श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 371–380

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 371–380

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३३७ राक्षिप्यते? भवेदयमनाक्षेपः स्वतन्त्रप्रज्ञानाम् । परतन्त्रप्रज्ञास्तु प्रायेण जनाः स्वातन्त्र्येण श्रुत्यर्थमवधारयितुमशक्नुवन्तः प्रख्यातप्रणेतृकासु स्मृतिष्ववलम्बेरन् । तद्बलेन च श्रुत्यर्थं प्रतिपित्सेरन् । अस्मत्कृते च व्याख्याने न विश्वस्युर्बहुमानात्स्मृतीनां प्रणेतृषु । कपिलप्रभृ-तीनां चार्षं ज्ञानमप्रतिहतं स्मर्यते । श्रुतिश्च भवति ' ऋषि प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जाय-मानं च पश्येत् ' ( श्वे ०५।२ ) इति । तस्मान्नैषां मतमयथार्थं शक्यं संभावयितुम् । तविष्टम्भेन चैतेऽर्थं प्रतिष्ठापयन्ति । तस्मादपि स्मृतिबलेन वेदान्ता व्याख्येया इति पुत्रराक्षेपः । तस्य समाधिः- नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गादिति । यदि स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गेनेश्वरकारण-वाद आक्षिप्येत, एवमप्यन्या ईश्वरकारणवादिन्यः स्मृतयोऽनवकाशाः प्रसज्येरन् । ता उदा-हरिष्यामः - ' यत्तत्सूक्ष्ममविज्ञेयम् ' इति परं ब्रह्म प्रकृत्य ' स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते ' इति चोक्त्वा ' तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम ' इत्याह । तथान्यत्रापि ' अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्म-न्निर्गुणे संप्रलीयते ' इत्याह । ' अतश्च संक्षेपमिमं शृणुध्वं नारायणः सर्वमिदं पुराणः । स सर्गकाले सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण है, यह श्रुत्यर्थं भली प्रकार निर्णीत हो चुका है, तब स्मृतिके अनवकाश दोष प्रसंगसे श्रुत्यर्थंपर पुनः आक्षेप क्यों किया जाता है? श्रुत्यर्थ समझने में स्वतन्त्र बुद्धि रखनेवाले विद्वज्जनोंके लिए यह आक्षेप नहीं है, किन्तु प्रायः परतन्त्र बुद्धिवाले मनुष्य स्वतन्त्ररूपसे श्रुत्यर्थंका निर्णय करनेमें असमर्थ होते हुए प्रसिद्ध व्यक्तियोंद्वारा प्रणीत स्मृतियोंका अवलम्बन करेंगे और उनके बलसे श्रुत्यर्थ जानना चाहेंगे । स्मृतियोंके प्रणेताओं पर अधिक आदर होने के कारण संभवतः वे हमारे किये गये व्याख्यानपर विश्वास न करें । कपिल आदिका ज्ञान आर्ष और अप्रतिहत है ऐसी स्मृति है । ' ऋषि प्रसूतं ० ' ( जिसने सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए कपिल ऋषि ( हिरण्यगर्भ ) को ज्ञानोंसे सम्पन्न किया और जन्म लेते हुए भी देखा ) ऐसी श्रुति भी है । इसलिए उनके मतको अयथार्थं कहना संभव नहीं हो सकता । वे तर्कके बलसे अर्थका स्थापन करते हैं, इससे भी स्मृतिके बलसे वेदान्तों-उपनिषदों का व्याख्यान करना चाहिए, ऐसा पुनः आक्षेप होता है । सिद्धान्ती - उसका समाधान करते हैं — यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर अन्य स्मृतियोंमें अनवकाश दोष प्रसंग होगा । यदि सांख्यस्मृतिके अनवकाश दोष प्रसंगसे ईश्वर कारणवाद पर आक्षेप किया जाय तो इसप्रकार ईश्वर कारण प्रतिपादक अन्य ( मनु आदि ) स्मृतियाँ भी अनवकाश दोष से प्रसक्त हो जायँगी । उनको हम उद्धृत करते हैं - ' यत्तत्सूक्ष्म ० ' ( जो वह सूक्ष्म और अविज्ञेय है ) इसप्रकार परब्रह्मको प्रस्तुतकर ' स ह्यन्तरात्मा ० ' ( निश्चित वह भूतोंका अन्तरात्मा और क्षेत्रज्ञ है, ऐसा कहा जाता है ) ऐसा कहकर ' तस्मादव्यक्त ' ( हे द्विजश्रेष्ठ! उससे त्रिगुणात्मक अव्यक्त - नाम - रूपसे • अनभिव्यक्त जगत् उत्पन्न हुआ ) ऐसा कहा है । उसीप्रकार अन्य स्थलोंमें भी ' अव्यक्तं ० ' ( हे ब्रह्मन्! निर्गुण पुरुषमें अव्यक्त लीने होता है ऐसा कहा है । और ' अतश्च ' संक्ष ेपमिमं ० ' ( तुम यह संक्षेपसे सुनो, यह समस्त जगत् पुराण पुरुष नारायणरूप है । वह सृष्टिकाल में सबको उत्पन्न करता है सत्यानन्दी - दीपिका * अतीन्द्रिय अर्थोके ज्ञाता होनेसे ऋषिलोग श्रद्धेय होते हैं, अतः उनसे प्रणीत स्मृतियों पर विश्वास किया जाता है । कहा भी गया है कि ' भादौ यो जायमानं च कपिलं जनयेदृषिम् । प्रसूतं विभृयाज्ज्ञानैस्तं पश्येत्परमेश्वरम् ॥ ' ( जिसने आरम्भमें उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको उत्पन्न होनेके अनन्तर ज्ञानोंसे - धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्योंसे सम्पन्न किया उस परमेश्वरका दर्शन करें ) इससे कपिलका महत्त्व व्यक्त किया गया है । ' प्रत्यक्षमनुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् ' ( प्रत्यक्ष, अनुमान और विविध आगम युक्त शास्त्र ) इत्यादि और ' यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ' ( जो तकंसे अर्थका अनुसंधान करता है वह धर्मको जानता है दूसरा नहीं ) इससे तर्क भी निर्णायक

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३३८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ च करोति सर्वं संहारकाले च तदत्ति भूयः ॥ ' इति पुराणे । भगवद्गीतासु च - ' -'अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ' ( भ ० गी ० ७/६ ) इति । परमात्मानमेव च प्रकृत्यापस्तम्बः पठति-' तस्मात्कायाः प्रभवन्ति सर्वे स मूलं शाश्त्रतिकः स नित्यः ' ( ४० सू ० १।८।२३।२ ) इति । एवमने-कशः स्मृतिष्वपीश्वरः कारणत्वेनोपादानत्वेन च प्रकाश्यते । * स्मृतिबलेन प्रत्यवतिष्ठमा-नस्य स्मृतिबलेनैवोत्तरं वक्ष्यामीत्यतोऽयमन्यस्मृत्यनवकाशदोषोपन्यासः । दर्शितं तु श्रुती-नामीश्वरकारणवादं प्रति तात्पर्यम् । विप्रतिपत्तौच स्मृतीनामवश्यकर्तव्येऽन्यतरपरिग्रहे-ऽन्यतरपरित्यागे च श्रुत्यनुसारिण्यः स्मृतयः प्रमाणम्, अनपेक्ष्या इतराः । तदुक्तं प्रमाणल-क्षणे - विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम् ' ( जै ० सू ० १ | ३ | ३ ) इति । न चातीन्द्रियानर्थाञ्श्रुतिम-न्तरेण कश्चिदुपलभत इति शक्यं संभावयितुम्; निमित्ताभावात् । शक्यं कपिलादीनां सिद्धा-नामप्रतिहतज्ञानत्वादिति चेत् - नः सिद्धेरपि सापेक्षत्वात् । धर्मानुष्ठानापेक्षा हि सिद्धिः । स च धर्मश्चोदनालक्षणः । ततश्च पूर्वसिद्धायाश्चोदनाया अर्थो न पश्चिम सिद्धपुरुषवचनवशेना-तिशङ्कितुं शक्यते । सिद्धव्यपाश्रय कल्पनायामपि बहुत्वात्सिद्धानां प्रदर्शितेन प्रकारेण स्मृति-विप्रतिपत्तौ सत्यां न श्रुतिव्यपाश्रयादन्यन्निर्णयकारणमस्ति । * परतन्त्रप्रज्ञस्यापि नाकस्मा-और पुनः संहार काल में सबको अपनेमें लय करता है ) इसप्रकार पुराणमें भी कहा है । और ' अहं कृत्स्नस्य ० ' ( मैं सम्पूर्णं जगत् की उत्पत्ति और प्रलय हूँ ) ऐसा भागवद्गीता में है । परमात्माको प्रस्तुत कर आपस्तम्ब कहता है - ' तस्मात्कायाः ० ' ( उस परमेश्वरसे ब्रह्मादिसे लेकर स्तम्ब पर्यन्त सब शरीर उत्पन्न होते हैं, अतः वह उपादान है, कूटस्थ और नित्य है ) इस तरह अनेक प्रकारसे स्मृतियों में. ईश्वर निमित्त और उपादानरूपसे वर्णित है । स्मृतिके बलसे विरोध उपस्थित करनेवालेको स्मृतिबलसे ही उत्तर कहूँगा, इसलिए यह अन्य स्मृति अनवकाश दोषका उपन्यास किया है । श्रुतियोंका तात्पर्य तो ईश्वर कारणवादमें दिखलाया गया है । स्मृतियोंके परस्पर विरोध होनेपर एकका ग्रहण और अन्यका परित्याग अवश्य कर्तव्य होने से श्रुत्युनुसारी स्मृतियाँ प्रमाण हैं और अन्य स्मृतियाँ अनपेक्ष्या-अप्रमाण हैं । क्योंकि ‘ विरोधे त्वनपेक्षं ० ' ( उपलब्ध श्रुतिके साथ स्मृतिका विरोध हो, तो वह स्मृति अप्रमाणरूप है, विरोध न हो, तो श्रुतिका अनुमान होता है ) इसप्रकार प्रमाण लक्षण में वह कहा गया है | श्रुति बिना अतीन्द्रय अर्थोंको कोई उपलब्ध करता है ऐसी संभावना नहीं की जा सकती, कारण कि कोई निमित्त ( कारण ) नहीं है । यदि कहो कि अप्रतिहतज्ञान होनेके कारण कपिल आदि सिद्धोंको अतीन्द्रय अर्थों का ज्ञान हो सकता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि सिद्धि भी सापेक्ष है । सिद्धि धर्मानुष्ठानोंकी अपेक्षासे होती है । और वह धर्मं चोदनात्मक - विधि प्रमाणक है । इसलिए पूर्व-सिद्ध चोदना ( वेदका ) अर्थ अनन्तर सिद्ध पुरुषके वचनबलसे आक्षेप करनेके योग्य नहीं है । सिद्धोंके वचनका आश्रयकर वेदार्थकी कल्पना में भी सिद्ध बहुत होने के कारण प्रदर्शित प्रकारसे स्मृतियोंका विरोध होनेपर श्रुति आश्रयके बिना कोई अन्य निर्णायक नहीं है । परतन्त्र बुद्धिवाले सत्यानन्दी - दीपिका माना गया है, तो उन्होंने तर्कके बलपर ही अपने अर्थ - प्रधान कारणवाद आदिकी स्थापना की है, अतः ऋषि प्रणीत और तर्क मूलक होनेसे सांख्य स्मृतिके अनुसार ही वेदान्तोंकी व्याख्या करनी चाहिए, ऐसा पुनः आक्षेप होता है । * जैसे श्रुतियोंका गतिसामान्य से ब्रह्मकारणवादमें अविरोध है, वैसे स्मृतियोंका प्रधान कारणवादमें अविरोध नहीं है । इसलिए अविरुद्ध श्रीत अर्थ ही स्वीकार्य है । इससे श्रुति मूलक मनु आदि स्मृति ग्राह्य हैं, वेद विरुद्ध कपिल आदि प्रणीत स्मृति नहीं । * ' ऋषिं प्रसूतं कपिलं ' यहाँ सर्वज्ञ शब्दसे श्रुतिका तात्पर्य ज्ञानातिशयमें है सर्वज्ञत्वमें नहीं ।

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकालहित ३३ ९ त्स्मृतिविशेषविषयः पक्षपातो युक्तः; कस्यचित्किचित्पक्षपाते सति पुरुषमतिवैश्वरूप्येण तत्त्वाव्यवस्थानप्रसङ्गात् । तस्मात्तस्यापि स्मृतिविप्रतिपत्त्युपन्यासेन श्रुत्यनुसाराननुसार-विषयविवेचनेन च सन्मार्गे प्रज्ञा संग्रहणीया । या तु श्रुतिः कपिलस्य ज्ञानातिशयं प्रदर्शयन्ती प्रदर्शिता न तया श्रुतिविरुद्धमपि कापिलं मतं श्रद्धातुं शक्यम्: कपिलमिति श्रुतिसामान्य-मात्रत्वात्, अन्यस्य च कपिलस्य संगरपुत्राणां प्रतप्तुर्वासुदेवनाम्नः स्मरणात् । अन्यार्थ -दर्शनस्य च प्राप्तिरहितस्यासाधकत्वात् । भवति चान्या मनोर्माहात्म्यं प्रख्यापयन्ती श्रुतिः-' यद्वै किंच मनुरवदत्तद्भेषजम् ' ( तै ० सं ० २।२।१०।२ ) इति । मनुना च ' सर्वभूतेषु चात्मानं सर्व-भूतानि चात्मनि । संपश्यन्नात्मयाजी वै स्वाराज्यमधिगच्छति ॥ ' ( १२ ।९ १ ) इति सर्वात्मत्वदर्शनं प्रशंसता कापिलं मतं निन्द्यत इति गम्यते । कपिलो हि न सर्वात्मत्वदर्शनमनुमन्यते; आत्म-भेदाभ्युपगमात् । महाभारतेऽपि च ' बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ' इति विचार्य ' बहवः पुरुषा राजन्सांख्ययोगविचारिणाम् ' इति परपक्षमुपन्यस्य तद्व्युदासेन - बहूनां पुरुषाणां हि पुरुषका मी अकस्मात् - बिना कारण किसी विशेष स्मृतिके विषयमें पक्षपात युक्त नहीं है, क्योंकि किसी परतन्त्रप्रज्ञका किसी विशेष स्मृतिमें पक्षपात होनेपर पुरुष बुद्धिको विचित्रतासे तत्त्वकी अव्यवस्था हो जायगी । इससे स्मृति विरोधके उपन्याससे यह स्मृति श्रुति अनुसारी है यह स्मृति श्रुति अनुसारी नहीं है इस विषयका विवेचनकर उसकी मी बुद्धि सन्मार्ग में लानी चाहिए । जो श्रुति कपिलके ज्ञानाति-ant दिखलाती हुई दिखलाई गई है उससे श्रुति विरुद्ध कपिल मतपर श्रद्धा नहीं की जा सकती, क्योंकि ' कपिलं ' इसप्रकार केवल सामान्य श्रुति मात्र है अर्थात् सांख्य स्मृति प्रणेता कपिल और श्रुत्युक्त कपिल दोनोंमें केवल शब्द सादृश्य है । यज्ञीय अश्वकी रक्षाके लिए नियुक्त सगरके पुत्रोंको शापसे दहन करनेवाले वासुदेव नामका एक दूसरा कपिल भी स्मृतिमें प्रसिद्ध है । किसी अन्य प्रमाणसे अप्राप्त अन्यार्थदर्शन — अन्य अर्थका अनुवाद स्वार्थसाधक नहीं होता है । और ' यद्वै किञ्च ० ' ( जो कुछ मनुने कहा वह औषध है ) इस प्रकार मनुका माहात्म्य वर्णन करनेवाली दूसरी श्रुति है | ' सर्वभूतेषु ० ' ( सब भूतों में आत्माको और आत्मामें सब भूतोंको देखता हुआ आत्मयाजी निश्चय स्वराज्य ब्रह्मत्वको प्राप्त होता है ) इससे यह प्रतीत होता है कि सर्वात्मत्वदर्शनकी प्रशंसा करते हुए मनुने कपिलमतकी निन्दा की है । कपिल सर्वात्मत्व दर्शनको नहीं मानते, क्योंकि उन्होंने आत्मभेद स्वीकार किया है । महाभारत में भी ' बहवः पुरुषा ० ' ( हे ब्रह्मन्! आत्मा बहुत हैं अथवा एक ही है ) ऐसा विचारकर ' बहवः पुरुषा ० ' ( हे राजन्! सांख्य और योग दर्शनवालोंके मतमें पुरुष - आत्मा बहुत हैं अर्थात् प्रत्येक शरीरमें भिन्न - भिन्न हैं ) इस प्रकार परपक्षका उपन्यास कर उसका निराकरण करते हुए ' बहूनां पुरुषाणां ० ' ( जैसे बहुत पुरुषाकार देहोंकी एक पृथिवी उपादान कही जाती है, वैसे ही जो सबका उपादान होनेसे सर्वात्मक और सर्वगुण सम्पन्न है उस सत्यानन्दी - दीपिका ' कपिल ' इस शब्द के श्रवण मात्रसे सांख्यस्मृति प्रणेता कपिल श्रुति प्रतिपादित है, ऐसी भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि द्वैतवादी कपिलका सर्वज्ञ होना सम्भव नहीं । श्रुति प्रतिपादित सर्वज्ञान सम्पन्न कपिल वासुदेवका अंशरूप सांख्य स्मृतिप्रणेता कपिलसे भिन्न है, वह सर्वात्मत्व ज्ञानरूप सांख्यका उपदेशक है । ' ईश्वरने कपिलको ज्ञानोंसे सम्पन्न किया ' इससे यदि सांख्य स्मृति रचयिता कपिलको सर्वज्ञ मानें तो वह केवलं सर्वज्ञत्वका अनुवादमात्र है, उसकी सर्वज्ञतामें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है, इसलिए श्रुति प्रमाणसे अप्राप्त सर्वज्ञत्वका अनुवाद वास्तविक सर्वज्ञत्व अर्थको सिद्ध नहीं कर सकता । इस प्रकार द्वैतवादी कपिलकें मतमें श्रुति - मूलकताका निराकरण कर अगे ' भवति ' आदिसे अद्वैतवादी मनुके मतको श्रुति - मूलकता प्रतिपादित करते हैं ।

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३४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ यथैका योनिरुच्यते । तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥ ' इत्युपक्रम्य ' ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंस्थिताः । सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ॥ विश्वमूर्धा विश्वभुजो विश्वपादाक्षिनासिकः । एकश्चरति भूतेषु स्वैरचारी यथासुखम् ॥ ' इति सर्वात्मतैव निर्धारिता । * श्रुतिश्च सर्वात्मतायां भवति - ' यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक. एकत्वमनुपश्यतः ' ( ई ० ७ ) इत्येवंविधा । अतश्च सिद्धमात्मभेदकल्पनयापि कपिलस्य तन्त्रं वेदविरुद्धं वेदानुसारिमनुवचनविरुद्धं च न केवलं स्वतन्त्रप्रकृतिकल्पनयैवेति । वेदस्य हि निरपेक्षं स्वार्थे प्रामाण्यं रवेरिव रूपविषये । पुरुषवचसां तु मूलान्तरापेक्षं वक्तृस्मृतिव्यवहितं चेति विप्रकर्षः । तस्माद्वेदविरुद्धे विषये स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो न दोषः ॥ १ ॥

कुतश्च स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो न दोषः? इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ ॥

पदच्छेद - इतरेषाम् च, अनुपलब्धे ॥ सूत्रार्थ - ( इतरेषाम् ) सांख्य स्मृतिमें प्रसिद्ध प्रधानसे भिन्न महद् आदि तत्त्वोंकी ( अनुप-लब्धेः ) लोक अथवा वेदमें उपलब्धि न होनेसे सांख्यस्मृतिको अप्रमाण माननेमें कोई दोष नहीं है । * प्रधानादितराणि यानि प्रधानपरिणामत्वेन स्मृतौ कल्पितानि महदादीनि न तानि आत्माको कहूँगा ) ऐसा उपक्रमकर ' ममान्तरात्मा ० ( मेरा और तेरा जो अन्तरात्मा है और देह-स्थित जो अन्य आत्मा हैं, उन सबका यह साक्षिभूत है, वह कहीं पर किसीसे ग्राह्य नहीं है । लोक प्रसिद्ध देव, मनुष्य आदि सबके मस्तक उसका मस्तक है, इस प्रकार सभोकी भुजाएँ उसकी भुजा है, सबके पांद, नेत्र, नासिका उसके पाद, नेत्र, नासिका हैं, अकेला, स्वतन्त्र, सुखपूर्वक भूतोंमें विचरता है अर्थात् सबको जानता है ) इससे सर्वात्मत्व ही निर्धारित किया गया है । ' यस्मिन्सर्वाणि ० ' ( जिस समय ज्ञानी पुरुषके लिए सब भूत आत्मा ही हो गये उस समय एकत्व देखनेवाले उस विद्वान्को क्या मोह और क्या शोक है ) इस प्रकारकी श्रुति भी सर्वात्मता में है । इससे यह सिद्ध होता है कि केवल स्वतन्त्र प्रधानकी कल्पनासे ही नहीं किन्तु आत्मभेदकी कल्पनासे भी कपिलतन्त्र वेद विरुद्ध है और वेदानुसारी मनुवचनसे भी विरुद्ध है, क्योंकि जैसे सूर्यका रूपविषयमें निरपेक्ष प्रामाण्य है, वैसे ही अपने अर्थ में वेदका प्रामाण्य निरपेक्ष है । पुरुषवचनोंका प्रामाण्य तो मूलान्तरकी अपेक्षा रखता है और उसमें वक्ता के अर्थ स्मृतिका व्यवधान है, इतना महान् अन्तर है । इसलिए वेद बिरुद्ध विषय में स्मृतिका अनवकाश प्रसंग दोष नहीं है ॥ १ ॥

और स्मृति का अनवकाश प्रसङ्ग दोष क्यों नहीं है? प्रधानसे भिन्न महद् आदि तत्व जिनकी प्रधानके परिमाणरूपसे सांख्यस्मृतिमें कल्पना की गई है, वे वेद अथवा लोकमें उपलब्ध नहीं होते । लोक और वेदमें प्रसिद्ध होने के कारण भूत और सत्यानन्दी - दीपिका * सांख्य स्मृति केवल स्वतन्त्र प्रधानकी कल्पनासे वेद विरुद्ध नहीं है अपितु देह भेदसे आत्माके भेदकी कल्पनासे भी वेद विरुद्ध है! इन दोनोंका बाध्य बाधकभाव भी है - वेद अपौरुषेय होनेसे स्वतः प्रमाण है और पुरुषवाक्योंका प्रामाण्य तो वक्त के अर्थकी स्मृति और उस स्मृतिका मूलभूत प्रत्यक्ष श्रुति इन दोनोंकी कल्पनासे होता है, अतः स्मृति परतः प्रमाण है और व्यवहित है अर्थात् ' यह अर्थ प्रामाणिक है ' इस प्रमाणिकता के लिए स्मृति जब तक अपनी मूलभूत श्रुतिकी कल्पना करे तब तक स्वतः प्रमाणरूप श्रुतिसे उस अर्थका निश्चय हो जाता है, यही व्यवधान है! इस प्रकार दोनोंमें महान् भेद है । तुल्यं बलवालोंके विरोध में निरवकाशसे सावकाशका बाध होता है । यहाँ तो स्वतः प्रामाण्य ( वेद ) और परतः प्रामाण्य ( स्मृति ) का विरोध है, अतः जिसका प्रामाण्य |

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अधि ० २ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित IIIII वेदे लोके वोपलभ्यन्ते । भूतेन्द्रियाणि तावल्लोकवेदप्रसिद्धत्वाच्छक्यन्ते स्मर्तुम् । अलोक-वेदप्रसिद्धत्वात्तु महदादीनां षष्ठस्येवेन्द्रियार्थस्यन स्मृतिरवकल्पते । यदपि क्वचित्तत्पर-मिव श्रवणमवभासते, तदप्यतत्परं व्याख्यातम् ' आनुमानिकमप्येकेषाम् ' ( ब्र ० १।४।१ ) इत्यत्र । कार्यस्मृतेरप्रामाण्यात्कारणस्मृतेरव्यप्रामाण्यं युक्तमित्यभिप्रायः । तस्मादपि न स्मृत्यनव-काशप्रसङ्गो दोषः । तर्कावष्टम्भं तु ' न विलक्षणत्वात् ' ( ब्र ० २।१।४ ) इत्यारभ्योन्मथिष्यति ॥२ ॥

( २ योगप्रत्युक्त्यधिकरणम् सू ० ३ ) एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ ३ ॥

पदच्छेद - एतेन, योग:, प्रत्युक्तः । सूत्रार्थ - ( एतेन ) सांख्यस्मृतिके निराकरणसे ( योगः ) योगस्मृति भी ( प्रत्युक्तः ) निरा-कृत समझनी चाहिए | * एतेन सांख्यस्मृतिप्रत्याख्यानेन, योगस्मृतिरपि प्रत्याख्याता द्रष्टव्येत्यतिदिशति । तत्रापि श्रुतिविरोधेन प्रधानं स्वतन्त्रमेव कारणम्, महदादीनि च कार्याण्यलोकवेदप्रसि-द्धानि कल्प्यन्ते । नन्वेवं सति समानन्यायत्वात्पूर्वेणैव तद्गतम्, किमर्थं पुनरतिदिश्यते? अस्ति यत्राभ्यधिकाशङ्का । सम्यग्दर्शनाभ्युपायो हि योगो वेदे विहितः ' श्रोतव्यो मन्तव्यो इन्द्रियोंका स्मृतिमें प्रतिपादन हो सकता है, परन्तु लोक और वेदमें प्रसिद्ध न होने के कारण छठवें इन्द्रियार्थके समान महदादिका स्मृतिमें प्रतिपादन सम्भव नहीं है । यद्यपि कहीं कहीं श्रुति महदादि-परक प्रतीत होती है, उसका भी ' नानुमानिक ० ' इस सूत्र में श्रुति अतत्परत्व - महदादिका प्रतिपादन नहीं करती, ऐसा व्याख्यान किया गया है । कार्यं महद् आदि स्मृतिके अप्रमाण होनेसे कारण प्रधान स्मृतिमें मी प्रामाण्य युक्त है, ऐसा अभिप्राय है । इसलिए भी स्मृतिका अनवकाश प्रसंग दोष नहीं है । और तर्कावलम्बनका तो सूत्रकार ' न विलक्षणत्वात् ' इस सूत्र से लेकर खण्डन करेंगे ॥२ ॥

इस सांख्य स्मृतिके निराकरणसे योगस्मृति भी निराकृत समझनी चाहिए, इसप्रकार सूत्रकार इस सूत्र में पूर्वं न्यायका अतिदेश करते हैं । योगमें भी प्रधान ही स्वतन्त्र कारण है, एवं लोक और वेदमें अप्रसिद्ध महदादि कार्य हैं, ऐसी श्रुतिविरुद्ध कल्पना करते हैं, यदि सांख्यस्मृति और योगस्मृतिमें समानता है तो एक ही न्यायसे पूर्वाधिकरणके कथनद्वारा इस अधिकरणका अर्थ भी आ गया तो पुनः इसका अतिदेश किसलिए किया जाता है? इसलिए कि यहाँ अधिक आशङ्का है, ' श्रोतव्यो ० ' ( आत्माका श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए और निदिध्यासन करना चाहिए ) इसप्रकार सत्यानन्दी - दीपिका निश्चित है और जिसका कोई विरोधी नहीं है, उस वेदवाक्यसे तद्विरुद्धस्मृतिका ही बाध होता है । अतः सांख्य स्मृति भ्रान्ति मूलक है ॥ १ ॥

* जो कहीं श्रुतिमें ‘ महतः परमव्यक्तम् ' ऐसा वाक्याभास मिलता है जिसके बलपर सांख्य-स्मृति प्रणेताने प्रधान और महद् आदि तत्त्वोंकी स्वतन्त्र कल्पना की है । वस्तुतः श्रुतिका तात्पयं प्रधान आदिके प्रतिपादनमें नहीं है । इसका विशेष विचार ' आनुमानिक ० ' इस सूत्रमें किया गया है । स्मृति तो प्रमाण मूलक होकर ही प्रमाण होती है । परन्तु सांख्यस्मृति तो न श्रुतिमूलक है और न प्रत्यक्ष मूलक ही, अत: श्रुति और श्रुतिमूलक मनु आदि स्मृतियोंके साथ विरोध होनेसे सांख्य स्मृत्यनवकाश प्रसंग दोष नहीं है । यहाँ पूर्वपक्ष में स्मृतिके विरोधसे पूर्वाध्यायोक्त समन्वयको असिद्धि फल है और सिद्धान्तमें समन्वयकी सिद्धि फल है ॥ २ ॥

* यहाँ सांख्यस्मृतिके निराकरणसे योगशास्त्रके उस अंशका निराकरण समझना चाहिए

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्यं [ अ ० २ पा ० १ निदिध्यासितव्यः ' ( बृ ० २/४/५ ) इति । ' त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम् ' ( श्वे ० २।८ ) इत्यादिना चासना-दिकल्पनापुरःसरं बहुप्रपञ्चं योगविधानं श्वेताश्वतरोपनिषदि दृश्यते । लिङ्गानि च वैदि-कानि योगविषयाणि लहस्रश उपलभ्यन्ते - ' तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ' ( का ० ( २।६।१८ ) इति, ' विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ' ( का ० २।६।१८ ) इति चैवमादीनि । * योग-शास्त्रेऽपि ' अथ तत्त्वदर्शनोपायो योगः ' इति सम्यग्दर्शनाभ्युपायत्वेनैव योगोऽङ्गीक्रियते । अतः संप्रतिपन्नार्थं कदेशत्वादष्टकादिस्मृतिवद्योगस्मृतिरप्यनपवदनीया भविष्यतीति- इय-मप्यधिकाशङ्काऽतिदेशेन निवर्त्यते, अर्थकदेशसंप्रतिपत्तावप्यर्थं कदेशविप्रतिपत्तेः पूर्वो-काया दर्शनात् । सतीष्वप्यध्यात्मविषयासु बह्वीषु स्मृतिषु सांख्ययोगस्मृत्योरेव निराकरणे यत्नः कृतः । सांख्ययोगौ हि परमपुरुषार्थ साधनत्वेन लोके प्रख्यातौ, शिष्टैश्च परिगृहीतौ, लिङ्गेन च श्रौतेनोपबृंहितौ । ' तत्कारणं सांख्ययोगा-भिपन्नं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ' ( वे ० ६ । १३ ) इति । निराकरणं तु - न सांख्य-ज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निःश्रेयसमधिगम्यत इति । श्रुतिर्हि वैदिका -दात्मैकत्वविज्ञानादन्यनिःश्रेयससाधनं वारयति - ' तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः सम्यग्दर्शनका साधनभूत योग वेदमें विहित है । ' त्रिरुन्नतं ० ' ( वक्षःस्थल, ग्रीवा और शिर ये तीन जिसमें उन्नत ( उठे हुए ) रखे जाते उस त्रिरुन्नत शरीरको समानभाव से रखकर योग करे ) इत्यादि-से आसनादिकी कल्पनापूर्वक बहुत विस्तारसे योगका विधान श्वेताश्वतर उपनिषद् में देखा जं.ता है । ' तां योगमिति ० ' ( उस स्थिर इंन्द्रिय धारणाको हो योग कहते हैं ) और ' विद्यामेतां ० ' ( इस ब्रह्म-विद्या और सम्पूर्ण योगविधिको पाकर नचिकेता ब्रह्ममावको प्राप्त हो गया ) इत्यादि योगवित्रयक सहस्र वैदिक लिङ्ग उपलब्ध होते हैं । ' अथ तत्त्वदर्शन ० ' ( योग तत्त्वदर्शनका साधन है ) इसप्रकार योग-शास्त्रमें भी योगको सम्यग्दर्शन के साधनरूपसे हो स्वीकार किया गया है । इसलिए प्रामाणिक अक. अर्थका एक देश ( योगांश ) होनेसे अष्टक आदि स्मृतियोंके समान योग स्मृति भी अनिराकरणीय हो जायगी । यह अधिक शङ्का भी अतिदेशसे निवृत्त की जाती है, " क्योंकि अर्थके एक अंश में संप्रतिपत्ति ( प्रामाण्य ) होनेपर भी अर्थके एक देश ( प्रधानादि ) में पूर्वोक्त विप्रतिपत्ति - विरोध देखने में आता है । अध्यात्म-विषयक बहुत स्मृतियाँ होनेपर भी सांख्यस्मृति और योगस्मृतिके ही निराकरण में यत्न किया गया है, क्योंकि सांख्य और योग मोक्षके साधनरूपसे लोक में प्रसिद्ध हैं, शिष्टपुरुषोंसे परिगृहोत हैं, तथा ' तत्कारणं ' ( सांख्य और योगसे प्राप्त उस सर्वकारण देवको जानकर पुरुष समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ) इसप्रकार श्रोतलिङ्गसे पुष्ट हैं । किन्तु वेद निरपेक्ष सांख्यस्मृतिज्ञानसे अथवा योगमार्गसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता, इस हेतुसे दोनोंका निराकरण है । ' तमेव ० ' ( उस महान् पुरुषको जानकर ही पुरुष मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परम पद प्राप्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है ) यह श्रति वैदिक आत्मैकत्व ज्ञानसे अतिरिक्त अन्य मोक्ष साधनका निवारण करती है । निःसन्देह वे सत्यानन्दी - दीपिका जोति विरुद्ध है । जैसे कि प्रधान जगत्का स्वतन्त्र कारण है, महदादि कार्यं हैं और पुरुष अनन्त हैं, इत्यादि । यदि पूर्वाधिकरणसे योगशास्त्रका पूर्णतः खण्डन किया जाता तो तत्त्वदर्शनके साधनभूत योगशास्त्रमें प्रतिपादित यम, नियम आदिका भी खण्डन हो जाता, उनका खण्डन न हो, इस अभिप्रायसे भगवान् सूत्रकारने अतिदेशकर पृथक् अधिकरणकी रचना की है । * जैसे ' अष्टकाः कर्तव्याः ' [ अष्टका ( फाल्गुन कृष्ण अष्टमी में किया गया श्राद्ध ) श्राद्ध करना चाहिए ] ' गुरुन नु गन्तव्यः ' ( गुरुका अनुसरण करना चाहिए ) इत्यादि स्मृतियाँ वेदके अविरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेसे प्रमाणरूप हैं, वैसे योगस्मृति योग अंश में प्रमाणभूत होनेपर भी तत्त्वांश आदिमें प्रमाण नहीं हो सकती । जैसे चक्षुको रूपविषय में प्रामाण्य होनेपर भी रसविषयमें प्रमाणता नहीं

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अधि ० ३ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित ३४३ पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( श्वे ० ३।८ ) इति । द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च नात्मैकत्वदर्शिनः । यत्तु दर्शनमुक्तं ' तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम् ' इति, वैदिकमेव तत्रज्ञानं ध्यानं च सांख्ययोग शब्दा-भ्यामभिलप्यते प्रत्यासत्तेरित्यवगन्तव्यम् । येन त्वंशेन न विरुध्येते तेनेप्रमेव सांख्ययोग-स्मृत्योः सावकाशत्वम् । तद्यथा - ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' ( वृ ० ३।३।१६ ) इत्येवमादिश्रुतिप्रसिद्धमेव पुरुषस्य विशुद्धत्वं निर्गुणपुरुषनिरूपणेन सांख्यैरभ्युपगम्यते । तथा च योगैरपि ' अथ परि-वाविवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः ' ( जात्रा ० ५ ) इत्येवमादि श्रुतिप्रसिद्धमेव निवृत्तिनिष्ठत्वं प्रवज्याद्यपदेशेनानुगस्यते । एतेन सर्वाणि तर्कस्मरणानि प्रतिवक्तव्यानि । तान्यपि तर्कोपपत्तिभ्यां तत्त्वज्ञानायोपकुर्वन्तीति चेदुपकुर्वन्तु नाम । तत्त्वज्ञानं तु वेदान्तवाक्येभ्य एव भवति - ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ( तै ० ब्रा ० ३।१२।९ ।७ ) ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( वृ ० ३।९ ।२६ ) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः ॥३ ॥

( ३ विलक्षणत्वाधिकरणम् सू ० ४-१२ ) न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ ४ ॥

पदच्छेद -- न, विलक्षणत्वात्, अस्य, तथात्वम्, च, शब्दात् । सूत्रार्थ - ( अस्य ) इस जगत्का ( न ) ब्रह्म उपादान कारण नहीं हो सकता, ( विलक्षणत्वास् ) क्योंकि विलक्षण है अर्थात् ब्रह्म चेतन है और जगत् अचेतन । ( शब्दात् ) ' विज्ञानं चाविज्ञानं चाभवत् ' इस श्रुतिसे ( तथात्वं च ) विलक्षणत्व ज्ञात होता है । * ब्रह्मास्य जगतो निमित्तकारणं प्रकृतिश्चेत्यस्य पक्षस्याक्षेपः स्मृतिनिमित्तः परिहृतः । सांख्य और योग द्वैतवादी हैं आत्मैकत्वदर्शी नहीं हैं । ' तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम् ' इसप्रकार जो दर्शन कहा गया है, उसमें ऐसा समझना चाहिए कि सांख्य और योग शब्दोंसे सान्निध्यके कारण वैदिक ज्ञान और ध्यान ही कहे गये हैं । जिस अंशसे श्रुतिका विरोध नहीं है उस अंश में सांख्य और योगस्मृतियोंका सावकाशत्व इष्ट ही है । जैसे ' असङ्गो ० ' ( यह आत्मा निश्चय असङ्ग है ) इत्यादि श्रुति प्रसिद्ध पुरुष में ही निर्गुण पुरुषके निरूपणसे विशुद्धत्व सांख्य लोग स्वीकार करते हैं । उसीप्रकार योग शास्त्रवाले मी ‘ अथ परिव्राडू ० ' ( परिव्राजकको कषायवस्त्रधारी, सिर मुण्डित और परिग्रहरहित होना चाहिए ) इत्यादि श्रुति प्रसिद्ध निवृत्तिमागंका ही प्रव्रज्यादि उपदेशसे अनुसरण करते हैं । एतेन श्रुति विरोधसे अर्थात् सांख्यस्मृति और योगस्मृतिके निराकरण न्यायसे सब तर्क स्मृतियोंका निरा-करण करना चाहिए । यदि वे स्मृतियाँ भी तर्क ( अनुमान ) उपपत्ति ( तर्ककी अनुग्राहिका युक्ति ) से तत्त्वज्ञानकी उपकारक होती हैं तो भले ही उपकारक हों । परन्तु ' नावेदवित् ० ' ( शब्दसे तथा अर्थसे वेदको न जाननेवाला उस ब्रह्मको नहीं जानता ) ' तं त्वौपनिषदं ० ' ( मैं तो उपनिषद्गम्य उस पुरुषको पूछता हूँ ) इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है कि तस्वज्ञान तो केवल वेदान्तवाक्योंसे ही होता है || ३ || ब्रह्म इस जगत्का निमित्तकारण और उपादानकारण है, इस पक्षपर सांख्यस्मृति निमित्तक आक्षेपका परिहार किया गया है । अब तकं निमित्तक आक्षेपका परिहार किया जाता है । परन्तु सत्यानन्दी - दीपिका है । किसको ऐसा भ्रम हो कि जैसे योगस्मृतिमें प्रतिपादित योगके कुछ अंश प्रमाणरूप हैं, वैसे प्रधान, महदादि कार्य, आत्मका नानात्व आदि अंश भी प्रमाणरूप हैं । उसकी निवृत्तिके लिए यह अतिदेश है । यद्यपि बौद्ध आदि बहुत स्मृतियाँ हैं, तो भी वे वेदबाह्य होने से उनके निराकरणमें यत्न न कर सांख्य और योगस्मृतियोंके निराकरण में यत्न किया गया है, क्योंकि मोक्षका साधन मानकर अनेक शिष्टपुरुषोंने उनका ग्रहण किया है । सांख्य और योग मतमें आत्माका नानात्व, बुद्धि और

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३४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ तर्कनिमित्त इदानीमाक्षेपः परिहियते । कुतः पुनरस्मिन्नवधारित आगमार्थे तर्कनिमित्तस्या-क्षेपस्यावकाशः? ननु धर्म इव ब्रह्मण्यप्यनपेक्षआगमो भवितुमर्हति । भवेदयमवष्टम्भो यदि प्रमाणान्तरानवगाह्य आगममात्रप्रमेयोऽयमर्थः स्यादनुष्ठेयरूप इव धर्मः, परिनिष्पन्नरूपं तु ब्रह्मावगम्यते । परिनिष्पन्न च वस्तुनि प्रमाणान्तराणामस्त्यवकाशो यथा पृथिव्यादिषु । यथा च श्रुतीनां परस्परविरोधे सत्येकवशेनेतरा नीयन्ते, एवं प्रमाणान्तरविरोधेऽपि तद्व-शेनैव श्रुतिनियेत । दृसाम्येन चादृष्टमर्थं समर्थयन्ती युक्तिरनुभवस्य संनिकृष्यते । विप्र-कृष्यते तु श्रुतिरैतिह्यमात्रेण स्वार्थाभिधानात् । अनुभवावसानं च ब्रह्मविज्ञानमविद्याया निवर्तकं मोक्षसाधनं च दृष्टफलतयेष्यते । श्रुतिरपि - ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इति श्रवणव्यतिरेकेण मननं विदधती तर्कमप्यत्रादर्तव्यं दर्शयति । अतस्तर्कनिमित्तः पुनराक्षेपः क्रियते ' न विल-क्षणत्वादस्य ' इति ॥ * यदुक्तं चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिरिति तन्नोपपद्यते; कस्मात्? निश्चित इस वेदार्थ में पुनः तर्क निमित्तक आक्षेपका अवकाश ही कहाँ है? क्योंकि धर्मके समान ब्रह्ममें भी वेद स्वतन्त्र प्रमाण होना युक्त है । यह दृष्टान्त तमी युक्त है यदि अनुष्ठेय धर्मके समान यह ब्रह्मरूप अर्थ भी प्रमाणान्तरसे अग्राह्य केवल आगममात्र ज्ञेय हो, ब्रह्म तो सिद्ध अवगत होता है । पृथिवी आदिके समान सिद्ध वस्तुमें अन्य प्रमाणोंका भी अवकाश है । जैसे श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर प्रबल एक श्रुतिके अनुसार दुर्बल दूसरी श्रुतियोंका अर्थं किया जाता है, वैसे अन्य प्रमाणोंके साथ श्रुतियोंका विरोध होनेपर भी उन ( निरवाकाश ) के अनुसार ही श्रुतिका अर्थ किया जाता है । अनुभूत अर्थंके सादृश्यसे अदृष्ट – परोक्ष अर्थका समर्थन करनेवाला तकं अनुभव के सन्निहित है | श्रुति तो ऐतिह्य मात्र ( परोक्षरूप प्रवाह परम्परामात्र ) से अपने अर्थका अभिधान करती है, इसलिए अनुभव से दूर है । ब्रह्म साक्षात्कारपर्यन्त मोक्षका साधनभूत ब्रह्मज्ञान अविद्याका निवर्तक होकर दृष्ट फलस्वरूप से अभिष्ट है । ' श्रोतव्यो ० ' ( आत्माका श्रवण और मनन करना चाहिए ) इसप्रकार श्रवण भिन्न मननका विधान करती हुई अति भी तर्कको यहाँ आदर योग्य दिखलाती है । इसलिए ' न विलक्षत्वादस्य ' इस सूत्रसे तर्क निमित्तक पुनः आक्षेप किया जाता है । जो यह कहा गया है कि चेतन ब्रह्म जगत्का कारण प्रकृति सत्यानन्दी - दीपिका पुरुषका भेदज्ञान मोक्षका साधन माना गया है, जो सर्वथा वेद विरुद्ध है, वेदमें तो ' तत्त्वमसि ' इस प्रकार आत्मैकत्वज्ञानको मोक्षका साधन कहा गया है ॥ ३ ॥

* जो सिद्ध वस्तु होती है वह अन्य प्रमाणसे गम्य होती है, यह तर्क है । इसलिए तर्क और श्रुतिका एक विषय होनेसे विरोध उपस्थित होता है । जैसे श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर प्रबल श्रुतिसे दुर्बल श्रुतिका बाघ होता है अर्थात् सावकाश श्रुतियोंका निरवकाश श्रुतिके अनुसार अर्थ किया जाता है, वैसे निरवकाश एक तर्कके बलसे सावकाश श्रुतियोंका अर्थ करना युक्त है । ब्रह्मसाक्षात्कार मोक्षका मुख्य साधन होने से प्रधान है और तर्क उसका अन्तरङ्ग है, क्योंकि तर्क अपनी स्थिति में प्रत्यक्ष दृष्टान्तकी अपेक्षा रखता है । इसलिए प्रधान साधन भूत ब्रह्मसाक्षात्कारके समान तर्क मी अपरोक्षार्थं विषयक है और श्रुति परोक्षार्थं विषयक है, अतः वह बहिरङ्ग है । तर्क दृष्टार्थंके समान अदृष्ट अर्थका समर्थन करता है, इससे तर्क श्रुतिकी अपेक्षा अनुभव के सन्निकट है, अतः अनवकाश तर्कके अनुसार श्रुतिका अर्थ करना चाहिए, क्योंकि विरोध होनेपर सावकाश श्रुतिसे निरवकाश तर्क बलवान् होता है ं । किञ्च ‘ अन्तरङ्गबहिरङ्गयोरन्तरङ्गं बलवत् ' ( अन्तरङ्ग और बहिरङ्गमेंसे अन्तरङ्ग बलवान् होता है । ) इस न्यायसे भी तर्क. बलवान सिद्ध होता है, अतः तर्कके अनुसार ही अर्थ होना युक्त है । ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' यह श्रुति भी तर्कका विधान करती है । * ' जगत् न ब्रह्मप्रकृतिकं तद्विलक्षणत्वात्, यद्यद्विलक्षणं तन्न तत्प्रकृतिकं यथा मृद्दिलक्षणा

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अधि ० ३ ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३४५ विलक्षणत्वादस्य विकारस्य प्रकृत्याः । इदं हि ब्रह्मकार्यत्वेनाभिप्रेयमाणं जगत् ब्रह्मविलक्षण-मचेतनमशुद्धं च दृश्यते । ब्रह्म च जगद्विलक्षणं चेतनं शुद्धं च श्रूयते । न च विलक्षणत्वे प्रकृतिविकार भावो दृष्टः । नहि रुचकादयो विकारा मृत्प्रकृतिका भवन्ति, शरावादयो वा सुवर्णप्रकृतिकाः । मृदैव तुमृदन्विता विकाराः क्रियन्ते, सुवर्णेन च सुवर्णान्विताः । तथेदमपि जगदचेतनं सुखदुःखमोहान्वितं सदचेतनस्यैव सुखदुःखमोहात्मकस्य कारणस्य कार्य भवितुमर्हतीति न विलक्षणस्य ब्रह्मणः । ब्रह्मविलक्षणत्वं चास्य जगतोऽशुद्धयचेतनत्वदर्शना-दवगन्तव्यम् । अशुद्धं हि जगत्सुखदुःखमोहात्मकतया प्रीतिपरिताप विषादादिहेतुत्वात्स्वर्ग-नरकाद्युच्चावचप्रपञ्चत्वाच्च । अचेतनं चेदं जगत् चेतनंप्रति कार्यकारणभावेनोपकरणभावो-पगमात् । नहि साम्ये सत्युपकार्योपकार कभावो भवति । नहि प्रदीपौ परस्परस्योपकुरुतः । ननु चेतनमपि कार्यकारणं स्वामिभृत्यन्यायेन भोक्तुरुपकरिष्यति । नः स्वामिभृत्ययोरप्यचेतनां-शस्यैव चेतनं प्रत्युपकारकत्वात् । यो होकस्य चेतनस्य परिग्रहो बुद्धयादिरचेतनभागः स एवान्यस्य चेतनस्योपकरोति नतु स्वयमेव चेतनश्चेतनान्तरस्योपकरोत्यपकरोति वा । निर-तिशया ह्यकर्तारश्चेतना इति सांख्या मन्यन्ते । तस्मादचेतनं कार्यकारणम् । न च काष्ठलो-टादीनां चेतनत्वे किंचित्प्रमाणमस्ति । प्रसिद्धश्चायं चेतनाचेतनप्रविभागोलोके । तस्माद् ब्रह्मविलक्षणत्वान्नेदं जगत्तत्प्रकृतिकम् । योऽपि कश्चिदाचक्षीत श्रुत्वा जगाश्चेतनप्रकृतिकतां है, वह युक्त नहीं, क्योंकि यह कार्य प्रकृति से विलक्षण है ब्रह्मके कार्यरूपसे माना हुआ यह जगत् ब्रह्मसे विलक्षण - अचेतन और अशुद्ध देखा जाता है, और ब्रह्म जगत्से विलक्षण चेतन और शुद्ध सुना जाता है, विलक्षण होनेपर विलक्षणों में कार्यकारण भाव नहीं देखा गया है । आभूषण कादि कार्यं मृत्तिका उपादान कारणवाले नहीं होते, एवं सिकोरा आदि कार्यं सुवर्ण उपादा. रणवाले नहीं होते, मृत्तिकासे अन्वित घट आदि विकार मृत्तिकासे ही बनाये जाते हैं और सुवर्णाविन्त आभूषण आदि विकार सुवर्णसे ही बनाये जाते हैं । उसी प्रकार यह जगत् भी अचेतन, सुख, दुःख और मोह युक्त होता हुआ अचेतन, सुख, दुःख एवं मोहात्मक कारणका ही कार्य होना युक्त है, विलक्षण ब्रह्मा नहीं । अशुद्धि और अचेतनत्वके देखनेसे यह जगत् ब्रह्मसे विलक्षण समझना चाहिए । निःसन्देह यह जगत् अशुद्ध है, क्योंकि सुख - दुःख और मोहात्मकरूपसे प्रीति, परिताप और विषाद आदिका हेतु है, एवं स्वर्ग, नरक आदि अनेक प्रकारका प्रपञ्चरूप है । यह जगत् अचेतन है, कारण कि शरीर, इन्द्रिय आदि रूपसे चेतन के प्रति उपकरणभावसे प्राप्त है । सादृश्य होनेपर तो उपकार्यों-पकारकभाव नहीं होता । दो प्रदीप एक दूसरेका उपकार नहीं करते । परन्तु देह, इन्द्रिय आदि चेतन होकर भी स्वामिभृत्य न्यायसे भोक्ताका उपकार करेगा? ऐसा नहीं, क्योंकि स्वामी और भृत्यका भी अचेतन अंश ही चेतनका उपकारक है, एक चेतनका परिग्रह जो बुद्धि आदि अचेतन माग है वही अन्य चेतनका उपकार करता है, परन्तु स्वयं चेतन अन्य चेतनका न उपकार करता है और न अपकार करता है, क्योंकि सांख्यमतावलम्बी ऐसा मानते हैं कि चेतन अतिशय रहित और अकर्ता हैं । इस लिए देह, इन्द्रिय आदि अचेतन हैं । काष्ठ और ढेले आदिके चेतन होनेमें कोई प्रमाण नहीं है । लोकमें यह चेतन और अचेतन विभाग तो प्रसिद्ध है । अतः ब्रह्मसे विलक्षण होनेसे यह जगत् ब्रह्म प्रकृतिक नहीं है । यदि कोई ऐसा कहे कि कि चेतन जगत् की प्रकृति है, ऐसा श्रवणकर उसके बलसे सत्यानन्दी - दीपिका रुचकादयः । ' ' जगत् ब्रह्म प्रकृतिक नहीं है, क्योंकि उससे विलक्षण है । जो जिससे विलक्षण होता है वह तत्प्रकृतिक नहीं होता, जैसे मृत्तिकासे विलक्षण आभूषण मृत्तिकासे उत्पन्न नहीं होते जैसे मृत्तिका से अन्वित घट आदि मृत्तिकारूप उपादान कारण से उत्पन्न होते हैं अन्यसे नहीं, वैसे सुख - दुःख और

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३४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ तद्वलेनैव समस्तं जगच्चेतनमवगमयिष्यामि, प्रकृतिरूपस्य विकारे ऽन्वयदर्शनात् । अविभा-वनं तु चैतन्यस्य परिणामविशेषाद्भविष्यति । यथा स्पष्टचैतन्यानामप्यात्मनां स्वापमूर्च्छा-द्यवस्थासु चैतन्यं न विभाव्यते, एवं काष्ठलेोष्टादीनामपि चैतन्यं न विभावयिष्यते । एत-स्मादेव च विभाविताविभावितत्वकृताद्विशेषाद्रूपादिभावाभावाभ्यां च कायकरिणानामा-त्मनां च चेतनत्वाविशेषेऽपि गुणप्रधानभावो न विरोत्स्यते । यथा च पार्थिवत्वाविशेषेऽपि मांस सूपौदनादीनां प्रत्यात्मवर्तिनो विशेषात्परस्परोपकारित्वं भवत्येवमिहापि भविष्यति । प्रविभागप्रसिद्धिरण्यत एव न विरोत्स्यत इति । तेनापि कथंचिच्चेतनाचेतनत्वलक्षणं विलक्षणत्वं परिहियेत । शुद्धयशुद्धित्वलक्षणं तु विलक्षणत्वं नैव परिहियते । न चेतरदपि विलक्षणत्वं परिहर्तुं शक्यत इत्याह- तथात्वं च शब्दादिति । अनवगम्यमानमेव हीदं लोके समस्तस्य वस्तुनश्चेतनत्वं चेतनप्रकृतिकत्वश्रवणाच्छन्दशरणतया केवलयोत्प्रेक्षेत, तच्च शब्ददेनैव विरुध्यते । यतः शब्दादपि तथात्वमवगम्यते । तथात्वमिति प्रकृतिविलक्ष-णत्वं कथयति । शब्द एव ' दिज्ञानं चाविज्ञानं च ' ( तै ० २२६ ) इति कस्यचिद्विभागस्या-चेतनतां श्रावयंश्चेतनाद्ब्रह्मणो विलक्षणमचेतनं जगच्छ्रावयति ॥ ४ ॥

ननु चेतनत्वमपि क्वचिदचेतनत्वाभिमतानां भूतेन्द्रियाणां श्रूयते । यथा ' मृदब्रवीत् ', ' आपोऽब्रुवन् ( श ० प ० ब्रा ० ६ | १ | ३ | २ | ४ ) इति, ' तत्तेज ऐक्षत ', ' ता आप ऐक्षन्त ' ( छा ० ६।२।३, ५ ) इति । चैवमाद्या भूतविषया चेतनःवश्रुतिः । इन्द्रियविषयाणि ' ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवद-समस्त जगत्को चेतन सिद्ध करूंगा, क्योंकि प्रकृतिस्वरूपका अन्वय कार्यमें देखने में आता है । विशेष परिणामके कारण उनमें चैतन्य अप्रतीत अभिव्यक्त नहीं होता जैसे स्पष्टरूपसे प्रतीयमान चैतन्य आत्मा-ओंका भी चैतन्य निद्रा, मूर्च्छादि अवस्थाओंमें प्रतीत नहीं होता, वैसे काष्ठ, लोष्ट आदिका भी चैतन्य प्रतीत न होगा । इसी अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति जन्य विशेषसे एवं रूप आदिके भावाभावके कारण देह, इन्द्रिय और आत्माओं में चेतनत्व समान होनेपर भी गौण प्रधान भावका विरोध नहीं हो सकता है I । जैसे मांस, दाल और मात आदिमें पार्थिवत्व समान होनेपर भी प्रत्येक में वर्तमान वैलक्षण्यसे परस्पर उपकारित्व है, वैसे यहाँ भी होगा । इसीसे ( चैतन्यकी अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति से ) विभाग ( चेतन और अचेतन ) की प्रसिद्धि में भी विरोध नहीं है । तो उस कथनसे भी किसी प्रकार चेतनत्व और अचेतनत्वरूप वैलक्षण्यका परिहार हो, परन्तु शुद्धि और अशुद्धिरूप वैलक्षण्यका परि-हार तो नहीं हो सकता और इसीप्रक. र अन्य वैलक्षण्यका भी परिहार नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं-' तथात्वं च शब्दात् ' लोकमें समस्त पदार्थं चेतनरूपसे प्रतीत नहीं होते, जगत् चेतन उपादानवाला है ऐसा श्रवण होनेसे यदि केवल श्रुतिप्रमाणके आधारपर उनमें चेतनत्वकी कल्पना की जाय, तो वह कल्पना श्रुतिसे हो विरुद्ध है, क्योंकि श्रुतिसे मी तथात्व ( वैलक्षण्य ) अवगत होता है । तथात्व पदसे प्रकृतिसे विलक्षणताको सूत्रकार कहते हैं । ' विज्ञानं चाविज्ञानं च ' ( चेतन और अचेतन ) इस प्रकार किसी एक विभागको अचेतनत्व श्रवण कराती हुई श्रुति चेतन ब्रह्मसे जगत् विलक्षण अचेतन श्रवण कराती है ॥ ४ ॥

परन्तु अचेतनरूपसे अभिमत आकाश आदि भूत और चक्षु आदि इन्द्रियोंमें भी कहीं - कहीं चेतनत्व प्रतिपादक श्रुति है, जैसे ' मृदब्रवीत् ' ( मृत्तिका - पृथिवी बोली ), ' आपोऽब्रुवन् ' ( जल बोला ) इस प्रकार और ‘ तत्तेज ऐक्षत ' ( उस तेजने ईक्षण किया ) ' ता आप ० ' ( उस जलने ईक्षण किया ) सत्यादन्दी - दीपिका मोह युक्त यह अचेतन जगत् सुख, दुःख, मोहात्मक कारणसे उत्पन्न होना चाहिए । उनसे विलक्षण ब्रह्मसे नहीं, जगत् में ब्रह्म से विलक्षणता तो प्रत्यक्ष सिद्ध है ॥ ४ ॥