श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 41–50

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 41–50

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अधि ० १ । सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी दीपिका सहित अन्यत्रान्यधर्माध्यास - इति वदन्ति । केचित्तु - यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रम - इति । अन्ये तु — यत्र यदध्यासरतस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते - इति । वही अध्यास है । कोई लोग एकमें दूसरेके धर्मके आरोपको अध्यास कहते हैं । कुछ लोग कहते हैं कि जिसमें जिसका अध्यास है उसका भेदाग्रह निमित्तक भ्रम अध्यास है । अन्य लोग तो जिसमें जिसका अध्यास है उसमें विरुद्ध धर्मत्वकी कल्पनाको अध्यास कहते हैं । परन्तु सर्वथापि सभी सत्यानन्दी -दीपिका आत्मख्यातिरसत्ख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा । तथाऽनिर्वचनीयख्यातिरेतत्तुं ख्यातिपञ्चकम् । विज्ञानशून्यमीमांसातर्काद्वैतविदां मतम् ॥ ' आत्मख्याति, असत् ख्याति, अख्याति, अन्यथाख्याति और अनिर्वचनीयख्याति ये पाँच ख्यातियाँ क्रमसे विज्ञानवादी, शून्यवादी, मीमांसक, नैयायिक और अद्वैतवादियोंको सम्मत हैं ' भगवान् भाष्यकारने प्रथम लक्षण में ' तं केचित् ' इत्यादि भाष्यसे आत्मख्यातिवादी योगाचार और अन्यथाख्यातिवादी नैयायिकों का मत प्रदर्शित किया है । आत्मख्यातिवादी योगाचार ' क्षणिक विज्ञान ( बुद्धि ) को आत्मा मानते हैं । उनके मतमें क्षणिक विज्ञानसे अतिरिक्त बाह्य कुछ भी नहीं है, तो भी अनादि अविद्या वश विज्ञान ही ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपसे जो पृथक् - पृथक् अवभासित होता है वही भ्रम है । इस मतमें ' अन्यत्रान्यधर्मावभासः ' यह अध्यासका लक्षण है । ' अन्यधर्मका अन्यमें अवभास अध्यास है ' अन्यका धर्म - विज्ञानरूप आत्माका धर्म - आकार विशेष जो रजत आदि उसकी अन्यमें - बाह्य अरु शुक्ति आदिमें प्रतीति ही अध्यास है । यद्यपि योगाचार मतमें बाह्य कोई भी पदार्थ नहीं है अर्थात् बाह्य शून्य है, इसलिए वह बाह्यार्थ शून्यवादी भी कहे जाते हैं, तथापि अनादि अविद्या वश क्षणिक विज्ञान ही रजत आदि अनेक आकारोंसे असत् बाह्यमें अवभासित ' होता है । ' नेदं रजतम् ' इस ज्ञान से बाह्य रजतका बाध होने पर भी वह आन्तर विज्ञानरूपसे है, क्योंकि उसके मतमें प्रतीयमान रजत आदि आकार विशेष आन्तर विज्ञानरूप ही हैं अर्थात् वे सब आत्मा के ही आकार विशेष हैं । आत्मा ही अनेक आकारोंमें प्रतीत होता है, इसलिए इसे आत्मख्याति कहा जाता है । नैयायिकोंकी दृष्टिमें यह समीचीन नहीं है, क्योंकि प्रतीयमान रजत आदि आकार विशेष बुद्धिरूप हैं, ऐसा अनुभव किसीकों भी नहीं होता । भ्रमस्थल तथा व्यवहारमें रजत आदिको आन्तरता किसी प्रमाणसे सिद्ध नहीं है, किन्तु सुख, दुःख आदि आन्तर हैं और रजत आदि बाह्य, यह तो सर्वानुभव सिद्ध है । रजत आदिको आन्तर माननेमें अनुभवसे भी विरोध है । रजत आदि पदार्थ स्वप्नके अतिरिक्त जाग्रत में अन्तर अप्रसिद्ध हैं इससे बाह्य प्रतीयमान पदार्थको भ्रमआदिस्थलोंमें आन्तररूपसे कल्पना करना १ टिप्पणी - बौद्धों में चार मत हैं --- माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैमाषिक! माध्यमिकमतमें बाह्य और आन्तर सब शून्य है, अतः वह सर्वशून्यवादी कहे जाते हैं । योगाचार मतमें बाह्यार्थ शून्य है, किन्तु आन्तर विज्ञान सत्य है । वह क्षणिक विज्ञानको ही आत्मा कहते हैं । प्रतिक्षणमें नष्ट होनेवाला विज्ञान हो बाह्याकारसे प्रतीत होता है, अतः वह क्षणिक विज्ञानवादी अथवा बाह्यार्थं शून्यवादी कहे जाते हैं । सौत्रान्तिक मतमें बाह्यार्थ तो है, परन्तु क्षणिक होनेसे उसका प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए वह उसे अनुमेय मानते हैं । वैभाषिकमतमें बाह्यार्थ है और वह प्रत्यक्ष भी होता है, सौत्रान्तिक और वैभाषिक दोनों बाह्य और आन्तर उभयात्मक पदार्थ मानते हैं, अतः ये दोनों सर्वास्तित्ववादी कहे जाते हैं । इसका विशेष विचार द्वितीय अध्यायके द्वितीयपाद में किया जायगा ।

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V ब्रह्मसूत्र शङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ सत्यानन्दी - दीपिका अप्रसिद्ध है । यदि आन्तर हो तो ' मयि रजतम् ' ( मेरेमें रजत है ) अथवा बुद्धिका धर्म रजत आदि बुद्धि रूप होनेसे ' अहं रजतम् ' ( मैं रजत हूँ ) ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, ' इदं रजतम् ' ऐसी सन्मुख प्रदेश में प्रतीति कदापि नहीं होनी चाहिए, किन्तु ' इदं रजतम् ' इस प्रकार बाह्य प्रतीति और प्रवृत्ति दोनों होती हैं, अतः आन्तर रजत आदि असम्भव हैं, क्योंकि ऐसी परिस्थितिमें उसकी बाह्य प्रतीति सम्भव नहीं है | किन्तु बाह्य भ्रमस्थल में अन्यदेशस्थ रजत आदिको अन्य ( शुक्ति आदि ) में प्रतीति होती है, अतः यह आत्मख्याति न होकर अन्यथाख्याति है । इसी प्रकार ' तं केचित् ' इस प्रथम अध्यास लक्षणसे अन्यथाख्यातिवादी नैयायिक तथा वैशेषिक मतोंका भी उल्लेख किया गया है । उनके मतमें भ्रमस्थल से भिन्न हट्ट आदि देशस्थ अनुभूत रजत आदि की नेत्रके दोषसे अन्यत्र - शुक्ति आदि में प्रतीति अथवा कथन अध्यास है अर्थात् भ्रमसे पूर्व हट्ट आदिमें देखे गये रजत आदि नेत्रके दोषसे संस्कारद्वारा भ्रमस्थल में प्रतीत होते हैं । यह प्राचीन नैयायिकों का मत | नव्य नैयायिक चिन्तामणिकार इसका खण्डन करते हैं- यदि नेत्र दोष से ही दूरस्थ रजत आदिक सन्मुख शुक्ति आदि में प्रतीति होती है तो भ्रमस्थल और हट्टके मध्यमें वर्तमान वृक्ष आदि अन्य पदर्थों की प्रतीति क्यों नहीं होती? उनकी भी प्रतीति होनी चाहिए? परन्तु देखा यह जाता है कि मध्यमें वर्तमान पदार्थोंकी प्रतीति नहीं होती, तो इससे यह मानना पड़ेगा कि नेत्र दोषसे हट्ट आदि स्थित रजत आदिकी भी शुक्ति आदि प्रतीति नहीं होती, क्योंकि भ्रमकाल में अथवा बाध कालमें ऐसा अनुभव तं । किसीको भी नहीं होता कि हट्ट आदि देशस्थित रजत यहाँ प्रतीत हुआ अथवा उसका बाध हुआ । किन्तु नेत्र आदि दोषसे शुक्ति आदि ही रजत आदिके रूपसे प्रतीत होते हैं । परन्तु शाङ्कर मतानुसार यह अन्यथाख्याति वादी मत भी समीचीन नहीं है, क्योकि वेदान्त सिद्धान्तमें अर्थाध्यास और ज्ञानाध्यास इस भेदसे अध्यास दो प्रकारका माना गया है । किन्तु इसके विपरीत नैयायिक और क्षणिकविज्ञानवादी मतमें केवल ज्ञानाध्यास स्वीकृत है अर्थाध्यास नहीं, क्योंकि नैयायिक भ्रम ज्ञानका विषय देशान्तरस्थ रजत अथवा रजतत्वको मानते हैं और क्षणिक विज्ञानवादी विज्ञानका परिणाम - आकार विशेष आन्तर सत्य रजतको भ्रम ज्ञानका विषय मानते हैं, अतः इन दोनोंके मतमें विषय मिथ्या नहीं है, किन्तु शुक्तिमें रजतत्वका सम्बन्ध प्रतीत होता है इसलिए ' इदं रजतम् ' यह ज्ञान मिथ्या है । बाध भी केवल रजतत्वके संसर्गमात्रका होता है । अब ' केचित्तु ' इस द्वितीय लक्षणसे अख्यातिवादी सांख्य तथा मीमांसक मतोंका उल्लेख है । जैसे— “ यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रमः " जिस शुक्ति आदिमें जिस रजत आदिका अध्यास लोक प्रसिद्ध है वहाँ उन दोनों विषयी ज्ञानोंका भेद गृहीत न होने के कारण भ्रम - ' यह रजत है ' ऐसा विशिष्ट व्यवहार होता है, तात्पर्य यह है कि उनके मत में ' इदं रजतम् ' “ अयं सर्पः ' इत्यादि भ्रम स्थलोंमें शुक्ति तथा रज्जुसे सदोष नेत्रका सम्बन्ध होनेपर शुक्ति तथा रज्जुका शुक्तित्व आदि विशेष अंश प्रतीत नहीं होता; किन्तु सामान्य ' इदम् ' अंश प्रतीत होता है । सदोष नेत्र का शुक्ति आदिके साथ सम्बन्ध होने पर सादृश्य आदिसे झटिति रजत आदिके संस्कार उद्भूत होकर रजत, सर्प आदिकी स्मृतिको उत्पन्न करते हैं । यद्यपि स्मृतिज्ञानमें तत्ता अंशकी प्रतीति होती है, परन्तु दोषवश वह लुप्त हो जाती है । इसलिए ' इदं रजतम् ' इत्यादि भ्रम स्थलोंमें दो ज्ञान होते हैं । ' इदम् ' अंशका नेत्रोंसे प्रत्यक्षज्ञान और रजत आदिका स्मृतिज्ञान । इससे ये दोनों ज्ञान सत्य हैं और इनके विषय इदम् और - रजत भी सत्य हैं । किन्तु दोषवश दोनों

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी दीपिका सहित सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति । तथा च लोकेऽनुभवः- शुक्तिका हि रजतवदवभासते, एकश्चन्द्रः स द्वितीयवदिति । कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो मतोंमें ‘ अन्यमें अन्यके धर्मकी प्रतीति ' इस लक्षणका व्यभिचार नहीं है । इसी प्रकार लोक व्यवहारमें भी अनुभव है कि शुक्ति ही रजतके समान अवभासित होती है; एक ही चन्द्रमा दो चन्द्रमाओं के समान प्रतीत होता है । अविषय प्रत्यगात्मा - चिदात्मा में विषय और उसके धर्मोका अध्यास कैसे होगा? सत्यानन्दी -दीपिका ज्ञानों और दोनों विषयोंका भेद गृहीत न होनेके कारण ' इदं रजतम् ' ' अयं सर्प: ' इत्यादि विशिष्ट व्यवहार होता है, जिससे प्रवृत्ति भी होती है । परन्तु ' नेदं रजतम् ' इस ज्ञानसे भेदाग्रह निमित्तक भ्रान्ति कालमें दोनों ज्ञानों तथा दोनों विषयोंका जो अभेद व्यवहार होता था वह बाधित हो जाता है और इससे ' इदं रजतम् ' यह पूर्व ज्ञान भ्रमरूप कहा जाता है । सांख्य और मीमांसक मतमें वह विशिष्ट व्यवहार ही भ्रमरूप है और वही बाधित होता है । उनके मत में कोई भी ज्ञान मिथ्या नहीं प्रत्युत ज्ञानमात्र सत्य है । तत्त्वतः उनका यह अभिमत भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्ति में रजत भ्रमसे रजतार्थी पुरुषकी निष्फल प्रवृत्ति होती है, इससे भ्रमज्ञान अनुभव सिद्ध है । किश्व अख्यातिवादी मतसे तो बाधज्ञान के अनन्तर रजतकी स्मृति और शुक्ति ज्ञानका भेद गृहीत न होनेके कारण मेरी शुक्तिमें प्रवृत्ति हुई थी, ऐसा बाधज्ञान होना चाहिए? और स्मृतिमें तत्तांशका लोप आदि अनेक विरुद्ध कल्पनाओंकी अपेक्षा एक भ्रमज्ञान मानना युक्तियुक्त है । किश्व भ्रमस्थलमें अङ्गुली निर्देश पूर्वक रंजतार्थीकी नियमसे प्रवृत्ति हुआ करती है । जहाँ नियमसे प्रवृत्ति होती है वहाँ रजत और रजतज्ञान दोनोंकी उत्पत्ति मानना युक्त है । अत: भ्रमस्थलमें एक ही विशिष्ट ज्ञान होता है । अब ' अन्ये तु ' इस तृतीय लक्षणसे शून्यवादी माध्यमिक मतका उल्लेख करते हैं— “ यत्र यदध्यासः तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते ” “ जिसमें - शुक्ति में जिस रजत आदिका अध्यास है, तस्यैव - उसी शुक्तिमें विपरीतधर्म - अत्यन्त असत् रजतकी रजतरूपसे प्रतीति अथवा शुक्तिमें अत्यन्त असत् रजतकी कल्पनाको अध्यास कहते हैं ' अर्थात् वे अत्यन्त असत् रजतकी प्रतीतिको असत्ख्याति कहते हैं । परन्तु यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि यदि अत्यन्त असत् रजतकी प्रतीति हो सकती है तो असत् गगनकुसुम, वन्ध्यापुत्र आदिकी भी प्रतीति होनी चाहिए? परन्तु होती नहीं, इससे अत्यन्त असत् रजत आदिकी भी भ्रम स्थलमें प्रतीति असंभव है । इससे यह स्पष्ट हुआ कि ' अन्यमें अन्यका अवभास ' यह अध्यासका लक्षण सर्ववादी सम्मत है । इस बातको भगवान् भाष्यकारने ' सर्वथापि ' इत्यादिसे दिखलाया है । यद्यपि सभी पक्षोंमें अधिष्ठान और आरोप्येका किस प्रकार अध्यास होता है, इस विषय में विवाद है, तो भी ' अन्यमें अन्यधर्मकी प्रतीति अध्यास है, इस लक्षण में किसीको विवाद नहीं और इस लक्षणका कहीं व्यभिचार भी नहीं है । यहाँ तक आत्मख्याति, अन्यथाख्याति, अख्याति और असत्ख्याति इन चारोंका संक्षेपसे वर्णन किया गया । अब क्रमसे प्राप्त शाङ्कर वेदान्तं अभिमत अनिर्वचनीयख्यातिका भी विचार किया जाता है - ' सत् असत्से विलक्षण प्रतीतिको अनिर्वचनीयख्याति कहते हैं ' । यथा ' शुक्ताविदं रजतम् ' इस प्रतीतिका विषय रजत अनिर्वचनीय है, क्योंकि ' नेदं रजतम् ' इस बाध ज्ञानसे बाधित होने के कारण वह सत् नहीं, प्रतीतिका विषय होनेसे गंगनकुसुम आदिके समान असत् - अलीक भी नहीं, सत्, असत् उभयात्मक भी नहीं,

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१० ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाप्य [ अ ० १ पा ० १ विषयतद्धर्माणाम्? सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति, युष्मत्प्रत्यया-जब कि सब लोग पुरोवर्ती ( इन्द्रियसंयुक्त ) विषयमें अन्य ( इन्द्रियासंयुक्त ) विषयका अध्यास करते हैं और तुम युष्मत् ( तुम ) ऐसी प्रतीति से रहित प्रत्यगात्माको अविषय कहते हो । कहते हैं — यह सत्यानन्दी -दीपिका क्योंकि दोनों का परस्पर विरोध है, अत: भ्रमस्थल में सत्, असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय रजतकी प्रतीति होती है, इससे इसे अनिर्वचनीयख्याति कहते हैं । अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति और प्रतीति इस प्रकार होती है- अन्तःकरणकी वृत्ति नेत्र द्वारा बाहर निकल कर विषयके समान आकारको प्राप्त कर विषयस्थ आवरणका नाश करती है और वृत्तिस्थ आभास विषयको प्रकाशित करता है, वैसे तो चाक्षुष ज्ञानमें प्रकाश आदि बाह्य सामग्री भी अपेक्षित है । बाह्य पदार्थोंका ' यह घट है, यह पट है ' इस प्रकार चाक्षुष प्रमाज्ञान उत्पन्न होता है । परन्तु जहाँ शुक्ति आदिमें रजत आदिका भ्रम होता है वहाँ अन्तःकरणकी वृत्ति शुक्तिके साथ सम्बन्धित होनेपर तिमिर आदि दोष वश शुक्तिके आकारको धारण नहीं कर सकती, इससे शुक्तिस्थ आवरणकी भी निवृत्ति नहीं हो पाती, तो वहाँ शुक्तिके विशेष अंशका ज्ञान न होनेके कारण पूर्वानु-भूत रजतके संस्कार जाग्रत हो जाते हैं, जिससे शुक्ति चेतनस्थ अविद्या क्षुब्ध होकर तमोगुणसे रजता-कार परिणामको प्राप्त होती है । जिस समय जिस निमित्तसे शुक्ति चेतनस्थ अविद्याका रजताकार परिणाम होता है, उसी समय उसी निमित्त से साक्षी चेतनस्थ अविद्याका सत्त्वगुण भी ज्ञानाकारसे परिणत हो जाता है । इस प्रकार भ्रमस्थलमें रजत आदि विषय और उसका ज्ञान एक ही समय अनिर्वचनीय उत्पन्न होते हैं । किसी सत्ख्याति वादीके मत में हैं, उन्होंमें सत्य रजत उत्पन्न होता है । इस प्रकार यदि रजत होगा, जब कि ' नेदं रजतम् ' ऐसा बाध सर्वानुभव सिद्ध है, अतः भ्रमस्थलमें अध्यस्त वस्तु सत् असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय है । साधारण लोग सब एक मत हैं । अब भगवान् माष्यकार ' तथा च ' इत्यादिसे सिद्धान्तको अन्यमें अन्यकी मिथ्या प्रतीति तो सर्वानुभव सिद्ध है, जैसे शुक्ति शुक्तिमें रजतके सत्य अवयव विद्यमान सत् मानें तो उसका बाध कदापि नहीं यह मत भी युक्त नहीं है । इसलिए इस प्रकार मिथ्याप्रतीतिमें विद्वान् तथा दृष्टान्त द्वारा स्पष्ट करते हैं । शङ्का-आदिमें रजत आदिकी । परन्तु अभिन्न वस्तु भेद भ्रम तो अनुभव विरुद्ध है, अतः वेदान्तमत में चिदात्मासे अभिन्न जीवोंका भेद कैसे? समाधान – अङ्गुली आदि व्यवधान के कारण नेत्रसे जैसे एक चन्द्रमा भी दोके समान प्रतीत होता है, वैसे ही अविद्या उपाधिके कारण ब्रह्म और जीव दो माने जाते हैं, इस प्रकार औपाधिक भेद सिद्ध होनेपर अध्यास भी सिद्ध है । परन्तु " विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ” ( ब्रह्म तथा जीवके भेदजनक अज्ञानका आत्मसाक्षात्कारसे अत्यन्त बाध होनेपर जीव ब्रह्मका असत् भेद कौन करेगा ) । इस प्रकार अध्यासके सामान्य लक्षणका निरूपण कर अब चिदात्मामें अनात्म · • अध्यासका निरूपण करते हैं । इसलिए इसे संभावना अध्यास भी कहा जाता है । अब ' कथं पुनः ' इत्यादिसेचिदात्मामें अध्यास पर आक्षेप करते हैं । शुक्ति, रज्जु आदि जो जो प्रत्यक्ष अध्यासके अधिष्ठान हैं वे सब इन्द्रिय संयुक्त होने से विषय हैं, अत उनमें रजत, सर्प आदिका अध्यास संभव है । परन्तु रूप आदि रहित आत्मा चक्षु आदि

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी दीपिका सहित ११ पेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि? उच्यते, न तावदयमेकान्तेनाविषयः, अस्म-त्प्रत्ययविषयत्वात्; अपरोक्षत्वाश्च प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः । न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थित आत्मा अत्यन्त - सर्वथा अविषय नहीं है, क्योंकि वह अस्मत् ( अहम् ) प्रत्ययका विषय है, अपरोक्ष है और प्रत्यगात्मरूपसे प्रसिद्ध है । किश्व यह भी कोई नियम नहीं है कि पुरोवर्ती विषयमें ही विषयान्तर का अध्यास होना चाहिए, क्योंकि अप्रत्यक्ष आकाश में भी अविवेकी लोग तलमलिनता आदिका सत्यानन्दी - दीपिका इन्द्रियोंसे अग्राह्य होनेके कारण अविषय हैं, इसलिए अविषय आत्मामें अहंकार आदि विषय और उनके जड़त्व आदि धर्मोका अध्यास कैसे हो सकता है? यदि अव्यासके लोभसे आत्माको विषय कहें तो ' न चक्षुषा गृह्यते ' ( मु ० ३ | १ | ८ ) ( यह आत्मा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे गृहीत नहीं होता ) ' यच्चक्षुषा न पश्यति ' ( केन ० १।६ ) ( जिसे कोई अन्तःकरणवृत्ति युक्त नेत्रसे नहीं देखता ) ‘ न तत्र चक्षुर्गच्छति ' ( केन ० १।३ ) ( उस ब्रह्म तक नेत्र आदि इन्द्रियाँ नहीं जातीं ) इत्यादि श्रुति-वाक्य बाधित होंगे? समाधान - भगवान् भाष्यकार ' उच्यते ' इत्यादिसे आत्मामें अध्यास होने की प्रतिज्ञा करते हैं -- आत्मा सर्वथा अविषय नहीं है, किन्तु लोक प्रसिद्ध अहं प्रतीतिका विषय है । यह आत्मा बाल, वृद्ध, मूर्ख, पण्डित आदि सबका अन्तरात्मा है, स्वप्रकाश होनेसे सबको प्रत्यक्ष है, इसलिए सब दृढ़ता पूर्वक कहते हैं कि ' मैं हूँ ' अपने अस्तित्वके विषय में कदापि किसीको सन्देह आदि नहीं हैं । आत्मा स्वप्रकाश है, इसमें ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' ( क ० ५ | १५, श्वेता ० ६ १४, मुण्ड ० २1१० ) ( उस आत्मा के प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ) और ' न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ' ( गीता ० १५/६ ) ( उस स्वयं प्रकाशमय परम पदको न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि प्रकाशित कर सकता है ) ' यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ ' ( गीता ० १५।१२ ) ( हे अर्जुन! जो तेज सूर्य में स्थित हुआ सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमामें स्थित है और जो तेज अग्निमें स्थित है, उसे तू मेरा ही तेज जान ) इत्यादि श्रुति स्मृति भी प्रमाण हैं । इस प्रकार आत्मा जब स्वप्रकाशरूपसे प्रतीत हो रहा है, तो उसमें अध्यास भी सम्भव है । अब ' न चायमस्ति नियमः ' इत्यादिसे न्याय मतानुसार समाधान ऐकान्तिक - अव्यभिचरित नियम नहीं है कि इन्द्रिय संयुक्त पुरोवर्ती विषयमें ही हो । उद्भूतरूप और स्पर्श युक्त द्रव्य ही नेत्र तथा त्वक् इन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्षके आकाश दोनों गुणोंसे रहित होने के कारण दोनों इन्द्रियोंसे गृहीत नहीं है और क्योंकि नेत्र आदि इन्द्रिय सहयोगके विना बाह्य पदार्थोंके ग्रहण करने में वह अप्रत्यक्ष आकाशमें अविवेकी पुरुष पृथिवी आदिकी छायारूप मलिनता अथवा ( कड़ाही ) के समान तलसदृशताका अध्यास करते हैं अर्थात् आकाश नीला है । इस प्रकार जब अप्रत्यक्ष आकाशमें अध्यास हो सकता है तो अप्रत्यक्ष करते हैं- ऐसा कोई भिन्न विषयका अध्यास योग्य होता है, परन्तु मनसे भी अप्रत्यक्ष है, अस्वतन्त्र है, तो भी इन्द्रनीलमणिके कटाह है और कटाहके समान आत्मामें भी अनात्मा-अहंकार आदि और उनके सुख - दुःख आदि धर्मो के अध्यास होनेमें कोई विप्रतिमत्ति नहीं है । शंका - अधिष्ठान और अध्यस्त दोनोंका सादृश्य भी तो अध्यासमें हेतु है, जैसे कि शुक्ति और रजत, रज्जु और सर्प आदिका सादृश्य इनके परस्पर अध्यास में हेतु है, तो ऐसे ही आत्मा और

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१२ ब्रह्मसूत्र शाङ्कर भाष्य [ अ ० १ पा ० १ एव विषये विषयान्तरमध्यसितव्यमिति, अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्य-स्यन्ति । एवमविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यप्यनात्माध्यासः । तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्तेः तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं विद्यामाहुः । तत्रैवं सति यत्र अध्यास करते हैं । इस प्रकार प्रत्यगात्मामें अनात्माका अध्यास भी अविरुद्ध है । उक्त लक्षणवाले इस अध्यासको विद्वान् लोग ' अविद्या ' ऐसा मानते हैं और इसके विवेक द्वारा वस्तु स्वरूपके निश्चयको ' विद्या ' कहते हैं । ऐसा होनेपर - अध्यासके अविद्यात्मक होनेपर अथवा वस्तु स्वरूपका निश्चय होनेपर जिसमें जिसका अध्यास होता है, तत्कृत दोष अथवा गुणके साथ अणुमात्र भी वह सम्बन्धित नहीं होता । सत्यानन्दी -दीपिका अनात्माका भी परस्पर कोई सादृश्य होना चाहिए, जिससे इन दोनों का परस्पर अध्यास हो? परन्तु इनका परस्पर सादृश्य किसी प्रकार भी संभव नहीं, तो अध्यास कैसे? समाधान - जैसे आकाश और नीलगुण दोनोंमें परस्पर कोई सादृश्य न होने पर भी ' आकाश नीला है ' ऐसा अध्यास सर्वानुभव सिद्ध हैं, वैसे ही आत्मा और अनात्मा के अध्यासके विषय में समझना चाहिए । यह समाधान न्याय मतानुसार किया गया है । [ वेदान्तसिद्धान्त में तो आकाश साक्षीभास्य होनेसे प्रत्यक्ष ही है ] अतः आत्मा और अहंकार आदि और उनके धर्मोका अध्यास हो सकता है । अन्य अध्यासोंको छोड़कर किसलिए आत्मा और अनात्मा और उनके धर्मोके अध्यासका शङ्का समाधान द्वारा निरूपण किया गया है? किञ्च प्रत्यगभिन्न ब्रह्मके ज्ञानसे निवृत्त होनेवाली तथा संसारकी मूलभूत अविद्याको छोड़कर अध्यासके निरूपणका प्रयोजन क्या है? भगवान् भाष्यकार इन शङ्काओंका ' तमेतम ' इत्यादिसे समाधान करते हैं । इस प्रकार अघ्यासकी संभावना दिखलाकर अब उसमें प्रमाण कहते हैं— अन्यमें अन्यके अवभासात्मक अध्यासको पण्डित लोग अविद्या और अध्यासके बाधात्मक तथा चिदात्मारूप अधिष्ठानके स्वरूपके निश्चयको विद्या कहते हैं । यद्यपि — अविद्या ही सर्वं अनर्थका बीजरूपसे श्रुति, स्मृति इतिहास पुराण आदिमें प्रसिद्ध है और उसकी निवृत्तिके लिए सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्र प्रवृत्त हैं, तो भी उसे छोड़कर कार्यात्मक अध्यासका वर्णन करनेका प्रयोजन यह है कि कारणात्मक अविद्या सुषुप्ति तथा प्रलयमें स्वरूपसे विद्यमान होनेपर भी अर्थमय नहीं है, किन्तु जाग्रत् आदि - अवस्थाओं में कार्यरूपसे - कर्तृत्व भोक्तृत्वरूपसे अनर्थकी हेतु है, आत्मामें अनात्मबुद्धि आदिका अध्यास ही अनर्थका साक्षात् हेतु है अन्य अध्यास नहीं, अतः यहाँ अन्य अध्यासोंका वर्णन नहीं किया गया है । आगे ' तत्रैवं सति ' इससे आत्मामें अनात्मप्रतीतिको अध्यास माननेका प्रयोजन कहते हैं । उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध हुआ कि अध्यास अविद्याका कार्य होनेसे अविद्यात्मक है । अतः जिस अधिष्ठान में जिस वस्तुका अध्यास होता है, उसके गुण अथवा दोषसे वह अणुमात्र मी सम्बन्धित नहीं होता । जैसे बुद्धि आदि आत्मामें स्वरूपसे अध्यस्त हैं, इसलिए उनके राग - द्वेष आदि दोषोंसे आत्मा अणुमात्र भी लिप्त नहीं होता और आत्माका बुद्धि आदिके साथ केवल संसर्गाध्यास है तो आत्माके चैतन्य, आनन्द आदिसे बुद्धि आदि भी कभी सम्बन्धित नहीं होते । “ आरोपितं नाश्रयदूषकं भवेत्कदापि मूढैर्मतिदोषदूषितैः । नाहीकरोत्यूपरभूमिभागं मरीचिकावारिमहाप्रवाहः ॥ " ( बुद्धि दोषसे दूषित अज्ञानियों द्वारा आरोपितकी हुई वस्तु अपने आश्रय - अधिष्ठानको कदापि दूषित नहीं कर सकती । जैसे मृगतृष्णाका महान् जल प्रवाह अपने आश्रय ऊसर भूमि खण्डको

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १३ यदध्यासः, तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न संबध्यते, तमेतमविद्याख्य-मात्मानात्मनोरितरेतराध्यासं पुरस्कृत्य सर्वे प्रमाणप्रमेयव्यवहारा लौकिका वैदिकाश्च प्रवृत्ताः, सर्वाणि च शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि । कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि चेति? उच्यते, देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमान र हितस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः । न हीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः पूर्वीक्त इस अविद्या संज्ञक आत्मा और अनात्माके परस्पर अध्यासको आगे रखकर सब लौकिल और वैदिक प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय व्यवहार प्रवृत्त हुए हैं और विधि, निषेध बोधक एवं मोक्षपरक शास्त्र प्रवृत्त हुए हैं तो फिर अविद्यावाला प्रमाता प्रत्यक्ष आदि प्रमाण और शास्त्रका आश्रय कैसे हो सकता है? कहते हैं - देह, इन्द्रिय आदिमें अहं मम अभिभान रहित आत्माका प्रमातृत्व अनुपपन्न होनेसे उसमें प्रमाणकी प्रवृत्तिकी भी अनुपपत्ति होती है, क्योंकि इन्द्रियोंका ग्रहण किए विना प्रत्यक्ष आदि व्यवहार संभव नही होते और अधिष्ठान ( इन्द्रियोंका आश्रयभूत शरीर ) के विना इन्द्रियोंका व्यवहार संभव सत्यानन्दी - दीपिका कश्चित् भी गीला नहीं करता ) । इससे यह सिद्ध होता है कि अधिष्ठान अव्यस्त वस्तुके गुण, दोषंसे किश्चिन्मात्र भी लिप्त नहीं होता । किञ्च अध्यस्त वस्तु अविद्यत्मक होने के कारण अधिष्ठानके अपरोक्ष ज्ञानसे निवृत्त हो जाती है । इस प्रकार साक्षीभास्य अपरोक्ष अविद्या अध्यास प्रमाता आदिका, विधि ( यजेत ) प्रतिषेध ( सुरापान आदिका निषेध ) बोधक ऋग्वेद आदि कर्मशास्त्रका " विधि प्रतिषेध से रहित मोक्ष - जीवब्रह्मैक्य - बोधक उपनिषद् आदि शास्त्रका हेतु है । इस तरह तीन प्रकारके व्यवहारका कारण होनेसे अध्यास यद्यपि प्रत्यक्ष सिद्ध है, तो भी अज्ञानापन्न आत्माको विषय करनेवाले प्रत्यक्ष आदि प्रमाण तथा शास्त्रोंके प्रामाण्यके विषय में पूर्वपक्षीकी शङ्काका ' कथं पुनः ' इत्यादिसे उल्लेख करते हैं-यहाँ अभिप्राय यह है कि देहमें ' मैं देह हूँ ' इस अभिमान से तथा श्रोत्र आदि इन्द्रियों और शरीरावयवोंमें ‘ ये मेरे हैं ' इस ममाभिमानसे रहित सुप्त पुरुष प्रमाता नहीं हो सकता, प्रमाताके अनुपपन्न होनेपर श्रोत्र आदि प्रमाणोंकी प्रवृत्ति नहीं ही सकती, इसलिए देह में ' अहम् ' अभिमान के समान श्रोत्र आदि इन्द्रियों में भी ' मय ' अभिमान होना चाहिए । शंका - जबकि देहमें ' मैं देह हूँ ' इस अभिमान मात्र से लोक प्रसिद्ध व्यवहार हो सकता है, तो श्रोत्र आदि इन्द्रियोंमें ' मम ' अभिमान माननेका प्रयोजन? समाधान - श्रवण आदि इन्द्रियोंमें ' मम ' अभिमान से रहित पुरुषका ' मैं सुनता हूँ, मैं देखता हूँ ' इत्यादि लोक प्रसिद्ध व्यवहार नहीं होगा । जैसे अन्ध पुरुषका ' मैं देखता हूँ, ऐसा व्यवहार नहीं होता, इसलिए इन्द्रियोंमें ' मम ' अभिमान मानना युक्त है । किन्तु इन्द्रियोंके आश्रयभूत देह विना इन्द्रियोंका व्यवहार असम्भव है, अतः देहका ग्रहण भी आवश्यक है । परन्तु जब तक देहमें आत्मभाव अध्यस्त नहीं है तब तक इस देहसे कोई व्यापार भी नही होता । यदि अध्यस्त आत्मभावके विना देहसे लोक प्रसिद्ध व्यवहार मानें तो सुषुप्ति में भी देहसे पूर्ववत् व्यापार होना चाहिए, किन्तु वहाँ किसी प्रकार का भी व्यापार नहीं होता, अतः लोक प्रसिद्ध व्यवहारकी सिद्धिके लिए देहमें आत्मभावरूप अध्यास मानना पड़ेगा, क्योंकि ' असङ्गो ह्यं पुरुषः ' ( बृ ० ४।३।१५ ) ( यह पुरुष असङ्ग ही है ) इत्यादि श्रुति सिद्ध असङ्ग आत्माके साथ शरीर आदिका आध्यासिक सम्बन्धके विना अन्य संयोग आदि सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता, इसलिए आत्मामें आध्यासिक सम्बन्धसे ही प्रमातृत्व है वास्तवमें नहीं । प्रमाका आश्रय अथवा कर्ता प्रमाता कहा जाता है, अबाधित अन्तःकरणकी वृत्तिको प्रमाण कहते हैं, परन्तु वृत्ति जढ़ होनेसे घट, पट आदि पदार्थों को प्रकाशित नहीं कर सकती, इसलिए

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१४ ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ संभवति । न चाधिष्ठानमन्तरेणेन्द्रियाणां व्यवहारः संभवति । न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद व्याप्रियते । न चैतह्निन्सर्वस्मिन्न सति असङ्गस्यात्मनः प्रामातृत्वमुपपद्यते । न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति । तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि च । ॐ पश्वादिभिश्चाविशेषात् । यथा हि पश्वादयः शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां संबन्धे सति शब्दादिविज्ञान प्रतिकूले जाते ततो निवर्तन्ते, अनुकूले च प्रवर्तन्ते, यथा दण्डोद्यतकरं पुरुषमभिमुखमुपलभ्य मां हन्तुमयमिच्छतीति पलायितुमारभन्ते, नहीं होता । अध्यस्त आत्मभाववाले शरीरसे कोई व्यापार नहीं कर सकता । और उपर्युक्त इन सब अध्यासोंके न होनेपर असङ्ग आत्मामें प्रमातृत्व उपपन्न नहीं होता, प्रभाताके विना प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं होती, इसलिए प्रत्यक्ष आदि प्रमाण और शास्त्र अविद्वानोंका ही आश्रय करते हैं । और पशु आदिके व्यवहारसे विद्वान्के व्यवहारमें विशेषता नहीं है, जैसे श्रोत्र आदि इन्द्रियोंका शब्द आदि विषयोंके साथ सम्बन्ध होने पर पशु आदि भी उन शब्द आदिका ज्ञान प्रतिकूल होनेपर उधरसे निवृत्त होते हैं और अनुकूल होने पर उसकी ओर प्रवृत्त होते हैं । हाथमें दण्ड उठाए हुए किसी पुरुषको सन्मुख आते देखकर ' यह मुझे मारना चाहता है ', ऐसा समझ कर पशु वहाँसे भागने लगते हैं और यदि हाथमें हरी घास पकड़ी हो तो उस व्यक्तिके प्रति अभिगुख होते हैं । वैसे ही लोकव्यवहारमें हम प्राय: देखते हैं कि खड्ग हाथमें उठाए क्रूरदृष्टिसे ललकारते हुए बलशाली सत्यानन्दी -दीपिका अन्तःकरणकी वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य ही घट आदि पदार्थोंका प्रकाशक है और उसीको प्रमा कहते हैं । " प्रमाकरणं प्रमाणम् " ' प्रमाका करण प्रमाण है, न्यायमतमें ' यह घट है ' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमा प्रति नेत्र आदि इन्द्रियाँ प्रमाण मानी जाती हैं, अनुमितिज्ञानके प्रति लिङ्गज्ञान अथवा व्याप्तिज्ञान प्रमाण है, शाब्दी प्रमाके प्रति पदज्ञान प्रमाण है, इस प्रकार अन्य प्रमाणोंके विषय में भी सभझना चाहिए । ' मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ ' इत्यादि व्यवहार आत्मामें तब सिद्ध हो सकता है जब व्यापार विशिष्ट अन्तःकरणका आत्मामें स्वरूपसे अध्यास हो और आत्माका अन्तःकरण में संसर्गाध्यास हो । इस प्रकार दोनों धर्मियों और उनके धर्मोका परस्पर में अध्यास मानने पर ही प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार हो सकता है, अन्यथा नहीं । अन्वयव्यतिरेकसे भी यही सिद्ध होता है कि उक्त व्यवहार अध्यास मूलक है । शंका - अध्यासके विना भी तो विद्वानोंमें उपर्युक्त व्यवहार देखने में आता है । कोई भी विद्वान् यह नहीं कहता कि हमारा व्यवहार अध्यास मूलक है, तो यह नियम कैसे सिद्ध हो सकता है? समाधान - आपको कौन - सा विद्वान् अभीष्ट है, ' मैं प्रत्यगभिन्न ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान सम्पन्न विद्वान् अथवा शास्त्रोंसे ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योंके श्रवण मात्र से आत्मा और देह, बुद्धि आदि अनात्मा के भेदको जानने वाला परोक्ष ज्ञान सम्पन्न विद्वान्? प्रथम विकल्पका उत्तर तो ब्रह्मसूत्र ४ में कहा जायगा । जहाँ बाधित अध्यासकी अनुवृत्तिको लेकर उक्त व्यवहार सिद्ध किया गया है । तथा द्वितीय विकल्प तो अभीष्ट है, क्योंकि आत्माके परोक्षज्ञान मात्र से आत्मा में कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अपरोक्ष भ्रम निवृत्त नहीं हो सकता । यथा रज्जु में ' यह सर्प है ' इस प्रत्यक्ष भ्रमकी निवृत्ति रज्जु के ' वह रज्जु है ' इस परोक्ष ज्ञानसे नहीं होती । इस आशय से भगवान् भाष्यकारने अविद्वान्को अध्यास मूलक प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार तथा शास्त्रका आश्रय कहा है । आगे इसीको ' पशु ' आदिके उदाहरण से स्पष्ट करते हैं

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी -दीपिका सहित हरिततृणपूर्णपाणिमुपलभ्य तं प्रत्यभिमुखीभवन्ति एवं पुरुषा अपि व्युत्पन्नचित्ताः क्रूर-दृष्टीनाक्रोशतः खङ्गोद्यतकरान्बलवत उपलभ्य ततो निवर्तन्ते, तद्विपरीतान्प्रति प्रवर्तन्ते, अतः समानः पश्वादिभिः पुरुषाणां प्रमाणप्रमेयव्यवहारः । पश्वादीनां च प्रसिद्धोऽविवेक-पुरःसरः प्रत्यक्षादिव्यवहारः । तत्सामान्यदर्शनादव्युत्पत्तिमतामपि पुरुषाणां प्रत्यक्षादि-व्यवहारस्तत्कालः समान इति निश्चीयते । शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वात्मनः परलोकसंबन्धमधिक्रियते, तथापि न वेदान्तवेद्यम्, अशनायाद्यतीतम्, अपेतब्रह्मक्षत्रादिभेदम्, असंसार्यात्मतत्त्वमधिकारेऽपेक्ष्यते, अनुपयोगादधिकारविरोधाच्च! पुरुषको देखकर विद्वान् लोग भी वहाँ से हट जाते हैं, तथैव उसके विपरीत स्निग्ध दृष्टिवाले मधुर-भाष सोम्य पुरुषके प्रति प्रवृत्त होते हैं । अत: पुरुषों का प्रमाण, प्रमेय व्यवहार पशु आदिके समान है अर्थात् दोनोंके व्यवहारमें भेद नहीं है । और यह तो प्रसिद्ध है कि पशु आदिका प्रत्यक्ष आदि व्यवहार अविवेक पूर्वक होता है । किश्व उनके साथ समानता देखनेसे विवेकी पुरुषोंका भी प्रत्यक्ष आदि व्यवहार, व्यवहारकालमें पशु आदिके समान ही है, ऐसा निश्चित होता है । शास्त्रीय व्यवहारमें तो यद्यपि देहसे भिन्न आत्माका स्वर्ग आदि लोकोंके साथ सम्बन्ध जाने विना विवेक पूर्वक कर्म करनेवाला पुरुष अधिकृत नहीं होता, तथापि उपनिषद्वेद्य क्षुधा आदिसे अतीत, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि भेद शून्य असंसारी आत्मतत्त्वकी कर्मके अधिकारमें अपेक्षा नहीं है, क्योंकि उसमें आत्मतत्त्वका उपयोग नहीं है और अधिकारका विरोध है । इस प्रकारके आत्मज्ञानसे सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि यह ठीक है कि पशु आदिको इदंरूपसे आत्मा तथा अनात्माका ज्ञान नहीं है, तो भी ' यह मैं हूँ, यह मेरा है ' इत्यादि ज्ञान उनमें भी पाया जाता है, यह ठीक हैं कि उनको मनुष्य के समान विशेष विवेक नहीं है । यदि वे भी मनुष्य के समान आत्मोपदेश श्रवण तथा ग्रहण करने में समर्थ हों तो उनको भी विवेक ज्ञान हो सकता है, जैसे कि काकभुशुण्ड आदिको हुआ है । हाँ! मनुष्यको भी यदि इस प्रकारका उपदेश न किया जाय तो उसे भी पशु आदिके समान विवेक नहीं हो सकेगा । निष्कर्ष यह है कि जैसे आत्म, अनात्म विवेक शून्य पशु आदिका खान - पान आदि व्यवहार अध्यास मूलक है, वैसे ही अविद्वान्का भी यह खान - पान आदि व्यवहार अध्यास मूलक है । इससे यह सिद्ध होता है कि अध्यास होनेपर ही यह प्रसिद्ध लोक व्यवहार होता है अन्यथा नहीं । किञ्च जाग्रत् आदि अवस्थाओं में अध्यासके होनेपर ' मैं, मेरा, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि व्यवहार होते हैं, किन्तु सुषुप्ति अवस्थामें अध्यासके न होनेपर नहीं होते, तो इस अन्वयव्यतिरेकसे भी यह व्यवहार अध्यास मूलक ही सिद्ध होता है । इस प्रकार व्यवहाररूप हेतुसे विवेकी पुरुषका देह आदि में ' अहं, मम ' अभिमान अध्यास से ही है । शंका- यह लोक प्रसिद्ध व्यवहार भले ही अध्यास मूलक हो, परन्तु शास्त्रीय व्यवहार तो अध्यास मूलक नहीं है, क्योंकि उसमें देह आदिसे भिन्न आत्माका ज्ञान अपेक्षित है, अन्यथा शास्त्रीय कर्म आदि कोई भी व्यवहार सिद्ध न होगा? इसका समाधान ' शास्त्रिये ' इत्यादिसे करते हैं । * भाष्यस्थ ' तु ' शब्द प्रत्यक्ष आदि व्यवहारसे शास्त्रीय व्यवहारकी भिन्नता सूचित करता है । यहाँ विचारणीय विषय यह है कि शास्त्रीय यज्ञ आदि कर्मोंके अधिकारमें देहसे भिन्न आत्मा है, केवल ऐसा ज्ञान अपेक्षित है • अथवा आत्माका तत्त्वज्ञान ( साक्षात्कार )? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि उससे प्रत्यक्ष अध्यासकी निवृत्ति नहीं होती, कारण, इस प्रकारके ज्ञानका अध्याससे विरोध नहीं है,

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१६ ब्रह्मसूत्र शाङ्कर भाष्य [ अ ० १ पा ० १ प्राक् च तथाभूतात्मविज्ञानात्प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते । तथा हि-' ब्राह्मणो यजेत् ' इत्यादीनि शास्त्राण्यात्मनि वर्णाश्रमवयोवस्थादिविशेषाध्या समाश्रित्य पूर्व प्रवर्तमान शास्त्र अविद्यावान् पुरुषके आश्रयत्वका उल्ङ्घघन नहीं करता अर्थात् शास्त्र अविद्वान्का ही आश्रय करता है, जैसे कि ' ब्राह्मणो यजेत ' ( ब्राह्मण याग करे ) इत्यादि शास्त्र, आत्मामें वर्ण, आश्रम, वय, अवस्था आदि विशेष अध्यासका आश्रय कर प्रवृत्त होते हैं । अत तद्बुद्धि ही अध्यास है अर्थात् उससे भिन्नमें उसकी बुद्धि ही अध्यास है, ऐसा सत्यानन्द - दीपिका प्रत्युत उससे अध्यास अधिक दृढ़ होता है, क्योंकि यज्ञ आदि कर्मका फल कर्ता तभी भोग सकता है जब इस देह कर्ता, भोक्ता आत्माको ( अपनेको ) भिन्न समझे, अन्यथा स्वर्ग आदि फल बोधक शास्त्र निरर्थक सिद्ध होगा । सुतरां कर्म शास्त्र अपनी सार्थकता के लिए देहसे भिन्न कर्ता, मोक्ता आत्माकी अपेक्षा रखता है । मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं कर्ता भोक्ता संसारी हूँ ' ऐसा ज्ञान ही कर्मों में अपेक्षित है । इसलिए अनादि अविद्या जन्य कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ब्राह्मणत्व आदि अभिमान युक्त पुरुषको लेकर ही विधि, निषेध शास्त्र प्रवृत्त होते हैं । दूसरा विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि इससे विपरीत उपनिषद् - गम्य क्षुधा, पिपासा आदि द्वन्द्वोंसे तथा ब्राह्मणत्व आदि मिथ्या अनात्म - अभिमान. रहित आत्मसाक्षात्कार विधि, निषेध शास्त्रमें अधिकृत नहीं है, कारण कि उसका उसमें उपयोग नहीं है और साथ - साथ अधिकारका विरोध भी है । इसलिए ब्रह्माभिन्न आत्मसाक्षात्कारके पूर्व प्रवर्तमान विधि, निषेध शास्त्र अविद्वानका ही आश्रय करते हैं 1 । जैसे प्रत्यक्ष, अनुमान, अर्थापत्ति अध्यासमें प्रमाण हैं वैसे ही शास्त्र भी प्रमाण है । यथा ' ब्राह्मणो बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( ब्राह्मणत्व अभिमान वाला ब्राह्मण बृहस्पतिसव नामक याग करे ) ' राजा राजसूयेन यजेत ' ( ( क्षत्रियत्व अभिमानवाला राजा राजसूय नामक याग करे ) यह श्रुति वाक्य आत्मामें ब्राह्मणत्वं क्षत्रियत्व वर्णका, न हवै स्नात्वा भिक्षेत ' ( ब्रह्मचारी स्नानकर - समावर्तनके अनन्तर गृहस्थाश्रम में आकर भिक्षा न करे ) ' गृहस्थः सदृशीं भार्यां विन्देत ' ( गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाला ब्रह्मचारी अपने समान धर्मपत्नीको प्राप्त करे ) इत्यादि वेद ' वाक्योंसे आत्मामें ब्रह्मचारी आदि आश्रमोंका, ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' ( ब्राह्मण बालकका आठवें वर्षमें उपनय संस्कार करे ) यह वेद वाक्य आत्मामें वर्ण और आयुका, ' जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्रीनादधीत ' ( नव जात पुत्र वाला तथा कृष्ण केशों वाला व्यक्ति श्रौताग्निका आधान करे ) यह श्रुति वाक्य आत्मामें यौवन आदि अवस्था विशेषका अध्यास प्रतिपादित करता है । अथवा अवस्था अध्यास ‘ अप्रतिसमाधेयव्याधीनां जलादिप्रवेशेन प्राणत्यागः ' ( प्रतिकार रहित व्याधि ग्रस्त व्यक्ति जल आदिमें प्रवेश कर प्राण त्याग करे ) । ' वर्णाश्रमवयोवस्थादि ' इस भाष्य वाक्य प्राप्त आदि पदसे ब्रह्महत्यादि महापातक और गोबध आदि उपपातकों का अध्यास भी ग्रहण करना चाहिए । पातकोंके विषयमें विशेष विवरण मनुस्मृतिके अध्याय ११, श्लोक ६८ आदिमें द्रष्टव्य है । इस प्रकार श्रुति, स्मृति, ब्राह्मण आदि ग्रन्थोंमें ब्राह्मण आदि वर्ण, आश्रम आदिमें अभिमान रखनेवाले व्यक्तिका अनुवाद पूर्वक अध्यासका समर्थन प्राप्त होता है । यद्यपि आक्षेप तथा समाधान द्वारा आत्मा और अनात्माका अध्यास प्रमाण सिद्ध है, तो भी यह अनर्थका हेतु कैसे है तथा किसका किसमें अध्यास है? इन शङ्काओं का प्रथम अध्यासके लक्षणका स्मरण कराते हुए भगवान् भाष्यकार ' अध्यासो नाम ' इत्यादिसे समाधान करते हैं— * अस्मितस्तद्बुद्धिः अध्यासः ( रजत भिन्न शुक्तिमें रजत बुद्धि ही शध्यास है ) यह अध्यास