श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 51–60

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 51–60

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ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 51 का मूल पृष्ठ
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १७ प्रवर्तन्ते । अध्यासो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम । तद्यथा पुत्रभार्यादिषु विकलेषु सकलेषु वा अहमेव विकलः सकलो वेति बाह्यधर्मानात्मन्यध्यस्यतिः तथा देहधर्मान-स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, गौरोऽहं तिष्ठामि गच्छामि, लङ्घयामि चेति । तथेन्द्रियधर्मान्-मूकः, काणः, क्लीवः, बधिरः, अन्धोऽहमिति । तथाऽन्तःकरणधर्मान् कामसंकल्पविचि-कित्साध्यवसायादीन् । एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचार साक्षिणि प्रत्यगात्मन्यध्यस्य, तं च पहले हम कह चुके हैं । जैसे कि कोई पुत्र, स्त्री आदिके अपूर्ण और पूर्ण होनेपर मैं ही अपूर्ण और पूर्ण हूँ, इस प्रकार बाह्य पदार्थोंके धर्मोका अपनेमें अध्यास करता है । तथा ' मैं स्थूल हूँ ' मैं कृश हूँ, मैं गौर हूँ, मैं खड़ा हूँ, मैं जाता हूँ, मैं लाँघता हूँ, इस प्रकार देहके धर्मोंका अध्यास करता है और ' मैं मूक हैं, काना हूँ, नपुंसक हूँ, बधिर हूँ, अन्धा हूँ ' इस प्रकार इन्द्रियोंके धर्मोका अध्यास करता है । इसी प्रकार काम, संकल्प, संशय, निश्चय आदि अन्तःकरणके धर्मोका अपने में अध्यास करता है । इसी प्रकार अहं प्रत्यय ( वृत्ति ) वाले अन्तःकरणका अन्तःकरण की सम्पूर्ण वृत्तियों के सत्यानन्दी - दीपिका लक्षण “ स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः " इस पूर्वोक्तं लक्षणका संक्षेपमात्र है । यहाँ ' अहम् ' यह धर्मीका तादात्म्याध्यास है और ' मम ' यह धर्माध्यास है । धर्माध्यासके विना केवल धर्मी अध्यास अनर्थका हेतु नहीं है । धर्माध्यास ही साक्षात् अनर्थमय संसारका हेतु है । इसलिए भगवान् भाष्यकार पहले ' तद्यथा ' इत्यादिसे धर्माध्यासका ही उदाहरण द्वारा विस्तार पूर्वक उल्लेख करते हैं । “ नामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धा श्रद्धाष्टतिरष्टतिहीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव ( बृ ० १।५।३ ) ” ( इच्छा, सङ्कल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, ज्ञान, भय यह सब मन ही है ) इत्यादि श्रुतिसे काम आदि सब अन्तःकरण के ही धर्म कहे भए हैं । इस प्रकार धर्मोका अध्यास कहकर ' एवमहम् ' इत्यादिसे धर्मियोंका अध्यास कहते हैं । अन्तःकरणकी सुख - दुःख आदि वृत्तियोंके प्रकाशक अन्तरात्मा में पहले तो ' मैं ' ऐसी अहंवृत्तिरूप ज्ञानके आश्रयभूत अन्तःकरणका स्वरूप अध्यास होता है, तदनन्तर अन्तःकरण के सुख - दुःख आदि धर्मोका अध्यास होता है । इसी प्रकार धर्मी अध्यास पूर्वक धर्माध्यास होने पर ' मैं सुखी, मैं दुःखी ' इत्यादि लोक प्रसिद्ध व्यवहार होता है । इस प्रकार अन्तःकरण आदिका आत्मामें स्वरूपाध्यास दिखलाकर अब आत्माका अनात्म - अन्तःकरणमें ' तं च ' इत्यादि से संसर्गाध्यास दिखलाते हैं । आत्मा अहंकार आदि प्रपञ्चसे अत्यन्त विलक्षण है, इसलिए उसके साथ आत्माका स्वरूपाध्यास न होकर संसर्गाध्यास - कल्पिततादात्म्य सम्बन्ध है । बुद्धि आदिका आत्मामें स्वरूपाध्यास होनेसे उसमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिकी मिथ्या प्रतीति होती है । यदि आत्माका बुद्धि आदिके साथ संसर्गाध्यास न मानें तो उसमें चैतन्य आदिकी प्रतीति कदापि नहीं होगी, अतः दोनोंका परस्पर अध्यास मानना ही युक्त है । अब ' एवमयम् ' इत्यादि भाष्यसे उक्त अध्यासका उपसंहार करते हैं । " विस्तरेण निरूपितस्य पदार्थस्य सारांशकथनेन तन्निरूपणसमापनमुपसंहारः " ( विस्तारसे निरूपित पदार्थका सारांश कथनसे उसके निरूपणकी समाप्ति उपसंहार है ) यह इसका लक्षण है । अविद्या अनादि है, उसका कार्य होनेसे अध्यास भी अनादि है । जैसे बीजसे अङ्कुर और अङ्कुरसे पुनः बीज, इस प्रकार प्रवाहरूप होनेसे इसे नैसर्गिक कहा गया है । इस अध्यासका उपादान कारण अनादि अविद्या है और निमित्तकारण पूर्व - पूर्व अध्यासके संस्कार । ब्रह्मामैकत्व ज्ञानके विना निवृत्त न होनेके कारण यह अनन्त कहा गया है । इसमें ‘ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ' ( म ० गी ० १५।३ ) ( संसार ३

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१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ प्रत्यगामानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेणान्तःकरणादिष्वध्यस्यति । एवमयमनादिरनन्तो नैसर्गिको ध्यास मिथ्याप्रत्ययरूपः कर्तृत्वभोक्तत्वप्रवर्तकः सर्वलोकप्रत्यक्षः । अस्यानर्थ-हेतोः प्रहाणाय, आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते । यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः । साक्षीभूत प्रत्यगात्मामें अध्यास आरोपकर और इसके विपरीत उस सर्व साक्षी प्रत्यगात्माका अन्तःकरण आदि अध्यास करता है, तो इस प्रकार अनादि अनन्त, नैसर्गिक, मिथ्याज्ञानरूप और [ आत्मा में ] कर्तृत्व भोक्तृत्व आदिका प्रवर्तक अध्यास सर्वजन प्रत्यक्ष है । इस अनर्थके हेतुभूत अध्यासकी समूल निवृत्तिके लिए तथा ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान प्राप्ति के लिए सब वेदान्तोंका आरम्भ होता है । जिस प्रकार सब वेदान्तोंका यह ब्रह्मात्मैकत्व प्रयोजन है, उसे उसी प्रकार हम यहाँ शारीरक मीमांसा में दिखलाएँगे । सत्यानन्दी - दीपिका वृक्षका स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार कालमें उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि न तो इसका आदि और न अन्त है, न स्थिति तथा मायामय होनेसें मिथ्या प्रतीत होता है ) यह स्मृति प्रमाण भी है, अतः यह कार्याध्यास मिथ्या प्रत्ययरूप है । आत्मामें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनेक अनर्थोंका हेतु अध्यास हैं । इसकी कारण भूत अनादि अविद्याकी अत्यन्त निवृत्तिके लिए ' ब्रह्म और आत्मा एक हैं ' इस प्रकारके ज्ञान सिद्धिके लिए वेदान्तों- उपनिषदोंका आरम्भ आचार्योंने माना है । तात्पर्य यह है कि वेदान्तोंका विषय जीव ब्रह्मकी एकता है तथा अनर्थकी अत्यन्त निवृत्ति और परमानन्दकी प्राप्तिरूप मोक्ष इनका प्रयोजन है, यहाँ निवृत्ति शब्द मिथ्यारूप प्रतीति समझना चाहिए! वेदान्त विचारका जो विषय और प्रयोजन हैं वही विषय और प्रयोजन वेदान्तके विचारात्मक शारीरिक मीमांसा शास्त्र के भी हैं । इस ग्रन्थको शारीरक मीमांसा इसलिए कहा जाता है कि ' शीर्यत इति शरीरम् ' ( नाशको प्राप्त होता है, अतः इस स्थूल देहको शरीर कहते हैं ) ) अथवा ' कुत्सितं शरीरं शरीरकं तत्र भव शारीरकम् ' ( घृणित होनेसे यह शरीर ही शरीरक है और शरीरकमें रहनेवाले जीवको शारीरक कहते हैं ) जीवका ब्रह्मरूपसे जो विचार वह शारीरक मीमांसा है । जीव - ब्रह्मका ऐक्य विचार प्रशंसनीय होनेसे पूजित है, क्योंकि इसी विचारसे जीव का परम पुरुषार्थं सिद्ध होता है अन्यथा नहीं, इस हेतुसे इस प्रकृत ग्रन्थको शारीरक मीमांसा कहा जाता है । उपनिषदोंमें जो प्राण आदि उपासनाओंका वर्णन है वह चित्त एकाग्रता और शुद्धि द्वारा जीव ब्रह्मके अभेद ज्ञान होने में सहायक है, इस प्रकार उपासनाओंका भी जीव - ब्रह्मकी एकतामें ही तात्पर्य है । उपर्युक्त रीतिसे विषय और प्रयोजन सिद्ध होनेसे यह शास्त्र आरम्भणीय है, यह सिद्ध हुआ ।

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १ ९ प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः [ अत्र पादे स्पष्टलिङ्गयुक्तानां वाक्यानां विचारः ] " इस पादमें स्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग युक्त वाक्योंका विचार है " । १ जिज्ञासाधिकरणम् । सू ० १ ] * वेदान्तमीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्येदमादिमं सूत्रम् -व्याख्यानके विषयीभूत वेदान्तमीमांसा शास्त्रका यह आदि सूत्र है अर्थात् जिसकी हम व्याख्या

करना चाहते हैं उस वेदान्तमीमांसा शास्त्रका यह प्रथम सूत्र है ।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥१ ॥

पदच्छेद - अथ, अतः, ब्रह्मजिज्ञासा । सूत्रार्थ - विवेक आदि साधन चतुष्टयरूप सम्पत्ति सिद्धिके अनन्तर कर्मफलके अनित्य और ज्ञानफल मोक्षके नित्य होने से मुमुक्षुको ब्रह्म जिज्ञासा करनी चाहिए । सत्यानन्दी -दीपिका * ' यद्यपि अध्यासकी सिद्धिके अनन्तर विषय और प्रयोजनकी सिद्धि होनेपर प्रस्तुत ग्रन्थका आरम्भ करना युक्त है, तथापि इस विचारका विषय वेदान्त पूर्वमीमांसा ( यज्ञ आदि कर्म समुदायका प्रतिपादक - वेदके पूर्व भागका विचारात्मक ) से गतार्थ है कि नहीं? इस प्रकार प्रश्नके उपस्थि होनेपर प्रस्तुत शास्त्रके आरम्भ में सन्देह हो जाता है कि क्या यह ग्रन्थ आरम्भणीय है कि नहीं? मीमांसक मतमें समस्त वेदका तात्पर्य विधिमें है । " आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ” ( वेद क्रियार्थक है अक्रियार्थक वेद अनर्थक है ) । जैसे कि ' यजेत ' ( याग करे ) ' जुहुयात् ' ( अग्निहोत्र करे ) इत्यादि विधियाँ हैं । वेदमें यज्ञ आदि अनुष्ठानकी आज्ञा विधि कही जाती है । प्रवृत्ति निवृत्ति रहित सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद वाक्य मन्त्र, नामधेय तथा अर्थवादकी विधिवाक्यके साथ एक-वाक्यता कर धर्म में प्रामाण्य माना गया है । " अथातो धर्मजिज्ञासा ” ( जै ० सू ० १1१1१ ) इत्यादि जैमिनि मुनि प्रणीत सूत्रोंद्वारा विधि आदिका विचार किया गया है । इस प्रकार विधिका विचार किए जानेपर वेदान्त गतार्थ है अर्थात् धर्म आदिसे पृथक् जीव ब्रह्मका ऐक्यरूप विषय वेदका अर्थ - प्रयोजन नहीं है, अतः जीव - ब्रह्मकी एकतारूप विषयके स्थिर न होनेसे इस शास्त्रका आरम्भ निष्फल है? समाधान -- तात्पर्य यह है कि यदि ' यजेत ' इत्यादि विधियोंको ही वेदका अर्थ मानें तो ब्रह्म में वेदान्त प्रमाण सिद्ध न होगा, परन्तु सर्वज्ञकल्प भगवान् बादरायण ( वेदव्यास ) द्वारा ब्रह्मसूत्रकी रचना यह सिद्ध करती है कि वेदान्तसे अतिरिक्त अन्य शास्त्रसे ब्रह्म अवगत नहीं है । इसलिए अन्य शास्त्र से अप्रतिपाद्य ब्रह्म बोधक वेदान्त विचारात्मक प्रस्तुत शास्त्रका आरम्भ युक्त है । इस प्रकार विषय और प्रयोजन दोनों सिद्ध हुए । “ अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम् । अस्तोममनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः " ( जो अल्प अक्षरोंवाला, असंदिग्ध अर्थवाला, सारयुक्त बहुमुखी, आकारमें छोटा और निर्दोष हो, उसे सूत्रवेत्ता सूत्ररूपसे जानते हैं ) यह सूत्रका लक्षण है । शंका- ब्रह्म विषयक जिज्ञासा क्यों करनी चाहिए? समाधान -" विषयों विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम् । प्रयोजनं संगतिश्च प्राञ्चोऽधिकरणं विदुः " “ विषयः सन्देहः संगतिः पूर्वपक्ष: सिद्धान्त इत्येकैकमधिकरणं पञ्चावयवं ज्ञेयम् " " विषय, सन्देह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त, प्रयोजन और सङ्गति इस प्रकार विद्वान् लोग इसे अधिकरण रूपसे जानते हैं । कोई इसे पञ्चावयव भी मानते हैं । "

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ सत्यानन्दी - दीपिका दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे साऽपार्था चैन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ ( सां ० का ० १ ) जिनसे प्रत्येक संसारी महान् दुःखका अनुभव करता रहता है, तथा जिनकी अत्यन्त निवृत्ति चाहता है वे अनुभूयमान दुःख आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक भेदसे शास्त्रोंमें तीन प्रकारके कहे गए हैं । उनमेंसे मनुष्य, पशु, पक्षी जल - थल अग्नि आदि भूतोंके निमित्तसे उत्पन्न दुःख आधिभौतिक, ग्रह, पिशाच, राक्षस आदिसे उत्पन्न दुःख आधिदैविक कहा जाता है । शारीरिक तथा मानसिक इस भेदसे आध्यात्मिक दुःख दो प्रकारका है । वात, पित्त तथा कफ इन तीनोंसे अथवा भुक्त अन्न, जल आदिसे परिणत रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा तथा वीर्यं इन सात धातुओंसे इस स्थूल शरीरकी रचना होती है । इनके सम रहने से शरीर स्वस्थ रहता है और विषमतासे शरीर में कोई न कोई व्याधि उत्पन्न हो जाती है, जिससे दुःखका अनुभव होता है । विषय सम्बन्धी काम, क्रोध आदिसे उत्पन्न दुःख मानसिक कहा जाता है । इन दुःखोंसे आक्रान्त पुरुषको इनसे मुक्त होनेके लिए ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए । शंका -- लौकिक उपाय बहुत हैं, जिनसे उक्त दुःख हटाए जा सकते हैं । जैसे औषधि आदिके सेवनसे शारीरिक रोग निवृत्त हो सकता है तथा सुन्दर स्त्री आदिकी प्राप्तिद्वारा काम आदि जन्य मानसिक दुःखोंकी निवृत्ति संभव है । मणि, मन्त्र आदिके अनुष्ठानसे आधिदैविक दुःखं निवृत्त हो सकते हैं । नीतिशास्त्र आदिकी कुशलतासे आधिभौतिक दुःखोंका भी जब प्रतिकार हो सकता है, तो फिर अतिपरिश्रम साध्य ब्रह्मकी जिज्ञासा क्यों करनी चाहिए? समाधान - यद्यपि समुचित लौकिक उपायोंसे उक्त दुःखोंकी यत्किञ्चित् निवृत्ति हो सकती है, तो भी दुःख मात्रकी अत्यन्त निवृत्ति तो ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान के विना नहीं हो सकती, अतः ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्य है । शंका- यदि लौकिक उपायोंसे दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति नहीं हो सकती तो यज्ञ आदि वैदिक उपायोंसे हो जायेगी? समाधान - ' दृष्ट-वदानुश्रविकः ' ( यज्ञ आदि वैदिक कर्म कलाप भी लौकिक उपायोंके समान ही हैं ) क्योंकि “ तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते " ( छा ० ८ | १ | ६ ) ( जैसे यहाँ लौकिक कर्मोंसे सम्पादित अन्नादि फल नष्ट हो जाता है, वैसे ही वैदिक पुण्य कर्मोंका स्वर्ग आदि फल भी क्षीण हो जाता है ) इत्यादि श्रुति प्रमाण है । जैसे साधनोंके तारतम्यसे लौलिक फलोंमें सातिशय- तारतम्य होता है; वैसे ही ज्योतिष्टोम वाजपेय आदि वैदिक साधनोंके तारतम्यसे स्वर्ग आदि फलों में भी तारतम्य होता है, सातिशय फल अनित्य विशन्ति ॥ " ( गी ० ९ । २५ मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं L विद्यते । ” ( गी ० ८।१६ ) ( नहीं होता, क्योंकि मैं नित्य, - सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य है । इसमें “ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं ) ( वे पुण्यशाली उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर ) यह स्मृति प्रमाण है । इसलिए " मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न परन्तु हे कौन्तेय! मुझ आत्माको अभिन्नरूपसे प्राप्त होकर उसका पुनर्जन्म व्यापक, सबका अभिन्न अन्तरात्मा हूँ ) “ मिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते कर्माणि तस्मिन्दृष्ठे परावरे ॥ ” ( मु ० २।२।४ ) ( उस प्रत्यगभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कार होनेसे हृदयग्रन्थि ( चित्- जड़ - ग्रन्थि ) टूट जाती है आत्मविषयक सब सन्देह नष्ट हो जाते हैं तथा सभी कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुति, स्मृतिसे यह सिद्ध होता है कि वेदान्त शास्त्रसे भिन्न अन्य शास्त्रोंके श्रवण आदिसे संशय और विपर्यय निवृत्त नहीं होते, क्योंकि कोई इस स्थूल शरीर, कोई श्रोत्र आदि इन्द्रिय, कोई मन, बुद्धि आदिको आत्मा मानते हैं । तथा कोई आत्मा का अणु परिमाण कोई मध्यम परिमाण मानते हैं । कोई आत्माको कर्ता, भोक्ता तथा व्यापक कहते

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २१ * तत्र अथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते, नाधिकारार्थः, ब्रह्मजिज्ञासाया अनधि-कार्यत्वात् । मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभावात् अर्थान्तरप्रयुक्त एवं हाथशब्दः श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति । पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलत आनन्तर्याव्यतिरेकात् । सति चानन्त-सूत्रस्थ ‘ अथ ’ शब्द आनन्तर्यार्थिक परिगृहीत है, आरम्भार्थक नहीं, क्योंकि ब्रह्मजिज्ञासाका आरम्भ नहीं किया जा सकता और मङ्गलका वाक्यार्थ में समन्वय नहीं होता, इसलिए अन्य अर्थमें ( आनन्तर्यार्थ में ) प्रयुक्त हुआ ही ' अथ ' शब्द श्रवणद्वारा मङ्गलरूप प्रयोजनवाला होता है । फल ( विचार ) की कारण भूत पूर्व प्रकृत ( पूर्ववर्तमान ) के साथ जो अपेक्षा है उसका आन तर्यसे भेद नहीं है । सत्यानन्दी - दीपिका हैं, कोई केवल भोक्ता मानते हैं । कोई आत्माको जड़, कोई चेतन, कोई जड़ चेतन उभयात्मक मानते हैं । इस प्रकार अनेक मतोंके श्रवणसे अव्युत्पन्न श्रोताको आत्मविषयक सन्देह आदि होना स्वाभाविक है । इनमें से किसी एक मतमें आस्थाको भ्रान्ति ही समझना चाहिए उससे अनर्थमय संसारकी निवृत्ति नहीं होगी । जहाँ सन्देह और प्रयोजन होते हैं वहाँ ही जिज्ञासा होती है । उस सन्देह की निवृत्ति और प्रयोजनकी सिद्धि वेदान्तशास्त्र के विचारसे ही हो सकती है । अन्यथा नहीं, अतः सुतरां ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्य है । इस प्रकार प्रत्यगभिन्न ब्रह्मतत्त्वके जिज्ञासुको यहाँ अधिकारी ' समझना चाहिए । इसी आशयको सूत्रकारने सूत्रस्थ ' अथ ' शब्दसे सूचित किया है । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस ‘ अथ ' शब्दका अर्थं यहाँ आनन्तर्य है । आनन्तर्य से अभिप्राय यहाँ उन्हीं साधनोंसे है जिनकी सिद्धि के अनन्तर सुमुक्षुको ब्रह्मजिज्ञासा स्वयंमेव होती है । यद्यपि " मंगलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्यंदेव-थोऽथ ” अमरकोशके इस वचनसे ' अथ ' शब्द के ' मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, कस्यं ( पूर्ण ) इत्यादि अनेक अर्थं बताए गए हैं और इन्हीं अर्थोंमें आचार्योंने ' अथ ' शब्दका प्रयोग भी किया है । जैसे ' अथ योगानुशासनम् ' योगदर्शन के इस प्रथम सूत्रमें ' अथ ' शब्द ' आरम्भ ' अर्थ में प्रयुक्त है । और “ अथातो धर्मजिज्ञासा " " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा के इन प्रथम सूत्रोंमें अथ शब्द ' आनन्तर्य ' अर्थ में प्रयुक्त किया गया हैं, क्योंकि आचार्योंको यहाँ आनन्तर्य अर्थ हो अभिप्रेत है । ' यहाँ ' अर्थ ' शब्दका अर्थं आनन्तर्य है आरम्भ नहीं, क्योंकि इस सूत्र में जिज्ञासा पद भी है । १ टि ० – अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्ध ये चारों अनुबन्ध चतुष्टयनामसे शास्त्रोंमें प्रसिद्ध हैं । " ग्रन्थप्रवृत्तिप्रयोजकज्ञानविषयत्वमनुबन्धत्वम् " ( ग्रन्थ में प्रवृत्तिके प्रयोजक ज्ञान “ मदिष्ट-साधनम् " का विषय अनुबन्ध है ) यहाँ साधन चतुष्टय सम्पन्नता ही अधिकारीका लक्षण है । विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता ये साधन - चतुष्टय हैं । आत्मा सत् है और अनात्म- जगत् असत् ( मिथ्या ) है, इस भेदज्ञानका नाम विवेक है । विवेक वैराग्यमें हेतु है, इस लोक तथा परलोकके भोगोंमें नितान्त अरुचि वैराग्य है । अनन्तर षट्सम्पत्तिकी उत्पत्ति होती है । शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति और तितिक्षा, ये छ: षट्सम्पत्ति कहे जाते हैं । विषयोंसे मनका निग्रह राम और इन्द्रियोंका निग्रह दम है | वेद तथा गुरुवाक्यों में विश्वास श्रद्धा है । संयत्त मनको विषयोंकी ओर न जाने देनेका नाम समाधान है, त्यक्त पदार्थोंको पुनः इच्छा न हो वह उपरति है । भूख प्यास आदि द्वन्द्वोंका सहन तितिक्षा है । प्रत्यगभिन्न ब्रह्मकी प्राप्ति तथा अनर्थकी अत्यन्त निवृत्ति मोक्षका स्वरूप है, उसकी प्राप्ति की इच्छाका नाम मुमुक्षता है । उक्त साधन - चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी कहा जाता है । विषय और प्रयोजनका पहले वर्णन हो चुका है । विषय और ग्रन्थका प्रतिपाद्य - प्रतिपादकभाव, अधिकारी और विषयका प्राप्य प्रापकभाव सम्बन्ध है, इसप्रकार यह अनुबन्धं चतुष्टय है ।

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ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ यर्थत्वे यथा धर्मजिज्ञासा पूर्ववृत्तं वेदाध्ययनं नियमेनापेक्षते, एवं ब्रह्मजिज्ञासापि यत्पूर्व-वृत्तं नियमेनापेक्षते, तद्वक्तव्यम् । स्वाध्यायाध्ययनानन्तर्ये तु समानम् । नन्विह कर्मा-तो ' अथ ' शब्दके आनन्तर्यार्थक होनेपर जैसे धर्मजिज्ञासा पहले नियमसे होनेवाले कारण भूत वेदाध्ययनकी अपेक्षा रखती है, वैसे ही ब्रह्मजिज्ञासा भी पहले नियमसे रहनेवाली जिस वस्तुकी अपेक्षा रखती हो उसे कहना चाहिए । [ यदि स्वाध्याय- अध्ययनका आनन्तर्य माना जाय तो वह ठीक नहीं, क्योंकि ] सत्यानन्दी - दीपिका क्या जिज्ञासा पदका अर्थ ज्ञानकी इच्छा है अथवा लक्षणासे विचार? प्रथमपक्ष में ' अर्थ ' शब्दके आरम्भार्थक होने से ब्रह्मज्ञानकी इच्छा आरम्भ की जाती है, ऐसा सूत्रका अर्थ होगा, परन्तु यह अर्थ, असङ्गत है, क्योंकि इच्छा आरम्भ करने योग्य नहीं है । प्रत्येक अधिकरणमें इच्छाका आरम्भ नहीं होता, किन्तु उसके द्वारा विचार किया जाता है । दूसरे पक्षमें कर्तव्य पदका अध्याहार किए विना यह अर्थं सिद्ध नहीं होता, सूत्रमें कर्तव्य पदके अध्याहार करनेपर उससे ही आरम्भ अर्थ हो जाता है तो इसका ब्रह्मविचार करना चाहिए अर्थात् ब्रह्मविचारका आरम्भ करना चाहिए यह अर्थ होता है । इस प्रकार ' कर्तव्य ' पदसे ' अथ ' शब्द के अर्थके निकल आनेसे ' अंथ ' शब्द व्यर्थ होगा, इसलिए दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है । अत: अधिकारीकी सिद्धिके लिए ' अथ ' शब्दका अर्थ आनन्तर्य ही संगत है । अपि च जैसे ' अथ ' शब्दका अर्थ यहाँ आरम्भ अभिप्रेत नहीं है, वैसे मङ्गल भी अभिप्रेत नहीं, क्योंकि मङ्गल वाक्यार्थमें समन्वित नहीं होता, पदार्थ ही वाक्यार्थ में समन्वित होता है । वह पदार्थ चाहे वाच्य हो अथवा लक्ष्य । यहाँ मङ्गल न तो ' अर्थ ' शब्दका वाच्यार्थ है और न लक्ष्यार्थं ही । इसलिए सूत्रस्थ ' अथ ' शब्दका मङ्गल अर्थ भी नहीं है! ' ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुराः । कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥ ( सृष्टिके आदि कालमें ' ओंकार और अथ ' ये दोनों शब्द ब्रह्माके कण्ठसे निकले हैं, इसलिए दोनों माङ्गलिक हैं ) यद्यपि स्मृति वाक्यसे ' अथ ' मङ्गलार्थक मात्र ही सिद्ध होता है, फिर भी भगवान् सूत्रकारने ' अथ ' शब्दको मुख्यतः मङ्गलार्थंक न कहकर आनन्तर्य वाची कहा है, क्योंकि आनन्तर्यार्थमें प्रयुक्त होनेपर भी यह ' अथ ' शब्द श्रवणमात्रसे मङ्गल-रूप अर्थं तो सिद्ध कर ही देता है । जलंपूर्ण कलश अथवा शंखध्वनि आदि अपने - अपने अर्थ में प्रयुक्त होनेपर भी जैसे दर्शक अथवा श्रोताको मङ्गलरूप सिद्ध होते हैं । ऐसे ही ' अथ ' शब्द भी श्रवणमात्रसे मङ्गल सिद्ध करता हुआ आचार्य के अभिप्रेत आनन्तर्य अर्थको भी स्पष्ट करता है । इसलिए कार्यको अपनी उत्पत्ति में कारण सामग्री की अपेक्षा होती है, ' यत्सत्त्वे यत्सत्त्वं यदभावे यदभावः ' ( जिसके होनेपर जिसका अस्तित्व हो और जिसके न होनेपर अभाव हो ) वहीं कार्य कारणभाव होता है, अतः यहाँ जिस कारण होनेपर जिज्ञासारूप कार्य हो और जिस कारणके न होनेपर जिज्ञासारूप कार्यं न हो, वही जिज्ञासारूप कार्यके प्रति पूर्व वृत्त होता है अर्थात् असाधारण कारण होता है । यदि यहाँ जिज्ञासा पदके द्वारा उक्त कर्तव्य विचारको फल मानें तो उनके हेतुरूपसे जो पूर्ववृत्त है उसकी अपेक्षा होगी । उसके बलसे प्रकृत हेतुका आक्षेपकर उससे अर्थान्तर कहें तो वह अर्थान्तर आनन्तर्यके ही अन्तर्भूत होता है, क्योंकि हेतु और फलभावके ज्ञानके लिए आनन्तर्य अवश्य मानना चाहिए । अतः यहाँ ' अथ ’ शब्दका अर्थ आनन्तर्य ही युक्ति - युक्त है । ' ' ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' जैसे यहाँ धर्मकी जिज्ञासा तभी हो सकती है जब वेदाध्ययन किया हो, इसलिए धर्मजिज्ञासा नियमसे अपने पूर्व विद्यमान कारण वेदाध्ययनकी अपेक्षा रखती है, वैसे ही ब्रह्मजिज्ञासा भी free त: अपनेसे पूर्व जिस कारणकी अपेक्षा रखती है उसे कहना चाहिए । यदि

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २३ वोधानन्तर्य विशेषः । नः धर्मजिज्ञासायाः प्रागप्यधीत वेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः । यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः क्रमस्य विवक्षितत्वान्न तथेह क्रमो विवक्षितः, शेष-शेषित्वेऽधिकृताधिकारे वा प्रमाणाभावात्, धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः फलजिज्ञास्यभेदाच्च । स्वाध्याय अध्ययनका आनन्तर्य तो दोनों ( धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा ) में समान है । यदि कहो कि ब्रह्मजिज्ञासामें धर्मजिज्ञासांसे कर्मज्ञानका आनन्तर्य विशेष है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अधी वेदान्त पुरुषको भी धर्मजिज्ञासा से पहले ब्रह्मजिज्ञासा हो सकती है । और जैसे हृदय आदि अवदानों ( छेदन ) में आनन्तर्य क्रमका नियम है, क्योंकि वहाँ क्रम विवक्षित है, वैसे यहाँ ( ब्रह्मजिज्ञासा में ) क्रम विवक्षित नहीं है । धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा में अङ्गाङ्गिभाव अथवा अधिकृताधिकार माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, एवं दोनोंके फल और जिज्ञास्यमें सत्यानन्द - दीपिका स्वाध्यायाध्ययन ( पितृ आदि परम्परा से प्राप्त देद शाखाका अध्ययन ) के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा स्वीकार करें तो यह अर्थं ‘ अथातो धर्मजिज्ञासा ' इस सूत्र से ही सिद्ध हो जाएगा, फिर ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस नूतन सूत्रकी रचना व्यर्थ सिद्ध होगी । इसलिए वेदाध्ययन के आनन्तर्यसे भिन्न आनन्तर्य यहाँ अपेक्षित है । वादीका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचारी आचार्यकुलमें विधिवत् वेदका अध्ययन करता है और जिज्ञास्य धर्मं ( यज्ञादि ) का केवल ज्ञान प्राप्त कर सकता है । परन्तु वह उनका अनुष्ठान नहीं करं सकता, क्योंकि अनुष्ठेय यज्ञ आदि कर्म गृहस्थ ( सपत्नीक ) होकर किए जाते हैं, इसलिए ब्रह्मजिज्ञासा वेदाध्ययनके अनन्तरं केवल कर्मका ज्ञान होनेपर होती है । जैसे ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति । ( बृ ० ४।४।२२ ) ( उस प्रत्यगभिन्न ब्रह्मको वेदाध्ययनसे ब्रह्मजिज्ञासु जाननेकी इच्छा करें ) यह श्रुति प्रमाण है । अतः धर्मजिज्ञासासे ब्रह्मजिज्ञासामें कर्मज्ञानका आनन्तर्य विशेष है |! समाधान - कर्मके ज्ञानसे तथा अनुष्ठेय यज्ञादिरूप धर्मकी जिज्ञासासे पूर्व भी वेदान्त - उपनिषद् -का अध्ययन करनेवाले पुरुषको ब्रह्मजिज्ञासा हो सकती है । यह कोई नियम नहीं है कि जब कर्मज्ञान तथा धर्मजिज्ञासा हो तभी ब्रह्म जिज्ञासा हो अन्यथा नहीं, इन दोनोंका परस्पर कार्य कारणभाव भी नहीं है । इसी आशयका ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' अथवा ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् ' इसके विपरीत यदि वैराग्य हो तो ब्रह्मचर्याश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करे ) ' यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन संन्यास ग्रहण करे ) इत्यादि जाबाल श्रुति प्रतिपादन करती है । अत: यह स्पष्ट है कि कर्मज्ञानकी अथवा धर्मजिज्ञासाकी ब्रह्मजिज्ञासामें अपेक्षा नहीं है । ' जायमानो वै ' ब्राह्मणस्त्रिभिरृणवान् जायते ' ( जाबाल ) ( उत्पन्न हुआ द्विज तीन ऋणवाला होता है ) इससे जब तक अनुष्ठेय यज्ञ आदि कर्मकर देव ऋण, पितृ ऋण तथा ऋषि ऋण इन तीन ऋणोंसे मुक्त न हो तब तक ब्रह्मचर्यंसे संन्यास ग्रहण नहीं कर सकता । यद्यपि इस श्रुतिवाक्य में ' जायमानः ' इस पदका यथाश्रुत अर्थ ऐसा ही प्रतीत होता है, तो भी टीकाकारोंने इस पदका अर्थ ऐसा किया है कि ' जायमानः ' गार्हस्थ्य संपद्यमान अर्थात् विधिवत् भार्याका पाणिग्रहणरूप गार्हस्थ्यको प्राप्त होनेवाला द्विज तीन ऋणवाला होता है । ऐसा अर्थ करनेसे ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' इस श्रुतिवाक्यके साथ कोई विरोध नहीं है । इसलिए ब्रह्मजिज्ञासामें कर्मज्ञानके आनन्तर्यकी अपेक्षा नहीं है । * वादी अब प्रकारान्तरसे आनन्तर्यका प्रतिपादन करता है कि सूत्रस्ध ' अर्थ ' शब्दका अर्थ क्रम हो । जैसे ‘ हृदयस्याग्रेऽवद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्षसः ' ( तै ० सं ० ) ( ( प्रथम उस अग्नीषोमीय पशुके हृदयका, अनन्तर जिल्ह्वाका, अनन्तर वक्षःस्थलका छेदन करे ) ' यह वाक्य अग्नीषोमीय पशुयाग में श्रुत है । यहाँ ' अथ ' शब्दसे अवदानका क्रम अभिप्रेत है । अथवा " ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्, गृही

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२४ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं तच्चानुष्ठानापेक्षम् । निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मविज्ञानं, न चानुष्ठाना-भी भेद है । धर्म ज्ञान अभ्युदय फलवाला है तथा वह अनुष्ठानकी अपेक्षा रखता है । ब्रह्मज्ञान तो मोक्षरूप फलवाला है और वह अन्य अनुष्ठानोंकी अपेक्षा नहीं रखता । सत्यानन्दी - दीपिका भूत्वा वनी भवेत्, वनी भूत्वा प्रव्रजेत् ( जाबा ० ४ ) ( ब्रह्मचर्यं समाप्त कर गृहस्थ हो, गृहस्थ होकर पश्चात् वानप्रस्थाश्रम ग्रहण करे, वानप्रस्थाश्रमी होकर संन्यास ग्रहण करे ) जैसे यहाँपर क्रम विवक्षित है, वैसे धर्मजिज्ञासा के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए । इस प्रकार ' अर्थ ' शब्दका अर्थ क्रम हो सकता है, परन्तु यहाँ धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासामें क्रमका नियम नहीं है, क्योंकि हृदय आदिका अवदान तो युगपत् एक कर्तासे होना संभव नहीं है, इसलिए उनमें क्रमकी विवक्षा की गई है । ' गृही भूत्वा वनी भवेत् ' । अथवा ‘ अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः । इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ( विधिवत ब्रह्मचर्य आदि नियमोंका पालन करता हुआ आचार्य कुलमें विधिवत् वेदोंका अध्ययन कर गार्हस्थ्य होकर धर्मानुसार पुत्रोंकी उत्पत्तिके अनन्तर यथाशक्ति यज्ञों द्वारा देवोंकी प्रसन्नता संपादित कर मन मोक्षमें लगाना चाहिए ) ' अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथात्मजान् । अनिष्ट्वा चैत्र यज्ञैश्च मोक्ष-मिच्छन्व्रजत्यधः ॥ यह स्मृति निन्दा करती है । इस प्रकार श्रुति और स्मृतिमें क्रम और अधिकृत अधिकारका विशद वर्णन उपलब्ध होता है । जिसका धर्ममें अधिकार हो उसीका मोक्ष में अधिकार है इसे अधिकृत अधिकार कहा जाता हैं । परन्तु क्रम अथवा अधिकृत अधिकार तो उस व्यक्ति के लिए है जिसका अन्तःकरण संसारी भोग वासनाओंसे मलिन है । जिसका अन्तःकरण इस जन्म अथवा जन्मान्तर कृंत निष्काम यज्ञ आदि कर्म तथा देवोपासना आदिसे शुद्ध है तथा जो विवेक आदि साधन चतुष्टय सम्पन्न है, ' उसके लिए तो क्रमका ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा ' ' यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( जाबा ० ४ ) इत्यादि श्रुति स्वयं खण्डन करती है । जैसे ‘ दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत ' ( स्वर्गकी कामनावाला पुरुष दर्श, पूर्ण मास याग कर सोम याग करे ) यहाँ दर्श, पूर्णमास याग अङ्गी है और जिन प्रयाज़ आदि क्रियाओं द्वारा वह निष्पन्न होता है वे क्रियाएँ यागके अङ्ग हैं | इसलिए दर्श, पूर्णमास याग अङ्गी - प्रधान हैं और प्रयाज आदि क्रियाएँ उनके अङ्ग - अप्रधान हैं । इस प्रकार दोनोंका अङ्गाङ्गिभाव है । वैसे इन जिज्ञासाओंमें अङ्गाङ्गिभाव भी नहीं है, क्योंकि दोनोंमें प्रधान और अप्रधानभाव नहीं है । अधिकृताधिकार से अभिप्राय यह है कि एक विषयमें अधिकार पानेवाला व्यक्ति अन्य विषयों में भी अधिकार सम्पन्न होता है । ( क ) जैसे ' दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत ' जो दर्श, पूर्णमास यागमें अधिकृत है उसका ही सोमयागमें अधिकार है अर्थात् जो प्रधान यागमें नियत अधिकृत होता है वही अङ्गों अथवा भिन्न यागमें अधिकारी होता है । ( ख ) दर्श पूर्णमास याग में चमससे जल आनयका विधान है, परन्तु यदि पशु कामनावाला हो तो ' गोदोहनेन पशुकामस्य ' ( पशुकी कामनावाला गोदोहन नामक पात्रसे जल लावे ) यहाँ जो पुरुष दर्श पूर्णमास यागमें अधिकृत है उसका गोदोहन पात्र से जल ले आनेमें अधिकार है । परन्तु प्रकरणमें ऐसा नहीं है । जो धर्मजिज्ञासामें अधिकृत हो यदि वही ब्रह्मजिज्ञासामें भी अधिकारी हो तो अधिकृताधिकार हो सकता है । परन्तु ऐसा यहाँ नहीं है, क्योंकि दोनोंके अधिकारी आदि भिन्न - भिन्न हैं । जैसे अधिकारीके भेदसे अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रका क्रम नहीं है, वैसे यहाँ भी है । किश्व दोनों जिज्ञासाओंके फल और विषयमें भी भेद है, यथा- धर्मज्ञानका फल अभ्युदय है और ब्रह्मज्ञानका फल मोक्ष है,. इससे दोनों प्रकारके क्रम नहीं हैं, अतः ' अथ ' शब्द आनन्तर्यार्थक है ।

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २५ न्तरापेक्षम् । * भव्यश्च धर्मों जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति, पुरुषव्यापारतन्त्रत्वात् । इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् । चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये नियुञ्जानैव पुरुषमवबोधयति । ब्रह्मचोदना तु पुरुष-मवबोधयत्येव केवलम्, अवबोधस्य चोदनाजन्यत्वान्न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते । यथाऽक्षा-संनिकर्षेणार्थावबोधे, तद्वत् । तस्मात्किमपि वक्तव्यं यदनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासोपदिश्यत धर्मजिज्ञासाका विषय धर्म भव्य साध्य ) है और ज्ञानकालमें नहीं है, क्योंकि वह पुरुष व्यापारके अधीन है | यहाँ - ब्रह्ममीमांसा में तो सिद्ध ब्रह्म जिज्ञास्य है, वह नित्य होनेसे पुरुषव्यापारके अधीन नहीं है । किञ्च बोधक प्रमाणकी प्रवृत्तिके भेदसे भी जिज्ञास्य - भेद है । जो विधि धर्मका लक्षण ( ज्ञापक ) है वह पुरुषको स्वविषयमें नियुक्त करती हुई बोध कराती है । ब्रह्मबोधक प्रमाण तो पुरुषको केवल बोध ही कराता है, अवबोध ब्रह्मप्रमाणसे जन्य है । इसलिए ब्रह्मप्रमाण ( अयमात्मा ब्रह्म ) पुरुषको ज्ञानमें नियुक्त नहीं करता । जैसे इन्द्रिय विषयके सन्निकर्षसे उत्पन्न ज्ञानमें नियुक्ति नहीं होती । इसलिए जिसके अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासाका उपदेश किया जाता है ऐसा कोई असाधारण हेतु कहना चाहिए । कहते हैं - नित्य और अनित्य वस्तुका विवेक, इस लोक तथा सत्यानन्दी - दीपिका * यदि धर्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मजिज्ञासा में क्रमरूप आनन्तर्य नहीं है, तो कर्म और ज्ञान दोनोंसे ही मोक्ष मानना चाहिए, क्योंकि हमारे ( समुच्चय वादियोंके ) मतमें ज्ञान कर्म समुच्चयसे मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है । परन्तु यह समुच्चयवाद भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि धर्म और ब्रह्म-· ज्ञानका स्वरूप, फल और हेतु भिन्न - भिन्न हैं । धर्मजिज्ञासाका विषय धर्मं है, वह जन्य होनेसे अनित्य है और ज्ञांनकालमें नहीं है अर्थात् स्वोत्पत्तिके पूर्व प्रत्येक कर्मका पहले ज्ञान होता है, पश्चात् उसके सम्पादन करनेकी इच्छा, अनन्तर पुरुष प्रयत्नसे उसकी निष्पत्ति होती है, इससे धर्म साध्य है । परन्तु ब्रह्म तो नित्य सिद्ध वस्तु है, अतः वह पुरुषकी किसी भी क्रियासे उत्पन्न नहीं होता । इस प्रकार ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है ) ' ब्रह्मैवेदमग्र आसीत् ' ( सृष्टिके पहले यह सब एक अद्वितीय ब्रह्म ही था ) ' एष महानज आत्मा ' ( यह आत्मा महान् अज है ) ‘ अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराण: ' ( भ ० गी ० २।२० ) यह आत्मा अज, नित्य, शाश्वत और पुराण है ) इत्यादि श्रुति स्मृति मी ब्रह्मको नित्य सिद्ध कहती हैं, तो इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्म नित्य सिद्ध और धर्मं नित्य साध्य हैं । इस प्रकार अत्यन्त वैलक्षण्य होनेसे दोनोंका स्वरूप भिन्न भिन्न है | अब. ' चोदना ' आदि भाष्यसे धर्म और ब्रह्ममें प्रमाणसे भी भेद दिखलाया जाता हैं - ' अज्ञातज्ञापकं वाक्यमत्र चोदना ' ' अज्ञात वस्तुका ज्ञापक ( लोट, लेट, लिङ् आदि युक्त ) वेदवाक्य अथवा शब्द यहाँ चोदना कहा जाता है ' ' इन चोदनाओंके भेदसे भी जिज्ञास्य धर्म और ब्रह्ममें भेद है । जैसे— ' स्वर्गकामो यजेत ' यह विधिवाक्य अपने विषय धर्मके साधन भूत याग आदिमें प्रवृत्त करता हुआ ज्ञान कराता है और ' अयमात्मा ब्रह्म ' ( बृह ० २ | ५ | १ ९ ) ( यह प्रयगात्मा ब्रह्म है ) इत्यादि ब्रह्म-चोदना ' मैं ब्रह्म स्वरूप हूँ ' इस प्रकार उत्पन्न ज्ञानमें नियुक्त नहीं करती केवल स्वरूपभूत ब्रह्मका अभेद ज्ञान कराती है जो संसारके बीजभूत अनादि अविद्यासे आवृत्त - सा है । धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासामें जब ' अय ' शब्दका अर्थ क्रम नहीं है, तो अन्ततोगत्वा ' अर्थ ' शब्दका अर्थ आनन्तर्य ही सिद्ध होता है । अब यह प्रश्न उठता है कि ब्रह्मजिज्ञासा किसके अनन्तर कर्तव्य है? क्योंकि अनन्तर शब्द अपनेसे पूर्वकी निश्चित अपेक्षा करता है ।

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२६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ इति । * उच्यते - नित्यानित्यवस्तुविवेकः, इहामुत्रार्थभोगविरागः, शमदमादिसाधनसंपत् " मुमुक्षुत्वं च । तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्मजिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुं ज्ञातुं च, न विपर्यये । तस्मादथशब्देन यथोक्तसाधनसंपत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते । * अतः शब्दो हेत्वर्थः । यस्माद्वेद एवाग्निहोत्रादीनां श्रेयःसाधनानामनित्यफलतां दर्शयति-' तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते ' ( छान्दो ० ८ | १ | ६ ) इत्यादिः । तथा ब्रह्मविज्ञानादपि परं पुरुषार्थं दर्शयति - ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तैत्ति ०२।१ ) इत्यादिः । परलोकस्थ विषय भोगों से विराग, शम - दम आदि साधन सम्पत्ति और मुमुक्षुता ( मोक्षकी इच्छा ) । उन साधनोंके होनेपर हो धर्मजिज्ञासासे पूर्व तथा पश्चात् भी ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं । इसलिये ' अथ ' शब्दसे पूर्वोक्त साधन सम्पत्तिके आनन्तर्यका उपदेश किया जाता है । अतः शब्द हेतु अर्थक है । ' तद्यथेह ० ' ( जैसे यहाँ कर्मोंसे उपार्जित अन्न आदि भोग्य पदार्थं क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही परलोकमें पुण्य कर्मोंसे सम्पादित स्वर्ग आदि भोग भी नष्ट हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुति ही श्रेयके साधनभूत अग्निहोत्र आदिका अनित्य फल दिखलाती है । इसी प्रकार ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्व-मात्मानं पश्यति ' ( बृह ० ४।४।२३ ) ( अतः इसप्रकार जाननेवाला शान्त, दान्तं, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ( विशुद्ध अन्तःकरणमें ) ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है ) इत्यादि श्रुति भी ब्रह्मजिज्ञासाके लिए साधन चतुष्टयसम्पन्न अधिकारीका प्रतिपादन करती है | ‘ तद्विजिज्ञासस्व ' ' उसके जानने की इच्छा कर ' क्योंकि ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' ( मोक्ष केवल ज्ञानसे ही होता है ) अतः ब्रह्मजिज्ञासा धर्मजिज्ञासासे पूर्व तथा पश्चात् भी संभव है । इसलिए साधन चतुष्टयके होनेपर ही ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं । इस अन्वय - व्यतिरेक से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञान दोनोंके प्रति साधन चतुष्टय असाधारण कारण है । साधन चतुष्टय सम्पन्न व्यक्ति ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञानमें अधिकारी है । परन्तु सर्वप्रथम तो साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारीका ही अभाव है? क्योंकि उन साधनोंमें से वैराग्यका संभव नहीं है । यद्यपि क्षणिक ऐहिक विषय सुखसे वैराग्यका संभव है, तो भी ' अपाम सोमममृता अभूम ' ( यागमें सोम पानकर हम अमर होते हैं ) । स्वर्गलोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया विभेति । उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ( कठ ० १।१२ ) ( हे मृत्यु देव! स्वर्ग लोकमें रोग आदि जन्य किञ्चिद् भी भय नहीं है, वहाँ आपका भी वश नहीं चलता, वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भयभीत नहीं होता अर्थात् वहाँ वृद्धावस्था नहीं होती, स्वर्गलोक में पुरुष भूख और प्यासका अतिक्रमणकर शोक रहित होकर आनन्दित होता है ) इत्यादि श्रुति स्वर्ग में दुःखाभावका प्रतिपादन करती है । अतएव निरन्तर सुख होने तथा दुःखका अभाव होनेसे स्वर्गस्थ व्यक्तिको कदापि वैराग्य नहीं हो सकता । वैराग्यका अभाव होनेसे शेष साधनोंका अभाव तो स्वभाव-सिद्ध है, अतः इस ग्रन्थका आरम्भ व्यर्थ है । इसप्रकारको शङ्काकी निवृत्तिके लिए भगवान् सूत्रकारने सूत्र में ' अतः ' शब्दका प्रयोग किया है । * वादीने पहले जो यह कहा था कि अग्निहोत्र आदि कर्मोंसे सम्पादित स्वर्ग आदि फल नित्यं है, अतः उसे प्राप्तकर साधक कदापि वैराग्यशील नहीं हो सकता, वह युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ' तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते ' तथा ' आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । ( भ ० गी ०८।१६ )