बहुबर्करा सरूपबर्करा च तां च कश्चिदजो जुषमाणोऽ-नुशयीत, कश्चिच्चैनां भुक्तभोगां जह्यात्, एवमियमपि तेजोबन्न लक्षणा भूतप्रकृतिस्त्रिवर्णा बहु सरूपं चराचरलक्षणं विकारजातं जनयति, अविदुषा च क्षेत्रज्ञेनोपभुज्यते, विदुषा च परित्यज्यत इति । * न चेदमाशङ्कितव्यम् - एकः क्षेत्रज्ञोऽनुशेतेऽन्यो जहातीत्यंतः क्षेत्रज्ञभेदः पारमार्थिकः परेषामिष्टः प्राप्नोतीति । न हीयं क्षेत्रज्ञभेदप्रतिपिपादयिषा, किंतु बन्धमोक्षव्य-वस्थाप्रतिपिपादयिषा त्वेषा । प्रसिद्धं तु भेदमनूद्य बन्धमोक्षव्यवस्था प्रतिपाद्यते । भेदस्तूपाधि निमित्तो मिथ्याज्ञानकल्पितो न पारमार्थिकः; ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । मध्वादिवत्, यथा ' आदित्यस्यामधुनो मधुत्वम् ' ( छा ० ६।१ ) ' वाचश्चाधेनोर्धेनुत्वम् ' ( बृ ० ५।८ ), ' द्युलोकादीनां चानग्नीनामग्नित्वम् ( बृ ० ८ / २ / ९ ) इत्येवंजातीयकं कल्प्यते, एवमिद-मनजाया अजात्वं कल्प्यत इत्यर्थः । तस्माद्विरोधस्तेजोबन्नेष्वजाशब्दप्रयोगस्य ॥१० ॥
[ अजामेका ] यह अजाशब्द जातिनिमित्तक रूढि नहीं है और यौगिक मी नहीं है, किन्तु यह काल्पनिक उपदेश है । चराचर जगत्के कारण भूत तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिमें अजा सादृश्य कल्पनाका उपदेश है । जैसे लोकमें दैववश रक्त, शुक्ल, कृष्ण वर्ण कोई एक ऐसी अजा - बकरी हो उसे समानरूपवाले बहुतसे बकरे हों, उसपर कोई एक अज - बकरा प्रेम करता हुआ उसके पीछे - पीछे फिरे और कोई एक अज भोग भोगके अनन्तर उसे त्याग दे, वैसे ही यह तेज, जल और अन्नरूप त्रिवर्णात्मक भूतप्रकृति भी समान रूपवाले चराचरात्मक विकार समूहको उत्पन्न करती है । अविद्वान् क्षेत्रज्ञ इसका उपभोग करता है और विद्वान् इसका परित्याग करता है । यह आशङ्का यहाँ नहीं करनी चाहिए कि एक क्षेत्रज्ञ सेवन करता हुआ इसके पास शयन करता है और दूसरा इसका परित्याग करता है, इससे पारमार्थिक क्षेत्रज्ञ भेद जो पर - सांख्यको इष्ट है, वह प्राप्त होता है, क्योंकि यह क्षेत्रज्ञ के भेदका प्रतिपादन करनेकी इच्छा नहीं है, किन्तु बन्ध - मोक्ष व्यवस्थाका प्रतिपादन करनेकी इच्छा है । लोक प्रसिद्ध भेदका अनुवादकर बन्ध - मोक्ष व्यवस्थाका प्रतिपादन किया जाता है । भेद तो उपाधिनिमित्तक और मिथ्याज्ञानसे कल्पित है, पारमार्थिक नहीं है । क्योंकि ' एको देवः ० ' ( एक देव सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ, सबमें व्यापक और सब भूतोंका अन्तरात्मा है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । मधु आदिके समान, अर्थात् जैसे मधुसे भिन्न आदित्यको मधु कहा गया है, धेनुसे भिन्न वाणीमें धेनुशब्दका प्रयोग किया गया है, और अनग्नि आदि लोकोमें अग्नि शब्दका प्रयोग किया गया है, इस प्रकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही यहाँ भी अनजा- अजासे भिन्न में यह अजात्वकी कल्पनाकी गई है, ऐसा अर्थ है | इसलिए तेज, जल और अन्नमें अजाशब्दके प्रयोगका विरोध नहीं है ॥१० ॥
सत्यानन्दी - दीपिका रक्त, शुक्ल एवं कृष्णरूप कही जाती है । इसलिए ' अजामेकां ' इस मन्त्र से अव्याकृत मायाका ग्रहण करना युक्त है, प्रधानका नहीं ॥ ९ ॥
* पूर्वपक्षी - ' न जायत इति अजा ' यह यौगिक अर्थं मुख्य है, अतः इससे प्रधानका ग्रहण करना युक्त है? सिद्धान्ती - रूढार्थकी अपेक्षा न करनेवाले यौगिक अर्थसे रूढार्थ में आश्रित गुणोंको लेकर की हुई लक्षणा अधिक बलवती होती है, यह नियम है, क्योंकि गुणों के आधारपर रूढि रहती है, इसलिए जैसे मधु आदि शब्दोंसे प्रसिद्ध मधु आदिके आश्रित गुणवृत्तिरूप लक्षणासे आदित्य आदिका ग्रहण होता है, वैसे रोहित आदि गुण वाचक शब्दोंके साथ अजाशब्द के सहोचारणसे समर्थित तथा रूढिमें आश्रित गुणवृत्तिरूप लक्षणासे यौगिक अर्थ प्रधानका बाधकर तेज, जल और
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अधि ० ३ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३०१ ( ३ संख्योपसंग्रहाधिकरणम् सू ० ११-१३ ) न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥११ ॥
पदच्छेद - न संख्योपसंग्रहात्, अपि, नानाभावात्, अतिरेकात्, च । सूत्रार्थ - ( संख्योपसंग्रहादपि ) ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठित: ' इस मन्त्रमें श्रूयमाण संख्यावाचक पदसे पच्चीस संख्याका ग्रहण करनेपर भी ( न ) प्रधान श्रुति- प्रतिपादित नहीं है, ( नानाभावाद ) क्योंकि नाना भाव है ( अतिरेकाच्च ) आत्मा और आकाश अतिरिक्त कहे गए हैं, इससे सप्तविंशति तत्त्व मानने पड़ेंगे । इससे तो अपसिद्धान्त होगा, अतः प्रधान आदि तत्त्वोंका ग्रहण युक्त नहीं है । * एवं परिहृतेऽप्यजामन्त्रे पुनरन्यस्मान्मन्त्रात्सांख्यः प्रत्यवतिष्ठते । ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम् ' ( बृ ० ४ | ४ | १७ ) इति । अस्मिन्मन्त्रे पञ्च पञ्चजना इति पञ्चसंख्याविपयाऽपरा पञ्चसंख्या श्रूयते; पञ्चशब्द-द्वयदर्शनात् । त एते पञ्चपञ्चकाः पञ्चविंशतिः संपद्यन्ते । तथा पञ्चविंशति संख्यया यावन्तः संख्येया आकायन्ते तावन्त्येव च तत्त्वानि सांख्यैः संख्यायन्ते – ' मूलप्रकृतिरविकृतिर्मह-दाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ' ( सांख्यका ० ३ ) इति । तया श्रुतिप्रसिद्धया पञ्चविंशतिसंख्यया तेषां स्मृतिप्रसिद्धानां पञ्चविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहा प्राप्तं पुनः श्रुतिमत्वमेव प्रधानादीनाम् । ततो ब्रूमः - न संख्योपसंग्रहादपि प्रधानादीनां इस प्रकार अजामन्त्रमें सांख्याभिमत प्रधानादिका परिहार होनेपर भी अन्य मन्त्रके आधारपर सांख्य पुनः पूर्वपक्ष करता है - ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना ० ' ( जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृत संज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको हो मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ । उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ) इस मन्त्र में ' पञ्च पञ्चजना ' इस प्रकार पाँच संख्या विषयक दूसरी पाँच संख्याका श्रवण है, क्योंकि दो वार पञ्चशब्द देखने में आता है, वे ये पाँच पंचक मिलकर पच्चीस होते हैं । एवं पच्चीस संख्यासे जितने सांख्यवालोंकी आकांक्षा होती है उतने ही तत्त्व सांख्योंने गिने हैं - ' मूलप्रकृति ० ' ( मूल प्रकृति अविकृति है अर्थात् किसीकी विकृति नहीं है, महदादि सात प्रकृति और विकृति दोनों हैं, सोलह तत्त्व विकार ही हैं, पुरुष न प्रकृति है और न विकृति ही ) श्रुति प्रसिद्ध उस पच्चीस संख्यासे उन स्मृति प्रसिद्ध पच्चीस तत्त्वोंका उपसंग्रह होनेसे प्रधान आदि श्रुति प्रतिपादित हैं, ऐसा पुनः प्राप्त हुआ । सिद्धान्ती - इस विषयमें हम कहते हैं - संख्या के संग्रहसे भी प्रधानादि श्रुति प्रतिपादित हैं सत्यानन्दी - दीपिका अन्न रूप अवान्तर प्रकृतिका अजाशब्दसे ग्रहण करना चाहिए । अतः यह सिद्ध हुआ कि अजा भिन्न तेज, जल और अन्नमें अजा शब्द विरुद्ध नहीं है और प्रधान अजाशब्दसे गृहीत न होनेसे श्रुति प्रतिपादित नहीं है । वाक्योंके समन्वयकी असिद्धि पूर्वपक्षमें फल है और सिद्धान्तमें उसकी सिद्धि फल है ॥१० ॥
* ‘ यस्मिन्पञ्च पञ्चजना: ' इस मन्त्र में पठित पञ्चजनशब्द यौगिक है अथवा रूढ़, यह निश्चय न होनेसे सांख्य तत्त्वोंका प्रतिपादन करता है अथवा अन्य पदार्थका " ऐसा संशय उत्पन्न होता है । जैसे तत्त्वविद्याके प्रकरण में प्रसिद्ध अजा बकरीरूप अर्थ में तात्पर्यं न होनेसे अजामन्त्रगत अजापदसे रूढ़ि अर्थका त्यागकर तेज आदिका ग्रहण किया गया है, वैसे ही ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना: ' इस मन्त्र में पंचजन शब्दसे मनुष्योंमें तात्पर्यके अभाव होनेसे रूढिका त्यागकर सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंका ग्रहण करना चाहिए, इस प्रकार दृष्टान्तसंगतिसे मन्त्रको उद्धृतकर ' एवम् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं । इस प्रकार ' मूल प्रकृति, महत्, अहङ्कार, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ ये सात, एकादश इन्द्रियाँ, एवं पांच स्थूलभूत ये सोलह केवल विकार और पुरुष सांख्यशास्त्र में २५ तत्त्व गिने जाते हैं । ' इसलिए प्रधान आदि श्रुति प्रतिपादित हैं ।
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३०२ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ श्रुतिमत्त्वं प्रत्याशा कर्तव्या । कस्मात्? नानाभावात् । नाना ह्येतानि पञ्चविंशतिस्तत्त्वानि । नैषां पञ्चशः पञ्चशः साधारणो धर्मोऽस्ति, येन पञ्चविंशतेरन्तराले पराः पञ्च पञ्जसंख्या निविशेरन् । न ह्येक निबन्धनमन्तरेण नानाभूतेषु द्वित्वादिकाः संख्या निविशन्ते । अथोच्येत पञ्चविंशतिसंख्यैवेयमवयवद्वारेण लक्ष्यते, यथा ' पञ्च सप्त च वर्षाणि न ववर्ष शतक्रतुः ' इति ऐसी आशा नहीं करनी चाहिए, किससे? इससे कि नानाभाव है अर्थात् ये पच्चीस तत्त्व नाना - पृथक ही हैं, इनमें प्रत्येक पञ्चकका साधारण धर्म नहीं है, जिससे कि पच्चीस संख्या के बौचमें दूसरी पाँच - पाँच संख्याएँ अन्तर्भूत हों, क्योंकि किसी एक अनुगत धर्मके विना पृथक् भूत पदार्थोंमें द्वित्व आदि संख्या प्रविष्ट नहीं होती । यदि कहो कि जैसे ' पञ्च सप्त च वर्षाणि ० ( पाँच और सात वर्ष अर्थात् बारह वर्ष इन्द्र-सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः ' इस मन्त्रमें पच्चीस संख्या के ग्रहण करनेसे भी प्रधान आदि श्रुति प्रतिपादित नहीं हैं, क्योंकि पुरुष, प्रधान, महत् आदि भिन्न - भिन्न पदार्थ हैं, इनमें अनुगत कोई एक धर्म नहीं है, अतः भिन्न - भिन्न पदार्थों में द्वित्व संख्या पञ्च पञ्च दो बार संख्याका प्रवेश भी नहीं होता अर्थात् इतर पञ्चक में न रहनेवाले पाँच - पाँच तत्त्वोंमें अनुगत साधारण धर्मका अभाव ही यहाँ पृथग्भाव विवक्षित है । यद्यपि पाँच ज्ञानेन्द्रियोंमें ज्ञान कारणत्व, पाँच कर्मेन्द्रियोंमें कर्मकारणत्व और पाँच तन्मात्राओंमें स्थूलप्रकृतित्व है, तोमि ' यस्मिन् ' इस प्रकार आत्मा और आकाशके पृथक् कथन के कारण सत्त्व, रज, तम, महत् और अहंकार इन पाँचोंका एक समूह, मन और चार भूतोंको मिलाकर इन पाँचोंका एक और समूह, इन दोनों पंचकों में प्रत्येकमें अनुवृत्त इतर पँचकोंसे व्यावृत्त धर्म नहीं है । क्योंकि ' पञ्चजन ' एक समस्त पद है । ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना: ' इस मन्त्र में पञ्चजन शब्द समस्त पद है, क्योंकि संहितामें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भेदसे स्वर तीन होते हैं । ब्राह्मण में उदात्त और अनुदात्त दो ही स्वर होते हैं । यह नियम ऐतरेय ब्राह्मण, सामवेद ब्राह्मण, शुक्ल यजुर्वेद - शतपथ ब्राह्मणमें माना जाता है । इसलिए इस मन्त्र में प्रथम पञ्चशब्द आद्युदात्त है, द्वितीय पञ्चशब्द सर्वानुदात्त है और जनशब्द अन्तोदात्त है, द्वितीय पञ्चशब्द और जनशब्दमें समास के बिना अन्त्य आकार उदात्त और उसके पूर्वं वर्णं अनुदात्त नहीं हो सकते । ' समासस्य ' ( पा ० सू ० ६ | १ | २२३ ) इस सूत्रसे समासका अन्त उदात्त होता है और ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' ( पा ० सू ० ६।१।१५८ ) इस सूत्र से जिस पदमें जिस वर्णके स्थान में उदात्त अथवा स्वरितका विधान हैं, उस एक वर्णको छोड़कर उस पदके शेष सब स्वर उदात्त होते हैं, ऐसा विधान है, इसलिए मन्त्र में अन्त्य स्वर उदात्त होनेसे एक पदत्वका निश्चय होता है । ‘ छन्दोगा बह्वृचाश्चैव तथा वाजसनेयिनः ऊचनीचस्वरं प्राहुः स बैभाषिक उच्यते ॥ ' ‘ सामवेद, ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद इनके ब्राह्मण ग्रन्थोंमें उदात्त और अनुदात्त स्वरको भाषिकस्वर कहते हैं ' उसमें ' स्वरितोऽनुदात्तो वा ' इस सूत्र से जो मन्त्र दशामें स्वरित अथवा अनुदात्त रहता है, वह ब्राह्मणदशामें उदात्त होता है, ऐसा अपवाद स्वीकार किया है, इसलिए अन्त्य आकारसे पूर्वस्थित अनुदात्त स्वरोंको ब्राह्मणदशामें उदात्तत्व प्राप्त हुआ, ' उदात्तमनुदात्तमनन्त्यम् ' इस सूत्र से मन्त्रदशा में अन्त्य मिन्न एवं अग्रिम पदसे मिलकर उच्चार्यमाण उदात्तस्वरमें अनुदात्तत्वका विधान है । इसलिए यहाँ नकारोत्तरवर्त्ती आकार अग्रिम ' आकाशश्च ' पदके साथ मिलकर पठ्यमान अनुदात्त होता है, यह मन्त्रानुदात्त स्वरभाषिक है । इससे एक पदत्वका निश्चय होता है । ' पञ्च - पञ्चजना: ' इसमें अन्तोदात्त मान्त्रिक स्वर है, और ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना: ' इसमें अन्तानुदात्त ब्राह्मस्वर है, दोनों प्रकारसे पदके एक होनेके कारण समास सिद्ध होता है! पुर्वपक्षमें पञ्चजन शब्द व्यस्त है, सिद्धान्तमें एक समस्त पद है, क्योंकि इसमें एक स्वर और एक विभक्तिका मी नियम है । अत: आज्य ग्रहण मन्त्र में ' पञ्चानां त्वा पञ्चजनानां यन्त्राय धन्रय गृह्णामि ' ( हे आज्य! पाँच देवताओंके कर्ममें
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अधि ० ३ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो- दीपिकासहित ३०३ द्वादशवार्षिकी मनावृष्टि कथयन्ति तद्वदिति । तदपि नोपपद्यते, अयमेवास्मिन्पक्षे दोषो यल्लक्षणाश्रयणीया स्यात् । परश्चात्र पञ्चशब्दो जनशब्देन समस्तः पञ्चजना इति; भाषि-कस्वरेणैकपदत्वनिश्चयात् । प्रयोगान्तरे च ' पञ्चानां त्वा पञ्चजनानाम् ' ( तै ० १।६।२।२ ) इत्ये-कपद्यैकस्वर्यैकविभक्तिकत्वावगमात् । * समस्तत्वाच्च न वीप्सा ' पञ्च पञ्च ' इति । न च पञ्च-कद्वयग्रहणं पञ्च पञ्चेति । नच पञ्चसंख्याया एकस्याः पञ्चसंख्यया परया विशेषणं पञ्च पञ्चका इति; उपसर्जनस्य विशेषणेना संयोगात् । नन्वापन्न पञ्चसंख्याका जना एव पुनः पञ्चसंख्यया विशेष्यमाणाः पञ्चविंशतिः प्रत्येष्यन्ते । यथा पञ्च पञ्चपूल्य इति पञ्चविंशति-पूलाः प्रतीयन्ते तद्वत् । नेति ब्रूमः युक्तं यत्पञ्चपूलीशब्दस्य समाहाराभिप्रायत्वात्कतीति सत्यां भेदाकाङ्क्षायां पञ्च पञ्चपूल्य इति विशेषणम्, इह तु पञ्चजना इत्यादित एव भेदोपा-दानात्कतीत्यसत्यां भेदाकाङ्क्षायां न पञ्च पञ्चजना इति विशेषणं भवेत् । भवदपीदं विशेषणं वृष्टि नहीं की ) यहाँ बारह वर्षकी अनावृष्टि कहते हैं, वैसे [ पञ्च पञ्च ] इस अवान्तर अवयव संख्या द्वारा पच्चीस संख्या ही लक्षित होती है, यह कथन भी युक्त नहीं है । इस पक्ष में यही दोष है कि लक्षणा ग्रहण करनी पड़ती है । और यहाँ अन्य पञ्चशब्द जनशब्दके साथ समस्त होकर पञ्चजन हुआ है, कारण कि भाषिकस्वरसे एकपदत्व निश्चय होता है । एवं ' पञ्चानां त्वा पञ्चजनानाम् ' ( तुझे पञ्च-पञ्च जनके ) इस अन्य प्रयोगमें एक पद, एक स्वर और एक विभक्ति प्रतीत होती है । समस्त पद होनेसे पञ्च पञ्च ऐसी वीप्सा ( दो बार कथन ) भी नहीं है और इससे ' पञ्च पञ्च ' इस प्रकार दो का भी ग्रहण नहीं है 1 । किञ्च पञ्च पञ्चका: ' ( पांच पंचक ) इस प्रकार एक पाँच संख्याका दूसरी पाँच संख्या के साथ विशेषण - अन्वय नहीं होता, क्योंकि ( एक ) विशेषणका अन्य विशेषण के साथ सम्बन्ध ( अन्वय ) नहीं होता, पू०- परन्तु पाँच संख्याको प्राप्त हुए जन ही फिर पाँच संख्यासे विशेष्यमाण होकर पच्चीस प्रतीत होंगे । जैसे कि ' पञ्च पञ्चपूल्यः ' ( पाँच पूली पञ्चक ) यहाँ पच्चीस पूली प्रतीत होती हैं । इसके समान प्रकरणमें भी समझना चाहिए । सि ० - हम कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि पञ्चपूली शब्दमें समाहार अभिप्रेत होनेसे कितनी पञ्चपूली हैं इस प्रकार भेदकी आकांक्षा होने पर ' पञ्च पञ्चपूल्यः ' ( पाँच पूली पंचक ) इस प्रकार पाँच पूलीका विशेषण पुनः पाँच युक्त है । परन्तु यहाँ तो ' पञ्चजना: ' ( पाँच जन ) ऐसा आरम्भसे ही भेद ( विशेषण ) का ग्रहण है, अत: ‘ कितने ' इस प्रकार भेदकी आकांक्षा न होनेपर ' पञ्च पञ्चजनाः ' ( पाँच पंचजन ) इस तरह पञ्चजनका पञ्च ( संख्या ) विशेषण नहीं हो सकता । यदि विशेषण हो तो भी केवल पाँच संख्याका सत्यानन्दी - दीपिका यन्त्ररूपसे अवस्थित, ऐहिक और पारलौकिक भोग धारण करनेमें समर्थं अपने शरीरकी रक्षाके लिए तुझे ग्रहण करता हूँ ) यह यजमानकी उक्ति है । इसमें भी पञ्चजन शब्द समस्त है । * ' पञ्चजनाः ' यदि यह समस्त पद न हो तो दो पञ्चशब्दोंसे उक्त दो पञ्चत्वोंका परस्पर अन्वय है अथवा उनका जन पदार्थके साथ अन्वय है अथवा पञ्चत्व विशिष्ट जनोंके साथ अन्य पञ्चत्वका अन्वय है? इनमेंसे प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि एक पञ्च संख्या दूसरी पाँच संख्याका विशेषण नहीं होती, कारण कि विशेषणका विशेषणके साथ साक्षात् अन्वय नहीं होता, सबं अप्रधान विशेषणोंका प्रधान विशेष्यके साथ अन्वय होता है । यदि अप्रधान - गुणोंका भी अन्वय मानें तो वाक्य भेद हो जायगा । दूसरा पक्ष मी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें दस संख्याकी प्रतीति होती है पच्चोसकी नहीं । तीसरे पक्ष दृष्टान्त द्वारा पच्चीस संख्याकी प्रतीति होती है । इसमें दृष्टान्तको विषम कहकर शङ्काका ' नेति ब्रूमः ' इत्यादिसे सिद्धान्ती निराकरण करते हैं । ' पञ्चानां पूलानां सुमहारः पञ्चपूल्यः ' यहाँ पर ' संख्यापूर्वी द्विगु: ' ( पा ० सू ० २।१।५२ ) इस सूत्र से समासका विधान है । अनन्तर ' द्विगो: '
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३०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ पञ्चसंख्याया एव भवेत् २, तत्र चोक्तो दोषः । तस्मात्पञ्च पञ्चजना इति न पञ्चविंशतितत्त्वा-भिप्रायम् । अतिरेकाच्च न पञ्चविंशतितत्त्वाभिप्रायम् । अतिरेको हि भवत्यात्माकाशाभ्यां पच्चविंशति संख्यायाः । आत्मा तावदिह प्रतिष्ठां प्रत्याधारत्वेन निर्दिष्टः; यस्मिन्निति सप्तमी-सूचितस्य ' तमेव मन्य आत्मानम् ' इत्यात्मत्वेनानुकर्षणात् । आत्मा च चेतनः पुरुषः । स च पञ्चविंशताचन्तर्गत एवेति न तस्यैवाधारत्वमाधेयत्वं च युज्यते । अर्थान्तरपरिग्रहे च तत्त्व-संख्यातिरेकः सिद्धान्तविरुद्धः प्रसज्येत । * तथा ' आकाश प्रतिष्टितः ' इत्याकशस्यापि पञ्चविंशतावन्तर्गतस्य न पृथगुपादानं न्याय्यम् । अर्थान्तरपरिग्रहे चोक्तं दूषणम् । कथं च संख्यामात्रश्रवणे सत्यश्रतानां पञ्चविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहः प्रतीयेत? जनशब्दस्य तत्त्वेष्व-रूढत्वात् । अर्थान्तरोप संग्रहेऽपि संख्योपपत्तेः । कथं तर्हि पञ्च पञ्चजना इति? उच्यते-होगा | जनपदका नहीं ] इस पक्षमें तो दोष ( उपसर्जनस्य विशेषणेना संयोगात् ) कहा गया है । इसलिए ' पञ्च पञ्चजना ः ' यइ प्रयोग पच्चीस तत्त्व के अभिप्रायसे नहीं है, और संख्याकी अधिकतासे मी पच्चीस तत्त्व के अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि आत्मा और आकाशको लेकर पच्चीस संख्यासे अधिक होता है । यहाँ तत्त्वोंकी प्रतिष्ठा के आधाररूपसे आत्माका निर्देश है, क्योंकि ' यस्मिन् ' इसे सप्तमी अर्थात् सप्तम्यन्त ‘ यत् ' पदसे सूचितका ' तमेव मन्ये ० ' ( उसीको मैं आत्मा मानता हूँ ) इस प्रकार आत्मरूप से अनुकर्षण है । आत्मा चेतन पुरुष है और वह सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंके अन्तर्गत ही है, इसलिए उसीमें आधाराधेयभाव अयुक्त है । तत्त्वोंसे भिन्न अर्थका ग्रहण किया जाय तो सांख्य-सिद्धान्तसे विरुद्ध तत्त्वसंख्या में अधिकता प्रसक्त होगी । इसी प्रकार पच्चीस तत्त्वोंके अन्तर्भूत आकाशका ' आकाशश्च प्रतिष्ठित: ' ( और आकाश प्रतिष्ठित है ) इस प्रकार पृथक् ग्रहण अयुक्त है । अन्य अर्थका ग्रहण करनेपर तो उक्त दोष ( अधिक संख्या ) है । संख्या मात्रका श्रवण होनेपर श्रुति अप्रतिपादित पच्चीस तत्त्वोंका संग्रह किस प्रकार प्रतीत होता है? क्योंकि जनशब्द तो तत्त्वोंमें रूढ़ नहीं है, अन्य अर्थका संग्रह करनेसे भी संख्या उपपन्न होती है, तो ' पञ्च पञ्चजनाः ' यह किस प्रकार है? कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका इस सूत्र से ' ङीप् '. ( ईकार ) का विधान होनेसे समाहारकी प्रतीति होनेपर समाहार ( समुदाय ) कितने हैं? इस आकांक्षा में ' पञ्च ' इस प्रकार अन्य पदका अन्वय होना युक्त है । परन्तु ' पञ्चजना ः ' इसके अन्त में ' डीप् ' न होनेसे पञ्चपूली ( धानके गट्टेको पूली कहा जाता है ) के समान समाहारकी प्रतीति नहीं होती, और जनपद में पहले ही पञ्चत्वका ग्रहण होनेके कारण संख्याकी आकांक्षा न होने से ' पञ्च ' इस दूसरे पदका अन्वय नहीं हो सकता, क्योंकि अन्वय आकांक्षा के अधीन होता है । यदि मानें तो एक विशेषणका अन्य विशेषणके साथ अन्वय नहीं होता किन्तु प्रधानके साथ ही होता है, इस न्यायके साथ विरोध होगा । वस्तुतः ' पञ्चजनाः ' यहाँ तो ' पञ्च चामी जना इति पञ्चजनाः ' ' सप्तर्षि ' ' दक्षिणाग्निः ' आदिकी तरह कर्मधार्यं समास है, ' पञ्चपूली ' की तरह समाहार नहीं है । पञ्चजन घटकी भूत पंच संख्या जनोंकी व्यावर्तक है, पांच संख्यासे ही जनोंका भेद प्रतीत होता है । समाहारका यहाँ मान नहीं है, अत: कितने समुदाय हैं, इस प्रकारकी आकांक्षाके न होनेसे ' पञ्च पञ्चजनाः ' इस पश्च संख्याको ' पञ्चजन ' का विशेषण मानकर पच्चीस संख्याका लाभ नहीं हो सकता । सूत्रस्थ ' नाना-भावात् ' इस पदकी व्याख्या कर अब ' अतिरेकात् ' की व्याख्या करते हैं- यदि पच्चीस संख्या मानें तो आत्मा और आकाशको लेकर पच्चीससे अधिक सताईस संख्या हो जायगी, जो सांख्य सिद्धान्त के विरुद्ध है । * ' यस्मिन् ' इस प्रकार आत्मामें तत्त्वोंकी आधारताका वर्णन भी विरुद्ध होगा, क्योंकि सांख्य मत महत् आदि तत्त्वोंका आधार स्वतन्त्र प्रधान ही है, असङ्ग पुरुष तत्त्वोंका आधार नहीं है । किश्च सांख्यमतमें जगत्को सत्य माना गया है, इससे ' जगत् में मिथ्यात्व बोधक ' नेहनानाऽस्ति किञ्चन '
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अधि ० ३ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३०५ ' दिक्संख्ये संज्ञायाम् ' ( पा ० सू ० २।१।५० ) इति विशेषस्मरणात्संज्ञायामेव पञ्चशब्दस्य जनशब्देन समासः । ततश्च रूढत्वाभिप्रायेणैव केचित्पञ्चजना नाम विवक्ष्यन्ते, न सांख्य-तत्त्वाभिप्रायेण । ते कतीत्यस्यामा काङ्क्षायां पुनः पञ्चेति प्रयुज्यते । पञ्चजना नाम ये केचित्ते
च पच्चैवेत्यर्थः । सप्तर्षयः सप्तेति यथा ॥ ११ ॥
के पुनस्ते पञ्चजना नामेति? तदुच्यते-प्राणादयो बाक्यशेषात् ॥१२ ॥
पदच्छेद – प्राणादयः, वाक्यशेषात् । सूत्रार्थ - ( प्राणादयः ) यहाँ पञ्चजन शब्दसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, अन्न और मन कहे गये हैं, ( वाक्यशेषात् ) क्योंकि ' प्राणस्य प्राण ० ' इस वाक्यशेषमें स्थित हैं । * ‘ यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः ' इत्यत उत्तरस्मिन्मन्त्रे ब्रह्मस्वरूप निरूपणाय प्राणादयः पञ्च निर्दिष्टाः - ' प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः ' इति । तेऽत्र वाक्यशेषगताः संनिधानात्पञ्चजना विवक्ष्यन्ते । कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः? तत्त्वेषु वा कथं जनशब्दप्रयोगः? समाने तु प्रसिद्धयतिक्रमे वाक्यशेषवशात्प्राणादय एव ग्रहीतव्या भवन्ति । जनसंबन्धाच्च प्राणादयो जनशब्दभाजो भवन्ति । जनवचनश्च पुरुष-शब्दः प्राणेषु प्रयुक्तः -- ' ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः ' ( छा ० ३ | १३ | ६ ) इत्यत्र । ' प्राणो ह पिता ' दिक्संख्ये ० ' ( दिशा और संख्या वाचक शब्दोंके संज्ञा ( नाम ) अर्थमें सुबन्त उत्तर पदके साथ समास होता है ) इस विशेष सूत्रसे संज्ञामें पञ्च शब्दका जनपदके साथ समास है । वस्तुतः रूढित्व के अभिप्रायसे कुछ पञ्चजन नाम यहाँ विवक्षित हैं सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंके अभिप्रायसे नहीं । वे कितने हैं? इस प्रकारकी आकाँक्षा होनेपर उसके उत्तरमें यहाँ पुनः पञ्च शब्दका प्रयोग किया गया है । जैसे सप्तर्षि सात हैं, वैसे पञ्चजन नामवाले जो कोई हैं वे भी पाँच ही हैं, ऐसा अर्थ है ॥। ११ ॥ पुनः वे पञ्चजन नामके कौन हैं? वह कहते है-' यस्मिन्पञ्च ० ' ( जिसमें पाँच पञ्चजन हैं ) इससे अग्रिम मन्त्रनें ब्रह्मस्वरूपका निरूपण करनेके लिए ' प्राणस्य प्राणमुत O · ( जो उसे प्राणके प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र, अन्नके अन्न, तथा मनके मनको जानते हैं वे ब्रह्मज्ञ हैं ) इस प्रकार प्राणादि पाँच निर्दिष्ट हैं । संनिहित होने के कारण वाक्यशेषमें स्थित वे प्राण आदि ' यस्मिन् ' इस मन्त्रमें पञ्चजन शब्दसे विवक्षित हैं । पूर्वपक्षी -प्राणादिमें जन शब्दका प्रयोग कैसे है? सिद्धान्ती -- तत्त्वों में जनशब्दका प्रयोग कैसे है? प्रसिद्धि - रूढिका दोनों पक्षोंमें त्याग समान होनेपर भी वाक्यशेषके बलसे [ पञ्चजनशब्दसे ] प्राण आदि पाँच ही ग्रहण योग्य हैं और मनुष्यके साथ सम्बन्ध होनेसे भी प्राण आदि जनशब्दके भागी होते हैं । ' ते वा एते ० ' ( वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष हैं ) इसमें जनवाचक पुरुष शब्द प्राणोंमें प्रयुक्त है । और उसी प्रकार ' प्राणो ह पिता ० ' ( प्राण पिता है, प्राण माता है ) इत्यादि ब्राह्मण है । समासके बलसे समुदायको सत्यानन्दी - दीपिका इत्यादि वाक्यशेष के साथ विरोध होगा । अतः ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना: ' इस मन्त्रसे सांख्य सिद्ध पच्चीस तत्वोंकी सिद्धि नहीं हो सकती है । पूर्वपक्ष में ब्रह्ममें उद्धृत वाक्योंके समन्वयकी असिद्धि फल हैं, सिद्धान्त में ' प्राणस्य प्राणमुत ' इत्यादि वाक्योंके समन्वयकी सिद्धि फल है ॥११ ॥
* यहाँ पञ्चजनशब्दसे प्राण आदि पाँचका ग्रहण करना चाहिए सांख्याभिमत तत्वोंका नहीं, क्योंकि ' जायन्ते इति जनाः ' इस व्युत्पत्ति से कार्यमात्रका वाचक जन शब्द है अथवा मनुष्यों में मी जनशब्द प्रसिद्ध है । पूर्वपक्षी - ' जायन्ते इति जनाः ' ' जो उत्पन्न होते हैं वे जन हैं ' इस व्युत्पत्तिके अनुसार महत् आदि और उनके जनक होनेसे प्रधान भी जनशब्द वाच्य हो सकता है, इस प्रकार
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३०६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ प्राणो ह माता ' ( छा ० ७/१५/१ ) इत्यादि च ब्राह्मणम् । समासबलाच्च समुदायस्य रूढत्वम-विरुद्धम् । कथं पुनरसति प्रथमप्रयोगे रूढिः शक्याऽऽश्रयितुम्? शक्योद्भिदादिवदित्याह-प्रसिद्धार्थ संनिधाने ह्यप्रसिद्धार्थः शब्द प्रयुज्यमानः समभिव्याहारात्तद्विषयो नियम्यते यथा उद्भिदा यजेत ', ' यूपं छिनत्ति ', ' वेदिं करोति ' इति । तथाऽयमपि पञ्चजनशब्दः समासान्वाख्या-नादवगतसंज्ञाभावः संज्ञ्याकाङ्क्षी वाक्यशेष समभिव्याहृतेषु प्राणादिषु वर्तिष्यते । कैश्चित्तु देवाः पितरो गन्धर्वा असुरा रक्षांसि च पञ्च पञ्चजना व्याख्याताः । अन्यैश्च चत्वारो वर्णा निपादपञ्चमाः परिगृहीताः । कचिच्च ' यत्पाञ्चजन्यया विशा ' ( ऋ ० सं ० ८ ५३।७ ) इति प्रजापरः प्रयोगः पञ्चजन शब्दस्य दृश्यते । तत्परिग्रहेऽपीह न कश्चिद्विरोधः आचार्यस्तु न पञ्चविंशतेस्तत्त्वानामिह प्रतीतिरस्तीत्येवं परतया ' प्राणादयो वाक्यशेषात् ' इति जगाद ॥ १२ ॥
भवेयुस्तावत्प्राणादयः पञ्चजना माध्यंदिनानाम्, येऽन्नं प्राणादिष्वामनन्ति । काण्या-कथं प्राणादयः पञ्चजना भवेयुर्येऽन्नं प्राणादिषु नामनन्तीति? अत उत्तरं पठति-रूढ माननेमें कोई विरोध नहीं है । परन्तु पञ्चजनशब्द के प्रथम प्राणादिमें प्रयोगकी असिद्धि होनेसे रूढिका किस प्रकार आश्रय किया जा सकता है? ऐसा कहा है कि उद्भिद आदिके समान पञ्चजन शब्दकी भी रूढि हो सकती है । प्रसिद्धार्थक पदके सन्निधानमें प्रयुक्त हुए अप्रसिद्धार्थं वाचक शब्दका समभिव्याहार के बलसे तद्विषयक अर्थ होता है ऐसा नियम है । जैसे ' उद्भिदा यजेत ' ( पशुकामना वाला उद्भिद नामक याग करे ) ' यूपं छिनत्ति ' ( यूपका छेदनसे संस्कार करे ) और ' वेदिं करोति ' ( वेदिका संस्कार करे ) इत्यादिमें होता है, वैसे ही यह ' पञ्चजन ' शब्द भी समासके कथन से संज्ञा-भावको प्राप्त होकर संज्ञीकी आकांक्षा करता हुआ वाक्यशेष और समभिव्याहुत - सहोच्चरित प्राण आदिमें प्रवृत्त होगा । कई एक लोगोंने तो ऐसा व्याख्यान किया है कि देव, पितर, गन्धर्व, असुर और राक्षस ये पाँच पञ्चजन हैं । दूसरोंने चार वर्णं और पाँचवें निषाद् ( ब्राह्मणके द्वारा शूद्रासे उत्पन्न, सन्तान ) का ग्रहण किया है । और कहोंपर ' यत्पाञ्चजन्यया विंशा ' इस प्रकार पञ्चजन शब्दका प्रयोग प्रजाके लिए दिखाई देता है । उसका ग्रहण करनेपर भी कोई विरोध नहीं है । आचार्यने तो, पच्चीस तत्त्वोंकी यहाँ प्रतीति नहीं होती, इस अभिप्राय से ' प्राणादयो वाक्यशेषात् ' यह सूत्र कहा है ॥ १२ ॥
प्राण आदिमें अन्नका पाठ करनेवाले जो माध्यन्दिनं शाखावाले हैं उनके मतमें तो प्राणादि पञ्चजन मले हों, परन्तु काण्वशाखावाले जो प्राण आदिमें अन्नका पाठ नहीं करते, उनके मत्रमें तो प्राण आदि पञ्चजन किस प्रकार होंगे? इसके लिए उत्तर पढते ( कहते ) हैं— सत्यानन्दी - दीपिका यौगिक अर्थका सम्भव होनेपर रूढिका आश्रयकर लक्षणाका प्रयास क्यों किया जाय? सिद्धान्ती - यहाँ समास के बलसे प्राण आदि समुदायमें पश्चजन शब्द रूढ माननेमें भी कोई विरोध नहीं है, इसलिए यहाँ यौगिक अर्थका ग्रहण करना युक्त नहीं है । अब इसपर पूर्वपक्षी ' कथम् ' आदिसे आक्षेप करते हैं । * परन्तु पश्च जनशब्दकी प्राणादिमें पहले लौकिक प्रसिद्धि नहीं है, तो फिर पञ्च जनशब्द की प्राण आदिमें रूढि क्यों ग्रहण की जाती है? समाधान - यह नियम नहीं है, क्योंकि ' स्युः पुर्मासः पञ्चजनाः ' यह अमरकोश है और प्रसिद्ध अर्थ वाचक शब्दके समीपमें प्रयुज्यमान अप्रसिद्ध अर्थ वाचक शब्दका सहोच्चरित होनेसे वही अर्थ होता है जो प्रसिद्धार्थं वाचक शब्दका होता है । जैसे ' उद्भिदा यजेत ' यद्यपि उद्भिद शब्द वृक्षोंमें प्रसिद्ध है, तो मी यहाँ सन्निहित और सहोच्चरित ' यजेत ' पदके योग से यह ' उद्भिद् ' शब्द उद्भिद् नामके यागमें रूढ है । ' यूपं छिनत्ति ' यहाँ ' छिनत्ति ' पदके समभिव्याहारसे ' यूप ' शब्द दारू में रूढ है । ' वेदि करोति ' यहाँ ' करोति ' पदके योगसे ' वेदि ' शब्द संस्कार योग्य स्थण्डिल विशेष में रूढ है अर्थात् गाहपत्य और आहवनीयके मध्य में चार अंगुल पृथिवी -