श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 341–350
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 341–350
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अधि ० ४ सू ० १३-१४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३०७ ज्योतिषै के पामसत्यन्ने ॥ १३ ॥
पदच्छेद – ज्योतिषा -, एकेषाम्, असति, अन्ने । सूत्रार्थ -- ( एकेषाम् ) काण्वशाखावालोंके पाठमें पूर्वोक्त प्राणादिमें ( अन्ने असति ) अन्न के न होनेके कारण ( ज्योतिषा ) ' तद्देवा ' इस पूर्ववाक्यस्थ ज्योतिसे पञ्चसंख्या की पूर्ति करनी चाहिए । असत्यपि काण्वानामान्ने ज्योतिषा तेषां पञ्चसंख्या पूर्येत । तेऽपि हि ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः ' इत्यतः पूर्वस्मिन्मन्त्रे ब्रह्मस्वरूपनिरूपणायैव ज्योतिरधीयते - ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः ' इति । कथं पुनरुभयेषामपि तुल्यवदिदं ज्योतिः पट्यमानं समानमन्त्रगतया पञ्च-संख्यया केषांचिद्गृह्यते केषांचिन्नेति? अपेक्षाभेदादित्याह । माध्यंदिनानां हि समानमन्त्र-पठितप्राणादिपञ्चजनलाभान्नास्मिन्मन्त्रान्तर पठिते ज्योतिष्यपेक्षा भवति । तदलाभात्तु काण्वानां भवत्यपेक्षा । अपेक्षाभेदाच्च समानेऽपि मन्त्रे ज्योतिषो ग्रहणाग्रहणे । यथा समानेऽप्यतिरात्रे वचनभेदात्षोडशिनो ग्रहणाग्रहणे, तद्वत् । तदेवं न तावच्छ्रुतिप्रसिद्धिः
काचित्प्रधानविषयास्ति । स्मृतिन्यायप्रसिद्धी तु परिहरिष्येते ॥ १३ ॥
( ४ कारणत्वाधिकरणम् सू ० १४-१५ ) कारणत्वे न चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १४ ॥
पदच्छेद – कारणत्वे, न, च, आकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः । काण्वशाखावालोंके पाठमें ' प्राणस्त्र प्राणमुतं ' इस मन्त्रमें अन्नका ग्रहण न होनेसे भी ज्योतिसे उसकी पञ्च संख्या की पूर्ति हो जायगो, क्योंकि वे भी ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना: ' इस मन्त्रसे पूर्वमन्त्र में ब्रह्मस्वरूपका निरूपण करनेके लिए ही ' तद्देवा ज्योतिषां ० ' ( उस आदित्यादि ज्योतियों के ज्योतिःस्वरूप अमृतकी देवगण ' आयु ' इस प्रकार उपासना करते हैं ) इस प्रकार ज्योतिका अध्ययन करते हैं । परन्तु दोनों शाखावालोंके पाठमें समानरूपसे पढ़ी हुई इस ज्योतिका एक ही मन्त्रमें प्राप्त पाँच संख्यासे कुछ लोग - काण्वशाखावाले क्यों ग्रहण करते हैं और कुछ लोग - माध्यन्दिन शाखावाले क्यों ग्रहण नहीं करते? कारण कि अपेक्षा - आकाँक्षाका भेद है, ऐसा कहते हैं । [ प्राणस्य प्राणमुत ] इस एक ही मन्त्रमें अन्नका ग्रहण होनेसे प्राणादि पाँच जनका माध्यन्दिनोंको लाभ होने के कारण पूर्वमन्त्र में पठित ज्योतिकी अपेक्षा नहीं होती । अन्नका ग्रहण न होनेसे एक ही मन्त्रमें प्राणादि पञ्चजनका लाभ न होनेके कारण काण्वशाखावालोंको ज्योतिकी अपेक्षा होती है अर्थात् चार होनेपर भी पाँचवाँ कौन है? ऐसी अपेक्षा रहती है । जैसे एक ही अतिरात्रसत्र में वचनभेदसे कहीं षोडशी ( यज्ञपात्र ) का ग्रहण होता है और कहींपर ग्रहण नहीं होता, वैसे अपेक्षाके भेदसे एक ही मन्त्रमें पठित ज्योतिका ग्रहण और अग्रहण होता है । इस प्रकार प्रधान विषयक कोई भी श्रुतिप्रसिद्धि नहीं है, स्मृति और न्यायप्रसिद्धिका तो आगे परिहार करेंगे ॥ १३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका को खोदकर संस्कृत किया गया स्थान वेदि कहलाता है, वैसे ' पञ्चजन ' शब्द मी ' दिक्संख्ये संज्ञायाम् ' इस सूत्रद्वारा समस्तपद होनेसे किसीकी संज्ञामें रूढ ज्ञात होता है, संज्ञीको आकांक्षा होनेपर सन्निहित वाक्यशेष और समभिव्याहारके बलसे ' पञ्चजन ' शब्द प्राण आदिमें रूढ निश्चित होता है । किञ्च पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच भूत और अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पाँच क्लेश, इन पच्चीसका यहाँ ' पञ्च पञ्चजनाः ' शब्द से ग्रहण हो सकता है, और ' जायन्ते इति जना: ' इस योगवृत्तिका भी यहाँ सम्भव है, क्योंकि प्राण आदि उत्पत्तिवाले हैं । इस प्रकार सांख्या-भिमत पच्चीस तत्त्वोंसे भिन्न जिस अर्थ परक ' पञ्चजन ' शब्दकी व्याख्याकी जाय तो कोई विरोध नहीं है, इस आशय से आचार्यने ' प्राणादयो वाक्यशेषात् ' इस सूत्र की रचनाकी है ॥ १२ ॥
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३०८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ सूत्रार्थ - ( कारणत्वे ) ब्रह्मके जगत् कारण होने में तो ( न ) कोई विरोध नहीं है, क्योंकि ( आकाशादिषु ) सृज्यमान आकाशादि पदार्थोंके विषयमें ( यथाव्यपदिष्टोक्त: ) यादृश ईश्वर एक उप-निषद् में कारणरूप से व्यपदिष्ट है, ( च ) और तादृश ही अन्य उपनिषद् में भी कारणरूपसे कथित है । * प्रतिपादितं ब्रह्मणो लक्षणम्, प्रतिपादितं च ब्रह्मविषयं गतिसामान्यं वेदान्त-वाक्यानाम् । प्रतिपादितं च प्रधानस्याशब्दत्वम् । तत्रेदमपरमाशङ्कयते - न जन्मादिकारणत्वं ब्रह्मणो ब्रह्मविषयं वा गतिसामान्यं वेदान्तवाक्यानां प्रतिपादायितुं शक्यम् । कस्मात्? विगा-नदर्शनात् । प्रतिवेदान्तं ह्यन्यान्या सृष्टिरुपलभ्यते; क्रमादिवैचित्र्यात् । तथा हि - कचित् ' आत्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २1१ ) इत्याकाशादिका सृष्टिराम्नायते । क्वचित्तेजआदिका-‘ तत्तेजोऽसृजत ’ ( छा ० ६।२।३ ) इति । क्वचित्प्राणादिका - ' स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्वाम् ' ( प्र ०६।४ ) इति कचिदक्रमेणैव लोकानामुत्पत्तिराम्नायते - ' स इमाँलोकानसृजत । अभ्मो मरीचीर्मरमापः ' ( ऐ ० उ ० ०।१।२ ) इति । तथा क्वचिदसत्पूर्विका सृष्टिः पठ्यते - ' असद्वा इदमग्र आसीत्ततो वै सदजायत ' ( तै ० २।७ ) इति । ' असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभवत् ' ( छा ० ३ । १ ९ । १ ) इति च । क्वचिदसद्वादनिराकरणेन सत्पूर्विका प्रक्रिया प्रतिज्ञायते -'तर्द्धक आहुरसदेवेदमग्र आसीत ' इत्युप-क्रम्य ' कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छा ० [ ' जन्माद्यस्य यतः ' इत्यादि सूत्रोंसे जगद् जन्मादिकारणत्व ] ब्रह्मका लक्षण कहा जा चुका है, [ ' गतिसामान्यात् ' इत्यादि सूत्रोंसे ] सब वेदान्तवाक्य समानरूपसे ब्रह्म के ही कारणत्व बोधक हैं, यह भी कहा जा चुका है । एवं [ ‘ ईक्षतेर्नाशब्दम् इत्यादि सूत्रोंसे ' ] प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है, यह भी कहा गया । अब यहाँ दूसरी आशङ्का होती है— ब्रह्म जगत् के जन्मादिका कारण है, सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंकी ब्रह्मविषयक कारण गति - ज्ञान समान है, ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है । किससे? इससे कि विगान - विरोध देखा जाता है । प्रत्येक उपनिषद् में क्रमादिके वैचित्र्यसे भिन्न - भिन्न सृष्टि उपलब्ध होती है । जैसे कि कहीं पर ' आत्मन आकाशः ० ' ( आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इस प्रकार आकाशपूर्वक सृष्टि कही गई है । कहींपर ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इस प्रकार तेजपूर्वक सृष्टि, कहीं पर ' स प्राणमसृजत ० ' ( उसने प्राण उत्पन्न किया, प्राणसे श्रद्धा उत्पन्न की ) इस प्रकार प्राण पूर्वक सृष्टि कही गई है । कहींपर ' स इमाँल्लोकानसृजत ० ' ( उसने इन लोकोंकी सृष्टिकी - जलमय-शरीरवाला स्वर्गलोक, सूर्यकिरणसे व्याप्त अन्तरिक्षलोक, मनुष्यलोक और जलमय पाताल लोक ) इस प्रकार क्रमके विना ही लोकोंकी सृष्टि कही गई है । उसी प्रकार कहीं पर ' असद्वा ० ' ( पहले यह ( जगत् ) असत् ही था । उसीसे सत् - नामरूपात्मक व्यक्त उत्पन्न हुआ ) और ' असदेवेदमप्र ० ' ( पूर्व में यह असत् ही था, वह सत् हुआ, वह सम्यक् अभिव्यक्त हुआ अर्थात् अंकुरित हुआ ) इस प्रकार असत् पूर्वक सृष्टि कही गई है । कहींपर असद्वादका निराकरणकर ' तक आहुरसदे ० ' ( उस जगत्-कारणके विषय में किन्होंने ऐसा भी कहा है कि आरम्भमें यह असत् ही था ) इस प्रकार उपक्रमकर सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्व ग्रन्थके साथ इस अधिकरणको संगति कहनेके लिए ' प्रतिपादितम् ' इत्यादिसे वृत्तका अनुवाद करते हैं । पूर्वके तीन अधिकरणोद्वारा प्रधानको श्रुति अप्रतिपादित कहनेसे जगत्कारणत्व लक्षणसे ब्रह्म ही बुद्धिस्थ होता है, उसी बुद्धिस्थ निर्गुण ब्रह्म में वेदान्तवाक्योंका समन्वय है, इस प्रकार पूर्वग्रन्थसे सिद्ध किया गया है । उसमें लक्षण और समन्वय दोनों ही असिद्ध हैं, क्योंकि श्रुतियोंका परस्पर विरोध देखनेमें आता है । इस प्रकार पूर्वं ग्रन्थके साथ इस अधिकरणकी ' तत्र ' इत्यादिसे आक्षेप संगति कहते हैं । पूर्वपक्षी सृष्टि विषयक विरोध दिखलाकर अब ' तथा ' आदिके कारण विषयक विरोध भी दिखाते हैं ।
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अधि ० ४ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३० ९ ६।२।१,२ ) इति । क्वचित् स्वयंकर्तृकैव व्याक्रिया जगतो निगद्यते -'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नाम-रूपाभ्यामेव व्याक्रियते ’ ( बृ ० १।४।७ ) इति । एवमनेकधा विप्रतिपत्तेर्वस्तुनि च विकल्पस्यानुपप-तेर्नवेदान्तवाक्यानां जगत्कारणावधारणपरता न्याय्या । स्मृतिन्यायप्रसिद्धिभ्यां तु कार-णान्तरपरिग्रहो न्याय्य इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - सत्यपि प्रतिवेदान्तं सृज्यमानेष्वकाशादिषु क्रमादिद्वारके विगाने न स्रष्टरि किञ्चिद्विगानमस्ति । कुतः? यथाव्यपदिष्टोक्तः । यथाभूतो ह्येकस्मिन्वेदान्ते सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वात्मैकोऽद्वितीयः कारणत्वेन व्यपदिष्टस्तथाभूत एव वेदान्तान्तरेष्वपि व्यपदिश्यते । तद्यथा - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ०२ ।१ ) इति । अत्र तावज्ज्ञान-शब्देन परेण च तद्विषयेण कामयितृत्ववचनेन चेतनं ब्रह्म न्यरूपयत्, अपर प्रयोज्यत्वेनेश्वरं कारणमब्रवीत् । तद्विषयेणैव परेणात्मशब्देन शरीरादिकोशपरम्परया चान्तरनुप्रवेशनेन सर्वेषामन्तः प्रत्यगात्मानं निरधारयत् । ' बहु स्यां प्रजायेय ' ( तै ०२।६ ) इति चात्मविषयेण बहुभ-वनानुशंसनेन सृज्यमानानां विकाराणां स्रष्टुरभेदमभाषत । तथा ' इदं सर्वमसृजत । यदिदं किञ्च ' ( तै ०२।६ ) इति समस्तजगत्सृष्टिनिर्देशेन प्राक्सृष्टेर द्वितीयं स्रष्टारमाचष्टे । * तदत्र यल्लक्षणं ब्रह्म कारणत्वेन विज्ञातं, तल्लक्षणमेवान्यत्रापि विज्ञायते - ' सदेव सोन्येदमग्र आसीदेकमेवाद्विती-' कुतस्तु खलु ' ( किन्तु हे सोम्य! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत् से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है, अतः हे सोम्य! पूर्व में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था, ऐसा [ आरुणिने ] कहा ) इस प्रकार सत्पूर्वक सृष्टिकी प्रतिज्ञा की जाती है । कहीं पर ' तद्धेदे ० ' ( वह यह जगत् सृष्टिके पूर्व अव्याकृत था । वह नाम रूपसे ही व्याकृत - व्यक्त हुआ ) इस प्रकार जगत्की अभिव्यक्ति स्वयं कर्तृक- अपने आप ही कही जाती है! इस प्रकार अनेक रीतिसे सृष्टि आदि विषयक श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे और वस्तु विकल्पकी अनुपपत्ति होनेसे वेदान्तवाक्योंमें जगत् - कारणकी अवधारणपरता युक्त नहीं है, अतः स्मृति और न्याय प्रसिद्धिसे ब्रह्मसे भिन्न कारणका ग्रहण करना युक्त है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं — प्रत्येक उपनिषद् में सृज्यमान आकाश आदिमें क्रम आदि द्वारक विरोध होनेपर भी स्रष्टा विषयमें कुछ भी विरोध नहीं, किससे? इससे कि जैसा एकत्र स्रष्टाका व्यपदेश है वैसा अन्यत्र भी है । एक उपनिषद् में जैसा सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वात्मा, एक अद्वितीय ब्रह्म कारणरूपसे व्यप-दिष्ट है, वैसा ही अन्य उपनिषदोंमें भी व्यपदिष्ट है । जैसे ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' यहाँ ज्ञानशब्दसे उस ब्रह्मविषयक [ सोऽकामयत ] कामयितृत्व वचनसे चेतन ब्रह्मका निरूपण करती हुई श्रुति ईश्वर को स्वतन्त्र-रूपसे कारण कहती है । अनन्तरोक्त ब्रह्मविषयक आत्मशब्द से और शरीर आदि कोश परम्परा द्वारा सबके अन्तर अनुप्रवेश करनेसे सबके भीतर प्रत्यगात्माका निर्धारण किया है । ' बहु स्यां ० ' ( मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ) इस प्रकार आत्मविषयक अनेक स्वरूप होनेके कथनसे सृज्यमान विकारोंका स्रष्टासे अभेद कहा है । उसी प्रकार ' इदं सर्व ० ' ( उसने यह जो कुछ है इस सबकी रचनाकी ) इस प्रकार समस्त जगत् की सृष्टिके निर्देशसे सृष्टिके पूर्व केवल अद्वितीय स्रष्टाको श्रुति कहती है । जिस प्रकार यहाँ तैत्तिरीय उपनिषदमें जो सर्वज्ञत्व आदि लक्षणवाला ब्रह्म जगत् - कारण-रूपसे विज्ञात है उस प्रकारके लक्षणवाला ब्रह्म ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! पहले यह सारा प्रपञ्च एक-सत्यानन्दी - दीपिका 8 कार्यं विषयक विरोध होनेसे कारण विषयक विरोध नहीं हो सकता, अन्यथा अतिप्रसंग हो जायगा अर्थात् प्रतिदिन स्वप्न सृष्टियाँ नाना प्रकारकी होती हैं, इससे ' मैं वही हूँ ' इस प्रकार जिस द्वष्टाकी प्रत्यभिज्ञा होती है उसमें भी नानात्व प्रसक्त होगा । यह दोषं सर्वत्र लागू होनेसे केवल अनिष्ट ही होगा । सृष्टिमें विरोध मानकर स्रष्टामें अविरोध दिखलाया गया है । सृष्टि विषयक भी विरोध नहीं है, अब इसे ' समाधास्यति ' आदिसे कहते हैं ।
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३१० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ यम् ', ' तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति । तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६ | २ | १, ३ ) इति । तथा ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजै ' ( ऐ ० उ ० ४।१।१, २ ) इति च; एवंजायीय-कस्य कारणस्वरूपनिरूपण परस्य वाक्यजातस्य प्रतिवेदान्तमविगीतार्थत्वात् । कार्यविषयं तु विगानं दृश्यते कचिदाकाशादिका सृष्टिः क्वचित्तेजआदि केत्येवंजातीयकम् । नच कार्यवि पण विगानेन कारणमपि ब्रह्म सर्ववेदान्तेष्वविगीतमधिगम्यमानमविवक्षितं भवितुमर्ह तीति शक्यते वक्तुम्; अतिप्रसङ्गात् । * समाधास्यति चाचार्यः कार्यविषयमपि विगानं ' न वियदश्रुतेः ' ( ब्र ० सू ० २ ३ | १ ) इत्यारभ्य । भवेदपिकार्यस्य विगीतत्वमप्रतिपाद्यत्वात् । नायं सृष्ट्यादिप्रपञ्चः प्रतिपिपादयिषितः । नहि तत्प्रतिबद्धः कश्चित्पुरुषार्थो दृश्यते श्रूयते वा । न च कल्पयितुं शक्यते; उपक्रमोपसंहाराभ्यां तंत्र तत्र ब्रह्मविषयैर्वाक्यैः साकमेक-वाक्यताया गम्यमानत्वात् । दर्शयति च सृष्ट्यादिपञ्चस्य ब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थताम् — ' अन्नेन . सोम्य शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलकन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूल-मन्विच्छ ' ( छा ० ६।८।४ ) इति । मृदादिदृष्टान्तैश्च कार्यस्य कारणेनाभेदं वदितुं सृष्ट्यादि-↓ प्रपञ्चः श्राव्यत इति गम्यते । तथाच संप्रदायविदो वदन्ति - ' मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या मात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' तदैक्षत ० ' ( उस सत्ने ईक्षण किया मैं बहुत हो जाऊँ अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ । इस प्रकार ईक्षण कर उसने तेज उत्पन्न किया ) उसी प्रकार ' आत्मा वा ० ' ( सृष्टि के पूर्व यह सब जगत् केवल आत्मरूप ही था, दूसरा कोई सचेष्ट पदार्थ नहीं था, उसने ईक्षण किया कि मैं लोकोंकी सृष्टि करूँ ) इस प्रकार अन्यत्र - छान्दोग्यादि उपनिषदोंमें भी जाना जाता है । क्योंकि कारण-स्वरूप निरूपण परक इस प्रकारके वाक्य समुदायका प्रत्येक उपनिषद् में अर्थ विषयक अविरोध है । परन्तु कहीं आकाशकी प्रथम सृष्टि, कहीं तेजकी प्रथम सृष्टि इस प्रकारका कार्य विषयक विरोध तो देखा जाता हैं । कार्यं विषयक विरोध होनेसे भी सब वेदान्तोंमें अविरुद्धरूपसे प्रतीयमान कारण ब्रह्म भी अविवक्षित होना योग्य है ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेपर अतिप्रसङ्ग हो जायगा । ' न वियदश्रुते. ' इस सूत्र से आरम्भकर कार्य विषयक विरोधका भी आचार्यं समाधान करेंगे । वेदान्त प्रतिपाद्य न होनेके कारण कार्य विषयक विरोध भले ही हो, परन्तु यह सृष्टि आदि प्रपञ्च वेदान्त-वाक्योंसे प्रतिपादन करनेकी इच्छाका विषय ही नहीं है 1 । क्योंकि प्रपञ्चसे सम्बद्ध कोई भी पुरुषार्थ न देखा जाता है और न सुना जाता है और न उसकी कल्पना ही की जा सकती हैं । कारण कि उपक्रम और उपसंहारसे तत् तत् उपनिषदों में स्थित ब्रह्मविषयक वाक्योंके साथ सृष्टिवाक्योंकी एक वाक्यता अवगत होती है । ' अन्नेन सोम्य शुङ्गेन ० ( हे सोम्य! अन्नरूप कार्यंसे जलरूपमूलको खोज - प्राप्तकर, हे सोम्य! जलरूप कार्यं लिङ्गसे तेजरूप मूलको प्राप्तकर और हे सोम्य! तेजरूप कार्यसे सद्रूप मूलका निश्चयकर ) इसप्रकार श्रुति ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति के लिए सृष्टि आदि प्रपञ्च दिखलाती है । ऐसा ज्ञात होता है कि मृत्तिका आदि दृष्टान्तों द्वारा कार्यका कारणके साथ अभेद कहनेके लिए श्रुति सृष्टि आदि प्रपञ्च श्रवण करावी है । ' मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः ० ( [ उपनिषदोंमें ] मृत्तिका, लोहखण्ड और विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्तों सत्यानन्दी -दीपिका * ब्रह्म में ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ' इसका उपपादन करनेके लिए ही जगत् कारणत्वका अध्यारोप किया है । वेदोंमें सृष्टिका जो भिन्न - भिन्न वर्णन है वह स्वप्नसृष्टिके समान है अर्थात् जैसे स्वप्न सृष्टि में उत्पत्ति - क्रमका नियम नहीं है, वैसे जाग्रत् प्रपञ्चमें भी नहीं है । स्वप्न प्रपञ्चकी तरह यह सारा जाग्रत् प्रपञ्च भी भ्रममात्र है । इसलिए सृष्टि आदिके प्रतिपादनमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है, किन्तु
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अधि ० ४ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३११ चोदिताऽन्यथा । उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथंचन || ' ( माण्डू ० ३।१५ ) इति । ब्रह्मप्रति-पत्तिप्रतिबद्धं तु फलं श्रूयते - ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० २1१ ) ' तरति शोकमात्मवित् ' ( छा ० ७।१।३ ) ‘ तमेव त्रिदित्वाऽतिमृत्युमेति ( वे ० ३।८ ) इति । प्रत्यक्षावगमं चेदं फलम् । ' तत्त्वमसि ' इत्यसंसार्यात्मत्वप्रतिपत्तौ सत्यां संसार्यात्मत्वव्यावृत्तेः ॥ १४ ॥
यत्पुनः कारणविषयं विगानं दर्शितम् - ' असा इदमग्र आसीत् ' इत्यादि, तत्परिहर्त-व्यम् । अत्रोच्यते-समाकर्षात् ॥ १५ ॥
सूत्रार्थ - ' असदेवेदमग्र आसीत् ' इसप्रकार अनभिव्यक्त नाम रूप वाची असत् शब्दसे सत्का ही आकर्षण होता है, अतः असत् कारण विषयक आशङ्काका यहाँ अवकाश नहीं है । ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' ( तै ० २।७ ) इति नात्रासन्निरात्मकं कारणत्वेन श्राव्यते । यतः ' असन्नेव स भवति । असद्द्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद 1 सन्तमेनं ततो विदुः ' इत्यस-द्वादापवादेनास्तित्वलक्षणं ब्रह्मान्नमयादिकोशपरम्परया प्रत्यगात्मानं निर्धार्य ' सोऽकामयत ' इति तमेव प्रकृतं समाकृष्य सप्रपञ्चां सृष्टितस्माच्छ्रावयित्वा ' तत्सत्यमित्याचक्षते ' इति चोप-संहृत्य ‘ तदप्येष श्लोको भवति ' इति तस्मिन्नेव प्रकृतेऽर्थे श्लोकमिममुदाहरति- ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इति । यदि त्वसन्निरात्मकमस्मिञ्छ्लोकेऽभिप्रेयेत ततोऽन्यसमाकर्षणेऽन्यस्योदा-द्वारा भिन्न - भिन्न प्रकारसे सृष्टिका निरूपण किया है वह [ ब्रह्मात्मैक्यमें ] बुद्धि प्रवेश करनेका उपाय-मात्र है, वस्तुतः उनमें कुछ भी भेद नहीं है ) इसप्रकार संप्रदायविद् आचार्य गौड़पाद कहते हैं । ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ० ( ब्रह्मवित् परब्रह्मको प्राप्त होता है ) ' तरति ० ' ( आत्मवित् शोकमय संसारसे मुक्त हो जाता है ' तमेव ० ' ( उसे ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है ) इसप्रकार ब्रह्मज्ञानसे सम्बद्ध फलकी श्रुति है ) ब्रह्मज्ञानसे विद्वानुको परमानन्दकी प्राप्ति, शोककी निवृत्ति और मृत्युका अतिक्रमणरूप फल प्रत्यक्ष अनुभव में आनेवाला है, क्योंकि जब ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार असंसारी आत्मत्वका अपरोक्ष अनुभव होता है तब संसारी आत्मत्त्रकी निवृत्ति हो जाती है || १४ || परन्तु ' असद्वा ० ( सृष्टिके पहले यह असत् ही था ) इत्यादि जो कारण विषयक विरोध दिखलाया गया है, उसका परिहार करना चाहिए । इसपर सूत्रकार कहते हैं— ' असद्वा ० ( सृष्टिके पहले यह असत् ही था ) इस तैत्तिरीय श्रुति में स्वरूप रहित असत्का कारणरूपसे श्रवण नहीं कराया जाता है, क्योंकि ' असन्नेव स भवति ० ' ( यदि पुरुष ब्रह्म असत् है, ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत् हो जाता है, यदि ऐसा जानता है कि ब्रह्म ' सत् ' है तो ब्रह्मवेत्ता उसे सत् समझते हैं ) इसप्रकार असद्वादके अपवाद से सत्स्वरूप ब्रह्मको अन्नमय आदि कोशपरम्परासे • प्रत्यगात्मरूपसे निर्धारणकर ' सोऽकामयत ' ( उस परमात्माने कामना की ) इस प्रकार उसी प्रकृत ब्रह्मका समाकर्षणकर उसीसे विस्तृत सृष्टिका श्रवण कराकर ' तत्सत्यमि ० ' ( वह सत्य है ऐसा लोग कहते हैं ) इसप्रकार उपसंहारकर ' तदप्येष ० ' ( उसके विषय में ही श्लोक है ) इसप्रकार उसी प्रकृत ब्रह्मरूप अर्थ में ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इस मन्त्रको उदाहरणरूपसे कहते हैं । यदि इस श्लोक में स्वरूपरहित असत् अभिप्रेत हो तो अन्यका समाकर्षण होनेपर अन्यका उदाहरण देनेसे वाक्य सत्यानन्दी - दीपिका ' अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चः प्रपञ्च्यते ' ( अध्यारोप और अपवाद द्वारा निष्प्रपञ्च ब्रह्मका प्रपञ्च-रूपसे वर्णन किया गया है ) इस प्रकार अध्यारोप और अपवादरूपसे अद्वितीय ब्रह्म के प्रतिपादन में ही तात्पर्य है ॥ १४ ॥
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३१२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य. [ अ ० १ पा ० ४ हरणादसंबद्धं वाक्यमापद्येत । तस्मान्नामरूपव्याकृतवस्तुविषयः प्रायेण सच्छन्दः प्रसिद्ध इति तद्वाकारणाभावापेक्षया प्रागुत्पत्तेः सदेव ब्रह्मासदिवासीदित्युपचर्यते । एषैव ' असदे-वेदमग्र आसीत् ( छा ० ३ | १ ९ | १ ) इत्यत्रापि योजना; ' तत्सदासीत् ' इति समाकर्षणात् । अत्यन्ता-भावाभ्युपगमे हि ' तत्सदासीत् ' इति किं समाकृष्येत? ' तक आहुरसदेवेदमग्र आसीत् ' ( छा ० ६।२।१ ) इत्यत्रापि न श्रुत्यन्तराभिप्रायेणायमेकीय मतोपन्यासःः क्रियायामिव वस्तुनि विकल्प-स्यासंभवात् । तस्माच्छ्रतिपरिगृहीतसत्पक्षदाययैवायं मन्दमतिपरिकल्पितस्यासत्पक्षस्यो-पन्यस्य निरास इति द्रष्टव्यम् । ' तद्वेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् ' ( बृ ० १।४।७ ) इत्यत्रापि न निरध्यक्षस्य जगतो व्याकरणं कथ्यते, ' स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यः ' इत्यध्यक्षस्य व्याकृतकार्यानुप्रवे-शित्वेन समाकर्षात् । निरध्यक्षे व्याकरणाभ्युपगमे ह्यनन्तरेण प्रकृतावलम्बिना सइत्यनेन सर्वनाम्ना कः कार्यानुप्रवेशित्वेन समाकृष्येत? चेतनस्य चायमात्मनः शरीरेऽनुप्रवेशः श्रूयते । अनुप्रविष्ठस्य चेतनत्वश्रवणात्- ' पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्श्रोत्रं मन्वानो मनः ' इति । * अपि च यादृशमिदमद्यत्वे नामरूपाभ्यां व्याक्रियमाणं जगत्साध्यक्षं व्याक्रियत एवमादिसर्गेऽपीति असम्बद्ध हो जायगा अर्थात् जिस सत् प्रकृतका यहाँ समाकर्षण किया गया है उससे भिन्न असत्का उदाहरण होनेसे यह वाक्य असम्बद्ध हो जायगा । इसलिए नाम रूपसे अभिव्यक्त वस्तुमें प्रायः सत् शब्द प्रसिद्ध है, अतः सृष्टिसे पहले नाम - रूपके व्याकृताभावकी अपेक्षासे सत् ही ब्रह्म असत् - सा था ऐसा उपचार किया जाता है अर्थात् गौणवृत्तिसे असत् शब्दसे उपचार किया जाता है । ' असदेवेदमग्र आसीत् ' इस मन्त्रमें भी यहां योजना है, क्योंकि ' तत्सदासीत् ' ( वह सत् था ) इस वाक्य घटक ' तत् ' पदसे पूर्ववाक्य गत ' सत् ' का समाकर्षण ग्रहण है । यदि अत्यन्ताभावरूप असत् को स्वीकार करें तो ' तत्सदासीत् ' इसमें किसका समाकर्षण करेंगे अर्थात् स्वरूप शून्य असत्का समाकर्षण असंभव है और असत्का सद्रूपसे ग्रहण करना भी असंगत है । ' तर्द्धक ० ' ( उसीके विषयमें किन्होंने ऐसा भी कहा है कि सृष्टिके पहले यह असत् ही था ) इसमें भी अन्य श्रुतिके अभिप्राय से यह किसी एकीय मतका उपन्यास नहीं है अर्थात् इस मन्त्रका ' किसी शाखावाले कारणको असत् कहते हैं ' यह अर्थ नहीं है, क्योंकि क्रियाके समान वस्तुमें विकल्पका संभव नहीं है, इसलिए यहाँ यह समझना चाहिए कि श्रुति परिगृहीत सत् पक्षको दृढ़ करने के लिए मन्दमति पुरुषोंसे परिकल्पितं असत् पक्षका उपन्यासकर यह परिहार है । ' तद्धेदं ० ' ( उत्पत्ति से पूर्वं यह जगत् अव्याकृत था ) इसमें भी अध्यक्ष रहित जगत्का व्याकरण नहीं कहा जाता । ' स एष ० ' ( वह यह व्याकर्ता इस शरीर में नखाग्र-पर्यन्त प्रवेश किए हुए हैं ) इसप्रकार अध्यक्षका व्याकृत वस्तुओंमें प्रवेश कर्तृत्वरूपसे समाकर्षण है । अध्यक्ष विना ही व्याकरण - नामरूपसे जगत्की अभिव्यक्ति स्वीकार करें तो [ स एष इह प्रविष्ठः ] इस अनन्तर ग्रन्थवर्ती प्रकृत अर्थका अवलम्बन करने वाले ' स ' इस सर्वनामसे कार्यमें अनुप्रवेशित्व से किसका समाकर्षण होगा? और चेतन आत्माका शरीरमें यह अनुप्रवेश सुना जाता है, क्योंकि ' पश्यंश्चक्षु ० ' ( देखनेके कारण वह चक्षु द्रष्टा है, सुननेके कारण श्रोत्र श्रोता है, मनन करनेके कारण मन - मता है ) इसप्रकार अनुप्रवेश करनेवालेमें चेतनत्वका श्रवण है । और वर्तमान समय में नाम-रूपसे व्याकृत हुआ यह जगत् जैसा सकर्तृक व्याकृत होता है, वैसा ही आदि सृष्टि में था, ऐसा ज्ञात सत्यानन्दी - दीपिका ‘ व्याक्रियते ' यह लकार कर्म में प्रयुक्त है, यह लोक प्रसिद्ध है कि कर्ताके विना कर्मकी सिद्धि नहीं होती, लकार कर्म में प्रयुक्त होनेसे कर्ता अर्थतः सिद्ध हो जाता है । इस विषयमें ' गम्यते ग्रामः ' यह लौकिक उदाहरण भी है । इससे यह सिद्ध हुआ कि श्रुतियोंका कारणके विषयमें अविरोध होनेसे उनका ब्रह्ममें समन्वय है ॥ १५ ॥
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अधि ० १ सू ० १६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३१३ गम्यते दृष्टविपरीतकल्पनानुपपत्तेः । श्रुत्यन्तरमपि ' अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरणवाणि ' ( छा ० ६ | ३ | २ ) इति साध्यक्षामेव जगतो व्याक्रियां दर्शयति । व्याक्रियत इत्यपि कर्मकर्तरि लकारः सत्येव परमेश्वरे व्याकर्तरि सौकर्यमपेक्ष्य द्रष्टव्यः । यथा लूयते केदारः स्वयमेवेति सत्येव पूर्णके लवितरि । यद्वा - कर्मण्येवैष लकारोऽर्थाक्षिप्तं कर्तारम
पेक्ष्य द्रष्टव्यः । यथा गम्यते ग्राम इति ॥१५ ॥
( ५ बालाक्यधिकरणम् सू ० १६-१८ ) जगद्वाचित्वात् ॥१६ ॥
सूत्रार्थ - ' यो ह वै बालाके ' इस श्रुतिमें कर्मशब्द सम्पूर्ण प्रपञ्चका वाचक होनेके कारण इसका कर्ता परमात्मा ही हैं । * कौषीतकि ब्राह्मणे बालाक्यजातशत्रुसंवादे श्रूयते - ' यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः ' ( कौ ० ब्रा ० ४। १ ९ ) इति । तत्र किं जीवो वेदितव्यत्वेनो-पदिश्यते उत मुख्यः प्राणः, उत परमात्मेति विशयः । किं तावत्प्राप्तम्? प्राण इति । कुतः? ' यस्य चैतत्कर्म ' इति श्रवणात्, परिस्पन्दलक्षणस्य च कर्मणः प्राणाश्रयत्वात्, वाक्यशेषे च ' अथा-स्मिन्प्राण एवैकधा भवति ' इति प्राणशब्ददर्शनात् । प्राणशब्दस्य च मुख्ये प्राणे प्रसिद्धत्वात् । ये चैते पुरस्ताद्वालाकिना ' आदित्ये पुरुषश्चन्द्रमसि पुरुषः ' इत्येवमादायः पुरुषा निर्दिष्टास्तेषामपि भवति प्राणः कर्ता, प्राणावस्थाविशेषत्वादादित्यादिदेवतात्मनाम्- ' कतम एको देव इति प्राण होता है । क्योंकि दृष्ट - प्रत्यक्ष सिद्धसे विपरीत कल्पना नहीं की जा सकती है ' अनेन जीवेनात्मना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों ( तेज, जल और अन्न ) देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) इसप्रकार दूसरी श्रुति भी जगत्की अभिव्यक्ति सकर्तृक ही दिखलाती है । ' व्याक्रियते ' यह कर्मकर्तामें लकार अभिव्यक्तिकर्ता परमेश्वरके होनेपर भी सौकर्यकी अपेक्षासे समझना चाहिए | जैसे केदार काटनेवाले किसी पूर्णक नामक व्यक्ति के रहनेपर मी ' लूयते केदार: ' ( क्यारी स्वयं ही कट रही है ) यह प्रयोग होता है, अथवा जैसे ' गम्यते ग्रामः ' ( ग्राम प्राप्त किया जाता है ) इसमें कर्ताका. आक्षेप किया जाता है, वैसे ही अर्थसे आक्षिप्त कर्ताकी अपेक्षासे कर्मके अर्थ में ही यह लकार समझना चाहिए ॥१५ ॥
कौषीतकिब्राह्मणमें बालाकि और अजातशत्रुके संवादमें ' यो वै बालाक ० ' ( हे बालाकि! जो इन पुरुषोंका कर्ता है अथवा यह सम्पूर्ण प्रपञ्च जिसका कर्म है वही जानने योग्य है ) ऐसी श्रुति । इसमें वेदितव्यरूपसे क्या जीव उपदिष्ट है अथवा मुख्य प्राण वा परमात्मा? ऐसा संशय होता है । तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - प्राण उपदिष्ट है, क्यों? क्योंकि ' यस्य वैतत्कर्म ' ऐसी श्रुति है । चलनात्मक कर्म प्राणके आश्रित है । और ' अथास्मिन्प्राण ० ' ( जाग्रत् और स्वप्न जनक कर्मकी उपरति अनन्तर सुषुप्ति में इस प्राणमें ही सब एक होता है ) इस तरह वाक्यशेषमें प्राणशब्दका श्रवण है और प्राणशब्द मुख्यप्राण में प्रसिद्ध है । ' आदित्ये पुरुष: ० ' ( आदित्य में पुरुष है, चन्द्रमा में पुरुष है ) इस प्रकार बालाकिने पहले इन जिन आदित्यादि पुरुषोंका निर्देश किया है उनका भी कर्ता प्राण है, क्योंकि आदित्य आदि देवता प्राणकी भिन्न - भिन्न अवस्थाएं हैं, ' कतम एको देव ० ' ( शाकल्य – एक सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्व अधिकरणमें एक वाक्यस्थ सत् आदि शब्दोंके बलसे असत् शब्दका अर्थं किया गया है | यहाँ तो ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इसप्रकार बालाकि वाक्यस्थ ब्रह्मशब्दसे प्राणशब्द ब्रह्मपरक नहीं माना जा सकता, क्योंकि यहाँ वाक्यभेद है, इसप्रकार प्रत्युदाहरणसंगतिसे ' किं तावत् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष
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३१४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ' ( वृ ० ३ / ९ / ९ ) इति श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । जीवो वाऽयमिह वेदित-व्यतयोपदिश्यते । तस्यापि धर्माधर्मलक्षणं कर्म शक्यते श्रावयितुम् - ' यस्य वैतत्कर्म ' इति । सोऽपि भोक्तृत्वाद्भोगोपकरणभूतानामेतेषां पुरुषाणां कर्तोपपद्यते । वाक्यशेषेच जीव-लिङ्गमवगम्यते । यत्कारणं वेदितव्यतयोपन्यस्तस्य पुरुषाणां कर्तुर्वेदनायोपेतं बालाकिं प्रति बुबोधयिषुरजातशत्रुः सुतं पुरुषमामन्त्रयामन्त्रणशब्दाश्रवणात्प्राणादीनामभोक्तृत्वं प्रतियो य यष्टिघातोत्थानात्प्राणादिव्यतिरिक्तं जीवं भोक्तारं प्रतिबोधयति । तथा परस्तादपि जीव-लिङ्गमवगम्यते — ' तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भु-ङ्क्ते एवमेवैत आत्मान एतमात्मानं सुञ्जन्ति ' ( कौ ० ब्रा ० ४।२० ) इति । प्राणभृत्त्वाच्च जीवस्योपपन्नं प्राणशब्दत्वम् । तस्माज्जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर इह ग्रहणीयो न परमेश्वरः; तल्लिङ्गानवगमा-दिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - परमेश्वर एवायमेतेषां पुरुषाणां कर्ता स्यात् । कस्मात्? उपक्रम-सामर्थ्यात् । इह हि बालाकिरजातशत्रुणा सह ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इति संवदितुमुपचक्रमे । स देव कौन है? याज्ञवल्क्य - प्राण, वह ब्रह्म है, उसीको त्यत् ( परोक्ष ) ऐसा कहते हैं ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें प्रसिद्ध है । अथवा यहाँ वेदितव्यरूपसे यह जीव उपदिष्ट है । उसका भी धर्माधर्मरूप कर्म ' यस्य वैतत्कर्म ' इसप्रकार सुनाया जा सकता है । वह भी मोक्ता होने से भोग के साधनभूत इन पुरुषोंका अदृष्टद्वारा कर्ता हो सकता है । और वाक्यशेषमें भी जीवका लिङ्ग अवगत होता है, क्योंकि वेदितव्यरूपसे उपन्यस्त जो पुरुषोंका कर्ता है उसका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए प्राप्त बालाकिको बोध करानेके अभिलाशी अजातशत्रुने सुप्त पुरुषको पुकारा उस आमन्त्रण शब्दको न सुननेके कारण प्राणादि अभोक्ता हैं ऐसा बोध कराकर पुनः लाठीके प्रहारसे उस सुप्तपुरुषके जागनेसे यह समझाया कि प्राण आदि से भिन्न जीव भोक्ता है । तथा अग्रिम वाक्यमें भी ' तद्यथा ० ' ( जैसे स्वामी अपने सेवक आदि द्वारा उपहृत वस्तुका उपभोग करता है और वे सेवक आदि उस स्वामीसे आजीविका पाते हैं, वैसे यह प्रज्ञात्मा इन आत्माओं द्वारा उपभोग करता है और ये आत्माएँ - देवता या इन्द्रियादि उस प्रज्ञात्मा के आश्रित भोग प्राप्त करती हैं ) इसप्रकार जीवलिङ्ग अवगत होता है । प्राणधारी होनेसे भी जीव में प्राणशब्द युक्त है । इसलिए जीव और मुख्यप्राणमें से एकका यहाँ ग्रहण करना चाहिए, परमेश्वरका नहीं, क्योंकि उसका लिङ्ग ज्ञात नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह परमेश्वर ही इन पुरुषोंका कर्ता हो, किससे? इससे कि उपक्रमकी ऐसी सामर्थ्य है । यहाँ बालाकिने अजात-शत्रुके साथ ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इसप्रकार बातचीत आरम्भकी और आदित्य आदिमें रहनेवाले अमुख्य-सत्यानन्दी - दीपिका करते हैं | ‘ यो वै बालाके ० ' इत्यादि वाक्य समुदाय इस अधिकरणका विषय वाक्य है । किसी समय एक गर्ग गोत्रीय विद्याभारसे गर्वित बालाकि ब्राह्मणने काशीराज अजातशत्रुके पास आकर कहा-' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' ( मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश देता हूँ ) अनन्तर उसने राजाको आदित्य, चन्द्रमा, विद्युत्, आकाश, वायु, अग्नि और जल आदिके अभिमानी अनेक देवताओं का उपदेश किया । परन्तु राजा इन सबको जानता था, राजाने कहा - हे ब्रह्मन्! यदि इससे अधिक जानते हो तो कहो! बालाकि को चुप देखकर राजाने उसे परमात्माको समझानेके लिए उपदेश किया है । पूर्वपक्षीने राजाके इस वचनको प्राणविषयक मानकर पूर्वपक्ष किया है । अब ' जीवो वा ' आदिसे जीवके विषयमें पूर्वपक्ष करते हैं । * ' एतत्कर्म ' इस नपुंसक एकवचन ' एतत् ' शब्द से ' पुरुषा: ' इस पुल्लिंग और बहुवचनका परामर्श नहीं हो सकता । ' पुरुषा: ' इसप्रकार पुरुषोंमें बहुवचन और पुल्लिंग है जब कि ' एतत्कर्म ' यहाँ एक वचन और नपुंसक लिङ्ग है, इससे ' यस्य वैतत्कर्म ' इस वाक्य में पुरुषोंका परामर्श नहीं हो
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अधि ० ५ सू ० १६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३१५ च कतिचिदादित्याद्यधिकरणान्पुरुषान मुख्य ब्रह्मदृष्टिभाज उक्त्वा तूष्णीं बभूव | तमजातशत्रुः ' मृषा वै खलु मा संवदिष्ठा ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इत्यमुख्यब्रह्मवादितयाऽपोद्य तत्कर्तारमन्यं वेदितव्य-तयोपचिक्षेप | यदि सोऽप्यमुख्यब्रह्मदृष्टिभाक् स्यात्, उपक्रमो बाध्येत । तस्मात्परमेश्वर एवायं भवितुमर्हति । कर्तृत्वं चैतेषां पुरुषाणां न परमेश्वरादन्यस्य स्वातन्त्र्येणावकल्पते । ‘ यस्य वैतत्क्रम ' इत्यपि नायं परिस्पन्दलक्षणस्य धर्माधर्मलक्षणस्य वा कर्मणो निर्देशः; तयोर-न्यतरस्याप्यप्रकृतत्वात्, असंशब्दितत्वाच्च । नापि पुरुषाणामयं निर्देश:; एतेषां पुरुषाणां कर्तेत्येव तेषां निर्दिष्टत्वात्, लिङ्गवचनविगानाच्च; नापि पुरुषविषयस्य करोत्यर्थस्य क्रिया-फलस्य वाऽयं निर्देश; कर्तृशब्देनैव तयोरुपात्तत्वात् । पारिशेष्यात्प्रत्यक्ष संनिहितं जगत् सर्वनाम्नैतच्छब्देन निर्दिश्यते । क्रियत इति च तदेव जगत्कर्म । ननु जगदप्यप्रकृतमसं-शब्दितं च । सत्यमेतत् । तथाप्यसति विशेषोपादाने साधारणेनार्थेन संनिधानेन संनिहित-वस्तुमात्रस्यायं निर्देश इति गम्यते, न विशिष्टस्य कस्यचित् । विशेषसंनिधानाभावात् । पूर्वत्र च जगदेकदेशभूतानां पुरुषाणां विशेषोपादानादविशेषितं जगदेवेहोपादीयत इति गम्यते । एतदुक्तं भवति य एतेषां पुरुषाणां जगदेकदेशभूतानां कर्ता, किमनेन विशेषेण, ब्रह्मदृष्टि भागी कुछ पुरुषोंको कहकर वह चुप हो गया । ' मृषा वै खलु ० ' ( तुमने मुझसे यह मिथ्या कहा कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करता हूँ ) इसप्रकार अजातशत्रुने बालाकिका अमुख्यब्रह्मवादि-रूपसे निषेधकर उनके कर्ता अन्यको वेदितव्यरूपसे आक्षेप किया । यदि वह वेदितव्य भी अमुख्य ब्रह्म ( ब्रह्मसे भिन्न ) दृष्टिका भागी हो तो उपक्रम बाधित होगा । इसलिए यह परमेश्वर ही होना चाहिए । परमेश्वरसे अन्य इन पुरुषों का स्वतन्त्ररूपसे कर्ता नहीं हो सकता । किञ्च यस्य वैतत्कर्भ ' यह निर्देश भो चलनात्मक अथवा धर्माधर्मात्मक कर्मके विषय में नहीं है, क्योंकि इन दोनों में से कोई भी प्रकृत नहीं है और श्रुति प्रतिपादित नहीं हैं । पुरुषोंके लिए भी यह निर्देश नहीं है, क्योंकि इन पुरुषोंका कर्ता, इस प्रकार उनका निर्देश हो गया है । एवं लिङ्ग और वचनका भेद है अर्थात् ' यस्य वैतत्कर्म ' यहाँ एकवचन और नपुंसक लिङ्ग हैं और पुरुषोत्पादन अथवा उसका फल पुरुष जन्मका भी यह निर्देश नहीं है, क्योंकि कर्तृशब्द से ही दोनोंका ग्रहण किया गया है । परिशेषसे प्रत्यक्ष संनिहित जगत्का सर्वनाम ' एतत् ' शब्दसे निर्देश किया जाता है, जो किया जाय वह कर्म है, इस व्युत्पत्तिसे वह जगत् ही कर्म है । परन्तु जगत् भी अप्रकृत और श्रुति अप्रतिपादित है । यह सत्य है, तो मी ऐसा ज्ञात होता है कि विशेष वस्तुका ग्रहण न होनेसे साधारण अर्थके साथ संनिधान से संनिहित वस्तुमात्रका यह निर्देश है किसी विशिष्ट वस्तुका नहीं, क्यों के विशेष संनिधान नहीं है । पूर्ववाक्य में जगत् के एक देशभूत पुरुषोंका विशेषरूपसे ग्रहण करनेसे यह ज्ञात होता है कि अविशेषित ( सामान्य ) जगत्का ही यहाँ ग्रहण है । तात्पर्य यह है— जगत् के एक देशभूत इन पुरुषोंका जो कर्ता है । इस विशेष कथनका क्या प्रयोजन है? जिसका तो सामान्यरूपसे सारा जगत् ही कर्म है । [ यस्य वा एतत् सत्यानन्दी - दीपिका सकता । पुरुषोत्पादक कर्ता व्यापार ' करोति ' का अर्थ उत्पादन और उत्पादनका फल पुरुष जन्म इन दोनोंका ही कर्तृशब्दसे ग्रहण हो चुका है, अतः उनका पृथक् निर्देश नहीं किया गया है । क्रिया और फलके बिना कर्तृत्व अनुपपन्न है, इसलिए कर्तृशब्दसे दोनोंका ग्रहण होता है । परिशेषसे यहाँ संनिहित जगत् ही कर्मशब्द ग्राह्य है और उसका कर्ता परमेश्वर ही है । * ब्राह्मणपरिव्राजकन्याय -- ' ब्राह्मणा भोजयितव्याः परिव्राजकाश्च ' ( ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और परिव्राजकोंको भी ) इस वाक्यमें जैसे ब्राह्मणशब्द परिव्राजकसे मित्र ब्राह्मणका वाचक है, वैसे ही ' एतत्कर्म ' यह कर्म शब्द भी पुरुषोंसे भिन्न समस्त जगत्का वाचक है । यद्यपि
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३१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ यस्य कृत्स्नमेव जगदविशेषितं कर्मेति । वाशब्द एकदेशावच्छिन्न कर्तृत्वव्यावृत्त्यर्थः । ये बालाकिना ब्रह्मत्वाभिमताः पुरुषाः कीर्तितास्तेषामब्रह्मत्वख्यापनाय विशेषोपादानम् एवं
ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन सामान्यविशेषाभ्यां जगतः कर्ता वेदितव्यतयोपदिश्यते ।
परमेश्वरश्च सर्वजगतः कर्ता सर्ववेदान्तेष्ववधारितः ॥१६ ॥
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद्वयाख्यातम् ॥ १७ ॥
पदच्छेद - जीवमुख्यप्राणलिङ्गात्, न, इति चेत्, तत्, व्याख्यातम् । सूत्रार्थ - ( जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् ) पूर्ववाक्यमें जीव और मुख्यप्राणके लिङ्ग होनेसे ( न ) यह श्रुति ब्रह्मपरक नहीं है, ( इति चेत् ) ऐसा यदि कहो तो ( व्याख्यातम् ) प्रदर्दनाधिकरणमें उसका व्याख्यान हो गया है । * अथ यदुक्तम् - वाक्यशेषगताज्जीवलिङ्गान्मुख्यप्राणलिङ्गाच्च तयोरेवान्यतरस्येह ग्रहणं न्याय्यं न परमेश्वरस्येति, तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते - परिहृतं चैतत् ' नोपासात्रैविध्या-दाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | ३१ ) इत्यत्र । त्रिविधं ह्यत्रोपासनमेवं सति प्रसज्ज्येत-जीवोपासनं मुख्यप्राणोपासनं ब्रह्मोपासनं चेति । न चैतन्न्याय्यम् । उपक्रमोपसंहाराभ्यां हि ब्रह्मविषयत्वमस्य वाक्य स्यावगम्यते । तत्रोपक्रमस्य तावद्ब्रह्मविषयत्वं दर्शितम् । उपसं-हारस्यपि निरतिशयफलश्रवणाद्ब्रह्मविषयत्वं दृश्यते - ' सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां च भूतानां कर्म ] श्रुतिस्थ ' वा ' शब्द एक देशके कर्तृत्वकी व्यावृत्तिके लिए है । बालाकि द्वारा ब्रह्मरूपसे अभि-मत जो पुरुष कहे गये हैं वे अब्रह्म हैं ऐसा कहनेके लिए विशेषका ग्रहण है । इस प्रकार ब्राह्मण-परिव्राजक न्यायसे सामान्य और विशेषसे जगत्का कर्ता वेदितव्यरूपसे उपदिष्ट है । सभी वेदान्तोंमें यह निर्णय है कि परमेश्वर ही समस्त जगत्का कर्ता है ॥ १६ ॥
जो यह कहा गया है कि वाक्यशेषगत भोक्तृत्व जीव लिङ्गसे और स्पन्दनरूप मुख्यप्राण लिङ्ग यहाँ जीव और प्राणमें से किसी एकका ग्रहण करना युक्त है परमेश्वरका नहीं, उसका परिहार करना चाहिए, इसपर कहते हैं - ' नोपासा त्रैविध्यादा ० ' इस सूत्रमें उसका परिहार किया गया है, क्योंकि ऐसा होनेपर यहाँ जीवोपासना, मुख्यप्राणोपासना और ब्रह्मोपासना इस प्रकार तीन उपासनाएँ प्रसक्त होंगी, परन्तु युक्त नहीं है, कारण कि उपक्रम और उपसंहारसे [ यो वै बालाके ] यह वाक्य ब्रह्म विषयक अवगत होता है । ( उन दोनों में उपक्रम ब्रह्म विषयक दिखलाया गया है । ' और ' सर्वान्पाप्मनो ० ' ( जो उसे इस प्रकार जानता है वह सब पापोंका नाशकर सब भूतों में श्रेष्ठत्व, सत्यानन्दी - दीपिका कर्मशब्द परिस्पन्दन तथा धर्माधर्ममें रूठ है और रूढि योगसे बलवती होती है, तो मी प्रकरणमें वह अपेक्षित नहीं है, क्योंकि ' क्रियते इति कर्म ' इस योगसे उन दोनोंका भी ग्रहण हो सकता है । जहाँ योगसे रूढ्यर्थका संग्रह नहीं होता वहाँ रूढिका पृथक् ग्रहण किया जाता है । अथवा ब्राह्मण कहने पर स्वतः परिव्राजकका ग्रहण होनेपर भी विशेष बोधके लिए जैसे परिव्राजकका पृथक् ग्रहण है, वैसे ही कर्मशब्दसे आदित्य आदि पुरुषोंका ग्रहण होनेपर उनमें अब्रह्मत्व बोध कराने के लिए देवता निरूपित कर्तृत्वका श्रुतिमें पृथक् ग्रहण किया गया है । अतः सब वेदान्तोंमें परमेश्वर ही इस सम्पूर्ण प्रपञ्चका कर्ता और वेदितव्यरूप से प्रतिपादित है । पूर्वपक्ष में यह वाक्य प्राणोपासना परक है, अतः वह ब्रह्म में समन्वित नहीं है, सिद्धान्तमें यह वाक्य ज्ञेयब्रह्ममें समन्वित है ॥१६ ॥
* ' सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य ' इस श्रौत उपसंहारसे यह निश्चय होता है कि बालाकि और अजात-शत्रुके संवादरूप वाक्य समुदायमें ब्रह्म ही वेदितव्यरूपसे उपदिष्ट है । जीव और मुख्यप्राणकी उपासना पक्षमें ब्रह्मविषयक उपक्रमका और सर्व पापनिवृत्ति, स्वराज्य - निरतिशय फलकी प्राप्ति और