श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 391–400
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 391–400
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अधि ० ३ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो -दीपिका सहित ३५७ प्रतिष्ठितत्वकल्पनात् । सर्वतर्काप्रतिष्ठायां च लोकव्यवहारोच्छेदप्रसङ्गः । अतीतवर्तमाना-ध्वसाम्येन नागतेऽप्यध्वनि सुखदुःखप्राप्ति परिहाराय प्रवर्तमानो लोको दृश्यते । श्रुत्य-र्थविप्रतिपत्तौ चार्थाभासनिराकरणेन सम्यगर्थेनिर्धारणं तर्केणैव वाक्यवृत्तिनिरूपणरूपेण क्रियते । मनुरपि चैवं मन्यते - ' प्रत्यक्षमनुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् । त्रयं सुविदितं कार्यं धर्म-शुद्धिमभीप्सता ॥ ' इति I । ' आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना । यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः । ' ( १२/१०५, १०६ ) इति च ब्रुवन् । अयमेव तर्कस्यालङ्कारो यदप्रतिष्ठितत्वं नाम । एवं हि सावद्यतर्कपरित्यागेन निरवद्यस्तर्कः प्रतिपत्तव्यो भवति । नहि पूर्वजो मूढ आसीदित्या-त्मनापि मूढेन भवितव्यमिति किंचिदस्ति प्रमाणम् । तस्मान्न तर्काप्रतिष्ठानं दोष इति चेत्-एवमप्यविमोक्षप्रसङ्ग । यद्यपि क्वचिद्विषये तर्कस्य प्रतिष्ठितत्वमुपलक्ष्यते, तथापि प्रकृते तावद्विषये प्रसज्यत एवाप्रतिष्ठितत्वदोषाद निर्मोक्षस्तर्कस्य, न हीदमतिगम्भीरं भावयाथा-त्म्यं मुक्तिं निबन्धनमागममन्तरेणोत्प्रेक्षितुमपि शक्यम् । रूपाद्यभावाद्धि नायमर्थः प्रत्यक्ष-गोचरः, लिङ्गाद्यभावाश्च नानुमानादीनामिति चावोचाम । अपि च सम्यग्ज्ञानान्मोक्ष इति सर्वेषां मोक्षवादिनामभ्युपगमः । तच्च सम्यग्ज्ञानमेकरूपम्, वस्तुतन्त्रत्वात् । एकरूपेण हाव-स्थितो योऽर्थः स परमार्थः । लोके तद्विषयं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानमित्युच्यते - यथाग्निरुष्ण इति । तर्कोंमें अप्रतिष्ठितत्वके दर्शनसे उसके समान जातीय अन्य तर्कोंमें मी अप्रतिष्ठित ह नेकी कल्पना की जाती है और सब तर्कोंके अप्रतिष्ठित होनेपर तो लोकव्यवहारका उच्छेद प्रसङ्ग हो जायगा, क्योंकि भूत और वर्तमान विषयके सादृश्यसे भविष्यत् विषयमें भी सुख प्राप्ति और दुःख परिहार के लिए प्रवृत्त होते हुए लोग देखे जाते हैं । श्रुत्यर्थमें विरोध हो, तो अर्थामासका निराकरण पूर्वक यथार्थ अर्थका निर्णय वाक्यवृत्ति निरूपणरूप तर्क से किया जाता है । ' प्रत्यक्षमनुमानं च ० ' ( धर्मकी शुद्धि धर्मका अधर्मं से भेद जाननेकी इच्छा करनेवाले पुरुषको प्रत्यक्ष, अनुमान ( तर्क ) और विविध वेदानुकूल शास्त्र, इन तीनों द्वारा धर्मको जानना चाहिए ) और ' आर्ष ० ' ( ऋषि प्रणीत धर्मोपदेशका वेद और शास्त्र अविरुद्ध तर्क से जो अनुसंधान करता है वह धर्मको जानता है दूसरा नहीं ) ऐसा कहते हुए मनु भी इस प्रकारके कुछ तर्कोंको मानते हैं । अप्रतिष्टित होना ही तो तर्कका अलङ्कार है । इस प्रकार दोष युक्त तर्कका परित्याग कर दोष रहित तर्क स्वीकार करने योग्य है । पूर्वज मूढ़ था, इससे अपनेको भी मूढ होना चाहिए, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसलिये यदि ऐसा कहो कि तर्ककी अप्रतिष्ठा दोष नहीं है, तो ऐसा माननेपर भी तर्क दोष मुक्त नहीं हो सकता, यद्यपि किसी एक विषयमें तर्ककी प्रतिष्ठा उपलक्षित होती है, तो मी प्रकृत विषयमें अप्रतिष्ठितत्व दोष से तर्क में अविमोक्ष ( मुक्त न होना ) दोष तो प्रसक्त ही है । इस अति-गम्भीर ( वेद भिन्न प्रमाणागम्य ) मुक्तिके हेतु जगत् के कारण ब्रह्मके अद्वितीयत्वका निश्चय शास्त्रके विना केवल कल्पनासे नहीं हो सकता, क्योंकि रूपादि रहित होनेसे यह पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय नहीं है और लिङ्ग आदिके अभाव होनेसे अनुमान आदिका विषय नहीं है, ऐसा हम कह चुके हैं | और सब मोक्ष वादियोंका यह सिद्धान्त है कि सम्यग्ज्ञानसे ही मोक्ष होता है । और वह सम्यग्ज्ञान एकरूप है, क्योंकि वस्तुके अधीन है । सदा एकरूपसे रहनेवालाजो पदार्थ वह यथार्थ है । लोकमें तत् विषयक ज्ञान सम्यग्ज्ञान है ऐसा कहा जाता है, जैसे अग्नि उष्ण है । मोक्षके सत्यानन्दी - दीपिका * यदि सब तर्कोंको प्रतिष्ठा हो जाय तो पूर्वपक्ष ही सिद्ध नही होगा, और पूर्वपक्षके तर्कके समान सिद्धान्त तर्ककी भी प्रतिष्ठा सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि आखिर वह भी तो तर्क हैं । इसलिये तर्कके लिए अप्रतिष्ठा दोष नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा मानने पर मी तर्क दोष मुक्त नहीं हो सकता, कारणकि हमें सर्वदा तर्कको दोष युक्त कहनेका व्यसन नहीं है, किन्तु ब्रह्मका उपादानकारण
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३५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ तत्रैवं सति सम्यग्ज्ञाने पुरुषाणां विप्रतिपत्तिरनुपपन्ना । * तर्कज्ञानानां त्वन्योन्यविरोधा-प्रसिद्धा विप्रतिपत्तिः । यद्धि केनचित्तार्किकेणेदमेव सम्यग्ज्ञानमिति प्रतिपादितं तदपरेण व्युत्थाप्यते, तेनापि प्रतिष्ठापितं ततोऽपरेण व्युत्थाप्यत इति प्रसिद्धं लोके, कथमेकरूपान-वस्थितविषयं तर्कप्रभवं सम्यग्ज्ञानं भवेत्? नच प्रधानवादी तर्कविदामुत्तम इति सर्वैस्ता-किकैः परिगृहीतो येन तदीयं मतं सम्यग्ज्ञानमिति प्रतिपद्येमहि । नच शक्यन्तेऽतीतानाग-तवर्तमानास्तार्किका एकस्मिन्देशे काले च समाहर्तुं येनं तन्मतिरेक रूपैकार्थविषया सम्यङ्यतिरिति स्यात् । वेदस्य तु नित्यत्वे विज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वे च सति व्यवस्थितार्थ -विषयत्वोपपत्तेः:,, तजनितस्य ज्ञानस्य सम्यक्त्वमतोतानागतवर्तमानैः सर्वैरपि तार्किकैर-पह्नोतुमशक्यम् । अतः सिद्धमस्यैवौपनिषदस्य ज्ञानस्य सम्यग्ज्ञानत्वम् । अतोऽन्यत्र सम्यग्ज्ञानत्वानुपपत्तेः संसाराविमोक्ष एव प्रसज्येत । अत आगमवशेनागमानुसारित-कवशेन च चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चेति स्थितम् ॥ ११ ॥
( ४ शिष्टापरिग्रहाधिकरणम् सू ० १२ ) एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ १२ ॥
पदच्छेद – एतेन, शिष्टापरिग्रहाः, अपि, व्याख्याताः । सूत्रार्थ - ( एतेन ) देवल आदि शिष्टोंसे किसी अंश में गृहीत प्रधान कारणवादके निराकरणसे ( शिष्टापरिग्रहा अपि ) शिष्टों से किसी भी अंश में अपरिगृहीत अणु आदि कारणवाद मी ( व्याख्याताः ) निराकृत हुए समझने चाहिए । साधन सम्यग्ज्ञानके एक होनेपर यथार्थ ज्ञानके विषय में पुरुषोंकी विप्रतिपत्ति - विरोध अनुपपन्न है । . तर्क ज्ञानोंमें तो परस्पर विरोध होनेसे विप्रतिपत्ति प्रसिद्ध है । और यह भी लोक में प्रसिद्ध है कि किसी एक तार्किकद्वारा तर्क से यह सम्यग्ज्ञान है, ऐसा प्रतिपादित है, उसका अन्यद्वारा खण्डन किया जाता है । और दूसरे तार्किकद्वारा तर्क से स्थापित सम्यग्ज्ञान भी उससे अन्य तार्किक द्वारा खण्डन किया जाता है । एकरूपसे अनवस्थित विषयक तर्कसे उत्पन्न ज्ञान सम्यग्ज्ञान कैसे हो सकता है? प्रधानवादी सांख्य तर्क वेत्ताओंमें उत्तम है ऐसा सब ताकिकोंने स्वीकार तो नहीं किया है जिससे हम उसके मतको सम्यग्ज्ञान मान सकें । अतीत भूत, भविष्यत् और वर्तमान तार्किक एक देश और एक कालमें एकत्रित नहीं किये जा सकते, जिससे कि उनकी मति एकरूप और एकार्थ विषयक होकर सम्यग्ज्ञान हो । वेद तो नित्य और ज्ञानकी उत्पत्तिका हेतु होनेसे व्यवस्थित अर्थ विषयक हो सकता है । उससे उत्पन्न ज्ञानके यथार्थत्वका भूत, भविष्यत् और वर्तमानके सभी तार्किकों द्वारा निषेध नहीं किया जा सकता, अतः यह सिद्ध हुआ कि उपनिषद्गम्यज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है । इसलिए उससे भिन्न ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं हो सकता, अतः उससे संसारसे मुक्ति नहीं हो सकेगी । इससे यह सिद्ध हुआ कि आगमके बलसे और आगम अनुकूल तर्कके बलसे चेतन ब्रह्म जगत्का निमित्तकारण और
उपादानकारण है ॥। ११ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका नहीं है, जड़ प्रधान जगत्का कारण है, ऐसा तर्क अप्रतिष्ठित और दोष युक्त है । जगत्का कारण भूत ब्रह्म तो वेदसे भिन्न प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय ही नहीं है, अतः वहाँ तर्कका अवकाश ही नहीं है । ' यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ ' ( मामती ) ( अनुमान करनेवाले कुशल पुरुषोंसे यत्नपूर्वक जो अर्थ अनुमान द्वारा सिद्ध किया गया है, उसे भी अन्य अधिक बुद्धिवाले अन्यथा कर देते हैं ) इसलिए तर्कसे उत्पन्न ज्ञान परस्पर विरुद्ध होनेसे सम्यग्ज्ञान नहीं हो सकता । यथार्थज्ञानमें तो कोई विरोध नहीं होता, कारण कि वह यथार्थं वस्तु
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अधि ० ४ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३५ ९ * वैदिकस्य दर्शनस्य प्रत्यासन्नत्वाद्गुरुतरतर्कबलोपेतत्वाद्वेदानुसारिभिश्च कैश्चि-च्छिषैः केनचिदंशेन परिगृहीतत्वात्प्रधानकारणवादं तावद्वयपाश्रित्य यस्तर्कनिमित्त आक्षेपो वेदान्तवाक्येषूद्भावितः स परिहृतः । इदानीमण्वादिवादव्यापाश्रयेणापि कैश्चिन्म-न्दमतिभिर्वेदान्तवाक्येषु पुनस्तर्कनिमित्त आक्षेप आशङ्कयेत, इत्यतः प्रधानमल्ल निबर्हण -न्यायेनातिदिशति । परिगृह्यन्त इति परिग्रहाः, न परिग्रहा अपरिग्रहाः, शिष्टानामपरिग्रहाः शिष्टापरिग्रहाः । एतेन प्रकृतेन प्रधान कारणवादनिराकरणकारणेन शिष्ठैर्मनुव्यासप्रभृतिभिः केन चिदंशेनापरिगृहीता येऽण्वादिकारणवादास्तेऽपि प्रतिषिद्धतया व्याख्याता निराकृता वैदिक दर्शनके निकटवर्ती होने, अनेक प्रबल तर्कोंसे युक्त होने और वेदके अनुसारी कुछ शिष्टोंद्वारा किसी एक अंशसे परिगृहीत होनेके कारण प्रधानकारणवादका आश्रयकर जो तर्क निमित्त आक्षेप वेदान्तवाक्योंपर किया गया था, उसका तो परिहार किया गया है । अब अणु आदि वादका आश्रयकर कुछ मन्दमति वेदान्तवाक्योंपर पुनः तर्क निमित्तक आक्षेपकी आशङ्का करते हैं, अत: प्रधानमल्लनिबर्हणन्यायसे अतिदेश करते हैं जिनका अच्छी तरह ग्रहण किया जाय वे परिग्रह कहलाते हैं, जो परिग्रह नहीं वे अपरिग्रह कहे जाते हैं, जिनका शिष्टोंसे परिग्रहण नहीं होता वे शिष्टा-परिग्रह हैं । शिष्ट- मनु, व्यास आदिने किसी एक अंशमें मी जो अणु आदि कारणवाद स्वीकृत सत्यानन्दी - दीपिका विषयक होता है । अतः यह सिद्ध हुआ कि सांख्यद्वारा केवल तर्कसे सिद्ध प्रधान जगत्का उपादान कारण नहीं है, किन्तु चेतन ब्रह्म ही जगत्का निमित्त और उपादान कारण है । पूर्वपक्षमें समन्वयकी सिद्ध है, सिद्धान्त में समन्वयकी सिद्धि है ॥ ११ ॥
* वेदान्तवादके समान प्रधानवाद भी सत्कार्यवाद है और उसमें आत्माको असङ्ग और चैतन्य माना गया है, कार्यकारणका अभेद है, इत्यादि कुछ अंशोंमें प्रधानवाद वेदान्तवादके निकट -वर्ती है । देवल आदि कुछ शिष्ट पुरुषोंने कुछ अंशोंमें उसे स्वीकार भी किया है । यहाँ वादका अर्थ स्वामिमत कथन है । सत्कार्यवाद और असत्कयंवाद भेदसे यह वाद दो प्रकारका है, परिणामवाद और विवर्तवाद भेदसे सत्कार्यवाद भी दो प्रकारका है । सांख्योंका परिणामवाद है, ' तात्त्विकोऽन्यथा-भावः परिणामः ' ( वास्तविक अन्यथामाव परिणाम है ) उनके मतमें कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है, इससे कार्य और कारण अभिन्न हैं और सत् हैं । जैसे दूध दहीरूपमें परिणत होता है । कार्यकी नामरूपसे अनभिव्यक्ति कारण है और साधनोंद्वारा नाम - रूपसे अभिव्यक्ति कार्य है । अतः कार्यं कारणसे भिन्न नहीं है । ब्रह्मवादी वेदान्तमतमें विवंतवाद है । उनके मतमें कारण ही कार्य-रूपमें मासता है, अतः कारण सत् है और कार्यं कल्पित मिथ्या है । नैयायिक और मध्वोंका असत्कार्यवाद है उसे आरम्भवाद भी कहा जाता है । उनके मतमें उत्पत्तिके पूर्वं कार्य नहीं है, सांधनोंद्वारा उत्पन्न किया जाता है । जैसे मुक्तिकामें पहलेसे घटका अभाव है । कुम्हारने दण्ड आदि साधनोंसे उसे उत्पन्न किया । इसलिए उनके मतमें कार्य कारणसे भिन्न है । इसीप्रकार योगाचार के मतमें क्षणिक विज्ञानवाद, माध्यमिक के मतमें शून्यवाद और अहंतोंका स्याद्वाद इत्यादि भी समझने चाहिए । परमाणु, स्वभाव, शून्यवाद आदि निर्मूल होनेके कारण दुर्बल हैं, अत: उनका पृथक् कथन न कर केवल अतिदेश किया गया है । जितने कारणवाद हैं उन सबको प्रधानवादने अपने तर्क आदि बलसे परास्तकर उनमें अपनी प्रधानता प्राप्त की है, इसलिए वेदान्तने उन सबमेंसे प्रधान कारणवादके निराकरणमें अधिक प्रयत्न किया है । प्रधानवादके निराकरणसे शेष सब कारणवादोंका निराकरण समझना चाहिए । विभु होनेसे ब्रह्म द्रव्यका उपादानकारण नहीं है, और परम महत्परिमाण, सर्वं संयोगित्व-
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३६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ द्रष्टव्याः, तुल्यत्वान्निराकरणकारणस्य, नात्र पुनराशङ्कितव्यं किंचिदस्ति । तुल्यमत्रापि परमगम्भीरस्य जगत्कारणस्य तर्कानवगाह्यत्वं, तर्कस्याप्रतिष्ठितत्वम्, अन्यथानुमानेऽ-प्यविमोक्षः, आगमविरोधश्वेत्येवंजातीयकं निराकरणकारणम् ॥ १२ ॥
( ५ भोक्त्रापत्त्यधिकरणम् सू ० १३ ) भोक्त्रापत्तेरविभागश्च त्स्याल्लोकवत् ॥ १३ ॥
पदच्छेद – भोक्त्रापत्तेः, अविभागः, चेत्, स्यात्, लोकवत् । सूत्रार्थ - ( मोक्त्रापत्तेः ) अद्वितीय ब्रह्म यदि जगत्का उपादान हो, तो सब पदार्थ ब्रह्मसे अभिन्न होनेके कारण भोग्य पदार्थ भोक्ता हो जायेंगे, इससे ( अविभागः ) प्रत्यक्ष सिद्ध मोक्ता, भोग्य आदि विभाग ही न रहेगा, ( चेत् ) ऐसा यदि कहो, तो ( लोकवत् ) जैसे व्यवहार में घट आदि कार्य यद्यपि मृत्तिका अभिन्न हैं, तो भी परस्पर भिन्न हैं, ( स्यात् ) वैसे कारणसे अमिन्न होनेपर भी मोक्ता, भोग्य आदि प्रपञ्चका परस्पर विभाग रहेगा । * अन्यथा पुनर्ब्रह्मकारणवादस्तर्कबलेनैवाक्षिप्यते । यद्यपि श्रुतिः प्रमाणं स्वविषये भवति, तथापि प्रमाणान्तरेण विषयापहारेऽन्यपरा भवितुमर्हति यथा मन्त्रार्थवादौ । तर्कोऽपि स्वविषयादन्यत्राप्रतिष्ठितः स्यात्, यथा धर्माधर्मयोः । किमतो यद्येवम्? अत इदमयुक्तं यत्प्रमाणान्तरप्रसिद्धार्थबाधनं श्रुतेः । कथं पुनः प्रमाणान्तरप्रसिद्धोऽर्थः श्रुत्या बाध्यत इति? अत्रोच्यते - प्रसिद्धो ह्ययं भोक्तृभोग्यविभागो लोके भोक्ता चेतनः शारीरः, भोग्याः शब्दादयो विषया इति । यथा भोक्ता देवदत्तो भोज्य ओदन इति । तस्य च विभाग-नहीं किए हैं, वे कारणवाद भी इस प्रकृत प्रधान कारणवादके निराकरण कारणसे प्रतिषिद्धरूप से व्याख्यात - निराकृत समझने चाहिए । निराकरणका कारण समान होनेसे यहाँ वेदान्त समन्वयपर पुनः कुछ भी आशङ्कितव्य नहीं है । यहाँ वैशेषिक आदि मतमें भी परम गम्भीर जगत्कारणका तर्का-गम्यत्व, तर्काप्रतिष्ठितत्व अन्यथा - दूसरी रीतिसे अनुमान करनेपर भी मोक्षाभाव और आगमविरोध इस प्रकारका निराकरण कारण समान है ॥ १२ ॥
पुनः अन्य प्रकारसे ब्रह्मकारणवादपर तर्कके बलसे ही आक्षेप किया जाता है, यद्यपि श्रुति अपने विषय में प्रमाण है, तो भी अन्य प्रमाणसे विषयका बाध होनेपर उसका अन्य विषयक ( गौण विषयक ) होना युक्त है, जैसे मन्त्र और अर्थवाद अन्य विषयक होते हैं । तर्क भी स्वविषय से अन्यत्र अप्रतिष्ठित होता है जैसे धर्म और अधर्म में । यदि ऐसा हो, तो इससे क्या? इससे यह अयुक्त है कि अन्य प्रमाणसे प्रसिद्ध अर्थंका श्रुतिसे बाघ हो । पुनः यह कैसे कहते हो कि अन्य प्रमाणसे प्रसिद्ध अर्थका श्रुतिसे बाध किया जाता है । इस विषयपर कहते हैं - लोकमें यह मोक्तृ, भोग्य विभाग प्रसिद्ध है, भोक्ता चेतन जीवात्मा है और भोग्य शब्द आदि विषय हैं, जैसे देवदत्त भोक्ता है और ओदन ( मात ) भोज्य है । यदि मोक्ता भोग्यभावको प्राप्त हो और भोग्य भोक्तृभावको प्राप्त हो, तो उस विभागका अभाव प्रसक्त होगा । इन दोनोंका परम कारण ब्रह्मसे अनन्यत्व होनेके कारण परस्परमें सात्यानन्दी - दीपिका विभुत्व निर्गुण ब्रह्म में नहीं है, इत्यादि आक्षेप श्रुतिसे बाधित हैं । और अणु आदि कारणवादोंके निराकरण में वही कारण है जो प्रधान कारणवादके निराकरण में है । इसलिए तर्कसे वेदान्तसमन्वयका बाध नहीं हो सकता है ॥ १२ ॥
* ब्रह्मको जगत्का उपादानकारण प्रतिपादक श्रुति ब्रह्म के साथ जगत्का अभेद कहती है, परन्तु वह प्रत्यक्षादि प्रमाणों और तर्कसे बाधित है, क्योंकि उनमें ब्रह्म और जगतका कार्यकारणभाव
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अधि ० ५ सू ० १३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३६१ स्याभावः प्रसज्येत, यदि भोक्ता भोग्यभावमापद्येत, भोग्यं वा भोक्तृभावमापद्येत । तयो-श्वेतरेतरभावापत्तिः परमकारणाद्ब्रह्मणोऽनन्यत्वात्प्रसज्येत । न चास्य प्रसिद्धस्य विभागस्य बाधनं युक्तम् । यथा त्वद्यत्वे भोक्तृभोग्ययोर्विभागो दृष्टस्तथातीतानागतयो-रपि कल्पयितव्यः । तस्मात्प्रसिद्धस्यास्य भोक्तृभोग्यविभागस्याभावप्रसङ्गादयुक्तमिदं ब्रह्मकारणतावधारणमिति * चेत्कश्चिच्चोदयेत्तं प्रति ब्रूयात् - स्याल्लोकवदिति । उपपद्यत एवायमस्मत्पक्षेऽपि विभागः, एवं लोके दृष्टत्वात् । तथा हि- समुद्रादुदकात्मनोऽनन्य-त्वेऽपि तद्विकाराणां फेनवीचीतरङ्गबुदबुदादीनामितरेतर विभाग इतरेतरसंश्लेषादिलक्ष-णश्च व्यवहार उपलभ्यते । नच समुद्रादुदकात्मनोऽनन्यत्वेऽपि तद्विकाराणां फेनतरङ्गा-दीनामितरेतरभावापत्तिर्भवति । न च तेषामितरेतरभावानापत्तावपि समुद्रात्मनोऽन्यत्वं भवति । एवमिहापि - न च भोक्तृभोग्ययोरितरेतरभावापत्तिः, नच परस्माद्ब्रह्मणोऽन्य-त्वं भविष्यति । यद्यपि भोक्ता न ब्रह्मणो विकारः, ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' ( तै ० २।६ ) इति स्रष्टुरेवाविकृतस्य कार्यानुप्रवेशेन भोक्तृत्वश्रवणात्, तथापि कार्यमनुप्रविष्टस्या-स्त्युपाधिनिमित्तो विभाग आकाशस्येव घटाद्युपाधिनिमित्त इत्यतः परमकारणाद्ब्रह्मणो-ऽनन्यत्वेऽप्युपपद्यते भोक्तृभोग्यलक्षणो विभागः समुद्रतरङ्गादिन्यायेनेत्युक्तम् ॥१३ ॥
अभेद हो जायगा । इस लोक प्रसिद्ध विभागका [ श्रुतिसे ] बाघ होना युक्त नहीं है । जैसे वर्तमान में भोक्तृ - भोग्य विभाग प्रत्यक्ष सिद्ध है, वैसे भूत और भविष्यत् में भी उसकी कल्पना करनी चाहिए । इस-लिए इस प्रसिद्ध मोक्तृ भोग्य विभागके अभावका प्रसंग होनेसे यह ब्रह्मकारणत्व निश्चय अयुक्त है । सिद्धान्ती - ऐसी यदि कोई शङ्का करे, तो उसके प्रति ऐसा कहना चाहिए - लोकके समान विभाग होगा । हमारे पक्षमें भी यह विभाग उपपन्न होता ही है, क्योंकि लोकमें ऐसा देखने में आता है । जैसे कि उदकरूप समुद्रसे फेन, वीची ( बड़ी तरंग ), तरंग और बुल्बुले आदि उसके विकार अनन्य होनेपर भी उनका परस्पर विभाग और परस्पर संश्लेश आदि रूप व्यवहार उपलब्ध होता है । और उदकरूप समुद्र से अनन्य होनेपर भी उसके विकार फेन तरङ्ग आदिकी अन्योन्यात्मकता नहीं होती और उनकी अन्योन्यात्मकता न होनेपर भी वे समुद्रस्वरूपसे अन्य नहीं होते । वैसे यहाँ भी भोक्ता और भोग्यकी अन्योन्यमावापत्ति नहीं होगी और न उनका परब्रह्मसे भेद होगा । यद्यपि मोक्ता ब्रह्मका विकार नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ' ( उसकी रचनाकर उसमें ही अनुप्रवेश किया ) इस प्रकार कार्यमें अनुप्रवेशद्वारा अविकृत स्रष्टामें ही भोक्तृत्वका श्रवण है, तो भी घंट आदि उपाधि निमित्तक आकांशके समान कार्यमें अनुप्रविष्टका उपाधिकृत विभाग है । इससे ऐसा कहा गया है कि परम कारण ब्रह्मसे अनन्य होनेपर भी मोक्तृ - भोग्यरूप विभाग समुद्रतरङ्ग न्यायसे उपपन्न होता है ॥ १३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका सिद्ध नहीं होता, इसलिए बाधक प्रमाणके विद्यमान होनेपर अभेद बोधक श्रुति मुख्य नहीं किन्तु गौण है । जैसे ' आदित्यो यूपः ' यह श्रुतिवाक्य आदित्यका यूपके साथ अभेद बोधित करता है, परन्तु यह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे बाधित हैं, अतः वहाँ मीमांसकोंने आदित्य शब्दकी आदित्य सदृशमें लक्षणाकर गौणवृत्तिसे ' आदित्यः सदृशो यूपः ' ऐसा व्याख्यान किया है । जैसे धर्म, अधर्म आदि अज्ञात तत्त्वोंमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाण बाधित हैं, वैसे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे प्रसिद्ध भेदसे श्रुति प्रतिपादित अभेद कारणवाद भी बाधित है, इससे ब्रह्म जगत्का कारण हो यह कथन अयुक्त है । इस प्रकार तर्कसे अद्वैत समन्वयका बाध होना युक्त है । * जैसे महाकाशंमें घट, मठ आदि उपाधिकृत घटाकाश, मठाकाश आदि कल्पित भेद व्यवहार होता है । वैसे ब्रह्म में भी अविद्या उपाधिकृत मोक्ता और भोग्य आदि कल्पित भेद व्यवहार होता है । अतः द्वैतप्रमाणका अद्वैतसमन्वयसे विरोध नहीं है ॥ १३ ॥
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३६२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य ( ६ आरम्भणाधिकरणम् सू ० १४-२० ) तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ १४ ॥
पदच्छेद - तदनन्यत्वम्, आरम्भणशब्दादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( तदनन्यत्वम् ) कार्यं जगत्की कारण ब्रह्म से अनन्यता है, ( क्योंकि ' वाचारम्भणं विकारो ' ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि अवगत होता है । [ अ ० २ पा ० १ आम्भणशब्दादिभ्यः ) श्रुतिवाक्योंसे ऐसा ही * अभ्युपगम्य चेमं व्यावहारिकं भोक्तृभोग्यलक्षणं विभागं स्यालोकवदिति परि-हारोऽभिहितः, नत्वयं विभागः परमार्थतोऽस्ति, यस्मात्तयोः कार्यकारणयोरनन्यत्वमव-गम्यते । कार्यमाकाशादिकं बहुप्रपञ्चं जगत्, कारणं परं ब्रह्म तस्मात्कारणात्परमार्थतोऽ नन्यत्वं व्यतिरेकेणाभावः कार्यस्यावगम्यते । कुतः? आरम्भणशब्दादिभ्यः । आरम्भण-शब्दस्तावदेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय दृष्टान्तापेक्षा यामुच्यते - ' यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' ( छा ० ६ | १ | ४ ) इति । एत-दुक्तं भवति - एकेन मृत्पिण्डेन परमार्थतो मृदात्मना विज्ञातेन सर्वे मृन्मयं घटशरावोदञ्च-नादिकं मृदात्मकत्वाविशेषाद्विज्ञातं भवेत् । यतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् - वाचैव केवलमस्तीत्यारभ्यते— विकारो घटः शराव उदञ्चनं चेति । न तु वस्तुवृत्तेन विकारो नाम यह व्यावहारिक भोक्तृ - भोग्यरूप विभाग स्वीकारकर ' स्याल्लोकवत् ' इस सूत्रभागसे उसका परिहार कहा गया । परन्तु यह विभाग परमार्थतः नहीं है, जिससे वे कार्यकारण अनन्य अवगत होते हैं । आकाश आदि बहुत विस्तृत जगत् कार्य है और परब्रह्म कारण है । उस कारणसे कार्यंके पृथक्त्वका अभाव ही वास्तव में कारणके साथ कार्यका अनन्यत्व अवगत होता है । किससे? इससे कि आरम्भण शब्द आदि कहे हैं । एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञाकर दृष्टान्तको अपेक्षा में ' यथा सोम्यैकेन ० ' ( हे सोम्य - श्वेतकेतु! जैसे एक मृत्तिकापिण्डसे सब मृत्तिकाके विकार ज्ञात हो जाते हैं कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाम मात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ) इसप्रकार आरम्भण शब्द कहा गया है । अभिप्राय यह है कि वास्तवमें मृत्तिकारूपसे ज्ञात एक मृत्तिकापिण्ड मृत्तिकांमय घट, सिकोरा, डोल आदि सभी पदार्थं मृत्तिकात्मकरूप अविशेषसे विज्ञात होते हैं, क्योंकि वाचारम्भण विकार केवल नाम मात्र हैं । घट, सिकोरा और डोल आदि विकार केवल वाणीसे ' हैं ' ऐसे कहे जाते हैं, वस्तुवृत्तिसे तो विकार कुछ भी नहीं हैं, नाममात्र यह सब अनृत- मिथ्या है, केवल मृत्तिका ही सत्य सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वाधिकरणमें परिणामवादके आधारपर समाधान किया गया है और इस अधिकरणमें विवर्तवादके आधारपर किया जाता है । इससे एकफल संगति है । परन्तु इसप्रकार दोनों अधि-करणोंकी संगतिमें विरोध होगा? ऐसी बात नहीं है, क्योंकि -विवर्तवादस्य च पूर्वं भूमिर्वेदान्तवादे परिणामवादः । व्यवस्थितेऽस्मिन्परिणामवादे स्वयं समायाति विवर्तवादः ॥ ( वेदान्तमें विवर्तवादी प्रथमावस्था परिणामवाद है, इस परिणामवादकी व्यवस्था हो जानेपर विवर्तवाद स्वयं ही प्राप्त हो जाता है ) ऐसा संक्षेपशारीरकमें कहा गया है । इसलिए कोई विरोध नहीं है । तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्ष आदिका लोकप्रसिद्ध प्रामाण्य स्वीकारकर स्थूल बुद्धिवालोंकी शङ्का निवृत्तिके लिए परिणाम दृष्टान्त - समुद्रतरङ्गन्यायसे भेद और अभेद कहा गया है । अव प्रत्य-क्षादि प्रमाणोंको तत्त्वके प्रतिपादनमें असमर्थं कहकर केवल व्यवहारमें ही उनकी स्थापना की जाती है अर्थात प्रत्यक्ष आदि प्रमाण केवल व्यवहारविषयक हैं परमार्थविषयक नहीं हैं । इसलिए मिथ्या-
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अधि ० ६ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३६३ कश्चिदस्ति । नामधेयमात्रं ह्येतदनृतं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति । एष ब्रह्मणो दृष्टान्त आम्नातः । तत्र श्रुताद्वाचारम्भणणशब्दाद्दान्तिकेऽपि ब्रह्मव्यतिरेकेण कार्यजातस्याभाव इति गम्यते पुनश्च तेजोबन्नानां ब्रह्मकार्यतामुक्त्वा तेजोऽबन्नकार्याणां तेजोऽबन्नव्यतिरेणाभावं ब्रवीति-' अपागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ' ( छा ० ६ । ४ । १ ) इत्यादिना । आरम्भणशब्दादिभ्य इत्यादिशब्दात् ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ), इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( बृ ० २।४।६ ), ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( मु ० २1२1११ ), ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( छा ० ७।२५।२ ), नेह नानास्ति किंचन ' ( वृ ० ४ | ४ | १ ९ ) इत्येवमाद्यप्यात्मैकत्वप्रतिपादनपरं वचनजातमुदाहर्तव्यम् । न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं संपद्यते । तस्माद्यथा घटकर-काद्याकाशानां महाकाशानन्यत्वम्, यथा मृगतृष्णि कोदकादिनामूषरादिभ्योऽनन्यत्वम्, दृष्टनष्टस्वरूपत्वात्स्वरूपेणानुपाख्यत्वात्, एवमस्य भोग्यभोक्त्रादिप्रपञ्चजातस्य ब्रह्मव्य-तिरेकेणाभाव इति द्रष्टव्यम् । * नन्वनेकात्मकं ब्रह्म, यथा वृक्षोऽनेकशाख एवमनेकशक्ति-प्रवृत्तियुक्तं ब्रह्म । अत एकत्वं नानात्वं चोभयमपि सत्यमेव । यथा वृक्ष इत्येकत्वं शाखा इति नानात्वम् । यथा च समुद्रात्मनैकत्वं फेनतरङ्गाद्यात्मना नानात्वम् । यथा च मृदात्म-है । यह ब्रह्ममें दृष्टान्त कहा गया है । यहाँ श्रुत वाचारम्भण शब्दसे दान्तिक में भी कारण ब्रह्मसे कार्य समूह भिन्न नहीं है ऐसा ज्ञात होता है । पुनः श्रुति तेज, जल और अन्नको ब्रह्मका कार्यं कहकर तेज, जल और अन्न के कार्योंका तेज, जल और अन्नंसे भेदाभाव ' अपागादग्नेरग्नित्वं ० ' ( इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिए नाममात्र है, केवल तीन रूप हैं, इतना ही सत्य है ) इत्यादिसे कहती है । ' आरम्भणशब्दादिभ्यः ' इसमें पठित ' आदि ' शब्द से ' ऐतदात्म्य ० ' ( यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु! वही तू है ) ' इदं सर्वं ० ' ( यह जो कुछ भी है यह सब आत्मा ही है ) ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( यह सब ब्रह्म ही है ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( आत्मा ही यह सब है ) ' नेह नानास्ति ० ' ( इस- ब्रह्म में नाना कुछ भी नहीं है ) इत्यादि आत्मैकत्व प्रतिपादन परक वाक्य समुदाय भी उदाहरणरूपसे ग्रहण करना चाहिए । नहीं तो एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान सम्पन्न नहीं होगा । इसलिए जैसे घटाकाश, करकाकाश आदि महाकाश-से अनन्य हैं और जैसे मृगतृष्णा जल आदि उषर आदिसे अनन्य हैं, क्योंकि दृष्ट नष्ट स्वरूप वाले हैं अर्थात् उनका स्वरूप दृष्टिगोचर होकर नष्ट हो जाता है अर्थात् अधिष्ठान ज्ञानसे बाधित हो जाता है और वह स्वरूप रहित है, वैसे ही मोक्तृ - भोग्य आदि प्रपञ्च समूह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, ऐसा समझना चाहिए | परन्तु ब्रह्म तो अनेकात्मक है, जैसे वृक्ष अनेक शाखा युक्त है, वैसे ब्रह्म भी सत्यानन्दी - दीपिका द्वैत प्रमाणोंसे श्रोताका बाध नहीं हो सकता है । इसप्रकार अद्वैत समन्वयके अविरोधके लिए द्वैतको मिथ्या सिद्ध करते हैं । यहाँ अनन्यत्वशब्द अभेद परक नहीं है किन्तु भेद निषेध परक है अर्थात् इस दृश्यमान जगत् की ब्रह्मसे पृथक् सत्ता नहीं है यही अनन्यत्वका तात्त्विक अर्थ है । ' नेह नानास्ति किञ्चन ' इत्यादि श्रुति भी ब्रह्ममें नानात्व - भेदका निषेध करती है । * अब भर्तृपञ्चक आदि प्राचीन वेदान्ताचायोंके अभिमत एकत्व नानात्ववादको दिखलाते हैं-अनेकशक्ति और इससे होनेवाली अनेकप्रकारकी कार्यात्मक सृष्टिसे ब्रह्म युक्त है, इस विषय में ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ' ( ब्रह्म मायारूप अनेक शक्तियोंसे बहुत रूप हुआ ) यह श्रुतिवाक्य प्रमाण है । यदि अत्यन्त अभेद मानें तो कर्मकाण्डादिके आश्रित लौकिक और वैदिक व्यवहार एवं ब्रह्म प्राप्तिके श्रवण, मनन आदि सब साधन बाधित हो जायेंगे । यदि ब्रह्ममें कार्यरूपसे नानात्व मानें तो लौकिक और शास्त्रीय सब व्यवस्था ठीक हो जायगी, अतः भेद और अभेदको मानना युक्त है ।
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३६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ नैकत्वं घटशरावाद्यात्मना नानात्वम् । तत्रैकत्वांशेन ज्ञानान्मोक्षव्यवहारः सेत्स्यति, नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयौ लौलिक वैदिकव्यवहारौ सेत्स्यत इति । एवंच मृदादिदृष्टान्ता अनुरूपा भविष्यन्तीति । नैवं स्यात्; ' मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' इति प्रकृति-मात्रस्य दृष्टान्ते सत्यत्वावधारणात् वाचारम्भणशब्देन च विकारजातस्यानृतत्वाभि-धानात्, दान्तिकेऽपि ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यम् ' इति च परमकारणस्यैवैकस्य सत्यत्वावधारणात्, ' स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इति च शारीरस्य ब्रह्मभावोपदेशात् । स्वयं प्रसिद्धं ह्येतच्छारीरस्य ब्रह्मात्मत्वमुपदिश्यते, न यत्नान्तरप्रसाध्यम् । अतश्चेदं शास्त्रीयं ब्रह्मात्मत्वमवगम्यमानं स्वाभाविकस्य शारीरात्मत्वस्य बाधकं संपद्यते, रज्ज्वादि-बुद्धय इव सर्पादिबुद्धीनाम् । बाधिते च शारीरात्मत्वे तदाश्रयः समस्तः स्वाभाविको व्यवहारो बाधितो भवति, यत्प्रसिद्धये नानात्वांशोऽपरो ब्रह्मणः कल्प्येत । * दर्शयति च - ' यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ( बृ ० ४/५/१५ ) इत्यादिना ब्रह्मात्मत्व-अनेक शक्ति प्रवृत्ति युक्त है, इसलिए एकत्व और नानत्व दोनों सत्य ही हैं । जैसे ' वृक्ष ' इस रूपसे एक है और ' शाखा ' रूपसे नाना है, जैसे ' समुद्र ' इस रूपसे एक है और फेन, तरङ्ग आदि रूपसे नाना है, और ' मृत्तिका ' इस रूपसे एक है और घट, शराव आदि रूपसे नाना है, [ वैसे ही ब्रह्म भी कारणरूपसे एक है और मोक्तृ, भोग्य आदि प्रपञ्चरूपसे अनेक है ] दोमें से एकत्व अंशके ज्ञानसे मोक्ष व्यवहार सिद्ध होगा और नानात्व अंशके ज्ञानसे कर्मकाण्डके आश्रित लौकिक और वैदिक व्यवहार सिद्ध होंगे, इसी प्रकार मृत्तिका आदि दृष्टान्त भी अनुरूप होंगे? परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि ' मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' ( केवल मृत्तिका ही सत्य है ) इस प्रकार दृष्टान्तमें प्रकृतिमात्रमें सत्यत्वका निश्चय किया गया है, और वाचारम्भणशब्दसे विकार समुदायमें अनृतत्वका अभिधान किया गया है । दान्तिक -में भी ' ऐतदाम्यमिदं सर्वम् ' ( यह सब एतद्रूत है वह सत्य है ) एक परम कारणमें सत्यत्वका अवधारण किया गया है और ' स आत्मा ० ' ( हे श्वेतकेतु! वह आत्मा है वह तू है ) इस प्रकार जीवात्माको ब्रह्मभावका उपदेश है । जीवात्माको यह स्वयं प्रसिद्ध ब्रह्मात्मत्वका उपदेश किया जाता है, न कि अन्य यत्न साध्य ब्रह्मात्मत्वका । इसलिए जैसे रज्जु आदि बुद्धि कल्पित सर्प आदि बुद्धिक बाधक होती हैं, वैसे यह शास्त्रीय अवगम्यमान ( अवगत हुआ ) ब्रह्मात्मत्व आविद्यक जीवात्मत्वका बाधक होता है । जीवात्मत्व बाधित होनेपर उसके आश्रित समस्त आविद्यक लौकिक, वैदिक व्यवहार जिनकी सिद्धि के लिए ब्रह्ममें एकत्वसे भिन्न नानात्वांर की कल्पना करनी पड़े, बाधित हो जाते हैं । और ' यन्त्र त्वस्य ० ' ( जिस ज्ञानावस्था में इस विद्वानके लिए सब आत्मा ही हो गया है उस अवस्थामें सत्यानन्दी - दीपिका सिद्धान्ती - यह ठीक नहीं है, क्योंकि ' मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' इस प्रकार श्रुतिमें अवधारणार्थक ' एव ' और ' आरम्भणशब्द ' ' सत्यत्वावधारणात् ' इत्यादि हेतुओंसे विकारकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका निषेध किया जाता है । इसलिए परिणामवाद श्रुति बाह्य है । * ' यत्र त्वस्य ० ' यह श्रुति ब्रह्मज्ञानीके लिए समस्त भेद व्यवहार, व्यवहारदशामें सत्य है और मोक्ष अवस्थामें निवृत्त हो जाता है, तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि सत्य वस्तुकी कदापि निवृत्ति नहीं होती, ज्ञान किसी सत्य वस्तुकी निवृत्ति नहीं करता किन्तु उसमें मिथ्याज्ञानसे आरोपित और उसके ज्ञानको निवृत्त करता है । यदि जीवत्व सत्य होता, तो ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्य जीवको ब्रह्म-भावका बोध ( ज्ञान ) नहीं कराते, परन्तु ' तत्त्वमसि ' ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे सिद्ध होता है कि जीवभाव कल्पित है और ब्रह्मभाव पारमार्थिक है । परन्तु तुम्हारे मतमें तो सम्यग्ज्ञानसे मोक्ष मो सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि संसारका कारण मिथ्याज्ञान हो, तो उसकी निवृत्ति के लिए सम्यग्ज्ञानकी
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अधि ० ६ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३६५ दर्शिनं प्रति समस्तस्य क्रियाकारक फललक्षणस्य व्यवहारस्याभावम् । न चायं व्यवहाराभा-वोऽस्थाविशेषनिबद्धोऽभिधीयत इति युक्तं वक्तुम्, ' तत्त्वमसि ' इति ब्रह्मात्मभावस्यानवस्था-विशेषनिबन्धनत्वात् । तस्करदृष्टान्तेन चानृताभिसंघस्य बन्धनं सत्याभिसंघस्य च मोक्षं दर्शयन्ने कत्वमेवैकं पारमार्थिकं दर्शयति ( छा ०६।१६ ) । मिथ्याज्ञानविजृम्भितं च नानात्वम् । उभयसत्यतायां हि कथं व्यवहारगोचरोऽपि जन्तुरनृताभिसंध इत्युच्येत? ' मृत्योः स मृत्यु-माप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( वृ ० ४ ॥ १ ९ ) इति च भेददृष्टिमपवदन्ने वैतद्दर्शयति । न चास्मि -न्दर्शने ज्ञानान्मोक्ष इत्युपपद्यते, सम्यग्ज्ञानापनोद्यस्य कस्यचिन्मिथ्याज्ञानस्य संसारकारण-त्वेनानभ्युपगमात् । उभयसत्यतायां हि कथमेकत्वज्ञानेन नानात्वज्ञानमपनुद्यतं इल च्यते? नन्वेकत्वैकान्ताभ्युपगमे नानात्वाभावात्प्रत्यक्षादीनि लौकिकानि प्रमाणानि व्याहन्येरन्नि-विषयत्वात् स्थाण्वादिष्विव पुरुषादिज्ञानानि । तथा विधिप्रतिषेधशास्त्रमपि भेदापेक्षत्वात्त दभावे व्याहन्येत, मोक्षशास्त्रस्यापि शिष्य शासित्रादिभेदापेक्षत्वात्तदभावे व्याघातः स्यात् । कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्यात्मैकत्वस्य सत्यत्वमुपपद्येतेति? अत्रोच्यते - नैष दोषः, सर्वव्यवहाराणामेव प्राब्रह्मात्मताविज्ञानात्सत्यत्वोपपत्तेः, स्वप्नव्यवहारस्येव प्रा-प्रबोधात् । यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिस्तावत्प्रमाणप्रमेयफ ललक्षणेषु विकारेष्वनृत-किस साधनसे किसे देखे ) इत्यादिसे ब्रह्मात्मत्वदर्शीके प्रति श्रुति क्रिया, कारक और फलरूप समस्त व्यवहारका अभाव दिखलाती है । यह कथन युक्त नहीं है कि यह व्यवहारका अमाव किसी अवस्था विशेष ( मोक्ष ) के अधीन कहा गया है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इस प्रकार जीवका ब्रह्मात्मभाव किसी अवस्था विशेष के अधीन नहीं कहा गया है । किञ्च चोरके दृष्टान्तसे मिथ्या वस्तुमें आग्रह करनेवालेका बन्धन और सत्याभिसन्धका मोक्ष दिखलाती हुई श्रुति केवल एकत्व ही एक पारमार्थिक और नानात्वको मिथ्याज्ञानसे कल्पित दिखलाती है । यदि भेद और अभेद दोनों सत्य हों, तो भेद व्यवहार करनेवाला पुरुष अनृताभिसन्ध है यह कैसे कहा जा सकेगा । ' मृत्योः स मृत्युमा ० ' ( जो इस अद्वितीय ब्रह्ममें नाना - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इस प्रकार श्रुति भेद दृष्टिका अपवाद करती हुई यही ( अभेद ) दिखलाती है । और इस भेद और अभेदवाद दर्शनमें ज्ञानसे मोक्ष भी उपपन्न नहीं होगा, क्योंकि इसके मत में सम्यग्ज्ञानसे निवारण योग्य किसी मिथ्याज्ञानको संसारके कारणरूपसे नहीं माना गया है, कारण कि दोनों सत्य होने से यह कैसे कहा जाय कि एकत्व ज्ञानसे नानात्वज्ञान निवृत्त होता है । परन्तु केवल एकत्वके ही स्वीकार करनेपर तो नानात्वके अभाव से प्रत्यक्ष आदि लौकिक प्रमाण निर्विषयक होनेसे बाधित हो जायँगे । जैसे स्थाणु आदिमें पुरुष आदिके ज्ञान बाधित हो जाते हैं । इसी प्रकार भेदकी अपेक्षा रखनेके कारण विधि, प्रतिषेध शास्त्र भी भेदके अभावमें बाधित हो जायँगे । गुरु शिष्य आदि भेदकी अपेक्षा रखनेके कारण मोक्ष शास्त्र मी उसके अमाव में बाधित हो जायगा । और मिथ्या मोक्ष शास्त्रसे प्रतिपादित आत्मैकत्व सत्य कैसे हो जायगा? इस विषय पर कहते हैं - यह दोष नहीं है, क्योंकि जैसे जागने के पूर्व सब स्वप्न व्यवहार सत्य प्रतीत होते हैं, बस इसी प्रकार ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानके पूर्व सब व्यवहार भी सत्य हो सकते हैं । जब तक सत्य आत्मैव प्रतिपत्ति नहीं होती तबतक प्रमाण, प्रमेय और फलरूप विकारों में किसीको भी मिथ्यात्व बुद्धि नहीं होती । स्वाभाविक ब्रह्मात्मताका त्यागकर अविद्यासे सब प्राणी विकारोंमें ही ' मैं मेरा ' इस प्रकार सत्यानन्दी - दीपिका अपेक्षा हो, परन्तु तुम्हारे मतमें तो एकत्व, नानात्व और उनका ज्ञान सत्य हैं, एक सत्यज्ञानसे अन्य सत्यज्ञानकी निवृत्ति संभव नहीं है । वेदान्तमत में तो नानात्व मिथ्याज्ञानसे कल्पित है वह शास्त्रीय ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे निवृत्त हो जाता है, जिससे बन्धनिवृत्तिपूर्वक मोक्ष होता है ।
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३६६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ बुद्धिर्न कस्यचिदुत्पद्यते । विकारानेव त्वहं ममेत्यविद्ययाऽऽत्मात्मीयेन भावेन सर्वो जन्तुः प्रतिपद्यते स्वाभाविक ब्रह्मात्मतां हित्वा । तस्मात्प्राब्रह्मात्मताप्रतिबोधादुपपन्नः सर्वो लौकिको वैदिकश्च व्यवहारः । ३ यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य जनस्य स्वप्न उच्चावचा-भावान्पश्यतो निश्चितमेव प्रत्यक्षाभिमतं विज्ञानं भवति, प्राक्प्रबोधात् नच प्रत्यक्षाभा-साभिप्रायस्तत्काले भवति, तद्वत् । कथं त्वसत्येन वेदान्तवाक्येन सत्यस्य ब्रह्मात्मत्वस्य प्रतिपत्तिरुपपद्येत? नहि रज्जुसर्पेण दष्टो म्रियते । नापि मृगतृष्णिकाम्भसा पानावगाह-नादिप्रयोजनं क्रियत इति । नैष दोषः शङ्काविषादिनिमित्तमरणादिकार्योपलब्धेः, स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात् । तत्कार्यमप्यनृतमे-वेति चेद्ब्रूयात्, तत्र ब्रूमः यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य सर्पदंशनोदकस्नादिकार्य-मनृतं तथापि तदवगतिः सत्यमेव फलम्, प्रतिबुद्धस्याप्यबाध्यमानत्वात् । नहि स्वप्नादुत्थितः स्पप्नदृएं सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्य मिथ्येति मन्यमानस्तदवगतिमपि मिथ्येति मन्यते कश्चित् । एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन देहमात्रात्मवादो दूषितो वेदितव्यः | तथा च श्रुतिः - ' यदा कर्मसु काम्येपु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । आत्मभाव और आत्मीयभावको प्राप्त होते हैं, इसलिए ब्रह्मात्मत्व ज्ञानके पूर्व लौकिक और वैदिक सब व्यवहार उपपन्न होते हैं । जैसे स्वप्न में भिन्न - भिन्न अनेक प्रकार के पदार्थों को देखनेवाले साधारण सुप्त पुरुषको जागनेसे पूर्वं प्रत्यक्षरूपसे माना हुआ निश्चित ही विज्ञान होता है । उस समय उसको प्रत्यक्षा-भासके अभिप्रायसे ज्ञान नहीं होता, वैसे प्रकृतमें भी समझना चाहिए | परन्तु असत्य वेदान्तवाक्यसे सत्य ब्रह्मात्मत्व ज्ञान कैसे उपपन्न होगा? क्योंकि रज्जुमें कल्पित सर्पसे डँसा हुआ नहीं मरता और मृगतृष्णाके जलसे पान और स्नान आदि प्रयोजन भी सिद्ध नहीं होते । यह दोष नहीं है, क्योंकि विष आदि शङ्का के कारण मरण आदि कार्य उपलब्ध होते हैं और स्वप्नास्वस्था स्थित पुरुष में सर्प से डँसा जाना, जल स्नान आदि कार्य देखने में आते हैं । यदि यह कहो कि उसके कार्य भी असत्य हैं । तो उस विषयको हम कहते हैं - यद्यपि स्वप्नावस्थामें स्थित पुरुषके सर्पका डँसना, जल स्नान आदि कार्यं असत्य हैं, तो भी उनका ज्ञानरूप फल सत्य ही है, क्योंकि जाग्रत् पुरुषका भी वह ज्ञान वाधित नहीं होता । स्वप्नसे उठा हुआ पुरुष स्वप्नदृष्ट सर्पदंश, उदकस्नानादि कार्य मिथ्या हैं, ऐसा मानता हुआ उसका ज्ञान भी मिथ्या है, ऐसा कोई भी नहीं मानता । इससे स्नप्नद्रष्टा विषयक ज्ञानका बाध न होनेसे देहमात्रको आत्मा मानने वालेका मत मी खण्डित समझना चाहिए । उसीप्रकार ' यदा कर्मसु ० ' ( जब काम्य कर्मोंको करता हुआ पुरुष स्वप्न में सुन्दर स्त्रीको देखे तो उस स्वप्न सत्यानन्दी - दीपिका ** वस्तुतः मिथ्या होनेपर भी विकारोंमें मिथ्यात्व निश्चय न होनेके कारण लौकिक आदि व्यवहार हो सकते हैं । जो यह कहा गया है कि असत्य वेदान्त वाक्योंसे सत्य ब्रह्मात्माका ज्ञान कैसे हो सकता है? क्या असत्य से सत्य उत्पन्न नहीं होता अथवा असत्य से सत्यका ज्ञान? प्रथम पक्ष तो इष्ट ही है, क्योंकि हम वाक्योत्पन्न ज्ञानको सत्य नहीं मानते हैं । परन्तु असत्य से भी सत्यकी उत्पत्ति देखी जाती है, जैसे स्वप्नावस्थामें कल्पित सर्प दंशन आदिसे मरण, मूर्च्छा, भय, कम्पन आदि सत्य उत्पन्न होते देखे जाते हैं और जाग्रत् में रज्जु, स्थाणु आदिमें कल्पित सर्प, चोर आदिके ज्ञानसे सत्य भय आदि उत्पन्न होते हैं । इस स्वप्न दृष्टान्तसे देहात्मवादी चार्वाक मतका भी निराकरण समझना चाहिए, क्योंकि स्वप्नज्ञान यदि देहका धर्म हो, तो मुझे यह ज्ञान हुआ और मैंने ही स्वप्न देखा था अब जाग्रत् पदार्थोंको देखता हूँ, इसप्रकार अबाधित ज्ञान और अपना अनुसन्धान न होगा, क्योंकि स्वप्नात्माका जागनेपर तो नाश हो जाता है । देहके भेद होनेपर भी अनुसन्धाताका भेद नहीं