श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 381–390

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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अघि ० ३ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित II माना ब्रह्य जग्मुः ' ( बृ ० ६।१।७ ) इति - ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति ' ( वृ ० १।३।२ ) इत्येव-माद्येन्द्रियविषयेति । अत उत्तरं पठति -अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् || ५ || पदच्छेद – अभिमानिव्यपदेशः, तु, विशेषानुगतिभ्याम् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्काकी निवृत्तिके लिए है | ( अभिमानिव्यपदेश: ) ' ते हेमे प्राणा ' इत्यादि श्रुतिमें ' प्राणा ' शब्दसे प्राण अभिमानी देवताओंका कथन है, ( विशेषानुगतिभ्याम् ) क्योंकि विशेष और अनुगति हैं । तुशब्द आशङ्कामपनुदति । न खलु ' मृदब्रवीत् ' इत्येवंजातीयकथा श्रुत्या भूतेन्द्रियाणां चेतनत्वमाशङ्कनीयम् । यतोऽभिमानिव्यपदेश एषः । मृदाद्यभिमानिन्यो वागाद्यभिमानि-न्यश्च चेतना देवता वदन संवदनादिषु चेतनोचितेषु व्यवहारेषु व्यपदिश्यन्ते, न भूतेन्द्रिय-मात्रम् । कस्मात्? विशेषानुगतिभ्याम् । विशेषो हि भोक्तृणां भूतेन्द्रियाणां च चेतनाचेतन-प्रविभागलक्षणः प्रागभिहितः । सर्वचेतनतायां चासौ नोपपद्येत । अपि च कौषीतकिनः प्राण-संवादेकारणमात्राशङ्का विनिवृत्तयेऽधिष्ठातृचेतनपरिग्रहाय देवताशब्देन विशिषन्ति - ' एता ह वै देवता अहं ससे विवदमानाः ' इति । ' ता वा एताः सर्वा देवताः प्राणे निःश्रेयसं विदित्वा ' ( कौषी • उ ० २।१४ ) इति च । अनुगताश्च सर्वत्राभिमानिन्यश्चेतना देवता मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणा-दिभ्योऽवगम्यन्ते । ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' ( ऐ ० आ ० २ | ४ | २ | ४ ) इत्येवमादिका च श्रुतिः करणेष्वनुग्राहिकां देवतामनुगतां दर्शयति । प्राणसंवादवाक्यशेषे च ' ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुः ' ( छा ० ५/१७ ) इति श्रेष्ठत्वनिर्धारणाय प्रजापतिगमनम्, तद्वचनाच्चैकै-इत्यादि भूतविषयक चेतनत्व श्रुति है । इन्द्रियोंके लिए भी है, जैसे ' ते हमें ' ० ( वे ये प्राण इन्द्रिय ' मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ ' इसप्रकार विवाद करते हुए ब्रह्मा के पास गये ) ' ते ह वाचमू ० ' ( उन देवोंने वाणीसे कहा- तुम हमारे लिए उद्गान करो ) इत्यादि इन्द्रियविषयक चेतनत्व श्रुति है । अतः उत्तर कहते हैं-तु शब्द आशङ्काका निवारण करता है । ' मृदब्रवीत् ' इसप्रकारकी श्रुतिसे भूत और इन्द्रियों में चेतनत्व आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ' मृदब्रवीत् ' यह कथन उनके अभिमानी देवता विषयक है । मृत्तिका ( पृथिवी ) आदिके अभिमानी और वाणी आदिके अभिमानी चेतन देवताओंका वाद - विवाद आदि चेतनोचित व्यवहारोंमें व्यपदेश है, केवल भूत और इन्द्रिय विषयक व्यपदेश नहीं है । किससे? इससे कि विशेष और अनुगति है । भोक्ताओं, भूत और इन्द्रियोंमें चेतन और अचेतन विभागरूप विशेष ( वैलक्षण्य ) पूर्व ( सू ० ४ ) में ही कहा गया है । समस्त जगत्‌को चेतन होनेपर यह चेतनाचेतन विभागरूप विशेष उपपन्न नहीं होगा । कौषीतकिशाखावाले प्राण संवादमें केवल इन्द्रियोंमें चेतनत्वकी आशङ्काकी निवृत्ति करनेके लिए और अधिष्ठातृचेतनको स्वीकार करने के लिए ' एता वै ० ' ( ये प्रसिद्ध देवता ' मैं श्रेष्ठ हूँ ' ' मैं श्रेष्ठ हूँ ' इस प्रकार विवाद करते हुए ) और ' ता वा एताः ० ' ( वे ये सब देवता प्राण में निःश्रेयस जानकर ) इसप्रकार [ इन्द्रिय और प्राणको ] देवता शब्द से विशेषित करते हैं । अभिमानी चेतन देवता सर्वत्र ( भूत और इन्द्रियादिमें ) अनुगत हैं, यह अनुगति मन्त्र, अर्थ-वाद, इतिहास, पुराण आदिसे अवगत होती है । यथा ' अग्निर्वाग्भूत्वा ० ' ( अग्निने वाणी होकर मुखमें प्रवेश किया ) इत्यादि श्रुति इन्द्रियों के अनुग्राहक ( प्रकाशक ) और इन्द्रियोंमें अनुगत देवताओंको दिखलाती है । और प्राणसंवादके वाक्यशेषमें ' ते ह प्राणाः ० ' ( उन प्राणोंने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा ) इस प्रकार श्र ेष्ठत्वं निश्चय करनेके लिए प्रजापतिके पास जाना, और उनके वचनसे एक एकके उत्क्रमणजे ] अन्वयव्यतिरेक द्वारा प्राण में श्रेष्ठत्वको प्रतोति, ' तस्मै बलिं हरणम् ' ( उसके लिए

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३४८ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ कोत्क्रमणेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां प्राणश्रैष्ठयप्रतिपत्तिः । ' तस्मै बलिहरणम् ' ( वृ ० ६।१।१३ ) इति चैवजातीयकोऽस्मदादिष्विव व्यवहारोऽनुगम्यमानोऽभिमा निव्यपदेशं द्रढयति । ' तरोज ऐक्षत ' इत्यपि परस्या एव देवताया अधिष्ठात्र्याः स्वविकारेष्वनुगताया इयमीक्षा व्यप-दिश्यत इति द्रष्टव्यम् । तस्माद्विलक्षणमेवेदं ब्रह्मणो जगत् ॥५ ॥

विलक्षणत्वाच्च न ब्रह्मप्रकृतिकमित्याक्षिप्ते प्रतिविधत्ते-दृश्यते तु ॥ ६ ॥:

पदच्छेद -- दृश्यते तु । सूत्रार्थ - ( दृश्यते ) किन्तु चेतनसे चेतनविलक्षण अचेतन पदार्थोंकी एवं चेतन पदार्थोंकी उत्पत्ति देखी जाती है, अतः अचेतन जगत् चेतन प्रकृतिक है । ( की व्यवृत्तिके लिए है । अचेतनसे तद्विलक्षण तु ) शब्द पूर्वपक्ष-तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । यदुक्तं विलक्षणत्वान्नेदं जगद्ब्रह्मप्रकृतिकमिति । नायमे-कान्तः । दृश्यते हि लोके चेतनत्वेन प्रसिद्धेभ्यः पुरुषादिभ्यो विलक्षणानां केशनखादीना-मुत्पत्तिः, अचेतनत्वेन च प्रसिद्धेभ्यो गोमयादिभ्यो वृश्चिकादीनाम् । नन्वचेतनान्येव पुरुषा-दिशरीराण्यचेतनानां केशनखादीनां कारणानि, अचेतनान्येव च वृश्चिकादिशरीराण्यचेत-नानां गोमयादीनां कार्याणीति, उच्यते एवमपि किंचिदचेतनं चेतनस्यायतनभावमुपगच्छ-ति, किंचिन्नत्यस्त्येव वैलक्षण्यम् । महांश्चायं पारिणामिकः स्वभावविप्रकर्षः, पुरुषादीनां के-शनखादीनां च स्वरूपादिभेदात् । यथा गोमयादीनां वृश्चिकादीनां च अत्यन्तसारूप्ये च प्रकृतिविकारभाव एव प्रलीयेत । अयोध्येत अस्ति कश्चित्पार्थिवत्वादिस्वभावः पुरुषादीनां केशनखादिष्वनु वर्तमानो गोमयादीनां वृश्चिकादिष्विति । ब्रह्मणोऽपि तर्हि सत्तालक्षणः [ चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा ] बलि ले जाना ) इसप्रकारका हम लोगोंके समान जाना हुआ व्यवहार अभिमानी देवता विषयक कथनको दृढ करता हैं । ' तत्तेज ऐक्षत ' ( उस तेजने ईक्षण किया ) यह भी अपने विकारोंमें अनुगत अन्य अधिष्ठातृ देवताविषयक यह ईक्षण व्यपदिष्ट है ऐसा समझना चाहिए । इसलिए यह जगत् ब्रह्मसे विलक्षण ही है ॥५ ॥

और विलक्षण होनेसे जगत् ब्रह्म उपादान कारणवाला नहीं है, ऐसा पूर्वपक्षी द्वारा अक्षेप किए जानेपर उत्तर देते हैं— ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । जो यह कहा गया है कि विलक्षण होने से यह जगत् ब्रह्मोपादानक नहीं है । यह नियम ऐकान्त ( अव्यभिचरित ) नहीं है, क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि चेतनरूपसे प्रसिद्ध पुरुषादिसे विलक्षण - अचेतन केश नखादिको उत्पत्ति होतो है और अचेतनरूपसे प्रसिद्ध गोमय ( गोबर ) आदिसे वृश्चिकादिकी उत्पत्ति होती है । परन्तु पुरुष आदिके अचेतन शरीर ही अचेतन केश नख आदिके कारण हैं और वृश्चिक आदिके अचेतन शरीर ही अचेतन गोमय आदिके कार्य हैं? कहते हैं - इसप्रकार मी कोई अचेतन चेतनके आश्रय भावको प्राप्त होता है और कोई नहीं होता, ऐसा वैलक्षण्य है ही । यह परिणामात्मक स्वभावका वैलक्षण्य महान् है, क्योंकि पुरुष आदि और केश नखादिके स्वरूप आदिमें भेद है । उसीप्रकार गोमय आदि और वृश्चिक आदिका परिणामात्मक वैलक्षण्य भी महान् है और दोनोंके स्वरूपमें भी भेद है । अत्यन्त सादृश्य होनेपर तो कार्यकारणभावका ही विलय हो जायगा । यदि कहो कि पुरुष आदिका कोई पार्थिवत्व आदि स्वभाव केश नख आदिमें और गोमय आदिका कोई पार्थिवत्व आदि स्वभाव वृश्चिक आदिमें अनुवर्तमान है? तो ब्रह्मका भी सत्तात्मक स्वभाव आकाशादिमें अनुवर्तमान दिखाई देता हैं ।

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अधि ० ३ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३४ ९ स्वभाव आकाशादिष्वनुवर्तमानो दृश्यते । * विलक्षणत्वेन च कारणेन ब्रह्मप्रकृतिकत्वं जगतो दूषयता किमशेषस्य ब्रह्मस्वभावस्याननुवर्तनं विलक्षणत्वमभिप्रेयत उत यस्य कस्य-चित्, अथ चैतन्यस्येति वक्तव्यम्? प्रथमे विकल्पे समस्त प्रकृतिविकारोच्छेदप्रसङ्गः । न ह्यस-त्यतिशये प्रकृतिविकार इति भवति । द्वितीये चासिद्धत्वम् । दृश्यते हि सत्तालक्षणो ब्रह्म-स्वभाव आकाशादिष्वनुवर्तमान इत्युक्तम् । तृतीये तु दृष्टान्ताभावः । किं हि यच्चैतन्येना-नन्वितं तदब्रह्मप्रकृतिकं दृष्टमिति ब्रह्मवादिनं प्रत्युदाह्रियेत, समस्तस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मप्र-कृतिकत्वाभ्युपगमात् । आगमविरोधस्तु प्रसिद्ध एव, चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चे त्यागमतात्पर्यस्य प्रसाधितत्वात् । * यत्तूक्तं परिनिष्पन्नत्वाद्ब्रह्मणि प्रमाणान्तराणि संभवे-युरिति, तदपि मनोरथमात्रम् । रूपाद्यभावाद्धि नायमर्थः प्रत्यक्षस्य गोचरः, लिङ्गाद्यभावाच्च नानुमानादीनाम् । आगममात्र समधिगम्य एव त्वयमर्थो धर्मवत्, तथा च श्रुतिः – ' नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ' ( का ० १ | २ | ९ ) इति । ' को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् ' ' इयं विसृष्टिर्यत आबभूव ' ( ऋ ० सं ० १ | ३० | ६ ) इति चेते ऋचौ सिद्धानामपीश्वराणां दुर्बोधतां विलक्षणत्व हेतुसे जगत् के ब्रह्मप्रकृतिकत्व में दोष देनेवालेको अशेष ( सम्पूर्ण ) ब्रह्मस्वभावकी अनु-वृत्तिका अभाव विलक्षणत्व अभिप्रेत है, या जिस किसी अनुवृत्तिका अभाव, अथवा चैतन्यकी अनु-वृत्तिका अभाव अभिप्रेत है यह कहना चाहिए? प्रथम पक्षमें तो समस्त कार्यकारणभावका उच्छेद हो जाएगा, क्योंकि प्रकृति और विकृति में अतिशय - वैलक्षण्य न होनेपर यह प्रकृति है यह विकार है ऐसा प्रकृति विकृतिभाव हो न रहेगा । द्वितीय पक्ष में असिद्धिरूप दोष है, क्योंकि पहले ऐसा कहा गया है कि सत्ता लक्षण ब्रह्मस्वभावको आकाश आदिमें अनुवृत्ति देखी जाती है । तृतिय पक्षमें तो दृष्टान्तका अभाव है । जो चैतन्यसे अन्वित नहीं है वह ब्रह्म प्रकृतिक नहीं देखा जाता, ऐसा कौन - सा उदाहरण ब्रह्मवादीके प्रति देंगे? क्योंकि इस समस्त वस्तु समुदायको ब्रह्मोपादानक माना गया है । शास्त्रविरोध तो प्रसिद्ध ही है, क्योंकि चेतन ब्रह्म जगत्का निमित्तकरण और उपादानकारण है यह आगमका तात्पर्यं सिद्ध किया गया है । जो यह कहा गया है कि सिद्ध वस्तु होनेसे ब्रह्ममें अन्य प्रमाणोंका संभव होगा । वह भी मनोरथ मात्र है । क्योंकि रूपादिका अभाव होनेसे यह ब्रह्म वस्तु प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय नहीं है, और लिङ्ग आदिका अमाव होनेसे अनुमान आदिका विषय नहीं है । यह वस्तु तो धर्मके समान केवल आगममात्र से अधिगम्य है । इस विषय में ' नैषा तर्केण ० ' ( हे प्रियतम! सम्यग्ज्ञानके लिए शुष्क तार्किकसे भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्य द्वारा कही हुई यह बुद्धि, जिसे कि तू प्राप्त हुआ है, तर्क द्वारा प्राप्त होने योग्य अथवा दूर होने योग्य नहीं है ) ऐसी श्रुति है । ' को श्रद्धा वेद ० ' ( कौन साक्षात् उसे जानता है और कौन उसे ठीक - ठीक समझा सकता है । यह विविध सृष्टि जिससे सत्यानन्दी - दीपिका * ' जगत् न ब्रह्मप्रकृतिकं तद्विलक्षणत्वात् ' इसप्रकार पहले पूर्वपक्षीने विलक्षणत्व हेतुसे जगत् में ब्रह्मोपादानकारणत्वका अभाव सिद्ध किया है । सिद्धान्ती - विलक्षणताका हेतु अशेष ब्रह्म स्वभावकी अनुवृत्ति है, या जिस किसी ब्रह्मके धर्मकी अनुवृत्तिका अभाव अथवा चैतन्यको अनुवृत्तिका अमाव? प्रथम विकल्पका समाधान स्पष्ट है । दूसरा पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि सत्तात्मक ब्रह्मस्वभाव-की मनुष्य है, घट है, यह है, इसप्रकार समस्त पदार्थों में अनुवृत्ति है । अतः अनुवृत्ति अमाव असिद्ध है । तृतीय पक्षमें दृष्टान्तका अभाव है । क्योंकि ' शास्त्रयोनित्वात् ' ( ब्र ० सू ० १।१।३ ) इस सूत्रमें ब्रह्म जगत्का उपादान और निमित्तकारण कहा गया है । और यही श्रुति सिद्ध मो है, अतः ब्रह्म-वादीके प्रति चेतनाननुगत कोई भी पदार्थ नहीं है । इसलिए पूर्वपक्षीका अनुमान हो असिद्ध है । * श्रुतिकी अपेक्षा न रखनेवाला तर्क शुष्क कहलाता है । श्रुतिसे तत्त्वका निश्चय करनेके

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३५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ जगत्कारणस्य दर्शयतः । स्मृतिरपि भवति - ' अचिन्त्याः खलु ये मावा न तांस्तर्केण योजयेत् ' इति । ' अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ' ( गी ० २।२५ ) इति च । ' न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां त सर्वशः ' ( गी ० १०।२ ) इति चैवजातीयका । यदपि श्रवणव्यतिरेकेण मननं विदधच्छन्द एव तर्कमध्यादर्तव्यं दर्शयतीत्युक्तम् । नानेन मिषेण शुष्कतर्कस्यात्रात्मलाभः संभवति । श्रुत्यनुगृहीत एव ात्र तर्कोऽनुभवाङ्गत्वेनाश्री-यते । स्वप्नान्तबुद्धान्तयोरुभयोरितरेतरव्यभिचारादात्मनोऽनन्वागतत्वम्, संप्रसादे च प्रपञ्च परित्यागेन सदात्मना संपत्तेर्निष्प्रपञ्चसदात्मत्वम्, प्रपञ्चस्य ब्रह्मप्रभवत्वात्कार्य-कारणानन्यत्वन्यायेन ब्रह्माव्यतिरेक इत्येवंजातीयकः । ' तर्काप्रतिष्ठानात् ' ( ब्र ० सू ० २।१।११ ) इति च केवलस्य तर्कस्य विप्रलम्भकत्वं दर्शयिष्यति । योऽपि चेतनकारणश्रवणबलेनैव समस्तस्य जगतश्चेतनतामुत्प्रेक्षेत तस्यापि ' विज्ञानं शविज्ञानं च ' इति चेतनाचेतनविभाग-श्रवणं विभावनाविभावनाभ्यां चैतन्यस्य शक्यत एव योजयितुम् । परस्यैव त्विदमपि विभागश्रवणं न युज्यते । कथम्? परमकारणस्य ह्यत्र समस्तजगदात्मना समवस्थानं श्राव्यते - ' विज्ञानं चाविज्ञानं चाभवत् ' । उत्पन्न हुई है ) ये दोनों ऋचाएँ जगत् के कारण ब्रह्ममें सिद्ध योगियों के लिए भी दुर्विज्ञेयत्व दिखलाती हैं । ' अचिन्त्याः खलु ० ' ( जो पदार्थ अचिन्त्य - जिन पदार्थों की उत्पत्ति आदि मनुष्यसे तो क्या देव, ऋषि आदिकी बुद्धि से भी अगम्य है उन पदार्थोंका तर्क से नियोजन नहीं करे ) और ' अव्यक्तो ० ' ( यह अव्यक्त - इन्द्रियों का अविषय, यह अचिन्त्य - मनका अविषय और अविकार्य है ) और ' न मे विदुः ०, ( हे अर्जुन! मेरी उत्पत्तिको अर्थात् विभूति सहित लीलासे प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि कारण हूँ ) इस प्रकारकी ये स्मृतियाँ भी हैं । जो यह कहा गया है कि श्रवणसे भिन्न मननका विधान करती श्रुति भी तर्कका आदर करना चाहिए, ऐसा दिखलाती है । इस मनन विधिके बहानेसे यहाँ शुष्क तर्कका होना संभव नहीं है । यहाँ श्रुतिसे अनुगृहीत तर्कका अनुमबके सहायकरूपसे ग्रहण किया गया है । स्वप्नावस्था और जाग्रदवस्था इन दोनोंमें परस्पर व्यभिचार होनेसे आत्मा इनसे असंस्पृष्ट है और सुषुप्ति अवस्था में प्रपञ्चके त्याग पूर्वक सत्स्वरूपके साथ एक होकर आत्मा निष्प्रपञ्च ब्रह्मस्वरूप हो जाता है । प्रपञ्च ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, अतः कार्यं कारणसे अभिन्न है, इस न्याय से ब्रह्मसे प्रपञ्च अभिन्न है, इसप्रकारका तर्क अङ्गीकृत होता है । और ' तर्काप्रतिष्ठानात् ' इस सूत्रसे श्रुति निरपेक्ष तर्कको अप्रमापक - प्रमाज्ञानको न उत्पन्न करनेवाला दिखलाया जायगा! जो कोई भी ( एक देशी ) ब्रह्मको कारण प्रतिपादक श्रुतिके बलसे ही समस्त जगत् में चेतनत्वको कल्पना करे उसके मत में भी ' विज्ञानं चाविज्ञानं च ' इसप्रकार चेतन और अचेतनके विभाग के श्रवणको चैतन्यको अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति ही योजना की जा सकती है । किन्तु अन्य - सांख्य के मतमें तो यह विभाग श्रवण युक्त नहीं है, क्योंकि ' विज्ञानं चाविज्ञानं चामवत् ' ( चेतन और अचेतन हुआ ) इसप्रकार श्रुति यहाँ परम कारणको समस्त जगद्रूपसे अवस्थितिका श्रवण कराती है । जैसे वहाँ विलक्षणतासे चेतनमें सत्यानन्दी -दीपिका लिए पुरुषों में विद्यमान असम्भावना और विपरीत भावना आदि दोषोंके अनुगृहीत कहलाता है, अचिन्त्य पदार्थ केवल श्रुतिका ही विषय होता है सिद्ध वस्तु होने से केवल श्रुतिगम्य है । * एकदेशी तो चैतन्यकी अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्तिसे विभाग किन्तु सांख्यमतमें यह दूषण तो वज्रलेप है, क्योंकि जगत्का परमकारण जगत्को अचेतन होने से चेतन और अचेतनका विभाग ही नहीं होगा । निरासार्थं स्वीकृत तर्क श्रुति , इसलिए ब्रह्म भी अचिन्त्य तिको योजना कर सकता है । प्रधानको माननेपर समस्त जैसे चेतन ब्रह्म अचेतन

पृष्ठ 385

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अधि ० ३ ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३५१ इति । तत्र यथा चेतनस्याचेतनभावो नोपपद्यते, विलक्षणत्वात् एवमचेतनस्यापि चेतन -भावो नोपपद्यते । प्रत्युक्तत्वात्तु विलक्षणत्वस्य यथाश्रुत्यैव चेतनं कारणं ग्रहीतव्यं भवति । ६ । अमदिति चेन्न प्रतिषेधपात्रत्वात् ॥७ ॥

पदच्छेद -असत् इति चेत्, न, प्रतिषेधमात्रत्वात् । सूत्रार्थ - ( असत् ) उत्पत्तिके पूर्व यह जगत् असत् था ( इति चेन्न ) तो यह युक्त नहीं है, ( प्रतिषेधमानत्वात् ) क्योंकि ' असत् था ' यह केवल प्रतिषेधमात्र है । * यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं च ब्रह्म तद्विपरीतस्याचेतनस्याशुद्धस्य शब्दादि-मतश्च कार्यस्य कारणमिष्येत, असत्तर्हि कार्य प्रागुत्पत्तेरिति प्रसज्येत | अनिष्टं चैतत्स-कार्यवादिनस्तवेति चेत् — नैष दोषः 9 प्रतिषेधात्रत्वात् । प्रतिषेधमात्रं हीदं नास्य प्रतिषेधस्य प्रतिषेध्यमस्ति । न हायं प्रतिषेधः प्रागुत्पत्तेः सत्त्वं कार्यस्य प्रतिषेद्धुं शक्नोति । कथम्? यथैव हीदानीमपीदं कार्य कारणात्मना सत्, एवं प्रागुत्पत्तेरपीति गम्यते । न हदानीमपीदं कार्य कारणात्मानमन्तरेण स्वतन्त्र मेवाति, ' सर्व तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद ' ( बृ ॰ २।४।६ ) इत्यादिश्रवणात् । कारणात्मना तु सत्त्वं कार्यस्य प्रागुत्पत्तेर-विशिष्टम् । ननु शब्दादिहीनं ब्रह्म जगतः कारणम्, बाढम् नतु शन्दादिमत्कार्य कारणा-त्मना हीनं प्रागुत्पत्तेरिदानीं वाऽस्ति । तेन न शक्यते वक्तु प्रागुत्पत्तेर सत्कार्यमिति । विस्तरेण चैतत्कार्यकारणानन्यत्ववादे वक्ष्यामः ॥७ ॥

अचेतनमाव उपपन्न नहीं होता, वैसे अचेतन में चेतनभाव भी उपपन्न नहीं होता । [ अभिव्यक्ति और अनव्यक्तिसे अथवा सारूप्य और वैलक्षण्यका प्रतिपादन होनेसे चेतनाचेतनके ] वैलक्षण्यका परिहार किया जा चुका है । इसलिए श्रुति के अनुसार ही चेतन कारणका ग्रहण करना चाहिए ॥ ६ ॥

यदि चेतन, शुद्ध, शब्दादि रहित ब्रह्म अपनेसे विपरीत अचेतन, अशुद्ध, शब्दादि युक्त जगद्रूप कार्यका कारण माना जाय, तो उत्पत्तिके पूर्व यह कार्य असत् प्रसक्त होगा । इस प्रकार तुम सत्कायं-वादीके लिए यह अनिष्ट होगा, ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रतिषेधमात्र है । यह केवल प्रतिषेधमात्र है, इस प्रतिषेधका कोई प्रतिषेध्य नहीं है । यह प्रतिषेध उत्पत्तिके पूर्व कार्यकी सत्ताका प्रतिषेध नहीं कर सकता । किस प्रकार? ऐसा अवगत होता है कि जिस प्रकार यह कार्य अभी भी कारणरूप से सत् है, इस प्रकार उत्पत्तिके पूर्व भी था । अब भी यह कार्य कारण स्वरूपके विना स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि ' सर्वं तं ० ' ( समी उसे परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे मिन्न देखता है ) इत्यादि श्रुति है । उत्पत्ति के पूर्व कार्यंके कारणरूप होने में वर्तमानकाल से कोई विशेष नहीं है । परन्तु क्या शब्द आदि रहित ब्रह्म जगत्‌का कारण है? हाँ है, किन्तु शब्द आदि युक्त कार्यं कारणरूपसे रहित न उत्पत्तिके पूर्व था और न अब है । इससे कार्य कारणरूप होनेसे अब ऐसा नहीं कह सकते कि उत्पत्तिके पूर्वं कार्यं असत् था, कार्यकारणके अभेद वर्णनके अवसर पर इसका विस्तारसे वर्णन करेंगे ॥ ७ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका जगद्रूप नहीं हो सकता, वैसे अचेतन प्रधानका कार्य कर्ता भोक्तारूप चेतना नहीं हो सकता, अतः सांख्यमतमें ही यह विभागश्रुति अनुपपन्न है । वैलक्षण्य होनेपर कार्यकारणभाव नहीं होता, इस सांख्यमतका परिहार किया गया है, जैसे अचेतन गोमय आदि चेतन वृश्चिक आदिका कारण है और चेतन पुरुष अचेतन केश नखादिका कारण है, वैसे ही चेतन ब्रह्म समस्त जगत्का कारण है || ६ || * परन्तु ' असदेवेदमग्र आसीत् ' ( उत्पत्तिके पूर्व यह असत् या ) तब इस श्रुतिका क्या तात्पर्य होगा? इस श्रुतिका तात्पर्य जगत्की नाम रूपात्मक स्थूल अवस्थाकी अपेक्षाको लेकर है

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३५२ ब्रहासूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥ ८ ॥

पदच्छेद - अपीतौ तद्वत्, प्रसङ्गात्, असमञ्जसम् । सूत्रार्थ - ( अपोतो ) प्रलयकालमें ( तद्वत् ) कार्य के समान ( प्रसङ्गात् ) कारण ब्रह्ममें भी अशुद्धत्वादि होने का प्रसंग आ जायगा, अतः ( अ मञ्जसम् ) शुद्धत्व आदि गुणवाला ब्रह्म जगत्का उपादान हो यह अयुक्त है । * अत्राह -- यदि स्थौल्य सावयवत्वाचेतनत्वपरिच्छित्रत्वा शुद्धयादिधर्मकं कार्य ब्रह्मकारणमभ्युपगम्येत, तदपीतौ प्रलये प्रति संसृज्यमानं कार्य कारणाविभागमापद्यमानं कारणमात्मीयेन धर्मेण दूषयेदित्यपीतौ कारणस्यापि ब्रह्मणः कार्यस्येवाशुद्धयादिरूप-प्रसङ्गात् सर्वज्ञं ब्रह्म जगत्कारणमित्य समञ्जसमिदमौपनिषदं दर्शनम् । अपि च समस्तस्य विभागस्याविभागप्राप्तेः पुनरुत्पत्तौ नियमकारणाभावाद्भोक्तृभोग्या दिविभागेनोत्पत्तिर्न प्राप्नोतीत्यसमञ्जसम् । अपि च भोक्तृणां परेण ब्रह्मणाऽविभागं गतानां कर्मादिनिमित्त-प्रलयेऽपि पुनरुत्पत्तावभ्युपगम्यमानायां मुक्तानामपि पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गादसमञ्जसम् । अथेदं जगदपीतावपि विभक्तमेव परेण ब्रह्मणावतिष्ठेत, एवमप्यपीतिश्चन संभवति, कारणाव्यतिरिक्तं च कार्य न संभवतीत्यसमञ्जसमेवेति ॥८ ॥

अत्रोच्यते-यहाँ पूर्वपक्षी कहते हैं - यदि ऐसा स्वीकार किया जाय कि स्थूलत्व, सावयवत्व, अचेतनत्व, परिच्छिन्नत्व, अशुद्धि बादि धर्म विशिष्ट कार्यका कारण ब्रह्म है, तो प्रलयकालमें लीन होता हुआ अर्थात् कारणके साथ अविभागको प्राप्त होता हुआ कार्यं कारणको अपने धर्मसे दूषित करेगा, इस प्रकार प्रलयमें कारण ब्रह्ममें भी कार्यके समान अशुद्धि आदि रूपका प्रसंग आ जायगा, इससे सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है यह औपनिषद् दर्शन असंगत हो जायगा । और समस्त विभागका कारण के साथ अविभाग प्राप्त होनेसे पुनः उत्पत्तिमें नियमकारणका अभाव होनेसे भोक्ता भोग्य आदि विभाग से उत्पत्ति प्राप्त न होगी, ऐसा होना भी असंगत है । प्रलयमें परब्रह्मके साथ अभेदको प्राप्त हुए भोक्ताओंकी कर्म आदि निमित्तका प्रलय होनेपर पुनः उत्पत्ति स्वीकार किये जानेसे मुक्त पुरुषों की भी पुनः उत्पत्ति प्रसक्त होगी, यह युक्त नहीं है । यदि जगत् प्रलयमें भी परब्रह्म से विभक्त ही अवस्थित हो तो ऐसा मानने से प्रलयका ही संभव न होगा । और कार्यका कारणसे अभिन्नत्व संभव नहीं होगा । इसलिए औपनिषद् दर्शन असंगत ही है ॥ ८ ॥

इस विषयपर कहते हैं— सत्यानन्दी - दीपिका अर्थात् जगत् की यह स्थूलावस्था उत्पत्तिके पूर्व नहीं थी । जगत्की कारणावस्थाको लेकर यह निषेध नहीं है । हे देवप्रिय! यदि कारणरूपसे भी जगत्‌को सत्ता न होती तो यह वर्तमान अवस्था कैसे प्रतीत होती, अतः यह वर्तमानप्रतीति कारणरूपसे कार्यकी सत्ता सिद्ध करती है । यदि असत् की उत्पत्ति मानें तो असत् वन्ध्यापुत्र आदिको भी उत्पत्ति होनी चाहिए? अतः कार्य कारणका अभेद कथन युक्त है और कार्यं उत्पत्तिके पहले कारणरूपसे सत् ही है ॥ ७ ॥

* ‘ अपि च ' आदिसे सूत्रकी दूसरी योजना है । ' अपि च ' आदिसे सूत्रका दूसरा अर्थ है । इसके अतिरिक्त यदि प्रलयमें भी कार्य कारणसे भिन्न रहेगा तो स्थितिकाल के समान कार्य कारणमें कभी लय न होगा । यदि कार्य कारणसे भिन्न है तो द्वैतापत्ति होगी और प्रलय भी सिद्ध न होगा । इस प्रकार औपनिषद् - दर्शन असंगत है ॥ ८ ॥

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अधि ० ३ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३५३ न तु दृष्टान्तभावात् ॥ ९ ॥

पदच्छेदन, तु, दृष्टान्तभावात् । सूत्रार्थ - ( न तु ) पूर्वोक्त असामञ्जस्य असंगतत्व दोष नहीं है, ( दृष्टान्तभावात् ) क्योंकि कारणमें लीन कार्य अपने कारणको दूषित नहीं करता, इस विषयमें दृष्टान्त हैं । * नैवास्मदीये दर्शने किंचिदसामञ्जस्यमस्ति । यत्तावदभिहितं कारणमपिगच्छ-कार्यकारणमात्मीयेन धर्मेण दूषयेदिति, तददूषणम्, कस्मात्? दृष्टान्तभावात् । सन्ति हि दृष्टान्ता यथा कारणमपिगच्छत्कार्यं कारणमात्मीयेन धर्मेण न दूषयति । तद्यथा शरावादयो मृत्प्रकृतिका विकास विभागावस्थायामुञ्च्चावचमध्यमप्रभेदाः सन्तः पुनः प्रकृतिमपिगच्छन्तो नतामात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति । पृथिवीविकारश्चतुर्विधो भूतग्रामो न पृथिवीमपीतावात्मी-येन धर्मेण संसृजति । त्वत्पक्षस्य तु न कश्चत दृष्टान्तोऽस्ति । अपीतिरेव हिन संभवेद्यदि कारणे कार्य स्त्रधर्मेणैवावतिष्ठेत । अनन्यत्वेऽपि कार्यकारणयोः कार्यस्य कारणात्मत्वं नतु कारणस्य कार्यात्मत्वं ' आरम्भणशब्दादिभ्यः ' ( ब्र ० सू ० २।१।१४ ) इति वक्ष्यामः । अत्यल्पं चेदमु-च्यते कार्यमपीतावात्मीयेन धर्मेण कारणं संसृजेदिति । स्थितावपि समानोऽयं प्रसङ्गः, कार्य-कारणयोरनन्यत्वाभ्युपगमात् । ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( वृ ०२।४।६ ), ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( छा ०७।२५ ।२ ), ‘ ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् ' ( मु ० २।२1११ ), सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ०३ । १।४।१ ) इत्येवमाद्याभिर्हि-श्रुतिभिरविशेषेण त्रिष्वपि कालेषु कार्यस्य कारणानन्यत्वं श्राव्यते । तत्र यः परिहारः कार्य-हमारे दर्शनमें किञ्चिद् भी अनौचित्य नहीं है । जो यह कहा गया है कि कारणमें लीन होता हुआ कार्य कारणको अपने धर्मसे दूषित करेगा, वह दूषण नहीं है, किससे? इससे कि इस विषय में दृष्टान्त हैं । जैसे कारणमें लीन होता हुआ कार्य कारणको अपने धर्मसे दूषित नहीं करता, इस विषय में दृष्टान्त हैं । जैसे कि मृत्तिकोपादानक सिकोरा आदि विकार विभाग अवस्था में छोटे, बड़े, मंझले आकारके होकर पुन: प्रकृतिमें लय होते हुए उसको अपने धर्मसे संसृष्ट नहीं करते । आभूषण आदि सुवर्णके. विकार आदि लय होते हुए सुवर्णको अपने धर्मसे सम्बन्धित नहीं करते । इसीप्रकार चार प्रकारका पृथिवीका विकार प्राणी समूह लय होता हुआ पृथिवीको अपने धर्मसे संसृष्ट नहीं करता । परन्तु तुम्हारे पक्षमें तो कोई दृष्टान्त नहीं है । यदि कारणमें कार्यं अपने धर्मसे ही रहेगा तो प्रलयका ही संभव न होगा । कार्यं कारणका अनन्यत्व ( अभेद ) होनेपर भी कार्य कारणात्मक है किन्तु कारण कार्यात्मक नहीं है, ऐसा ' आरम्भणशब्दादिभ्यः ' इस सूत्रमें कहेंगे । यह बहुत अल्प कहा गया कि प्रलयमें कार्य कारणको अपने धर्मोसे संसृष्ट करता है, स्थिति कालमें भी यह प्रसंग समान तुल्य ही है 1 । क्योंकि कार्य और कारणका अनन्यत्व स्वीकार किया है । ' इदं सर्व ० ' ( यह जो कुछ भी है वह सब आत्मा ही है ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( यह सब आत्मा ही है ) ' ब्रह्मैवेदम ० ' ( यह अमृत ब्रह्म ही आगे है ) ' सवं खल्विदं ब्रह्म ' ( निःसन्देह यह सब ब्रह्म ही है ) इत्यादि श्रुतियों द्वारा तीनों कालमें समान-रूपसे कार्यका कारणसे अभेद कहा गया है । उसमें कार्य और उसके धर्मोंका अविद्यासे अध्यारोपित होने से उनसे कारण संसृष्ट नहीं होता, इसप्रकार कार्यकालमें जो परिहार है वह प्रलयमें भी समान सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे प्रलयमें कार्यके धर्म नहीं रहते, वैसे कारणके मी नहीं रहने चाहिए, क्योंकि कार्य और कारणका अनन्यत्व है? यद्यपि कार्यं और कारण अभिन्न हैं, तो भी इतना भेद है कि कार्य कारणात्मक है किन्तु कारण कार्यात्मक नहीं है । ' सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्ग वचन समुद्र न तारङ्ग ( षट्पदी ३ )

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३५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ स्य तद्धर्काणां चाविद्याध्यारोपितत्वान्न तैः कारणं संसृज्यत इति, अपीतावपि स समानः । अस्ति चायमपरो दृष्टान्तो यथा स्वयं प्रसारितया मायया मायावी त्रिष्वपि कालेषु न संस्पृ-श्यते; अवस्तुत्वात् एवं परमात्मापि संसारमायया न संस्पृश्यत इति । यथाच स्वप्नहगेकः स्वप्नदर्शन मायया न संस्पृश्य इति । प्रबोधसंप्रसादयोरनन्वागतत्वात् । एवमवस्थात्रयसा-क्ष्येकोऽव्यभिचार्यवस्थात्रयेण व्यभिचारिणा न संस्पृश्यते । मायामात्रं ह्येतद्यत्परमात्मनोऽ-वस्थात्रयात्मनावभासानं रज्वा इव सर्पादिभावेनेति । अत्रोक्तं वेदान्तार्थ संप्रदायविद्भिरा-चार्यैः - ' अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते । अजमनिद्रमस्वतमद्वैतं बुध्यते तदा ' ( गौड ० कारि ० १।१६ ) इति । तत्र यदुक्तमपीतौ कारणस्यापि कार्यस्येव स्थौल्यादिदोषप्रसङ्ग इत्येतदयुक्तम् । यत्पुनरेतदुक्तम्- समस्तस्य विभागस्याविभागप्राप्तेः पुनर्विभागेनोत्पत्तौ नियमकारणं नोपण-द्यत इति, अयमप्यदोषः, दृष्टान्तभावादेव । यथा हि सुषुप्तिसमाध्यादावपि सत्यां स्वाभावि-क्यामविभागप्राप्तौ मिथ्याज्ञानस्यान पोदितत्वात्पूर्ववत्पुनः प्रबोधे विभागो भवति, एवमिहा-पि भविष्यति । श्रुतिश्चात्र भवति - ' इमाः सर्वाः प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामह इति, त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदा भवन्ति ' ( छा ० ६।९ ।२,३ ) इति । यथा ह्यविभागेऽपि परमात्मनि मिथ्याज्ञानप्रतिबद्धो विभाग-हैं । यह दूसरा दृष्टान्त है - जैसे अपनी फैलाई हुई मायासे तीनों कालमें भी स्वयं मायावी संसृष्ट नहीं होता, क्योंकि वह माया अवस्तु - मिथ्या है | वैसे ही परमात्मा भी संसारमायासे संसृष्ट नहीं होता, जैसे एक स्वप्नद्रष्टा स्वप्नदर्शन मायासे सम्बंधित नहीं होता, क्योंकि जाग्रत् और सुषुप्ति में वह स्वप्नदर्शन मायासे सम्बन्धित नहीं है, वैसे ही जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंका साक्षी, एक और अव्यभिचारी ( तीनोंमें समानरूपसे स्थित ) वह तीनों व्यभिचारी अवस्थाओंसे संसृष्ट नहीं होता । जैसे रज्जुकी सर्पादिरूपसे प्रतीति मिथ्या है, वैसे परमात्माकी तीनों ( उत्पत्ति, स्थिति, लय ) अवस्थाओंके रूपमें प्रतीति मिथ्या है । इस विषय में वेदान्त संप्रदायको जाननेवाले गौड़पाद आचार्यंने कहा है -- ' अनादि मायया ० ' ( जब अनादि मायासे सोया हुआ जीव [ तत्त्वमसि आदि महावाक्यों द्वारा ] जागता है अर्थात् तत्त्वज्ञान लाभ करता है तब उसे अज, अनिद्र और स्वप्नरहित अद्वैत आत्मतत्त्वका बोध प्राप्त होता है ) और जो यह कहा है कि प्रलय में कार्यके सदृश कारणमें भी स्थूलत्वादि दोषोंका प्रसंग होगा, यह प्रयुक्त है । पुनः जो यह कहा गया है कि प्रलय में समस्त विभागका कारणके साथ अविभाग प्राप्त होनेपर पुन: विभाग पूर्वक उत्पत्ति में नियम - कारण उपपन्न नहीं होता, यह भी दोष नहीं है, क्योंकि इस विषय में दृष्टान्त ही है । जैसे सुषुप्ति, समाधि आदिमें भी स्वाभाविक अविभाग - अपृथक्त्व प्राप्त होनेपर भी मिथ्याज्ञान निवृत्त न होनेके कारण प्रबोध- जाग्रत् होनेपर पुनः पूर्वके समान विभाग होता ही है, वैसे यहाँ भी प्रलयानन्तर सृष्टिकालमें भी पूर्वसृष्टिके समान ही विभाग होगा । इस विषय में श्रुति भी है - ' इमाः सर्वाः प्रजाः ० ' ( सुषुप्तिमें यह सम्पूर्ण प्रजा सत् ब्रह्मको प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गए । यहाँ सुषुप्तिके पूर्व प्रबोध समय में व्याघ्र, सिंह, भेड़िया शूकर, कीट पतंग, डाँस अथवा मच्छर जो जो भी होते हैं जागने पर वे ही पुनः होते हैं ) जैसे स्थिति कालमें परमात्मामें अविभाग होनेपर भी मिथ्याज्ञानसे प्रतिबद्ध विभाग व्यवहार स्वप्नके समान अव्याहत - अबाधित स्थित देखने में आता है, वैसे प्रलयमें भी मिथ्याज्ञानसे प्रतिबद्ध ( सम्बद्ध ) विभाग सत्यानन्दी -दीपिका घट मृत्तिकात्मक है, परन्तु मृत्तिका घटात्मक नहीं, यदि मानें तो पुनः मृत्तिका शराव आदि कार्यरूपमें नहीं हो सकेगी । इससे कार्य अपने धर्मं सहित कारणमें लीन होता है, किन्तु कारण अपने अवस्थित रहता है । क्योंकि कार्य कारणमें कल्पित होनेसे उसकी सत्ता कारण सत्तासे भिन्न नहीं है ॥ ९ ॥

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अधि ० ३ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३५५ व्यवहारः स्वप्नवदव्याहतः स्थितो दृश्यते, एवम पीतावपि मिथ्याज्ञान प्रविद्धैव विभाग-शक्तिरनुमास्यते । एतेन मुक्तानां पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः प्रत्युक्तः सम्यग्ज्ञानेन मिथ्याज्ञानस्या-पोदितत्वात् । यः पुनरयमन्तेऽपरो विकल्प उत्प्रेक्षितोऽथेदं परेण ब्रह्मणावतिष्ठेतेति सोऽप्यनभ्युपगमादेव प्रतिषिद्धः निषदं दर्शनम् ॥९ ॥

स्वपक्षदोषाच्च ॥ १० ॥

पदच्छेद - स्वपक्षदोषात्, च । सूत्रार्थ -- सांख्यने जो दोष कहे हैं, वे सांख्यमत में भी हैं । दोनोंके मत में समान हैं । * स्वपक्षे चैते प्रतिवादिनः साधारणा दोषाः प्रादुःष्युः । जगदपीतावपि विभक्तमेव । तस्मात्समञ्जसमिदमौप-अतः दोष और उसका परिहार कथमिति? उच्यते यत्ताव-दभिहितम् - विलक्षणत्वान्नेदं जगद्ब्रह्म प्रकृतिकमिति, प्रधानप्रकृतिकतायामपि समानमे-तत्, शब्दादिहीनात्प्रधानाच्छन्दादिमतो जगत उत्पत्त्यभ्युपगमात् । अतएव च विलक्षण-कार्योत्पत्त्यभ्युपगमात्समानः प्रागुत्पत्तेर सत्कार्यवाद प्रसङ्गः । तथाऽपीतौ कार्यस्य कारणा-विभागाभ्युपगमात्तद्वत्प्रसङ्गोऽपि समानः । तथा मृदितसर्वविशेषेषु विकारेष्वपीतावविभा-गात्मतां गतेष्विदमस्य पुरुषस्योपादानमिदमस्येति प्राक्प्रलयात्प्रतिपुरुषं ये नियता भेदाः, न ते तथैव पुनरुत्पत्तौ नियन्तुं शक्यन्ते, कारणाभावात् । विनैव कारणेन नियमेऽभ्युपगम्य-माने कारणाभावसाम्यान्मुक्तानामपि पुनर्बन्धप्रसङ्गः । अथ केचिद्भ ेदा अपीतावविभागमा-शक्तिका अनुमान होगा । इससे मुक्तपुरुषोंकी पुनरुत्पत्ति के प्रसंगका मी निराकारण हुआ, क्योंकि सम्यग्ज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है । और अन्तमें जो दूसरे विकल्पकी पुनः कल्पना की है कि यह जगत् प्रलयमें भी परब्रह्म के साथ विभक्त ही रहेगा, इसका भी स्वीकार न करने से प्रतिषेध

हुआ समझना चाहिए । इससे यह औपनिषद् दर्शन संगत है ॥ ९ ॥

प्रतिवादीके अपने पक्ष में भी ये साधारण - दोष प्रादुर्भूत होंगे । यह कैसे? कहते हैं - जो यह कहा गया है कि विलक्षण होनेके कारण यह जगत् ब्रह्मोपादानक नहीं है, वह तो प्रधानको जगत्के प्रति उपादानकारण माननेपर भी समान है, क्योंकि सांख्य शब्दादिरहित प्रधानसे शब्दादि युक्त जगत् की उत्पत्ति मानते हैं । इससे - विलक्षणकारणसे विलक्षणकार्यकी उत्पत्ति मानने से उत्पत्तिके पूर्व असत्कार्यवाद प्रसंग समान है । उसी प्रकार प्रलय में कार्यका कारणके साथ अविभाग स्वीकार करनेसे कार्यंके धर्मोसे कारणका संस्पृष्ट होना समान है अर्थात् कार्य के स्थूलत्व आदि धर्मोसे कारण प्रधानमें भी स्थूलत्व आदि प्रसंग होगा । एवं जिन विकारोंके जाति आदि सब विशेष नष्ट हो गये हैं, प्रलयमें कारणके साथ अभेदको प्राप्त होनेपर प्रलयके पूर्व प्रत्येक पुरुषके प्रति यह इस पुरुषका उपादान है यह इस पुरुषका, इस प्रकार जो नियत भेद थे उनका उसी प्रकार पुनरुत्पत्ति में नियमन नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा नियमन करने में कोई कारण नहीं है । यदि कारणके बिना ही नियमन स्वीकार करें तो कारणाभावके समान होनेसे मुक्तात्माओं को भी पुनः संसार प्रसंग हो जायगा । ऐसा यदि कहो कि प्रलय में कुछ विशेष अविभागको प्राप्त होते हैं और कुछ नहीं होते, तो जो सत्यानन्दी - दीपिका * बद्ध और मुक्तोंकी व्यवस्था करनेके लिए यदि कहो कि प्रलयमें बद्धपुरुष के कर्म आदि लीन नहीं होते, इससे वे पुनः उत्पन्न होते हैं और मुक्तपुरुषोंके कर्म आदि लीन हो जाते हैं, इससे वे पुनः उत्पन्न नहीं होते, यह ठीक है, परन्तु जो भेद प्रलयमें प्रधानसे भिन्न रहते हैं वे प्रधानके कायं सिद्ध नहीं होंगे, इत्यादि दोष भी हैं । ये दोष दोनों पक्षों में समान हैं, इनके स्वीकार किये विना उक्त व्यवस्था उपपन्न नहीं होगी ॥ १० ॥

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३५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य - [ अ ० २ पा ० १ पद्यन्ते केचिन्नेति चेत् - ये नापद्यन्ते तेषां प्रधानकार्यत्वं न प्राप्नोतीत्येवमेते दोषाः साधारणत्वान्नान्यतरस्मिन्पक्षे चोदयितव्या भवन्तीत्यदोषतामेवैषां द्रढयति, अवश्या-श्रयितव्यत्वात् ॥१० ॥

तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यविमोक्षप्रसङ्गः ॥ ११ ॥

पदच्छेद - तर्काप्रष्ठानात्, अपि, अन्यथा, अनुमेयम् इति, चेत्, एवम् अपि अविमोक्ष प्रसंग: । सूत्रार्थ - ( तर्काप्रतिष्ठानादपि ) केवल तर्ककी प्रतिष्ठा न होनेसे ब्रह्म में वेदान्तवाक्य समन्वयका कोई विरोध नहीं है, किसी तर्कके अप्रतिष्ठित होनेपर भी ( अन्यथा ) अन्य प्रकारसे अर्थात् प्रतिष्ठित तर्कसे ( अनुमेयम् ) वेदान्त समन्वय विरोधका अनुमान करना चाहिए, ( इति चेत् ) ऐसा कहो, ( एवमपि ) कुछ तर्कों के प्रतिष्ठित होनेपर भी ( अविमोक्ष प्रसङ्गः ) प्रकृतविषयमें तर्क अप्रतिष्ठितत्व दोषसे मुक्त नहीं हो सकता । अथवा कपिल, कणादादिके परस्पर विरुद्ध तर्कोंसे तत्त्वनिर्णय ही नहीं हो सकता, इससे संसारसे कभी मोक्ष नहीं हो सकेगा । * इतश्च नागमगम्येऽर्थे केवलेन तर्केण प्रत्यवस्थातव्यम् । यस्मान्निरागमाः पुरुषोत्प्रेक्षा मात्र निबन्धनास्तर्का अप्रतिष्ठिता भवन्ति, उत्प्रेक्षाया निरङ्कुशत्वात् । तथा हि कैश्चिदभियुक्तैर्यत्नेनोत्प्रेक्षितास्तर्का अभियुक्ततरैरन्यैराभास्यमाना दृश्यन्ते । तैरप्युत्प्रेक्षिताः सन्तस्ततोऽन्यैराभास्यन्त इति न प्रतिष्ठितत्वं तर्काणां शक्य-माश्रयितुम्, पुरुषमतिवैरूप्यात् । अथ कस्यचित्प्रसिद्ध माहात्म्यस्य कपिलस्य चान्यस्य वा संमतस्तर्कः प्रतिष्ठित इत्याश्रीयेत, एवमप्यप्रतिष्ठितत्वमेव प्रसिद्ध माहात्म्यानु-मतानामापि तीर्थंकराणां कपिलकणभुक्प्रभृतीनां परस्परविप्रतिपत्तिदर्शनात् । अथो-च्येतान्यथा वयमनुमास्यामहे यथा नाप्रतिष्ठा दोषो भविष्यति । नहि प्रतिष्ठितस्तर्क एव नास्तीति शक्यते वक्तुम् । एतदपि हि तर्काणामप्रतिष्ठितत्वं तर्केणैव प्रति-छाप्यते, केषांचित्तर्काणामप्रतिष्ठितत्वदर्शनेनान्येषामपि तजातीयकानां तर्काणाम-afa भागको प्राप्त नहीं होते वे प्रधानके कार्यं नहीं होंगे । इस प्रकार ये दोष दोनों पक्षोंमें साधारण होनेसे एक पक्ष में आक्षेपके योग्य नहीं हो सकते, यह बात तो इन दोषोंको अदोषताको दृढ़ करती है, क्योंकि ये दोष अवश्य स्वीकार करने योग्य हैं ॥ १० ॥

और इस हेतुसे भी आगम गम्य अर्थमें वेद निरपेक्ष तर्कसे विरोध करना उचित नहीं है, क्योंकि आगम निरपेक्ष और केवल पुरुष कल्पना मूलक तर्क प्रतिष्ठित नहीं होते, कारण कि कल्पना निरंकुश होती है । जैसे कुछ विद्वानोंसे यत्न पूर्वक कल्पित तर्क अन्य विशेष विद्वानों द्वारा आमास - से दिखाये जाते हैं, उनसे भी कल्पित हुए तर्क उनसे अन्य विशिष्ट विद्वानोंद्वारा आभास से किये जाते हैं, इस कारण तर्कोंकी प्रतिष्ठा कदापि ग्रहण नहीं की जा सकती, क्योंकि पुरुषोंकी बुद्धि विलक्षण है । यदि ऐसा स्वीकार करो कि किसी प्रसिद्ध माहात्म्यवाले कपिल अथवा किसी अन्य सम्मत तर्क प्रतिष्ठित हो तो वह भी पूर्वोक्त दोषसे अप्रतिष्ठित ही है । कारण कि जिनका माहात्म्य प्रसिद्ध समझा गया है । ऐसे शास्त्र प्रणेता कपिल, कणाद आदिमें मी परस्पर विरोध देखने में आता है । यदि ऐसा कहा जाय, जैसे अप्रतिष्ठा दोष न आवे इस प्रकार दूसरी रीति से हम अनुमान करेंगे । प्रतिष्ठित तर्क ही नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, यह तर्कों का अप्रतिष्ठितत्व भी तर्कसे ही प्रतिष्ठापित किया जाता है । कुछ सत्यानन्दी - दीपिका * वेद निरपेक्ष तर्कमें अप्रतिष्ठारूप दोषकी संभावना होनेसे निर्दोष वेदान्त - समन्वयका बाध नहीं हो सकता । यदि कपिलके माहात्म्यको सुनकर उनके तर्कसे सिद्ध प्रधानवादको माना जाय, तो कणाद आदिके माहात्म्यको सुनकर उनके तर्कसे सिद्ध परमाणुवाद आदिको क्यों न माना जाय? इसलिए परस्पर विरुद्ध होनेसे तर्क अप्रतिष्ठित ही है ।