श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 361–370

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 361 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ७ सू ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३२७ शोक एकत्वमनुपश्यतः: ' ( ईशा ० ७ ) इति च । ' स्थितप्रज्ञलक्षणस्मृतेश्च ( गी ० २।५४ ) स्थिते. च क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्वविषये सम्यग्दर्शने क्षेत्रज्ञः परमात्मेति नाममात्रभेदात्, क्षेत्रज्ञोऽयं परमात्मनो भिन्नः परमात्माऽयं क्षेत्रज्ञाद्भिन्न इत्येवंजातीयक आत्मभेदविषयो निर्बन्धो निरर्थकः । एको ह्ययमात्मा नाममात्र भेदेन बहुधाभिधीयत इति । * नहि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायाम् ' ( तै ० २२६ ) इति कांचिदेवैकां गुहामधिकृत्यैतदुक्तम् । न च ब्रह्मणोऽन्यो गुहायां निहितोऽस्ति, ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' ( तै ० २।६ ) इति स्रष्टुरेव प्रवेशश्रवणात् । ये तु निर्बन्धं कुर्वन्ति ते वेदान्तार्थं बाधमानाः श्रेयोद्वारं सम्यग्दर्शनमेव

बाधन्ते । कृतकमनित्यं च मोक्षं कल्पयन्ति । न्यायेन च न संगच्छन्त इति ॥ २२ ॥

( ७ प्रकृत्यधिकरणाम् सू ० २३-२७ ) प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा दृष्टान्तानुपरोधात् ॥ २३ ॥

पदच्छेद -- प्रकृतिः, च, प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । सूत्रार्थ - ( प्रकृतिश्च ) ब्रह्म उपादानकारण और निमित्तकारण भी है, ( प्रतिज्ञादृष्टान्तानु-परोधात् ) क्योंकि ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इस प्रकार एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानकी प्रतिज्ञा और ' यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन ० ' इस तरह दृष्टान्तका सामंजस्य है । * यथाभ्युदयहेतुत्वाद्धर्मो जिज्ञास्यः ' एवं निःश्रेयसहेतुत्वाद्ब्रह्म जिज्ञास्यमित्युक्तम् । विज्ञान ही इष्ट है । कारण कि ' वेदान्तविज्ञान ० ' ( जिन्होंने वेदान्तविज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी प्रकार निश्चय कर लिया है ) और ' तत्र को मोह: ० ' ( उस समय एकत्व देखनेवाले उस विद्वान्को क्या मोह और क्या शोक है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं । ' स्थितप्रज्ञका लक्षण करनेवाली स्मृति भी है ' । इस प्रकार क्षेत्रज्ञ और परमात्माका एकत्व विषयक सम्यग् ज्ञान निश्चित होनेपर क्षेत्रज्ञ परमात्मा इस प्रकार नाममात्रके भेद होनेसे यह क्षेत्रज्ञ परमात्मासे भिन्न है, यह परमात्मा क्षेत्रज्ञ से भिन्न है इस प्रकारका आत्मामें भेद विषयक आग्रह व्यर्थ है । यह एक ही आत्मा नाममात्रके भेदसे बहुत प्रकारसे कहा जाता है | ‘ सत्यं ० ' ( ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है, जो पुरुष उसे बुद्धिरूप परमाकाशमें निहित जानता है ) यह कथन किसी एक गुहाके उद्देश्यसे नहीं कहा गया है [ किन्तु समष्टि बुद्धिरूप गुहा उद्देश्यसे है ] और ब्रह्मसे अन्य मी गुहामें निहित नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ० ' ( इसे रचकर वह इसमें अनुप्रविष्ट हो गया ) इस प्रकार स्रष्टाके ही अनुप्रवेशकी श्रुति है । परन्तु जो आचार्य [ भेदादिका ] आग्रह करते हैं वे वेदान्तार्थं ( अत्यन्त दुःख निवृत्ति ) का बाध करते हुए श्रेय द्वार - सम्यग् ज्ञानका ही बाघ करते हैं | कार्य और अनित्य मोक्षकी कल्पना करते हैं और न्यायका अनुसरण नहीं करते || २२ || जो यह कहा गया है कि जैसे अभ्युदयका हेतु होनेसे धर्मं जिज्ञास्य है, वैसे मोक्षका हेतु होनेसे सत्यानन्दी -दीपिका. * भेदाभेदवादी आश्मरथ्यका मत और मोक्षदशा में अभेदवादी ओडुलोमिका मत ' एकमेवा-द्वितीयम् ' ' नेह नानास्ति किञ्चन ' ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि भेद बाधक और अभेद प्रतिपादक श्रुतियोंसे बाधित है । भेदाभेदवादी मोक्षको ज्ञान और कर्म साध्य मानते हैं, उनके मतसे मोक्षमें अनित्यत्व दोष तो वज्रलेप है । जो क्रिया साध्य है ' वह अनित्य है, यह न्याय है, इस न्यायसे भी बाधित है । वेदान्तमतमें अनर्थको निवृत्ति ज्ञान साध्य होनेसे और नित्यमुक्त आत्ममात्र होनेसे कोई दोष नहीं है । इससे यह सिद्ध होता है कि जीव ब्रह्मका अत्यन्त अभेद है और • मैत्रेय ब्राह्मण प्रत्यगभिन्न ब्रह्ममें ही समन्वित है । पूर्वपक्ष में ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' यह वाक्य जीवों-पसनापरक है और सिद्धान्तमें ज्ञेय प्रत्यगभिन्न ब्रह्म में इस वाक्यका समन्वय फल है ॥ २२ ॥

पृष्ठ 362

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 362 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३२८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ ब्रह्म च ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १ । १ । २ ) इति लक्षितम् । तच्च लक्षणां घटरुचकादीनां मृत्सु -वर्णादिवत्प्रकृतित्वे कुलाल सुवर्ण कारादिवनिमित्तत्वे च समानमित्यतो भवति विमर्श: -किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति । तत्र निमित्तकारणमेव तावत्केवलं स्यादिति प्रतिभाति । कस्मात्? ईक्षापूर्वक कर्तृत्वश्रवणात् । ईक्षापूर्वकं हि ब्रह्मणः कर्तृत्वमवगम्यते-' स ईक्षांचक्रे ( प्र ० ६।३ ) ‘ स प्राणमसृजत ' प्र ० ६ ४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु दृष्टम् । अनेककार कंपूर्विका च क्रियाफलसिद्धिलोंके दृष्टा । स च न्याय आदिकर्तर्यपि युक्तः संक्रमयितुम्; ईश्वरत्वप्रसिद्धेश्च - ईश्वराणां हि राजवैव-स्वतादीनां निमित्तकारणत्वमेव केवलं प्रतीयते, तद्वत्परमेश्वरस्यापि निमित्तकारणत्वमेव युक्तं प्रतिपत्तुम् । कार्य चेदं जगत्सावयवमचेतनमशुद्धं च दृश्यते, कारणेनापि तस्य तादृशे-नैव भवितव्यम्; कार्यकारणयोः सारूप्यदर्शनात् । ब्रह्म च नैवंलक्षणमवगम्यते ' निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ' ( वे ० ६।१ ९ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । पारिशेष्याद्ब्रह्मणोऽन्यदु-ब्रह्म जिज्ञास्य हैं । और जन्माद्यस्य ' यतः ' इस सूत्र से ब्रह्मका लक्षण कहा गया है । उस लक्षणसे ब्रह्म घट, आभूषण आदिके प्रति मृत और सुवर्ण आदिकें समान उपादानकारण और कुम्हार, सुवर्ण-कार आदिके समान निमित्तकारण है यह समान है, इससे संशय होता है कि ब्रह्म किस प्रकारका कारण है? पूर्वपक्षी - ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों कारणोंमें से ब्रह्म केवल निमित्तकारण ही है, किससे? इससे कि ईक्षण पूर्वक कर्तृत्वका श्रवण है । ' स ईक्षांचक्रे ' ( उसने ईक्षण किया ) ' स प्राणमसृजत ' ( उसने प्राणकी सृष्टि की ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतीत होता है कि ब्रह्म ईक्षण पूर्वक कर्ता है । ईक्षा-पूर्वक कर्तृत्व कुम्हार मादि निमित्तकारणोंमें ही देखा जाता है । अनेक कारक ( कर्ता कर्ता,, कर्मादि ) पूर्वक क्रियाके फलकी सिद्धि लोकमें देखी गई है । और वह न्याय आदिकर्ता में भी संक्रमित करना युक्त है । और ईश्वरत्वकी प्रसिद्धिसे भी [ ब्रह्म निमित्तकारण है ], क्योंकि जैसे राजा वैवस्वत मनु आदि ईश्वर केवल निमित्तकारण ही प्रतीत होते हैं, वैसे परमेश्वरको भी केवल निमित्त कारण समझना युक्त है । और कार्यरूप यह जगत् सावयव, अचेतन और अशुद्ध देखा जाता है । उसका कारण मी वैसा ही होना चाहिए, क्योंकि कार्य कारणमें सादृश्य देखा जाता है । परन्तु ' निष्कल ० ' ( अवयव रहित, अक्रिय, शान्त दोषरहित और निर्लेप ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्म ऐसा प्रतीत नहीं होता । अतः परिशेषसे अर्थात् प्रकृत ब्रह्मके प्रतिषेध और अन्यत्र प्रसक्तिके अभाव होनेसे ब्रह्मसे भिन्न अशुद्धि सत्यानन्दी - दीपिका * ' जन्माद्यस्य यतः ' इस लक्षणसूत्र से ब्रह्म सामान्यतः कारण प्रतिपादित है, तो ब्रह्म केवल कर्ता होने से निमित्तकारण ही है अथवा उपादान और निमित्त दोनों कारण है । इसप्रकार विशेष जिज्ञासा के होनेपर इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है, सामान्यज्ञान विशेषविचारका हेतु है, अतः कार्य कारणभाव संगतिसे इस अधिकरणका आरम्भ है । यद्यपि इस अधिकरणको जन्मादि अधिकरणके अनन्तर देना उपयुक्त था, तो भो निश्चित तात्पर्यवाले वेदान्तोंसे केवल ईश्वर निमित्त-कारण मतका निराकरण सहज समझकर समन्वयाध्याय के अन्तमें दिया है, अतः यह . प्रकृति अघि-करण सार्थक है । पूर्व अधिकरणमें सर्वविज्ञान प्रतिज्ञा मुख्य होनेसे ' आत्मा व वरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्य में द्रष्टव्यशब्दसे जीवपरत्वका निरास किया गया है । परन्तु वह अयुक्त है, क्योंकि कर्ता और उपादानके मित्र - मित्र होनेसे यह सर्वविज्ञान प्रतिज्ञा गोण है । इसप्रकार ' तत्र ' इत्यादिसे आक्षेप करते हैं । पूर्वपक्ष में द्वैतसिद्धि फल है, और सिद्धान्तमें अद्वैत सिद्धि फल है । ब्रह्म नोपादानं ईश्वरत्वाद् राजादिवत् ' ( जैसे राजा उपादान कारण नहीं है, क्योंकि वह ईश्वर है, वैसे ईश्वर होनेसे ब्रह्म भी उपादान नहीं ) ' जगत् न ब्रह्मप्रकृतिकं तद्विलक्षणत्वात्

पृष्ठ 363

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 363 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ७ सू ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३२ ९ पादानकारणमशुद्धयादिगुणकं स्मृतिप्रसिद्धमभ्युपगन्तव्यम् । ब्रह्मकारणत्वश्रुतेर्निमित्तत्व-मात्रे पर्यवसानादिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - प्रकृतिश्चोपादानकारणं च ब्रह्माभ्युपगन्तव्यं निमित्त-कारणं च । न केवलं निमित्तकारणमेव । कस्मात्? प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । एवं प्रतिज्ञा-दृष्टान्तौ श्रौतौ नोपरुध्येते 1 । प्रतिज्ञा तावत् - ' उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतम-विज्ञातं विज्ञातम् ' ( छा ० ६।१।२ ) इति । तत्र चैकेन विज्ञातेन सर्वमन्यदविज्ञातमपि विज्ञातं भव-तीति प्रतीयते । तच्चोपादानकारणविज्ञाने सर्वविज्ञानं संभवत्युपादानकारणाव्यतिरेकात्का-र्यस्य 1 । निमित्तकारणाव्यतिरेकस्तु कार्यस्य नास्तिः लोके तक्ष्णः प्रासादव्यतिरेकदर्शनात् । * दृष्टान्तोऽपि - ' यथा सोम्यैकैन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्ति -केत्येव सत्यम् ' इत्युपादानकारणगोचर एवाम्नायते । तथा ' एकेन लोह मणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात् ' एकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं काष्र्णायसं विज्ञातं स्यात् ' ( छा ० ६।१।४, ५, ६ ) इति च । तथान्य-त्रापि ‘ कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' ( मुण्ड ० १।१।२ ) ' इति प्रतिज्ञा । ' यथा ' पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति ' ( मुण्ड ० १1१1७ ) इति दृष्टान्तः । तथा ' आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम् ' इति प्रतिज्ञा । ' स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्यान्शब्दाशक्नु-आदि गुणयुक्त स्मृति प्रसिद्ध [ प्रधानको ] उपादान कारण स्वीकार करना चाहिए । क्योंकि ब्रह्ममें कारणत्व प्रतिपादक श्रुतिका निमित्तकारणमात्रमें पर्यवसान है । सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं --- ब्रह्मको प्रकृति अर्थात् उपादानकारण और निमित्तकारण स्वीकार करना चाहिए । केवल निमित्तकारण ही नहीं, किससे? इससे कि प्रतिज्ञा और दृष्टान्तका अनुपरोध है । ब्रह्मको उभय कारण मानने से श्रुति - प्रतिपादित प्रतिज्ञा और दृष्टान्त बाधित नहीं होते । ' उत तमादेश ' ( क्या तूने गुरुसे वह आदेश पूछा है? जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेष-रूपसे ज्ञात हो जाता है ) यह प्रतिज्ञा है । उसमें ऐसा प्रतीत होता है कि एकके विज्ञात होनेसे अन्य सब अविज्ञात भी विज्ञात हो जाते हैं । वह सर्वविज्ञान उपादानकारणके विज्ञान होनेपर संभव है, क्योंकि कार्यं उपादानकारण से अभिन्न होता है । किन्तु निमित्तकारणसे कार्य अभिन्न नहीं होता, कारण कि लोक में बढई - कारीगर महल से भिन्न देखने में आता है । ' यथा सोम्यैकेन ० ( हे सोम्य! जैसे एक मृत्पिण्डके विज्ञान से सब मृत्तिकाके विकारोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणी के आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ) तथा ' एकेन लोहमणिना ० ' ( एक लोहमणि - सुवर्णम के विज्ञात होनेपर सब सुवर्ण विकार ज्ञात हो जाते हैं ) और ' एकेन नखनिकृन्तनेन ० ( एक नहन्ना - लोह-fuosh ज्ञानसे सब लोहके विकार ज्ञात हो जाते हैं ) इसप्रकार दृष्टान्त भी उपादानकारण विषयक कहा गया है । उसी प्रकार अन्य स्थलोंमें भी ' कस्मिन्नु भगवो ० ' ( शौनक - हे भगवन्! किसके जान लिए जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ) ऐसी प्रतिज्ञा है, और ' यथा पृथिव्यामो ० ' ( जैसे पृथिवीमें औषधियाँ उत्पन्न होती हैं ) ऐसा दृष्टान्त है । तथा ' आत्मनि ० ( हे मैत्रेयी! निश्चय ही आत्माक्वा दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इन सबका ज्ञान हो जाता है ) ऐसी प्रतिज्ञा है और ' सयथा ० ' सत्यानन्दी - दीपिका. कुलालविलक्षणघटवत् ' ( जगत् ब्रह्म उपादान कारण वाला नहीं है, क्योंकि वह उससे विलक्षण है, यथा घट कुलालसे विलक्षण है ) इसलिए ब्रह्मसे भिन्न कार्यके सदृश सांख्य स्मृतिमें प्रसिद्ध प्रधान हो कारण होना युक्त है । * ' यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्प्रवतीह विश्वम् ( मु ० १1१1७ ) ( जैसे जीवत पुरुषसे केश और लोम उत्पन्न होते हैं, वैसे ही उस अक्षरसे यह विश्व प्रकट होता है ) यह भी दृष्टान्त है । उभयकारणरूप ब्रह्मके जाननेसे तदभिन्न सम्पूर्ण कार्य प्रपञ्च ज्ञात हो जाता है । इसप्रकार

पृष्ठ 364

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 364 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ यादग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीत: ' ( वृ ० ४ / ५ / ६,८ ) इति दृष्टान्तः । एवं यथासंभवं प्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ प्रकृतित्वसाधनौ प्रत्येतव्यौ । यत इतीयं प्रञ्चमी-' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यत्र ' जनिकर्तुः प्रकृतिः ' ( पा ० सू ० १ | ४ | ३० ) इति विशेष-स्मरणात्प्रकृतिलक्षण एवापादाने द्रष्टव्या । निमित्तत्वं त्वधिष्ठात्रन्तराभावादधिगन्तव्यम् । यथा हि लोके मृत्सुवर्णादिकमुपादानकारणं कुलाल सुवर्णकारादीनधिष्ठातृनपेक्ष्य प्रवर्तते, नैवं ब्रह्मण उपादानकारणस्य सतोऽन्योऽधिष्ठातापेक्ष्योऽस्ति, प्रागुत्पत्तेरेकमेवाद्वितीय-मित्यवधारणात् । अधिष्ठात्रन्तराभावोऽपि प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधादेवोदितो वेदितव्यः । अधिष्ठातरि ह्यपादानादन्यस्मिन्नभ्युपगम्यमाने पुनरप्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्यासंभवा-त्प्रतिज्ञादृष्टान्तोपरोध एव स्यात् । तस्मादधिष्ठात्रन्तराभावादात्मनः कर्तुत्वमुपादाना-न्तराभावाच्च प्रकृतित्वम् || २३ | कुतश्चात्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे? अभिव्योपदेशाच्च ॥ २४ ॥

पदच्छेद - अभिध्योपदेशात्, च । सूत्रार्थ - ' से कामयात ' इसप्रकार अभिध्यान- संकल्पका उपदेश होनेसे आत्मा कर्ता- निमित्त-कारण है और ' बहु स्याम् ' ( मैं बहुत होऊ ) इसप्रकार अभिध्यानका उपदेश होनेसे प्रकृति - उपादान-कारण भी है । * अभिध्योपदेशञ्चात्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे गमयति ' सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति ' ( वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस दुन्दुभि ( नक्कारे ) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किन्तु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है ) ऐसा दृष्टान्त है । इस प्रकार यथासंभव प्रत्येक वेदान्तमें उपादानकारण सिद्ध करनेवाली प्रतिज्ञा और दृष्टान्त समझने चाहिए । ' यतो वा ० ' ( जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिस्थ ' यत: ' इस पदमें यह पञ्चमी विभक्ति ' जनिकर्तुः ' ( जायमानकी प्रकृतिकी संज्ञा उपादान होती है ) इस विशेष सूत्रसे प्रकृतिरूप अपादान अर्थमें ही समझनी चाहिए । ब्रह्मको निमित्तकारण तो अन्य अधिष्ठाताके न होनेसे समझना चाहिए । जैसे लोकमें मृत्तिका, सुवर्ण आदि उपादानकारण कुम्हार सुवर्णकार आदि अधिष्ठाताओंकी अपेक्षा रखकर प्रवृत्त होते हैं, वैसे उपादानकारण सत् ब्रह्मको अन्य अधिष्ठाता की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि जगत् की उत्पत्तिके पूर्व सजातीय, विजातीय, स्वगत भेदशून्य केवल एक अद्वितीय था, ऐसा अवधारण है । अन्य अधिष्ठाताका अभाव भी प्रतिज्ञा और दृष्टान्तके बाधाभावसे ही कहा गया समझना चाहिए । उपादानकारणसे अन्य अधिष्ठाताके स्वीकार किये जानेपर फिर भी एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानका असंभव होनेसे प्रतिज्ञा और दृष्टान्तका बाध ही होगा । इसलिए अन्य अधिष्ठाता न होनेसे आत्मा कर्ता है और अन्य उपादानके न होनेसे प्रकृति है ॥ २३ ॥

आत्मा, निमित्तकारण और उपादानकारण कैसे है? ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामनाकी कि मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न होऊ ) और ' तदैक्षत ० ' ( उसने ईक्षण - संकल्प किया कि मैं बहुत होऊ ) इसप्रकार सृष्टि संकल्पका उपदेश आत्मामें सत्यानन्दी- दीपिका प्रतिज्ञा और दृष्टान्तरूप लिङ्गसे ब्रह्मको उपादानकारण सिद्धकर आगे ' यतः ' आदि से पञ्चमी विभक्तिसे निमित्तकरण सिद्ध करते हैं ॥ २३ ॥

* ब्रह्म में दोनों प्रकारकी कारणताका उपपादन चार सूत्रोंसे करते हैं- अनागत वस्तु विषयक इच्छा या संकल्पका नाम अभिध्या है । ' बहु स्यां ' इसप्रकार बहुत होनेका संकल्प आत्मविषयक होनेसे यह प्रतीत होता है कि कार्य और कारणका अभेद है ॥ २४ ॥

पृष्ठ 365

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 365 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ७ सू ० २५-२६ ] भाषानुवाद - संत्यानन्दो -दीपिका सहित ३३१ ' तदैशत बहु स्यां प्रजायेय ' इति च । तत्राभिध्यानपूर्विकायाः स्वातन्त्र्य प्रवृत्तेः कर्तेति गम्यते । बहु स्यामिति प्रत्यगात्मविषयत्वाद्बहुभवनाभिध्यानस्य प्रकृतिरित्यपि गम्यते || २४ || साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ २५ ॥

पदच्छेद - साक्षात् च, उभयाम्नानात् । सूत्रार्थ - ( साक्षाच्चोभयाम्नानात् ) ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' इसप्रकार आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहणकर साक्षात् जगत्की उत्पत्ति और प्रलय सुने जाते हैं, अतः ब्रह्म ही जगत्का उपादानकारण है | : प्रकृतित्वस्यायमभ्युच्चयः इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं साक्षाद्ब्रह्मैव कारणमुपा-दायोभौ प्रभवप्रलयावाम्नायेते - ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते । आकारां प्रत्यस्तं यन्ति ' ( छा ० १।९ ।१ ) इति । यद्धि यस्मात्प्रभवति यस्मिंश्च प्रलीयते तत्तस्योपादानं प्रसिद्धम् । यथा व्रीहियवादीनां पृथिवी । ' साक्षात् ' इति चोपादानान्तरानुपादानं दर्श यत्याकाशादेवेति । प्रत्यस्तमयश्च नोपादानादन्यत्र कार्यस्य दृष्टः ॥ २५ ॥

आत्मकृतेः परिणामात् ॥२६ ॥

पदच्छेद – आत्मकृतेः, परिणामात् । सूत्रार्थ - ( आत्मकृतेः ) ' तदात्मानं स्वयमकरुत ' इसमें आत्मसम्बन्धी कृतिका श्रवण है, अतः ब्रह्म उभयकारण है, ( परिणामात् ) क्योंकि कर्तारूपसे पुर्वसिद्ध वस्तु भी विवर्तरूपसे साध्य हो सकती है, इससे ब्रह्म कृतिका कर्म विषय है । * इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मप्रक्रियायाम् ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( तै ० २।७ ) इत्यात्मनः कर्मत्वं कर्तृत्वं च दर्शयति । आत्मानमिति कर्मत्वं, स्वयमकुरुतेति कर्तृत्वम् । कथं पुनः पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वं शक्यं संपादयितुम्? परिणा-कर्तृत्व और प्रकृतित्व बोधित करता है । उसमें संकल्प पूर्वक स्वतन्त्र प्रवृत्तिसे आत्मा कर्ता - निमित्त-कारण है, ऐसा प्रतीत होता है और ' बहु स्यां ' इसप्रकार बहुत होनेका संकल्प प्रत्यगात्मविषयक होनेसे ऐसा ज्ञात होता है कि आत्मा प्रकृति उपादानकारण मी है ॥२४ ॥

उपादान कारण होनेमें यह दूसरा हेतु है, इससे भो ब्रह्म प्रकृति है । क्योंकि ' सर्वाणि हवा इमानि ० ( ये समस्त भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाश में हो लीन होते हैं ) इस श्रुतिमें साक्षात् ब्रह्मका ही कारणरूपसे ग्रहणकर उत्पत्ति और प्रलय दोनों कहे गये हैं, क्योंकि • यह प्रसिद्ध है कि जो जिससे उत्पन्न होता है और जिसमें लय होता है वह उसका उपादान होता है, जैसे धान, यव आदिका पृथिवी उपादानकारण है । श्रुतिस्थ ' आकाशादेव ' इस ' एव ' से सूचित अन्य उपादानके अग्रहणको भगवान सूत्रकार ' साक्षात् ' पदसे दिखलाते हैं । कार्यका प्रलय भी उपादानसे भिन्नमें नहीं देखा गया है ॥२५ ॥

और इस हेतुसे मी ब्रह्म प्रकृति है, क्योंकि ब्रह्मप्रक्रिया में ' तदात्मानं ० ' ( उसने स्वयं अपनेको ही नामरूपात्मक जगत् - रूपसे रचा ) इस प्रकार यह श्रुति आत्माको कर्म और कर्तृरूपसे दिखलाती है । ' आत्मानम् ' इस पदसे कर्मत्व और ' स्वयमकुरुत ' इस पदसे आत्मामें कर्तृत्व दिखलाती है । परन्तु पूर्व-सिद्ध एवं कर्तारूपसे व्यवस्थित पदार्थको क्रियाविषयत्व कैसे सम्पादन किया जा सकता है? परिमाणसे, सत्यानन्दी -दीपिका * ‘ तदात्मानं स्वयमकुरुत ' इस श्रुति में ' आत्मानम् ' यह द्वितीयान्तपद II कर्मवाचक है और ' तत् स्वयमकुरुत ' यह प्रथमान्त ' तत् ' पद कर्तृवाचक है, एकमें ही कर्मकर्तृभाव विरुद्ध है । आत्म-

पृष्ठ 366

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 366 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य अ ० १ पा ० ४ मादिति ब्रूमः । पूर्वसिद्धोऽपि हिं सन्नात्मा विशेषेण विकारात्मना परिणमयामासात्मान-मिति । विकारात्मना च परिणामो मृदाद्यासु प्रकृतिषूपलब्धः । स्वयमिति च विशेषणान्नि-मित्तान्तरानपेक्षत्वमपि प्रतीयते । परिणामादिति वा पृथक्सूत्रम् । तस्यैषोऽर्थः- इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मण एव विकारात्मना परिणामः सामानाधिकरण्येनाम्नायते ' सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च ' ( तै ० २२६ ) इत्यादिनेति ॥ २६ ॥

योनिश्व हि गीयते ॥ २७॥;

पदच्छेद - योनिः च, हि, गीयते । सूत्रार्थ - ( हि ) क्योंकि ( योनिश्च गीयते ) ' यद्भूतयोनि परिपश्यन्ति ' यहाँ प्रकृतिवाचक योनि शब्दसे मी आत्मा कहा गया है, अतः ब्रह्म ही उपादान और निमित्तकरण है । इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्म योनिरित्यपि पठ्यते वेदान्तेषु कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ' ( मुण्ड ० ३।१।३ ) इति । ' यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ' ( मुण्ड ० १।१।६ ) इति च । योनिशब्दश्च प्रकृतिवचनः समधिगतो लोके - ' पृथिवी योनिरोषधिवनस्पतीनाम् ' इति । स्त्रीयो-नेरप्यस्त्येवावयवद्वारेण गर्भ प्रत्युपादानकारणत्वम् । क्वचित्स्थानवचनोऽपि योनिशब्दो ऐसा हम कह सकते हैं । पूर्वसिद्ध होते हुए की आत्माने अविद्याबलसे अपनेको [ आकाशादि ] विशेष विकाररूपसे परिणत किया । विकाररूपसे परिणाम मृत्तिका आदि उपादानकारणोंमें उपलब्ध है । यहाँ ' स्वयम् ' इस विशेषणसे प्रतीत होता है क उसे अन्य निमित्तको अपेक्षा भी नहीं | अथवा ' परिणा-मात् ' इतना अंश पृथक् सूत्र है । उसका यह अर्थ है कि इस कारण से भी ब्रह्म प्रकृति है, क्योंकि ‘ सच्च-त्यच्चाभवत् ' ( वह ब्रह्म ही मूर्त और अमूर्त हुआ, निर्वचन योग्य तथा निर्वचन के अयोग्य सब हुआ ) इत्यादि श्रुति सामानाधिकरण्यसे ब्रह्मका ही विकाररूपसे यह परिणाम कहती है ॥ २६ ॥

और इस हेतुसे भी ब्रह्म प्रकृति है, क्योंकि ' कर्तारमीशं ' ( ब्रह्माके भी उत्पत्तिस्थान उस जगत्कर्ता ईश्वर पुरुषको देखता है ) और ' यद्भूतयोनिं ० ' ( जो सम्पूर्ण भूतोंका कारण उसे विवेकी लोग सब ओर देखते हैं ) इसप्रकार वेदान्तों- उपनिषदों में ब्रह्म योनि है, ऐसा भी पढ़ा जाता I ' पृथिवी योनि ० ' ( ओषधि और वनस्पतिकी योनि पृथिवो है ) इसप्रकार व्यवहारमें निश्चित किया जाता है कि योनिशब्द प्रकृति वाचक है । स्त्रीकी योनि मी अवयव - शोणित द्वारा गर्भके प्रति उपादान सत्यानन्दी - दीपिका सम्बन्धी कृति - व्यापार आत्मकृति कही जाती है । कृतिके साथ आत्माका सम्बन्ध विषयरूपसे और आश्रयरूपसे है । पूर्वसिद्ध पदार्थ कृतिका आश्रय और विषय साध्य होता है, इसलिए एक हीं आत्मा कृतिका आश्रय - कर्ता और विषय कर्म हो यह विरुद्ध है? परन्तु पूर्वं सिद्ध वस्तु भी साध्य होती है, जैसे मृत्तिका आदि उपादानकारणों में घट आदिका विकाररूपसे परिणाम उपलब्ध होता है, वैसे आत्माका मी परिणाम हो सकता है । यहाँ परिणामका अर्थ विवर्त है । इसलिए ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( तत् पद वाच्य आत्माने स्वयं अपनेको साध्य - जगद्रूपसे परिणत किया ) यहाँ आत्मा ही कृतिका कर्म और कृतिका आश्रय - कर्ता है | ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि श्रुति भी आत्मा ही सर्वात्मक है ऐसा कहती हैं । जैसे रज्जु सर्प आदि आकारसे प्रतीत होनेपर भी स्वयं विकार रहित है, वैसे ब्रह्म जगद्रूप परिणत होनेपर भी स्वयं विकार रहित है । अब ' परिणामात् ' इतने अंशको पृथक् सूत्र मानकर व्याख्या करते हैं- जैसे ' मृद्घट: ' ( घट मृत्तिका है ) इस सामानाधिकरण्यसे मृत्तिका घटका उपादानकारण है, वैसे ‘ सच्च त्यच्चाभवत् ' ( ब्रह्म मूर्त - पृथिवी, जल और तेज, अमूर्त - वायु और आकाश हुआ ) यथा ' देवदत्तो व्याघ्रोऽभवन् ' ( योगबल से देवदत्त स्वयं व्याघ्र हुआ ) इत्यादि श्रुति, स्मृति से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म ही उभयकारण है ॥ २६ ॥

पृष्ठ 367

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 367 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ८ सू ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३३३ दृष्ट: -- ' योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारि ' ( ऋ ० सं ० १।१०४ | १ ) इति । वाक्यशेषात्त्वत्र प्रकृति-वचनता परिगृह्यते ' यथोर्णनामिः सृजते गृह्णते च ' ( मु ० १ | १ | ७ ) इत्येवंजातीयकात् । एवं प्रकृतित्वं ब्रह्मणः प्रसिद्धम् । यत्पुनरिदमुक्तमीक्षा पूर्वकं कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलाला-दिषु लोके दृष्टं नोपादानेष्वित्यादि, तत्प्रत्युच्यते - न लोकवदिह भवितव्यम् । न ह्ययमनु-मान गभ्यो ऽर्थः । शब्दगम्यत्वात्वस्यार्थस्य यथाशब्दमिह भवितव्यम् । शब्दरचेक्षितुरी-श्वरस्य प्रकृतित्वं प्रतिपादयतीत्यवोचाम । पुनश्चैतत्सर्वं विस्तरेण प्रतिवक्ष्यामः || २७ || ( ८ सर्वव्याख्यानाधिकरणम् सू ० २८ ) एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ॥ २८ ॥

पदच्छेद - एतेन, सर्वे, व्याख्याताः, व्याख्याताः । सूत्रार्थ - ( एतेन ) प्रधान कारणवादके निराकरण से ( सर्वे ) अणु, स्वभाव, असत् आदि को जगत्का कारण मानने वालोंके मत मी ( व्याख्याता: ) निराकृत समझने चाहिए, ' व्याख्याताः ' इस पदका अभ्यास- दूसरी वार उच्चारण अध्याय समाप्तिका द्योतक है । * ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | ५ ) इत्यारभ्य प्रधानकारणवादः सूत्रैरेव पुनः पुनराशङ्कय निराकृतः, तस्य हि पक्षस्योपोद्बलकानि कानिचिल्लिङ्गाभा सानि वेदान्तेष्वापातेन मन्दमती प्रतिभान्तीति । स च कार्यकारणानन्यत्वाभ्युपगमात्प्रत्यासन्नो वेदान्तवादस्य । देवल प्रभृतिभिश्च कैश्विद्धर्मसूत्रकारैः स्वग्रन्थेष्वाश्रितः, तेन तत्प्रतिषेधे यत्नोऽतीव कृतो नावा-कारण ही है । ' योनिष्ट इन्द्र ' ( हे इन्द्र! आपके बैठनेके लिए मैंने स्थान बनाया है ) इस प्रकार कहीं स्थान वाचक भो योनि शब्द देखा गया है । किञ्च ' यथोर्णनामिः ० ' ( जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाति और निगल जाती हैं ) इसप्रकार के वाक्यशेषसे यहाँ योनिशब्द प्रकृति वाचक ग्रहण किया. जाता है । इसप्रकार ब्रह्ममें उपादानकारणत्व प्रसिद्ध है । ईक्षापूर्वक कर्तृत्व लोकमें कुम्हार आदि निमित्तकारणों में देखा गया है उपादानकारणोंमें नहीं, इत्यादि जो कहा गया है, उसका निराकरण करते हैं — यहाँ लोकके समान नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह अनुमानगम्य अर्थ नहीं है, किन्तु शब्दगम्य है,. अत: इस अर्थको तो यहाँ शब्द - श्रुतिके अनुसार होना चाहिये । ऐसा हम कह चुके हैं कि शब्द - वेद ईक्षण कर्ता ईश्वर प्रकृति है ऐसा प्रतिपादन करता है । और पुन: यह सब विस्तार पूर्वक

आगे भी [ ब्र ० सू ० २।१।४ इत्यादि सूत्रोंसे ] कहेंगे ॥ २७ ॥

' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' इस सूत्र से आरम्भ कर अन्य सूत्रोंद्वारा ही पुनः पुनः आशङ्का कर प्रधान-कारणवादका निराकरण किया गया है, क्योंकि मन्दमतियों को उस पक्षके पोषक कुछ लिङ्गामास वेदान्तों में आपाततः प्रतीत होते हैं, वह पक्ष कार्य कारणका अभेद स्वीकार करनेसे वेदान्तवादके अति-निकटवर्ती है और देवलादि कुछ धर्म सूत्रकारोंने अपने ग्रन्थोंमें उसको आश्रय दिया है । इससे उसके प्रतिषेध में अत्याधिक यत्न किया गया है, किन्तु परमाणु आदि कारणवादके प्रतिषेधमें अत्यधिक यत्न नहीं सत्यानन्दी - दिपिका ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' आदि अशब्दत्वादि हेतुओंसे जैसे प्रधान कारणवादका निराकरण किया गया है, वैसे यहाँ अणु, स्वभाव, असत् कारणवादका निराकरण नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके लिए भी कारणत्व बोधक शब्द सुने जाते हैं, इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष है । छां. अ. ६, में यह प्रसंग है - अदृश्य सदात्मासे दृश्य जगत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? श्वेतकेतुकी इस शङ्काकी निवृति करने तथा जगत् के कारणको समझाने के लिए उह लकने कहा - हे सोम्य! इन बटबीजों में से एक बीजको तोड़ो । उद्दालक - इसमें क्या देखते हो? श्वेतकेतु - ' न किञ्चन ' कुछ भी नहीं । उद्दालक - ' एतमणिमानं ' इस अणिमाको नहीं देखते हो? हे प्रिय! जिस सुक्ष्म दुर्लक्ष्य बीजको तुम नहीं देखते इसीसे यह

पृष्ठ 368

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 368 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ४ दिकारणवादप्रतिषेधे । तेऽपि तु ब्रह्मकारणवादपक्षस्य प्रतिपक्षत्वात्प्रतिषेद्धव्याः । तेषामप्यु-पोलकं वैदिकं किं चिलिङ्गमापातेन मन्दमतीन्प्रतिभायादिति । अतः प्रधानमलुनिबर्हणन्या-येनातिदिशति - एतेन प्रधानकारणवादप्रतिषेधन्याय कलापेन सर्वेऽण्वादिकारणवादा ि प्रतिषिद्धतया व्याख्याता इति पदाभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्तिं द्योतयति ॥२८ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कर भगवत्पूज्यपादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये प्रथमाध्याये चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥

इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्ये समन्वयाख्यः प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥

किया गया । परन्तु ब्रह्म कारणवाद पक्षके प्रतिपक्ष होनेसे वे भी प्रतिषेध करनेके योग्य हैं । क्योंकि मन्दमतियोंको आपाततः उनके भी पोषक कुछ वैदिक लिङ्ग प्रतीत हो सकते हैं, इसलिए प्रधानमल्ल-निबर्हणन्यायसे अतिदेश करते हैं - इससे - प्रधान कारणवादके प्रतिषेधक न्याय समुदायसे सब अणु आदि कारणवाद मी प्रतिषिद्धरूपसे व्याख्यात हुए समझने चाहिए, कारण कि वे भी प्रधान समान अशब्द और शब्द- श्रुति विरूद्ध हैं । ' व्याख्याता व्याख्याता: ' इसप्रकार पदका अभ्यास - दो बार उच्चारण अध्याय समाप्तिका द्योतक है ॥२८ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवाद के प्रथमाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका महान् वटवृक्ष उत्पन्न होता है, एवं इस संसार वृक्षका बीज भी सुक्ष्म तथा दुर्लक्ष्य है । इसमें ' न किञ्चन ' शब्दसे शून्यवाद और स्वभाववादकी प्रतीति होती है और अणु शब्दसे परमाणुवाद प्रतीत होता है । एवं ' असदेवेदमग्र आसीत् ' ( छा ० ३।१ ९ ।१ ) ' न किंचन भगव ' ( छा ० ६।१२।१ ) आदि श्रुतिसे शून्यवाद, ' अण्व्य इवेमे धाना ' ( छा ० ६।१२।१ ) ' अणोरणीयान् ' ( क ० २।२० ) आदि श्रुतिसे परमाणुवाद, ' तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियत ' ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' आदि श्रुति से स्वभाववाद सिद्ध होता है । ये अणु आदि वाद श्रुति संगत हैं कि नहीं? ऐसा संशय होनेपर श्रुतिमें असत्, अणु आदि पद उपलब्ध होते हैं, अतः उक्तवाद श्रोत हैं अर्थात् श्रुति संगत हैं । सिद्धान्ती - उपक्रम और उपसंहार आदि लिङ्गोंसे निर्णीत एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञाके अनुकूल होनेसे मृत्तिका आदि दृष्टान्त मुख्य हैं और प्रतिज्ञाके प्रतिकूल होनेसे असद् आदि वाद असम्भव हैं । तत् तत् वाद समर्थक लिङ्गाभासोंकी तरह उक्त श्रुतिवाक्य और वटधान आदि दृष्टान्त गौण हैं । ' महतो महीयानू ' ( कठ ० ११२।२० ) इत्यादि श्रुतिवाक्य जगत् के कारणभूत ब्रह्ममें दुर्लक्ष्यताका बोध कराते हैं, यहाँ ' असत् ' शब्द प्रत्यक्षके अयोग्य वस्तुका प्रतिपादक है और ' अणु ' पद सूक्ष्मपरक है । वस्तुतः ‘ सदेव सोम्येदमग्र आसीत्, ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि श्रुतिके बलसे असद्, शून्य आदि वाद उपपत्ति-हीन होनेसे अप्रामाणिक हैं । अतः यहाँ प्रधानमल्लनिबर्हणन्यायसे व्यवस्था समझनी चाहिए । प्रधान कारणवादकी तरह परमाणु कारणादि वाद भी श्रुतिसे अप्रतिपादित और ब्रह्मकारणवादसे बाधित हैं । इससे यह सुतरां सिद्ध होता है कि समस्त जगत्का ब्रह्म ही परम कारण है और उसमें ही सब वेदान्तों-का समन्वय है । पूर्वपक्ष में ब्रह्म में वेदान्त समन्वयकी असिद्धि, सिद्धान्तमें समन्वयकी सिद्धि है । प्रतिज्ञालक्षणं लक्ष्यमाणे पदसमन्वयः । वैदिकः स च तत्रैव नान्यत्रेत्यत्र साधितम् ॥ यहाँ इस ग्रन्थके प्रथम सूत्र में ब्रह्मविचारकी प्रतिज्ञा, द्वितीय सूत्र में जगत् कारणरूपसे ब्रह्मका लक्षण, तृतीय सूत्रमें ब्रह्ममें प्रमाण प्रदर्शन और चतुर्थं सूत्रमें लक्ष्यमाण स्वत: सिद्ध प्रत्यगभिन्न ब्रह्म में श्रुति शास्त्रका समन्वय सिद्ध किया गया है । शेष ग्रन्थसे प्रकृत ब्रह्ममें ही शास्त्रका समन्वय और अन्यत्र समन्वययाभावका प्रतिपादन किया गया है ॥ २६ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के प्रथमाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥४ ॥

पृष्ठ 369

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 369 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ द्वितीयोऽध्यायः [ द्वितीये अविरोधाख्याध्याये प्रथमपादे सांख्ययोगकाणादादिस्मृतिभिः सांख्यादिप्रयुक्त तर्केश्व वेदान्तसमन्वयविरोधपरिहारः ] अविरोध नामक द्वितीयाध्यायके प्रथम पादमें सांख्य, योग, काणादादि स्मृतियों और साँख्य आदि द्वारा प्रयुक्त तर्कोंसे वेदान्त समन्वय पर किये गये विरोधोंका परिहार है । ( १ स्मृत्यधिकरणम् सू ० १-२ ) * प्रथमेऽध्याये सर्वज्ञः सर्वेश्वरो जगत उत्पत्तिकारणम्, मृत्सुवर्णादय इव घटरुच-कादीनाम्, उत्पन्नस्य जगतो नियन्तृत्वेन स्थितिकारणम्, मायावीव मायायाः । प्रसारितस्य च जगतः पुनः स्वात्मन्येवोपसंहारकारणम्, अवनिरिव चतुर्विधस्य भूतग्रामस्य । स एव च सर्वेषां न आत्मेत्येतद्वेदान्तवाक्य समन्वय प्रतिपादनेन प्रतिपादितम् । प्रधानादिकारणवादा-वाशब्दत्वेन निराकृताः । इदानीं स्वपक्षे स्मृतिन्यायविरोधपरिहारः, प्रधानादिवादानांच न्यायाभासोपबृंहितत्वम्, प्रतिवेदान्तं च सृष्ट्यादिप्रक्रियाया अविगीतत्वमित्यस्यार्थजातस्य प्रतिपादनाय द्वितीयोऽध्याय आरभ्यते । तत्र प्रथमं तावत्स्मृतिविरोधमुपन्यस्य परिहरति-जैसे मृत्तिका, सुवर्ण आदि घट, आभूषण आदिके कारण हैं, वैसे ही सर्वज्ञ, सर्वेश्वर जगत् की उत्पत्तिका कारण है, जैसे मायावी मायाका नियन्तारूपसे स्थितिका कारण है, वैसे ही सर्वज्ञ सर्वेश्वर नियन्तारूपसे उत्पन्न हुए जगत् की स्थितिका कारण है, और जैसे पृथिवी चार प्रकारके ( जरायुज, आण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदिज ) प्राणियोंके उपसंहारका कारण है अर्थात् इनका अपनेमें उपसंहार कर लेती है, वैसे ही सर्वज्ञ सर्वेश्वर प्रसारित जगत् के पुनः अपने में ही उपसंहारका कारण है । वही हम सबका आत्मा है, ऐसा प्रथम अध्यायमें वेदान्तवाक्योंके समन्वय प्रतिपादनद्वारा प्रतिपादित किया गया है । और प्रधान आदि कारणवादोंका भी श्रुति - अप्रतिपादितरूप हेतुसे निराकरण किया गया । अब अपने पक्षमें स्मृति और न्यायके विरोधका परिहार, प्रधान आदि कारणवादोंकी न्याया-मासकता - भ्रान्तिमूलकता और प्रत्येक उपनिषद् में सृष्टि आदि प्रकियाका अविरोध, इस विषय समुदायका प्रतिपादन करनेके लिए यह दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है । इन सबमें से पहले स्मृतिविरोधका उपन्यासकर परिहार करते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका * प्रथम और द्वितीय अध्यायका परस्पर विषयविषयिभाव सम्बन्ध है, क्योंकि प्रथम अध्यायमें वर्णित विषयको लेकर ही इस अध्यायमें आक्षेप और समाधान हैं, इसलिए प्रथम अध्याय विषय है और दूसरा अध्याय विषयी | जन्मादि सूत्रसे लेकर ऐसा कहा गया है कि जगत् की उत्पत्ति आदिका कारण ब्रह्म है । ‘ शास्त्रदृष्ट्या ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | ३१ ) इत्यादि सूत्रोंसे ' वही अद्वितीय ब्रह्म सबका आत्मा है ' ऐसा प्रतिपादन किया गया है । ' आनुमानिकमध्ये केषाम् ' ( ब्र ० सू ० १।४।१ ) इत्यादि सूत्रोंमें ब्रह्म से भिन्न प्रधान आदि कारण श्रुतिसे अप्रतिपादित हैं ऐसा दिखलाया गया है । इस प्रकार प्रथमा -ध्यायके अर्थका अनुवादकर उसी अर्थ में विरोधका परिहार करनेवाले द्वितीयाध्याय के अर्थका पाद क्रमानुसार ' इदानीम् ' इत्यादिसे संक्षेपसे वर्णन किया जाता है । श्रुतियोंका जो ब्रह्ममें समन्वय किया गया है उसमें सांख्य आदि स्मृतियों और युक्तियोंसे जो विरोध उपस्थित होता है, उसका इस अध्यायके प्रथमपादमें परिहार किया जाता है । द्वितीयपादमें अविरोध दिखलानेके लिए सांख्यस्मृतियोंमें भ्रान्तिमूलकता दिखाई गई है । तृतीयपादमें प्रत्येक उपनिषद् में सृष्टिश्रुतियों, जीव श्रुतियों और आकाश आदि महाभूतोंका जन्म और लय क्रम आदि कथनसे अविरोध प्रतिपादित है । और चतुर्थ

पृष्ठ 370

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 370 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ॥ १ ॥

पदच्छेद – स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गः, इति चेत्, न अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् । सूत्रार्थ - ( स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गः ) ब्रह्म जगत्का कारण होनेपर कपिल प्रणीत स्मृतिसे अनवकाश दोष प्रसंग होगा, इससे वेदान्तोंका ब्रह्ममें समन्वय विरुद्ध है । ( इति चेन्न ) ऐसा यदि. कहो तो यह युक्त नहीं है, ( अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ) चेतनकारणवादी अन्य मनु आदि स्मृतियोंमें अनवकाश दोष प्रसंग आजायगा, अतः श्रुत्यनुसारी स्मृति प्रमाण है और तद्भिन्न स्मृति अप्रमाण है, इससे समन्वयका विरोध नहीं । * यदुक्तं ब्रह्मैव सर्वज्ञं जगतः कारणमिति, तदयुक्तम्ः कुतः? स्मृत्यनवकाशदोष-प्रसङ्गात् । स्मृतिश्च तन्त्राख्या परमर्षिप्रणीता शिष्टपरिगृहीता; अन्याश्च तदनुसारिण्यः स्मृतयः, ता एवं सत्यनवकाशाः प्रसज्येरन् । तासु ह्यचेतनं प्रधानं स्वतन्त्रं जगतः कारणमुप-निबध्यते । मन्वादि स्मृतयस्तावच्चोदनालक्षणेनाग्निहोत्रादिना धर्मजातेनापेक्षितमर्थ समर्प-यन्त्यः सावकाशा भवन्ति । अस्य वर्णस्यास्मिन्कालेऽनेन विधानेनोपनयनम्, ईदृशश्चाचारः, इत्थं वेदाध्ययनम्, इत्थं समावर्तनम्, सहधर्मचारिणीसंयोग इति । तथा पुरुषार्थांश्च वर्णा-श्रमधर्मान्नानाविधान्विदधति । नैवं कपिलादिस्मृतीनामनुष्ठेये विषयेऽवकाशोऽस्ति । मोक्ष-साधनमेव हि सम्यग्दर्शनमधिकृत्य ताः प्रणीताः । यदि तत्राप्यनवकाशाः स्युरानर्थक्य-मेवासां प्रसज्येत । तस्मात्तदविरोधेन वेदान्ता व्याख्यातव्याः । * कथं पुनरीक्षत्यादिभ्यो हेतुभ्यो ब्रह्मैव सर्वशं जगतः कारणमित्यवधारितः श्रुत्यर्थः स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गेन पुन-जो यह कहा गया है कि सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण है, वह अयुक्त है, किससे? इससे कि स्मृतियोंसे अनवकाशरूप दोषका प्रसंग है । शास्त्र नामक वह स्मृति परम ऋषिद्वारा प्रणीत और शिष्ट-पुरुषसे गृहीत और तदनुसारी अन्य स्मृतियां भी हैं । ब्रह्म जगत्का कारण होनेपर वे ( सब स्मृतियाँ ) अनवकाश - व्यथं हो जायँगी, क्योंकि उनमें अचेतन प्रधान स्वतन्त्ररूपसे जगत्‌का कारण उपनिबद्ध - अङ्गी-कृत है । मनु आदि स्मृतिग्रन्थ तो चोदनात्मक - विध्यात्मक विधि प्रमाणक अग्निहोत्रादि धर्मं समूहसे अपे-क्षित अर्थका वर्णन करते हुए सावकाश होते हैं । इस वर्णका इस कालमें - इस विधान ( विधि ) से उपनयन, इस प्रकारका आचार, इस तरहसे वेदाध्ययन, इस प्रकार समावर्तन, इस तरह अपनी पत्नी के साथ व्यवहार ये सब उनमें प्रतिपादित हैं । तथा पुरुषार्थीको ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको ) और वर्णाश्रमोंके विविध धर्मोको विधान करते हैं । ऐसी परिस्थितिमें कपिल आदि प्रणीत स्मृतियोंका अनुष्ठेय विषयमें अवकाश नहीं है, क्योंकि मोक्षके साधन तत्त्वज्ञानको अधिकृतकर ही वे प्रणीत हुई हैं । यदि वहाँ भी अनवकाश ( अवकाशरहित ) हुई तो अनर्थक हो जायँगी, इसलिए जैसे कपिल आदि स्मृतियोंके साथ विरोध न हो ऐसे ही वेदान्तवाक्योंका व्याख्यान करना चाहिए । जब कि ईक्षति आदि हेतुमसे सत्यानन्दी - दीपिका पादमें लिङ्गशरीर श्रुतियोंका अविरोध प्रतिपादित है । यही विषय सुखपूर्वक समझने के लिए ' द्वितीये स्मृतितर्काभ्यामविरोधोऽन्यदुष्टता । भूतभोक्तृश्रुते लिङ्गश्रुतेरप्यविरुद्वता ॥ ' ( द्वितीय अध्याय में स्मृति और तर्कसें श्रुतिका अविरोध, अन्य मतोंकी असाधुता, भूतश्रुति, जीव-भोक्तृ श्रुति और लिङ्गशरीर श्रुतियोंका अविरोध कहा गया है ) इस श्लोक में संगृहीत है । अज्ञात अर्थ में विरोधकी शङ्का और समाधान अयुक्त हैं, इसलिए समन्वयाध्यायके अनन्तर अविरोधाध्यायका आरम्भ युक्त है । अतः सबसे पूर्व सांख्य आदि स्मृति विरोधका उपन्यासकर उसका परिहार करते हैं । * अवकाश रहित सांख्यस्मृति से सावकाशवेदका इस अर्थ में संकोच करना चाहिए, क्योंकि सावकाश और निरवकाश दोनोंका परस्पर विरोध होनेपर निरवकाश बलवाम् होता है, यह नियम है ।