श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 431–440

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 431 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १२ सू ० ३६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३ ९ ७ धारणान्नास्ति कर्म, यदपेक्ष्य विषमा सृष्टिः स्यात् । सृष्ट्युत्तरकालं हि शरीरादिविभागापेक्षं कर्म, कर्मापेक्षश्च शरीरादिविभाग इतीतरेतराश्रयत्वं प्रसज्येत । अतो विभागादूर्ध्वं कर्मा-पेक्ष ईश्वरः प्रवर्ततां नाम । प्राग्विभागाद्वैचित्र्यनिमित्तस्य कर्मणोऽभावात्तुल्यैवाया सृष्टिः प्राप्नोतीति चेत् - नैष दोषः, अनादित्वात्संसारस्य । भवेदेष दोषो स्यात् । अनादौ तु संसारे बीजाङ्कुरव हेतुहेतुमद्भावेन कर्मणः प्रवृत्तिर्न विरुध्यते ॥ ३५ ॥

कथं पुनरवगम्यतेऽनादिरेष संसार इति? अत उत्तरं पठति उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ ३६ ॥

पदच्छेद - उपपद्यते, च, अपि, उपलभ्यते, च, । सूत्रार्थ - ( उपपद्यते च ) संसारका अनादित्व उपपन्न होता है, ( यद्यादिमान्संसारः सर्गवैषम्यस्य च उपलभ्यते च ) और ' धाता यथा पूर्वमकल्पयत् ' इत्यादि श्रुति और ' नरूपमस्येह तथोपलभ्यते ' इत्यादि स्मृतिमें संसारका अनादित्व उपलब्ध होता । * उपपद्यते च संसारस्यानादित्वम् । आदिमत्त्वे हि संसारस्याकस्मादुद्भुतेर्मुक्तानामपि पुनः संसारोद्भुतिप्रसङ्गः, अकृताभ्यागमप्रसङ्गश्च, सुखदुःखादिवैषम्यस्य निर्निमित्तत्वात् । न चेश्वरो वैषम्य हेतुरित्युक्तम् । न चाविद्या केवला वैषम्यस्य कारणम्, एकरूपत्वात् । रागादिक्लेशवासना क्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्यात् । नच कर्मान्तरेण शरीरं संभवति, नच शरीरमन्तरेण कर्म संभवतीतीतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गः । अनादित्वे तु बीजा-डुरन्यायेनोपपत्तेर्न कश्चिद्दोषो भवति । उपलभ्यते च संसारस्यानादित्वं श्रुतिस्मृत्योः । श्रुतौ तावत् ' अनेन जीवेनात्मना ' ( छा ० ६ । ३ । २ ) इति सर्गप्रमुखे शारीरमात्मानं जीवश-सृष्टिके पहले भेदाभावका निश्चय होनेसे कर्म ही नहीं है जिसको अपेक्षाकर विषम सृष्टि हो । शरीरादि विभागकी अपेक्षा रखने वाला कर्म सृष्टिके उत्तरकालमें होता है और शरीर आदि विभाग कर्मापेक्षित है, इस प्रकार अन्योन्याश्रय प्रसक्त होगा । अतः विभाग के अनन्तर कर्मकी अपेक्षा करनेवाला ईश्वर सृष्टि में प्रवृत्त भले ही हो, परन्तु विभाग के पूर्व वैचित्र्य निमित्तक कर्मका अभाव होनेसे आद्यसृष्टि तो दोनों पक्ष तुल्य ही प्राप्त होती है । ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि संसार अनादि है । यह दोष तो तब होता जब संसार सादि होता । परन्तु संसारके अनादि होनेसे बीज और अंफुरके समान कार्य - कारणरूपसे कर्म और विषमसृष्टिकी प्रवृत्ति विरुद्ध नहीं है ॥ ३५ ॥

यह कैसे अवगत हो कि संसार अनादि है? इसपर उत्तर कहते हैं-संसारका अनादित्व उपपन्न है । यदि संसार सादि हो, तो उसकी अकस्मात् उत्पत्ति होनेसे मुक्त पुरुषोंका भी पुनर्जन्म प्रसक्त होगा, और न किये गये कर्मो का फल प्राप्त होगा, क्योंकि ऐसी परिस्थिति में सुख दुःखादिकी विषमता अनिमित्तक होगी । यह कहा गया है कि ईश्वर विषमताका हेतु नहीं है । एकरूप होने से केवल अविद्या भी विषमताका कारण नहीं है । रागादि क्लेशोंकी वासना से आकृष्ट कर्मोकी अपेक्षासे अविद्या वैषम्य करनेवाली हो सकती है । कर्मके विना शरीरका सम्भव नहीं और शरीरके विना कर्मका सम्भव नहीं, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होगा । परन्तु संसारको अनादि माननेपर बीजाङ्करन्यायसे [ कर्म और विषमसृष्टिके कार्यकारण भावकी ] उपपत्ति होने से कोई भी दोष नहीं है । संसारका अनादित्व श्रुति और स्मृतिमें उपलब्ध है । श्रुतिमें तो ' अनेन जीवेनात्मना ० ' ( इस जीवरूपसे ) इस प्रकार सृष्टिके आरेम्ममें जीवात्माको प्राणधारणके निमित्त जीवशब्दसे कहकर संसार अनादि है ऐसा दिखलाते हैं । परन्तु संसार सादि हो तो पूवं प्राणधारण न करनेपर सर्गके

पृष्ठ 432

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 432 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० १ ब्देन प्राणधारणनिमित्तेनाभिलपन्ननादिः संसार इति दर्शयति । आदिमत्त्वे तु प्रागतव-धारितप्राणः सन् कथं प्राणधारणनिमित्तेन सर्गप्रमुखेऽभिलप्येत? नच धारयिष्यतीत्य-तोऽभिलप्येत! अनागताद्धि संबन्धादतीतः संबन्धो बलवान्भवति, अभिनिष्पन्नत्वात् । ' सुर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ( ऋ ० सं ० १०।१ ९ ०१३ ) इति च मन्त्रवर्णः पूर्वक-ल्पसद्भावं दर्शयति । स्मृतावप्यनादित्वं संसारस्योपलभ्यते - ' न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ' ( गी ० १५/३ ) इति । पुराणे चातीतानामनागतानां च कल्पानां न परिमाणमस्तीति स्थापितम् ॥ ३६ ॥

( १३ सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम् सृ ०४७ ) सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ ३७ ॥

पदच्छेद - सर्वधर्मोपपत्तेः, च । सूत्रार्थ - जगत्कारणत्व, सर्वज्ञत्व आदि सर्वधर्मोकी ब्रह्म में उपपत्ति होनेसे ब्रह्म भी जगत्-कारण हो सकता है । चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चेत्यस्मिन्नवधारिते वेदार्थे परैरुपक्षिप्तान्विलक्ष-णत्वादीन्दोषान्पर्य हार्षीदाचार्यः । इदानीं परक्षप्रतिषेधप्रधानं प्रकरणं प्रारिप्समाणः स्वपक्षपरिग्रह प्रधानं प्रकरणमुपसंहरति । यस्मादस्मिन्ब्रह्मणि कारणे परिगृह्यमाणे प्रद-शितेन प्रकारेण सर्वे कारणधर्मा उपपद्यन्ते ' सर्वज्ञ सर्वशक्ति महामायं च ब्रह्म ' इति, तस्मा-दन तिशङ्कनीयमिदमौपनिषदं दर्शनमिति ॥ ३७ ॥

इति शङ्करभगवत्पूज्यपादकृतौ शारीरकमीमांसामाध्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः ॥ १ ॥

आरम्भमें उसका प्राणधारण निमित्तक जीव शब्दसे कैसे प्रयोग होगा? ' धारयिष्यति ' ( धारण करेगा ) इस अभिप्राय से यह शब्दप्रयोग है ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अतीत सम्बन्ध अभि-निष्पन्न होनेके कारण अनागत सम्बन्धसे बलवान् होता है । ' सूर्याचन्द्रमसौ ० ' ( धाताने सूर्य और चन्द्रमा-की पूर्वकल्प के अनुसार कल्पना की ) यह मन्त्र पूर्वकल्पका सद्भाव दिखलाता है । ' न रूपमस्येह ० • ( परन्तु इस संसार वृक्षका स्वरूप जैसे शास्त्रों में वर्णन किया गया है वैसा यहाँ विचार कालमें उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि न तो इसका आदि है और न अन्त है तथा न अच्छी प्रकारसे स्थिति- मध्य है ) इस प्रकार स्मृतिमें भी संसारका अनादित्व उपलब्ध होता है । और पुराणोंमें अतीत अनागत कल्पोंका परिमाण नहीं है, ऐसा वर्णन किया गया है ॥ ३६ ॥

चेतन ब्रह्म जगत्का निमित्तकारण और उपादानकारण है, इस अवधारित वेदार्थमें प्रति-पक्षियोंद्वारा लगाये गये विलक्षणत्व आदि दोषोंका आचार्यने परिहार किया । अब जिसमें परपक्ष प्रतिषेध प्रधान है, ऐसे प्रकरणके आरम्भ करनेकी इच्छा करते हुए [ भगवान् सूत्रकार ] जिस प्रकरणमें स्वपक्ष परिग्रह प्रधान है, उसका उपसंहार करते हैं । इस ब्रह्मका कारणरूपसे स्वीकार करनेपर प्रदर्शित-पूर्वोक्त प्रकारसे ' ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और महामायावी है ' ऐसे सब कारणधमं उपपन्न होते हैं, इसलिए इस औपनिषद् दर्शनपर अधिक शङ्का नहीं करनी चाहिए ॥ ३७ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके द्वितीयाध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥ १ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * संसार अनादि होनेपर भी मिथ्या है, क्योंकि इससे ' एकमेवाद्वितीयम् ' इस श्रुतिमें अवधारणार्थंक ' एव ' उपपन्न होता है । इसलिए दोष रहित ब्रह्म में वेदान्त समन्वयका कोई विरोध नहीं है ॥ ३६ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत सत्यानन्दी - दीपिका ' के द्वितीयाध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥ १ ॥

पृष्ठ 433

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 433 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः । [ अत्र पादे सांख्यादिमतानां दुष्टत्वप्रदर्शनम् । ] इस पादमें सांख्य आदि मतोंका दुष्टत्व प्रदर्शन है । ( १ रचनानुपपत्त्यधिकरणम् सू ० १-१० ) रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥ १ ॥

पदच्छेद - रचनानुपपत्तेः, च, न, अनुमानम् । सूत्रार्थ - ( अनुमानम् ) जगत् सुख दुःख मोहात्मक वस्तुसे उत्पन्न मोहसे अन्वित है, जैसे घट मृत्तिकासे उत्पन्न होकर मृत्तिकासे अन्वित है । ( न ) जगत्का उपादानकारण नहीं हो सकता, ( रचनानुपपत्तेश्च ) क्योंकि जड़ रचना नहीं हो सकती है । ३ ९९ हुआ है, क्योंकि सुख दुःख इस अनुमानसे सिद्ध प्रधान प्रधानसे विचित्र जगत्क * यद्यपीदं वैदान्तवाक्याना मैदंपर्यं निरूपयितुं शास्त्रं प्रवृत्तं न तर्कशास्त्रवत्केवला-भिर्युक्तिभिः कंचित्सिद्धान्तं साधयितुं दूषयितुं वाप्रवृत्तम्, तथापि वेदान्तवाक्यानि व्याच-क्षाणैः सम्यग्दर्शनप्रतिपक्षभूतानि सांख्यादिदर्शनानि निराकरणीयानीति तदर्थः परः पादः प्रवर्तते । वेदान्तार्थनिर्णयस्य च सम्यग्दर्शनार्थत्वात्तन्निर्णयेन स्वपक्षस्थापनं प्रथमं कृतं तद्धयभ्यर्हितं परपक्षप्रत्याख्यानादिति । ननु मुमुक्षूणां मोक्षसाधनत्वेन सम्यग्दर्शन-निरूपणाय स्वपक्षस्थापनमेव केवलं कर्तुं युक्तं किं परपक्षनिराकरणेन परद्वेषकरेण? बाढमे-वम्; तथापि महाजनपरिगृहीतानि महान्ति सांख्यादितन्त्राणि सम्यग्दर्शनापदेशेन प्रवृत्ता-न्युपलभ्य भवेत्केषां चिन्मन्दमतीना मेतान्यपि सम्यग्दर्शनायोपादेयानीत्यपेक्षा । तथा युक्ति-गाढत्वसंभवेन सर्वज्ञभाषितत्वाच्च श्रद्धा च तेषु इत्यतस्तदसारतोपपादनाय प्रयत्यते । ननु ' ईक्षतेन शब्दम् ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | ५ ), ' कामाच्च नानुमानापेक्षा ' ( ब ० सू ० १।१।१८ ) ' एतेन सर्वे व्याख्याता यद्यपि यह शास्त्र वेदान्तवाक्यों का इदं परत्व - ब्रह्मतत्त्वं परत्व निरूपण करने के लिए प्रवृत्त हुआ है, तर्कशास्त्र के समान केवल युक्तियोंसे किसी सिद्धान्तको सिद्ध करने या दूषित करनेके लिए प्रवृत्त नहीं हुआ है, तो मी वेदान्तवाक्योंका व्याख्यान करनेवालेको सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षभूत सांख्यादि दर्शनोंका निराकरण करना चाहिए, इसके लिए द्वितीय पाद प्रवृत्त होता है । वेदान्तार्थका निर्णय तत्त्वज्ञान के लिए है, अत: उस निर्णयसे प्रथम स्वपक्षकी स्थापना की, क्योंकि अन्यपक्षके खण्डन करने की अपेक्षा वह अभ्यर्हित - अधिक अभीष्ट है । परन्तु मुमुक्षुओंके मोक्ष प्राप्ति के साधनरूपसे तत्त्व-ज्ञाननिरूपण करनेके लिए केवल स्वपक्षका स्थापन करना ही युक्त है, दूसरेके साथ द्वेषकर अन्य मतके खण्डन करनेसे क्या प्रयोजन? यह ठीक है, तो भी बड़े - बड़े सांख्य आदि शास्त्र महाजनों से परिगृहीत हैं और तत्त्वज्ञान निरूपणके बहानेसे प्रवृत्त हुए उनको प्राप्तकर कुछ मन्दमतियोंकी यह अपेक्षा हो कि वे भी तत्त्वज्ञानके लिए उपादेय हैं । और उसी प्रकार उनमें दृढतर युक्तियोंके सम्भव होनेसे और सर्वज्ञसे उपदिष्ट होनेसे उनमें उनकी श्रद्धा भी हो सकती है, इसलिए वे शास्त्र असार हैं, ऐसा उप-पादन करने के लिए प्रयत्न किया जाता है । परन्तु ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' ' कामाच्च नानुमानापेक्षा ' ' एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ' इत्यादि सूत्रोंसे पूर्व में भी सांख्यादि पक्षोंका खण्डन किया गया है, तो पुनः किए सत्यानन्दी - दीपिका * गत पादमें वेदान्त समन्वयके विरोधका स्मृति और तकसे परिहार किया गया और ब्रह्म में जगत् - कारणत्वके अनुकूल सर्वज्ञत्वादि धर्मोका श्रुतिद्वारा उपपादन और सांख्यादिद्वारा लगाये गये विलक्षणत्वादि दोषों का स्मृति और युक्तिसे परिहार किया गया । अब इस पादमें श्रुति निरपेक्ष केवल

पृष्ठ 434

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 434 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ व्याख्याताः ' ( ब्र ० सू ० १ | ४ | २८ ) इति च पूर्वत्रापि सांख्यादिपक्षप्रतिक्षेपः कृतः, किं पुनः कृत करणेनेति? 8 तदुच्यते - सांख्यादयः स्वपचस्थापन | वेदान्तवाक्यान्यप्युदाहृत्य स्वपक्षानुगुण्येनैव योजयन्तो व्याचक्षते, तेषां यद्व्याख्यानं तद्व्याख्यानाभासं न सभ्य-व्याख्यानमित्येतावत्पूर्वं कृतम्, इह तु वाक्यनिरपेक्षः स्वतन्त्रस्तद्युक्तिप्रतिषेधः क्रियत इत्येष विशेषः । तत्र सांख्या मन्यन्ते - यथा घटशरावादयो भेदा मृदात्मनाऽन्वीयमाना मृदात्मक सामान्यपूर्वका लोके दृष्टाः, तथा सर्व एव बाह्यांध्यात्मिका भेदाः सुखदुःखमोहात्म-हुए को करने से क्या लाभ? इसपर कहते हैं - सांख्यादि अपने पक्ष की स्थापना करनेके लिए वेदान्त-वाक्योंका उदाहरण देकर स्वपक्ष के अनुसार ही उनकी योजना करते हुए व्याख्यान करते हैं, उनका जो व्याख्यान है, वह व्याख्यानामास है, सम्यग्व्याख्यान नहीं है । इतना ही पूर्व प्रतिपादन किया गया है । इस पादमें तो वेदान्तवाक्योंकी अपेक्षा न रखते हुए स्वतन्त्ररूपसे उनकी युक्तियोंका प्रतिषेध किया जाता है, यही विशेष है । यहाँ सांख्य ऐसा मानते हैं- जैसे लोकमें घट शराव आदि कार्य मृत्तिकारूपसे अन्वित होते हुए मृत्तिकारूप सामान्य कारण पूर्वक देखे जाते हैं, वैसे ही सब बाह्य और आध्यात्मिक कार्य सुखदुःखमोहरूप से अन्वित होते हुए सुखदुःखमोहरूप सामान्य कारण पूर्वक होने चाहिए । जो सत्यानन्दी - दीपिका युक्तियोंद्वारा परपक्षका खण्डन किया जाता है । इस शास्त्र के आरम्भका मुख्य प्रयोजन तत्त्वनिर्णय है उसकी सिद्धि तब तक नहीं हो सकती जब तक परमतमें भ्रान्ति मूलकता सिद्ध न हो, उसकी सिद्धि अपने सिद्धान्तके संरक्षण और ब्रह्मकी सिद्धिसे हो सकती है । तत्त्वनिर्णयके लिए परपक्षका खण्डन द्वेष नहीं है । भ्रान्तिमूलक मार्गका अनुसरण करनेवाले मन्दबुद्धिवालोंको वहाँसे हटाकर यथार्थ मार्ग पर लाना ही वास्तव में परहित है । अतः भ्रान्ति मूलक परपक्षका खण्डन करना युक्त है । * पूर्वपाद और इस पादमें अर्थके भेद होनेसे पुनरुक्ति नहीं है । अचेतन प्रधान जगत्का उपादानकारण है यह सांख्यसिद्धान्त इस अधिकरणका विषय है । वह प्रमाण मूलक है वा भ्रान्ति-मूलक? ऐसा सन्देह उपस्थित होनेपर ' सर्वधर्मोपपत्तेश्व ' इस सूत्र में प्रतिपादित सब धर्मोका प्रधानमें सम्भव है, अतः प्रधान ही जगत्का उपादानकारण 1 इस प्रकार आक्षेपसंगतिसे सांख्यसिद्धान्त प्रमाण मूलक है, ऐसा दिखाते हुए ' तत्र सांख्या ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं । इसे पादकें सब अधिकरण परमत निरासात्मक हैं, इसलिए सब अधिकरणोंकी पाद संगति है । पूर्वपक्षमें प्रमाणमूलक सांख्यके विरोधसे ब्रह्ममें श्रुति समन्यवकी असिद्धि फल है और सिद्धान्तमें उसकी सिद्धि फल है, ऐसा, पाद समाप्ति तक समझना चाहिए । जो कार्य स्थूलतासे लेकर सूक्ष्मता पर्यन्त जिससे अन्त्रित - सम्बद्ध होते हैं, वे तत्, तत् उपादानकारणवाले होते हैं, यह व्याप्ति है । कारणमें सुखात्मकता सत्त्व, दुःखा-त्मकता रज और मोहात्मकता तमोगुणसे है, इसलिए कारण त्रिगुणात्मक है । अतएव प्रत्येक भाव कार्य भी त्रिगुणात्मक है । मृत्सुवर्ण आदिके समान प्रधान अचेतन है, चेतन पुरुषके भोग और मोक्षरूप पुरुषार्थं सिद्धिके लिए स्वभावसे महदादि विचित्र कार्यरूपसे प्रवृत्त होता है । जैसे कि ' पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित्कार्यंते करणम् ' ( सां ० का ० ३१ ) ( इसकी प्रवृत्ति में पुरुषका भोग और मोक्षरूप पुरुषार्थं ही कारण है, किसी अन्य चेतनसे प्रेरित नहीं होता ) किञ्च ' भेदानां परिमाणात्समन्वयाच्छ-क्तितः प्रवृत्तेश्च । कारणकार्यविभागादविभागाद्वैश्वरूप्यस्य ' ॥ ( सां ० का ० १५ ) ( विकारोंके परिमाणसे, समन्वयसे, शक्तिकी प्रवृत्तिसे और कारणसे विचित्र कार्यके विभाग और अविभागसे प्रधान सिद्ध होता है ) इस कारिका में समन्वय लिङ्गका तो व्याख्यान किया गया है । दूसरा हेतु-' क्षित्यादीनां भेदानां कारणमव्यक्तमस्ति परिमितत्वात् घटवत् ' ' पृथिवी आदि विकारोंका कारण अव्यक्त है, क्योंकि वे घट आदिके समान परिमित हैं । ' जैसे घटादि कार्योंकी मृत्तिकारूप कारणशक्ति से

पृष्ठ 435

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 435 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० १ ] भाषा नुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४०१ तयाऽन्वीयमानाः सुखःदुख मोहात्मक सामान्यपूर्वका भवितुमहन्ति । यत्सुखदुःखमोहा-त्मकं सामान्यं तत्रिगुणं प्रधानं मृद्वदचेतनं चेतनस्य पुरुषस्यार्थं साधयितुं स्वभावेनैव विचित्रेण विकारात्मना प्रवर्तत इति । तथा परिमाणादिभिरपि लिङ्गैस्तदेव प्रधानमनु-मिमते । * तत्र वदामः -- यदि दृष्टान्तबलेनैवैतन्निरूप्येत, नाचेतनं लोके चेतनानधिष्ठितं स्वतन्त्रं किंचिद्विशिष्टपुरुषार्थ निर्वर्तनसमर्थान्विकारान्विरचयदृद्दष्टम् । गेहप्रासादश-यनासनविहारभूम्यादयो हि लोके प्रज्ञावद्भिः शिल्पिभिर्यथाकालं सुखदुःखप्राप्तिपरिहा-रयोग्या रचिता दृश्यन्ते । तथेदं जगदखिलं पृथिव्यादि नानाकर्मफलोपभोगयोग्यं बाह्यम्, आध्यात्मिकं च शरीरादि नानाजात्यन्वितं प्रतिनियतावयवविन्यासमनेककर्म-फलानुभवाधिष्ठानं दृश्यमानं प्रज्ञावद्भिः संभाविततमैः शिल्पिभिर्मनसाप्यालोचयितुम-शक्यं सत् कथमचेतनं प्रधानं रचयेत्? लोष्टपाषाणादिष्वदृष्टत्वात् । मृदादिष्वपि कुम्भ-काराद्यधिष्ठितेषु विशिष्टाकारा रचना दृश्यते, तद्वत्प्रधानस्यापि चेतनान्तराधिष्ठितत्व-प्रसङ्गः । नच मृदाद्युपादानस्वरूपव्यपाश्रयेणैव धर्मेण मूलकारणमवधारणीयं न सुख दुःखमोहात्मक सामान्य ( कारण ) है वह त्रिगुणात्मक प्रधान मृत्तिकाके समान अचेतन चेतन पुरुषके भोग और मोक्षरूप प्रयोजनको सिद्ध करनेके लिए स्वभावसे ही विचित्र विकाररूपसे प्रवृत्त होता है । उसी प्रकार कार्यगत परिमाणादि लिङ्गोंसे भी उसी प्रधानका वे अनुमान करते हैं । उसपर हम कहते हैं -- यदि दृष्टान्तके बलसे ही यह निरूपण करें, तो लोकमें चेतनसे अनधिष्ठित स्वतन्त्ररूपसे अचेतन विशिष्ट पुरुषार्थ के संपादन करनेमें समर्थं विकारोंकी रचना करता हुआ नहीं देखा जाता । लोकमें गृह, महल, शयन, आसन, विहारभूमि आदि समयके अनुसार बुद्धिमान् शिल्पियों द्वारा सुख प्राप्ति और दुःख परिहारके योग्य रचे गये देखे जाते हैं, वैसे भिन्न - भिन्न कर्मफलके उपभोग योग्य पृथिव्यादि यह सम्पूर्ण बाह्य जगत् और अनेक प्रकारकी जातियोंसे सम्बद्ध असाधारण अवयवोंसे युक्त अनेक कर्मफलोंके अनुभवका आश्रय दृश्यमान शरीर आदि आध्यात्मिक जगत्, जिसकी आलोचना बड़े - बड़े बुद्धिमान् शिल्पियों द्वारा मनसे भी नहीं की जा सकती, उसकी रचना अचेतन प्रधान कैसे कर सकता है? क्योंकि अचेतन लोष्ट, पाषाण आदिमें नहीं देखा जाता है, किन्तु कुलाल आदि अधिष्ठित मृत्तिका आदिमें विशिष्ट आकार रचना देखी जाती है । इस प्रकार प्रधानको भी अन्य चेतनसे अधिष्ठित मानना पड़ेगा । मृत्तिका आदि उपादान स्वरूपके व्यपाश्रित धर्मसे ही मूल-सत्यानन्दी - दीपिका प्रवृत्ति होती है, वैसे महद् आदि विकारोंकी भी कारण शक्तिसे प्रवृत्ति कहना चाहिए, वह शक्ति युक्त कारण प्रधान है । कारणसे विचित्र कार्यकी उत्पत्ति देखी जाती है, जैसे मृत्तिकासे घटादिकी, यह विभाग है और उत्पत्तिके विपरीत कारणमें कार्यके लीन होनेका नाम अविभाग है, यथा घट मृत्तिकामें, मृत्तिका पृथिवीमें, पृथिवी जलमें लीन होती है, इत्यादि हेतुमसे प्रधानका अनुमान होता है । इस प्रकार अव्यक्त प्रधान जगत्‌का उपादानकारण सिद्ध होता है । * सिद्धान्ती ---- – क्या इन अनुमानोंसे जगत्का उपादानकारण अचेतन सिद्ध करते हो अथवा स्वतन्त्र अचेतन? प्रथम प्रक्षमें तो सिद्ध साधन दोष है, क्योंकि ईश्वरसे अधिष्ठित अनादि त्रिगुणात्मक मायाको जगत्का उपादान हम भी स्वीकार करते हैं । द्वितीय पक्षका ग्रहण करें तो घट आदि दृष्टान्तोंमें साध्य अप्रसिद्ध है, क्योंकि मृत्तिका आदि चेतनोंसे अधिष्ठित होकर घट आदि कार्योंके उपादान होते हैं । यह नियम कार्य जगत् में भी है । ' जगत् चेतनानधिष्ठिताचेतनप्रकृतिकं समन्वयात् मृदादिवत् । ' ( यह जगत् चेतनसे अनधिष्ठित अचेतन प्रकृतिक है, क्योंकि समन्वय है जैसे मृदादि ) इस पूर्वपक्षीके अनुमान में समन्वयरूप हेतु साध्यके अभावका साधक होनेसे विरुद्ध हेतु है अर्थात् मृत्सुवणं आदि दृष्टान्तोंमें यह हेतु चेतनसे अनधिष्ठित नहीं किन्तु कुलालादि चेतनोंसे अधिष्ठित अचेतन कारणत्व सिद्ध करता है,

पृष्ठ 436

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 436 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०२ ब्रह्मसूत्र -- शाङ्करभाष्य [ अ ०२ पा ० २ बाह्यकुम्भकारा दिव्यपाश्रयेणेति किंचिन्नियामकमस्ति । न चैवं सति किंचिद्विरुध्यते, प्रत्युत श्रुतिरनुगृह्यते, चेतनकारणसमर्पणात् । अतो रचनानुपपत्तेश्च हेतोर्ना चेतनं जगत्का-रणमनुमातव्यं भवति । अन्वयाद्यनुपपत्तेश्चेति चशब्देन हेतोरसिद्धिं समुच्चिनोति । न हि बाह्याध्यात्मिकानां भेदानां सुखदुःखमोहात्मकतयान्वय उपपद्यते, सुखादीनां चान्तरत्वप्र-तीतेः " शब्दादीनां चातद्रूपत्वप्रतीतेः । तन्निमित्तत्वप्रतीतेश्च, शब्दाद्य विशेषेऽपि च भावाना-विशेषात्सुखादिविशेषोपलब्धेः । तथा परिमितानां भेदानां मूलाङ्करादीनां संसर्गपूर्वकत्वं वात्मिकानां भेदानां परिमितत्वात्संसर्गपूर्वकत्वमनुमिमानस्य सत्त्वरजस्त-कारणका निश्चय करना चाहिए और बाह्य कुलालादिके व्यापश्रित धर्मसे नहीं करना चाहिए, ऐसा कोई नियामक नहीं है | ऐसा होनेपर कुछ विरुद्ध नहीं है, प्रत्युत श्रुति अनुगृहीत होती है, क्योंकि वह चेतनमें कारणत्व समर्पण ( वर्णन ) करती है । अतएव रचनानुपपत्तिरूप हेतुसे अचेतन जगत्का कारण है, ऐसा अनुमान करना उचित नहीं है, और ' अन्वयाद्यनुपपत्तेश्च अन्वयादिकी अनुपपत्ति होने से, इस हेतुकी असिद्धि ( स्वरूपासिद्धि ) का मी ' च ' शब्द से समुच्चय करते हैं । बाह्य और आध्यात्मिक विकारोंका सुखदुःख मोहात्मकता के साथ अन्वय उपपन्न नहीं होता, क्योंकि सुखादि आन्तर प्रतीत होते हैं और शब्दादि अतद्रूप - बाह्य प्रतीत होते हैं और सुखादिके निमित्तरूपसे प्रतीत होते हैं, शब्दादिके विशेष न होनेपर भी भावनाविशेषसे सुख आदि विशेषकी उप-लब्धि होती है । इसीप्रकार मुलाङ्करादि परिमित विकारोंको संसर्ग पूर्वक देखकर बाह्य और आध्या-त्मिक विकार परिमित होनेसे संसर्ग पूर्वक हैं ऐसा अनुमान करनेवालेको सत्त्व, रज और तम मी संसगं सत्यानन्दी - दीपिका अतः व्यभिचारी है । दूसरा दोष यह है कि साध्य सिद्धि के लिये दृष्टान्त भी नहीं है, क्योंकि घटादि तो चेतन अधिष्ठित अचेतन प्रकृतिवाले हैं, अतः जगद्रूप पक्षमें साध्य सिद्ध नहीं हो सकता, इससे इस अनुमानमें साध्य अत्रसिद्ध दोष भी है । सत्प्रतिपक्ष दोष भी है, क्योंकि पूर्वपक्ष कृत साध्याभावका साधक अन्य हेतु भी है— जैसे ' विचित्ररचनात्मकं कार्यं ( जगत् ) चेतनाधिष्ठिताचेतन प्रकृतिकं कार्यत्वात् गृहादिवत् ' ' यह विचित्र कार्यं जगत् चेतनसे अधिष्ठित अचेतन प्रकृतिवाला है, क्योंकि गृह आदि समान यह कार्य है । ' यदि इसमें सांख्यवादी कहे कि ' रचनानुपपत्तेः ' हेतुसे प्रधान सिद्ध होता है । यदि अचेतनको जगत्का कारण नहीं मानें, तो जगत् में विचित्रता सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि चेतन एक रस है । विचित्ररचना अनुपपत न हो इसलिए अचेतन प्रधान जगत्का कारण मानना चाहिए । परन्तु ' रचनानुपपत्तेः ' यह हेतु मो विरुद्ध है, क्योंकि गृह आदिमें विचित्रता चेतन बुद्धिमान् शिल्पियों द्वारा उपलब्ध है अचेतनसे नहीं, समन्वयरूप हेतु जगद्रूप पक्ष में न रहनेसे स्वरूपा-सिद्धि दोष ग्रस्त है, कारण कि जगत् सुख दुःख, मोहसे अन्वित नही है, सुखादि खान्तर और आध्या-त्मिक हैं जब कि जगत् बाह्य है! * यदि चन्दन आदि बाह्य पदार्थं स्वभावसे सुखादिरूप होते, तो ग्रीष्म ऋतुके समान हेम-ऋतुमें भी सुखकर होते, कुसुम हेमॠतुके समान ग्रीष्मऋतुमें भी सुखकर होता, कण्टक उष्ट्र के लिए सुखकर है इसलिए मनुष्यादिके लिए भी हो, यह नियम नहीं है । इस विषय में नैषधकार श्रीहर्ष का यह श्लोक बिल्कुल उपयुक्त है-क्रमेलकं निन्दति कोमलेच्छुः क्रमेलकः कण्टकलम्पटस्तम् । प्रीतौ तयोरिष्टभुजोः समायां मध्यस्थता नैकतरोपहासः ' ॥ ( नैष ० ६।१०४ ) ( मृदु वस्तु अभिलाषी पुरुष कठिन कण्टक मक्षी उष्ट्रकी निन्दा करता है, कण्टकाशी उष्ट्र मृदु आशीकी निन्दा करता है । अपनी - अपनी इष्ट वस्तुके भक्षणमें दोनोंकी प्रीति समान है, किसीका

पृष्ठ 437

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 437 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४०३ मसामपि संसर्गपूर्वकत्वप्रसङ्गः, परिमितत्वाविशेषात् । कार्यकारणभावस्तु प्रेक्षापूर्वक निर्मितानां शयनासनादीनां दृष्ट इति न कार्यकारणभावाद्वाह्याध्यात्मिकानां भेदानाम-चेतनपूर्वकत्वं शक्यं कल्पयितुम् ॥ १ ॥

प्रवृत्तेश्व || २ || पदच्छेद – प्रवृतेः च । सूत्रार्थ - अचेतन प्रधानकी साम्यावस्थाकी प्रच्युतिरूप प्रवृत्ति चेतनके विना उपपन्न नहीं हो सकती, इसलिए भी प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता । * अस्तां तावदियं रचना । तत्सिद्ध्यर्था या प्रवृत्तिः साम्यावस्थानात्प्रच्युतिः सत्त्व-रजस्तमसामङ्गाङ्गिभावरूपापत्तिर्विशिष्टकार्याभिमुख प्रवृत्तिता, सापि नाचेतनस्य प्रघानस्य स्वतन्त्रस्योपपद्यते, मृदादिष्वदर्शनाद्रथादिषु च । नहिं मृदादयो रथादयो वा स्वयमचेतनाः सन्तश्चेतनैः कुलालादिभिरश्वादिभिर्वानधिष्ठिता विशिष्टकार्याभिमुखप्रवृत्तयो दृश्यन्ते, दृष्ट्राश्चादृष्टसिद्धिः । अतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेरपि हेतोर्नाचेतनं जगत्कारणमनुमातव्यं भवति । पूर्वक मानने पड़ेंगे, क्योंकि उनमें भी परिमितत्व समान है । प्रेक्षा ( बुद्धि ) पूर्वक निर्मित शयन, आसन आदिका कार्य - कारणमाव देखा गया है, अतः कार्यकारणभाव होनेसे बाह्य और आध्यात्मिक विकारोंमें अचेतन पूर्वकत्वकी कल्पना नहीं की जा सकती है ॥ १ ॥

इस विचित्र रचनाको रहने दो, उस रचनाकी सिद्धि के लिए जो प्रधानकी साम्यावस्था से प्रच्युतिरूप प्रवृत्ति अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंके अङ्गाङ्गिभावकी आपत्ति ( प्राप्तिरूप ) विशेष कार्यके संपादनके लिए जो प्रवृत्तिता है वह भी स्वतन्त्र अचेतन प्रधानकी नहीं हो सकती, क्योंकि मृत्तिका आदि और रथ आदि में स्वतन्त्र प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । मृत्तिका आदि अथवा रथ आदि स्वयं अचेतन होते हुए चेतन कुलाल बादि अथवा अश्व आदिसे अनधिष्ठित होकर विशिष्ट कार्य अभिमुख प्रवृत्तिवाले नहीं देखे जाते, और दृष्टसे अदृष्टकी सिद्धि होती है । इसलिए ' प्रवृत्त्यनु-पपत्तेः ' प्रवृत्तिकी अनुपपत्तिरूप हेतुसे भी अचेतन जगत्‌का कारण अनुमातव्य नहीं है । परन्तु केवल सत्यानन्दी - दीपिका उपहास करना ठीक नहीं, किन्तु मध्यस्थता ठीक है ) इसलिए कोई भी वस्तु सुखादिरूप नहीं है । असुख आदिरूप होते हुए मी चन्दन आदि जाति, काल और अवस्था आदिसे सुख आदिके हेतु देखे जाते हैं । शब्दादि विषय एक होनेपर भी पुरुष वासनाके वैचित्र्यसे उसमें किसोको सुख बुद्धि, किसीकी दु: ख बुद्धि और किसीकी मोह बुद्धि होती है । इस प्रकार ' समन्वयात् ' इस हेतुको दूषितकर अब ' परिमाणात् ' आदि हेतुमको ' तथा ' इत्यादिसे दूषित करते हैं । प्रधानवादीका यह अनुमान है-' जगत् संसर्गपूर्वकं परिमाणात् घटादिवत् ' ( यह जगत् कारण सम्बन्धपूर्वक है, क्योंकि घटादिके समान परिमित है ) । ' जो जो परिमित होता है वह वह संसर्ग पूर्वक होता है ' ' यह व्याप्ति है ', परन्तु इस व्याप्तिका सत्त्व आदि गुणोंमें व्यभिचार है, क्योंकि उनमें परिमितत्व हेतु तो है किन्तु साध्य नहीं है, कारण कि वे नित्य और निरवयव हैं, अतः व्यभिचारी हेतुसे जगत् में कारण संसर्गपूर्वकत्व साध्य सिद्ध नहीं हो सकता । सदृशोंमें ही कार्यकारणभाव होता है विकार अचेतनप्रकृतिक होते हैं, इस नियम-का ' न विलक्षणत्वात् ' ( ब्र ० सू ० २1१1४ ) इस सूत्रमें निराकरण किया गया है | चेतनाधिष्ठित अचेतन प्रकृतिकत्वका ग्रहण करनेसे भी सादृश्य बन सकता है । इसप्रकार कारिकागत ' शक्तितः प्रवृत्तेश्व ' इस हेतुका मी चेतनाधिष्ठित कारण शक्तिसे कार्यका समव हो सकता है, तो केवल कारण शक्ति कार्यकी प्रवृत्ति होती हैं, यह हेतु अन्यथासिद्ध है ॥ १ ॥

* अचेतन प्रधान स्वतन्त्ररूपसे जगत्का कारण है, ऐसा अनुमान नहीं करना चाहिए

पृष्ठ 438

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 438 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ ननु चेतनस्यापि प्रवृत्तिः केवलस्य न दृष्टा, सत्यमेतत्? तथापि चेतन संयुक्तस्य रथादेर-चेतनस्य प्रवृत्तिर्दृष्टा, न त्वचेतन संयुक्तस्य चेतनस्य प्रवृत्तिर्दृष्टा । किं पुनरत्र युक्तम्? यस्मिन्प्रवृत्तिर्दृष्टा तस्य सा, उत यत्संप्रयुक्तस्य दृष्टा तस्य सेति? ननु यस्मिन्दृश्यते प्रवृत्तिस्तस्यैव सेति युक्तम्, उभयोः प्रत्यक्षत्वात् । नतु प्रवृत्त्याश्रयत्वेन केवलश्चेतनो रथादिवत्प्रत्यक्षः । प्रवृत्त्याश्रयदेहादिसंयुक्तस्यैव तु चेतनस्य सद्भावसिद्धिः केवलाचेत-नरथादिवैलक्षण्यं जीवद्देहस्य दृष्टमिति । अत एव च प्रत्यक्षे देहे सति दर्शनादसति चादर्शनाद्देहस्यैव चैतन्यमपीति लौकायतिकाः प्रतिपन्नाः । तस्मादचेतनस्यैव प्रवृत्तिरिति । तदभिधीयते - न ब्रूमो यस्मिन्नचेतने प्रवृत्तिर्दृश्यते न तस्य सेति । भवतु तस्यैव सा । सा तु चेतनाद्भवतीति ब्रूमः, तद्भावे भावात्तदभावे चाभावात् " यथा काष्ठा-दिव्यपाश्रयापि दाहप्रकाशलक्षणा विक्रियाऽनुपलभ्यमानापि च केवले ज्वलने ज्वलनादेव भवति, तत्संयोगे दर्शनात्तद्वियोगे चादर्शनात्, तद्वत् । लौकायतिकानामपि चेतन एव देहोऽचेतनानां रथादीनां प्रवर्तको दृष्ट इत्यविप्रतिषिद्धं चेतनस्य प्रवर्तकत्वम् । चेतनमें भी प्रवृत्ति नहीं देखी गई है? यह ठीक है, तो भी चेतन संयुक्त अचेतन रथ आदिकी प्रवृत्ति देखी जाती है | अचेतन संयुक्त चेतनकी भी तो प्रवृत्ति नहीं देखी जाती, तो इन दोनों में कौन युक्ति युक्त है? जिसमें प्रवृत्ति देख | जाती है उसकी वह प्रवृत्ति है अथवा जिसके संसर्गसे अचेतन में प्रवृत्ति देखी जाती है उसकी है? पूर्वपक्षी - जिसमें प्रवृत्ति देखी जाती है वह उसकी है, ऐसा युक्त है, क्योंकि प्रवृत्ति और उसका आश्रय दोनों प्रत्यक्ष हैं । परन्तु केवल चेतन रथादिके समान प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष नहीं है, किन्तु प्रवृत्तिके आश्रयभूत देहादिसे संयुक्त होकर ही चेतंनके सद्भाव ( अस्तित्व ) की सिद्धि होती है, क्योंकि जीवित देहमें केवल अचेतन रथादिसे वैलक्षण्य देखा जाता है । अतएव देहके प्रत्यक्ष होनेपर चैतन्य दिखाई देता है और देहके प्रत्यक्ष न होनेपर चैतन्य दिखाई नहीं देता, इससे देह ही चेतन है, ऐसा लौकायितक ( चार्वाक ) मानते हैं । इसलिए अचेतनकी ही प्रवृत्ति है । सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं - हम यह नहीं कहते हैं कि जो अचेतनमें प्रवृत्ति देखी जाती है वह उसकी नहीं है, वह उसीकी हो, परन्तु वह तो चेतनसे होती है, ऐसा हम कहते हैं, क्योंकि चेतनके होनेपर उसका अस्तित्व है और चेतनके अभाव में अभाव है, जैसे काष्ठ आदिके आश्रित दाह और प्रकाशरूप विक्रिया केवल अग्निमें उपलभ्यमान न होनेपर भी अग्नि से ही होती है, क्योंकि काष्ठ आदिसे अग्निका संयोग होनेपर वह दिखाई देती है और वियोग होनेपर नहीं दिखाई देती, वैसे ही चेतनके साथ संयोग होनेपर शरीर आदिमें प्रवृत्ति देखी जाती है और उसके अभावमें नहीं देखी जाती । चार्वाकों के मत में भी चेतन देह ही अचेतन रथ आदिका प्रर्वतक माना गया है । इसलिए चेतनके प्रवर्तक होनेमें कोई विरोध नहीं है । ऐसा यदि कहो कि तुम्हारे मत में देहादिसे सत्यानन्दी - दीपिका क्योंकि सृष्टिके लिए उसमें प्रवृत्ति उपपन्न नहीं होती है । इसप्रकार सूत्रस्थ ' च ' शब्दसे इस सूत्र में पूर्वसूत्रसे ' अनुपपत्तेः ' पदकी अनुवृत्तिकर सूत्रकी योजना करनी चाहिए अर्थात् ' प्रवृत्तेश्वानुपपत्तेर्ना -नुमानं कारणम् ' ( प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति होनेसे अनुमान - प्रधान कारण नहीं है ) ऐसी सूत्र की योजना है । गुणोंकी साम्यावस्था हो महद् आदि तत्त्वोंका प्रलय है, उसमें कोई कार्य नहीं होता । सृष्टिके आरम्भमें गुणोंकी साम्यावस्थाकी प्रच्युतिरूप विषमता होती है । इन तीनों गुणोंमें जो गुण कार्योन्मुख होता है, वह प्रधान - अङ्गी है, शेष दो गुग उसके अङ्ग होकर रहते हैं, इसप्रकार अङ्गाङ्गिभाव होता है । ऐसा होनेपर महद्, अहंकार आदिमें कार्योत्पादनरूप प्रवृत्ति होती है । उससे ही यह देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि शरीरोंका परस्पर विलक्षण अवयव विन्यास होता है, यही रचना है, यह सांख्यों की प्रक्रिया है । सिद्धान्ती -- ' गुणानां प्रवृत्तिः चेतनाधिष्ठानपूर्विका प्रवृत्तित्वात् रथादिप्रवृत्तिवत् ' ( गुणों की

पृष्ठ 439

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 439 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४०५ * ननु तव देहादिसंयुक्तस्याप्यात्मनो विज्ञानस्वरूपमात्रव्यतिरेकेण प्रवृत्त्यनुपपत्तेरनुप-पनं प्रवर्तकत्वमिति चेत् - न, अयस्कान्तवद्रूपादिवच्च प्रवृत्तिरहितस्यापि प्रवर्तकत्वोपपत्तेः । यथाऽयस्कान्तो मणिः स्वयं प्रवृत्तिरहितोऽप्ययसः प्रवर्तको भवति, यथा वा रूपादयो विषयाः स्वयं प्रवृतिरहिता अपि चक्षुरादीनां प्रवर्तका भवन्ति । एवं प्रवृत्तिरहितोऽपीश्वरः सर्वगतः सर्वात्मा सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च सन् सर्वं प्रवर्तयेदित्युपपन्नम् । एकत्वात्प्रवर्त्या भावे प्रवर्तकत्वानुपपत्तिरिति चेत् न, अविद्याप्रत्युपस्थापित नामरूपमाया वेशवशेना-सकृत्प्रत्युक्तत्वात् । तस्मात्संभवति प्रवृत्तिः सर्वज्ञकारणत्वे, न त्वचेतनकारणत्वे ॥२ ॥

पयोम्बुवचेत्तत्रापि ॥ ३ ॥

पदच्छेद --- पयोम्बुवत्, चेत्, तत्र, अपि । सूत्रार्थ - ( पयोम्बुवत् ) जैसे दूध बछड़े के पोषण के लिए स्वयं प्रवृत्त होता है, और जल स्वयं बहता है, वैसे प्रधान भी स्वयं प्रवृत्त होता है । ( चेत् ) ऐसा यदि कहो तो ( तत्रापि ) उनमें मी चेतन-अधिष्ठित प्रवृत्ति है, क्योंकि ' योऽप्सु तिष्ठन् ' इत्यादि श्रुतियाँ हैं, अतः प्रधान जगत्का कारण नहीं है । संयुक्त भी आत्माके विज्ञानस्वरूपमात्र से अतिरिक्त प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति होने से प्रवर्तकत्व अनुपपन्न है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अयस्कान्तमणि ( लोहचुम्बक ) और रूपादिके समान प्रवृत्ति रहित वस्तुमें मी प्रवर्तकत्व हो सकता है I । जैसे अयस्कान्तमणि स्वयं प्रवृत्ति रहित होता हुआ भी लोहका प्रवर्तक होता हैं, अथवा जैसे रूपादि विषय स्वयं प्रवृत्ति रहित होते हुए मी चक्षु आदिके प्रवर्तक होते हैं । वैसे ही प्रवृत्ति रहित होता हुआ भी ईश्वर सर्वगत, सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् होकर सबको प्रवृत्त करे, यह युक्त है । यदि कहो कि एकत्वके कारण प्रवत्येके न होनेपर प्रवर्तकत्व अनुपपन्न है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्यासे प्रत्युपस्थापित नाम रूपात्मक मायाके आवेशके बलसे [ चेतनमें ईश्वर भाव और प्रवत्यं प्रवर्तक भाव उपपन्न है ] ऐसा अनेक वार निराकरण किया गया है । इसलिए सर्वज्ञको कारण माननेवर प्रवृत्ति संभव है किन्तु अचेतनको कारण मानने में नहीं ॥ २ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका प्रवृत्ति चेतनाधिष्ठानपूर्वक होती है, क्योंकि रथादि प्रवृत्तिके समान यह भी प्रवृत्ति है ) दृष्टके अनुसार ही अदृष्टकी कल्पना की जाती है । अनुमानकी शरण लेनेवालेको दृष्टान्तके विना अतीन्द्रि-यार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती । परन्तु ' जीवद्देहः सात्मकः प्राणादिमत्त्वात् यन्नैवं तन्नैवं रथादिवत् ' ( जीवित देह आत्मासे युक्त है, क्योंकि उसमें प्राण आदि हैं, व्यतिरेक दृष्टान्त रथादि हैं ) इससे चेतनकी सिद्धि होती है | परन्तु वह प्रवर्तक है यह सिद्ध नहीं होता, इसलिए देह ही आत्मा है, यह चार्वाकका मत है । इसलिए अचेतनकी प्रवृत्ति है । * ‘ यः प्रवर्तकः स स्वयं प्रवृत्तिमान् अश्वादिवत् ' ( जो प्रवर्तक है जैसे अश्वादि ) इस प्रकार व्याप्ति के होनेसे आत्मामें व्यापक प्रवृत्तिमत्त्वके न हीं है अर्थात् आत्मा प्रवृत्ति रहित होनेसे प्रवर्तक नहीं है, अतः अचे उन है किन्तु अपनी है । सि ० - जो प्रवर्तक होता है वह प्रवृत्तियुक्त होता है, इस आदिमें व्यभिचार है, अतः उक्त व्याप्ति अयुक्त है । परन्तु जिनके मत में अन्वयव्यतिरेकसे जीवित वह स्वरूपसे प्रवृत्तिमान् है होनेसे व्याप्य प्रवर्तकत्व को प्रवृत्ति चेतनसे नहीं व्याप्तिका अयस्कान्तमणि चेतनसे अतिरिक्त अधि-ष्ठाता ईश्वर माना जाता है उनके मतमें तो यह युक्त है कि चेतनसे अधिष्ठित होकर अचेतन प्रवृत्त होता है । परन्तु वेदान्तमतमें तो ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर चेतन से अति-रिक्त कुछ भी नहीं है । उस मतमें प्रवत्यंके न होनेसे चेतनमें प्रवर्तकत्व कैसे हो सकता है? समाधान -उस मत में अविद्यासे चेतनमें कल्पित द्वैतसे प्रवत्यं प्रवर्तकभाव यादि सब उपपन्न होता है | अतः माया प्रवर्त्य है और सर्वज्ञ ईश्वर प्रवर्तक, इसप्रकार सर्वज्ञ ईश्वरको मानने से सृष्ट्यात्मक प्रवृत्ति युक्त है ॥२ ॥

पृष्ठ 440

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ * स्यादेतत् - यथा क्षीरमचेतनं स्वभावेनैव वत्सविवृद्धयर्थं प्रवर्तते, यथा च जलमचेतनं स्वभावेनैव लोकोपकाराय स्यन्दते, एवं प्रधानमचेतनं स्वभावेनैव पुरुषार्थ-सिद्धये प्रवर्तिष्यत इति । नैतत्साधूच्यते, यतस्तत्रापि पयोम्बुनोश्चेतनाधिष्ठितयोरेव प्रवृत्तिरित्यनुमिमीमहे उभयवादिप्रसिद्धे रथादावचेतने केवले प्रवृत्त्यदर्शनात् । शास्त्रं च ' योऽप्सु तिष्ठन् योऽपोऽन्तरो यमयति ' ( बृ ० ३ | ७ | ४ ) ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गिं प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते ' ( बृ ० ३।८१ ९ ) इत्येवंजातीयकं समस्तस्य लोकपरिस्पन्दि-तस्येश्वराधिष्ठितां श्रावयति । तस्मात्साध्यपक्ष निक्षिप्तत्वात्पयोम्बुवदित्यनुपन्यासः, चेतनायाश्च धेन्वाः स्नेहेच्छया पयसः प्रवर्तकत्वोपपत्तेः, वत्सचोपणेन च पयस आकृष्य-माणत्वात् । न चाम्बुनोऽप्यत्यन्तमनपेक्षा, निम्न भूम्याद्यपेक्षत्वात्स्यन्दनस्य । चेतनापेक्ष-त्वं तु सर्वत्रोपदर्शितम् । ' उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षारवद्धि ' ( ब्र ० सू ० २।१।२४ ) इत्यत्र तु बाह्यनिमित्तनिरपेक्षमपि स्वाश्रयं कार्यं भवतीत्येतल्लोकदृष्ट्या निदर्शितम् । शास्त्रदृष्ट्या तु पुनः सर्वत्रेवेश्वरापेक्षत्वमापद्यमानं न पराणुद्यते ॥३ ॥

व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ॥ ४ ॥

पदच्छेद - व्यतिरेकानवस्थितेः, च, अनपेक्षत्वात् । सूत्रार्थ - ( व्यतिरेकानवस्थिते: ) प्रधानसे भिन्न कर्म आदि सहकारीके न होनेसे ( च ) और ( अनपेक्षत्वात् ) पुरुषके असंग आदि होनेके कारण प्रवृत्ति और निवृत्तिमें अपेक्षाका स्वीकार न होने से अचेतन प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता! सांख्यानां त्रयो गुणाः साम्येनावतिष्ठमानाः प्रधानम्, न तु तद्व्यतिरेकेण प्रधानस्य पूर्वपक्षी - यह ठीक है, जैसे अचेतन दूध स्वभावसे ही बछड़ेकी विशेषवृद्धिके लिए प्रवृत्त होता है और जैसे अचेतन जल स्वभावसे ही लोगों के उपकारके लिए बहता है, वैसे ही अचेतन प्रधान भी स्वभावसे ही पुरुषार्थ ( भोग और मोक्ष ) की सिद्धिके लिए प्रवृत्त होगा । सिद्धान्ती -यह ठीक नहीं कहा जाता, क्योंकि उनमें भी अर्थात् चेतनाधिष्ठित ही दूध और जलमें प्रवृत्ति है, ऐसा हम अनुमान करते हैं । कारण कि दोनों वादियों करके प्रसिद्ध चेतनसे अनधिष्ठित केवल अचेतन रथादिमें प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती । ' योऽप्सु ० ' ( जो जलमें रहता हुआ, जो जलके मीतर रहकर उसका नियमन करता है ) ( एतस्य वा ० ' ( है गार्गी! इस अक्षरके ही प्रशासन में पूर्ववाहिनी एवं अन्य नदियाँ श्वेतपर्वतों से बहती हैं ) इस प्रकारका शास्त्र सम्पूर्ण लोककी क्रियाएँ ईश्वरसे अधिष्ठित हैं, ऐसा कहता है । इसलिए जिसमें साध्य सिद्ध किया जा रहा है उस पक्षकुक्षिनिक्षिप्त होनेसे ' पयोम्बुवत् ' यह व्यभिचारस्थल नहीं है, क्योंकि चेतन गौ स्नेह - इच्छासे दूधको प्रवर्तिका हो सकती है, बछड़े के चोषण से दूध खींचा जाता है । जलको मी किसीकी अपेक्षा नहीं है, ऐसा नहीं है, कारण कि उसकी बहनक्रिया को निम्नभूमि आदिको अपेक्षा है | चेतनकी अपेक्षा तो सर्वत्र दिखलाई गई है । ' उपसंहारदर्शन | नेत्ति ' इस सूत्र में तो बाह्य निमित्तकी अपेक्षा किए विना भी स्वाश्रय कार्य होता है, यह लोक दृष्टिसे दिखलाया गया है । पुनः शास्त्रदृष्टिसे तो सर्वत्र ईश्वरकी प्राप्त अपेक्षाका वादीसे निराकरण नहीं किया जाता ॥३ ॥

सांख्योंके मतमें साम्यसे अवस्थित हुए तीन गुण प्रधान है । परन्तु उससे भिन्न प्रधानका प्रवर्तक अथवा निवर्तक कुछ बाह्य अपेक्ष्य अवस्थित नहीं है, पुरुष तो उदासीन है वह न प्रवर्तक है सत्यानन्दी - दीपिका * ' अनादिजड़स्य प्रवृत्तिः चेतनाधीना प्रवृत्तित्वात् रथादिप्रवृत्तिवत् ' ( ' अनादि जड़की प्रवृत्ति चेतनके अधीन है, प्रवृत्ति होनेसे, रथादिकी प्रवृत्तिके समान ' ) इस अनुमान और ' योऽप्सु तिष्ठन् ' इस आगमसे साध्य सिद्ध होनेपर दूध और जलमें दिया हुआ व्यभिचार अयुक्त है । क्योंकि दूध और जल मी पक्षसम हैं, मतः जड़में स्वतन्त्र प्रवृत्ति नहीं होती है ॥ ३ ॥