श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 441–450

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 441 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४०७ प्रवर्तकं निवर्तकं वा किंचिद्वाह्यमपेक्ष्यमवस्थितमस्ति । पुरुषस्तुदासीनो न प्रवर्तको न निवर्तक इत्यतोऽनपेक्षं प्रधानम्, अनपेक्षत्वाच्च कदाचित्प्रधानं महदाद्याकारेण परिणमते कदाचिन परिणमत इत्येतदयुक्तम् । ईश्वरस्य तु सर्वज्ञत्वात्सर्वशक्तित्वान्महामायत्वाच्च प्रवृत्त्यप्रवृत्ती न विरुध्येते ॥४ ॥

अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ ५ ॥

पदच्छेद - अन्यत्राभावात् च, न, तृणादिवत् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( तृणादिवत् ) तृण आदिके समान प्रधानका भी स्वभाव से ही परिणाम नहीं हो सकता, ( अन्यत्राभावात् ) क्योंकि अन्यत्र दूधरूपसे तृणादिके परिणामका अभाव है । स्यादेतत् - यथा तृणपल्लवोदकादि निमित्तान्तरनिरपेक्षं स्वभावादेव क्षीराद्याका रेण परिणमते, एवं प्रधानमपि महदाद्याकारेण परिणंस्यत इति । कथं च निमित्तान्तरनिर-पेक्षं तृणादीति गम्यते? निमित्तान्तरानुपलम्भात् । यदि हि किंचिन्निमित्तमुपलभेमहि, ततो यथाकामं तेन तृणाद्युपादाय क्षीरं संपादयेमहि, नतु संपादयामहे । तस्मात्स्वाभाविकस्तृ-णादेः परिणामः, तथा प्रधानस्यापि स्यादिति । अत्रोच्यते भवेत्तृणादिवत्स्वाभाविकः प्रधान-स्यापि परिणामः, यदि तृणादेरपि स्वाभाविकः परिणामोऽभ्युपगम्येत, न त्वभ्युपगम्यते, निमित्तान्तरोपलब्धेः । कथं निमित्तान्तरोपलब्धिः? अन्यत्राभावात् । धेन्वैवह्युपभुक्तं तृणादि क्षीरीभवति न प्रहीणमनडुहाद्युपभुक्तं वा । यदि हि निर्निमित्तमेतत्स्याद्धेनुशरीरसंबन्धा-दन्यत्रापि तृणादि क्षीरीभवेत् । नच यथाकामं मानुषैर्न शक्यं संपादयितुमित्येतावता निर्नि मित्तं भवति । भवति हि किंचित्कार्यं मानुषसंपाद्यं किंचिद्दैवसंपाद्यम् । मनुष्या अपि शक्नुव-.न्त्येवोचितेनोपायेन तृणाद्युपादाय क्षीरं संपादयितुम् । प्रभूतं हि क्षीरं कामयमानाः प्रभूतं और न निवर्तक है, इसलिए प्रधान अनपेक्ष है, अनपेक्ष होनेसे कभी प्रधान महदादि आकारते परिणत होगा और कभी न होगा, यह अयुक्त है । ईश्वरको तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और महामायामय होनेसे प्रवृत्ति और निवृत्तिमें विरोध नहीं है ॥ ४ ॥

पूर्वपक्षी – यह ठीक है, परन्तु जैसे तृण, पल्लव, उदक आदि अन्य निमित्तकी अपेक्षा किए विना स्वभावसे ही क्षीर आदि रूपमें परिणत होते हैं, वैसे प्रधान भी महदादिरूपमें परिणत हो जायगा । परन्तु यह कैसे ज्ञात हो कि तृण आदि निमित्तान्तरंकी अपेक्षा नहीं रखते? इससे कि अन्य निमित्त उपलब्ध नहीं होता । यदि हम अन्य कोई निमित्त उपलब्ध करते तो हम उससे इच्छानुसार तृण आदि लेकर दूधका संपादन करते, किन्तु हम संपादन नहीं कर सकते, इसलिए तृणादिका परिणाम स्वाभाविक है, उसी प्रकार प्रधानका भी परिणाम हो । सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं- यदि तृण आदिका स्वाभाविक परिणाम स्वीकार किया जाता तो तृण आदिके समान प्रधानका भी स्वाभाविक परिणाम होता । परन्तु तृणादिका स्वाभाविक परिणाम स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि अन्य निमित्तकी उपलब्धि है । अन्य निमित्तकी किस प्रकार उप-लब्धि है? कारण कि अन्यत्र अभाव है । क्योंकि धेनुसे ही उपभुक्तं तृण आदि क्षीर होता है, नष्ट हुआ अथवा बैल आदिसे खाया गया तृणादि क्षीर नहीं होता । यदि विना निमित्त भी यह हो जाय, तो धेनु शरीरके सम्बन्धसे अन्यत्र भो तृणादि दूध हो जाय । मनुष्य अपनी इच्छा अनुसार उसे संपादन करनेमें समर्थ नहीं हैं इतने मात्रसे यह निनिमित्त नहीं होता, क्योंकि कोई कार्य मनुष्य संपाद्य है और कोई कार्यं दैव सम्पाद्य है । मनुष्य भी उचित उपायसे तृण आदि लेकर दूधके संादन करनेमें समर्थ होते हैं, पुष्कल दूध चाहनेवाले पुरुष गौको पुष्कल घास खिलाते हैं, उससे पुष्कल

पृष्ठ 442

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 442 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०८ ब्रह्मसूत्र -- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० घासं धेनुं चारयन्ति । ततञ्च प्रभूतं क्षीरं लभन्ते । तस्मान्न तृणादिवत्स्वाभाविका प्रधानस्य परिणामः ॥५ ॥

अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ ६ ॥

पदच्छेद --- अभ्युपगमे, अपि, अर्थाभावात् । सूत्रार्थ - ( अभ्युपगमेऽपि ) प्रधानकी स्वतः प्रवृत्ति मानने पर भी ( अर्थाभावात् ) प्रवृत्तिका कोई प्रयोजन न होनेसे दोष तदवस्थ ही है । * स्वाभाविकी प्रधानप्रवृत्तिर्न भवतीति स्थापितम् । तथापि नाम भवतः श्रद्धामनु रुध्यमानाः स्वाभाविकीमेव प्रधानस्य प्रवृत्तिमभ्युपगच्छेम, तथापि दोषोऽनुषज्येतैव । कुतः? अर्थाभावात् यदि तावत्स्वाभाविकी प्रधानस्य प्रवृत्तिर्न किंचिदन्यदिहापेक्षत इत्युच्येत ततो. यथैवसहकारि किंचिनापेक्षत एवं प्रयोजनमपि किंचिन्नापेक्षिष्यते इत्यतः प्रधानं पुरुषास्यार्थ साधयितुं प्रवर्तत इतीयं प्रतिज्ञा हीयेत । सयदि ब्रूयात् - सहकार्येव केवलं नापेक्षते न प्रयो-जनमपीति, तथापि प्रधानप्रवृत्तेः प्रयोजनं विवेक्तव्यं भोगो वा स्यादपवर्गो वोभयं वेति । भोग sarate शोऽनाधेयातिशयस्य पुरुषस्य भोगो भवेत्, अनिर्मोक्षप्रसङ्गश्च । अपवर्गश्चे-स्प्रागपि प्रवृत्तेरपवर्गस्य सिद्धत्वात्प्रवृत्तिरनर्थिका स्यात्, शब्दाद्यनुपलब्धिप्रसङ्गश्च । उभया-ताभ्युपगमेऽपि भोक्तव्यानां प्रधानमात्राणामानन्त्यादनिर्मोक्षप्रसङ्गएव । न चौत्सुक्य-निवृत्त्यर्था प्रवृत्तिमनहि प्रधानस्याचेतनस्यौत्सुक्यं संभवति । नच पुरुषस्य निर्मलस्यनिष्कल-दूध प्राप्त करते हैं । इसलिए तृण आदिकें समान प्रधानका परिणाम स्वाभाविक नहीं है || ५ || प्रधानकी प्रवृत्ति स्वाभाविक नहीं होतो यह सिद्ध किया गया, परन्तु आपकी श्रद्धाके अनुसार हम प्रधानकी स्वाभाविक प्रवृत्ति मान भी लें, तो भी दोष प्रसक्त ही है । क्यों? क्योंकि प्रयोजनका अभाव है । यदि कहो कि प्रधानकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है उसमें किसी अन्यकी अपेक्षा नहीं है, तो जिस प्रकार प्रधानको किसी सहकारीकी अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार किसी प्रयोजनकी भी अपेक्षा नहीं होगी, इससे तो प्रधान पुरुषके मोग तथा मोक्ष रूप अर्थके सिद्ध करनेके लिए प्रवृत्त होता है, इस प्रतिज्ञाकी हानि होगी । यदि वह ऐसा कहे कि प्रधान केवल सहकारोकी अपेक्षा नहीं रखता, इससे प्रयोजनकी भी अपेक्षा नहीं रखता, ऐसा नहीं, प्रयोजनकी अपेक्षा तो रखता है । तो भी प्रधान प्रवृत्तिके प्रयोजनका विवेचन करना चाहिए कि भोग वा मोक्ष अथवा दोनों प्रवृत्तिके प्रयोजन हैं? यदि भोग है तो सुख आदि आधान अतिशयसे रहित पुरुषका भोग किस प्रकार होगा और मोक्षाभाव प्रसंग भी होगा । यदि मोक्ष प्रयोजन है तो प्रवृत्तिके पूर्व मी मोक्षके सिद्ध होनेसे प्रवृत्ति निष्फल होगी और शब्द आदिकी अनुपलब्धिका प्रसंग आ जायगा । दोनों प्रयोजन माननेपर भोगके योग्य प्रधान तन्मात्राओंके अनन्त होनेसे मोक्षके अभावका प्रसङ्ग ही है । उत्सुकताकी निवृत्तिके लिए भी प्रवृत्ति नहीं है, क्योंकि अचेतन प्रधानमें उत्सुकताका संभव नहीं है, एवं निर्मल, निष्कल पुरुषमें मी उत्सुकता नहीं हो सकती । सत्यानन्दी - दीपिका * उपर्युक्त तीनों विकल्पोंमें केवल मोक्ष के लिए प्रवृत्त हुआ प्रधान मोगका संपादन नहीं कर सकेगा, इससे शब्द आदिकी उपलब्धिका अभाव होगा । यदि दोनों प्रयोजन मानें तो प्रधानकी केवल अप्रबृत्तिसे ही मोक्ष सिद्ध है, शेष भोगके लिए प्रवृत्त होगा, वह तो एक बार शब्दादिकी उपलब्धि होनेसे ही सिद्ध हो जाता है । प्रधान पुनः पुनः भोगके लिए प्रवृत्त होता है तब तो भोग्य शब्दादि अनन्त होनेसे कभी समाप्त ही नहीं होंगे, इससे पुनः मोक्षका अभाव होगा । * औत्सुक्यनिवृत्त्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोकः । पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ( सां ० का ० १८ ) ( जैसे उत्सुकताकी निवृत्तिके लिए लोग क्रियाओंमें प्रवृत होते हैं, वैसे ही पुरुषके मोक्ष

पृष्ठ 443

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 443 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४० ९ स्योत्सुक्यम् । दक्शक्तिसर्गशक्तिवैयर्थ्यभयाच्चेत्प्रवृत्तिस्तर्हि दृक्शक्त्यनुच्छेदवत्सर्ग-शक्त्यनुच्छेदात्संसारानुच्छेद ( द निर्मोक्षप्रसङ्ग एव । तस्मात्प्रधानस्य पुरुषार्था प्रवृत्तिरित्येतदयुक्तम् ॥ ६ ॥

पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ ७ ॥

पदच्छेद - पुरुषाश्मवत् इति चेत्, तथापि । सूत्रार्थ - ( पुरुषाश्मवत् ) अन्ध और पङ्गु पुरुषके समान अथवा लोहचुम्बकके समान पुरुष प्रधानका प्रवर्तक है, ( इति चेत् ) ऐसा यदि कहो ( तथापि ) तो मी दोषकी निवृत्ति नहीं हो सकती । स्यादेतत् - यथा कश्चित्पुरुषो हक्शक्तिसंपन्नः प्रवृत्तिशक्तिविहीनः पङ्गुरपरं पुरुषं प्रवृत्तिशक्ति संपन्नं दृक्शक्तिविहीनमन्धमधिष्ठाय प्रवर्तयति । यथा वाऽयस्कान्तोऽश्मा स्वयमप्रवर्तमानोऽप्ययः प्रवर्तयति । एवं पुरुषः प्रधानं प्रवर्तयिष्यतीति दृष्टान्तप्रत्ययेन पुनः प्रत्यवस्थानम् । अत्रोच्यते - तथापि नैव दोषान्निर्मोक्षोऽस्ति । अभ्युपेतहानं तावदोष आपतति, प्रधानस्य स्वतन्त्रस्य प्रवृत्त्यभ्युपगमात्ः पुरुषस्य च प्रवर्तकत्वानभ्युपगमात् । कथं चोदासीनः पुरुषः प्रधानं प्रवर्तयेत्? पंगुरपि ह्यन्धं वागादिभिः पुरुषं प्रवर्तयति । नैवं पुरुषस्य कश्चिदपि प्रवर्तनव्यापारोऽस्ति, निष्क्रियत्वान्निर्गुणत्वाच्च । नाप्ययस्कान्त-वत्संनिघिमात्रेण प्रवर्तयेत् । संनिधिनित्यत्वेन प्रवृत्तिनित्यत्वप्रसङ्गात् । अयस्कान्तस्य त्वनित्यसंनिधेरस्ति स्वव्यापारः संनिधिः परिमार्जनाद्यपेक्षा चास्यास्तीत्यनुपन्यासः पुरुषाश्मवदिति । तथा प्रधानस्याचैतन्यात्पुरुषस्य चौदासीन्यात्तृतीयस्य च तयोः पुरुषमें दृक्शक्ति और प्रधान में सशक्तिकी व्ययंता के मयसे यदि प्रवृत्ति स्वीकार है, तो हक्शक्तिके अनुच्छेद ( नित्य ) के समान सर्गशक्ति के अनुच्छेद होने से संसारका अनुच्छेद होनेके कारण मोक्षाभाव प्रसङ्ग होगा, इसलिए प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके प्रयोजनके लिए है यह अयुक्त है ॥ ६ ॥

पूर्वपक्षी – ऐसा हो, परन्तु जैसे दृक्शक्ति सम्पन्न किन्तु प्रवृत्ति - गमन शक्ति रहित कोई प पुरुष प्रवृत्तिशक्ति सम्पन्न किन्तु दृक्शक्ति विहीन अन्य अन्धपुरुषको कन्धेपर बैठकर प्रवृत्त करता है अथवा जैसे अयस्कान्तमणि स्वयं अप्रवृत्त होती हुई भी लोहको प्रवृत्त करती है । वैसे पुरुष प्रधानको प्रवृत्त करेगा, इसप्रकार दृष्टान्तबलसे पुनः सांख्य खड़ा होता ( शङ्का करता ) है । सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं - तो भी दोष से मुक्ति नहीं है, क्योंकि स्वीकृत सिद्धान्तकी हानि दोष आ पड़ता है, कारण कि • प्रधानकी स्वतन्त्ररूपसे प्रवृत्ति स्वीकारकी गई है और पुरुषको प्रवर्तक स्वीकार नहीं किया गया है, तो ऐसी अवस्थामें उदासीन पुरुष प्रधानको कैसे प्रवृत्त करेगा? पजुपुरुष भी अन्धपुरुषको वाणी आदि प्रवृत्त करता है । परन्तु इसप्रकार पुरुषमें कोई भी प्रवृत्तिजनक व्यापार नहीं है, क्योंकि वह निष्क्रिय और निर्गुण है । अयस्कान्तमणिके समान संनिधिमात्रसे भी प्रवृत्त नहीं कर सकता, क्योंकि संनिधिके नित्य होनेसे प्रवृत्ति में भी नित्यता प्रसक्त होगी, और अयस्कान्तमणिकी अनित्य संनिधि होनेसे उसका अपना व्यापार संनिधि [ भी अनित्य ] है । उसको परिमार्जन ( सन्मुख सोधा रखना ) आदिकी अपेक्षा है, इससे ' पुरुषाश्मवत् ' ( पुरुष और अश्मके समान ) यह सम दृष्टान्तका उपन्यास नहीं है । उसी प्रकार प्रधानको अचेतन और पुरुषको उदासीन होनेके कारण दोनोंका सम्बन्ध करानेवाले सत्यानन्दी - दीपिका के लिए प्रधान प्रवृत्त होता है ) इस प्रकारकी उत्सुकता अचेतन प्रधान और निर्मल चेतन पुरुषमें संभव नहीं है । इसलिए प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुष के प्रयोजनके लिए है, यह सर्वथा अयुक्त है ॥ ६ ॥

* प्रधान अचेतन है, अतः उसमें दृश्यरूप योग्यता है और पुरुष चेतन है, इसलिए उसमें द्रष्टृरूप योग्यता है । इसप्रकार दोनोंकी योग्यता निमित्तक सम्बन्ध मानें तो योग्यताके नित्य होनेसे मोक्षामा प्रसंग है | जैसे प्रधानके स्वतन्त्र प्रवृत्ति पक्षमें भोग, अपवर्ग अथवा दोनों प्रवृतिके

पृष्ठ 444

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 444 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४१० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० संबन्धयितुरभावात्संबन्धानुपपत्तिः । योग्यतानिमित्ते च संबन्धे योग्यात्वानुच्छेदादनि-र्मोक्षप्रसङ्गः । पूर्ववच्च हाप्यर्थाभावो विकल्पयितव्यः । परमात्मनस्तु स्वरूपव्यपाश्रय-मौदासीन्यम्, मायाव्यपाश्रयं च प्रवर्तकत्वमित्यस्यतिशयः ॥ ७ ॥

अङ्गित्वानुपपत्तेश्व ॥ ८ ॥

पदच्छेद – अङ्गित्वानुपपत्तेः, च । सूत्रार्थ - गुणोंके अङ्गाङ्गिभावकी अनुपपत्ति होनेसे भी प्रधानकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती है । * इतश्चन प्रधानस्य प्रवृत्तिरवकल्पते । यद्धिसत्त्वरजस्तम सामन्योन्यगुणप्रधान-भावमुत्सृज्य साम्येन स्वरूपमात्रेणावस्थानं सा प्रधानावस्था । तस्यामवस्थायामनपेक्ष-स्वरूपाणां स्वरूपप्रणाशभयात्परस्परं प्रत्यङ्गाङ्गिभावानुपपत्तेः । बाह्यस्य च कस्यचित्क्षों भयितुरभावाद्गुणवैषम्यनिमित्तो महदाद्युत्पादो न स्यात् ॥ ८ ॥

अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ ९ ॥

पदच्छेद -- अन्यथा, अनुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् । सूत्रार्थ- हम अनपेक्ष गुणोंका अनुमान नहीं करते, किन्तु ( अन्यथानुमिती ) प्रकारान्तरसे परस्पर सापेक्ष गुणोंका अनुमान करते हैं । जिससे पूर्वोक्त दोष प्रसक्त न हो । यह ठीक नहीं है, ( शशक्तिवियोगात् ) क्योंकि ऐसा माननेपर भी गुणोंमें ज्ञानशक्तिके न होनेसे स्वयं साम्यावस्थासे च्युति न होनेके कारण परस्पर अङ्गाङ्गिभाव नहीं हो सकता, इससे महद् आदिका अनुत्पत्तिदोष तदवस्थ ही है । अथापि स्यादन्यथा वयमनुमिमीमहे - यथां नायमनन्तरो दोषः प्रसज्येत । न ह्यनपेक्ष-स्वभावाः कूटस्थाश्चास्माभिर्गुणा अभ्युपगम्यन्ते, प्रमाणाभावात् । कार्यवशेन तु गुणानां स्वभावोऽभ्युपगम्यते । यथा यथा कार्योत्पाद उपपद्यते तथा तथैषां स्वभावोऽभ्युपगम्यते । तीसरेके अभाव होनेसे सम्बन्धकी अनुपपत्ति होगी, उनकी योग्यता निमित्तक सम्बन्ध स्वीकार करें. तो योग्यता के अनुच्छेद- नित्य होनेसे मोक्षाभाव प्रसङ्ग है । पूर्वके समान यहाँ भी प्रयोजन ( भोग और मोक्ष ) के अभावका विकल्प करना चाहिए । परमात्मा तो स्वरूप व्यपाश्रयसे उदासीन और

मायाके आश्रयसे प्रवर्तक है । इसप्रकार अतिशय ( विशेष ) है ॥ ७ ॥

और इस हेतुसे भी प्रधानको प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि सत्त्व, रज और तमकी परस्पर गुणप्रधानभावको छोड़कर समभावसे केवल स्वरूपमात्रसे अवस्थिति वह प्रधानावस्था है । उस साम्यावस्थामें एक दूसरेके स्वरूपकी अपेक्षासे रहित सत्त्व आदि गुणोंके अपने - अपने स्वरूप नाश होनेके भयसे परस्परके प्रति अङ्गाङ्गिभाव नहीं हो सकता और उनमें क्षोम उत्पन्न करनेवाले किसी बाह्य पदार्थके न होनेसे गुणोंकी विषमता निमित्तक महद् आदिकी उत्पत्ति नहीं होगी ॥ ८ ॥

पूर्व पक्षी - ऐसा हो, परन्तु हम अन्य प्रकारसे अनुमान करते हैं, जिससे यह पूर्वोक्त दोष प्रसक्त न हो । हम गुणोंको निरपेक्ष स्वभाव तथा कूटस्थ स्वीकार नहीं करते, क्योकि ऐसा मानते में कोई प्रमाण नहीं है 1 । कार्यके अनुसार गुणोंका स्वभाव स्वीकार किया जाता है । जैसे जैसे कार्यकी सत्यानन्दी - दीपिका प्रयोजन हैं, ऐसा विकल्पकर दूषित किया गया है, वैसे पुरुषके अधीन प्रधानकी प्रवृत्ति पक्ष में भी इसप्रकार प्रयोजन विषयक विकल्पकर दूषित करना चाहिए । सांख्य मतमें उदासीनत्व और प्रवर्तकत्व दोनों सत्य हैं, अतः एकपुरुष में दोनोंका होना विरूद्ध है । परन्तु वेदान्त सिद्धान्तमें तो परमात्मामें उदासीनत्त्व पारमार्थिक है और प्रवर्तकत्व मायासे कल्पित है ॥ ७ ॥

पृष्ठ 445

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 445 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४११ चलं गुणवृत्तमिति चास्त्यभ्युपगमः । तस्मात्साम्यावस्थायामपि वैषम्योपगमयोग्या एव गुणा अवतिष्ठन्त इति । एवमपि प्रधानस्य ज्ञशक्तिवियोगाद्र चनानुपपत्त्यादयः पूर्वोक्ता दोषास्तदवस्था एव । ज्ञशक्तिमपि त्वनुमिमानः प्रतिवादित्वान्निवर्तेत । चेतनमेकमनेक-प्रपञ्चस्य जगत उपादानमिति ब्रह्मवादप्रसङ्गात् । वैषम्योपगमयोग्या अपि गुणाः साम्या-वस्थायां निमित्ताभावान्नैव वैषम्यं भजेरन् । भजमाना वा निमित्ताभावाविशेषात्सर्वदैव वैषम्यं भजेरन्निति प्रसज्यत एवायमनन्तरोऽपि दोषः ॥ ९ ॥

विप्रतिषेधाच्च समञ्जसम् ॥१० ॥

पदच्छेद - विप्रतिषेधात्, च, असमञ्जसम् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( विप्रतिषेधात् ) सांख्य लोग कहीं महदसे तन्मात्राओं की उत्पत्ति मानते हैं तो कहीं अहङ्कारसे, इसप्रकार परस्पर विरुद्ध होने से ( असभञ्जसन ) सांख्य मत असंगत है । * परस्परविरुद्धश्चायं सांख्यानामभ्युपगमः - कचित्सप्तेन्द्रियाण्यनु कामन्ति, कचि-देकादश, तथा कचिन्महतस्तन्मात्रसर्गमुपदिशन्ति, क्वचिदहङ्कारात् तथा कचित्त्री-व्यन्तःकरणानि वर्णयन्ति, कचिदेकमिति । प्रसिद्ध एव तु श्रुत्येश्वरकारणवादिन्या विरोधस्तदनुवर्तिन्य च स्मृत्या । तस्मादप्यसमञ्जसं सांख्यानां दर्शनमिति । अत्राह-नन्वोपनिषदानामप्यसमञ्जसमेव दर्शनम्, तप्यतापकयोर्जात्यन्तरभावानभ्युपगमात् । एकं हि ब्रह्म सर्वात्मकं सर्वस्य प्रपञ्चस्य कारणमभ्युपगच्छता मे कस्यैवात्मनो विशेष तप्यतापकौ न जात्यन्तरभूतावित्यभ्युपगन्तव्यं स्यात् । यदि चैतौ तप्यतापकावेकस्या-उत्पत्ति उपपन्न होती है वैसे वैसे इनका स्वभाव माना जाता है । गुणों का स्वभाव चलरूप है, ऐसा हमारा स्वीकार सिद्धान्त - है, इसलिए साम्यावस्था में भी गुण वैषम्य प्राप्तिके योग्य ही रहते हैं । सिद्धान्ती – - ऐसा अनुमान करनेपर भी प्रधानमें ज्ञानशक्तिका अभाव होनेसे रचना अनुपपत्ति आदि पूर्वोक्त दोष ज्योंके त्यों हैं । उन दोषोंके परिहार के लिए यदि सांख्य प्रधानमें ज्ञानशक्तिका मी अनुमान करे, तो वह प्रतिपक्षिता से ही निवृत्त हो जायगा, क्योंकि एक चेतन अनेक प्रपञ्चरूप जगत्का उपादानकारण है, इस ब्रह्मवादका प्रसङ्ग होगा । वैषम्य प्राप्तिके योग्य भी गुण सम्यावस्था में निमित्तके न होनेसे वैषम्यको नहीं प्राप्त होंगे । यदि वे निमित्तके बिना भी विषमताको प्राप्त करने वाले होंगे तो निमित्तका अभाव समान होनेसे सर्वदा ही विषमताको प्राप्त होते रहेंगे, इसप्रकार पूर्वोक्त दोष ( कार्यको अनुत्पत्ति ) प्रसक्त ही है ॥ ९ ॥

सांख्योंका यह स्वीकार परस्पर विरुद्ध है, क्योंकि वे कहीं सात इन्द्रियाँ ( मन, त्वक् और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ) कहते हैं, कहीं ग्यारह ( पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन ), एवं कहीं महत्से तन्मात्राओं ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) की उत्पत्तिका उपदेश करते हैं, तो कहीं अहङ्कारसे | और कहीं अन्तःकरण तीन ( मन, बुद्धि और अहङ्कार ) वर्णन करते हैं और कहीं एक ( बुद्धि ) | ईश्वरको जगत्का कारण कहनेवाली श्रुति और उसकी अनुवर्तनी स्मृतिसे विरोध तो प्रसिद्ध ही है, इससे भी सांख्योंका दर्शन असंगत है । पूर्वपक्षी - इस पर कहते हैं- वेदान्तियों का दर्शन भी असंगत ही है, क्योंकि उसमें तप्य ( दुःख भोक्ता जीव ) और तापक ( दुःखप्रद संसार ) का जाति - भेद स्वीकार नहीं किया गया है । वेदान्तमें एक ही ब्रह्म सर्वात्मक है और सम्पूर्ण प्रपञ्चका कारण है, ऐसा स्वीकार करनेवालोंको तप्य और तापक एक ही आत्माके विशेष हैं इससे वे भिन्न नहीं हैं ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका * पू ० – वेदान्तमें एक आत्माके ही विशेष होनेसे तप्य तापकका भेद न मानने पर लोक प्रसिद्ध तप्य तापकभाव ही लुप्त हो जायगा । ' तपि ' धातु सकमंक है, एसलिए तथ्य ( कर्म ) से तापक

पृष्ठ 446

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 446 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४१२ ब्रह्मसूत्र — शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ त्मनो विशेषौ स्यातां स ताभ्यां तप्यतापकाभ्यां न निर्मुच्येत इति तापोपशान्तये सम्य-ग्दर्शनमुपदिशच्छास्त्रमनर्थकं स्यात् । न ह्यौष्ण्यप्रकाशधर्मकस्य प्रदीपस्य तदवस्थस्यैव ताभ्यां निर्मोक्ष उपपद्यते । * योऽपि जलतरङ्गवीची फेनाद्युपन्यासः, तत्रापि जलात्मन एकस्य वीच्यादयो विशेषा आविर्भावतिरोभावरूपेण नित्या एवेति समानो जलात्मनो वीच्यादिभिरनिर्मोक्षः । प्रसिद्धश्चायं तप्यतापकयोर्जात्यन्तरभावो लोके । तथा हि - अर्थी चार्थश्चान्योन्यभिन्नौ लक्ष्येते । यद्यर्थिनः स्वतोऽन्योऽर्थो न स्यात्, यस्यार्थिनो यद्विषय-मर्थित्वं स तस्यार्थो नित्यसिद्ध एवेति न तस्य तद्विषयमर्थित्वं स्यात्, यथा प्रकाशात्मनः प्रदीपस्य प्रकाशाख्योऽर्थो नित्यसिद्ध एवेति न तस्य तद्विषयमर्थित्वं भवति । अप्राप्ते ह्यर्थे-ऽर्थिनोऽर्थित्वं स्यादिति । तथार्थस्याप्यर्थत्वं न स्यात् यदि स्यात्स्वार्थत्वमेव स्यात् न चैतदस्ति, संबन्धिशब्दौ तावर्थी चार्थश्चेति । द्वयोश्च संबन्धिनोः संबन्धः स्यान्नैकस्यैव तस्माद्भिन्नावेतावर्थार्थिनौ । तथानर्थानर्थिनावपि । अर्थिनोऽनुकूलोऽर्थः प्रतिकूलोऽनर्थ-स्ताभ्यामेकः पर्यायेणोभाभ्यां संबध्यते । तत्रार्थस्याल्पीयस्त्वाद्भूयस्त्वाच्चानर्थस्यो भाव-मानना पड़ेगा । यदि ये तप्य और तापक एक ही आत्माके विशेष हैं तो वह इन तप्य, तापकसे मुक्त नहीं हो सकता, तब तो तापकी निवृत्तिके लिए तत्त्वज्ञानका उपदेश करनेवाला उपनिषद् शास्त्र व्यर्थ हो जायगा । उष्णता और प्रकाश धर्मसे युक्त प्रदीप है, उनसे युक्त दीपक उनसे मुक्त नहीं हो सकता । और जो जलके तरङ्ग, लहर, फेन आदिका उपन्यास है, उसमें भी एक ही जल स्वरूपके तरङ्ग आदि विशेष कमी प्रकट और कमी विलीनरूपसे नित्य हैं, इसलिए जल स्वरूपको तरङ्ग आदि से मुक्त न होना समान ही है । परन्तु तप्य तापकका यह पृथक्त्व लोकमें प्रसिद्ध है । वैसे ही अर्थ और अर्थी परस्पर भिन्न लक्षित होते हैं । यदि अर्थीसे स्वतः अन्य अर्थ न हो तो जिस अर्थीका जिस विषय में अर्थित्व है, उसके लिए वह अर्थ नित्मसिद्ध ही है, इससे उसका तद्विषयक अर्थित्व नहीं होगा । जैसे प्रकाशरूप दीपकका प्रकाश नामक अर्थ नित्य सिद्ध ही है, इसलिए उसका तद्विषयक अथित्व नहीं होता, क्योंकि अप्राप्त अर्थ में ही अर्थिका अथित्व होता है । इसी प्रकार अर्थका भी अर्थत्व न होगा यदि हो तो स्वके लिए ही होगा, परन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि ये अर्थी और अर्थ सम्बन्धिशब्द हैं, दो संबन्धियोंका सम्बन्ध होता है एकका नहीं, इसलिए ये दोनों अर्थ और अर्थी भिन्न हैं । वैसे अनर्थं और अनर्थी भी भिन्न हैं | अर्थीके अनुकूल अर्थ और प्रतिकूल अनर्थ होता है L एकका उन दोनों के साथ क्रमसे सम्बन्ध होता हैं । उनमें अर्थके अल्प और अनर्थके अधिक होनेसे अर्थ और अनथं दोनों सत्यानन्दी - दीपिका ( कर्ता ) भिन्न होना चाहिए । ' तप्यः तापकादन्यः कर्मत्वात् नगरवत् ' ( तप्य तापकसे भिन्न है, क्योंकि वह कर्म है जैसे नगर ) तो क्या वे तप्य तापक दोनों आत्माके स्वरूप हैं अथवा धर्म? यदि स्वरूप हैं तो उनसे आत्मा कभी मुक्त नहीं होगा, इससे उनकी निवृत्ति के लिए तत्त्वज्ञानका प्रतिपादक उपनिषद् शास्त्र व्यर्थं सिद्ध होगा । यदि धर्म हैं तो वे स्वरूपके अन्तर्भूत हैं वा बहिर्भूत? प्रथम पक्षमें भी दीपक अपने स्वरूपगतधमं उष्णता और प्रकाशसे मुक्त नहीं होता, इस प्रकार आत्मा भी तप्य तापकसे मुक्त नहीं होगा । * दूसरा विकल्प - इसमें जो जल और तरङ्ग आदिका उपन्यास है उसमें भी यह देखा जाता है कि जल अपने धर्मं तरङ्ग आदिके आविर्भाव और तिरोभावसे कभी मुक्त नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी अपने बाह्य धर्मं तप्य और तापकके आविर्भाव और तिरोभावसे कभी मुक्त नहीं होगा । तप्य तापकका आत्मासे भेद अथवा अभेद माननेपर भी दोष है । भेद माननेसे अभेद सिद्धान्तकी हानि और अभेद माननेसे लोक प्रसिद्धिसे विरोध है, क्योंकि लोक में तप्य तापक, अर्थी और अर्थ का भेद व्यवहार होता है ।

पृष्ठ 447

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 447 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो -दीपिका सहित ४१३ व्यर्थानर्थानर्थ एवेति तापकः स उच्यते । तप्यस्तु पुरुषो य एकः पर्यायेणोभाभ्यां संबध्यत इति तयोस्तप्यतापकयोरेकात्मतायां मोक्षानुपपत्तिः । जात्यन्तरभावे तु तत्संयोगहेतुपरि-हारात्स्यादपि कदाचिन्मोक्षोपपत्तिरिति । अत्रोच्यते - न, एकत्वादेव तप्यतापकभावानुप-पत्तेः । भवेदेष दोषो यद्येकात्मतायां तप्यतापकावन्योन्यस्य विषयविषयिभावं प्रतिपद्येया ताम् । न त्वेतदस्ति, एकत्वादेव । न ह्यग्निरेकः सन्स्वमात्मानं दहति प्रकाशयति वा सत्यप्यौ-यप्रकाशादिधर्मभेदे परिणामित्वे च । किं कूटस्थे ब्रह्मण्येकस्मिंस्तप्यतापकभावः संभ-वेत्? क्व पुनरयं तव्यतापकभावः स्यादिति? उच्यते - किं न पश्यसि कर्मभूतो जीवद्दे-हस्तप्यस्तापकः सवितेति? ननु तप्तिर्नाम दुःखम्, सा चेतयितुर्नाचेतनस्य देहस्य । यदि हि देहस्यैव तप्तिः स्यात्सा देहनाशे स्वयमेव नश्यतीति तन्नाशाय साधनं नैषितव्यं स्या-दिति । उच्यते - देहाभावेऽपि केवलस्य चेतनस्य तप्तिर्न दृष्टा । न च त्वयापि तप्तिर्नाम विक्रिया चेतयितुः केवलस्येष्यते । नापि देहचेतनयोः संहतत्वम्, अशुद्धयादिदोषप्रसङ्गात् । नच तप्तेरेव तप्तिमभ्युपगच्छसि । कथं तवापि तप्यतापकभावः? सत्त्वं तप्यं तापकं रज अनर्थ ही हैं, इससे वह तापक कहा जाता है । जो एक क्रमसे दोनोंके साथ सम्बद्ध होता है वह पुरुष तप्य है । उन तप्य और तापकके एकरूप होनेपर मोक्षकी उपपत्ति नहीं होगी । यदि उनमें भेद हो तो उसके संयोगके हेतुका परिहार होनेसे कदाचित् मोक्ष मी हो सकता है । सिद्धान्ती -- इसपर कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि परमार्थ में एकत्व होनेसे तप्य तापकभाव ही नहीं हो सकता । यह दोष होता यदि एकरूपमें तप्य और तापक परस्पर विषयविषयिभावको प्राप्त होते, परन्तु यहाँ एकत्व होनेसे ऐसा नहीं है । एक अग्नि यद्यपि उष्णता, प्रकाश आदि भिन्न धर्मोसे युक्त और परिणामशील है, तो भी वह अपनेको जालाती या प्रकाशित नहीं करती, तो फिर एक कूटस्थ ब्रह्ममें तप्यतापकभाव कैसे संभव होगा? पुनः यह तप्यतापकमाव कहाँ होगा? कहते हैं - क्या नहीं देखता कि कर्मरूप जीवित देह तप्य है और सूर्यं तापक | परन्तु तप्ति नाम दुःखका है वह चेतनको होता है अचेतन देहको नहीं, यदि देहको ही दुःख होता तो वह देह के नाश होनेपर स्वयं ही नष्ट हो जाता है, उसके नाश करनेके लिए साधनों की खोज नहीं करनी चाहिए । कहते हैं - देहके अभाव में केवल चेतनको भी दुःख नहीं देखा गया है । यह तुमको भी इष्ट नहीं है कि तति क्रिया केवल चेतनको है । अशुद्धि आदि दोषोंके प्रसङ्ग होनेसे देह और चेतनका संघात मी तुमको इष्ट नहीं है, और तापको ताप होता भी तुम स्वीकार नहीं करते, तो तुम्हारे मतमें तप्यतापकभाव किस प्रकार सिद्ध होगा? यदि कहो कि सत्त्वगुण तप्य है सत्यानन्दी -दीपिका * इस प्रकार अद्वेतमतमें मुक्तिकी अनुपपत्ति दिखलाकर सांख्य अब अपने मतमें ' जात्यन्तरमावे तु ' इत्यादिसे मुक्तिकी उपपत्ति दिखलाते हैं - हक्यक्ति पुरुषका जो बुद्धिके साथ स्वस्वामिभाव सम्बन्ध है वह तापका कारण है, उसका कारण अविवेक है, उसकी निवृत्ति विवेकख्याति ( जड़ और चेतनके भेदज्ञान ) से होती है, उसको निवृत्ति से सम्बन्ध निवृत्त और सम्बन्ध निवृत्तिसे तापकी निवृत्ति हो जाती है, इस प्रकार पुरुषकी मुक्ति हो जाती है । इस विषय में पञ्चशिखाचार्यंने कहा भी है- ' तत्संयो-गहेतुविवर्जनात्स्यादयमात्यन्तिको दुःखप्रतिकारः ' ( बुद्धि और पुरुषके स्वस्वामिभाव सम्बन्धके हेतु अविवेकके निवृत्त होनेसे यह आत्यन्तिक दुःखका प्रतिकार ( निवृत्ति ) हे ता है ) वस्तुतः असङ्ग पुरुषमें बन्ध और मोक्ष नहीं हैं ये तो चित्प्रतिबिम्बित बुद्धिके धर्म हैं, केवल पुरुषमें उपचारसे कहे जाते हैं, जैसे राजामें जय - पराजयका गौण व्यवहार होता है । ' सैव च बध्यते मुच्यते च ' ( वह बुद्धि हो बद्ध और मुक्त होती है ) इस प्रकार हमारे मतमें मोक्ष सिद्ध हो सकता है । * यहाँ सांख्यसे पूछना चाहिए कि ताप केवल चेतनको है अथवा देहके साथ तादात्म्यापन्न चेतनको वा तापको ही तप्ति है अथवा सत्त्वगुणको ताप है? क्रमशः सबको ' उच्यते ' आदिसे कहते हैं ।

पृष्ठ 448

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 448 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४१४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ५ पा ० २ इति चेत् न ताभ्यां चेतनस्य संहतत्वानुपपत्तेः । सत्त्वानुरोधित्वाच्चेतनोऽपि तप्यत इवेति चेत् - परमार्थतस्तर्हि नैव तप्यत इत्यापतति, इवशब्दप्रयोगात् । न चेत्तप्यते नेव-शब्दो दोषाय । नहि डुण्डुभः सर्प इवेत्येतावता सविषो भवति । सर्पो वा डुण्डुभ इवेत्ये-तावता निर्विषो भवति । अतश्चाविद्याकृतोऽयं तप्यतापकभावो न पारमार्थिक इत्यभ्युपग-न्तव्यमिति । नैवं सति ममापि किंचिदुष्यति । अथ पारमार्थिकमेव चेतनस्य तप्यत्वम-भ्युपगच्छसि तवैव सुतरामनिर्मोक्षः प्रसज्येत, नित्यत्वाभ्युपगमाच्च तापकस्य ॥ तप्य-तापकशक्त्योर्नित्यत्वेऽपि सनिमित्तसंयोगापेक्षत्वात्तप्तेः संयोगनिमित्तादर्शन निवृत्तावा-त्यन्तिकः संयोगोपरमः, ततश्चात्यन्तिको मोक्ष उपपन्न इति चेत् - न, अदर्शनस्य तमसो नित्यत्वाभ्युपगमात् । गुणानां चोद्भवाभिभवयोरनियतत्वादनियतः संयोगनिमित्तोपरम इति वियोगस्य । प्यनियतत्वात्सांख्यस्यै वा निर्मोक्षोऽपरिहार्यः स्यात् । औपनिषदस्य स्वात्मैकत्वाभ्युपगमादेकस्य च विषयविषयिभावानुपपत्तेर्विकारभेदस्य च वाचारम्भण-मात्रत्वश्रवणादनिर्माक्षशङ्का स्वप्नेऽपि नोपजायते । व्यवहारे तु यत्र यथा दृष्टस्तप्यताप-कभावस्तत्र तथैव स इति न चोदयितव्यः परिहर्तव्यो वा भवति ॥ १० ॥

( २ महद्दीर्घाधिकरणाम् सू ० ११ ) प्रधानकारणवादो निराकृतः । परमाणुकारणवाद इदानीं निराकर्तव्यः । तत्रादौ रजोगुण तापक है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि उनके साथ चेतनाका संहतत्व नहीं हो सकता । यदि कहो कि सत्त्व ( बुद्धि ) के अनुसारी होनेसे चेतन मी तपता - सा दुःख भोगता - सा है, तो परमार्थसे वह दुःखी नहीं होता, क्योंकि ' इव ' शब्द के प्रयोग होने से ऐसा ही प्राप्त होता है । यदि परमार्थसे चेतन तप्त नहीं होता तो ' इव ' शब्द दोषके लिए नहीं होता । डुण्डुम साँप सा होता है ऐसा कहने मात्रसे डुण्डुम विषयुक्त नहीं हो जाता, एवं सर्प डुण्डुम - सा होता है इतने कथन मात्रसे सर्प विषरहित नहीं हो जाता । इसलिए यह तप्यतापकभाव अविद्याकृत है, पारमार्थिक नहीं है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए । ऐसा माननेपर हमारे पक्ष में भी कोई दोष नहीं है । यदि चेतनको पारमार्थिक ही तुम तप्य मानें तो तुम्हारे मतमें ही सुतरां मोक्षाभाव प्रसक्त होगा, क्योंकि तुम्हारे सिद्धान्त में तापक ( रजोगुण ) नित्य स्वीकार किया गया है । यदि कहो कि तप्य और तापककी शक्तियोके नित्य होनेपर भी ताप निमित्त सहित संयोगकी अपेक्षा रखता है, इससे संयोगके निमित्त- अज्ञानकी निवृत्ति हो जाने से संयोग आत्यन्तिक उपरत हो जाता है, उससे आत्यन्तिक मोक्ष उपपन्न होता है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि अज्ञानरूप तमोगुण नित्य स्वीकार किया गया है । गुणों का उद्भव और अभिभव ( लय ) अनियत होनेसे संयोगके निमित्तका उपरम भी अनियत है, इस प्रकार उनका वियोग भी अनियत होनेसे सांख्योंके मतमें ही मोक्षाभाव अपरिहार्य है । वेदान्तमें तो आत्मैकत्व स्वीकार होनेसे एकमें विषयविषयिभाव नहीं हो सकता, विकारभेद तो वाचारम्भण मात्र है । ऐसी श्रुति होनेसे मोक्षाभावकी शङ्का तो स्वप्न में भी उत्पन्न नहीं होती । परन्तु व्यवहारमें तो जहाँ जैसा तप्यतापकमाव देखा गया है वह वहाँ वैसा ही है । इसलिए इसके विषयमें शङ्का करना अथवा परिहार करना योग्य नहीं है ॥ १० ॥

प्रधान कारणवादका निराकरण किया गया । अब परमाणु कारणवादका निराकरण करना चाहिए | इस विषय में पहले परमाणु कारणवादीने ब्रह्मवादीपर जो दोष लगाया है उसका प्रति-सत्यानन्दी - दीपिका * ' चलं गुणवृत्तम् ' ( गुणोंका स्वभाव चल है ) इसलिए संयोगके समान वियोग अनियत है, अतः सांख्यमतमें ही मोक्षाभाव प्रसङ्ग होगा । हमारे मतमें तो कल्पित द्वैतको लेकर लोक प्रसिद्ध

तप्यतापकभाव स्वीकार करते हैं । अतः वेदान्तसमन्वय विरुद्ध नहीं है ॥ १० ॥

पृष्ठ 449

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 449 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० २ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४१५ तावद्योऽवादिना ब्रह्मवादिनि दोष उत्प्रेक्ष्यते स प्रतिसमाधीयते । तत्रायं वैशेषिकाणाम-भ्युपगमः - कारणद्रव्यसमवायिनो गुणाः कार्यद्रव्ये समानजातीयं गुणान्तरमारभन्ते, शुक्ले-भ्यस्तन्तुभ्यः शुक्लस्य पटस्य प्रसवदर्शनात्तद्विपर्ययादर्शनाच्च । तस्माच्चेतनस्य ब्रह्मणो जगत्कारणत्वेऽभ्युपगम्यमाने कार्येऽपि जगति चैतन्यं समवेयात्, तददर्शनात्तु न चेतनं ब्रह्म जगत्कारणं भवितुमर्हतीति । इममभ्युपगमं तदीययैव प्रक्रियया व्यभिचारयति-महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् || ११ || पदच्छेद - महद्दीर्घवत्, वा, ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् । सूत्रार्थ - ( ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ) हस्त्र द्वयणुक और परमाणुसे ( महद्दीर्घवद्वा ) महत् और दीर्घं उत्पन्न होते हैं, वैसे चेतन ब्रह्मसे अचेतन जगत् उत्पन्न होता है । * एषा तेषां प्रक्रिया - परमाणवः किल कञ्चित्कालमनारब्धकार्या यथायोगं रूपा-दिमन्तः पारिमाण्डल्यपरिमाणाश्च तिष्ठन्ति । ते च पश्चाददृष्टादिपुरःसराः संयोगसचि-वाश्च सन्तो द्वयणुकादिक्रमेण कृत्स्नं कार्यजातमारभन्ते । कारणगुणाश्च कार्ये गुणान्तरम् । यदा द्वौ परमाणू द्व्यणुकमारभेते तदा परमाणुगता ं रूपादिगुणविशेषाः शुक्लादयो द्वयणुके शुक्लादीनपरानारभन्ते । परमाणुगुणविशेषस्तु पारिमाण्डल्यं न द्वयणुके पारिमाण्डल्यमपरमारभते, द्वयणुकस्य परिमाणान्तरयोगाभ्युपगमात् । अणुत्वह्रस्वत्वे समाधान किया जाता है । उसमें वैशेषिकों का यह सिद्धान्त है कि कारण द्रव्यमें समवाय सम्बन्धसे विद्यमान गुण कार्यं द्रव्यमें समान जातीय अन्य गुणको आरम्भ करते हैं, जैसे शुक्लतन्तुओंसे शुक्ल पटका प्रसव देखनेमें आता है, उसके विपर्यय देखने में नहीं आता, इसलिए चेतन ब्रह्मको जगत्का कारण स्वीकार करनेपर कार्यं जगत् में भी चेतनता सम्बन्धित होनी चाहिए । परन्तु उसके दर्शन न होनेसे चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं हो सकता । उनके इस सिद्धान्तको उन्होंकी प्रक्रियासे व्यभिचरित करते हैं -उनकी यह प्रक्रिया है— यथायोग रूपादि युक्त पारिमाण्डल्य परिमाण ( अणुगत परिमाण ) विशिष्ट परमाणु कुछ काल पर्यन्त कार्यका आरम्भ किए विना रहते हैं, पश्चात् वे अदृष्ट आदि कारण पूर्वक संयोग सहकारी युक्त होते हुए द्वयणुक आदि क्रमसे सम्पूर्ण कार्य समूहका आरम्भ करते हैं । और कारणके गुण कार्यमें [ समानजातीय ] अन्य गुणोंका आरम्भ करते हैं । जब दो परमाणु द्वयणुकका आरम्भ करते हैं तब परमाणुगत शुक्ल आदि रूप विशेष गुण द्वयणुकमें अन्य शुक्ल आदिका आरम्भ करते हैं । परन्तु परमाणुगत गुण विशेष पारिमाण्डल्य द्वयणुक में अन्य पारिमाण्डल्यका आरम्भ नहीं करता, क्योंकि द्वयणुकमें अन्य परिमाणका सम्बन्ध माना गया है । द्वयणुकवर्ती परि-माणको अणुत्व और ह्रस्वत्व वर्णन करते हैं । परन्तु जब मी दो द्वयणुक चतुरणुकका आरम्भ करते सत्यानन्दी - दीपिका * चेतन ब्रह्मसे जगत् की उत्पत्तिका प्रतिपादक वेदान्तसमन्वय इस अधिकरणका विषय है । यद्यपि ' न विलक्षणत्वात् ' ( ब्र ० सू ० २१२१४ ) इस सूत्रमें चेतनसे अचेतनकी सृष्टि कही गई है, तो भी वैशेषिक न्यायका व्यभिचार उसकी प्रक्रियासे सिद्ध करना इस सूत्र का प्रयोजन है । यह उनकी प्रक्रिया है - प्रलय में परमाणु निश्चल और असंयुक्त रहते हैं । सृष्टिकालमें जीवोंके कर्मोंको लेकर जब ईश्वरको सृष्टि करनेकी इच्छा होती है तब परमाणुओं में परस्पर संयुक्त होने की क्रिया उत्पन्न होती है । उससे दो परमाणुओं का संयोग होता है, जिससे द्वयणुक उत्पन्न होता है, तीन द्वयणुकके संयोगसे त्र्यणुक, चार द्व्यणुकके संयोगसे चतुरणुक उत्पन्न होता है । और कारणके गुण कार्यमें

पृष्ठ 450

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 450 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ हि द्वयणुकवर्तिनी परिमाणे वर्णयन्ति । यदापि द्रयणुके चतुरणुकमारभेते, तदापि समानं द्व्यणुकसमवायितां शुक्लादीनामारम्भकत्वम् । अणुत्वहस्वत्वे तु द्वयणुक-समवायिनी अपि नैवारभेते, चतुरणुकस्य महत्त्वदीर्घत्वपरिमाणयोगाभ्युपगमात् । यदापि बहवः परमाणवो बहूनि वा द्व्यणुकानि द्वयणुकसहितो वा परमाणुः कार्य-मारभते, तदापि समानैषा योजना । तदेवं यथा परमाणोः परिमण्डलात्सतोऽणु ह्रस्वं चद्वयणुकं जायते, महद्दीर्घ च त्र्यणुकादि, न परिमण्डलम्, यथा वा द्व्यणुकाद-गोस्वाच्च सतो महद्दीर्घं च त्र्यणुकं जायते नाणु, नो ह्रस्वम्, एवं चेतनाद्-ब्रह्मणोऽचेतनं जगजनिष्यत इत्यभ्युपगमे किं तव च्छिन्नम्? अथ भन्यसे विरोधिना परिमाणान्तरेणाक्रान्तं कार्यद्रव्यं द्वयणुकादीत्यतो नारम्भकाणि कारणगतानि पारिन् माण्डल्यादीनीत्यभ्युपगच्छामि, न तु चेतनाविरोधिना गुणान्तरेण जगत आक्रान्त-त्वमस्ति, येन कारणगता चेतना कार्ये चेतनान्तरं नारभेत । न ह्यचेतना नाम चेतना-विरोधी कश्चिद्गुणोऽस्ति चेतनाप्रतिषेधमात्रत्वात् । तस्मात्पारिमाण्डव्यादिवैषम्या-हैं, तभी कमें समवाय सम्बन्धसे विद्यमान शुक्ल आदि गुणोंको आरम्भकत्व समान है । परन्तु अणुत्व और हस्वत्व द्वयणुक में समवाय सम्बन्धसे रहनेपर भी कार्यके आरम्भक नहीं होते हैं, क्योंकि चतुरणुकका महत्व और दीर्घत्व परिमाणयोग माना गया है । परन्तु जब भी बहुत परमाणु, बहुत द्वणुक अथवा द्वणुक सहित परमाणु कार्य आरम्भ करते हैं तब भी यह योजना समान ही है । तो इसप्रकार जैसे परिमण्डल परमाणुसे अणु और हस्व द्वघणुक उत्पन्न होता है तथा महत् और दीर्घं त्र्यणुक आदि उत्पन्न होते हैं परिमण्डल उत्पन्न नहीं होता, अथवा जिस प्रकार अणु और ह्रस्व कसे महत् और दीर्घ त्र्यणुक उत्पन्न होता है, न अणु और न हस्व । उसी प्रकार चेतन ब्रह्मसे अचेतन जगत् उत्पन्न हो जायगा, ऐसा स्वीकार करनेमें तुम्हारी क्या हानि है? यदि तुम ऐसा मानो किणुक आदि कार्यद्रव्य विरोधी अन्य परिमाणसे आक्रान्त हैं, इससे कारणगत पारिमाण्डल्यादि आरम्भक नहीं होते, मैं ऐसा स्वीकार करता हूँ । परन्तु चेतनासे विरोधी अन्य गुणसे जगत् आक्रान्त नहीं है, जिससे कि कारणगत चेतना कार्यमें अन्य चेतनाका आरम्भ न करे, क्योंकि अचेतना नामक चेतनाका विरोधी कोई गुण नहीं है केवल चेतनाका अभावमात्र है । इसलिए पारिमाण्डल्य आदिसे सत्यानन्दी - दीपिका समान जातीय अन्य गुणोंको उत्पन्न करते हैं । इसप्रकार सम्पूर्ण कार्यं जगत् की उत्पत्ति होती है । परन्तु समवायिकारण परमाणु तथा द्वयणुकका परिमाण क्रमसे द्वयणुक, त्र्यणुक अथवा चतुरणुकके परिमाणको उत्पन्न नहीं करता, क्योंकि कारणका परिमाण समानजातीय और उत्कृष्ट परिमाणको उत्पन्न करता है । परमाणुको परिमण्डल और तद्गत परिमाणको पारिमाण्डल्य कहा जाता है । द्वयणुका ह्रस्व और अणु परिमाण है । उनसे उत्पन्न कार्यपरिमाण उत्कृष्ट होनेसे अणुतर होगा । इससे त्र्यणुकका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होगा, कारण कि प्रत्यक्ष में उद्भूतरूप और महत्परिमाण कारण माने गये हैं । अतः द्व्यणुक से उत्पन्न कार्यं द्वयणुकके ही समान होगा, स्थूल न होने से उसका प्रत्यक्ष भी न होगा । इससे इसप्रकारकी सृष्टिका आरम्भ व्यर्थं सिद्ध होगा, इसलिए वैशेषिक सिद्धान्तमें परमाणु और द्वयणुक गत संख्याको कार्यपरिमाणका आरम्भक माना गया है । जो परमाणुके समुदाय से घट आदि कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं, उनके मतमें भी घटके परिमाणका परमाणु परिमाण आरम्भक माननेसे घटका प्रत्यक्ष ही न होगा, क्योंकि वह स्वयं अणुपरिमाण घटमें अणुतर परिमाणको उत्पन्न करेगा । दूसरी बात यह भी है कि अवयवी घटके ध्वस्त होनेसे उसके अवयव टुकड़े नहीं दीखने चाहिए, कारण कि वे घटके आरम्भक नहीं हैं, घटका आरम्भक परमाणु समुदाय है वह अतीन्द्रिय है तो उसका कार्य घट भी अतीन्द्रिय ही होगा, इत्यादि दोष प्रसक्त होंगे ।