श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 411–420

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 411 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ६ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो -दीपिका सहित ३७७ गृह्येत, नचैवं नियतं गृह्यते । प्रत्येकपरिसमाप्तौ चावयविनः कार्येणाधिकारात्तस्य चैकत्वाच्छ्रङ्गेणापि स्तनकार्यं कुर्यादुरसा च पृष्टकार्यम् । न चैवं दृश्यते । प्रागुत्प-त्तेश्व कार्यस्यासत्व उत्पत्तिरकर्तृका निरात्मिका च स्यात् । उत्पत्तिश्च नाम क्रिया, सा सकर्तृकैव भवितुमर्हति गत्यादिवत् । क्रियाच नाम स्यादकर्तृका चेति विप्रतिषिध्येत । घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमाना न घटकर्तृका, किं तर्हि? अन्यकर्तृकेति कल्प्या स्यात् । तथा कपालादीनामप्युत्पत्तिरुज्यमानाऽन्यकर्तृकैव कल्प्येत । तथा च सति घट उत्पद्यत इत्युक्ते कुलालादीनि कारणान्युत्पद्यन्त इत्युक्तं स्यात् । न चं लोके घटोत्पत्तिरित्युक्ते कुलालादीनामप्युत्पद्यमानता प्रतीयते, उत्पन्नता प्रतीतेश्च । * अथ स्वकारणसत्तासंबन्ध एवोत्पत्तिरात्मलाभश्च कार्यस्येति चेत् — कथमलब्धात्मकं संबध्येतेति वक्तव्यम्? सतोहि द्वयोः संबन्धः संभवति, न सदसतोरसतोर्वा, अभावस्य च निरुपाख्यत्वा-प्रागुत्पत्तेरिति मर्यादाकरणमनुपपन्नम् । सतां हि लोके क्षेत्रगृहादीनां मर्यादा दृष्ट्रा नाभावस्य । न हि वन्ध्यापुत्रो राजा बभूव प्राक्पूर्णवर्मणोऽभिषेकादित्ये-होगा, परन्तु ऐसा नियमसे गृहीत नहीं होता । प्रत्येक अवयव में परिसमाप्त हो तो अवयवीका कार्यके साथ अधिकार ( सम्बन्ध ) होनेसे और उसके एक होनेसे गौ सींगसे स्तनकार्यं और उरुसे पीठका कार्य करेगी, परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता । उत्पत्तिके पूर्वं कार्यं असत् हो, तो उत्पत्ति कर्तृरहित और निरात्मक ( अकारणात्मक ) हो जायगी । उत्पत्ति तो क्रिया है, वह गति आदि क्रियाके समान कर्तृक ही हो सकती है । हो क्रिया और फिर हो अकर्तृक यह तो विरुद्ध है । घटकी उच्यमान उत्पत्ति घट-कर्तृक नहीं है किन्तु अन्य कर्तृक कल्पना करनी पड़ेगी । उसी प्रकार कपाल आदिकी उच्यमान उत्पत्ति भी अन्यकर्तृक ही कल्पना होगी । ऐसा होनेसे घट उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेपर कुलाल आदि कारण उत्पन्न होते हैं, ऐसा कहा जायगा । परन्तु लोकमें घटकी उत्पत्ति, ऐसा कहनेसे कुलाल आदिकी मी उत्पद्यमानता प्रतीत नहीं होती, किन्तु उनमें उत्पन्नता प्रतीत होती है । यदि कहो कि अपने कारण अथवा अपनी सत्ताके साथ सम्बन्ध ही कार्यकी उत्पत्ति और स्वरूप प्राप्ति है, तो यह कहना चाहिए कि जिसने आत्मलाभ ही प्राप्त नहीं किया हो वह कारणके साथ कैसे सम्बद्ध होगा? क्योंकि दो सत् पदार्थोंका ही सम्बन्ध सम्भव है, सत् और असत् अथवा दोनों असत्का सम्बन्ध संभव नहीं है । अभावके असत् - तुच्छ होनेसे उसमें ' उत्पत्ति के पूर्व ' ऐसी मर्यादा करना युक्त नहीं है, कारण कि लोक में सत् क्षेत्र, गृह आदि पदार्थोंकी [ उत्पत्तिके पूर्व या अनन्तर ] मर्यादा देखी जाती है, किन्तु अभावकी नहीं । पूर्णवर्माके राज्याभिषेक के पूर्व वन्ध्यापुत्र राजा था इस प्रकारकी मर्यादा करनेसे असत् - तुच्छ सत्यानन्दी - दीपिका तन्तुरूप अवयव में जब पट रहता है तब अन्य तन्तुरूप अवयवों में पट नहीं रह सकेगा, यदि रहेगा तो अनेक हो जायगा, क्योंकि एक तन्तुमें एक पट तो अनेक तन्तुओंमें अनेक पट । पूर्वपक्षी - जैसे एक ही समय घट आदि अनेक व्यक्तियों में वर्तमान घटत्व आदि जातिमें अनेकत्व दोष नहीं है, वैसे अनेक तन्तु व्यक्तिमें वर्तमान पटरूप अवयवी में भी अनेकत्व दोष नहीं होगा । सिद्धान्ती - जातिके समान अवयवीकी वृत्ति असिद्ध है, इसलिये उक्त दोष पूर्ववत् ही है । यथा देवदत्त अपना अध्ययन आदि कार्य ग्राम अथवा अरण्यमें करता है तथा गौ अवयवी भी अपना दूध आदि कार्यं शृङ्ग आदिसे संपादित करे, क्योंकि एक अवयव में अवयवी विद्यमान है, इसलिये अवयवीके समस्त कार्यं उस एक अवयवसे होंगे, परन्तु ऐसा होता नहीं है । * उत्पद्यमान पदार्थकी प्रथम विक्रियाका नाम उत्पत्ति है । वह कार्यकी उत्पत्ति अपने कारणमें अपना समवाय है अथवा अपने में सत्ताका समवाय है? इस प्रकार तार्किकमतसे ' अथ ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं । पूर्वपक्षी - हमारे मतमें सर्वत्र सर्वदा कार्यं असत् नहीं है, किन्तु उत्पत्तिके

पृष्ठ 412

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 412 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ वजातीयकेन मर्यादाकरणेन, निरुपाख्यो वन्ध्यापुत्रो राजा बभूव भवति भविष्यतीति वा विशेष्यते । यदि च वन्ध्यापुत्रोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वमभविष्यत्तत इदमप्युपापत्स्यत-कार्याभावोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वं भविष्यतीति । वयं तु पश्यामो वन्ध्यापुत्रस्य कार्या-भावस्य चाभावत्वाविशेषाद्यथा वन्ध्यापुत्रः कारकव्यापारादूर्ध्वं न भविष्यत्येवं कार्या-भावोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वं न भविष्यतीति । * नन्वेवं सति कारकव्यापारोऽनर्थकः प्रसज्येत । यथैव हि प्राक्सिद्धत्वात्कारणस्वरूपसिद्धये न कश्चिद्वयाप्रियते, एवं प्राक्सिद्धत्वात्तद्नन्यत्वाच्च कार्यस्य स्वरूपसिद्धयेऽपि न कश्चिद्वयाप्रियते च । अतः कारकव्यापारार्थवत्त्वाय मन्यामहे प्रागुत्पत्तेरभावः कार्यस्येति चेत्, नैष दोषः, यतः कार्याकारेण कारणं व्यवस्थापयतः कारकव्यापारस्यार्थवत्त्वमुपपद्यते, कार्याकारोऽपि कारणस्यात्मभूत एवानात्मभूतस्यानारभ्यत्वादित्यभाणि । न च विशेषदर्शन-मात्रेण वस्त्वन्यत्वं भवति । नहि देवदत्तः संकोचितहस्तपादः प्रसारितहस्तपादश्च विशेषण दृश्यमानोऽपि वस्त्वन्यत्वं गच्छति, स एवेति प्रत्यभिज्ञानात् । तथा प्रतिदिन-मनेक संस्थानानामपि पित्रादीनां न वस्त्वन्यत्वं भवति, मम पिता मम भ्राता मम पुत्र इति प्रत्यभिज्ञानात् । * जन्मोच्छेदानन्तरितत्वात्तत्र युक्तं नान्यत्रेति चेत्-वन्ध्यापुत्र राजा था, है, होगा इस प्रकार विशेषणोंसे विशेषित नहीं होता । यदि वन्ध्यापुत्र भी कारक व्यापारके अनन्तर होता तो यह भी उपपन्न होता कि असत् कार्य भी कारक व्यापारके अनन्तर होगा । हम तो ऐसा देखते हैं कि वन्ध्यापुत्र और कार्याभाव में अभावत्व समान होनेसे जैसे कारक व्यापारके अनन्तर वन्ध्यापुत्र नहीं होता, वैसे असत् कार्यं भी कारक व्यापारके अनन्तर नहीं होगा । परन्तु ऐसा होने पर उत्पत्ति के पूर्व कार्यं सत् होनेपर तो कारक व्यापार निष्फल हो जायगा । जैसे पूर्व में ही सिद्ध होनेसे कारणके स्वरूप सिद्धिके लिए कोई व्यापार नहीं करता, वैसे ही उत्पत्ति के पूर्वं सिद्ध होनेसे और कारणसे अनन्य होनेसे कार्यके स्वरूपसिद्धि के लिए भी कोई व्यापार नहीं करेगा । परन्तु व्यापार तो करता है, इससे कारकव्यापारकी सार्थकताके लिए उत्पत्तिके पूर्व कार्यका अभाव हम मानते हैं । ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, क्योंकि कार्यरूपसे कारणको व्यवस्थापित करनेवालेको कारक व्यापारमें प्रयोजनवत्त्व उपपन्न होता है । कार्यंका आकार भी कारणका आत्मभूत स्वरूपभूत ही है, क्योंकि जो कार्यं कारणात्मक नहीं होता वह उससे आरभ्य भी नहीं होता, ऐसा कहा है, और विशेष दर्शनमात्रसे पदार्थ कोई अन्य नहीं हो जाता । संकुचित हस्तपाद और प्रसारित हस्तपाद देवदत्तं कुछ विशेषरूपसे दृश्यमान होने पर -मी अन्य वस्तु नहीं हो जाता, क्योंकि वही है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है, उसी प्रकार प्रतिदिन पिता आदि अनेक आकृतियों में कुछ विशेषता आनेपर भी वे अन्य वस्तु नहीं हो जाते, क्योंकि मेरा पिता, मेरा भ्राता, मेरा पुत्र ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । पूर्वं और नाशके अनन्तर असत् है हमारे कार्यमें भेद है । इसलिए आदिसे इसका समाधान करते हैं । परन्तु तार्किकसे दिया हो सकता है, क्योंकि उसके मतमें यदि कहो कि जन्म और मरणका व्यवधान होनेसे पिता आदिमें ऐसी सत्यानन्दी - दीपिका , मध्य में तो सत् ही है । उस अत्यन्त असत् वन्ध्यापुत्र आदिसे उनका कारणके साथ सम्बन्ध हो सकता है । सिद्धान्ती - ' कथम् ' गया यह ( कारकव्यापार व्यर्थ ) दोष तो सत्कार्यवादी सांख्यमतमें अभिव्यक्ति भी सत् है । अद्वैतवादी के मतमें तो यह दोष नहीं है, क्योंकि कार्यरूपसे कारणमें विशेष अवस्थाको सम्पन्न करना ही कारकव्यापारकी सार्थकता है । उससे कोई वस्तु मित्र नहीं हो जाती । जैसे तन्तुओंमें तन्तुवाहक आदि द्वारा आतान वितानकर पटरूप विशेष अवस्थाको सम्पन्न करनेसे तन्तुओंसे पट भिन्न वस्तु नहीं है, वे ही तन्तु हैं, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । * यद्यपि प्रतिदिन पिता आदिके देहकी अवस्थाका परिवर्तन होता है, तो भी देहके जन्म

पृष्ठ 413

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 413 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ६ सु ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३७ ९ न, क्षीरादीनामपि दध्याद्याकारसंस्थानस्य प्रत्यक्षत्वात् । अदृश्यमानानामपि बटधाना-दीनां समानजातीयावयवान्तरोपचितानामंकुरादिभावेन दर्श नगोचरतापत्तौ जन्मसंज्ञा । तेषामेवावयवानामपचयवशाददर्शनापत्तावुच्छेदसंज्ञा । तत्रे हग्जन्मोच्छेदान्तरितत्वाच्चेद-सतः सत्त्वापत्तिः सतश्चासत्त्वापतिस्तथा सति गर्भवासिन उत्तानशायिनश्च भेदप्रसङ्गः । तथा च बाल्ययौवनस्थाविरेष्वपि भेदप्रसङ्गः, पित्रादिव्यवहारलोपप्रसङ्गश्च । एतेन क्षण-भङ्गवादः प्रतिवदितव्यः । यस्य पुनः प्रागुत्पत्तेर सत्कार्यं तस्य निर्विषयः कारकव्यापारः स्यात्, अभावस्य विषयत्वानुपपत्तेराकाशहनन प्रयोजनखङ्गाद्यनेका युधप्रयुक्तिवत् । समवायिकारणविषयः कारकव्यापारः स्यादिति चेत् - न, अन्यविषयेण कारकव्यापारेणा-न्य निष्पत्तेरतिप्रसङ्गात् । समवायिकारणस्यैवात्मातिशयः कार्यमिति चेत् - न, सत्कार्यता-पत्तेः । * तस्मात्क्षीरादीन्येव द्रव्याणि दध्यादिभावेनावतिष्ठमानानि कार्याख्यां लभन्त इति न कारणादन्यत्कार्यं वर्षशतेनापि शक्यं निश्चेतुम् । तथा मूलकारणमेवान्त्यात्कार्यात्तेन तेन कार्याकारेण नटवत्सर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते । एवं युक्तेः कार्यस्य प्रागुत्पत्तेः सत्त्व-मनन्यत्वं च कारणादवगम्यते । शब्दान्तराञ्चैतदवगम्यते । पूर्वसूत्रे ऽसद्वयपदेशिनः शब्द-प्रत्यभिज्ञा होना युक्त है, अन्यत्र नहीं, तो युक्त नहीं है, क्योंकि दूध आदि भी दही आदि आकार विशेष -में प्रत्यक्ष हैं । अदृश्यमान बटबीज आदि भी अन्य समानजातीय अवयवोंसे वृद्धिको पाकर अंकुर आदि भावसे दृष्टिगोचर होनेपर उनकी जन्म संज्ञा होती है, उन्हीं अवयवोंके क्षय होनेसे अदर्शनता प्राप्त होनेपर उच्छेद- मरण संज्ञा होती है । उनमें ऐसे जन्म और मरणका व्यवधान होनेसे यदि असत्को सत्की प्राप्ति और सत्को असत् की प्राप्ति हो, तो ऐसा होनेपर गर्भवासी उत्तान होकर शयन करने वालोंमें भी भेदप्रसंग होगा । एवं बाल्य, यौवन और वार्द्धक्यमें भी भेदका प्रसंग आ जायगा, पिता आदि व्यवहारका लोप प्रसंग होगा । इससे क्षणभङ्गवादका भी प्रत्याख्यान समझना चाहिए । परन्तु जिसके मतमें उत्पत्तिके पूर्वं कार्यं असत् है उसके मतमें आकाशको मारनेके लिए खङ्ग आदि अनेक आयुधों के प्रयोगके समान कारकव्यापार निर्विषयक होना चाहिए, क्योंकि अभाव विषय नहीं हो सकता । यदि कहो कि समवायिकारणविषयक कारकव्यापार होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य विषयक कारकव्यापारसे अन्यकी निष्पत्ति होनेसे अतिप्रसङ्ग हो जायगा । यदि कहो कि समवायिकारणका ही आत्मातिशय कार्य है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि सत्कार्यवाद प्रसक्त हो जायगा । इसलिए दूध आदि पदार्थं दधि आदिके रूपसे अवस्थित हुए कार्य संज्ञाको प्राप्त होते हैं, कारणसे कार्य भिन्न है ऐसा... सौ वर्ष में भी निश्चय नहीं किया जा सकता । उसी प्रकार मूलकारण ही अन्तिम कार्यं पर्यन्त तत् तत् कार्यके रूपसे नटके समान सब व्यवहारोंका आश्रय प्राप्त होता है । इस प्रकार उत्पत्तिके पूर्व कार्यकी सत्ता और कारणसे अनन्यता युक्तिसे अवगत होती हैं । और ' शब्दान्तरात् ' अर्थात् अन्य श्रुतिसे सी यही अवगत होता है । पूर्वं सूत्रमें असत्का कथन करनेवाला [ असदेवेदमग्र आसीत् ] शब्द श्रुति उदाहृत है, सत्यानन्दी - दीपिका और नाश प्रतिदिन नहीं होते, इसलिए देहका अभेद मानना युक्त है । परन्तु मृत्तिकाका नाश होनेपर घट उत्पन्न होता है, इसप्रकार जन्म और नाश विरुद्ध धर्म होनेसे कार्यं और कारणमें अभेद युक्त नहीं है? सि ० 0- - यह ठीक नहीं है, क्योंकि दधि, घट आदि कार्यों में दूध और मृत्तिका आदि अनुगत प्रतीत होते हैं, और अंकुर आदिमें भी बीजके अवयवों की अनुवृत्ति हैं, इससे कारणके जन्म और नाश नहीं होते, किन्तु अवयवोंकी वृद्धि और क्षय होनेसे उसमें जन्म और नाशका व्यवहार होता है । जन्म और नाशरूप हेतुसे मी वस्तुके स्वरूपमें भेद नहीं होता, अन्यथा सब व्यवहार लुप्त हो जाएँगे । * इस प्रकार युक्तिसे और ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है

पृष्ठ 414

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 414 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ स्योदाहृतत्वात्ततोऽन्यः सद्व्यपदेशीशब्दः शब्दान्तरम् - ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवा-द्वितीयम् ' इत्यादि । ' तर्द्धक आहुरसदेवेदमग्र आसीत् ' इति चासत्पक्षमुपक्षिष्य ' कथमसतः सज्जायेत ' इत्याक्षिप्य ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छा ० ६।२।१ ) इत्यवधारयति । तत्रेदंशब्द-वाच्यस्य कार्यस्य प्रागुत्पत्तेः सच्छन्दवाच्येन कारणेन सामानाधिकरण्यस्य श्रूयमाणत्वा-त्सत्त्वानन्यत्वे प्रसिध्यतः । यदि तु प्रागुत्पत्तेर सत्कार्य स्यात्पश्चाश्चोत्पद्यमानं कारणे-समवेयात्तदाऽन्यत्कारणात्स्यात्, तत्र ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' ( छा ० ६ । १ । ३ ) इतीयं प्रतिज्ञा पीड्येत । सत्त्वानन्यत्वावगतेस्त्वियं प्रतिज्ञा समर्थ्यते ॥ १८ ॥

पटवच्च ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - पटवत् च । सूत्रार्थ - जैसे संवेष्टित और प्रसारित एक ही वस्त्रमें तत् तत् समयमें विलक्षणता प्रतीत होनेपर भी वस्त्रमें कोई भेद नहीं आता, वैसे मृद् और घट में भी भेद नहीं है । यथा च संवेष्टितः पटो न व्यक्तं गृह्यते - किमयं पटः किं वाऽन्यद्द्रव्यमिति । स एव प्रसारितो यत्संवेष्टितं द्रव्यं तत्पट एवेति प्रसारणेनाभिव्यक्तो गृह्यते । यथा च संवेष्टन-समये पट इति गृह्यमाणोऽपि न विशिष्टायामविस्तारो गृह्यते, स एव प्रसारणसमये विशि-टायामविस्तारो गृह्यते न संवेष्टितरूपादन्योऽयं भिन्नः पट इति । एवं तन्त्वादिकारणावस्थं पटादिकार्यमस्पष्टं सत् तुरीवेमकुविन्दादिकार कव्यापारादिभिर्व्यक्तं स्पष्टुं गृह्यते । अतः संवेष्टितप्रसारित पटन्यायेनैवानन्यत्कारणात्कार्यमित्यर्थः ॥ १ ९ ॥ यथा च प्राणादिः ॥ २० ॥

इससे अन्य सत्का कथन करनेवाली श्रुति, व ' सदेव सोम्य ० ' ( हे प्रियदर्शन! उत्पत्ति के पूर्व यह एक अद्वितीय ही सत् था ) इत्यादि दूसरी श्रुतियाँ हैं । ' तद्धैक ० ' ( कुछ एक कहते हैं कि उत्पत्तिके पूर्व यह असद्रूप ही था ) इस प्रकार असत् पक्षका उपक्षेप ( उत्थान ) कर ' कथमसतः ० ' ( असत्से सत् कैसे उत्पन्न होगा? ) ऐसा आक्षेपकर ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( हे सोम्य! उत्पत्ति के पूर्वं यह सद्रूप ही था ) इस प्रकार श्रुति निर्णय करती है । इस श्रुतिमें ' इदम् ' शब्द वाच्य कार्यका उत्पत्तिके पूर्वं ' सत् ' शब्द वाच्य कारणके साथ सामानाधिकरण्य श्रयमाण है, इससे सत्त्व और अनन्यत्व स्पष्ट सिद्ध होते हैं । यदि उत्पत्तिके पूर्व कार्य असत् हो और पश्चात् उत्पन्न होकर कारण में समवेत हो, तो कारणसे अन्य होगा । ऐसा होनेपर ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' ( जिससे अश्रु त भी श्रुत हो जाता है ) यह प्रतिज्ञा बाधित हो जायगी । कार्यके सत्त्व और अनन्यत्वकी अवगति से इस प्रतिज्ञाका समर्थन होता है ॥ १८ ॥

जैसे लपेटा हुआ वस्त्र स्पष्टरूपसे गृहीत नहीं होता कि क्या यह पट है अथवा कोई अन्य पदार्थ? वह फैला देनेपर जो संवेष्टित द्रव्य पदार्थ था वह वस्त्र ही है इस प्रकार फैला देनेसे स्पष्ट गृहीत होता है । और जिस प्रकार संवेष्टनके समयमें यह पट है, ऐसा गृह्यमाण होनेपर भी विशिष्ट लम्बाई और चौड़ाई गृहीत नहीं होती, परन्तु प्रसारण समय में वही विस्तार और आयाम गृहीत होते हैं किन्तु संवेष्टतरूपसे भिन्न यह दूसरा पट हैं ऐसा गृहीत नहीं होता । उसी प्रकार तन्तु कारणरूपसे स्थित पट आदि कार्यं अस्पष्ट होता हुआ तुरी, वेम, कुविन्द ( जुलाहा ) आदि कारक व्यापार आदिसे व्यक्त होकर स्पष्ट गृहीत होता है । इसलिए संवेष्टित और प्रसारित पटन्याय से ही कार्य कारण से अभिन्न है, ऐसा अर्थ है ॥ १ ९ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका कि उत्पत्तिके पूर्व कार्यं सत् है और कारणसे अनन्य है । ऐसा मानने से ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' यह प्रतिज्ञा भी सिद्ध होती है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 415

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 415 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ७ सू ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३८१ पदच्छेद – यथा च प्राणादिः । सूत्रार्थ - जैसे प्राणायाम आदिसे निरुद्ध प्राण, अपान आदि द्वारा कार्यं भिन्न होनेपर भी उनमें भेद नहीं है, वैसे कार्य में भेद होनेपर भी कारणके अनन्यत्वमें कोई विरोध नहीं है यथा च लोके प्राणापानादिषु प्राणभेदेषु प्राणायामेन निरुद्धेषु कारणमात्रेण रूपेण वर्तमानेषु जीवनमात्रं कार्य निर्वर्त्यते, नाकुञ्चनप्रसारणादिकं कार्यान्तरम् । तेष्वेव प्राण-भेदेषु पुनः प्रवृत्तेषु जीवनादधिकमाकुञ्चनप्रसारणादिकमपि कार्यान्तरं निर्वर्त्यते, न च प्राणभेदानां प्रभेदवतः प्राणादन्यत्वं, समीरणस्वभावाविशेषात् । एवं कार्यस्य कारणादन-न्यत्बम् । अतश्च कृत्स्नस्य जगतो ब्रह्मकार्यत्वात्तदनन्यत्वाच्च सिद्धैषा श्रौती प्रतिज्ञा ' येना-श्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् ' ( छा ० ६ | १ | ३ ) इति ॥ २० ॥

( ७ ' इतरव्यपदेशाधिकरणम् सू ० २१-२३ ) इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ॥ २१ ॥

पदच्छेद - इतरव्यपदेशात्, हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः । सूत्रार्थ - ( इतरव्यपदेशात् ) ' तत्त्वमसि ' इत्यादि श्रुतिसे इतर जीवमें ब्रह्मत्व व्यपदेश है. अथवा ' अनेन जीवेनात्मना ० ' इत्यादि श्रुति से ब्रह्ममें जीवत्व व्यपदेश है, इससे ब्रह्म स्रष्टा हो, तो जीव स्रष्टा हुआ, अतः ( हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ) ब्रह्मको अपने अहित जरा, मरण आदि अनेक अनर्थ करणरूप दोषोंकी प्रसक्ति होगी, इससे चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं हो सकता । अन्यथा पुनश्चेतन कारणवाद आक्षिप्यते । चेतनाद्धि जगत्प्रक्रियायामाश्रीयमाणायां हिताकरणादयो दोषाः प्रसज्यन्ते । कुतः? इतरव्यपदेशात् । इतरस्य शारीरस्य ब्रह्मात्मत्वं व्यपदिशति श्रुतिः - ' स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' ( छा ० ६/८/७ ) इति प्रतिबोधनात् । यद्वा-इतरस्य च ब्रह्मणः शारीरात्मत्वं व्यपदिशति ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' ( तै ० २।६ ) इति स्रष्टु-रेवाविकृतस्य ब्रह्मणः कार्यानुप्रवेशेन शारीरात्मत्वप्रदर्शनात् । ' अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य और जैसे लोक प्राण, अपान आदि प्राणभेदोंके प्राणायाम द्वारा निरूद्ध होनेपर और कारणरूपसे विद्यमान होनेपर जीवनमात्र कार्य संपादित होता है, किन्तु आकुञ्चन ( सिकुड़ना ) प्रसारण आदि अन्य कार्य नहीं होते । परन्तु उन्हीं प्राणभेदोंके पुनः प्रवृत्त होनेपर जीवनसे अधिक आकुञ्चन, प्रसारण आदि अन्य कार्य भी संपादित होते हैं । भेद विशिष्ट प्राणसे प्राणभेद भिन्न नहीं है, क्योंकि समीरण स्वभाव - वायुका स्वभाव सबमें समान है । इस प्रकार कार्यं कारणसे अनन्य है । इससे सम्पूर्णं जगत् ब्रह्मका कार्य होनेसे और उससे अनन्य होनेसे ' येनाश्रुतं ० ' ( जिसके श्रवणसे अश्रुत श्रुत हो जाता है, मनन न किया हुआ मनन किया हुआ हो जाता है और अविज्ञात विज्ञात हो जाता है ) यह श्रुति प्रतिपादित प्रतिज्ञा सिद्ध होती है ॥ २० ॥

चेतनकारणवाद पर प्रकारान्तरसे पुनः आक्षेप किया जाता है - चेतनसे ही जगत् की सृष्टिका आश्रयण करनेपर हिताकरण आदि दोष प्रसक्त होंगे, किससे? इससे कि इतरका व्यपदेश है । इतर- जीवा-त्माका ब्रह्मात्मरूपसे श्रुति व्यपदेश करती है, क्योंकि ' स आत्मा ० ' ( वह आत्मा है, हे श्वेतकेतु! वह तू है ) ऐसा वोध कराती है अथवा इतर ब्रह्मका जीवात्मरूपसे व्यपदेश करती है, कारण कि ' तत्सृष्ट्वा ० ( उसकी रचनाकर उसमें अनुप्रवेश किया ) इसप्रकार स्रष्टा अविकृत ब्रह्मको ही कार्य में अनुप्रवेश द्वारा जीवात्मरूप दिखलाया है । ' अनेन जीवेनात्मना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओं में अनु-१ – उक्त न्यायसे जीव और ब्रह्मका अनन्यत्व होनेसे जीवके अहितकरण आदि धर्म ब्रह्ममें प्रसक्त होंगे? इस प्रकार आक्षेप संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है ।

पृष्ठ 416

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 416 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १. पा ० १ नामरूपे व्याकरवाणि ' ( छा ० ६ । ३ । २ ) इति च परा देवता जीवमात्मशब्देन व्यपदिशन्ती न ब्रह्मणो भिन्नः शारीर इति दर्शयति तस्माद्यद्ब्रह्मणः स्त्रष्टृत्वं तच्छारीरस्यैवेति । अतः स स्व-तन्त्रः कर्ता सन् हितमेवात्मनः सौमनस्यकरं कुर्यान्नाहितं जन्ममरणजरारोगाद्यने कानर्थ-जालम्; नहि कश्चिदपरंतन्त्रो बन्धनागारमात्मनः कृत्वाऽनुप्रविशति । न च स्वयमत्यन्त-निर्मलः सन्नत्यन्तमलिनं देहमात्मत्वेनोपेयात् । कृतमपि कथंचिद्यदुःखकरं तदिच्छया जह्यात् । सुखकरं चोपाददीत । स्मरेच्च मयेदं जगद्विम्बं विचित्रं विरचितमिति । सर्वो हि लोकः स्पष्टं कार्यं कृत्वा स्मरति - मयेदं कृतमिति । यथा च मायावी स्वयं प्रसारितां मायामिच्छयाऽनायासेनैवोपसंहरति, एवं शारीरोऽपीमां सृष्टिमुपसंहरेत् । स्वमपि तावच्छरीरं शारीरो न शक्नोत्यनायासेनोपसंहर्तुम् । एवं हितक्रियाद्यदर्शनादन्याय्या चेतनाज्जगत्प्रक्रियेति गम्यते ॥ २१ ॥

अधिकं तु मेदनिर्देशात् ॥२२ ॥

पदच्छेद - अधिकम्, तु, भेदनिर्देशात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए | ( अधिकम् ) जीवसे भिन्न सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ब्रह्म जगत्का स्रष्टा है, इसलिए उसमें हिताकरण आदि दोष नहीं हैं, ( भेदनिर्देशात् ) क्योंकि ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रुतिसे कल्पित भेदका निर्देश है । * तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । यत्सर्वज्ञं सर्वशक्ति ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं शा-रीरादधिकमन्यत्, तद्वयं जगतः स्रष्टृ ब्रूमः । न तस्मिन्हिताकरणादयो दोषाः प्रसज्यन्ते । न हि तस्य हितं किंचित्कर्तव्यमस्त्य हितं वा परिहर्तव्यम्, नित्यमुक्तस्वभावत्वात् । नच तस्य ज्ञानप्रतिबन्धः शक्तिप्रतिबन्धो वा क्वचिदप्यस्ति, सर्वज्ञत्वात्सर्वशक्तित्वाच्च । शारीरस्त्वने-प्रवेशकर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) इसप्रकार परदेवता जीवका आत्मशब्द से व्यपदेश करता हुआ शारीर ब्रह्मसे भिन्न नहीं, ऐसा दिखलाता है । इससे ( जीव और ब्रह्मका अभेद होनेसे ) जो ब्रह्मका स्रष्टृत्व है वह शारीरका ही है । इस लिए वह स्वतन्त्र कर्ता होकर मनोनुकूल अपना हित ही करेगा । जन्म, मरण, जरा, रोग आदि अनेक प्रकारका अनर्थं समूहरूप अहित नहीं करेगा, क्योंकि स्वतन्त्र होकर कोई भी अपने लिए स्वयं बन्धनगृह बनाकर उसमें प्रवेश नहीं करता । उसीप्रकार स्वयं अत्यन्त निर्मल होकर अत्यन्त मलिन देहको आत्मरूप से प्राप्त नहीं करता । किसी प्रकार जो दुःखकर कुछ किया भी तो उसका इच्छानुसार त्यागकर देता और सुखकरका ग्रहण करता, और ऐसा स्मरण करता कि मैंने यह विचित्र जगद्विम्ब रचा है, क्योंकि सब लोग कार्यकर यह मैंने किया हैं, ऐसा स्पष्ट स्मरण करते हैं । जैसे मायावी अपनी फैलाई हुई मायाका इच्छानुसार विना परिश्रम ही उपसंहार करता है, वैसे ही शारीर भी इस सृष्टिका उपसंहार करता, परन्तु शारीर तो अपने - शरीरका भी अनायास उपसंहार करनेमें समर्थ नहीं है । इसप्रकार हितक्रिया आदिके अदर्शनसे यह ज्ञात होता है कि चेतनसे जगत् की प्रक्रिया मानना अन्याय - अयुक्त है ॥ २१ ॥

' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव ब्रह्म जीवसे अधिक - भिन्न है, उसे हम जगत्का स्रष्टा कहते हैं । उसमें हिताकरण हित न करना आदि दोष प्रसक्त नहीं होते, क्योंकि उसे न तो कोई अपना हित कर्तव्य है और न अहित परिहार्य है, कारण कि वह नित्य मुक्त स्वभाव है । सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् होनेसे उसके ज्ञानका सत्यानन्दी -दीपिका * जैसे बिम्ब और प्रतिबिम्बमें कल्पित भेद माना गया है, वैसे ही जीव और ब्रह्म में कल्पित भेद है | इससे ब्रह्म और जीवसे भिन्न सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् है, इससे न जीवके धर्मोकी ब्रह्ममें प्रसक्ति है

पृष्ठ 417

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 417 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ७ सू ० २२, २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३८३ वंविधः! तस्मिन्प्रसज्यन्ते हिताकरणादयो दोषाः न तु तं वयं जगतः स्रष्टारं ब्रूमः । कुत एतत्? भेदनिर्देशात् । ' आत्मा वा भरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य: ' ( बृ ० २।४।५ ), ‘ सोऽन्वेष्टव्यः सः विजिज्ञासितव्य: ' ( छा ० ८।७।१ ), ' सता सोम्य तदा संपन्नो भवति ' ( छा ० ६।८।१ ), ' शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढः ' ( वृ ० ४ | ३ | ३५ ) इत्येवंजातीयकः कर्तृकर्मादिभेदनिर्देशो जीवादधिकं ब्रह्म दर्शयति । नन्वभेद निर्देशोऽपि दर्शितः - ' तत्त्वमसि ' इत्येवंजातीयकः । कथं भेदाभेदौ विरुद्धौ संभवेयाताम्? नैष दोषः, आकाशघटाकाशन्यायेनोभयसंभवस्य तत्र तत्र प्रतिष्ठापितत्वात् । अपि च यदा तत्त्वमसीत्येवं जातीयकेनाभेदनिर्देशेनाभेदः प्रतिबोधितो भवति, अपगतं भवति तदा जीवस्य संसारित्वं ब्रह्मणश्च स्रष्टुत्वम्, समस्तस्य मिथ्याज्ञान-८ विजृम्भितस्य भेदव्यवहारस्य सम्यग्ज्ञानेन बाधितत्वात् । तंत्र कुत एव सृष्टिः? कुतो वा हिताकरणादयो दोषाः? अविद्याप्रत्युपस्थापितनामरूपकृतकार्य करणसंघातोपाध्यविवेक-कृता हि भ्रान्तिर्हिताकरणादिलक्षण: संसारोन तु परमार्थतोऽस्तीत्य सकृदवोचाम | जन्म-मरणच्छेदनभेदनाद्यभिमानवत् । अबाधिते तु भेदव्यवहारे ' सोऽन्वेष्टव्य । स विजिज्ञासितव्यः ' इत्येवं जातीयकेन भेदनिर्देशेनावगम्यमानं ब्रह्मणोऽधिकत्वं हिताकरणादिदोषप्रसक्ति निरुणद्धि ॥ २२ ॥

अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २३ ॥

पदच्छेद - अश्मादिवत्, च, तदनुपपत्तिः । सूत्रार्थ - ( अश्मादिवच्च ) एक पृथिवीसे उत्पन्न हुए पत्थरोंमें जैसे वज्र, वैडूर्य आदि प्रतिबन्ध अथवा शक्तिका प्रतिबन्ध कहीं भी नहीं है । परन्तु जीव तो ऐसा नहीं है, अतः उसमें अहित करना आदि दोष प्रसक्त होते हैं । परन्तु हम उसको जगत्का स्रष्टा नहीं कहते हैं । यह क्यों? श्रुतिमें भेदका निर्देश होनेसे । यथा ' आत्मा वा भरे द्रष्टव्य 1० ' ( अयी मैत्रेयी! आत्मा द्रष्टव्य ( दर्शनाहं ) है, इसलिए उसका श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए ) ' सोऽन्वेष्टव्यः ' ( वह अन्वेष्टव्य और विशेष जिज्ञासितव्य है ) ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य | सुषुप्ति में सत् के साथ सम्पन्न हो जाता है ) ' शारीर आत्मा ० ' ( मरणकालमें यह जीवात्मा परमात्मासे अधिष्ठित हो शब्द करता हुआ जाता है ) इसप्रकारके कर्तृकर्म आदि भेदका निर्देश जीवसे भिन्न ब्रह्मको दिखलाता है । परन्तु ' तत्त्वमसि ' इसप्रकारका अभेद निर्देश भी दिखलाया गया है तो पुनः परस्पर विरुद्ध भेद और अभेदका कैसे संभव होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि महाकाश और घटाकाश-न्यायसे तत् तत् स्थानों में दोनोंका संभव प्रतिष्ठापित किया गया है, और जब ' तत्त्वमसि ' इसप्रकारके अभेद निर्देशसे [ जीव ] अभेद प्रतिबोधित होता है तब जीवका संसारित्व और ब्रह्मका स्रष्टृत्व निवृत्त हो जाता है, क्योंकि मिथ्याज्ञानसे फैले हुए समस्त भेद व्यवहारका सम्यग्ज्ञानसे बाघ हो जाता है, तो ऐसी स्थितिमें सृष्टि कैसे और हिताकरण आदि दोष कैसे? हिताकरण आदिरूप संसार अविद्यासे प्रत्युपस्थापित नाम और रूपकृत शरीर और इन्द्रिय संघातरूप उपाधिके अविवेकसे उत्पन्न हुई भ्रान्ति है, परमार्थसे नहीं है, ऐसा अनेकवार हम कह चुके हैं । जैसे कि शरीरके जन्म - मरण, छेदन - भेदन आदिकी आत्मामें अभिमानसे प्रतीति होती है । परन्तु भेदव्यवहारके अबाधित होनेपर ‘ सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः ' इसप्रकारके भेदनिर्देशसे अवगत हुआ ब्रह्मगत भेद हिताकरण आदि दोषोंकी प्रसक्तिको रोकता है ॥ २२ ॥

सत्यानन्दी -दीपिका और न ब्रह्मके धर्मोकी जीवमें प्रसक्ति है । ' आत्मा वा भरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म और जीवमें कल्पित भेदको लेकर सार्थक होती हैं ॥ २२ ॥

पृष्ठ 418

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 418 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३८४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ भेदसे विचित्रता है, वैसे ब्रह्मके कार्योंका स्वरूप वैचित्र्य युक्त है, अतः ( तदनुपपत्तिः ) अन्य कल्पित दोषकी उपपत्ति नहीं है । * यथा च लोके पृथिवीत्वसामान्यान्वितानामप्यश्मनां केचिन्महार्हा मणयो वज्र-वैडूर्यादयोऽन्ये मध्यमवीर्याः सूर्यकान्तादयोऽन्ये प्रहीणाः श्ववायसप्रक्षेपेणाहः पाषाणा इत्यनेकविधं वैचित्र्यं दृश्यते । यथा चैकपृथिवीव्यपाश्रयाणामपि बीजानां बहुविधं पत्रपुष्प-फलगन्धरसादिवैचित्र्यं चन्दनकिपाकचंपकादिषूलक्ष्यते, यथा चैकस्याप्यन्नरसस्य लोहितादीनि केशलोमादीनि च विचित्राणि कार्याणि भवन्ति, एवमेकस्यापि ब्रह्मणो जीव-प्राज्ञपृथक्त्वं कार्यवैचित्र्यं चोपपद्यत इत्यतस्तदनुपपत्तिः, परपरिकल्पित दोषानुपपत्ति-रित्यर्थः । श्रुतेश्च प्रामाण्याद्विकारस्य च वाचारम्भणमात्रत्वात्स्वप्नदृश्यभाववैचित्र्यव-च्चेत्यभ्युच्चयः ॥ २३ ॥

( ८ उपसंहारदर्शनाधिकरणम् सू ० २४-२५ ) उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥ २४ ॥

पदच्छेद - उपसंहारदर्शनात्, न, इति चेत्, न, क्षीरवत्, हि । सूत्रार्थ - ( उपसंहारदर्शनात् ) लोकमें घटादि कर्ता कुलालको दण्ड आदि उपयोगी सामग्रीका संग्रह करते देखा जाता है, वैसे ( न ) असहाय ब्रह्म जगत्का उपादान अथवा निमित्त-कारण नहीं हो सकता । ( इति चेन्न ) यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( क्षीरवद्धि ) जैसे दूध अन्यकी अपेक्षा किए विना ही दधिरूपसे परिणत हो जाता है, वैसे ब्रह्म मी अन्यकी अपेक्षाके विना ही जगत् की सृष्टि आदि करता है । * चेतनं ब्रह्म कर्मेंद्वितीयं जगतः कारणमिति यदुक्तम्, तन्नोपपद्यते । कस्मात्? उप-संहारदर्शनात् । इह हि लोके कुलालादयो घटपटादीनां कर्तारो मृद्दण्डचक्र सूत्रसलिलाद्य-नेककारकसाधनोपसंहारेण संगृहीतसाधनाः सन्तस्तत्तत्कार्यं कुर्वाणा दृश्यन्ते । ब्रह्म चास-जैसे व्यवहार में पृथिवीत्व जातिसे युक्त पत्थरोंमें भी कुछ पत्थर बहुमूल्य वस्त्र, वडूयं आदि मणि होते हैं, कुछ दूसरे सूर्यकान्त आदि मध्यम मूल्यके होते हैं और अन्य निकृष्ट पत्थर कुत्ते और कौओं पर फेकनेके योग्य होते हैं । इसप्रकार पाषाणों में अनेक प्रकारका वैचित्र्य देखा जाता है, और जिस प्रकार एक पृथिवीका आश्रयण करनेवाले बीजोंके भी पत्र, पुष्प, फल, गन्ध, रस आदि अनेक प्रकारका वैचित्र्य चन्दन, ताड़, चम्पक आदि वृक्षोंमें उपलक्षित होता है, और एक ही अन्नरसके मी रुधिर आदि और केश, लोम आदि विचित्र कार्यं होते हैं । वैसे ही एक ब्रह्मका भी जीव और प्राज्ञरूपसे पृथक्त्व और कार्यवैचित्र्य उपपन्न होता है, इससे उस दोषकी अनुपपत्ति है, अर्थात् अन्यसे परिकल्पित दोषकी अनुपपत्ति है, ऐसा अर्थ है । श्रुतिके प्रामाण्य होनेसे और विकारके वाचारम्भण-मात्र होनेसे स्वप्न पदार्थोंके वैचित्र्यके समान है, इसी प्रकार अन्यका भी संग्रह करना चाहिए ॥ २३ ॥

यह जो कहा गया है कि एक अद्वितीय चेतन ब्रह्म जगत्का कारण है, वह उपपन्न नहीं होता, किससे? इससे कि उपसंहार ( संग्रह ) देखने में आता है । इस लोकमें घट, पट आदिके कर्ता कुम्हार आदि मृत्तिका, दण्ड, चक्र, सूत, जल आदि अनेक कारक साधनोंके संग्रहसे संगृहीत साधन होकर तत् तत् कार्यं सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे स्वप्न के एक हो द्रष्टा में भी पण्डित मूर्ख, स्वाभी- सेवक, जड़ - चेतन आदि अनेक प्रकारकी विचित्रता देखने में आती है, वैसे ही एकरूप ब्रह्ममें भी यह कार्यवैचित्र्य युक्त है । इसप्रकार इस विचित्र कार्यका कारण चेतन ब्रह्म ही है, इसलिए जीवाभिन्न ब्रह्ममें वेदान्त समन्वयका विरोध नहीं है ॥ २३ ॥

* गत अधिकरणमें कहा गया है कि जीवसे ओपाधिक भेद होने से ब्रह्ममें अहितकरणादि दोष

पृष्ठ 419

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 419 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ८ सू ० २५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३८५ हायं तवाभिप्रेतम्, तस्य साधनान्तरानुपसंग्रहे सति कथं स्रष्टुत्वमुपपद्येत? तस्मान्न ब्रह्म जगत्कारणमिति चेत् - नैष दोषः, यतः क्षीरवद्द्रव्यस्वभावविशेषादुपपद्यते । यथा हि लोके क्षीरं जलं वा स्वयमेव दधिहिमकरकादिभावेन परिणमतेऽनपेक्ष्यं बाह्यं साध-नम्, तथेहापि भविष्यति । ननु क्षीराद्यपि दध्यादिभावेन परिणममानमपेक्षत एवं बाह्यं साधनमादिकम् कथमुच्यते क्षीरवद्धीति? नैष दोषः, स्वयमपि हि क्षीरं यां च यावतीं च परिणाममात्रामनुभवति तावत्येव त्वर्यते त्वौष्ण्यादिना दधिभावाय । यदि च स्वयं दधिभावशीलता न स्यान्नैवौष्ण्यादिनापि बलाद्दधिभावमापद्येत । नहि वायु-राकाशो वौष्ण्यादिना बलाद्दधिभावमापद्यते । साधनसामग्रया च तस्य पूर्णता संपा-द्यते । परिपूर्णशक्तिकं तु ब्रह्म । न तस्यान्येन केनचित्पूर्णता संपादयितव्या । श्रुतिश्च भवति - ' न यस्य कार्यं कारणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकीज्ञानबलक्रिया च ॥ ' ( इवे ० ६ | ८ ) इति । तस्मादेकस्यापि ब्रह्मणो विचित्र-शक्तियोगात्क्षीरादिवद्धि चित्रपरिणाम उपपद्यते ॥ २४ ॥

देवादिवदपि लोके ॥२५ ॥

पदच्छेद - देवादिवत्, अपि, लोके । सूत्रार्थ - ( लोके ) मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण आदिमें ( देवादिवत् ) जैसे चेतन देवता आदि बाह्य साधनके विना संकल्पमात्रसे विविध कार्य करते उपलब्ध होते हैं, वैसे ब्रह्म ( अपि ) मी असहाय होकर ही इस विचित्र जगत्का उपादान और निमित्त कारण है । करते हुए देखे जाते हैं । तुमको तो ब्रह्म असहाय अभिप्रेत है, ऐसी परिस्थितिमें अन्य साघनोंके संग्रहकेविना वह स्रष्टा कैसे हो सकता है, इसलिए ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है, ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि क्षीरके समान द्रव्यके स्वभाव विशेषसे उपपन्न होता है । जैसे लोकमें दूध या जल बाह्य साधनोंकी अपेक्षा किए विना स्वयं ही दधि, हिम, करक आदि रूपसे परिणत होते हैं, वैसे यहाँ भी हो जायगा । परन्तु दूध आदि मो दधि आदि रूपसे परिणामको प्राप्त होते हुए उष्णता आदि बाह्य साधनोंकी अपेक्षा रखते ही हैं, तो ' क्षीरके समान ' यह कैसे कहते हो? यह दोष नहीं है,. क्योंकि स्वयं ही दूध जिस और जितनी परिणाममात्राको प्राप्त होता है उष्णतादिसे भी उतनी ही परिणाममात्रा प्राप्त होती है, किन्तु उष्णतादिसे उसमें दधि होनेके लिए शीघ्रता की जाती है । यदि उसका स्वयं दधिभाव होनेका स्वभाव न होता तो उष्णता आदि द्वारा भी बलात् दधिभाव प्राप्त नहीं हो सकता । वायु और आकाश औष्ण्य आदिसे बलात् दधिभावको प्राप्त नहीं होते । साधन सामग्रीसे तो केवल उसकी पूर्णता संपादन की जाती है । परन्तु ब्रह्म तो पूर्ण शक्तिवाला है उसकी पूर्णता किसी अन्यसे संपादन करने योग्य नहीं है । और इसमें " न तस्य ० ' उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे अधिक भी कोई दिखाई नहीं देता, उसकी पराशक्ति ( माया ) नाना प्रकारकी सुनी जाती है और वह स्वाभाविकी ज्ञानक्रिया और बलक्रिया है ) यह श्रुति भी है । इसलिए एक ब्रह्मा मी विचित्र शक्तिके योगसे दूध आदिके समान विचित्र परिणाम उपपन्न होता है ॥ २४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका नहीं है । अब उपाधिसे विभक्त भी ब्रह्म असहाय होनेसे कारण नहीं है, क्योंकि वह नाना नहीं है, इस प्रकार प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष है । यद्यपि ब्रह्म एक है, तो मी ' मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ' ( मायाको प्रकृति जानो और महेश्वरको मायावी जानो ) इत्यादि श्रुति और युक्तिसे ज्ञात होता है कि माया शक्ति उसकी सहायक है । यहाँ परिणाम कहने से ब्रह्मका वास्तविक परिणाम नहीं समझना चाहिए, कारण कि ब्रह्म अधिष्ठानरूपसे निर्विकार है । उसकी शक्तिरूप मायाके परिणामसे ब्रह्मका गौणरूपसे परिणाम कहा गया है । अत: ब्रह्ममें ही वेदान्तका समन्वय है ॥ २४ ।

पृष्ठ 420

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 420 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०२ पा ० १ * स्यादेतत् - उपपद्यते क्षीरादीनामचेतनानामपेक्ष्यापि बाह्यं साधनं दध्यादिभावः दृष्टत्वात् । चेतनाः पुनः कुलालादयः साधनसामग्रीमपेक्ष्यैव तस्मै तस्मै कार्याय प्रवर्तमाना दृश्यन्ते । कथं ब्रह्म चेतनं सदसहायं प्रवर्ततेति? देवादिवदिति ब्रूमः । यथा लोके देवाः . पितर ऋषय इत्येवमादयो महाप्रभावाश्चेतना अपि सन्तोऽनपेक्ष्यैव किंचिद्वाह्यं साधन-मैश्वर्य विशेषयोगादभिध्यानमात्रेण स्वत एव बहूनि नानासंस्थानानि शरीराणि प्रासादादीनि च रथादीनि च निर्मिमाणा उपलभ्यन्ते, मन्त्रार्थवादेतिहासपुराण-प्रामाण्यात् । तन्तुनाभश्च स्वत एव तन्तून्सृजति, बलाका चान्तरेणैव शुक्रं गर्भ धत्ते, पद्मिनी चानपेक्ष्य किंचित्प्रस्थान साधनं सरोन्तरात्सरोन्तरं प्रतिष्ठते, एवं चेतन-मपि ब्रह्मानपेक्ष्य वाह्यं साधनं स्वत एव जगत्स्रक्ष्यति, सयदि ब्रूयात्- य एते देवादयो ब्रह्मणो दृष्टान्ता उपात्तास्ते दाष्टन्तिकेन ब्रह्मणा न समाना भवन्ति, शरीरमेव ह्यचेतनं देवादीनां शरीरान्तरादिविभूत्युत्पादन उपादानम् " नतु चेतन आत्मा, तन्तुनाभस्य च क्षुद्रतरजन्तुभक्षणालाला कठिनतामापद्यमाना तन्तुर्भवति, बलाका च स्तनयित्नुरवश्रवणाद्गर्भे धत्ते, पद्मिनी च चेतनप्रयुक्ता सत्यचेतनेनैव शरीरेण सरोन्त-रात्सरोन्तरमुपसर्पति, वल्लीव वृक्षं, नतु स्वयमेवाचेतना सरोन्तरोपसर्पणे व्याप्रियते । यह ठीक है कि अचेतन दूध आदि पदार्थ बाह्य साधनों की अपेक्षा किए विना ही ' दधि आदि नावको उपपन्न होते हैं, क्योंकि ऐसा देखा गया है । परन्तु चेतन कुलाल आदि साधन सामग्रीकी अपेक्षा कर ही तत्, तत् कार्य में प्रवृत्त होते हुए देखे जाते हैं, तो ब्रह्म चेतन होकर असहाय ( साधनकी सहायता के विना ) किस प्रकार कार्य में प्रवृत्त होगा? हम कहते हैं -- देवता आदि समान । जैसे लोकमें देव, पितर, ऋषिगण इत्यादि महाप्रभावशाली चेतन होते हुए भी कुछ भी बाह्य साधन सामग्री की अपेक्षा किए विना ही ऐश्वर्यं विशेषके योगसे केवल संकल्पमात्रसे स्वतः ही मिन मिन्न आकारवाले बहुत शरीर, प्रासाद ( महल ) और रथ आदिका निर्माण करते हुए उपलब्ध होते हैं । मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास और पुराणोंके द्वारा यह प्रमाणित होता है अर्थात् इस विषय में मन्त्र, अर्थवाद, इतिहांस और पुराण ये सब प्रमाण हैं । मकड़ी अपने आप ही तन्तुओंका सृजन करती है, बगुली शुक्र - वीर्यके विना ही गर्भको धारण करती है । पद्मिनी भी प्रस्थानके साधनकी किंचित् भी अपेक्षा किए बिना ही एक सरोवरसे दूसरे सरोवरमें प्रतिष्ठित होती है, वैसे ही चेतन ब्रह्म मी बाह्य साधनकी अपेक्षा किए विना ही स्वतः ही जगत् की सृष्टि करेगा । वह ( वादी ) यदि ऐसा कहे कि ब्रह्म के लिए जो ये देव आदि दृष्टान्तरूपसे गृहीत किए गये हैं, वे दाष्टांन्तिक ब्रह्म साथ समान नहीं हैं, क्योंकि देव आदिका अचेतन शरीर ही अन्य शरीर आदि विभूति उत्पन्न करनेमें उपादान है, चेतन आत्मा नहीं । मकड़ी बहुत छोटे - छोटे जन्तु भक्षण करती है, इससे उसकी लार कठिनताको प्राप्त होकर तन्तु होती है ओर बलाका मेघगर्जनके श्रवणसे गर्भ धारण करती है । जैसे वेल एक वृक्षसे दूसरे वृक्ष पर जाती है, वैसी पद्मिनी भी चेतनसे प्रयुक्त होकर अचेतन शरीरसे एक तालाब से दूसरे तालाबको जाती है, परन्तु स्वयं अचेतन होकर अन्य सरमें जानेका व्यापार नहीं करती है, इसलिए ये ब्रह्म दृष्टान्त नहीं है । उसके प्रति कहना चाहिए - यह दोष नहीं है, क्योंकि कुलाल सत्यानन्दी - दीपिका * ब्रह्म अकारणं चेतनत्वे सति असहायत्वात् मृदादिशून्य कुलाला दिवंत् ' ' ब्रह्म कारण नहीं है, क्योंकि -- चेतन होकर असहाय है, जैसे मृत्तिका आदिसे रहित कुलाल आदि हैं । ' इसका क्षीर आदिमें व्यभिचार नहीं है । परन्तु यह पूर्वपक्षीका अनुमान ठीक नहीं है, क्योंकि ' ब्रह्म कारणं चेतनत्वे-सति असहायत्वात् देवादिवत् ' ' ब्रह्म कारण है, क्योंकि चेतन होकर असहाय है जैसे देव आदि हैं । ' पूर्वोक्त अनुमानको दूषित करनेके लिए यह सत्प्रतिपक्ष अनुमान है ॥ २५ ॥