श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 401–410

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 401–410

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अधि ० ६ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३६७ समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्न निदर्शने ' ( छा ०५ / २१८ ) इत्यसत्येन स्वप्नदर्शनेन सत्यायाः समृद्धेः प्रतिपत्ति दर्शयति । तथा प्रत्यक्षदर्शनेषु केषुचिदरिष्टेषु जातेषु'न चिरभिवजीविष्यतीतिविद्यात् ' इत्युक्त्वा ' अथ यः स्वप्ने पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति ' इत्यादिना तेन तेनासत्ये-नैव स्वप्नदर्शनेन सत्यं मरणं सूच्यत इति दर्शयति । प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककु-शलानामीदृशेन स्वप्नदर्शनेन साध्वागमः सूच्यत ईदृशेनासाध्वागम इति । * तथाऽका-रादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिर्दृष्टा रेखानृताक्षरप्रतिपत्तेः । अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकं नातः परं किंचिदाङ्क्षयमस्ति । यथा हि लोके यजेतेत्युक्ते किं केन कथमित्या-काङ्क्षयते, नैवं ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्युक्ते किंचिदन्यदाकाङ्क्षयमस्ति सर्वात्मैकत्व-विषयत्वावगतेः । सति ह्यन्यस्मिन्नव शिष्यमाणेऽर्थ आकाङ्क्षा स्यात् । न त्वात्मैकत्व-व्यतिरेकेणावशिष्यमाणोऽन्योऽर्थोऽस्ति य आकाङ्क्षयेत । * न चेयमवगतिर्नोत्पद्यत इति शक्यं वक्तुम्, ' तद्धास्य विजज्ञौ ' ( छा ० ६ | १६ | २ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अवगति-साधनानां च श्रवणादीनां वेदानुवचनादीनां च विधानात् । न चेयमवगतिरनर्थिका भ्रान्तिर्वेति शक्यं वक्तुम् । अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात, बाधकज्ञानान्तराभावच्च । * प्राक्वात्मैकत्वावगतेख्याहतः सर्वः सत्यानृतव्यवहारो लौकिको वैदिकश्चेत्यवोचाम । दर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ) यह श्रुति असत्य स्वप्नदर्शनसे सत्य समृद्धिका ज्ञान दिख-लाती है । इसप्रकार उत्पन्न हुए कुछ आरिष्टों ( अनिष्ट सूचक ) का प्रत्यक्ष दर्शन होनेपर ' न चिर-मिव ० ' ( चिर काल तक नहीं जीएगा, ऐसा समझों ) ऐसा कहकर ' यः स्वप्ने ' ( जो कोई स्वप्न में काले दान्तवाले काले पुरुषको देखे तो वह उसको मारता है ) इत्यादिसे उस उस असत्य स्वप्न दर्शन से ही सत्य मरण सूचित होता है, ऐसा श्रुति दिखलाती है । यह लोकमें प्रसिद्ध है कि अन्वय-व्यतिरेकमें कुशल पुरुषोंको इसप्रकारके स्वप्नदर्शनसे शुभ प्राप्ति और इसप्रकार के स्वप्नदर्शनसे अशुभ प्राप्ति सूचित होती है । एवं रेखाओंमें असत्य अक्षरोंके ज्ञानसे अकार आदि सत्य अक्षरोंका ज्ञान होता देखा जाता है । और आत्मैकत्व प्रतिपादक यह अन्तिम प्रमाण है, इसके अनन्तर अन्य कुछ भी आकांक्ष्य नहीं है । जैसे लोकमें ' यजेत ' ऐसा कहनेपर किस फलके लिए किस साधनसे और किसप्रकार ऐसी आकांक्षा होती है, वैसे ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ऐसा कहने- जान लेनेपर कुछ अन्य आकांक्ष्य नहीं है, क्योंकि यह सर्वात्मकत्व विषयक ज्ञान है । अन्य अवशिष्ट पदार्थ हो तो उसकी आकांक्षा हो, परन्तु आत्मैकत्वसे भिन्न अवशेष रहा हुआ अन्य पदार्थ नहीं है जिसको आकांक्षा हो । यह अवगति ( ( पिताके उपदेश श्वेतकेतुने गतिके साधन श्रवणादि और भ्रान्ति है ऐसा भी नहीं कहा है, अतः देह आत्मा नहीं है । व्यभिचार दिखलाते हैं । * यद्यपि रेखाओंका ज्ञान ) उत्पन्न नहीं होती, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' तद्धाऽस्य ० 1 ' उस आत्मतत्त्वको यथार्थरूपसे जाना ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं, और अव-वेदाध्ययन आदिका विधान है और यह अवगति निष्प्रयोजन अथवा जा सकता, क्योंकि अविद्याकी निवृत्तिरूप फल देखनेमें आता है तथा सत्यानन्दी -दीपिका असत्यसे सत्यज्ञान नहीं होता, अब इस दूसरे विकल्पमें ' तथा च ' आदिसे स्वरूप सत्य है तो भी उनमें किया गया वर्णं संकेत असत्य है, उससे ' अ, आ ' आदि वर्णोंका सत्य ज्ञान उत्पन्न होता है । और जहाँ अग्नि है वहाँ धूलीपटलमें धूमके भ्रमसे उत्पन्न व्याप्तज्ञानसे अग्निको यथार्थ अनुमिति होती है । वैसे ही असत्य वेदान्तवाक्योंसे भी सत्य ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान उत्पन्न होता है ।

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३६८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २. पा ० १ तस्मादन्त्येन प्रमाणेन प्रतिपादित आत्मैकत्वे समस्तस्य प्राचीनस्य भेदव्यवहारस्य बाधितत्वान्नानेकात्मक ब्रह्म कल्पनावकाशोऽस्ति । ननु मृदादिदृष्टान्तप्रणयनात्परिणाम-वद्ब्रह्म शास्त्रस्याभिमतमिति गम्यते । परिणामिनो हि मृदादयोऽर्था लोके समधिगता इति । नेत्युच्यते, ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभ्यो ब्रह्म ' ( वृ ० ४।४।२५ ) ' स एष नेति नेत्यात्मा ' ( वृ ० ३।९ ।२६ ), ' अस्थूलमनणु ' ( वृ ० ३।८1८ ) इत्याद्याभ्यः सर्व-विक्रियाप्रतिषेधश्रुतिभ्यो ब्रह्मणः कूटस्थत्वावगमात् । न ह्येकस्य ब्रह्मणः परिणामधर्मत्वं तद्रहितत्वं च शक्यं प्रतिपत्तुम् । स्थितिगतिवत्स्यादिति चेत् न, कूटस्थस्येति विशेषणात् । नहि कूटस्थस्य ब्रह्मणः स्थितिगतिवदनेकधर्माश्रयत्वं संभवति । कूटस्थं च नित्यं ब्रह्म सर्व-विक्रियाप्रतिषेधादित्यवोचाम, न च यथा ब्रह्मण आत्मैकत्वदर्शनं मोक्षसाधनम्, एवं जगदा-कारपरिणामित्वदर्शनमपि स्वतन्त्रमेव कस्मैचित्फलायाभिप्रेयते, प्रमाणाभावात् । कूटस्थ ब्रह्मात्मत्वविज्ञानादेव हि फलं दर्शयति शास्त्रम् -'स एष नेति नेत्यात्मा ' इत्युपक्रम्य ' अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि ' ( बृ ० ४।२।४ ) इत्येवंजातीयकम् । * तत्रैतत्सिद्धं भवति - ब्रह्मप्रकरणे सर्वधर्म-विशेषरहितब्रह्मदर्शनादेव फलसिद्धौ सत्यांयत्तत्राफलं श्रूयते ब्रह्मणो जगदाकारपरिणा-अन्य बाधक ज्ञान भी नहीं है । हम यह कह चुके हैं कि आत्मैकत्वज्ञानके पूर्व लौकिक और वैदिक सत्य एवं अनृत सब व्यवहार अवाधित रहते हैं, इसलिए सर्वोत्कृष्ट अन्तिम प्रमाणसे आत्मैकत्व प्रति-पादित होनेपर पूर्वके भोक्तृ - मोग्यात्मक समस्त भेद व्यवहार बाधित होनेसे अनेकात्मक ब्रह्मकी कल्पनाका अवकाश ही नहीं है । परन्तु मृदादि दृष्टान्त दिये हैं इससे ऐसा ज्ञात होता है कि शास्त्रको परिणामी ब्रह्म अभिमत है, क्योंकि लोकमें मृत्तिका आदि पदार्थ परिणामी निश्चत होते हैं । सि ० - नहीं ऐसा कहते है – ' स वा एष ० ' ( वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय-ब्रह्म है ) स एष ० ' ( वह यह नहीं, यह नहीं, इसप्रकार अन्यके निषेध द्वारा मधुकाण्डमें आत्मा निर्दिष्ट है ) ' अस्थूल ० ' ( न स्थूल है, न सूक्ष्म है ) इत्यादि सब विक्रिया प्रतिषेधक श्रुतियोंसे ब्रह्म कूटस्थ अवगत होता है । एक ही ब्रह्मको परिणाम धर्मं युक्त और उससे रहित नहीं माना जा सकता हैं । ऐसा यदि कहो कि स्थिति और गति के समान हो? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ' कूटस्थस्य ' ( कूटस्थका ) ऐसा विशेषण है । कूटस्थ ब्रह्म स्थिति और गति के समान अनेक धर्मोका आश्रय नहीं हो सकता । और ऐसा हम कह चुके हैं कि जन्म आदि सब विक्रियाओंके प्रतिषेधसे ब्रह्म कूटस्थ और नित्य है । जैसे ब्रह्मका आत्मैकत्व ज्ञानं मोक्षका साधन है, वैसे ब्रह्मका जगद्रूपसे परिणामित्व दर्शन स्वतन्त्र ही किसी भी फलके लिए अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । ' स एष नेति नेत्यात्मा ' ऐसा उपक्रमकर ‘ अमयं बै ॰ ' ( याज्ञवल्क्य -- हे जनक! तुम अभय - ब्रह्मको प्राप्त हुए हो ) इसप्रकारका शास्त्र कूटस्थ ब्रह्मात्मत्वविज्ञानसे ही मोक्षरूप फल दिखलाता है । वहाँ यह सिद्ध होता है - ब्रह्म प्रकरणमें सर्व धर्मं विशेष रहित ब्रह्मज्ञानसे ही फल सिद्धि होनेपर उस प्रकरणमें ब्रह्मका जो अफल सत्यानन्दी दीपिका * यदि यह सब द्वैत मिथ्या हो, तो स्वप्न मिथ्या है जाग्रत् सत्य है, यह लौकिक व्यवहार और ‘ सत्यं चानृतं च सत्यममवत् ' ( सत्य और असत्य सब सत्य ब्रह्म ही है ) इसप्रकारके वैदिक व्यवहार कैसे उपपन्न होंगे? जैसे स्वप्न में यह सत्य है, यह असत्य है, इसप्रकार तात्कालिक बाध और बाधा-भावसे व्यवहार होता है, वैसे आत्मकत्व ज्ञानके पहले यह सब व्यवहार उपपन्न होता है! इसलिए व्यवहार के लिए नानात्व के सत्यत्वकी कल्पना असंगत है । * सि ० - यह मृत्तिका आदि दृष्टान्त, कारण कार्यरूपसे परिणत होता है, इस अभिप्रायसे नहीं है, किन्तु कार्यकारणसे भिन्न नहीं है, इस अभिप्रायसे है । यदि मानें तो मृत्तिका आदिका परिणाम

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अधि ० ६ ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३६ ९ मित्वादि तदब्रह्मदर्शनोपायत्वेनैव विनियुज्यते, फलवत्संनिधावफलं तदङ्गमितिवत् । न तु स्वतन्त्रं फलाय कल्प्यत इति । नहि परिणामवत्त्वविज्ञानात्परिणावत्त्वमात्मनः फलं स्यादिति वक्तुं युक्तं, कूटस्थनित्यत्वान्मोक्षस्य । कूटस्थब्रह्मात्मवादिन एकत्वैकान्त्यादी शित्रीशित-व्याभाव ईश्वरकारणप्रतिज्ञाविरोध इति चेत् - न, अविद्यत्मकनामरूपबीजव्याकरणापेक्षत्वा-त्सर्वज्ञत्वस्य । ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २1१ ) इत्यादिवाक्येभ्यो नित्य-शुद्धबुद्धमुक्तस्वरूपात्सर्वज्ञात्सर्वशक्ते रीश्वराज्जगज्जनिस्थितिप्रलया नाचेतनात्प्रधानाद-न्यस्माद्वेत्येषोऽर्थः प्रतिज्ञातः ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १ । १ । २ ) इति । सा प्रतिज्ञा तदवस्थैव न तद्विरुद्धोऽर्थः पुनरिहोच्यते । कथं नोच्यतेऽत्यन्तमात्मन एकत्वमद्वितीयत्वंच ब्रुवता? शृणु यथा नोच्यते - सर्वज्ञस्येश्वरस्यात्मभूत इवाविद्याकल्पिते नामरूपे तत्त्वान्यत्वाभ्यामनि-र्वचनीये संसारप्रपञ्चबीजभूते सर्वज्ञस्येश्वरस्य मायाशक्तिः प्रकृतिरिति च श्रुतिस्मृत्योरभि-लप्येते । ताभ्यामन्यः सर्वज्ञ ईश्वरः, ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इति श्रुतेः । ' नामरूपे व्याकरवाणि ' ( छा ० ६ | ३ | २ | ), ' सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो जगद्रूपसे परिणामित्व आदि श्रुत हैं, उसका ब्रह्मदर्शन के उपायरूपसे ही विनियोग होता है । जैसे फलयुक्त कर्मकी संनिधिमें अफल उसका अङ्ग होता है, परन्तु स्वतन्त्ररूपसे फल देनेके लिए उसकी कल्पना नहीं की जाती । परिणामवत्त्वके विज्ञानसे आत्मा में परिणामवत्त्व फल हो, ऐसा कहना युक्त नहीं है, क्योंकि मोक्ष तो कूटस्थ नित्य है । ऐसा यदि कहो कि कूटस्थ ब्रह्मात्मवादीके मत में ऐकान्तिक एकत्व होनेसे ईशिता और ईशितव्यके अभाव होनेपर ईश्वर जगत्‌का कारण है, इस प्रतिज्ञासे विरोध होगा? सो यह विरोध नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञत्वको अविद्यात्मक नाम रूप बीजको अभिव्यक्त करनेकी अपेक्षा है | ‘ तस्माद्वा ' ( उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि वाक्योंसे नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वशक्तियुक्त, ईश्वरसे जगत् के जन्म, स्थिति और प्रलय होते हैं, अचेतन प्रधानसे अथवा अन्यसे नहीं, यही अर्थ ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्रमें प्रतिज्ञात है । वह प्रतिज्ञा वैसी ही है, यहाँ — आत्मैकत्व प्रतिपादक श्रुतियों में उससे कुछ विरुद्ध अर्थ नहीं कहा जाता । आत्मा अत्यन्त एक और अद्वितीय है ऐसा प्रतिपादन करनेवाले तुमसे यह प्रतिज्ञा विरोध क्यों नहीं कहा जाता? सुनो, जैसे नहीं कहा जाता - सर्वज्ञ ईश्वरके मानो आत्मभूत, अविद्यासे कल्पित, सत् और असत्से विलक्षण अनिर्वचनीय एवं संसार प्रपञ्चके बीजभूत नाम और रूप सर्वज्ञ ईश्वरकी माया शक्ति और प्रकृति-रूपसे श्रुति और स्मृति में कहे जाते हैं । इन दोनोंसे सर्वज्ञ ईश्वर भिन्न है, क्योंकि ' आकाशो बै ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका व्याकर्ता है अर्थात् इनको स्थूलरूपसे अभिव्यक्त करनेवाला है, वे दोनों जिसके आभ्यन्तर हैं वह ब्रह्म है ) यह श्रुति है । ' नामरूपे ० ' ( मैं नाम और रूपको अभिव्यक्त करूँ ) ' सर्वाणि ० ' ( धीरो - परमेश्वर सब रूपोंको उत्पन्न कर उन सबके नाम रखकर सत्यानन्दी - दीपिका और अपरिणाम दोनों भेद हो सकते हैं, क्योंकि मृत्तिका आदि में उत्पत्ति आदि विक्रियाएं होती हैं । परन्तु कूटस्थ ब्रह्ममें तो उत्पत्ति आदि इन सब विक्रियाओंका ' नेति नेत्यात्मा ' इत्यादि श्रुतियोंसे निषेध किया गया है । पू ० – परन्तु एक व्यक्ति समय भेदसे स्थिति और गति दोनों धर्मोवाला होता है । जैसे मृत्तिका आदि कार्यकालमें परिणामी और कारणावस्थामें अपरिणामी होते हैं, वैसे ब्रह्म भी प्रलय में परिणामरहित और सृष्टिकालमें परिणामी हो सकता है । सि ० - ऐसा मानने से ब्रह्मको कूटस्थ नित्य प्रतिपादक ' स वा एष महानज आत्मा ० ' इत्यादि श्रुतियोंका बाध होगा । जगत् ब्रह्मका परिणाम नहीं किन्तु रज्जुसर्प आदिके समान विवर्त है, ऐसा मानने से कोई दोष नहीं है । * तं यथा यथोपासते तदेव भवति ' ( ब्रह्मकी जिस - जिसरूपसे उपासना करता है, उसी रूपको

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३७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते ' ( तै ० आ ० ३ | १२ | ७ ), ' एकं बीजं बहुधा यः करोति ' ( श्वे ० ६।१२ ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । एवमविद्याकृतनामरूपोपाध्य नुरोधीश्वरो भवति, व्योमेव घट कर काद्यु-पाध्यनुरोधि । स च स्वात्मभूतानेव घटाकाशस्थानीयानविद्याप्रत्युपस्थापित नामरूपकृत-कार्यकरणसंघातानुरोधिनो जीवाख्यान्विज्ञानात्मनः प्रतीष्ठे व्यवहारविषये । तदेवमविद्या-त्मकोपाधिपरिच्छेदापेक्षमेवेश्वरस्येश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तित्वं च न परमार्थतो विद्यया-पास्तसर्वोपाधिस्वरूप आत्मनीशित्रीशितव्य सर्वज्ञत्वादिव्यवहार उपपद्यते । * तथा चोक्तम्- ' यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा ' ( छा ० ७।२४ । १ ) इति, ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृ ० ४।५।१५ ) इत्यादिना च, एवं परमार्थावस्थायां सर्व-व्यवहाराभावं वदन्ति वेदान्ताः सर्वे । तथेश्वरगीतास्वपि - ' न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेना-उनमें प्रविष्ट होकर वदनादि व्यवहार करता हुआ स्थित है ) ' एकं बीजं ० ' ( एक बीजको जो अनेक-रूपकर देता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । जैसे घट, करक आदि उपाधि अनुरोधी अनुसारी आकाश होता है, वैसे अविद्याकृत नाम - रूपका अनुरोधी ईश्वर होता है । वह ईश्वर अविद्यासे उपस्थापित नाम - रूप कृत शरीरेन्द्रिय संघातके अनुरोधी घटाकाशस्थानीय स्वात्मभूत जीवाख्य विज्ञानात्माओंके ऊपर व्यवहार विषय में शासन करता है । इसप्रकार अविद्यारूप उपाधिके परिच्छेदको अपेक्षा ईश्वरमें ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व और सर्वशक्तिमत्त्व हैं, परमार्थसे तो विद्यासे निरस्त समस्त उपाधि स्वरूप आत्मामें ईशितृत्व ईशितव्यत्व, सर्वज्ञत्व आदि व्यवहार उपपन्न नहीं होते । और इस प्रकार ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( सनत्कुमार - जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता कुछ और नहीं जानता वह भूमा-ब्रह्म है ) और ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ इस आत्मवित् के लिए सब आत्मा ही हो गया, वहाँ किस करणसे किसे देखे ) इत्यादिसे कहा है । एवं परमार्थ अवस्था में सब वेदान्त सब व्यवहारका अभाव कहते हैं । '. इसीप्रकार भगवद्गीतामें भी ' न कर्तृत्वं ० ' ( परमेश्वर लोकों - प्राणियोंके न कर्तृत्व, न कार्य और न कर्मफल संयोगको रचता है, किन्तु उसके सकाशसे स्वभाव - माया ही प्रवृत्त होता है । वह परमेश्वर न सत्यानन्दी - दीपिका प्राप्त होता है ) इस श्रुतिसे सिद्ध होता है कि ब्रह्म परिणामी है, और वह परिणामी फल विद्वानको प्राप्त होता है । परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० २११११ ) इत्यादि श्रुतियोंसे कूटस्थ नित्य मोक्षरूप फल जब सम्भव है, तो अनित्य, परिणामीके विज्ञान ( उपासना ) से आत्मामें अनित्य परिणामी फलकी कल्पना करना अयुक्त है । जैसे ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' ( स्वर्गकी कामनावाला दर्शपूर्णमास याग करे ) स्वर्ग आदि फलके लिए विहित दर्शपूर्णमास आदिके · प्रकरणमें संनिहित पाँच प्रयाजोंका विधान है, उनका वहाँ स्वतन्त्र फल नहीं कहा गया है, तो वे फल रहित प्रयाजादि फल युक्त संनिहित प्रधान दर्शपूर्णमासके अङ्ग होते हैं अर्थात् मुख्य फलोत्पत्तिमें साधनरूप होते हैं, वैसे परिमाणित्व उपासना और सृष्टि आदि ज्ञान भी ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके लिए साधनरूपसे अपेक्षित हैं इनकी स्वतन्त्ररूपसे फलकी कल्पना युक्त नहीं है । ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्रमें ईश्वर जगत्का कारण है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है और इस १४ सूत्रमें अनायत्वका प्रतिपादन है, इस कारण प्रतिज्ञासे विरोध होगा, क्योंकि ईशिता और ईशितव्यका अभाव होनेसे कौन किसका कारण है और कौन किसका कार्य है यह सब बाधित हो जायगा? समाधान - कल्पित भेदको लेकर ईशिता - ईशितव्य आदि सब व्यवहार होता है, इसलिए इस सुत्रका प्रतिज्ञाके साथ कोई विरोध नहीं है । * किसी आचार्यंने कहा है- ' कृपणधीः परिणाममुदीक्षते क्षपितकल्मषधीस्तु विवर्तताम् ' ( जिसका चित्त शुद्ध नहीं है वह इस जगत्‌को ब्रह्मका परिणाम देखता है और जिसका चित्त दोष

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अधि ० ६ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३७१ वृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ' ( गी ० ५।१४-१५ ) इति परमार्थावस्थायामीशित्रीशितव्यादि-व्यवहाराभावः प्रदर्श्यते । व्यवहारावस्थायां तूक्तः श्रुतावपीश्वरादिव्यवहारः – ' एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ' ( वृ ० ४ । ४ । २२ ) इति तथा चेश्वरगीतास्वपि - ' ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्दशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ' ( गी ० १८।६१ ) इति । सूत्रकारोऽपि परमार्थाभिप्रायेण ' तदनन्यत्वम् ' इत्याह । व्यवहा-राभिप्रायेण तु ' स्याल्लोकवत् ' इति महासमुद्रस्थानीयतां ब्रह्मणः कथयति । अप्रत्याख्यायैव कार्यप्रपञ्चं परिणाम प्रक्रियां चाश्रयति - सगुणेषूपासनेषूपयोक्ष्यत इति ॥ १४ ॥

भावे चोपलब्धेः ॥ १५ ॥

पदच्छेद - – मावे, च, उपलब्धेः । सूत्रार्थ - ( च ) और ( मावे ) कारण के होनेपर ही ( उपलब्ध: ) कार्यकी उपलब्धि होती है । इससे सिद्ध होता है कि कार्य कारणसे अनन्य है । * इतश्च कारणादनन्यत्वं कार्यस्य यत्कारणं भाव एव कारणस्य कार्यमुपलभ्यते, नाभावे । तद्यथा सत्यां मृदि घट उपलभ्यते, सत्सु च तन्तुषु पटः । न च नियमेनान्यभावेऽ-न्यस्योपलब्धिर्दृष्टा । न ह्यश्वो गोरन्यः सन् गोर्भाव एवोपलभ्यते । नच कुलालभाव एव घट उपलभ्यते; सत्यपि निमित्तनैमित्तिकभावेऽन्यत्वात् । नन्वन्यस्य भावेऽप्यन्यस्योपल-किसीके पाप कर्मको और न किसीके पुण्य कर्मको ग्रहण अथवा संहार करता है, किन्तु अज्ञानसे ज्ञान आवृत है इससे जीव मोहित होते हैं ) इसप्रकार परमार्थं अवस्था में ईशितृ - ईशितव्य आदि व्यवहारका अभाव दिखलाया गया है । और व्यवहारावस्थामें तो श्रुतिमें भी ईश्वर आदि व्यवहार कहा गया है— ' एष सर्वेश्वर ० ' ( यह सर्वेश्वर है, यह सब भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालक है । इन लोगोंकी मर्यादा भङ्ग न हो इस प्रयोजनसे यह इनको धारण करने वाला सेतु है ) इसप्रकार भगवद्गीता में मी है- ' ईश्वरः सर्वभूतानां ० ' ( हे अर्जुन! शरीररूप यन्त्र में आरूढ हुए सब प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे उनके कर्मों के अनुसार भ्रमाता हुआ सब भूत - प्राणियोंके हृदयदेशमें स्थित है ) सूत्रकारने भी परमार्थके अभिप्रायसे ' तदनन्यत्वम् ' ( कार्य - कारणका अनन्यत्व - अभिन्नत्व है ) ऐसा कहा है । व्यवहारके अभिप्रायसे तो ' स्याल्लोकवत् ' ( लोकके समान कार्य कारण विभाग हो ) इसप्रकार ब्रह्मको महासमुद्र स्थानीय कहते हैं । और कार्यं प्रपञ्च का प्रत्याख्यान किए विना ही सगुण उपासनाओंमें उपयुक्त हो सकें, इस अभिप्रायसे परिणामप्रक्रियाका आश्रय करते हैं ॥ १४ ॥

इस हेतु से भी कारण से कार्य अनन्य है, क्योंकि कारण के अस्तित्वमें ही कार्य उपलब्ध होता है, कारणके अभाव होनेपर नहीं । जैसे मृत्तिकाके रहनेपर घट उपलब्ध होता है और तन्तुओंके रहनेपर पट उपलब्ध होता है । अन्यके रहनेपर अन्यको उपलब्धि नियमसे नहीं देखी जाती । अश्व गौसे अन्य होकर गौके होनेपर उपलब्ध नहीं होता । कुलालके होनेपर ही घट उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि कार्य-कारणभाव होनेपर भी दोनों ( कुलाल और धट ) परस्पर भिन्न हैं । परन्तु अन्य के अस्तित्वमें भी अन्यकी उपलब्धि नियमसे देखी जाती है, जैसे अग्निके रहनेपर धूमकी उपलब्धि देखी जाती है । सत्यानन्दी - दीपिका रहित शुद्ध है वह इस जगत्‌को ब्रह्मका विवर्त देखता है ) इसप्रकार व्यवहारमें उपास्य उपासक भाव, शास्य- शासकमाव आदि भेद माना जाता है, किन्तु परमार्थमें केवल अद्वितीय ब्रह्म ही सत् है ॥ १४ ॥

* कार्यं कारणसे अनन्य है, इस विषय में प्रत्यक्ष आदिके विरोधका निराकरण किया गया । अब ' भावे च ' आदिसे अनुमानसे भी कार्यकारणका अनन्यत्व सिद्ध करते हैं । काकता लिन्यायसे कभी

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ ब्धिर्नियता दृश्यते - यथाग्निभावे धूमस्येति । नेत्युच्यते, उद्वापिते ऽप्यग्नौ गोपालघु टिकादि-धारितस्य धूमस्य दृश्यमानत्वात् । अथ धूमं कयाचिदवस्थया विशिष्यादीदृशो धूमो नास-त्यग्नौ भवतीति 1 । नैवमपि कश्चिद्दोषः, तद्भावानुरक्तां हि बुद्धि कार्यकारणयोरनन्यत्वे हेतुं वयं वदामः । न चासावग्निधूमयोर्विद्यते । ' भावाच्चोपलब्धेः ' इति वा सूत्रम् । न केवलं शब्दादेव कार्यकारणयोरनन्यत्वम्, प्रत्यक्षोपलब्धिभावांच्च तयोरनन्यत्वमित्यर्थः । भवति हि प्रत्यक्षोपलब्धिः कार्यकारणयोरनन्यत्वे । तद्यथा - तन्तुसंस्थाने पटे तन्तुव्यतिरेकेण पटो नाम कार्य नैवोपलभ्यते, केवलास्तु तन्तव आतानवितानवन्तः प्रत्यक्षमुपलभ्यन्ते, तथा तन्तुष्वंशवोंऽशुषु तदवयवाः । अनया प्रत्यक्षोपलब्ध्या लोहितशुक्ल कृष्णानि त्रीणि रूपाणि, ततो वायुमात्रमाकाशमात्रं चेत्यनुमेयम् । ( छा ० ६६४ ) ततः परं ब्रह्मकमेवाद्वितीयम्, तत्र सर्वप्रमाणानां निष्ठामवोचाम ॥ १५ ॥

सच्चाच्चावरस्य ॥ १६ ॥

पदच्छेद - सत्त्वात् च, अवरस्य । सूत्रार्थ - ( अवरस्य ) कार्यकी ( सत्त्वाच्च ) ' आत्मा वा इदम ' इत्यादि श्रुतियों से प्रतीत होता है कि उत्पत्ति पूर्व सत्ता है । इससे सिद्ध होता है कि कार्यकी सत्ता कारणसे पृथक नहीं है । इस विषय में कहते हैं — ऐसा नहीं है, क्योंकि अग्निके बुझा देनेपर भी गोपाल घुटिका आदिमें धारण किया हुआ धूम देखने में आता है । यदि धूमको किसी अवस्था विशेष - विशेषण से विशेषित करें कि इस प्रकारका धूम अग्निके अभाव में नहीं होता, तो ऐसा निवेश करनेपर भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि कार्यकारणकी सत्तासे अनुरक्त बुद्धिको हम कार्यकारणके अनन्यत्वमें हेतु कहते हैं । ऐसी बुद्धि अग्नि और धूममें नहीं है । अथवा ' भावाच्चोपलब्धेः ' ऐसा सूत्र है । केवल शब्द ( श्रुति ) से ही कार्य-कारणका अनन्यत्व नहीं है, किन्तु प्रत्यक्षोपलब्धि भावसे भी उनका अनन्यत्व है, ऐसा अर्थ है । कार्यकारणके अनन्यत्वमें प्रत्यक्षोपलब्धि है । जैसे कि तन्तुके विशेष रचनात्मक पटमें तन्तुसे भिन्न पट नामका कार्य उपलब्ध ही नहीं होता, केवल आतान वितान वाले ( ताना - बाना ) तन्तु ही प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं । उसी प्रकार अवयवी तन्तुओंमें अनेक अवयवरूप अंश, उन अंशोंमें उनके अवयव उपलब्ध होते हैं । इस प्रत्यक्ष उपलब्धिसे लोहित, शुक्ल और कृष्ण ये तीन रूप हैं, तदनन्तर केवल वायु और आकाश मात्र हैं, ऐसा अनुमान करना चाहिए । उसके अनन्तर केवल अद्वितीय परब्रह्म ही शेष रह जाता है । उसमें ही सब प्रमाणोंका, पर्यवसान हमने कह दिया है ॥ १५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका अन्यकी उपलब्धिसे अन्यकी उपलब्धि होती है किन्तु नियमसे नहीं । जहाँ उपादानोपादेयरूप कार्य-कारणभाव होता है वहाँ कारणकी उपलब्धिसे कार्यकी उपलब्धि होती है अन्यत्र नहीं । * अनुमान परक सूत्रका व्याख्यानकर अब पाठान्तरसे प्रत्यक्षपरक व्याख्या करते हैं । प्रत्यक्षो-पलब्धिको प्रतिज्ञा और उदाहरणसे स्पष्ट किया जाता है - प्रत्यक्षोपलब्धिसं कार्यकारणका अनन्यत्व है, यह प्रतिज्ञा है । और तन्तुओंके आतान वितानसे अतिरिक्त पट नामकी कोई पृथक् वस्तु नहीं है, तन्तुकी आतान वितानात्मक विशेष अवस्था ही पट है, यह उदाहरण है । इससे सिद्ध होता है कि कार्यं कारणमात्र है । जहाँ प्रत्यक्षका अवकाश नहीं है, वहाँ ' विमतं कार्यं कारणादमिनं कार्यत्वात् पटवत् ' ' विवादास्पद कार्य कारणसे अभिन्न है, क्योंकि कार्य है, जैसे पटः कार्यं है । ' ' विमतं जगत् कारणब्रह्मामिन्नं कार्यत्वात् घटवत् ' ' यह विवादस्पद जगत् कारण ब्रह्मसे अभिन्न है, क्योंकि घटके समान यह भी कार्य है ' ऐसा अनुमान करना चाहिए । इस प्रकार सम्पूर्ण प्रपञ्चका कारण ब्रह्म है, अचेतन प्रधान आदि नहीं, क्योंकि अद्वितीय ब्रह्ममें सब वेदान्तका समन्वय है ॥ १५ ॥

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अधि ० ६ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३७३ * इतश्च कारणात्कार्यस्यानन्यत्वम्, यत्कारणं प्रागुत्पत्तेः कारणात्मनैव कारणे सत्त्वमवरकालीनस्य कार्यस्य श्रूयते - ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छा ० ६।२।५ ), ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ' ( ऐ ० आ ० २ | ४ | ३ | १ ) इत्यादाविदं शब्दगृहीतस्य कार्यस्य कार-न सामानाधिकरण्यात् । यच्च यदात्मना यत्र न वर्तते न तत्तत उत्पद्यते, यथा सिक-ताभ्यस्तैलम् । तस्मात्प्रागुत्पत्तेरनन्यत्वादुत्पन्नमप्यनन्यदेव कारणात्कार्यमित्यवगम्यते । यथा च कारणं ब्रह्म त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति, एवं कार्यमपि जगत्त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति । एकं च पुनः सत्त्वमतोऽप्यनन्यत्वं कारणात्कार्यस्य ॥१६ ॥

असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥१७ ॥

पदच्छेद – असद्वयपदेशात्, न, इति चेत्, न, धर्मान्तरेण, वाक्यशेषात् । सूत्रार्थ - ( असद्वयपदेशात् ) ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इत्यादि श्रुतिसे प्रतिपादित है कि . उत्पत्ति के पूर्व यह दृश्यमान जगत् असत् ही था, ( न ) इसलिए कार्यं कारणरूसे सत्तावाला नहीं है, ( इति चेन्न ) यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( धर्मान्तरेण ) यह कथन अव्याकृतरूप अन्य धर्म से है ( वाक्य -शेषात् ) कारणकि ' तत्सत् आसीत् ' इत्यादि वाक्यशेष है । अतः कार्यकी सत्ता कारणसे पृथक् नहीं है । ननु कचिदसत्त्वमपि प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य व्यपदिशति श्रुति ' - ' असदेवेदमग्र आसीत् ' ( छा ० ३।१ ९ ।१ ) इति । ‘ असद्वा इदमग्र आसीत् ' ( तै ० २।७।१ ) इति च । तस्मादसद्व्यपदेशान्न प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य सत्त्वमिति चेत्, नेति ब्रूमः -न हायमत्यन्तासत्त्वाभिप्रायेण प्रागुत्पत्तेः कार्यस्यासद्व्यपदेशः, किं तर्हि? व्याकृतनामरूपत्वाद्धर्मादिव्याकृतनामरूपत्वं धर्मान्तरं और इस हेतुसे भी कारण से कार्य अनन्य है, क्योंकि अर्वाचीन कार्यकी उत्पत्ति के पूर्व कारण-रूपसे ही कारण में सत्ता सुनी जाती है - ' सदेव ० ' ( हे सोम्य! उत्पत्तिके पूर्व यह जगत् सद्रूप ही था ) और ‘ आत्मा वा इदम ० ' ( उत्पत्ति के पूर्व यह जगत् केवल आत्मरूप ही था ) इत्यादि श्रुतिसे ' इदम् ' शब्दसे गृहीत कार्यका कारणके साथ सामानाधिकरण्य कहा गया है । जो जिस स्वरूपसे जिसमें नहीं होता वह उससे उत्पन्न नहीं होता, जैसे कि उत्पत्तिके पूर्व अनन्य होनेसे उत्पन्न कालमें सत्तासे व्यभिचरित नहीं होता, होता । इस प्रकार सत्ता तो एक ही है, परन्तु कहीं - कहीं ' असदेवेदम ० ' ( आरम्भके पहले यह जगत् असत् था ) करती है । इससे ऐसा यदि कहो कि बालूसे तैल उत्पन्न नहीं होता । इससे ऐसा अवगत होता है हुआ कार्यं भी कारणसे अनन्य ही है, जैसे कारण ब्रह्म तीनों वैसे कार्यं जगत् भी तीनों कालमें सत्तासे व्यभिचरित नहीं इससे भी कार्य कारणसे अनन्य है ॥ १६ ॥

( उत्पत्तिके पूर्व यह जगत् असत् ही था ) और ' असद्वा ० ' इस प्रकार श्रुति उत्पत्तिके पूर्व कार्य में असत्त्वका भी व्यपदेश असत् के व्यपदेशसे उत्पत्ति के पूर्व कार्यकी सत्ता नहीं है । तो हम कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि उत्पत्तिके पूर्व कार्यं विषयक जो असद् व्यपदेश है यह अत्यन्त सत्यादन्दी - दीपिका * ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ' आत्मा वा इदमेक ' इन उद्धृत श्रुतियोंमें ' इदम् ' शब्दसे गृहीत कार्य जगत् की ' सद् ' और ' आत्मा ' रूप कारणके साथ समानाधिकरणता है, क्योंकि दोनोंमें प्रथमा विभक्ति है । इस सामानाधिकरण्य श्रुतिसे उत्पत्तिके पूर्व कार्यकी कारणरूपसे सत्ता कही गई है । इस श्रुत्यर्थमें यह युक्ति है - जैसे घट मृत्तिकामें मृत्तिकारूपसे विद्यमान है तो उत्पन्न घट भी मृत्तिका रूपसे ही उपलब्ध होता है, यह अन्वय उदाहरण है । वैसे बालूरूपसे तैल बालू में नहीं रहता तो वह उससे उत्पन्न भी नहीं होता, यह व्यतिरेक उदाहरण है । अतः कारणके समान कार्य भी सत् है, क्योंकि सत्ताके भेद में कोई प्रमाण नहीं है । इसलिए सत्ताके अभेदसे भी कारण ब्रह्मसे कार्यं जगत् अभिन्न है ॥ १६ ॥

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३७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ तेन धर्मान्तरेणायम सद्व्यपदेशः प्रागुत्पत्तेः सत एव कार्यस्य कारणरूपेणानन्यस्य । कथ-मेतदम्यते? वाक्यशेषात् । यदुपक्रमे संदिग्धार्थं वाक्यं तच्छेषान्निश्चीयते । इह च तावत् ‘ असदेवेदमग्र आसीत् ' इत्यसच्छब्देनोपक्रमे निर्दिष्टं यत्तदेव पुनस्तच्छब्देन परामृश्य सदिति विशिनष्टि ' तत्सदासीत् ' इति । असतश्च पूर्वापरकाला संबन्धादासीच्छन्दानुपपत्तेश्च । ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इत्यत्रापि ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' इति वाक्यशेषे विशेषणान्नात्यन्ता-सत्त्वम् । तस्माद्धर्मान्तरेणैवायमसद्व्यपदेशः प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य । नामरूपव्याकृतं हि वस्तु सच्छन्दार्ह लोके प्रसिद्धम् । अतः प्राङ्नामरूपव्याकरणादसदिवासीदित्युपचर्यते ॥ १७ ॥

युक्तः शब्दान्तराच्च ॥ १८ ॥

पदच्छेद – युक्तेः, शब्दान्तरात्, च । सूत्रार्थ -- ( युक्तेः ) युक्तिसे ( च ) और ( शब्दान्तरात् ) ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' इस अन्य श्रुति से भी सृष्टिके पूर्व कार्यका सद्भाव और कारणसे अनन्यत्व प्रतीत होता है । * युक्तेश्च प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य सत्त्वमनन्यत्वं च कारणादवगम्यते, शब्दान्तराच्च । युक्तिस्तावद्वर्ण्यते - दधिघटरुचकाद्यर्थिभिः प्रतिनियतानि कारणानि क्षीरमृत्तिका सुवर्णादी-न्युपादीयमानानि लोके दृश्यन्ते । न हि दध्यर्थिभिर्मृत्तिकोपादीयते, न घटार्थिभिः क्षीरं, तदसत्कार्यवादे नोपपद्येत । अविशिष्टे हि प्रागुत्पत्तेः सर्वस्य सर्वत्रासत्त्वे कस्मात्क्षीरादेव दध्युत्पद्यते? न मृत्तिकायाः? मृत्तिकाया एव च घट उत्पद्यते, न क्षीरात् । अथाविशिष्टेऽपि असत् के अभिप्रायसे नहीं है, किन्तु व्याकृत नामरूपधमंसे अव्याकृतनामरूप धर्म अन्य है, उस भिन्न धर्मसे उसके पूर्व कारणरूपसे अनन्य होते हुए कार्यका ही यह असत् व्यपदेश है अर्थात् अवस्था भेदसे सत् कार्यं ही असत् शब्द से व्यपदिष्ट है । यह कैसे अवगत हो? वाक्यशेषसे, उपक्रममें जो संदिग्धार्थं वाक्य हो उसका वाक्यशेषसे निश्चय किया जाता है । जैसे यहाँ ' असदेवेदमग्र आसीत् ' इस उपक्रममें जो ‘ असत् ’ शब्दसे निर्दिष्ट है उसका ही पुनः ' तत् ' शब्दसे परामर्शकर ' तत्सदासीत् ' ( वह सत् था ) इस प्रकार उसको ' सत् ' इस विशेषणसे विशेषित किया है । ' असत् ' का पूर्वोत्तरकालसे सम्बन्ध न होनेसे ' आसीत् ' ( था ) इस शब्दकी अनुपपत्ति होगी । ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इसमें भी ' तदात्मानं ० ' ( उसने स्वयं अपनेको रचा ) इस प्रकार वाक्यशेष में विशेषण होनेसे [ यह कार्यं ] अत्यन्त असत् नहीं है । इसलिए उत्पत्ति के पूर्व कार्यका धर्मान्तरसे ( अव्याकृत नामरूपधर्मंसे ) यह असत् व्यपदेश है । यह लोक में प्रसिद्ध है कि नाम - रूपसे व्याकृत वस्तु ' सत् ' शब्दके योग्य होती है । अत: नाम - रूपसे व्याकृत व्यक्त होनेसे पूर्व असत् - सा था, इससे उत्पत्ति के पूर्व सत् कार्यमें असत् शब्दका उपदार- गौण प्रयोग किया गया है ॥ १७ ॥

युक्तिसे और अन्य श्रुतिसे मी उत्पत्ति के पूर्वं कार्य की सत्ता और कारणसे अनन्यता अवगत होती है । प्रथम युक्तिका वर्णन किया जाता है— लोक व्यवहार में ऐसा देखा जाता है कि दधि, घट और रुचक ( आभूषण ) आदिके अभिलाशीसे दूध, मृत्तिका और सुवणं आदि नियत कारणोंका ग्रहण किया जाता है । दधिके इच्छुक मृत्तिका ग्रहण नहीं करते और घटार्थियोंसे क्षीरका ग्रहण नहीं होता, वह असत् कार्यवादमें उपपन्न नहीं होगा, क्योंकि उत्पत्ति के पूर्व सबका सर्वत्र सत्त्वाभाव अविशिष्ट सत्यानन्दी - दीपिका * कार्यं उत्पत्ति से पूर्वं सत् और कारणसे अनन्य है । इस विषय में सांख्याचार्यने कहा है-‘ असदकरणादुपादानग्रहणात्सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात्कारणमावाच्च सत्कार्यम् ॥ ' ( सां ० का ० ९ ) ( असत् किसीसे किया नहीं जाता, यदि कारण व्यापारसे पूर्व कार्यं असत् हो, तो

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अधि ० ६ ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३७५ प्रागसत्त्वे क्षीर एवं दध्नः कश्चिदतिशयोन मृत्तिकायाम्, मृत्तिकायामेवच घटस्य कश्चि-दतिशयो न क्षीर इत्युच्येत, तर्ह्यतिशयवत्त्वात्प्रागवस्थाया असत्कार्यवादहानिः सत्का-र्यवादसिद्धिश्च । शक्तिश्च कारणस्य कार्यनियमार्था कल्प्यमाना नान्याऽसती वा कार्य नियच्छेत् असत्त्वाविशेषादन्यत्वाविशेषाच्च । तस्मात्कारणस्यात्मभूता शक्तिः शक्तेश्वात्मभूतं कार्यम् । अपि च कार्यकारणयोर्द्रव्यगुणादीनां चाश्वमहिषवद्भ ेदबुद्धय-भावात्तादात्म्यमभ्युपगन्तव्यम् । * समवायकल्पनायामपि समवायस्य समवायिभिः संबन्धेऽभ्युपगम्यमाने तस्य तस्यान्योन्यः संबन्धः कल्पयितव्य इत्यनवस्थाप्रसङ्गः । अनभ्युपगम्यमाने च विच्छेदप्रसङ्गः । अथ समवायः स्वयं संबन्धरूपत्वादनपेक्ष्यैवापरं संबन्धं संबध्येत, संयोगोऽपितर्हि स्वयं संबन्धरूपत्वादनपेक्ष्यैव समवायं संबध्यत । तादात्म्यप्रतीतेश्च द्रव्यगुणादीनां समवायकल्पनानर्थक्यम् । कथं च कार्यमवयविद्रव्यं होनेसे दूधसे ही दधि क्यों उत्पन्न होता है और मृत्तिकासे क्यों नहीं होता, एवं मृत्तिकासे ही घट उत्पन्न होता है, दूधसे क्यों नहीं होता? ऐसा यदि कहो कि उत्पत्तिके पूर्व सत्त्वाभाव समान होने पर भी दूधमें ही दहीका कुछ अतिशय - विशेष है, मृत्तिकामें नहीं है एवं मृत्तिकामें ही घटका अतिशय-विशेष है दूधमें नहीं है, तब तो उत्पत्ति की पूर्वावस्थाके अतिशय विशिष्ट होनेसे असत्कार्यवादकी हानि और सत्कार्यवादकी सिद्धि होगी I । किञ्च कार्यके नियमनके लिए कल्प्यमान कारण शक्ति कार्य - कारणसे अन्य अथवा असत् होनेपर कार्यका नियमन नहीं कर सकेगी, क्योंकि उसमें असत्त्व समान है और अन्यत्व भी समान है, इसलिए कारणकी आत्मभूत शक्ति है और शक्तिका आत्मभूत कार्य है । कार्यकारणमें तथा द्रव्यगुणादिमें अश्व महिषके समान भेद बुद्धिके अभाव होनेसे तादात्म्य स्वीकार करना चाहिए । समवायकी कल्पना करनेपर भी समवायका समवायियों के साथ सम्बन्ध स्वीकार करनेपर तत् तत् समवायके लिए भिन्न - भिन्न सम्बन्धोंको कल्पना करनी पड़ेगी, ऐसा करनेसे अनवस्था प्रसंग हो जायगा, और सम्बन्ध न स्वीकार करनेपर कार्य कारण, तथा द्रव्य - गुणादिका विच्छेद हो जायगा । ऐसा यदि कहो कि समवाय स्वयं सम्बन्धरूप होने से अन्य सम्बन्धकी अपेक्षा किए विना ही समवायियों के साथ सम्बद्ध हो जायगा, तो संयोग मी सम्बन्धरूप होनेसे समवायकी अपेक्षा किए विना ही सम्बन्धियोंसे सम्बद्ध हो जायगा । तादात्म्यकी प्रतीति द्रव्य - गुण आदिमें समवायकी कल्पना निष्फल है । और कार्य अवयवी द्रव्य सत्यानन्दी - दीपिका उसकी किसी प्रकार भी सत्ता नहीं की जा सकती, यथा सहस्र शिल्पी मिलकर मी नीलको पीत नहीं कर सकते, पटको घट नहीं कर सकते, अतः कार्य संत् है । कारणका कार्थके साथ सम्बन्ध है अर्थात् कासे सम्बद्ध कारण ही कार्यका जनक होता है, इसलिए तत्त कार्यके लिए तत्तत् कारणका ग्रहण होता है अन्यका नहीं । यदि कारणसे असम्बद्ध कार्य उत्पन्न हो, तो सब असम्बद्ध होनेके कारण सब कारणोंसे सब कार्योंकी उत्पत्ति होने लगेगी, तन्तुओं से भी घट उत्पन्न हो जायगा, किन्तु होता नहीं है, क्योंकि घट तन्तुओंसे असम्बद्ध है, अतः कार्यं सत् है । जिस कार्यको उत्पादन करने की शक्ति जिस कारणमें रहती है, उस कारणसे उसी कार्यकी उत्पत्ति होती है अन्यकी नहीं, इसलिए शक्तिको कार्य सम्बद्ध मानना चाहिए । असत् कार्यसे तो सम्वन्ध नहीं हो सकता, इसलिए कार्य पूर्व भी सत् है । कार्य कारणात्मक है, कार्यं कारणसे भिन्न नहीं है, कारण सत् है तो तदभिन्न कार्य भी सत् है ) किञ्च कार्यकी नियामक शक्ति कार्य - कारणसे भिन्न हो अथवा असत् हो, तो कार्यका नियमन नहीं कर सकेगी । यदि असत् को भी नियामक मानें तो असत् नरशृङ्ग भी नियामक हो जायगा । इसलिए कारणरूप से लीन कार्य ही अपनी अभिव्यक्तिका नियामक होनेसे शक्ति कहलाता है, इससे कार्य सत् है । * गुण गुणी, अवयव अवयवी, जाति व्यक्ति आदिका जो एक और नित्य सम्बन्ध है उसे

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३७६ ब्रह्म सूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ कारणेष्ववयवद्रव्येषु वर्तमानं वर्तते? किं समस्तेष्ववयवेषु वर्तेत उत प्रत्यवयवम्? यदि तावत्समस्तेषु वर्तत, ततोऽवयव्यनुपलब्धिः प्रसज्येत, समस्तावयव संनिकर्षस्याश-क्यत्वात् । न हि बहुत्वं समस्तेष्वाश्रयेषु वर्तमानं व्यस्ताश्रयग्रहणेन गृह्यते । अथवावय-वशः समस्तेषु वर्तेत, तदाप्यारम्भकावयवव्यतिरेकेणावयविनोऽवयवाः कल्प्येरन्, रारम्भण्ववयवेष्ववयवशोऽवयवी वर्तेत कोशावयवव्यतिरिक्तैर्ह्यवयवैरसिः कोशं व्याप्नोति । अनवस्था चैवं प्रसज्येत, तेषु तेष्ववयवेषु वर्तयितुमन्येषामन्येषामवयवानां कल्पनीयत्वात् । अथ प्रत्यवयवं वर्तेत तदैकत्र व्यापारेऽन्यत्राव्यापारः स्यात् । न हि देवदत्तः स्रुध्ने संनिधीयमानस्तदहरेव पाटलिपुत्रेऽपि संनिधीयते । युगपदनेकत्र वृत्ता-वनेकत्वप्रसङ्गः स्यात् । देवदत्तयज्ञदत्तयोरिव स्रुघ्नपाटलिपुत्रनिवासिनोः । गोत्वादिवत्प्र-त्येकं परिसमाप्तेर्न दोष इति चेत् - न, तथा प्रतीत्यभावात् । यदि गोत्वादिवत्प्रत्येकं परिस-asarat स्यात् यथा गोत्वं प्रतिव्यक्ति प्रत्यक्षं गृह्यत एवमवयव्यपि प्रत्यवयवं प्रत्यक्षं कारण - अवयव द्रव्योंमें किसप्रकार रहता हुआ स्थित है? क्या वह समस्त अवयवोंमें रहता है अथवा प्रत्येक अवयव में? यदि समस्त अवयवोंमें रहेगा तो अवयवीकी अनुपलब्धि हो जाएगी, क्योंकि समस्त अवयवोंका इन्द्रियके साथ संनिकर्ष नहीं हो सकता, जैसे कि समस्त आश्रयों में वर्तमान बहुत्वका किसी एक आश्रय ग्रहणसे ग्रहण नहीं होता । यदि प्रत्येक अवयवमें रहता हुआ समस्त अवयवोंमें रहेगा तो जिन आरम्भक अवयवोंमें अवयवी अवयवावच्छेदसे रहता है उन आरम्भक अवयवोंगे भिन्न अव-rath अवयवोंकी कल्पना करनी पड़ेगी । जैसे कि कोशके अवयवोंसे भिन्न अवयवोंसे तलवार कोशको व्याप्त करती है, ऐसी अवस्थामें अनवस्था दोष प्रसक्त होगा, क्योंकि तत् तत् अवयवोंमें रहनेके लिए अन्य अन्य अवयवोंकी कल्पना करनी पड़ेगी । यदि कार्य अत्रयवी प्रत्येक अवयवमें रहेगा, तो एक स्थानपर व्यापार होनेपर दूसरे स्थान में व्यापार न होगा, क्योंकि सुघ्न ( आगरा ) में रहता हुआ देवदत्त उसी दिन पाटलिपुत्र ( पटना ) में नहीं रह सकता । यदि युगपत् अनेक स्थानोंमें रहेगा, तो सुन और पाटलिपुत्र निवासी देवदत्त और यज्ञदत्त के समान उसमें अनेकत्वका प्रसंग आ जाएगा । यदि यह कहो कि गोत्व आदिके समान प्रत्येक में परिसमाप्ति होनेसे दोष नहीं है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि वैसी प्रतोति नहीं होती । यदि गोत्व आदिके समान अवयवी प्रत्येक अवयवमें परिसमाप्त हो, तो जैसे गोत्व प्रत्येक व्यक्तिमें गृहीत होता है, वैसे अवयवी मी प्रत्येक अवयवमें प्रत्यक्ष गृहीत सत्यानन्दी - दीपिका नैयायिक आदिके मतमें समवाय कहा जाता है । सिद्धान्ती - समवाय तन्तु पट आदि समवायियों से सम्बद्ध है कि नहीं? यदि सम्बद्ध है तो समवाय सम्बन्धसे अथवा स्वरूप सम्बन्ध से? यदि समवाय सम्बन्ध से तो अनवस्था दोष होगा । यदि स्वरूप सम्बन्धसे सम्बद्ध है तो मृद् और घटका भी स्वरूप सम्बन्ध हो सकता है, क्योंकि जैसे समवाय स्वरूप सम्बन्धसे रहता है, वैसे मृद् और घट भी स्वरूप सम्बन्धसे रह सकते हैं, तो समवाय मानना व्यर्थ है । यदि कहो कि समवाय अपने समवायियोंसे सम्बद्ध नहीं है, तो द्रव्य, गुण आदिकी विशिष्ट बुद्धि नहीं होगी, क्योंकि सम्बन्ध ही कारण द्रव्यमें कार्य द्रव्य समवाय सम्बन्धसे रहने में और भी दोष है -द्रव्य कार्य द्रव्य रहता है अथवा प्रत्यवयव में? आद्य पक्षमें भी - समस्त • अथवा प्रत्येक अवयवमें अलग - अलग । प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, न होनेसे कार्यरूप अवयवो भी प्रत्यक्ष न होगा । द्वितीय पक्ष भी ठीक अवयवशः रहने वाले तलवारके स्वतन्त्ररूपसे अलग अवयव होते हैं, अवयवी तलवार स्थित मान लिया जाय, तो उसके लिए अवयव धारा * कार्यं प्रत्येक अवयवमें रहता है अब यह दूसरे पक्षका विशिष्ट बुद्धिका नियामक है । जैसे समस्त अवयवरूप कारण अवयवोंमें स्वरूपसे कार्य रहता क्योंकि समस्त अवयवोंके प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि जैसे म्यानमें वैसे ही आरम्भक अवयवों में होनेसे अनवस्था दोष होगा । ' अथ ' आदिसे खण्डन है— एक