श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 421–430

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 421–430

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अधि ० ९ सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३८७ तस्मान्नैते ब्रह्मणो दृष्टन्ता इति तं प्रति ब्रूयात्- नायं दोषः, कुलालादिदृष्टान्तवैलक्षण्यमा-त्रस्य विवक्षितत्वादिति । यथा हि कुलालादीनां देवादीनां च समाने चेतनत्वे कुलालादयः कार्यारम्भे बाह्यं साधनमपेक्षन्ते न देवादयः, तथा ब्रह्म चेतनमपि न बाह्यं साधनमपेक्षिष्यत इत्येतावद्वयं देवाद्युदाहरणेन विवक्षामः । तस्माद्यथैकस्य सामर्थ्यं दृष्टुं तथा सर्वेषामेव भवितुमर्हतीति नास्त्येकान्त इत्यभिप्रायः ॥ २५ ॥

( ९ कृत्स्नप्रसक्त्यधिकरणम् सू ० २६-२९ ) कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २६ ॥

पदच्छेद - कृत्स्नप्रसक्तिः, निरवयवत्वशब्दकोपः, वा । सूत्रार्थ - ( कृत्स्नप्रसक्ति:) यदि निरवयव ब्रह्मका परिणाम हो तो सम्पूर्ण ब्रह्मका कार्यरूपसे परिणाम प्रसक्त होगा, ( निरवयवत्व शब्दकोपो वा ) यदि एक अंशसे परिणाम हो, तो ब्रह्मके सावयव · होनेसे ' निष्कलं ' इत्यादि ब्रह्मको निरवयव प्रतिपादक श्रुतियोंके साथ विरोध होगा । इस तरह दोनों प्रकारसे ब्रह्म अनित्य हो जायगा, इस लिए ब्रह्म जगत्‌का उपादानकारण नहीं हो सकता । * चेतनमेकमद्वितीयं ब्रह्म क्षीरादिवदेवादिवच्चानपेक्ष्य बाह्यसाधनं स्वयं परिणम-मानं जगतः कारणमिति स्थितम् । शास्त्रार्थ परिशुद्धये तु पुनराक्षिपति । कृत्स्नप्रसक्तिः कृत्स्नस्य ब्रह्मणः कार्यरूपेण परिणामः प्राप्नोति, निरवयवत्वात् । यदि ब्रह्म पृथिव्यादिवत्सा-वयवमभविष्यत्, ततोऽस्यैकदेशः पर्यणं स्यदेकदेशश्चावास्थास्यत् । निरवयवं तु ब्रह्म श्रुति-भ्योऽवगम्यते - ‘ निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ' ( इ ० ६।१ ९ ), ' दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ( मु ० २।१।२ ), ' इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव ' ( बृ ० २ | ४ | १२ ), आदि दृष्टान्तोंसे केवल वैलक्षण्यमात्र विवक्षित है । जैसे कुलाल आदि और देव आदिमें चेतनत्व समान होनेपर भी कुलाल आदि कार्यके आरम्भमें बाह्य साधनोंकी अपेक्षा रखते हैं और देव आदि नहीं रखते । उसी प्रकार चेतन ब्रह्म भी बाह्य साधनों की अपेक्षा नहीं करेगा, बस इतना ही हम देव आदि उदाहरणोंसे कहना चाहते हैं । इसलिए जैसे एक की सामर्थ्य देखी गई हो उसी प्रकार सबकी सामर्थ्य होनी चाहिए, ऐसा अव्यभिचरित नियम नहीं है, यह अभिप्राय हैं ॥ २५ ॥

एक अद्वितीय चेतन ब्रह्म दूध आदि और देवादिके समान बाह्य साधनों की अपेक्षा किए विना हो स्वयं परिणत होता हुआ जगत्का कारण है, यह सिद्ध हुआ । परन्तु शास्त्रार्थकी परिशुद्धिके लिए. पुनः आक्षेप करते हैं — ' कृत्स्नप्रसक्तिः ' यदि ब्रह्मको जगत्का कारण मानें तो सम्पूर्ण ब्रह्मका कार्यरूपसे परिणाम प्राप्त होता है, क्योंकि वह निरवयव है । यदि ब्रह्म पृथिवी आदिके समान सावयव होता, तो उसके एक देशका परिणाम होता और एक देश परिणाम रहित होता । परन्तु ब्रह्म तो ' निष्कलं'० ' ( जो कलाहीन - अवयव रहित, निष्क्रिय, शान्त, दोषरहित और निरञ्जन है ) ' दिव्यो ० ' ( वह अक्षर ब्रह्म निश्चय ही दिव्य, अमूत्तं, पुरुष, बाहर और भीतरमें विद्यमान और जन्मरहित है ) ' इदं महद् ० ' ( यह महान्, परिनिष्पन्न, अनन्त, अपार और विज्ञानघन ही है ) ' स एष ० ' ( जो यह नहीं है, यह नहीं है इस प्रकार निषेध द्वारा निर्दिष्ट है, वह आत्मा है ) ' अस्थूलम ० ' ( जो स्थूल नहीं, अणु नहीं हैं ) सत्यानन्दी - दीपिका * वेदान्त सिद्धान्तमें विवर्तवाद है परिणामवाद नहीं है, ऐसा निर्णय करनेके लिए इस अधिकरणका आरम्भ है । आरम्भ अधिकरणमें कार्यकारणका अनन्यत्व प्रतिपादित है, इससे वैशेषिक आदिके समान ब्रह्मवादीको आरम्भवाद अभिप्रेत नहीं है, किन्तु क्षीर दधि न्यायसे परिणामवाद अभि-प्रेत है, ऐसा समझकर पूर्वपक्षी ' कृत्स्नप्रसक्तिः ' आदिसे शङ्का करते हैं ॥ २३ ॥

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३८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ ‘ स एष नेति नेत्यात्मा ' ( बृ ० ३।९ ।२६ ), ' अस्थूलमनणु ' ( वृ ० ३।८।८ ) इत्याद्याभ्यः सर्वविशेष-प्रतिषेधिनीभ्यः । ततश्चैकदेशपरिणामासंभवात्कृत्स्नपरिणामप्रसक्तौ सत्यां मूलोच्छेदः प्रसज्येत । द्रष्टव्यतोपदेशानर्थक्यं चापद्येत, अयत्नदृष्टत्वात्कार्यस्य, तद्व्यतिरिक्तस्य च ब्रह्मणोऽसंभवात्, अजत्वादिशब्दकोषश्च । अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया सावयवमेव ब्रह्माभ्युप-गम्येत, तथापि ये निरवयवत्वस्य प्रतिपादकाः शब्दा उदाहृतास्ते प्रकुप्येयुः । सावयवत्वे चानित्यत्वप्रसङ्ग इति । सर्वथायं पक्षो न घटयितुं शक्यत इत्याक्षिपति ॥ २६ ॥

श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २७ ॥

पदच्छेद - श्रुतेः, तु, शब्दमूलत्वात् । सूत्रार्थ - ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है । ( श्रुतेः ) ' सेयं देवतैक्षत ' इत्यादि श्रुतिमें ब्रह्म जगत्का उपादानकारण कहा गया है, और ' तावानस्य महिमा ' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मकी कार्यं से पृथक् सत्ता कही गई है, अतः ब्रह्मका सर्वात्मना कार्यरूपसे परिणाम नहीं हो सकता, पूर्वोक्तयुक्ति से श्रुतिका बाध भी असंभव है, ( शब्दमूलत्वात् ) क्योंकि ब्रह्म श्रुतिमूलक है । * तुशब्देनाक्षेपं परिहरति । न खल्वस्मत्पक्षे कश्चिदपि दोषोऽस्ति । न तावत्कृत्स्न-प्रसक्तिरस्ति । कुतः? श्रुतेः । यथैव हि ब्रह्मणो जगदुत्पत्तिः श्रूयते, एवं विकारव्यतिरेकेणापि ब्रह्मणोऽवस्थानं श्रूयते, प्रकृतिविकारयोर्भेदेन व्यपदेशात्, ' सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि ' ( छा ० ६।३।२ ) इति ' तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ' ( छा ० ३।१२ । ६ ) इति चैवजातीय-कात्, ' सता सोम्य तदा संपन्नो भवति ' ( छा ० ६/८1१ ) इति सुषुप्तिगतं विशेषण-इत्यादि सर्व विशेष प्रतिषेधक श्रुतियोंसे निरवयव अवगत होता है । इससे एक देशके परिणामका असम्भव होनेसे सम्पूर्णं ब्रह्मके परिणामकी प्रसक्ति होनेपर मूलका ही उच्छेद प्रसक्त होगा । और [ आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ] द्रष्टव्यतोपदेश भी अनर्थक हो जायगा, क्योंकि कार्य तो विना यत्नके दिखाई देता है, और कार्य से भिन्न ब्रह्मका संभव नहीं है, तथा ब्रह्म के लिए अजत्व प्रतिपादक श्रुतियोंका बाघ हो जायगा । यदि इस दोषकी परिहारकी इच्छासे ब्रह्मको सावयव स्वीकार करें तो ब्रह्मको निरवयव प्रतिपादक जो उदाहृत श्रुतियाँ हैं, वे बाधित हो जायंगी, सावयव मानें तो अनित्यत्वका प्रसंग है, इस प्रकार पूर्वपक्षी आक्षेप करते हैं कि यह पक्ष सर्वथा संगत नहीं हो सकता है ॥ २६ ॥

सूत्रकार ' तु ' शब्दसे आक्षेपका परिहार करते हैं । वस्तुतः हमारे पक्ष में कोई भी दोष नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्मका कार्यरूप में परिणाम प्रसक्त नहीं है, किससे? इससे कि ऐसी श्रुति है । जिस प्रकार ब्रह्मसे जगत्की श्रुति है, उसी प्रकार कार्यसे भिन्न ब्रह्मकी अवस्थिति श्रुति भी है । क्योंकि ' सेयं देवतैक्षत ० ' ( उस सत् संज्ञक देवताने ईक्षण किया, ' मैं इस जीवात्मरूपसे ' इन तीनों देवताओं में अनुप्रवेशकर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) और ' तावानस्य ० ' ( उतनी ही इस गायत्री संज्ञक ब्रह्मकी महिमा है, तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है । सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इस निर्विकार पुरुषके तीन पाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित हैं ) इस प्रकारकी श्रुतिसे कार्यं और कारणका भेदसे व्यपदेश है । इसी प्रकार हृदय आयतनत्व वचन ( स वा एष आत्मा हृदि ) से और सत् के साथ सम्पत्ति ऐक्य वचनसे भी कार्य और कारणका भेदसे व्यपदेश है । यदि सम्पूर्ण ब्रह्म कार्यरूप से उपयुक्त ( परिणत ) हो, तो ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! उस समय यह सत् ब्रह्म के साथ सम्पन्न हो जाता है ) यह सुषुप्ति गत विशेषण ( तदा ) अनुपपन्न होगा, क्योंकि विकृत ब्रह्मके

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अधि ० ९ सू ० २७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३८ ९ मनुपपन्नं स्यात्, विकृतेन ब्रह्मणा नित्यसंपन्नत्वादविकृतस्य च ब्रह्मणोऽभावात् । तथेन्द्रि-यगोचरत्वप्रतिषेधाद्ब्रह्मणो विकारस्य चेन्द्रियगोचरत्वोपपत्तेः तस्मादस्त्यविकृतं ब्रह्म । नच निरवयवत्व शब्दव्याकोपोऽस्ति श्रूयमाणत्वादेव निरवयवत्वस्याप्यभ्युपगम्यमान-त्वात् । शब्दमूलं च ब्रह्म शब्दप्रमाणकं नेन्द्रियादिप्रमाणकं तद्यथाशब्दमभ्युपगन्तव्यम् । शब्दश्वोभयमपि ब्रह्मणः प्रतिपादयत्यकृत्स्नप्रसक्तिं निरवयवत्वं च । लौकिकानामपि मणि-मन्त्रौषधिप्रभृतीनां देशकालनिमित्तवैचित्र्यवशाच्छक्तयोविरूद्धानेककार्यविषया दृश्यन्ते । ता अपि तावन्नोपदेशमन्तरेण केवलेन तर्केणावगन्तुं शक्यन्ते - अस्य वस्तुन एतावत्य एतत्सहाया एतद्विषया एतत्प्रयोजनाश्च शक्तय इति । किमुताचिन्त्यस्वभावस्य ब्रह्मणो रूपं विना शब्देन न निरूप्येत । तथा चाहुः पौराणिकाः - ' अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् । प्रकृतिभ्यःपरं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ ' इति । तस्माच्छन्दमूल एवातीन्द्रिया-र्थयाथात्म्याधिगमः । ननु शब्देनापि न शक्यते विरुद्धोऽर्थः प्रत्याययितुं च ब्रह्म परिणमतें नव कृत्स्नमिति । यदि निरवयवं ब्रह्म स्यान्नैव परिणमेत । कृत्स्नमेव वा परिणमेत । अथ केनचिद्रषेण परिणमेत केनचिच्चावतिष्ठेतेति रूपभेदकल्पनात्सावयवमेव प्रसज्येत । क्रिया-विषये हि ' अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति ' ' नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति ' इत्येवंजातीयकायां विरोध-प्रतीतावपि विकल्पाश्रयणं विरोधपरिहारकारणं भवति, पुरुषतन्त्रत्वाच्चानुष्ठानस्य । इह तु विकल्पाश्रयणेनापि न विरोधपरिहारः संभवति, अपुरुषतन्त्रत्वाद्वस्तुनः । तस्मादुदुर्घ-टमेतदिति । नैष दोषः, अविद्याकल्पित रूपभेदाभ्युपगमात् । नह्यविद्याकल्पितेन रूपभेदेन सावयवं वस्तु संपद्यते । नहि तिमिरोपहतनयनेनानेक इव चन्द्रमा दृश्यमानोऽनेक एव साथ नित्य सम्पन्न है और अविकृत ब्रह्मका अभाव है । उसी प्रकार ब्रह्ममें इन्द्रिय विषयत्वका प्रतिषेत्र है और विकारमें इन्द्रिय विषयत्वकी उपपत्ति होती है, इससे सिद्ध होता है ब्रह्म अविकृत है, और इस प्रकार ब्रह्मको निरवयव प्रतिपादक श्रुतिका बाघ भी नहीं होता, क्योंकि श्रूयमाण होनेसे ही निरव-यवत्वको भी स्वीकार करना चाहिए, ब्रह्म श्रुतिमूलक - श्रुतिप्रमाणक है इन्द्रियादि प्रमाणक नहीं है, इसलिए श्रुतिके अनुसार उसे स्वीकार करना चाहिए | श्रुति ब्रह्मका असम्पूर्ण कार्य प्रसक्ति और निरवयवत्व दोनों भी प्रतिपादित करती है । लौकिक मणि, मन्त्र, ओषधि आदिकी शक्तियाँ भी देश, काल और निमित्तके वैलक्षण्यसे परस्पर विरूद्ध अनेक कार्यविषयक देखी जाती हैं । वे शक्तियाँ भी उपदेशके विना केवल तर्कसे नहीं जानी जा सकतीं कि इस वस्तुमें इतनी शक्तियाँ हैं, इसके ये सहायक कारण हैं यह कार्य है और यह उनका प्रयोजन है । अचिन्त्य प्रभाव विशिष्ट ब्रह्मके स्वरूपका श्रुति विना निरूपण न हो सके, तो इसमें आश्चर्य क्या । उसी प्रकार ' अचिन्त्याः खलु ० ' ( जो पदार्थं अचिन्त्य हैं उनमें तर्क नहीं करना चाहिए । जो प्रकृतिसे पर है वही अचिन्त्यका स्वरूप है ) पौराणिक भी कहते हैं । इसलिए अतीन्द्रिय अर्थके यथार्थ स्वरूपका अधिगम श्रुतिमूलक ही है । परन्तु निर्वयव ब्रह्म परिणत होता है किन्तु सम्पूर्ण नहीं, इस प्रकार विरूद्ध अर्थकी प्रतीति श्रुतिसे मी नहीं कराई जा सकती । यदि ब्रह्म निरवयव हो, तो परिणत ही नहीं होगा अथवा होगां तो सम्पूर्ण ही होगा । यदि ऐसा माना जाय कि किसो एकरूप से परिणत होता है और किसी एकरूप से अवस्थित रहता है, तो इस प्रकार रूप भेदको कल्पनासे ब्रह्म सावयव हो हो जायगा । क्रियाके विषय में तो ' अतिरात्र नामक यागमें षोडशी पात्रका ग्रहण करे, अतिरात्र में षोडशीका ग्रहण न करे ' इस प्रकारकी विरुद्ध प्रतीति में भी विकल्पका आश्रय विरोध परिहारका कारण होता है, क्योंकि अनुष्ठान पुरुषके अधीन है । परन्तु यहाँ तो विकल्पके आश्रयणसे मी विरोध परिहारका संभव नहीं है, क्योंकि वस्तु पुरुषके अधीन नहीं है, इसलिए यह ( श्रुति प्रामाण्य ) दुर्घट है । सिद्वान्ती — यह दोष नहीं है, क्योंकि अविद्या कल्पित रूपभेद स्वीकार किया गया है ।

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३ ९ ० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ भवति । अविद्याकल्पितेन न नामरूपलक्षणेन रूपभेदेन व्याकृताव्याकृतात्मकेन तत्त्वान्य-त्वाभ्यामनिर्वचनीयेन ब्रह्म परिणामादिसर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते । पारमार्थिकेन च रूपेण सर्वव्यवहारातीतमपरिणतमवतिष्ठते । वाचारम्भणमात्रत्वाच्चाविद्याकल्पितस्य नामरूपभेदस्येति न निरवयवत्वं ब्रह्मणः कुप्यति । न चेयं परिणामश्रुतिः परिणामप्रति-पादनार्था, तत्प्रतिपत्तौ फलानवगमात् । सर्वव्यवहारहीनब्रह्मात्मभावप्रतिपादनार्था त्वेषा, तत्प्रतिपत्तौ फलावगमात् । स एष नेति नेत्यात्मा ' इत्युपक्रम्याह- ' अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि ' ( वृ ० ४।२।४ ) इति । तस्मादस्मत्पक्षे न कश्चिदपि दोषप्रगङ्गोऽस्ति ॥ २७ ॥

आत्मनि चैवं विचित्राश्व हि ॥ २८ ॥

पदच्छेद - आत्मनि, च, एवम्, विचित्राः, च, हि । सूत्रार्थ - ( हि ) क्योंकि ( आत्मनि ) ' न तत्र रथा न रथयोगा ' इत्यादि श्रुतिमें स्वप्नद्रष्टा एक आत्मा ( विचित्रा: ) अनेक प्रकार की सृष्टियाँ कही गई हैं, ( च ) और लोकमें एक ऐन्द्रजालिकमें उसके स्वरूपके नाश हुए विना विचित्र सृष्टि देखी जाती है, ( एवम् ) इस प्रकार ब्रह्म में भी विचित्र सृष्टि हो सकती है । अपि च नैवात्र विवदितव्यम् - कथमेकस्मिन्ब्रह्मणि स्वरूपानुपमदेनैवानेकाकारा सृष्टिः स्यादिति । यत आत्मन्यप्येकस्मिन्स्वप्नदृशि स्वरूपानुपमदेनैवानेकाकारा सृष्टिः पठ्यते - ' न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ स्थान्स्थयोगान्पथः सृजते ' ( बृ ० ४।३।१० ) इत्यादिना । लोकेऽपि देवादिषु मायाव्यादिषु च स्वरूपानुपमर्देनैव विचित्रा हस्त्यश्वादिसृ-टयो दृश्यन्ते । तथैकस्मिन्नपि ब्रह्मणि स्वरूपानुपमर्देनैवाने काकारा सृष्टिर्भविष्यतीति ॥२८ ॥

स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ ९ । पदच्छेद - स्वपक्षदोषात्, च । अविद्या कल्पित रूपभेदसे वस्तु सावयव नहीं हो जाती, जैसे तिमिर दोषसे दूषित नेत्र द्वारा चन्द्रमा अनेक - सा दृश्यमान होनेपर भी अनेक नहीं हो जाता, वैसे अविद्यासे कल्पित नाम रूपात्मक, व्यक्त और अव्यक्तरूप, सत् और असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय रूपभेदसे ब्रह्म परिणामादि सब व्यवहारोंका आश्रय होता है । परन्तु पार्मार्थिकरूपसे सब व्यवहारोंसे अतीत और परिणाम रहित अवस्थित है । अविद्या कल्पित नाम, रूप भेद तो केवल वाचारम्भण मात्र है, इससे ब्रह्म में निरवयवत्व बाधित नहीं है । यह परिणामश्रति परिणाम प्रतिपादनके लिए नहीं है, क्योंकि उसके ज्ञानसे फल अवगत नहीं होता, किन्तु यह श्रुति सर्वव्यवहार शून्य ब्रह्मात्मभाव प्रतिपादन करनेके लिए है, क्योंकि उसके ज्ञानसे फल अवगत होता है । ‘ स एष नेति नेव्यात्मा ' इस प्रकार उपक्रम कर ' अभयं वै जबक ० ' ( हे जनक! निस्सन्देह, तुम अभय- ब्रह्म पदको प्राप्त हुआ है ) ऐसा कहा है । इसलिए हमारे पक्षमें कोई भी दोष प्रसंग नहीं है ॥। २७ ॥ और इस विषय में भी विवाद नहीं करना चाहिए कि स्वरूपका नाश हुए विना एक ब्रह्म में अनेक प्रकारकी सृष्टि किस प्रकार होगी, क्योंकि ' न तत्र स्था ० ' ( स्वप्नमें न रथ हैं, न अश्व हैं, न मार्ग हैं, किन्तु स्वप्नद्रष्टा रथ, अश्व और उनके मार्गोंकी रचना कर लेता है ) इत्यादि श्रुतिसे स्वप्नद्रष्टा एक आत्मामें भी स्वरूप नाश हुए विना अनेक प्रकारको सृष्टि प्रतिपादित है । लोकमें भी देव आदि और मायावी आदि में स्वरूप नाश हुए विना ही हस्ति, अश्व आदि विचित्र सृष्टियाँ देखी जाती हैं, उसी प्रकार एक ब्रह्म में भी स्वरूप नाश हुए विना ही अनेक प्रकारकी सृष्टि होगी ॥ २८ ॥

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अधि ० ९ सू ० ३ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३ ९ १ सूत्रार्थ - और सांख्य आदिके पक्ष में भी यह दोष है, केवल हमारे पक्षमें दोष लगाना उचित नहीं, इसलिए ब्रह्मकारणत्ववाद उपपन्न है । * परेषामप्येष समानः स्वपक्षे दोषः । प्रधानवादिनोऽपि हि निरवयवम परिच्छिन्नं शब्दादिहीनं प्रधानं सावयवस्य परिच्छिन्नस्य शब्दादिमतः कार्यस्य कारणमिति स्वपक्षः । तत्रापि कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वात्प्रधानस्य प्राप्नोति निरवयवत्वाभ्युपगमकोपो वा । ननु नैव तैर्निरवयवं प्रधानमभ्युपगम्यते, सत्त्वरजस्तमांसि त्रयो गुणा नित्या-स्तेषां साम्यावस्था प्रधानं तैरेवावयवैस्तत्सावयवमिति । नैवंजातीयकेन सावय-वत्वेन प्रकृतो दोषः परिहर्तुं पार्यते । यतः सत्त्वरजस्तमसामप्येकैकस्य समानं निर-वयत्वम् । एकैकमेव चेतरद्वयानुगृहीतं सजातीयस्य प्रपञ्चस्योपादानमिति समान-त्वात्स्वपक्षदोषप्रसङ्गस्य । तर्काप्रतिष्ठानात्सावयवत्वमेवेति चेत् - एवमप्यनित्यत्वा-दिदोषप्रसङ्गः । अथ शक्तय एव कार्यवैचित्र्यसूचिता अवयवा इत्यभिप्रायः, तास्तु ब्रह्मवादिनोऽप्यविशिष्टाः । * तथाणुवादिनोऽप्यणुरण्वन्तरेण संयुज्यमानो निरवय-अन्य वादियों ( पूर्वपक्षियों ) के मी पक्षमें यह दोष समान है, क्योंकि प्रधानवादीका मी अपना पक्ष यह है कि निरवयव, अपरिच्छिन्न शब्दादि रहित प्रधान सावयव, परिच्छिन्न, शब्दादि युक्त कार्यका कारण है । उसके मत में भी निरवयव होनेसे सम्पूर्ण प्रधानका कार्यरूपमें परिणाम प्रसक्त होगा अथवा प्रधानके निरवयवत्व के स्वीकारका बाघ होगा । परन्तु उन्होंने प्रधानको निरवयव स्वीकार नहीं किया है । सत्त्व, रज और तम तीन नित्य गुण हैं, उनकी साम्यावस्था ही प्रधान है, उन्हीं गुणरूप अवयवोंसे प्रधान सावयव है । इस प्रकारके सावयवत्वसे प्रकृत दोषका परिहार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सत्त्व, रज और तममें भी प्रत्येकका निरवयत्व समान है । एक एक ही गुण अन्य दो गुणोंसे अनुग्रहीत- युक्त होकर सजातीय प्रपञ्चका उपादान है, इस प्रकार स्वपक्षमें दोष प्रसङ्ग समान है । यदि यह कहो कि तर्कके प्रतिष्ठित न होने से सावयवत्व है, तो ऐसा होनेपर भी अनित्यत्व दोष प्रसङ्ग है । यदि यह अभिप्राय हो कि कार्यके वैचित्र्यसे सूचित शक्तियाँ ही अवयव हैं, वे तो ब्रह्मवादी के लिए भी समान हैं । सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ यश्वोभयोःसमो दोषः परिहारोऽपि तादृशः ' ( जो दोष दोनों पक्षोंमें समान है, उसका परिहार भी समान है, इस विषय में केवल एक पक्ष से प्रश्न करना उचित नहीं है ) यह न्याय है । यदि प्रधानको निरवयव मानें, तो उसका महदादि कार्यरूपसे सम्पूर्ण परिणाम हो जानेके कारण कार्य कारण दोनोंका ही उच्छेद हो जायगा । इस दोषकी निवृत्ति के लिए यदि प्रधानको सावयव मानें तो उसे निर-वयव भानना वाधित हो जायगा और अनित्यत्व प्रसक्त होगा । गुणोंकी साम्यावस्था प्रधान है, वह साम्यावस्था गुणोंका विकार है कि समुदाय? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि वह विकार होनेसे मूल प्रकृति ही नहीं होगी । यदि दूसरा पक्ष मानें, तो प्रपञ्चका अभाव हो जायगा, क्योंकि समुदाय कोई वस्तु नहीं है । यदि निरवयव गुण ही विविध परिणामोंकी प्रकृति मानें, तो सम्पूर्णरूपसे परिणत होनेपर मूलोच्छेद तदवस्थ है । यदि प्रत्येक सत्त्व आदि गुण अन्य दो गुणोंके साथ निरवयव होकर उपादान हों, तो सम्पूर्णरूपसे परिणाम होनेपर पुनः मूलोच्छेद है । उस दोष से मुक्त होनेके लिए यदि मृत्तिकाके समान सावयव मानें, तो उसके एक देशका परिणाम तो हो सकता है, परन्तु निरवयवत्वका बाघ और अनित्यत्व दोष पूर्ववत् ही विद्यमान हैं । यदि कहो कि गुणोंके अवयव तन्तुओंके समान आरम्भक नहीं होते, किन्तु कार्यके वैलक्षण्यसे अनुमित उनमें वर्तमान शक्तियाँ आरम्भक होती हैं, तो हम भी ऐसा कहते हैं कि मायिक शक्तियोंद्वारा ब्रह्म भी सावयव सा है । * दो परमाणु मिलकर द्वयणुक और तीन द्व्यणुक मिलकर त्र्यणुकका आरम्भ होता है । यह वैशेषिकों की प्रक्रिया है । निरवयव दो परमाणुओं का संयोग व्याप्यवृत्ति है अथवा अव्याप्य वृत्ति?

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३ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ वत्वाद्यदि कात्स्न्येन संयुज्येत ततः प्रथिमानुपपत्तेर णुमात्रत्वप्रसङ्गः । अथैकदेशेन संयुज्येत, तथापि निरवयवत्वाभ्युपगमकोप इति स्वपक्षेऽपि समान एष दोषः । समान-त्वाच्च नान्यतर सिन्ने व पक्ष उपक्षेतव्यो भवति । परिहृतस्तु ब्रह्मवादिना स्वपक्षे दोषः ॥ २ ९ ॥ ( १० सर्वोपेताधिकरणम् सू ० ३०-३१ ) सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ३० ॥ पदच्छेद- सर्वोपेता, च तदर्शनात् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( सर्वोपेता ) परादेवता सर्वशक्ति युक्त है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि ' सर्व-कर्मा सर्वकामः ' इत्यादि श्रुतिमें उसका सर्वशक्ति योग देखा गया है | एकस्यापि ब्रह्मणो विचित्रशक्तियोगादुपपद्यते विचित्रो विकारप्रपञ्च इत्युक्तम् । तत्पुनः कथमवगम्यते - विचित्रशक्तियुक्तं परं ब्रह्मेति? तदुच्यते - सर्वोपेता च तद्दर्श नात् । सर्वशक्तियुक्ता च परा देवतेत्यभ्युपगन्तव्यम् । कुतः? तद्दर्शनात् । तथा हि दर्शयति श्रुतिः सर्वशक्तियोगं परस्या देवतायाः - ' सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर: ' ( छा ० ३ | १४18 ), ' सत्यकामः सत्यसंकल्प: ' ( छा ० ८ | ७ | १ ), ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' ( मुण्ड ० १।१।९ ), ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ वित तिष्ठतः ( बृ ० ३1८1 ९ ) इत्येवंजातीयका || ३० ॥ विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम् ॥ ३१ ॥

पदच्छेद - विकरणत्वात् न, इति चेत्, तत्, उक्तम् । इसी प्रकार अणुवादी मतमें भी एक अणु दूसरे अणुसे संयुक्त होता हुआ निरवयव होनेसे यदि सम्पूर्णरूपसे संयुक्त हो, तो प्रथिमा अधिक परिणामकी अनुपपत्ति होनेके कारण उसमें अणुमात्रत्वका प्रसंग होगा । यदि एक देशसे संयुक्त हो, तो भी निरवयवत्वाभ्युपगम बाधित हो जायगा, इस प्रकार स्वपक्षमें भी यह दोष समान है । दोनोंके समान होनेपर दोमें से एक पक्षपर ही आक्षेप करना योग्य नहीं है । ब्रह्मवादीने तो अपने पक्षमें दोषका परिहार कर दिया है ॥२ ९ ॥ यह कहा गया है कि एक ब्रह्मका भी विचित्रशक्तिके योगसे विचित्र कार्यं प्रपञ्च उपपन्न होता है । परन्तु यह कैसे अवगत हो कि परब्रह्म विचित्र शक्ति युक्त है? उसे कहते हैं- ' सर्वोपेता च तदर्शनात् ' । परादेवता सर्वशक्ति युक्त है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए, किससे? इससे कि श्रुतियोंमें ऐसा देखा गया ( प्रतिपादित ) है, जैसे कि ' सर्व कर्मा ० ' ( जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक् रहित और निष्काम है ) ' सत्यकामः ० ' ( जो सत्यकाम और सत्य संकल्प है ) ' यः सर्वज्ञः ० ' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है ) ' एतस्य वा ० ' ( हे गार्गी! इस अक्षर ब्रह्म के ही शासन में सूर्य और चन्द्रमा विधृत होकर अवस्थित हैं ) इस प्रकारकी श्रुति परा देवता में सर्वशक्तिका योग दिखलाती है ॥ ३० ॥

सत्यानन्दी - दीपिका प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि निरवयव परमाणुओंसे उत्पन्न द्वद्यणुक परमाणु मात्र ही होगा, परमाणुका दूसरे परमाणु के साथ किसी प्रकार मिलनेपर भी उसमें अधिक परिमाण नहीं हो सकता, जैसे निरवयव आत्मा, आकाश, काल आदिके व्याप्त संयोग होनेपर भी उनमें कोई स्थूलता नहीं आती । यदि इस दोषकी निवृत्तिके लिए व्याप्यवृत्ति संयोग मानें, तो परमाणु सावयव होनेसे अनित्य होगा । यदि परमाणु के अवयवोंका विभाग करें तो अनन्तावयवत्व होनेसे सुमेरू और सरसोंकी समानता भी हो जायगी । परन्तु ' तुम चोर हो ' ऐसा किसीके कहनेपर ' तुम भी चोर हो ' इस कथनके समान दोषकी समानताका उल्लेख करना अयुक्त है । मायावादमें तो स्वप्नके समान सबका सामञ्जस्य किया गया है इसलिए निरवयव ब्रह्म में समन्वयका कोई विरोध नहीं है ॥२ ९ ॥

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अधि ० ११ सू ० ३२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३ ९ ३ सूत्रार्थ -- ( विकरणत्वात् ) ' अचक्षुष्कमश्रोत्रम् ' इत्यादि श्रुतिमें ब्रह्म इन्द्रिय रहित प्रतिपादिन होनेसे ( न ) कर्ता नहीं हो सकता । ( इति चेत् ) ऐसा यदि कहो, तो ( तदुक्तम् ) इस विषयमें जो कहना था, वह ' देवादिवदपि लोके ' इस सूत्र में कहा गया है । स्यादेतत् - विकरणां परां देवतां शास्ति शास्त्रम् -'अचक्षुष्कम श्रोत्रमत्रागमनः ' ( बृ ० ३।८।८ ) इत्येवंजातीयकम् । कथं सा सर्वशक्तियुक्तापि सती कार्याय प्रभवेत्? देवादयो हि चेतनाः सर्वशक्तियुक्ता अपि सन्त आध्यात्मिक कार्यकरणसंपन्ना एव तस्मै तस्मै कार्याय प्रभवन्तो विज्ञायन्ते । कथं च ' नेति नेति ' ( वृ ० ३ ९: २६ ) इति प्रतिषिद्धसर्व विशे-पाया देवतायाः सर्वशक्तियोगः संभवेदिति चेत् - यदत्र वक्तव्यं तत्पुरस्तादेवोक्तम् । श्रुत्यवगाह्यमेवेदमतिगम्भीरं ब्रह्म न तर्कावगाह्यम् । नच यथैकस्य सामर्थ्यं दृष्टं तथाऽन्य-स्यापि सामर्थ्येन भवतिव्यमिति नियमोऽस्तीति । प्रतिषिद्धसर्वविशेषस्यापि ब्रह्मणः सर्वशक्तियोगः संभवतीत्येतदप्यविद्याकल्पितरू पभेदोपन्यासेनोक्तमेव । तथा च शास्त्रम् -'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यंत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ण: ' ( वे ० ३।१ ९ ) इत्यकरण-स्यापि ब्रह्मणः सर्व सामर्थ्ययोगं दर्शयति ॥ ३१ ॥

( ११ न प्रयोजनवत्त्वाधिकरणम् सू ० ३२-३३ ) न प्रयोजनवत्वात् ॥ ३२ ॥

पदच्छेद - न, प्रयोजनवत्त्वात् । सूत्रार्थ - ( न ) ब्रह्म जगत्का कर्ता नहीं हो सकता, ( प्रयोजनवत्त्वात् ) क्योंकि प्रवृत्ति प्रयोजन-वाली होती है । नित्य तृप्त होने से ब्रह्मका कोई प्रयोजन नहीं है । अन्यथा पुनश्चेतनकर्तृत्वं जगत आक्षिपति । न खलु चेतनः परमात्मेदं जगद्विम्बं विरचयितुमर्हति । कुतः? प्रयोजनवत्त्वात्प्रवृत्तीनाम् । चेतनो हि लोके बुद्धिपूर्वकारी पुरुषः प्रवर्तमानो न मन्दोपक्रमामपि तावत्प्रवृत्तिमात्मप्रयोजनानुपयोगिनीमारभमाणो दृष्टः । किमुत गुरुतरसंरम्भाम्? भवति च लोकप्रसिद्धयनुवादिनी श्रुतिः - ' न आ अरे यह ठीक है, परन्तु ' अचक्षुष्कम ० ' ( वह नेत्र रहित, श्रोत्र रहित, वाणी रहित और मन रहित है ) इस प्रकारकी श्रुति परा देवताको इन्द्रिय रहित कहती है । वह देवता सर्वशक्तियुक्त होनेपर भी कार्यके लिए किस प्रकार समर्थ होगा? देवादि चेतन और सर्वशक्ति युक्त होते हुए भी आध्यात्मिक शरीर और इन्द्रियोंसे सम्पन्न होकर ही तत् तत् कार्यं करनेमें समर्थ ज्ञात होते हैं । तो ' नेति नेति ' इस प्रकार श्रुतिसे जिसके सब विशेषोंका प्रतिषेध किया गया है, उस देवतामें सर्वशक्तियोगका सम्भव कैसे होगा? ऐसा यदि कहो, तो इस विषयमें जो कहना चाहिए वह पहले ही कहा गया है । यह अतिगम्भीर ब्रह्म श्रुतिसे ही ज्ञातव्य है, तकंसे अवगाह्य नहीं है । और एकको जैसी सामर्थ्यं देखी गई हो, वैसे ही अन्यकी मी सामर्थ्य होनी चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं है । जिसके सब विशेषोंका प्रतिषेध किया गया है उस ब्रह्ममें सर्वशक्तिका योग संभव है, यह शक्तियोग मी अविद्यासे कल्पित रूपभेदके उपन्याससे कहां गया है । उसी प्रकार ' अपाणिपादो ० ' ( वह हाथ - पाँव से रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्ररहित होकर भी देखता है और कणरहित होकर भी सुनता है ) यह श्रुतिकरण रहित इन्द्रियरहित भी ब्रह्म में सर्वशक्तिका योग सम्बन्ध दिखलाती है ॥ ३१ ॥

चेतन जगत् का कर्ता है, इसपर पुनः अन्य प्रकारसे आक्षेप करते हैं । चेतन परमात्मासे इस जगत् मण्डलकी रचना करना युक्त नहीं है, क्यों? क्योंकि प्रवृत्तियाँ प्रयोजनवाली होती हैं । लोकमें बुद्धिपूर्वक कार्य करनेवाला चेतन पुरुष कार्यमें प्रवृत्त होता हुआ अपने प्रयोजनके अनुपयोगी अल्प यत्न साध्य प्रवृत्ति - कामको आरम्भ करते नहीं देखा गया है, पुनः गुरुतर- प्रयत्न साध्य प्रवृत्तिको आरम्भ न करे तो

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३ ९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ' ( बृ ० २/४/५ ) इति । गुरुतर-संरम्भा चेयं प्रवृत्तिर्यदुच्चावचप्रपञ्चं जगद्विम्बं विरचयितव्यम् | यदीयमपि प्रवृत्तिश्चेत-नस्य परमात्मन आत्मप्रयोजनोपयोगिनी परिकल्प्येत परितृप्तत्वं परमात्मनः श्रूयमाणं बाध्येत । प्रयोजनाभावे वा प्रवृत्त्यभावोऽपि स्यात् । अथ चेतनोऽपि सन्नुन्मत्तो बुद्धयपरा-धादन्तरेणैवात्मप्रयोजनं प्रवर्तमानो दृष्टस्तथा परमात्मापि प्रवर्तिष्यत इत्युच्येत, तथा सति सर्वज्ञत्वं परमात्मनः श्रूयमाणं बाध्येत । तस्मादश्लिष्टा, चेतनात्सृष्टिरिति ॥३२ ॥

लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥३३ ॥

पदच्छेद - लोकवत्, तु, लीलाकैवल्यम् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्षको व्यावृत्तिके लिए है । ( लोकवत् ) जैसे लोकमें किसी विशिष्ट पुरुषकी प्रयोजनके विना क्रीडा आदिमें प्रवृत्ति होती देखी जाती है, वैसे ही परमात्माकी भी यह विचित्र रचना ( लीलाकैवल्यम् ) प्रयोजनके विना लीलामात्र है, अतः उक्त समन्वयका विरोध नहीं है । तुशब्देनाक्षेपं परिहरति । यथा लोके कस्यचिदा तैषणस्य राज्ञो राजामात्यस्य वा व्य-तिरिक्तं किंचित्प्रयोजनमनभिसंधाय केवलं लीलारूपाः प्रवृत्तयः क्रीडाविहारेषु भवन्ति, यथा चोच्छ्वासप्रश्वासादयोऽनभिसंधाय बाह्यं किंचित्प्रयोजनं स्वभावादेव संभवन्ति, एवमी -श्वरस्याप्यनपेक्ष्य किंचित्प्रयोजनान्तरं स्वभावादेव केवलं लीलारूपा प्रवृत्तिर्भविष्यति । न श्वरस्य प्रयोजनान्तरं निरूप्यमाणं न्यायतः श्रुतितो वा संभवति । नच स्वभावः पर्यनु-योक्तुं शक्यते । यद्यप्यस्माकमियं जगद्विम्बविरचना गुरुतरसंरम्भेवाभाति, तथापि इसमें कहना ही क्या है? लोक प्रसिद्धिकी अनुवादिनी ' न वा अरे ० ' ( अरे मैत्रेयी! सबके प्रयोजनके लिए सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिए सब प्रिय होते हैं ) यह श्रुति भी है । जो अनेक प्रकारके प्रपञ्चोंसे युक्त जगत् मण्डलकी रचना करनी चाहिए, यह प्रवृत्ति गुरुतर प्रयत्न साध्य है । यदि यह प्रवृत्ति भी चेतन परमात्मा के अपने प्रयोजनकी उपयोगिनी कल्पना की जाय, तो परमात्मामें श्रूयमाण परितृप्तत्व बाधित हो जायगा, अथवा प्रयोजनके अभावमें प्रवृत्तिका अभाव भी हो जायगा । यदि कहीं कि चेतन होकर भी उन्मत्त पुरुष बुद्धि के अपराध - दोषसे बिना प्रयोजनके मी प्रवृत्त होता देखा गया है, उसी प्रकार परमात्मा मी प्रवृत्त होगा, तो ऐसा होनेपर परमात्मामें श्रूयमाण सर्वज्ञत्वका बाध हो जायगा, इसलिए चेतनसे सृष्टि असंगत है ॥ ३२ ॥

' तु ' शब्दसे पूर्वपक्षीके आक्षेपका परिहार करते हैं । जैसे लोकमें आप्तैषणावाले ऐसे किसी राजा अथवा मन्त्रीकी क्रीडाक्षेत्रोंमें प्रवृत्तियाँ किसी अन्य प्रयोजनकी अभिलाषा न कर केवल लीलारूप होती हैं । जैसे उच्छ्वास और प्रश्वास आदि किसी बाह्य प्रयोजनकी इच्छा के विना स्वभावसे ही होते हैं, वैसे ही किसी अन्य प्रयोजन की अपेक्षा के विना स्वभावसे ईश्वरकी भी केवल लीलारूप प्रवृत्ति होगी, क्योंकि युक्ति अथवा श्रुतिसे ईश्वर के निरूप्यमाण अन्य प्रयोजनका सम्भव नहीं है । स्वभाव के विषय में आक्षेप भी नहीं किया जा सकता अर्थात् ईश्वरका ऐसा स्वभाव क्यों है? ऐसा आक्षेप करना युक्त नहीं है । यद्यपि जगत् मण्डलकी यह विरचना हम लोगोंको गुरुतर- अत्यधिक परिश्रम साध्य - सी प्रतीत होती सत्यानन्द - दीपिका * यह सृष्टि भी स्वप्न सृष्टिके समान मायामात्र है । इसलिए ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि सृष्टि प्रतिपादकश्रुतियोंका ब्रह्म में जगत्कारणत्व प्रतिपादन करनेमें तात्पर्य नहीं है, किन्तु ब्रह्मा-त्मभाव ' आत्मा ब्रह्म है ' प्रतिपादन करनेमें तात्पर्य है, अतः सृष्टि श्रुतियाँ निष्फल नहीं हैं । यह बात पहले भी स्पष्ट की गई है, उसको भूलना नहीं चाहिए ॥ ३३ ॥

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अधि ० १२ सू ० ३४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३ ९ ५ परमेश्वरस्य लीलैव केवलेयम्, अपरिमितशक्तित्वात् । यदि नाम लोके लीलास्वपि किंचि-त्सूक्ष्मं प्रयोजनमुत्प्रेक्ष्येत, तथापि नैवात्र किंचित्प्रयोजनमुत्प्रेक्षितुं शक्यते, आप्तकामश्रुतेः । नाप्यप्रवृत्तिरुन्मत्तप्रवृत्तिर्वा, सृष्टिश्रुतेः, सर्वज्ञश्रुतेश्च । न चेयं परमार्थविषया सृष्टिश्रुतिः, अविद्याकल्पितनामरूपव्यवहारगोचरत्वात् ब्रह्मात्मभावप्रतिपादनपरत्वाच्चेत्येतदपि नैव विस्मर्तव्यम् ॥ ३३ ॥

( १२ वैषम्यनैघृण्याधिकरणम् सू ० ३४-३६ ) वैषम्यनैर्घण्येन सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३४ ॥

पदच्छेद - वैषम्यनैघृण्ये, न, सापेक्षत्वात्, तथाहि दर्शयति । सूत्रार्थ - ( वैषम्यनं घृण्ये न ) ब्रह्ममें विषमता और निष्करुणतारूप दोष नहीं हैं, ( सापेक्षत्वात् ) क्योंकि वह जीवोंको कर्मानुसार फल देता है अर्थात् कर्मोंकी अपेक्षा रखता है । ( तथाहि दर्शयति ) इस बातको ' एष ह्येव साधु कर्म कारयति ' यह श्रुति भी दिखालाती है । पुनश्च जगज्जन्मादिहेतुत्वमीश्वरस्याक्षिप्यते, स्थूणानिखननन्यायेन प्रतिज्ञातस्या-र्थस्य दृढीकरणाय । नेश्वरो जगतः कारणमुपपद्यते । कुतः? वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गात् । कांश्चि-दत्यन्त सुखभाजः करोति देवादीन्, कांश्चिदत्यन्तदुःखभाजः पश्वादीन्, कांश्चिन्मध्यम-भोगभाजो मनुष्यादीनित्येवं विषमां सृष्टि निर्मिमाणस्येश्वरस्य रागद्वेषोपपत्ते । श्रुतिस्मृ-त्यवधारितस्वच्छत्वादीश्वरस्वभावविलोपः प्रसज्येत । तथा खलजनैरपि जुगुप्सितं निर्घृण-त्वमतिक्रूरत्वं दुःखयोगविधानात्सर्वप्रजोपसंहाराच्च प्रसज्येत । तस्माद्वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गा-नेश्वरः कारणमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः वैषम्यनैर्धृण्ये नेश्वरस्य प्रसज्येते । कस्मात्? सापेक्षत्वात् । यदि हि निरपेक्षः केवल ईश्वरो विषमां सृष्टि निर्मिमीते, स्यातामेतौ दोषौ - वैषम्यं नैर्घृण्यं च, नतु निरपेक्षस्य निर्मातृत्वमस्ति । सापेक्षो हीश्वरो विषमां सृष्टि निर्मिमीते । किमपेक्षतइति है, तो भी परमेश्वकी यह केवल लीला ही है, क्योंकि उसकी शक्ति अपरिमित - अनन्त है । यद्यपि लौकिक लीलाओं में किसी सूक्ष्मप्रयोजनकी उत्प्रेक्षा ( कल्पना ) की जा सकती है, तो भी यहाँ परमात्मा के विषयमें किसी प्रयोजनको मी उत्प्रेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि परमेश्वर आप्तकाम है ऐसी श्रुति है । इसी प्रकार अप्रवृत्ति अथवा उन्मत्तकी - सी प्रवृत्ति भी नहीं है, क्योंकि सृष्टिश्रुति और सर्वज्ञत्व श्रुति है । और यह सृष्टिश्रुति परमार्थं विषयक नहीं है, क्योंकि अविद्यासे कल्पित नामरूपात्मक व्यवहार विषयक है और ब्रह्मात्मभाव प्रतिपादन परक है यह भी विस्मरण नहीं करना चाहिए ॥३३ ॥

ईश्वर जगत् की उत्पत्ति आदिका कारण है, इस प्रतिज्ञात अर्थको स्थूणानिखनन न्यायसे दृढ करने के लिए पुनः आक्षेप किया जाता है । ईश्वर जगत्का कारण उपपन्न नहीं होता, क्यों? क्योंकि वैषम्य और नैघृण्यका प्रसंग होता है । वह कुछको - देवादिको अत्यन्त सुखका भागी बनाता है, कुछको पशु आदिको अत्यन्त दुखका भागी करता है और कुछको - मनुष्य आदिको मध्यम भोगका भागी बनाता है, इस प्रकार विषम सृष्टिका निर्माण करनेवाले ईश्वरमें साधारण जनके समान राग, द्वेषकी उपपत्ति होने से श्रुति, स्मृतिद्वारा अवधारित स्वच्छतादि ईश्वर स्वभावका लोप प्रसक्त होगा । इसी प्रकार सब प्राणियों को दुःख योगका विधान और सम्पूर्ण प्रजाका उपसंहार करनेसे उसमें दुष्टजनोंसे भी अधिक अतिनिन्दित निघृणत्व - अतिक्रूरत्व प्रसक्त होगा । इसलिए विषमता और निघृणताके प्रसंगसे ईश्वर कारण नहीं है । ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं -- वैषम्य और नैघृण्य ईश्वर में प्रसक्त नहीं होते, किससे? इससे कि वह सापेक्ष है । यदि ईश्वर केवल निरपेक्ष होकर विषम सृष्टिका निर्माण करता, तो वैषम्य और नैघृण्य ये दोष होते । परन्तु वह निरपेक्ष होकर तो निर्माण नहीं करता, प्रत्युत ईश्वर सापेक्ष होकर ही विषम सृष्टिका निर्माण करता है । यदि यह कहो कि किसकी अपेक्षा करता है? तो हम कहते हैं कि

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३ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ चेत् - धर्माधर्मावपेक्षतइति वदामः । अतः सृज्यमानप्राणिधर्माधर्मापेक्षा विषमा सृष्टिरिति नायमीश्वरस्यापराधः । ईश्वरस्तु पर्जन्यवद्द्रष्टव्यः । यथा हि पर्जन्यो व्रोहियावादिसृष्टौ साधारणं कारणं भवति, ब्रीहियवादिवैषम्ये तु तत्तद्वी जगतान्येवा साधारणानि सामर्थ्यानि कारणानि भवन्ति, एवमीश्वरो देवमनुष्यादि सृष्टौ साधारणं कारणं भवति । देवमनुष्यादि-वैषम्ये तु त तज्जीवगतान्येवासाधारणानि कर्माणि कारणानि भवन्ति, एवमीश्वरः सापेक्ष-त्वान्न वैषम्यनैर्घृण्याभ्यां दुष्यति । * कथं पुनरवगम्यते सापेक्ष ईश्वरो नीचमध्यमोत्तमं संसारं निर्मिमीत इति? तथा दि दर्शयति श्रुतिः - ' एष ह्य ेव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते ' ( कौ ० ब्रा ० ३।८ ) इति । ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा मवति पापः पापेन ' ( वृ ० ३।२।१३ ) इति च । स्मृतिरपि प्राणिकर्मविशेषापेक्षमेवेश्वर-स्यानुग्रहीतृत्वं निग्रहीतृत्वं च दर्शयति- ' ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ' ( भ ० गी ० ४ । ११ ) इत्येवं जातीयका ॥ ३४ ॥

न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ ३५ ॥

पदच्छेद –न, कर्म, अविभागात्, इति चेत्, न, अनादित्वात् । सूत्रार्थ -- ( अविभागात् ) ' सदेव सोम्येदमग्र ' इत्यादि श्रुतिसे सृष्टिके पूर्व भेदका अभाव प्रतिपादित है, इससे उस समय ( न कर्म ) कर्म नहीं था, तो कर्मकी अपेक्षासे विषम सृष्टि कैसे होगी? ( इति चेन्न ) ऐसा कहो तो नहीं, ( अनादित्वात् ) क्योंकि संसार अनादि होने से सृष्टि और कर्मका बीज और अङ्करके समान कार्यकारणभाव है । इसलिए कर्मकी अपेक्षासे विषम सृष्टि है । ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२1१ ) इति प्राक्सृष्टेर विभागाव-धर्म और अधर्मकी अपेक्षा करता है । सृज्यमान प्राणियोंके धर्म और अधर्मकी अपेक्षासे विषम सृष्टि होती है, इसलिए यह ईश्वरका अपराध नहीं है । ईश्वरको तो पर्जन्यके समान समझना चाहिए । जैसे व्रीहि, यव आदिकी सृष्टिमें पर्जन्य ( मेघ ) साधारण कारण है और व्रीहि, यव आदिकी विषमतामें तो तत् तत् बीजगत सामार्थ्य असाधारण कारण होती हैं । वैसे ही देव, मनुष्य आदिकी सृष्टिमें ईश्वर साधारण कारण है और देध, मनुष्य आदिकी विषमतामें तो तत् तत् जीवगत कर्म असाधारण कारण हैं । इस प्रकार ईश्वर सापेक्ष होनेसे वैषम्य और नैघृण्यसे दूषित नहीं होता । परन्तु यह कैसे अवगत हो कि कर्मोकी अपेक्षा रखकर ईश्वर नीच ( पशु आदि ) मध्यम ( मनुष्य आदि ) और उत्तम ( देव आदि ) संसारका निर्माण करता है? उसी प्रकार ' एष ह्येव ० ' ( जिसको इस लोकसे ऊपर ले जाना चाहता है उससे यही ( ईश्वर ) पुण्य कर्म कराता है और जिसको निकृष्ट लोकमें ले जाना चाहता है उससे यही पाप कर्म कराता है ) और ' पुण्यो वै ० ' ( वह पुण्य कर्मसे पुण्यवान् और पापकर्मसे पापी होता है ) यह श्रुति ७ दिखलाती है । और प्राणियोंके कर्म विशेषकी अपेक्षासे ही ईश्वर अनुग्रह और निग्रहका कर्ता है । ऐसा ' ये यथा मां ० ' ( जो मुझे जिस भावसे भजते हैं. मैं भी उन्हें वैसे ही भजता हूँ ) इस प्रकारकी स्मृति भी दिखलाती है ॥ ३४ ॥

' सदेव सोम्य ० ' ( हे प्रियदर्शन | सृष्टिके पूर्व यह एक मात्र अद्वितीय सत् ही था ) इसप्रकार सत्यानन्दी - दीपिका

* ' जन्म जन्म यदभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः । तेनैवाभ्यासयोगेन तथैवाभ्यसते नरः ' ॥

( पूर्व - पूर्व जन्म में जिसने जिस दान, अध्ययन और तप आदिका अभ्यास किया है, उसी पूर्वाभ्यासकें • बलसे मनुष्य इस जन्ममें भी तत्, तत् दानादिका अभ्यास करता है ) इसलिए ईश्वर किसीसे भी पुण्य - पाप नहीं कराता, यदि कराता है तो उसमें भी जीवोंके पूर्वजन्मकृत कर्म कारण हैं । अतः ' निरवद्यं निरञ्जनम् ' ( ईश्वर दोष रहित निरञ्जन है ) इस प्रकार ईश्वरका यह श्रुति प्रतिपादित लक्षण सर्वथा युक्त है ॥३४ ॥