श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 351–360

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 351–360

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अधि ० ५ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो- दीपिकासहित ३१७ श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद ' इति । नन्वेवं सति प्रतर्दनवाक्यनिर्णयेनैवेदमपि वाक्यं निर्णीयेत, न निर्णीयते; ' यस्य वैतत्कर्म ' इत्यस्य ब्रह्मविषयत्वेन तत्रानिर्धारितत्वात् । तस्मादत्र जीवमुख्य प्राणशङ्का पुनरुत्पद्यमाना निवर्त्यते । प्राणशब्दोऽपि ब्रह्मविषयो दृष्टः-‘ प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ’ ( छा ० ६।८।२ ) इत्यत्र । जीवलिङ्गमप्युपक्रमोपसंहारयोर्ब्रह्मविषय-त्वादभेदाभिप्रायेण योजयितव्यम् ॥१७ ॥

अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्न व्याख्यानाभ्यामपि चैनमेके ॥ १८ ॥

पदच्छेद – अन्यार्थम्, तु, जैमिनिः, प्रश्नव्याख्यानाभ्याम्, अपि, च, एवम्, एके । सूत्रार्थ - ( जैमिनिस्तु ) आचार्य जैमिनि तो ऐसा मानते हैं कि इस प्रकरणमें जीवका परामर्श ( अन्यार्थम् ) ब्रह्मज्ञानके लिए है । ( प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् ) ' क्वैष एतद्बालाके ' क्योंकि ऐसा प्रश्न और ' यदा सुप्तः स्वप्नं न कश्चन ० ' ऐसा उत्तर है, ( अपि च ) किव ( एके ) वाजसनेयिशाखावाले ( एवम् ) ' य एष विज्ञानमय: ० ' इस प्रश्न और ' य एषोऽन्तहृदय ' इस उत्तर द्वारा स्पष्ट कहते हैं कि विज्ञानात्मा परमात्मासे भिन्न है । * अपि च नैवात्र विवदितव्यम् - जीवप्रधानं वेदं वाक्यं स्याद् ब्रह्मप्रधानं वेति । यतोऽन्यार्थ जीवपरामर्श ब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थमस्मिन्वाक्ये जैमिनिराचार्यो मन्यते । कस्मात्? प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् | प्रश्नस्तावत् सुप्तपुरुषप्रतिबोधनेन प्राणादिव्यतिरिक्ते जीवे प्रतिबोधिते पुनर्जीवव्यतिरिक्तविषयो दृश्यते - ' कैष एतद्वालाके पुरुषोऽशयिष्ट व वा एतदभूत्कुत एतदागात् ' ( कौ ० ब्रा ० ४ । १ ९ ) इति । प्रतिवचनमपि ' यदा सुप्तः स्वप्नंन कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति ' इत्यादि ' एतस्मादत्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः ' ( कौ ० स्वराज्य और आधिपत्य प्राप्त करता है ) इस प्रकार उपसंहार भी निरतिशय फलका श्रवण होनेसे ब्रह्म-विषयक देखा जाता है । परन्तु ऐसा होनेपर तो प्रतर्दनवाक्यके निर्णय से इस वाक्यका भी निर्णय हो जाता, किन्तु निर्णय नहीं होता, क्योंकि ' यस्य वैतत्कर्म ' इसका ब्रह्म विषयरूपसे वहाँ निर्धारण नहीं किया गया है । इसलिए यहाँ पुन: उत्पन्न हुई जीव ओर मुख्यप्राण शङ्काका निवारण किया जाता है । ' प्राणबन्धनं हि ० ' ( हे सोम्य! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ) इसमें प्राणशब्द भी ब्रह्मविषयक देखा गया है । उपक्रम और उपसंहार ब्रह्मविषयक होनेसे जीव लिङ्गकी मी अभेदाभिप्रायसे ही योजना करनी चाहिए ॥ १७ ॥

और यहाँ विवाद भी नहीं करना चाहिए कि यह वाक्य जीव प्रधान है अथवा ब्रह्म प्रधान, कारण कि इस वाक्यमें आचार्य जैमिनि जीव परामर्श को अन्यार्थक -ब्रह्म - प्रतिपत्ति के लिए मानते हैं; किससे? इससे कि प्रश्न और व्याख्यान - उत्तर हैं । सोये हुए पुरुषको उठाकर प्राणादिसे अन्य जीवके. प्रतिबोधित होनेपर ' क्वैष एतद् बालाके पुरुषो ० ' ( हे बालाकि! यह पुरुष कहाँ सोता था, यह शयन कहाँ हुआ था अर्थात् यह सुप्त पुरुष किसको प्राप्त हुआ था और ऐक्य भ्रंशरूप आगमन कहाँसे हुआ ) इस प्रकार जीवसे भिन्न विषयक फिर प्रश्न देखा जाता है । और ' यदा सुप्तः ० ( सोता हुआ पुरुष जब कोई स्वप्न नहीं देखता तब इस प्राणमें ही एक होता है ) इत्यादि और ' एतस्मादात्मनः ० ' " ( इस आत्मासे सत्यानन्दी -दीपिका आधिपत्य बोधक उपसंहारका स्पष्ट विरोध है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके विना जीव और प्राणकी उपासना से सर्वपापकी निवृत्ति और स्वराज्यकी प्राप्ति असम्भव है ॥ १७ ॥

* प्रथम सूत्रमें भोवतृत्व आदि जीव लिङ्गसे ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है । परन्तु इस सूत्रमें, जीवलिङ्गसे जीवके कथन द्वारा ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि ' क्वैष एतद् बालाके ० ' इन वाक्योंमें जीवका परामर्श ब्रह्म के जाननेके लिए है ।

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३१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० ४ ब्रा ० ४।२० ) इति च । सुषुप्तिकाले च परेण ब्रह्मणा जीव एकतां गच्छति । परस्माचब्रह्मणः प्राणादिकं जगज्जायत इति वेदान्तमर्यादा । तस्माद्यत्रास्य जीवस्य निः संबोधता. स्वच्छता-रूपः- स्वाप उपाधिजनितविशेषविज्ञान रहितं स्वरूपं, यतस्तद्भ्रंशरूपमागमनं, सोऽत्र पर-मात्मा वेदितव्यतया श्रावित इति गम्यते । अपि चैवमेके शाखिनो वाजसनेयिनोऽस्मिन्नेव -बालाक्यजातशत्रुसंवादे स्पष्टं विज्ञानमयशब्देन जीवमाम्नाय तद्वयतिरिक्तं परमात्मानमा-मनन्ति - य एष विज्ञानमयः पुरुषः ष तदाभूत्कुत एतदागात् ' ( बृद्धं २।१।१६ ) इति प्रश्ने । प्रति-वचनेऽपि‘य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्शेते ' इति । आकाश शब्दश्च परमात्मनि प्रयुक्तः ' दहरो-ऽस्मिन्नन्तराकाशः ' ( छा ० ८1१1१ ) इत्यत्र । ' सर्व एत आत्मनो व्युच्चरन्ति ' इति चोपाधिमतामात्मना -मन्यतो व्युच्चरणमामनन्तः परमात्मानमेव कारणत्वेन ( मनन्तीति गम्यते । प्राण निराकरण-स्यापि सुषुप्तपुरुषोत्थापनेन प्राणादिव्यतिरिक्तोपदेशोऽभ्युच्चयः ॥ १८ ॥

( ६ वाक्यान्वयाधिकरणम् सू ० १ ९ -२२ ) वाक्यान्वयात् ॥१९ ॥

सूत्रार्थ - - ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: ' इस श्रुतिमें द्रष्टव्य आदि रूपसे उपदिष्ट आत्मा परमात्मा ही है, क्योंकि उपक्रम आदिके पर्यालोचनसे ज्ञात होता हैं कि ब्रह्म में ही वाक्यका अन्वय है । * बृहदारण्यके मैत्रेयीब्राह्मणेऽधीयते - ' न वा अरे पत्युः कामाय ' इत्युपक्रम्य ‘ न वा विस्फुलिङ्गोंकी तरह वाग् आदि प्राण अपने - अपने स्थानपर जाते हैं, प्राणोंसे देव और देवोंसे लोक निकलते - उत्पन्न होते हैं ) प्रतिवचन भी है । सुषुप्तिकाल में जीव परब्रह्म के साथ एक हो जाता है और परब्रह्मसे प्राणादि जगत् उत्पन्न होता है, यह वेदान्त मर्यादा - सिद्धान्त है । इससे ज्ञात होता है कि जिसमें इस जीवका मान रहित स्वच्छतारूप स्वाप है अर्थात् उपाधि जनित विशेष विज्ञान रहित स्वरूप हैं, जिस स्वरूपसे वह पतनरूप आगमन है, वह परमात्मा यहाँ वेदितव्यरूपसं सुनाया जाता है अर्थात् प्रतिपादित है । और इस प्रकार एक वाजसनेय शाखावाले बालांकि और अजातशत्रुके इसी संवादमें विज्ञानमय शब्दसे जीवका स्पष्ट श्रवण कराके उससे अन्य परमात्माको ' य एष विज्ञानमयः ' ( यह जो विज्ञानमय पुरुष हैं, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था? और यह कहाँसे आया? ) इस प्रश्नमें और ' य एष ० ' ( हृदयमें जो यह आकाश है उसमें सोता है ) इस प्रतिवचनमें भी कहते हैं । ' दहरोऽस्मिन्न-न्तराकाश: ' ( इसमें जो सूक्ष्म आकाश है ) इस छान्दोग्य श्रुतिमें माकाश शब्द परमात्मा में प्रयुक्त है । ' सर्व एत आत्मनो ० ( ये सब आत्मासे निकलते हैं ) इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि उपाधि युक्त आत्माओंका अन्यमेंसे निकलना श्रवण कराते हुए परमात्माका ही कारणरूप से प्रतिपादन करते हैं । प्राणके निराकरण में सुषुप्त पुरुषके उत्थानके साथ प्राणांदिसे अतिरिक्त जीवके उपदेशरूप हेतुका भो संग्रह कर लेना चहिए अर्थात् प्राणके निराकरण में यह भी हेतु है ॥ १८ ॥

बृहदारष्यकके मैत्रेयीब्राह्मण में ' न वा अरे पत्युः ' ( अरे मैत्रेयी! स्त्रीको पतिके लिए पति प्रिय नहीं होता ) इस प्रकार आरम्भकर आगे ' न वा अरे ० ' ( अरे मैत्रेयी! सबके प्रयोजनके लिए सब सत्यानन्दी - दीपिका * ' सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ० ( छा ० ६/८/१ ) ( हे सोम्य! सुषुप्ति में जीव सत् ब्रह्म के साथ एक होता है ) इस प्रकार सुषुप्ति में जीवका आविर्भाव और तिरोभाव ब्रह्म में ही होता है । चेतन जीव जड़ प्राणके साथ कदापि एक नहीं हो सकता । ' प्राणस्य प्राणम् ' ( वह तो प्राणका प्राण है ) इस प्रकार यहाँ प्राण शब्द ब्रह्मका प्रतिपादक है । इसलिए यहाँ परमात्मा ही सबका कारणरूपसे उपदिष्ट और वेदितव्य है । यहाँ जीव निराकरणकी तरह प्राणके निराकरणमें भी यह सूत्र हेतु समझना चाहिए । अतः यह सिद्ध हुआ कि उक्त वाक्य जीवके परमार्थरूप प्रतिपादन द्वारा ब्रह्ममें ही समन्वित है ॥१८ ॥

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अधि ६ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३१ ९ अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ' ( वृ ० ४/५/६ ) इति तत्रैतद्विचिकित्स्यते- किं विज्ञानात्मैवायं द्रष्टव्यश्रोतव्यत्वादिरूपेणो-पदिश्यत आहोस्वित्परमात्मेति । कुतः पुनरेषा विचिकित्सा? प्रियसंसूचितेनात्मना भोक्त्रो-पक्रमाद्विज्ञानात्मोपदेश इति प्रतिभाति । तथात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानोपदेशात्परमात्मोपदेश इति । किं तावत्प्राप्तम्? विज्ञानात्मोपदेश इति । कस्मात्? उपक्रम सामर्थ्यात् । पति-जायापुत्रवित्तादिकं हि भोग्यभूतं सर्वं जगदात्मार्थतया प्रियं भवतीति प्रियसंसूचितं भोक्तार-मात्मानमुपक्रम्यानन्तरमिदमात्मनो दर्शनाद्युपदिश्यमानं कस्यान्यस्यात्मनः स्यात्? मध्येऽपि ' इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्ति ' इति प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभावेन ब्रुवन्विज्ञाना-त्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शयति । तथा ' विज्ञातामरे केन विजानीयात् ' इति कर्तृवचनेन शब्दे-नोपसंहरन्विज्ञानात्मानमेवेहोपदिष्टं दर्शयति । तस्मादात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञान वचनं भोक्त्र-प्रिय नहीं होते, अपने प्रयोजन - सुख के लिए सब प्रिय होते हैं, अतः ' अरी मैत्रेयी! आत्मा ही दर्शनके योग्य है, अतः उसका श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए, अरी मैत्रेयी! निश्चय ही आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञानसे यह सब विदित हो जाता है ) इस प्रकार अध्ययन करते हैं । यहाँ यह संशय होता है कि क्या यह विज्ञानात्मा ही द्रष्टव्य श्रोतव्यादिरूपसे उपदिष्ट है अथवा परमात्मा? मला यह संशय क्यों होता है? प्रियशब्द से सूचित भोक्ता आत्माका उपक्रम होनेके कारण प्रतीत होता है कि विज्ञानात्माका उपदेश है । उसी प्रकार आत्मविज्ञानसे सबके विज्ञानका उपदेश होने से परमात्माका उपदेश प्रतीत होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विज्ञानात्माका यह उपदेश है, किससे? इससे उपक्रमको सामर्थ्य है । पति, स्त्री, पुत्र, वित्त आदि भोग्यरूप सारा जगत् आत्माके लिए प्रिय होता है, इसप्रकार प्रिय शब्द से संसूचित मोक्ता आत्माका उपक्रमकर अनन्तर उपदेश किए हुए आत्मा के दर्शनादि किसी अन्य आत्माके होंगे? मध्यमें मी ' इदं महद्भूत ० ' ( यह महान्, सत्य, अनन्त, अपार और विज्ञानेकरस इन भूतोंसे विशेषरूपसे समु स्थित होकर उन्हीं के साथ नष्ट हो जाता है । इसप्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती ) इसप्रकार प्रकृत द्रष्टव्य महान् भूतका ही भूतोंसे विज्ञानात्मरूपसे समुत्थान कहती हुई श्रुति विज्ञात्मा ही द्रष्टव्य है ऐसा दिखलाती है । इसीप्रकार ' विज्ञातारमरे ० ' ( अरे मैत्रेयी! विज्ञाताको किससे जाने ) इसप्रकार कर्तृवाचकशब्दसे उपसंहार करती हुई श्रुति विज्ञाता विज्ञानात्मा ही. उपदिष्ट है ऐसा दिखालाती है | इससे यह समझना चाहिए कि आत्मविज्ञानसे सबका विज्ञान होता है, यह वचन लिए होनेसे भोग्य समूहमें गौण है । सत्यानन्दी - दीपिका * ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इस उपक्रमके बलसे जैसे पूर्वाधिकरणका विषयवाक्य ब्रह्म परक माना गया है वैसे ' न वा अरे पत्युः कामाय ' इस प्रकार मैत्रेयीब्राह्मणमें जीवका उपक्रम होनेसे यह वाक्य जीव परक होना चाहिए, इस तरह दृष्टान्तसंगतिसे ' किं तावत् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं । * ' आत्मनस्तु कामाय ' इसप्रकार उपक्रममें आत्मशब्दसे विज्ञानात्माका ही ग्रहण है । मरण समयमें सब भूतोंसे समुस्थान भी विज्ञानात्मका होता है, यह मध्यमें वर्णन है और उपसंहारमें कर्तृ-वाची शब्दसे विज्ञानात्माका उपदेश है । इसलिए उपक्रम, मध्य और उपसंहारसे यहाँ विज्ञानात्मा ही द्रष्टव्य आदिरूपसे उपदिष्ट है । किश्च ' आत्मा के ज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है ' यह प्रतिज्ञा है, यद्यपि वह जीव पक्षमें मुख्यरूपसे सम्भव नहीं है, क्योंकि भोक्ता आत्मासे भोग्य समुदाय अत्यन्त

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३२० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ र्थत्वाद्भोग्यजातस्योपचारिकं द्रष्टव्यमिति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - परमात्मोपदेश एवायम् । कस्मात्? वाक्यान्वयात् । वाक्यं हीदं पौर्वापर्येणावेक्ष्यमाणं परमात्मानं प्रति अन्वितावयवं लक्ष्यते । कथमिति, तदुपपाद्यते - ' अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन ' इति याज्ञवल्क्यादुपश्रुत्य ‘ येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहि ' इत्यमृतत्वमाशांसानाया मैत्रेय्या याज्ञवल्क्यआत्मविज्ञानमिदमुपदिशति । न चान्यत्र परमात्मविज्ञानादमृतत्वमस्तीति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति । * तथा चात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुच्यमानं नान्यत्र परमकारण-विज्ञानान् मुख्य मवकल्पते । नचैतदौपचारिकमाश्रयितुं शक्यम्, यत्कारणमात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञायानन्तरेण ग्रन्थेन तदेवोपपादयति- ' ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद ' इत्यादिना । यो हि ब्रह्मक्षत्रादिकं जगदात्मनोऽन्यत्र स्वातन्त्र्येण लब्धसद्भावं पश्यति तं मिथ्यादर्शिनं तमेव मिथ्यादृष्टुं ब्रह्मक्षत्रादिकं जगत्पराकरोतीति भेददृष्टिमपोद्य ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' इति सर्वस्य वस्तुजातस्यात्माव्यतिरेकमवतारयति ' दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैश्च ' ( वृ ० ( ४/५/८ ) तमेवाव्यतिरेक द्रढयति । ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः ' ( बृ ० ४।५।११ ) सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - परमात्माका ही यह उपदेश है, किससे? इसमें ही वाक्योंके अन्वय होनेसे । पूर्वापर के पर्यालोचनसे इस वाक्यके अवयव अवेक्ष्यमाण परमात्मा में ही अन्वित लक्षित होते हैं । कैसे अन्वित होते हैं? उसका उपपादन करते हैं ' अमृतत्वस्य ० ' ( अमृतत्वकी तो वित्तसे आशा नहीं है ) इस प्रकार याज्ञवल्क्यसे सुनकर ' येनाहं ० ' ( जिससे में अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी? हे भगवन्! जो अमृतत्वका साधन जानते हों वही मुझे बतलावें ) इस तरह अमृतत्वकी आशा रखनेवाली मैत्रेयीको याज्ञवल्क्य इस आत्मविज्ञानका उपदेश करते हैं । परमात्म-विज्ञानके सिवा अमृतत्वकी प्राप्ति नहीं है, ऐसा श्रुति और स्मृति वचन कहते हैं । उसी प्रकार आत्म-विज्ञानसे कहा हुआ जो सर्वविज्ञान है वह पर कारण विज्ञानके विना मुख्यरूप से नहीं हो सकता, यह कथन औपचारिक भी ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योंकि आत्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञाकर ' ब्रह्म तं ० ' ( ब्राह्मण जाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मण जातिको आत्मासे भिन्न समझता है ) इत्यादि अग्रिम ग्रन्थसे उसीका उपपादन करता है । निश्चय जो ब्रह्म क्षत्र आदि जगत्को आत्मासे अन्यत्र ( भिन्न ) स्वतन्त्ररूप से सत्तावाला देखता है, वही मिथ्यादृष्ट ब्रह्म क्षत्रादि जगत् उस मिथ्या-दर्शीको कल्याणमार्गसे भ्रष्ट कर देता है, इस प्रकार भेददृष्टिका निषेधकर ' इदं सर्व ० ' ( यह जो कुछ है वह सब यह आत्मा है ) इस तरह सम्पूर्ण वस्तुसमूहको आत्मासे अभिन्न अवतरण कहता है । ' दुन्दुभि आदि दृष्टान्तोंसे ' उसी अभेदको दृढ करता है । ' अस्य महतो ० ' ( जो यह ऋग्वेद है वह इस सत्यानन्द - दीपिका भिन्न है, तो भी गौणरूपसे सम्भव है, कारण कि भोग्य समुदाय भोक्ताके लिए होता है, भोक्ता जीवका ज्ञान होनेपर तदाश्रित मोग्य समूहका भी ज्ञान सुतरां हो जाता है, इसलिए ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रुति वाक्योंसे जीवात्माका ही द्रष्टव्य आदिरूपसे उपदेश है । * सि ० - पूर्वापर वाक्योंके पर्यालोचनसे ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्योंमें परमात्माका ही उपदेश अवगत होता है, क्योंकि सारा मैत्रेयीव्राह्मण ज्ञेय ब्रह्ममें ही समन्वित है | * जैसे दुन्दुभि, शंख और वीणाके सामान्य शब्दके ज्ञानसे गृह्यमाण तत् तत् अवान्तर विशेष शब्द शुक्तिके ग्रहणसे ग्राह्य रजतके समान समान्यशब्दमें कल्पित हैं, उससे भिन्न नहीं हैं, वैसे आत्मा के मानसे मास्य सब आत्ममात्र है यह निश्चित है इस प्रकार एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानको प्रतिज्ञा होनेसे ब्रह्मका निश्चय होता है । सर्वस्रष्टृत्वादि लिङ्गसे भी ब्रह्मका निश्चय होता है । किंच ' स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम् ' ( बृ ० २ | ४ | ११ ) ( जैसे

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अधि ० ६ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३२१ इत्यादीना च प्रकृतस्यात्मनो नामरूपकर्मप्रपञ्चकारणतां व्याचक्षाणः परमात्मानमेनं गमयति । तथैवैकायनप्रक्रियायामपि ' ( बृ ० ४।५।१२ ) सविषयस्य सेन्द्रियस्य सान्तःकरणस्य प्रपञ्चस्यैकायनमनन्तरमबाह्यं कृत्स्नं प्रज्ञानघनं व्याचक्षाणः परमात्मानमेनं गमयति । तस्मात्परमात्मन एवायं दर्शनाद्युपदेश इति गम्यते ॥१ ९ ॥ यत्पुनरुक्तम्- प्रिय संसूचितोपक्रमाद्विज्ञानात्मन एवायं दर्शनाद्युपदेश इति, अत्र ब्रूमः-प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः || २० || पदच्छेद - प्रतिज्ञासिद्ध:, लिङ्गम्, आश्मरथ्यः । सूत्रार्थ - ( प्रतिज्ञासिद्धेः ) एकके विज्ञानसे सबका ज्ञान होता है ' इस प्रतिज्ञाकी सिद्धिमें ( लिङ्गम् ) जीव ब्रह्मके अभेदांशको लेकर जीवका उपक्रम हेतु है, ऐसा ( आश्मरथ्यः ) आरमरथ्य आचार्यका मत है । * अस्त्यत्र प्रतिज्ञा ' आत्मनि विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं मवति ', ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' इति च । तस्याः प्रतिज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गं यत्प्रियसंसूचितस्यात्मनो द्रष्टव्यत्वादि-संकीर्तनम् | यदि हि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽन्यः स्यात्ततः परमात्मविज्ञानेऽपि विज्ञानात्मा न विज्ञात इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं यत्प्रतिज्ञातं तद्धीयेत । तस्मात्प्रतिज्ञा सिद्धयर्थ विज्ञानात्म परमात्मनोरभेदांशेनोपक्रमणमित्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते ॥ २० ॥

सत्य ब्रह्मका निःश्वास है ) इत्यादिसे प्रकृत आत्मामें नाम, रूप, कर्म प्रपञ्चकी कारणताके व्याख्यानकी इच्छा करते हुए इस परमात्माका अवगम - बोध कराते हैं । ' उसी प्रकार एकायनप्रक्रिया में मी ' विषय, इन्द्रिय और अन्तःकरणके साथ सम्पूर्ण प्रपञ्चका एक आधार बाह्य और माभ्यान्तर भेद शून्य, अखण्ड और प्रज्ञानैकरसके व्याख्यानकी इच्छा करते हुए याज्ञवल्क्य इस परमात्माका ही बोध कराते हैं, इससे ज्ञात होता है कि परमात्माका ही यह दर्शनादि उपदेश है ॥ १ ९ ॥ जो यह कहा गया है कि प्रिय शब्दसे सूचित भोक्ता आत्माके उपक्रमसे विज्ञानात्माका ही यह दर्शन आदि उपदेश है, उसपर हम कहते हैं—-' आत्मनि विज्ञाते ० ' ( आत्माका विज्ञान होनेपर इस सम्पूर्ण प्रपश्वका ज्ञान हो जाता है ) और ' इदं सर्व ० ' ( यह आत्मा ही यह सब कुछ है ) ऐसी यहां प्रतिज्ञा है । प्रिय शब्दसे संसूचित आत्मा-का जो द्रष्टव्यत्वादि संकीर्तन है, यह लिङ्ग उस प्रतिज्ञाकी सिद्धिको सूचित करता है । यदि विज्ञानात्मा परमात्मासे अन्य हो तो परमात्माका विज्ञान होनेपर भी विज्ञानात्मा विज्ञात न होगा, इस प्रकार एक का विज्ञान होनेसे सबका विज्ञान होता है यह जो प्रतिज्ञा की गई है वह बाधित हो जायगी । इसलिए प्रतिज्ञाकी सिद्धिके लिए जीवात्मा और परमात्माके अभेदांशको लेकर उपक्रम है, इस प्रकार आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं ॥२० ॥

सत्यानन्दी - दीपिका सब जलोंका समुद्र एकमात्र आश्रय है, वैसे सब स्पर्शोका त्वक् एकमात्र आश्रय है ) यहाँ कार्यका कारणमें लय श्रुतिको विवक्षित है, अतः प्रपञ्वरूप कार्यका ब्रह्ममें लय प्रतिपादन करनेके लिए ' एवं सर्वेषामात्मैकायनम् ' ( सबका आत्मा एकमात्र आश्रय है ) इस वाक्यका अध्याहार करना चाहिए । इस प्रकार एकायन ( प्रलयकाल ) प्रक्रियासे प्रपञ्चका आश्रय ब्रह्म सिद्ध होता है । अतः जीवसे समस्त जगत् की उत्पत्ति आदिके संभव न होनेसे मैत्रेयी ब्राह्मणमें उपदिष्ट आत्मा परमात्मा ही है । किच ' अमृतत्व फलसे उपक्रम, मध्यमें आत्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा, अन्तमें ' महद्भूतमनन्तं ' इत्यादिसे मैत्रेयीब्राह्मणमें ब्रह्म ही प्रतिपाद्य है जीवात्मा नहीं । उसके विज्ञानसे ही मोक्तृभोग्यसमूहके ज्ञानकी प्रतिज्ञां भी सिद्ध होती है । अतः ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें परमात्मा

ही द्रष्टव्य आदि रूपसे उपदिष्ट है । इसका फल पूर्वके समान है ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 356

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३२२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः ॥ २१ ॥

पदच्छेद -- उत्क्रमिष्यतः, एवंभावात् इति, ओडुलोमिः । सूत्रार्थ - ( उत्क्रमिष्यतः ) ब्रह्म साक्षात्कार होनेके अनन्तर देह आदि संघातसे उत्क्रमण करते हुए जीवका ( एवं भावात् ) परमात्मा के साथ ऐक्य होता है । इस भविष्यत् अभेदको लेकर जीवका उपक्रम है, ( औडुलोभिः ) यह औडुलोभि आचार्यका मत है । * विज्ञानात्मन एव देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघातोपाधिसंपर्कात्कलुषीभूतस्य ज्ञान-ध्यानादिसाधनानुष्ठानात्संप्रसन्नस्य देहादिसंघातादुत्क्रमिष्यतः परमात्मैक्योपपत्तेरिदम-भेदेनोपक्रमणमित्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते । श्रुतिश्चैवं भवति - ' एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरा-त्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( छा ० ८।१२।३ ) इति । क्वचिच्च जीवाश्रय-मपि नामरूपं नदी निदर्शनेन ज्ञापयति- ' यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ' ( मुण्ड ० ३।२।८ ) इति । यथा लोके नद्यः स्वाश्रयमेव नामरूपं विहाय समुद्रमुपन्त्येवं जीवोऽपि स्वाश्रयमेव नामरूपं विहाय परं पुरुषमुपैतीति हि तत्रार्थः प्रतीयते दृष्टान्तदार्शन्तिकयोस्तुल्यतायै ॥२१ ॥

देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिके संघातरूप उपाधिके सम्बन्धसे कलुषित विज्ञानात्माका ही ज्ञान, ध्यान आदि साधनों के अनुष्ठानसे संप्रसन्न हुए दृष्ट देहादि संघातसे उत्क्रमण होनेपर परमात्माके साथ ऐक्य उपपन्न होता है, अत: यह: उपक्रम अभेदसे है, ऐसा ओडुलोमि आचार्य मानते हैं । श्रुति भी ऐसी ही है - ' एष सम्प्रसादो ० ' ( यह सम्प्रसाद - जीव इस शरीरसे समुत्थानकर आनात्माभिमान त्यागकर परमज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित होता है ) कहीं पर जीवाश्रय नाम रूपको भी ओडुलोमि आचार्य नदीके दृष्टान्तसे ज्ञापन कराते हैं- ' यथा नद्यः स्यन्दमानाः ० ' जैसे लोकमें नदियाँ स्वाश्रय नाम-रूपका त्यागकर समुद्रको प्राप्त होती हैं, वैसे जीव भी स्वाश्रय नाम - रूपका त्यागकर परम पुरुषको प्राप्त प्रोत है, यहाँ दृष्टान्त और दाष्टन्तिकी तुल्यताके लिए ऐसा अर्थ प्रतीत होता है || २१ | सत्यानन्दी - दीपिका * अग्नि और विस्फुलिङ्गोंकी तरह जीव और ब्रह्मका भेद तथा अभेद है । अभेद अंशको लेकर ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' यह जीवात्माका उपक्रम प्रतिज्ञाका साधक है, यह आश्मरथ्य आचार्यका मत है ॥२० ॥

* देह आदि संघात के साथ सम्बन्ध होनेसे जीवका परमात्मासे संसारदशामें भेद है और ब्रह्मात्मत्व साक्षात्कार होनेपर अविद्या तथा देह आदि संघातसे मुक्त होनेसे मुक्तिदशामें जीवका परमात्मा के साथ अभेद होता है । इस प्रकारं पाञ्चरात्र भी कहते हैं-' आमुक्तेर्भेद एव स्याज्जीवस्य च परस्य च । मुक्तस्य तु न भेदोऽस्ति भेदहेतोरभावतः ' ॥ ( मुक्ति पर्यन्त जीव और परमात्माका भेद ही है, मुक्तिदशामें तो भेद हेतुके अभाव होनेसे जीवका परमात्मा के साथ भेद नहीं है ) इस भविष्यत् वृत्ति अभेदको लेकर ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' यह उपक्रम है । इस विषय में ' एष सम्प्रसादः ' यह श्रुति भी है । अब तक तो देहादि उपाधिसे जीवात्मा कलुषित कहा गया है, परन्तु अब तो जीवमें ' क्वचिच्च ' आदिसे नाम - रूप प्रपञ्चका आश्रयस्वरूप कालुष्य स्वाभाविक है, जैसे पार्थिव परमाणुमें श्यामत्व स्वाभाविक है वह पाकद्वारा निवृत्त हो जाता है, वैसे ज्ञान ध्यान आदिसे उस कालुष्यको निवृत्तकर जीव परसे पर दिव्य पुरुषको प्राप्त होता है । इस विषयमें नदीका दृष्टान्त है । इस मतमें भविष्यत् वृत्तिको लेकर ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वाक्य कभेद परक समझने चाहिए । ' सिद्धान्त में ' ब्रह्मात्मैक्य ज्ञानसे पूर्व जीवभेद आदि प्रपञ्च भ्रान्ति-मात्र - मिथ्या है, औडुलोमिके मतमें सत्य है । सिद्धान्तमें नाम रूप उपाधिके धर्म हैं और इस मतमें जीवात्मा हैं । इस प्रकार दोनोमें अन्तर है ॥२१ ॥

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अधि ० ६ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३३३ अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥ २२ ॥

पदच्छेद - अवस्थितेः, इति, काशकृत्स्नः । सूत्रार्थ - ( इति काशकृत्स्नर ) ऐसा काशकृत्स्न आचार्यका मत है कि ( अवस्थितेः ) अविद्या कल्पितभेदसे ब्रह्म ही जीवरूपसे अवस्थित है, इसलिए जीवसे उपदेशका उपक्रम है । ** अस्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनावस्थानादुपपन्नमिदमभेदेनोपक्रम-णमिति काशकृत्स्न आचार्यो मन्यते । तथाच ब्राह्मणम् -'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि ' ( छा ० ६।३।२ ) इत्येवंजातीयकं परस्यैवात्मनो जीवभावेनावस्थानं दर्शयति । मन्त्रवर्णश्च – सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वामिवदन्यदास्ते ' ( तै ० आ ० ३।१२।७ ) इत्येवंजातीयकः । न च तेजःप्रभृतीनां सृष्टौ जीवस्य पृथक्सृष्टिः श्रुता, येन परस्मादात्मनोऽ-न्यस्तद्विकारो जीवः स्यात् । का शकृत्स्नस्याचार्यस्याविकृतः परमेश्वरो जीवो नान्य इति मत-म् । आश्मरथ्यस्य तु यद्यपि जीवस्य परस्मादनन्यत्वमभिप्रेतं तथापि प्रतिज्ञा सिद्धेरिति सापे-क्षत्वाभिधानात्कार्यकारणभावः कियानष्यभिप्रेत इति गम्यते । * औडुलोमिपक्षे पुनः स्पष्ट-मेवावस्थान्तरापेक्षौ भेदाभेदौ गम्येते । तत्र काशकृत्स्नीयं मतं श्रुत्यनुसारीति गम्यते; प्रति-पिपादयिषितार्थानुसारात् ' तत्त्वमसि ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । एवं च सति तज्ज्ञानादमृतत्वमव-कल्पते । विकारात्मकत्वे हि जीवस्याभ्युपगम्यमाने विकारस्य प्रकृतिसंबन्धे प्रलयप्रसङ्गान्न काशकृत्स्न आचार्य इस प्रकार मानते हैं कि इसी परमात्भाकी इस जीवात्मरूपसे अवस्थिति होनेके कारण अभेदरूपसे यह उपक्रम युक्त है । उसी प्रकार ' अनेन जीवेनात्मना ० ' ( मैं इस जीवात्म-रूपसे तेज़, जल और अन्न इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेशकर नाम और रूपको अभिव्यक्ति करूँ ) इस प्रकारका ब्राह्मणवाक्य परमात्माका ही जीवात्मरूपसे अवस्थान दिखलाता है । और ' सर्वाणि रूपाणि ० ' ( सर्वज्ञ समस्त चराचरको उत्पन्न कर उनका नाम रख और उनमें प्रवेशकर भाषण आदि व्यवहार करता हुआ रहता है ) इस प्रकारका मन्त्र भी है । तेज आदिकी सृष्टिमें जीवकी पृथक् सृष्टि श्रुत नहीं है जिससे कि जीव परमात्मासे अन्य एवं उसका विकार हो । काशकृत्स्न आचार्यका यह उ है कि अविकृत परमेश्वर ही जीव है अन्य नहीं है । आश्मरथ्यको तो यद्यपि जीवात्माका परमात्मासे अनन्यत्व अभिप्रेत है, तो भी ' प्रतिज्ञासिद्धेः ' इस प्रकार सापेक्षत्वाभिधानसे यत्किञ्चित् कार्यकारणभाव अभिप्रेत है, ऐसा ज्ञाता होता है । पुनः ओडुलोमिके पक्ष में तो संसारदशा की अपेक्षासे भेद और मोक्षावस्थाकी अपेक्षासे अभेद स्पष्ट प्रतीत होता है । उन सब मतोंमें आचार्यं काशकृत्स्नका मत श्रुति अनुरूप ज्ञात होता है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादनके अभीष्ट अर्थके अनुसार है । श्रुति अनुरूप होने से उसके ज्ञानसे अमृतत्व हो सकता है । यदि जीवको ब्रह्मका विकारात्मक स्वीकार किया जाय तो प्रकृति के साथ सम्बन्ध होनेपर विकारका लय प्रसङ्ग हो जानेसे उसके ज्ञानसे अमृतत्व सत्यानन्दी -दीपिका # परन्तु यह मत असंगत है, क्योंकि सत्य कार्य करण संघातवाला जीव यदि ब्रह्मसे अत्यन्त मिन है तो मुक्ति में उसका ब्रह्मके साथ अभेद अनुपपन्न है, इस अरुचिसे ' अवस्थितेरिति ' आदि सूत्र कहते हैं । आश्मरथ्य आचार्यके मतमें अग्नि और विस्फुलिङ्गों की तरह जीवकी परमात्मासे उत्पत्ति होनेके कारण जीव और ब्रह्मका भेद सत्य है । भेद अंशको लेकर दोनोंमें कार्यकारण भाव है । ' प्रतिज्ञासिद्धे: ' ' एकके विज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है, इस प्रतिज्ञाकी सिद्धिमें अभेद अंशको लेकर यह जीविका उपक्रम है । * यद्यपि ' यथाग्नेः क्षुद्राविस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः ' ( जैसे अग्निसे छोटी - छोटी चिनगारियां निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे प्राण उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे

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३२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पेत । अतश्च स्वाश्रयस्य नामरूपस्यासंभवादुपाध्याश्रयं नामरूपं जीव उपचर्यते । अत एवोत्पत्तिरपि जीवस्य क्वचिदग्निविस्फुलिङ्गोदाहरणेन श्राव्यमाणोपाध्याश्र-यैव वेदितव्या । यदयुक्तम् प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्म-भावेन दर्शयन्विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शयतीति, तत्रापीयमेव त्रिसूत्री योजयितव्या । * ‘ प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः । इदमत्र प्रतिज्ञातम् - ' आत्मनि विदिते सर्वं विदितं भवति ' ' इदं सर्वं यदयमात्मा । ' ( बृह ०२।४।६ ) इति च । उपपादितं च सर्वस्य नामरूपकर्मप्रपञ्चस्यैकप्रसवत्वादेक-प्रलययत्वाच्च दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैश्च कार्यकारणयोरव्यतिरेकप्रतिपादनात् । तस्या एव प्रति-ज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गं यन्महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभा-वेन कथितमित्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते । अभेदे हि सत्येक विज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातमव-कल्पतइति । ' उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमिः । उत्क्रमिष्यतो विज्ञानात्मनो ज्ञानध्यानादि-सामर्थ्यात्संप्रसन्नस्य परेणात्मनैक्यसंभवादिदमभेदाभिधानमित्यौइलोमिराचार्यो मन्यते । ‘ अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ’ । अस्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनावस्थानादुपपन्नमि-दमभेदाभिधानमितिकाशकृत्स्न आचार्यों मन्यते । ननूच्छेदाभिधानमेतत् ' एतेभ्यो भूतेभ्यः संभव नहीं है । अतः स्वाश्रय नामरूपका असम्भव होनेसे उपाधि आश्रय नामरूपका जीवमें उपचार होता है । इसी कारण कहीं अग्नि और विस्फुलिङ्गोंके उदाहरणसे सुनाई हुई जीवको उत्पत्ति भी उपाधिके आश्रित ही समझनी चाहिए । जो यह कहा गया है कि प्रकृत द्रष्टव्य महान् सत्य स्वरूपका ही विज्ञानात्मरूपसे भूतोंसे समुत्थान दिखलाते हुए मुनि याज्ञवल्क्य विज्ञानात्मा ही यह द्रष्टव्य है ऐसा दिखलाते हैं । उसमें भी इस त्रिसूत्रीकी योजना करनी चाहिए । ' प्रतिज्ञासिद्धेः ' यहाँपर आत्मनि विदिते ० ( आत्माके विदित होनेपर सब विदित हो जाता है ) और ' इदं सर्व ० ' ( यह सब दृश्य प्रपश्च आत्मा ही है ) ऐसी प्रतिज्ञा की गई है । नाम, रूप और कर्म रूप सारे प्रपञ्चका आत्मरूपत्व उपपादित है, क्योंकि एक उत्पत्ति स्थान और एक प्रलयस्थान होनेसे और दुन्दुभि आदि दृष्टान्तोंसे कार्य और कारणका अभेद प्रतिपादित है । जो महान् सत्य भूत द्रष्टव्य ब्रह्मका भूतोंसे विज्ञानात्मरूपसे समुत्थान कहा गया है वह लिङ्ग इसी प्रतिज्ञाकी सिद्धिको सूचित करता है, ऐसा आश्मरथ्य आचार्यका मत है, क्योंकि अभेद होनेपर प्रतिज्ञात एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान उपपन्न होता है । ' उत्क्रमिष्यतः ० ' उत्क्रमण करने वाले ज्ञान, ध्यान आदिकी सामर्थ्य से सम्यक् प्रसन्न हुए विज्ञानात्माका परमात्माके साथ ऐक्य सम्भव होनेसे यह अभेद कथन युक्त है, ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं । ' अवस्थितेरिति ० ' इसी परमात्माकी विज्ञानात्मरूप से अवस्थिति होनेसे यह अभेदका अभिधान उपपन्न है, ऐसा काशकृत्स्न आचार्य मानते हैं । परन्तु ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ० ' ( यह प्रकृत द्रष्टव्य आत्मा ही पाँच भूतरूप उपाधि से जीवभावको सत्यानन्दी - दीपिका जीवकी उत्पत्तिका श्रवण होता है, तो भी यह कथन उपाधिकी उत्पत्तिको लेकर समझना चाहिए ।. * ' आत्मनि विदिते ० ' इस श्रुतिसे एकके विज्ञानसे सबके ज्ञानकी प्रतिज्ञा दिखलाई गई है और ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' इस शास्त्र से आत्माकी सर्वात्मकता दिखलाकर उक्त प्रतिज्ञाका उपपादन किया गया है । यदि भेद सत्य हो तो एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा उपपन्न नहीं होगी । भेदाभेद वादमें अभेद पक्षको लेकर प्रतिज्ञा उपपन्न होती है । * ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ' इस श्रुतिका तात्पर्य विम्ब - प्रतिबिम्बवादमें है । जैसे उदकपूर्ण पात्र में बिम्बभूत सूर्यादिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस प्रतिबिम्बके आधार भूत जलका नाश होने पर प्रतिबिम्ब नष्ट हुआ प्रतीत होता है, वस्तुता उसका बिम्बरूप होना ही नाश कहा जाता है । ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' ' मरणानन्सर संज्ञा नहीं रहती ' इस श्रुतिभागका भी यही तात्पर्य है कि बुद्धि आदि उपाधिवश बिम्बभूत

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अधि ० ६ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३२५ समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्ति ' ( बृह ० २।४।१२ ) इति कथमेतदभेदाभिधानम्? नैष दोषः, विशेषविज्ञानविनाशाभिप्रायमेतद्विनाशाभिधानं, नात्मोच्छेदाभिप्रायम् । ' अत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्ति ' इति पर्यनुयुज्य स्वयमेव श्रुत्याऽर्थान्तरस्य दर्शितत्वात्- ' न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति ' इति । एतदुक्तं भवति - कूटस्थनित्य एवायं विज्ञानघन आत्मा नास्योच्छेदप्रसङ्गोऽस्ति । मात्रा-भिस्त्वस्य भूतेन्द्रियलक्षणाभिरविद्याकृताभिर संसर्गो विद्यया भवति । संसगाभावे च तत्कृ-तस्य विशेषविज्ञानस्याभावान्न प्रेत्य संज्ञास्तीत्युक्तमिति । यदप्युक्तम्- ' विज्ञातारमरे केन विजा-नीयात् ' इति कर्तृवचनेन शब्देनोपसंहाराद्विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यमिति, तदपि काशकृत्स्नी-येनैव दर्शनेन परिहरणीयम् । अपि च ' यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति ' ( बृ ०२।४।१३ ) इत्यारभ्याविद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणं विशेषविज्ञानं प्रपञ्चय ' यन्त्रत्वस्य सर्वमात्मैवा-प्राप्त होकर, विद्यासे उपाधिकी निवृत्तिके अनन्तर नाशको प्राप्त हो जाता है, देहेन्द्रिय भावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती ) इस प्रकार यह तो उच्छेदका अभिधान है, यह अभेदका अभिधान कैसे है? यह दोष नहीं है, क्योंकि यह विनाशका अभिधान तो विशेष विज्ञानके विनाश के अभिप्रायसे है आत्मोच्छेदके अभिप्रायसे नहीं है, कारण कि ' अत्रैव मा भगवानमू ० ' ( हे भगवन्! शरीरपातके अनन्तर कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती, ऐसा कहकर ही आपने मुझे मोहमें डाल दिया है ) इस प्रकार पर्यनुयोग ( शंका ) कर श्रुतिने स्वयं ही अन्य अर्थको दिखलाया है । ' न वा अरे ० ' ( याज्ञवल्क्य-अरे मैत्रेयी! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ । नाशहेतु रहित होनेसे यह बात्मा अविनाशी है, देह, इन्द्रिय आदिके साथ इसका संसर्ग नहीं है ) तात्पर्य यह है कि यह आत्मा कूटस्थ, नित्य, विज्ञा-नैकरस है, इसके उच्छेदका प्रसंग ही नहीं है । अविद्याकृत भूतेन्द्रियात्मक मात्राओं के साथ इसके संसर्ग-का अभाव विद्यासे होता है । संसर्गके अभाव होनेपर संसर्गकृत विशेष विज्ञानके अभाव होने ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' ऐसा कहा है । ' विज्ञातारमरे ० ' ( हे मैत्रेयी! विज्ञाताको किससे जाने ) इस प्रकार कर्तृवाचक शब्दसे उपसंहार होनेसे विज्ञानात्मका ही यह द्रष्टव्यरूप उपदेश है, ऐसा जो कहा है, उसका भी काशकृत्स्नके दर्शनसे ही परिहार करना चाहिए । और भी ' यत्र हि ० ' ( परन्तु जहाँ- अविद्यावस्थामें द्वैत - सा होता है वहाँ अन्य अन्यको देखता है ) ऐसा आरम्भकर अविद्या विषयमें उसीके दर्शन आदि रूप विशेष विज्ञानका प्रपञ्चकर ' यत्र त्वस्य ० ' ( किन्तु जहाँ विद्यावस्था में इसके लिए सत्यानन्दी- दीपिका परमात्मा ही प्रतिबिम्बरूपसे जीवभावको प्राप्त हुआ हैं, ' अहं ब्रह्मास्मि ' इस प्रकार प्रत्यगभिन्न ब्रह्मज्ञान | से अविद्या और तन्मूलक उपाधिके विलय होने पर प्रतिबिम्बरूप जीव कहाँ गया? ऐसा सन्देह होता है । परन्तु वह तो कहीं गया नहीं, केवल बिम्बभूत परमात्मरूपसे अवस्थित है । पहले भी ब्रह्मस्वरूप ही है, किन्तु उपाधिवश पृथक् -सा प्रतीत होता है । अब उपाधि के विलय होने पर बिम्बरूपसे प्रतीत होता है ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' सुषुप्ति में भी यह श्रुत्यर्थं लगाया जाता है, उसमें जाग्रत, स्वप्न विषयक विशेषज्ञान नहीं रहता, क्योंकि उसमें ज्ञानके हेतुभूत मन इन्द्रिय आदिका विलय हो जाता है, इस अभिप्राय ऐसा श्रुति में वर्णन है, स्वरूपभूत ज्ञानको लेकर नहीं, कारण कि यह कूटस्थ नित्य ज्ञान स्वरूप है । किञ्च मैत्रेयीकी यह शङ्का है कि ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' इस वाक्यमें मरणानन्तर आत्मोका नाश प्रतीत होता है, उसके नाश हो जानेसे ज्ञानसे प्रतिपादित अमृतत्वकी प्राप्ति अयुक्त है । तब याज्ञवल्क्यने आत्माको अविनाशी कहकर मैत्रेयीकी शङ्का निवृत्त की, अत: ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' यह वाक्य विशेष विज्ञानके नाशके अभिप्रायसे है आत्माके नाशके अभिप्रायसे नहीं । * आरमरथ्य मोर मोडलोमि इन दोनों के मतमें सत्यभेदका अङ्गीकार होनेसे ' केन ' ऐसा

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३२६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ भूत्तत्केन कं पश्येत् ' इत्यादि विद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणस्य विशेषविज्ञानस्याभाव-मभिदधाति । पुनश्च विषयाभावेऽपि आत्मानं विजानीयात् इत्याशङ्कय ' विज्ञातारमरे केन विजानीयात् ' इत्याह । ततश्च विशेषविज्ञानाभावोपपादनपरत्वाद्वाक्यस्य विज्ञानधातुरेव केवलः सन्भूतपूर्वगत्या कर्तृवचनेन तृचा निर्दिष्ट इति गम्यते । दर्शितं तु पुरस्तात्काश-स्नीयस्य पक्षस्य श्रुतिमत्त्वम् । अतश्च विज्ञानात्मपरमात्मनोर विद्याप्रत्युपस्थापितनामरू-परचितदेहाद्युपाधिनिमितो भेदो न पारमार्थिक इत्येषोऽर्थः सर्वैर्वेदान्तवादिभिरभ्युपग-न्तव्यः । ‘ सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( छा ०७ / २५ / २ ) ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( मुण्ड ० २ | २ | 1१ ) इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( वृ ० २।४।६ ), ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( बृ ० ३।७।२३ ), ‘ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ ' ( वृ ० ६ | ८ | ११ ) इत्येवंरूपाभ्यः श्रुतिभ्यः । स्मृतिभ्यश्च ' वासुदेवः सर्वमिति ' ( गी ० ६।१ ९ ), ‘ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ' ( गी ० १।३।२ ), ' समं सर्वेषु भूतेषु तिष्टन्तं परमेश्वरम् ' ( गी ०१३।२७ ) इत्येवंरूपाभ्यः, भेददर्शनापवादाच्च ' अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशु: ' ( वृ ० १।४।१० ) ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( बृ ० ४ | ४ | १ ९ ) इत्येवं जातीयकात् । ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽमयो ब्रह्म ' ( बृ ० ४।४।२५ ) इति चात्मनि सर्वविक्रियाप्रतिषेधात् अन्यथा च मुमुक्षूणां निरपवादविज्ञानानुपपत्तेः; सुनिश्चितार्थत्वानुपपत्तेश्च । निरपवादं हि विज्ञानं सर्वाकाङ्क्षानिवर्तकमात्मविष-यमिष्यते; ' वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः ' ( मुण्ड ० ३।२।६ ) इति च श्रुतेः । ‘ तत्र को मोहः कः सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किससे किसे देखे ) इत्यादिसे विद्याविषयमें उसके हो दर्शन आदि रूप विशेषविज्ञानका अभाव कहते हैं । और विषयके अभाव में भी ' आत्माको विशेषरूपसे जाने ' ऐसी. आशङ्काकर ' विज्ञातारमरे ० ' ऐसा कहा है । यह वाक्य विशेषविज्ञानके अभावका उपपादन करता है इससे ऐसा ज्ञात होता है कि केवल विज्ञानैकरस ही भूतपूर्व गति अविद्यादशा से कर्तृवाचक ' तृच् ' प्रत्ययसे निर्दिष्ट है । और यह पहले ही दिखलाया गया है कि काशकृत्स्नका सिद्धान्त श्रुति अनुरूप है । इसलिए विज्ञानात्मा और परमात्माका भेद अविद्यासे उपस्थापित नाम - रूपसे रचित - कल्पित देहादि उपाधिसे है पारमार्थिक नहीं है, ऐसा अर्थ सब वेदान्तवादियोंको स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि ‘ सदेव ० ’ ( हे सोम्य! आरम्भ में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' आत्मैवेदं ० ' ( आत्मा ही यह सब है ) ' ब्रह्मदं ० ' ( ब्रह्म ही यह सब है ) ' इदं सर्व ० ' ( यह सब आत्मा ही है ) ‘ नान्यो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) ' नान्यदतो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ और ' वासुदेवः सर्वमिति ' ( सब वासुदेव है ) ' क्षेत्रज्ञं चापि ० ' ( हे भारत! सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे जान ) ' समं . सर्वेषु ० ' ( सम्पूर्ण भूतों में समभाव से स्थित परमेश्वरको देखता है ) इस प्रकारकी स्मृतियाँ हैं । ' अन्यो ο ' ( यह अन्य है, मैं अन्य हूँ इस प्रकार जो उपासना करता है, वह पशुके समान है, तत्त्व को नहीं जानता ) ' मृत्योः स ० ' ( जो अद्वितीय आत्मामें अनेक - सा देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इस प्रकारकी श्रुतियोंसे भेद दर्शनका अपवाद है । क्योंकि ' स वा एष ० ( वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है ) इस प्रकार आत्मामें सब क्रियाओंका प्रतिषेध है, अन्यथा मुमुक्षुओंको अपवाद ( बाध ) रहित ज्ञानकी अनुपपत्ति होगी और सुनिश्चितार्थत्व-तत्त्व निश्चयकी भी अनुपपत्ति होगी, क्योंकि सर्व आकांक्षाओंका निवर्तक अपवाद रहित आत्मविषयक सत्यानन्दी -दीपिका आक्षेप युक्त नहीं है । काशकृत्स्नके मतमें तो जीव ब्रह्मका अत्यन्त अभेद है, इसलिए विज्ञान के कारकका अभाव होनेसे ' केन ' यह आक्षेप युक्त है । उस मतमें मनः कल्पित विज्ञातृत्व मुक्त ब्रह्मात्मामें अविद्याशा में कर्तृवाचक ' तृच् ' प्रत्यय द्वारा विज्ञातृत्वका प्रयोग किया गया है ।