श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 451–460
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 451–460
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अधि ० २ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४१७ त्प्राप्नोति चेतनाया आरम्भकत्वमिति । 8 मैवं मंस्थाः तथा कारणे विद्यमानानामपि पारिमाण्डल्यादीनामनारम्भकत्वमेवं चैतन्यस्यापीत्यस्यांशस्य समानत्वात् । नच परिमा णान्तराक्रान्तत्वं पारिमाण्डल्यादीनामनारम्भकत्वे कारणम्. प्राक्परिमाणान्तरारम्भात्पा-रिमाण्डल्यादीनामारम्भकत्वोपपत्तेः, आरब्धमपि कार्यद्रव्यं प्राग्गुणारम्भात्क्षणमात्रमगुणं तिष्ठतीत्यभ्युपगमात् । न च परिमाणान्तरारम्भे व्यग्राणि पारिमाण्उल्यादीनीत्यतः स्वस-मानजातीयं परिमाणान्तरं नारभन्ते, पारिमाणान्तरस्यान्यहेतुत्वाभ्युपगमात् । ' कारणव हुत्वा-त्कारणमहत्त्वात्प्रचयविशेषाच्च महत् ' ( वै ० सू ० ७ / १1 ९ ) ' तद्विपरीतमणु ' ( वै ० सू ० ७।१।१० ) ( एतेन दीर्घत्वस्वत्वे व्याख्याते ' ( वै ० स् ० ७।१।१७ ) इति हि काणभुजानि सूत्राणि । न च संविधान-विशेषात्कुतश्चित्कारणबहुत्वादीन्येवारभन्तेन पारिमाडल्यादीनीत्युच्येत द्रव्यान्तरे गुणा-न्तरे वारभ्यमाणे सर्वेषामेव कारणगुणानां स्वाश्रयसमवायाविशेषात् । तस्मात्स्वभावादेव पारिमाण्डल्यादीनामनारम्भकत्वं तथा चेतनाया अपीति द्रष्टव्यम् । * संयोगाच्च द्रव्या-दीनांविलक्षणानामुत्पत्तिदर्शनात्समानजातीयोत्पत्तिव्यभिचारा । द्रव्ये प्रकृते गुणोदाह-वैषम्य ( भिन्न ) होने के कारण चेतनामें आरम्भकत्व प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - ऐसा मत समझो, क्योंकि जैसे कारणमें विद्यमान भी पारिमाण्डत्यादि अनारम्भक हैं, वैसे चैतन्य मी, इस अंशमें तो दोनों पक्ष समान है । पारिमाण्डल्यादिके अनारम्भकत्वमें अन्य परिमाणसे आक्रान्त होना कारण नहीं है, क्योंकि अन्य परिमाण ( अणुत्व और ह्रस्वत्व ) के आरम्भके पूर्व पारिमाण्डत्यादि आरम्भक हो सकते हैं, कारण कि आरब्व भी कार्यद्रव्य गुणोंके आरम्भके पूर्व क्षणमात्र गुण रहित रहता है, ऐसा स्वीकार किया गया है । पारिमाण्डल्यादि अन्य परिमाणके आरम्भमें व्यग्र हैं, इससे समान-जातीय अन्य परिमाणका आरम्भ नहीं करते, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि परिमाणान्तरका अन्य हेतु ( कारणगत संख्या ) स्वीकार किया गया है, ' कारणबहुत्वात् ० " " ( कारणके बहुत से, कारणके महत्त्वसे और अवयवोंके संयोग विशेष से महत् परिमाण उत्पन्न होता है ) ' तद्विपरीतमणु ' ( उससे विपरीत अणु परिमाण उत्पन्न होता है ) ' एतेन ० ' ( इससे दीर्घत्व और हस्वत्वका व्याख्यान हुआ ) ये कणादके सूत्र हैं । किसी संनिधान विशेषसे कारण बहुत्व आदि आरम्भक होते हैं पारिमाण्डत्यादि नहीं होते, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योकि अन्य द्रव्य अथवा अन्य गुण के आरम्भ करनेमें सब कारण गुणों का स्वाश्रयसमवाय समान है, इसलिए स्वभावसे पारिमाण्डत्यादि अनारम्भक हैं, वैसे चेतना मी अनारम्भक है ऐसा समझना चाहिए । और इसोप्रकार संयोगसे विलक्षण द्रव्य आदिकी उत्पत्ति देखनेमें आती है, इससे समान जातियोंकी उत्पत्ति में व्यभिचार है । यदि कहो कि प्रकृत द्रव्यमें गुणका उदाहरण अयुक्त है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि दृष्टान्तसे केवल. विलक्षण आरम्भमात्र विवक्षित सत्यानन्दी - दीपिका * द्वयक परिमाणका कारण परमाणुगत द्वित्वसंख्या है, इसलिए पारिमाण्डल्यादिके आरम्भक होनेमें कोई बाधक नहीं है । द्वयक परिमाण आदि विषयमें वैशेषिक दर्शन के सूत्र उद्धृत किये गये हैं । द्व्यणुकके बहुत संख्यासे त्र्यणुक में महत्परिमाण उत्पन्न होता है, मृत्तिका कारण-के महत्त्वसे घट आदि महत्त्व, दो रूईके पिण्डोंसे आरब्त्र अतिस्थूल तुलविण्डमें प्रचय- अवयवों के स्थलसंयोगविशेषसे महत्त्व उत्पन्न होता है और महत्त्वके विरुद्ध अणुत्व परमाणुगत द्वित्वसंख्यासे कमें उत्पन्न होता है । * वैशेषिक लोग शरीरको पाँच भौतिक मानते हैं और चार्वाक लोग आकाशको भूत न मानकर केवल शून्य अवकाशात्मक मानते हैं, अतः उनके मतमें शरीर चार भूतोंका है । इसलिए वे ' प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाणाम ' इस सूत्र से शङ्का करते हैं । यद्यपि यह सूत्र पूर्वपक्षका है तो भी कणादको द्रव्यके
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४१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ रणमयुक्तमिति चेत् - न, दृष्टान्तेन विलक्षणारम्भमात्रस्य विवक्षितत्वात् । न च द्रव्यस्य द्रव्यमेवोदाहर्तव्यं गुणस्य वा गुण एवेति कश्चिन्नियमे हेतुरस्ति । सूत्रकारोऽपि भवतां द्रव्यस्य गुणमुदाजहार - ' प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाणामप्रत्यक्षत्वात्संयोगस्य पञ्चात्मकं न विद्यते ' ( दै ० सू ० ४।२।२ ) इति । यथा प्रत्यक्षाप्रत्यक्षयोर्भूम्याकाशयोः समवयन्संयोगोऽप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्षा-प्रत्यक्षेषु पञ्चसु भूतेषु समवयच्छरीरमप्रत्यक्षं स्यात् । प्रत्यक्षं हि शरीरम् । तस्मान्न पाञ्चभौतिकमिति । एतदुक्तं भवति - गुणश्च संयोगो द्रव्यं शरीरंम् । ' दृश्यते तु ' ( ब्र ० सू ० २।१।६ ) इति चात्रापि विलक्षणोत्पत्तिः प्रपञ्चिता । नन्वेवं सति तेनैवैतद्गतम् । नेति ब्रूमः-तत्सांख्यं प्रत्युकम् एतत्तु वैशेषिकं प्रति । नन्वतिदेशोऽपि समानन्यायतया कृतः । ' एतेन शिष्टापरिप्रहा अपि व्याख्याताः ' ( ब ० सू ० २।३।१२ ) इति । सत्यमेतत्, तस्यैव त्वयं वैशेषिकप्रक्रियारम्भे तत्प्रक्रियानुगतेन निदर्शनेन प्रपञ्चः कृतः ॥११ ॥
( ३ परमाणुजगद कारणत्वाधिकरणम्, सू ० १२-१७ ) उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥ १२ ॥
पदच्छेद - उभयथा, अपि, न, कर्म, अतः, तदभावः । सूत्रार्थ - ( उभयथापि ) दोनों प्रकारसे मी परमाणु में ( न कर्म ) उत्पत्ति विषयक क्रिया नहीं हो सकती, ( अतः ) ( तदभावः ) परमाणुसे द्व्यणुक आदि क्रमसे सृष्टि नहीं हो सकती । * इदानीं परमाणुकारणवादं निराकरोति । स च वाद इत्थं समुतिष्ठते - पटादीनि हि लोके सावयवानि द्रव्याणि स्वानुगतैरेवसंयोग सचिवैस्तन्त्वा दिभिर्द्रव्यैरारभ्यमाणानि है । द्रव्यका द्रव्य ही उदाहरण होना चाहिए अथवा गुणका गुण ही, इस नियममें कोई हेतु नहीं है । आपके सूत्रकारने भी द्रव्यका गुण उदाहरण दिया है - ' प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाणाम ' ( प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षका संयोग प्रत्यक्ष न होनेसे शरीर पंचभूतात्मक नहीं है ) जैसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमि और आकाश में समवाय सम्बन्धसे रहता हुआ संयोग अप्रत्यक्ष है, वैसे ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पाँच भूतोंमें समवाय सम्बन्धसे रहता हुआ शरीर अप्रत्यक्ष होगा । परन्तु शरीर तो निश्चित प्रत्यक्ष है, इसलिए पाँच मौतिक नहीं है । तात्पर्य यह है कि संयोग गुण है और शरीर द्रव्य है । ' दृश्यते तु ' इस सूत्र में भी विलक्षण उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन किया गया है । परन्तु ऐसा हो तो उससे ही यह सूत्र गतार्थ है । हम कहते हैं कि ऐसा नहीं है, वह सांख्यके प्रति कहा गया और यह मूत्र वैशेषिकों के प्रति कहा जाता है । परन्तु ' एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ' ( इससे शिष्टोंसे अपरिगृहीतोंका मी प्रत्याख्यान समझना ) इसप्रकार समान न्यायरूपसे अतिदेश भी किया गया है । यह सत्य है, परन्तु उसीका तो वैशेषिक प्रक्रियाके आरम्भ में उसकी प्रक्रियाके अनुसारी दृष्टान्तसे यह विस्तार
किया गया है ॥। ११ ॥
अब परमाणु कारणवादका निराकरण करते हैं - वह वाद इसप्रकार उपस्थित होता है, लोकमें पट आदि सावयव द्रव्य स्वानुगत संयोग सहकारी तन्तु आदि द्रव्योंसे उत्पन्न होते देखे गये सत्यानन्दी - दीपिका विषयमें गुणका उदाहरण मान्य है । अतः भगवान् माष्यकारने भी इस सूत्रको उदाहरणरूपसे दिया है, इसलिए चेतन ब्रह्मसे भी अचेतन जगत् उत्पन्न हो जायगा और उसमें चेतना उत्पन्न नहीं होगी ॥ ११ ॥
* ईश्वरसे अनधिष्ठित होनेसे प्रधान जगत्का कारण नहीं है, तो भी ईश्वरसे अधिष्ठित होनेसे परमाणु जगत् के कारण हों, इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे सांख्याधिकरणके अनन्तर इस अधि-करणका आरम्भ है । द्व्यणुक आदि क्रमसे परमाणुद्वारा यह समस्त भावात्मक कार्यं जगत् उत्पन्न
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अधि ० ३ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४१ ९ दृशिनि । तत्सामान्येन यावत्किचित्सावयवं तत्सर्वं स्वानुगतैरेव संयोगसचिवैस्तैस्तैर्द्र-व्यैरारब्धमिति गम्यते । स चायमवयवावयविविभागो यतो निवर्तते, सोऽपकर्षपर्यन्त-गतः परमाणुः । सर्व चेदं जगद् गिरिसमुद्रादिकं सावयवम्, सावयत्वाच्चाद्यन्तवत् । न चाकारणेन कार्येण भवितव्यमित्यतः परमाणवो जगतः कारणमिति कणभुगभिप्रायः । तानीमानि चत्वारि भूतानि भूम्युदकतेजः पवनाख्यानि सावयवान्युपलभ्य चतुर्विधाः परमाणवः परिकल्प्यन्ते तेषां चापकर्षपर्यन्तगतत्वेन परतो विभागासंभवाद्विनश्यतां पृथिव्यादीनां परमाणुपर्यन्तो विभागो भवति, स प्रलयकालः । ततः सर्गकाले च वाय-arrogat ष्टापेक्षं कर्मोत्पद्यते, तत्कर्म स्वाश्रयमणुमण्वन्तरेण संयुनक्ति, ततो द्रयणु-कादिक्रमेण वायुरुत्पद्यते । एवमग्निरेवमाप एवं पृथिवी, एवमेव शरीरं सेन्द्रियमिति । एवं सर्वमिदं जगदणुभ्यः संभवति, अणुगतेभ्यश्च रूपादिभ्यो द्वयणुकादिगतानि रूपादीनि संभवन्ति तन्तुपटन्यायेनेति काणादा मन्यन्ते । तत्रेदमभिधीयते — विभागा-वस्थानां तावदणूनां संयोगः कर्मापेक्षोऽभ्युपगन्तव्यः, कर्मवतां तन्त्वादीनां संयोग-दर्शनात् । कर्मणश्च कार्यत्वान्निमित्तं किमप्यभ्युपगन्तव्यम् । अनभ्युपगमे निमित्ता-भावान्नाणुष्वाद्यं कर्म स्यात् । अभ्युपगमेऽपि यदि प्रयत्नोऽभिघातादिर्वा यथादृष्टं हैं । इस सामान्य उदाहरणसे ज्ञात होता है कि जो कोई सावयव ( अवयवी द्रव्य ) है वह सब अपने अनुगत संयोग सहकारी युक्त तत् तत् द्रव्योंसे आरब्ध है । यह जो अवयवावयविविभाग जहाँपर निवृत्त होता है वह न्यूनतम परिमाणको प्राप्त हुआ ही परमाणु है । पर्वत, समुद्र आदि यह सम्पूर्ण जगत् सावयव है, सावयव होनेसे आदि और अन्तवाला है । कार्यं कारणके बिना नहीं होना चाहिए, अत: परमाणु जगत्के कारण हैं, यह कणादका आशय मत है । पृथिवी, जल, अग्नि और वायु इन चार भूतोंको सावयव देखकर चार प्रकारके परमाणुओं की कल्पना की जाती है, न्यूनतम परिमाण तक विभक्त होनेसे आगे और विभाग के संभव न होनेपर विनष्ट होते हुए उन पृथिवी आदिका परमाणु पर्यन्त जो विभाग होता है, वह प्रलयकाल है । तदनन्तर पुनः सृष्टिकाल में वायु के परमाणुओं में जीवों अष्टकी अपेक्षासे क्रिया उत्पन्न होती है, वह कर्म अपने आश्रयभूत परमाणुका अन्य परमाणु से संयोग करता है, ततः द्वयणुक आदि क्रमसे वायु उत्पन्न होता है, इसीप्रकार अग्नि एवं जल एवं पृथिवी उत्पन्न होती है और इसीप्रकार इन्द्रियों सहित शरीर उत्पन्न होता है । इसप्रकार यह सारा जगत् अणुओंसे उत्पन्न होता है । जैसे तन्तुके रूपसे पटगतरूप उत्पन्न होता है, वैसे पर-मागत रूप आदि द्वयणुक आदिगत रूपादि उत्पन्न होते हैं, ऐसा वैशेषिक मानते हैं । सिद्धान्ती-इस विषय में कहते हैं— विभागावस्था में स्थित परमाणुओं का संयोग कर्मकी अपेक्षासे मानना चाहिए, क्योंकि कर्म युक्त तन्तु आदिका संयोग देखने में आता है । कर्म कार्य है, इसलिए उसका कोई मी निमित्त ( कारण ) मानना चाहिए । निमित्तके स्वीकार न करने पर तो निमित्तके अभाव होने से परमाणुओं में आद्य ( पहला ) कर्म नहीं होगा, यदि स्वीकार करें तो व्यवहारमें जैसे कर्मका निमित्त प्रयत्न अथवा अभिघात ( शब्दजनक संयोग विशेष ) आदि देखे जाते हैं, वैसे परमाणुके कर्मका कोई सत्यानन्दी - दीपिका होता है, यह वैशेषिक का सिद्धान्त इस अधिकरणका विषय है । उनके मतमें प्रत्येक माव कार्यके समवायी, असमवायी और निमित्त तीन कारण होते हैं । तन्तुओं में समवाय सम्बन्धसे पट उत्पन्न होता है, इससे तन्तु पटका समवायिकारण हैं । तन्तुओंका परस्पर संयोग समवाय सम्बन्धसे तन्तुओं में रहकर पटको उत्पन्न करता है, इसलिए तन्तुओं का संयोग पटके प्रति असमवायिकारण है । शेष जुल्लाहा वेम आदि निमित्तकारण हैं । इस पटके उदाहरणसे यह समझना चाहिए कि सब सावयव द्रव्य अपने अवयवोंसे उत्पन्न होते हैं । पृथिवी आदि चारोंके परमाणु नित्य और निवयव होते हैं ।
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ किमपि कर्मणो निमित्तमभ्यपगम्येत, तस्यासंभवान्नैवाणुष्वाद्यं कर्म स्यात् । नहि तस्यामवस्थायामात्मगुणः प्रयत्नः संभवति, शरीराभावात् । शरीरप्रतिष्ठे हि मनस्या-त्मनः संयोगे सत्यात्मगुणः प्रयत्नो जायते । एतेनाभिघाताद्यपि दृष्टं निमित्तं प्रत्याख्या-तव्यम् । सर्वोत्तरकालं हि तत्सर्वं नाद्यस्य कर्मणो निमित्तं संभवति । * अथादृष्ट-माद्यस्य कर्मणो निमित्तमित्युच्येत तत्पुनरात्मसमवायि वा स्यादणुसमवायि वा? उभयथापि नादृष्टनिमित्तमणुषु कर्माविकल्पेत, अदृष्टस्याचेतनत्वात् । नाचेतनं चेतनेनानधिष्ठितं स्वतन्त्रं प्रवर्तते प्रवर्तयति वेति सांख्यप्रक्रियायामभिहितम्, आत्म-नश्चानुत्पन्नचैतन्यस्य तस्यामवस्थायामचेतनत्वात् आत्मसमवायित्वाभ्युपगमाच्च नादृष्टणुषु कर्मणो निमित्तं स्यादसंबन्धात् । अदृष्टवता पुरुषेणास्त्यणूनां संबन्ध इति चेत् — संबन्धसातत्यात्प्रवृतिसातत्यप्रसङ्गो नियामकान्तराभावात् । तदेवं नियतस्य कस्यचित्कर्मनिमित्तस्याभावान्नाणुष्वाद्यं कर्म स्यात् । कर्माभावात्तन्निबन्धनः संयोगो न स्यात् । संयोगाभावाच्च तन्निबन्धनं द्वयणुकादि कार्यजातं न स्यात् । * संयो-गश्चाणोरण्वन्तरेण सर्वात्मना वा स्यादेकदेशेन वा? सर्वात्मना चेदुपचयानुपपत्तेरणु-मात्रत्वप्रसङ्गो दृष्टविपर्ययप्रसङ्गश्च । प्रदेशवतो द्रव्यस्य प्रदेशवता द्रव्यान्तरेण संयो-गस्य दृष्टत्वात् । एकदेशेन चेत्सावयवत्वप्रसङ्गः । परमाणूनां कल्पिताः प्रदेशाः स्युरिति मी निमित्त मानना पड़ेगा । उसका असंभव होनेसे परमाणुओंमें आद्य कर्म नहीं होगा, क्योंकि उस अवस्थामें आत्माके गुण प्रयत्नका संभव नहीं है, कारण कि उस समय शरीर नहीं है । शरीर स्थित हुए मनके साथ आत्माका संयोग होनेपर आत्माका गूण प्रयत्न उत्पन्न होता है । इस कथनसे अभिघात आदि दृष्टनिमित्तका भी प्रत्याख्यान करना चाहिए, क्योंकि यह सब सृष्टिके अनन्तर होने से आद्यकर्मका निमित्त नहीं हो सकता है । यदि कहो कि अष्ट आद्य कर्मका निमित्त है, तो वह अदृट आत्मामें समवाय सम्बन्धले रहने वाला है अथवा अणु समवायो है? दोनों प्रकारसे अदृष्ट निमित्तक परमाणुओं में कर्मकी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि अदृष्ट अचेतन है | चेतनसे अनधिष्ठित अचेतन स्वतन्त्ररूपसे न प्रवृत्त होता है और न किसीको प्रवृत्त करा सकता है, यह सांख्यप्रक्रियामें कहा गया है I । जिसमें चैतन्य उत्पन्न नहीं हुआ है वह आत्मा उस अवस्था में अचेतन है । आत्म-समवायित्व स्वीकार करनेसे अदृष्ट परमाणुओंम कर्मका निमित्त न होगा, क्योंकि उसका अदृष्टके साथ कोई सम्बन्ध नहीं हैं | यदि कहो कि अदृष्टवाले पुरुष के साथ अणुओं का सम्बन्ध है, तो सम्बन्धके निर-न्तर रहने से सर्वदा प्रवृत्तिका प्रसंग होगा, कारण कि अन्य नियामकका अभाव है । इसप्रकार किसी नियत कर्म निमित्त अभाव होने से अणुओंमें आद्यकर्म न होगा, कर्मके अमाद होनेसे कर्म निमित्तक संयोग न होगा । संयोगके अभाव होनेसे तन्निमित्तक द्वयणुक आदि कार्य समुदाय नहीं होगा । एक परमाणुका अन्य परमाणु के साथ संयोग सर्वात्मना होगा अथवा एक देशसे? यदि सर्वात्मना हो, तो उपचय ( रथूलता ) की अनुपपत्ति होनेसे परमाणुमात्रत्व प्रसङ्ग और दृष्ट विपर्यय प्रसङ्ग होगा, क्योंकि प्रदेशवाले द्रव्यका प्रदेशवाले अन्य द्रव्यके साथ संयोग देखा गया है । यदि एक देशसे हो तो सत्यानन्द - दीपिका * तुम्हारे मतमें आत्मा जड़ है ज्ञानमें चेतनता है, अतः अचेतन आत्मासे अचेतन अदृष्ट अधिष्ठित नहीं हो सकता है । ज्ञान शरीरके होनेपर आत्मा और मनके संयोगसे उत्पन्न होता है, इसलिए सृष्टिकाल में आत्मा अचेतन ही है । अदृष्ट आत्मामें समवाय सम्बन्ध से रहता है, उसका बाह्य परमाणुके साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं, जिससे क्रियाका कारण हो । यदि अदृष्टवाले आत्माका परमाणु के साथ सम्बन्ध मानें तो आत्मा व्यापक है, इससे निरन्तर सम्बन्ध होने के कारण परमाणु में निरन्तर क्रिया होगी और पुनः कभी भी प्रलय नहीं होगा, क्योंकि अन्य कोई नियामक नहीं है ।
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अधि ० ३ सू ० १३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४२१ वेत् — कल्पितानामवस्तुत्वादवस्त्वेव संयोग इति वस्तुनः कार्यस्यासमवायिकारणं न स्यात् । असति चासमवायिकारणे द्वयणुकादि कार्यद्रव्यं नोत्पद्येत । यथा चादिसर्गे निमि-त्ताभावात्संयोगोत्पत्त्यर्थं कर्म नाणूनां संभवति, एवं महाप्रलयेऽपि विभागोत्पत्त्यर्थं कर्म नैवाणूनां संभवेत् । नहि तत्रापि किंचिन्नियतं तन्निमित्तं दृष्टमस्ति । अदृष्टमपि सोगप्रसिद्ध-यर्थं न प्रलयप्रसिद्धयर्थमित्यतो निमित्ताभावान्न स्यादणूनां संयोगोत्पत्त्यर्थं विभागोत्प-त्यर्थं वा कर्म । अतश्च संयोगविभागाभावात्तदायत्तयोः सर्गप्रलययोरभावः प्रसज्येत । तस्मादनुपपन्नोऽयं परमाणुकारणवादः ॥१२ ॥
समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥ १३ ॥
पदच्छेद – समवायाभ्युपगमात् च, साम्याद्, अनवस्थितेः । सूत्रार्थ - ( च ) और ( समवायाभ्युपगमात् ) जैसे परमाणुओंसे अत्यन्त भिन्न द्वयणुक समवाय सम्बन्धसे उनके साथ सम्बद्ध है ऐसा स्वीकार किया है, वैसे समवाय भी समवायियोंसे अत्यन्त भिन्न होता हुआ अन्य समवाय सम्बन्धसे उनके साथ सम्बद्ध होगा, ( साम्यात् ) क्योंकि अत्यन्त भेद दोनों में समान है, ( अनवस्थिते: ) ऐसी स्थिति में तत् तत् समवायके लिए अन्य अन्य समवायको कल्पना करनी होगी, इससे अनवस्था होनेके कारण द्वणुक आदि क्रमसे सृष्टि नहीं होगी । * समवायाभ्युपगमाच्च तदभाव इति प्रकृतेनाणुवादनिराकरणेन संबध्यते । द्वाभ्यां चाणुभ्यां द्वणुकमुत्पद्यमानमत्यन्तभिन्नमणुभ्यामण्वोः समवैतीत्यभ्युपगम्यते भवता । न परमाणु में सावयवत्व प्रसंग होगा । यदि कहो कि परमाणुओंके कल्पित प्रदेश होंगे, तो कल्पितको • अवस्तुरूप होनेसे उनका संयोग भी अवस्तुरूप होगा, इससे वह वस्तु कार्यका असमवायिकरण न होगा । असमवायिकारणके न होनेपर द्व्यणुक आदि कार्य द्रव्य उत्पन्न नहीं होगा । जैसे आदि सृष्टिमें निमित्तके अभावसे संयोगकी उत्पत्तिके लिए परमाणुओं में कर्म नहीं हो सकता, वैसे महाप्रलयमें भी विभागकी उत्पत्ति के लिए परमाणुओंमें कर्म नहीं हो सकेगा, कारण कि उसमें भी उस विभाग ) का कोई नियत निमित्त नहीं देखा गया है । अदृष्ट ( धर्माधर्म ) भी भोगकी सिद्धिके लिए है प्रलयकी सिद्धिके लिए नहीं है, इसलिए निमित्तके अभाव से परमाणुओंमें संयोगकी उत्पत्तिके लिए अथवा विभागकी उत्पत्ति के लिए कर्म नहीं है । अतएव संयोग और विभाग के अभावसे तदधीन होनेवाले सगं और प्रलयका अभाव प्रसक्त होगा, इसलिए यह परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है ॥ १२ ॥
और वैशेषिकों द्वारा समवाय स्वीकार करनेसे भी सृष्टि और प्रलयका अभाव है, इसका प्रकृत परमाणु कारणवादके निराकरणके साथ सम्बन्ध है । दो परमाणुओंसे उत्पद्यमान द्वयणुक परमाणुओंसे सत्यानन्दी - दीपिका * इस प्रकार संयोगके निमित्तका खण्डनकर, अब परमाणुमें संयोग के स्वरूपका ' संयोगवाणी ' आदिसे खण्डन करते हैं - परमाणुका संयोग व्याप्यवृत्ति है अथवा अव्याप्यवृत्ति ( एकदेशवृत्ति )? प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि सम्पूर्णरूपसे व्याप्त होनेसे एक परमाणुका दूसरे परमाणु में अन्तर्भाव होनेके कारण कार्य में स्थूलता न आनेसे कार्यं परमाणुमात्र होगा और वह दृष्टिगोचर न होगा, इससे लोक प्रसिद्धिका भी विरोध होगा, क्योंकि व्यवहारमें सावयव द्रव्योंका अन्य सावयव द्रव्यके साथ एक देशसे अव्याप्यवृत्ति संयोग होता है । जैसे पक्षी आदिका वृक्षादिके साथ । दूसरा पक्ष मी युक्त नहीं है, क्योंकि अव्याप्यवृत्ति संयोग सावयवोंका होता है । यदि परमाणुको सावयव मानें तो निरवयवत्व सिद्धान्त मङ्ग होगा, अतः यह परमाणुकारणवाद युक्त नहीं है ॥१२ ॥
* समवायको अन्य समवायकी अपेक्षा जो अनवस्था दोष दिया गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य. [ अ ० २ पा ० २ चैवमभ्युपगच्छता शक्यतेऽणुकारणता समर्थयितुम् । कृतः? साम्यादनवस्थितेः । यथैव ह्यणुभ्यामत्यन्तभिन्नं सद्व्यणुकं समवायलक्षणेन संबन्धेन ताभ्यां संबध्यत एवं समवायो-S पि समवायिभ्यो ऽत्यन्तभिन्नः सन्समवायलक्षणेनान्येनैव संबन्धेन समवायिभिः संब-ध्येत, अत्यन्तभेद साम्यात् । ततश्च तस्य तस्यान्योन्यः संबन्धः कल्पयितव्य इत्यनवस्थैव प्रसज्येत । नन्विह प्रत्ययग्राह्यः समवायो नित्यसंबद्ध एव समवायिभिर्गृह्यते नासंबद्धः संबन्धान्तरापेक्षो वा । ततश्च न तस्यान्यः संबन्धः कल्पयितव्यो येनानवस्था प्रसज्येतेति! * नेत्युच्यते - संयोगोऽप्येवं सति संयोगिभिर्नित्यसंबद्ध एवेति समवायवन्नान्यं संबन्धम-पेक्षेत । अथार्थान्तरत्वात्संयोगः संबन्धान्तरमपेक्षेत, समवायोऽपि तर्ह्यर्थान्तरत्वात्संबन्धा-न्तरमपेक्षेत । नच गुणत्वात्संयोगः संबन्धान्तरमपेक्षतेन समवायोऽगुणत्वादिति युज्यते वक्तुम्, अपेक्षाकारणस्य तुल्यत्वात्, गुणपरिभाषायाञ्चातन्त्रत्वात् । तस्मादर्थान्तरं समवा-यमभ्युपगच्छतः प्रसज्येतैवानवस्था । प्रसज्यमानायां चानवस्थायामेकासिद्धौ सर्वासि
भ्यामनुभ्यां द्वयणुकं नैवोत्पद्येत । तस्मादप्यनुपपन्नः परमाणुकारणवादः ॥१३ ॥
अत्यन्त भिन्न होता हुआ परमाणुओंमें समवेत है ऐसा आप स्वीकार करते हैं । परन्तु ऐसा स्वीकार करते हुए आप परमाणु में कारणताका समर्थन नहीं कर सकते, क्यों? क्योंकि साम्य और अनवस्थिति है । जिस प्रकार परमाणुओंसे अत्यन्त भिन्न होता हुआ द्वयणुक समवायरूप सम्बन्धसे उनके साथ सम्बद्ध होता हैं, उसी प्रकार समवाय भी समवायियोंसे अत्यन्त भिन्न होता हुआ समवायरूप अन्य सम्बन्धसे ही समवायियों के साथ सम्बद्ध होगा, क्योंकि दोनोंमें अत्यन्त भेद समान है । इसलिए तत् तत् समवाय के लिए अन्य अन्य सम्बन्धको कल्पना करनी चाहिए, इससे अनवस्था ही प्रसक्त होगी । परन्तु ' इह ' ( यहाँ ) इस प्रतीतिसे ग्राह्य समवाय समवायियोंसे नित्य सम्बद्ध ही गृहीत होता है न असम्बद्ध और न अन्य सम्बन्धकी अपेक्षावाला है, इसलिए उसके लिए अन्य सम्बन्धकी कल्पना करना युक्त नहीं है जिससे अनवस्था प्रसक्त हो । सिद्धान्ती - नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि ऐसा होनेपर संयोग भी संयोगियों के साथ नित्य सम्बद्ध ही है, इससे समवायके समान संयोग भी अन्य सम्बन्धकी अपेक्षा न करेगा । यदि [ संयोगियोंसे ] ] भिन्न पदार्थ होनेसे संयोग अन्य सम्बन्धकी अपेक्षा रखेगा, तो समवाय मी [ समवायियोंसे ] भिन्न पदार्थ होनेसे अन्य सम्बन्धकी अपेक्षा करेगा । गुण होनेसे संयोग अन्य सम्बन्धकी अपेक्षा करता है और अगुण होनेसे समवाय अपेक्षा नहीं करता, यह कहना युक्त नहीं है, क्योंकि दोनोंमें अपेक्षाका कारण ( सम्बन्धियोंसे मिन्नता ) समान है और गुणपरिभाषा अशास्त्रीय हैं । इसलिए समवायको अन्य पदार्थ स्वीकार करनेवालेको अनवस्था प्रसक्त होगी । इस प्रकार अनवस्थाके प्रसक्त होनेपर एककी असिद्धिसे सबकी असिद्धि होनेसे दो परमाणुओंसे द्वयणुकं उत्पन्न नहीं होगा । इससे मी परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है ॥ १३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका ' इह तन्तुषु पट: ' ( इन तन्तुओंमें पट है ) इत्यादि विशिष्ट प्रतीतिका नियामक समवाय है । उसको अन्य सम्बन्धकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि वह स्वरूपसे ही नित्य सम्बद्ध है । * वस्तुतः संयोग के समान समवाय भी द्रव्याश्रयी है, द्रव्यके नाशसे जैसे संयोगका नाश होता है, वैसे समवायका भी, इससे समवाय माननेकी अपेक्षा नहीं है । जैसे कार्य होनेसे दो परमाणुओं के संयोगके लिए निमित्त नहीं है, वैसे समवायकी उत्पत्तिके लिए भी निमित्त नहीं है, मत: परमाणु कारणवाद अयुक्त है ॥। १३ ॥
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अधि ० ३ सू ० १४-१५ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिकासहित [ ४२३ नित्यमेव च भावात् ॥ १४ ॥
पदच्छेद - नित्यम्, एव, चं, भावात् । सूत्रार्थ — परमाणुका प्रवृत्तिस्वभाव मानें तो ( नित्यमेव ) प्रवृत्तिके नित्य होनेसे ( भावात् ) प्रलयाभाव प्रसङ्ग ( च ) और निवृत्ति स्वभाव मानें तो ( नित्यमेव ) निवृत्ति नित्य होनेसे ( भावात् ) सृष्टिका अभाव प्रसङ्ग होगा । इससे भी परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है । अपि चाणवः प्रवृत्तिस्वभावा वा निवृत्तिस्वभावा वोभयस्वभावा वाऽनुभयस्वभावा वाऽभ्युपगम्यन्ते, गत्यन्तराभावात् । चतुर्धापि नोपपद्यते । प्रवृत्तिस्वभावत्वे नित्यमेव प्रवृ-तेर्भावात्प्रलयाभावप्रसङ्गः । निवृत्तिस्वभावत्वेऽपि नित्यमेव निवृत्तेर्भावात्सर्गाभावप्रसङ्गः । उभयस्वभावत्वं च विरोधादसमञ्जसम् | अनुभयस्वभावत्वे तु निमित्तवशात्प्रवृत्तिनिवृत्त्यो-रभ्युपगम्यमानयोरष्टादेर्निमित्तस्य नित्यसंनिधानान्नित्यप्रवृत्तिप्रसङ्गात् अतन्त्रत्वेऽप्यह-प्रादेर्नित्याप्रवृत्तिप्रसङ्गात् । तस्मादप्यनुपपन्नः परमाणुकारणवादः ॥ १४ ॥
रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ॥ १५ ॥
पदच्छेद – रूपादिमत्त्वात्, च, विपर्ययः, दर्शनात् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( रूपादिमत्त्वात् ) वैशेषिकमतमें परमाणुको रूपादि युक्त होनेसे ( विपर्यय: ) उसमें निरवयवत्व अणुत्व आदिके विपरीत सावयवत्व आदिकी प्रसक्ति होगी, ( दर्शनात् ) क्योंकि व्यवहार में रूपादि युक्त घट आदिमें ऐसा देखने में आता है । * सावयवानां द्रव्याणामवयवशो विभज्यमानानां यतः परो विभागो न संभवति ते चतुर्विधा रूपादिमन्तः परमाणवश्चतुर्विधस्य रूपादिमतो भूतभौतिकस्यारम्भका नित्या-श्चेति यद्वैशेषिका अभ्युपगच्छन्ति स तेषामभ्युपगमो निरालम्बन एव, यतो रूपादिमत्त्वा-त्परमाणूनामणुत्वनित्यत्वविपर्ययः प्रसज्येत । परमकारणापेक्षया स्थूलत्वमनित्यत्वं च तेषामभिप्रेतविपरीत मापद्येतेत्यर्थः । कुतः? एवं लोके दृष्टत्वात् । यद्धि लोके रूपादिमद्वस्तु और परमाणु प्रवृत्ति स्वभाववाले वा निवृत्तिस्वभाववाले अथवा उययस्वभाववाले वा अनु-भयस्वभाववाले माने जाते हैं? क्योंकि इनसे अतिरिक्तगति ( प्रकार ) नहीं है । चारों प्रकार भी उपपन्न नहीं होते । प्रवृत्तिस्वभावत्व होनेपर नित्य ही प्रवृत्ति होनेसे प्रलयका अभाव प्रसङ्ग होगा । निवृत्तिस्वभावत्व होनेपर भी नित्य ही निवृत्त होनेसे सृष्टिका अभाव प्रसङ्ग होगा । प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों स्वभाव होने पर परस्पर विरुद्ध होने के कारण असंगत है । यदि प्रवृत्ति और निवृत्ति उमयस्वभाव न मानें तो किसी कारणवश प्रवृत्ति और निवृत्ति स्वीकार करनेमें अदृष्ट आदि निमित्त के नित्य सन्नि-हित होनेसे नित्यप्रवृत्तिका प्रसङ्ग होगा, अदृष्टादि अनियामक होनेपर भी नित्य अप्रवृत्ति प्रसङ्ग होगा, इससे नी परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है ॥ १४ ॥
अवयवशः ( क्रमसे ) विभज्यमान सावयव द्रव्योंका जहाँसे आगे विभाग नहीं हो सकता, वे चार प्रकारके रूपादि युक्त परमाणु रूपादि विशिष्ट चार प्रकारके भूत और भौतिकके आरम्भक हैं और नित्य हैं, ऐसा जो वैशेषिक स्वीकार करते हैं, उनका वह स्वीकार निरालम्ब - निराधार है, क्योंकि रूपादि विशिष्ट होने से परमाणुओं को अणुत्व और नित्यत्वके विपर्यय ( स्थूलत्व और अनित्यत्व ) की प्रसक्ति होगी । परमकारणकी अपेक्षा उनको अभिप्रेतके विपरीत स्थूलत्व, अनित्यत्व प्रसङ्ग होगा, ऐसा अर्थ | क्यों? क्योंकि लोकमें इस प्रकार देखने में आता है । लोकमें जो रूप आदि युक्त वस्तु है वह अपने सत्यानन्दी - दीपिका * परमाणु स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि गुणोंसे युक्त चार प्रकारके हैं । वे रूपादि गुणोंसे युक्त वायु, अग्नि, जल और पृथिवी इन चार प्रकारके भूतों और घट, पट आदि मौतिक पदार्थोंोंके आरम्भक
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४२४ ] ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ तत्स्वकारणापेक्षया स्थूलमनित्यं च दृष्टम्, तद्यथा परस्तन्तूनपेक्ष्य स्थूलोऽनित्यच भवति, तन्तवश्चांशूनपेक्ष्य स्थूला अनित्याश्च भवन्ति, तथा चामी परमाणवो रूपादिमन्तस्तैर भ्युपगम्यन्ते तस्मात्तेऽपि कारणवन्तस्तदपेक्षया स्थूला अनित्याश्च प्राप्नुवन्ति । * यच्च नित्यत्वे कारणं तैरुक्तम् - ' सदकारणवन्नित्यम् ' ( वै ० सू ० ४।१।१ ) इति । तदप्येवं सत्यणुषु न संभवति, उक्तेन प्रकारेणाणूनामपि कारणवत्त्वोपपत्तेः । यदपि नित्यत्वे द्वितीयं कारण-मुक्तम्- अनित्यमिति च विशेषतः प्रतिषेधाभावः ' ( वै ० ४।१४ ) इति, तदपि नावश्यं परमा-शूनां नित्यत्वं साधयति । असति हि यस्मिन्कस्मिश्चिन्नित्ये वस्तुनि नित्यशब्देन नञः समासो नोपपद्यते, न पुनः परमाणुनित्यत्वमेवापेक्ष्यते । तच्चास्त्येव नित्यं परमकारणं ब्रह्म । नच शब्दार्थव्यवहारमात्रेण कस्यचिदर्थस्य प्रसिद्धिर्भवति, प्रमाणान्तरसिद्धयोः शब्दार्थयोर्व्यवहारातारात् । यदपि नित्यत्वे तृतीयं कारणमुक्तम्- ' अविद्या च ' ( बै ०४ । १५ ) इति, तद्यद्येवं विक्रीयेत सतां परिदृश्यमान कार्याणां कारणानां प्रत्यक्षेणाग्रहणमवि-द्येति, ततो द्वय शुक्रनित्यताऽप्यापद्येत । अथाद्रव्यत्वे सतीति विशेष्येत, तथाप्यकारणव-कारणकी अपेक्षा स्थूल और अनित्य देखी जाती है । जैसे पट तन्तुओं की अपेक्षा स्थूल और अनित्य होता है, तन्तु अपने अवयवोंकी अपेक्षा स्थूल और अनित्य होते हैं, वैसे ये परमाणु मी रूपादि युक्त हैं, ऐसा वे स्वीकार करते हैं । इसलिए वे मी कारणवाले हैं और उसकी अपेक्षा स्थूल और अनित्य प्राप्त होते हैं । ' सदकारणवन्नित्यम् ' ( सत् और अकारणवाला होनेसे नित्य है ) इसप्रकार परमाणु के नित्यत्वमें उन्होंने जो कारण कहा है, वह भी ऐसा होनेपर अर्थात् परमाणु कारणवाला होनेपर परमाणु में संभव नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकार ( स्पर्शवत्त्व, परिच्छिन्नत्व ) से परमाणु भो कारणवाले हो सकते हैं | और ' अनित्यमिति च ० ' ( अनित्य है, इसप्रकार विशेषरूप से प्रतिषेधका अभाव है ) इसप्रकार नित्यत्वमें जो दूसरा कारण कहा गया है, वह भी अवश्य परमाणुओं में नित्यत्व सिद्ध नहीं करता । यदि कोई नित्य वस्तु न हो तो नित्य शब्दके साथ नञ्का समास उपपन्न न होता । अतः यहाँ परमाणु नित्यत्वकी अपेक्षा नहीं है । वह नित्य परम कारण ब्रह्म ही है । शब्द और अर्थके व्यवहारमात्रसे किसी अर्थकी प्रसिद्धि नहीं होती, क्योंकि अन्य प्रमाणसे सिद्ध शब्द और अर्थको व्यवहारमें लाया जाता है । ' अविद्या च ' ( और अविद्या ) इस कार परमाणुके नित्यत्व में जो भी तृतीय कारण कहा गया है । उसका यदि ऐसा विवणं करें कि जिसका कार्यं परिदृश्यमान है ऐसे विद्यमान कारणोंका प्रत्यक्षसे अग्रहण अविद्या है, तो इससे द्वयणुकको भी नित्यत्व प्रसंग होगा । यदि ' अद्रव्यत्वे सति ' अर्थात् ' अकारणवत्त्वे सति ' ( अकारणवाला होना ) ऐसा विशेषण दें, तो भी अकारणवत्त्व ( न कारणवाला ) नित्यत्वका हैं और नित्य हैं । यह वैशेषिकों का सिद्धान्त प्रमाण रहित है । इसमें ' परमाणवः समवायिकारण-वन्तः स्वकारणापेक्ष्या स्थूला अनित्याश्च रूपवत्त्वात्, रसवत्त्वात्, स्पर्शवत्त्वात्, गन्धवत्त्वात् घटवत् ' ( परमाणु समवायिकारण वाले हैं और अपने कारण की अपेक्षा स्थूल ओर अनित्य हैं, क्योंकि रूप रस, स्पर्श और गन्धवाले हैं, जैसे घट ) यह अनुमान प्रमाण भी है । * ' कार्यमनित्यम् ' ( कार्यं अनित्य है ) इसप्रकार कार्य में विशेषरूपसे नित्यत्वके प्रतिषेध होनेसे पमाणुओंमें नित्यत्व सिद्ध होता है, अन्यथा ' न नित्यमनित्यम् ' प्रतियोगी नित्यके अभाव में ' नञ् ' प्रतिषेधका समास नहीं हो सकता? परन्तु इससे भी परमाणु नित्य सिद्ध नहीं होता, किन्तु कार्यमें नित्यत्व के प्रतिषेधसे नित्य परमं कारण ब्रह्म ही प्रतियोगीरूपसे सिद्ध होता है । किश्व ' इह वटे यक्षः तिष्ठति ' ( इस वटमें यक्ष रहता है ) इसप्रकार वटमें यक्ष शब्द व्यवहारमात्रसे यक्षको सिद्धि माननी पड़ेगी । मूलका ज्ञान होनेपर तो उसीसे सब सिद्ध होनेसे व्यवहारका प्रमाणरूप से उपन्यास व्यर्थ है ।
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अधि ० ३ सू ० १६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो -दीपिका सहित ४२५ त्वमेव नित्यतानिमित्तमापद्येत । तस्य च प्रागेवोक्तत्वात् ' अविद्या च ' इति पुनरुक्तं स्यात् । अथापि कारणविभागात्कारणविनाशाच्चन्यस्य तृतीयस्य विनाशहेतोरसंभवोऽविद्या, सा परमाणूनां नित्यत्वं ख्यापयतीति व्याख्यायेत । नावश्यं विनश्यद्वस्तु द्वाभ्यामेव हेतुभ्यां विनष्टुमर्हतीति नियमोऽस्ति । संयोगसचिवे हानेकस्मिश्च द्रव्ये द्रव्यान्तरस्यारम्भके-ऽभ्युपगम्यमान एतदेवं स्यात् । यदा त्वपास्तविशेषं सामान्यात्मकं कारणं विशेषवदव-स्थान्तरमा पद्यमानमारम्भकमभ्युपगम्यते, तदा घृतकाठिन्यविलयनवन्मूर्त्यवस्थाविल-यनेनापि विनाश उपपद्यते । तस्माद्रपादिमत्त्वात्स्यादभिप्रेतविपर्ययः परमाणूनाम् । तस्मादप्यनुपपन्नः परमाणुकारणवादः ॥ १५ ॥
उभयथा च दोषात् ॥ १६ ॥
पदच्छेद – उभयथा, च, दोषात् । सूत्रार्थ - ( उभयथा ) परमाणु उपचितापचित गुणात्मक है कि नहीं? प्रथम पक्षमें अणुत्वका भङ्ग होगा और द्वितीय पक्षमें उनके कार्य पृथिवी आदिमें रूपादिकी अनुपलब्धिका प्रसङ्ग होगा, इस तरह दोनों प्रकारसे ( च ) मी ( दोषात् ) दोष होने से परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है । गन्धरसरूपस्पर्शगुणा स्थूला पृथिवी, रूपरसस्पर्शगुणाः सूक्ष्मा आपः, रुपस्पर्श-गुणं सूक्ष्मतरं तेजः सूक्ष्मतमो वायुरित्येवमेतानि चत्वारि भूतान्युपचितापचितगुणानि निमित्त प्रसक्त होगा । और उसके पूर्व कथित होनेसे ' अविद्या च ' यह पुनरुक्त हो जायगा । यदि कारणके विभागसे और कारणके विनाशसे अन्य तृतीय विनाश हेतुका असंभव अविद्या है और वह परमाणुओंका नित्यत्व ख्यापन करती है, ऐसी व्याख्या करें, तो विनष्ट होती हुई वस्तु अवश्य दो ही हेतुओंसे विनष्ठ होनेके योग्य है ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि संयोग सचिव अनेक द्रव्योंको अन्य द्रव्यका आरम्भक स्वीकार करें तो यह नियम हो, परन्तु जिसमेंसे विशेष निवृत्त हो गया है ऐसा सामान्यात्मक कारण विशेष युक्त अन्य अवस्थाको प्राप्त हुआ आरम्भक स्वीकार किया गया है, तो धृत-के काठिन्य विलय के समान मूत्तं अवस्थाके विलयसे भी विनाश हो सकता है । इसलिए परमाणु रूप आदि विशिष्ट होनेसे उनमें अभिप्रेत के विपर्यय होगा । इससे भी परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है || १५ ॥ गन्ध, रस, रूप और स्पशं गुणवाली पृथिवी स्थूल है, रूप, रस और स्पर्शं गुण विशिष्ट जल सूक्ष्म है, रूप और स्पशं गुण युक्त तेज सूक्ष्मतर है और स्पर्श गुणवाला वायु सूक्ष्मतम है, इस प्रकार सत्यानन्दी - दीपिका * यदि द्रयणुक में नित्यत्वके परिहार के लिए ' अद्रव्यत्वे सति ' यह विशेषण दें अर्थात् जिसका कोई द्रव्य आरम्भक न हो, उस कारणका प्रत्यक्ष से अग्रहण अविद्या है, ऐसा लक्षण करनेसे द्वणुक -का व्यभिचार तो निवृत्त हो जायगा, क्योंकि उसके अनेक द्रव्य आरम्भक हैं । परन्तु ' कारणका प्रत्यक्ष से अग्रहण ' यह विशेष्य व्यथं होगा अकारणवत्त्व ही नित्यत्वका निमित्त हो जायगा, इससे ' सदकारणवत् ' इस सूत्र की पुनरुक्ति होगी । जैसे तन्तु आदि अवयवोंके विभाग अथवा नाशसे पटका नाश होता है, परन्तु ये दोनों नाशके हेतु परमाणुमें नहीं है, अतः परमाणु नित्य है । यह युक्त नहीं है, क्योंकि यदि अनेक द्रव्य अन्य द्रव्यके आरम्भ होते तो यह नियम होता परन्तु आरम्भ में कोई प्रमाण नहीं है, कारण कि तन्तुओंके आतान वितानसे अतिरिक्त पट कोई वस्तु नहीं है । केवल ती ही एक अवस्था विशेष है । इसलिए परमाणु अविद्याका परिणाम है । उसके प्रलयनिमित्त कालादिसे पिण्डात्मक स्वरूपके तिरोभाव - अदृश्य होनेसे कारणभावकी प्राप्तिरूप विनाश उपपन्न होता है । जैसे अग्निके सम्पर्कसे घृतके काठिन्यका अवयव संयोगका अवयवोंके नाश हुए विना विलय होता । इसलिए परमाणु कारणवाद युक्त नहीं है ॥ १५ ॥
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४२६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतर सूक्ष्मतमतारतम्योपेतानि च लोके लक्ष्यन्ते, तद्वत्परमाणवोऽप्युपचि तापचितगुणाः कल्प्येरन्न वा? उभयथापि च दोषानुषङ्गोऽपरिहार्य एव स्यात् । कल्प्य -माने तावदुपचितापचितगुणत्वे उपचितगुणानां मूर्त्यपचयादपरमाणुत्वप्रसङ्गः । न चा-न्तरेणापि मूर्त्यपचयं गुणोपचयो भवतीत्युच्यते, कार्येषु भूतेषु गुणोपचये मूर्त्यपचयदर्श-नात् । अकल्प्यमाने तूपचितापचितगुणत्वे, परमाणुत्वसाम्यप्रसिद्धये यदि तावत्सर्वं एकै-कगुणा एव कल्प्येरंस्ततस्तेजसि स्पर्शस्योपलब्धिर्न स्यात्, अप्सु रूपस्पर्शयोः, पृथिव्यां चरसरूपस्पर्शानाम्, कारणगुणपूर्वकत्वात्कार्यगुणानाम् । अथ सर्वे चतुर्गुणा एव कल्प्येरन्, ततोऽप्स्वपि गन्धस्योपलब्धिः स्यात्, तेजसि गन्धरसयोः, वायौ गन्ध-रूपरसानाम् । नचैवं दृश्यते । तस्मादप्यनुपपन्नः परमाणुकारणवादः ॥ १६ ॥
अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ १७ ॥
पदच्छेद - अपरिग्रहात्, च, अत्यन्तम्, अनपेक्षा । सूत्रार्थ - ( अपरिग्रहाच्च ) परमाणु कारणवादको किसी भी अंशमें मनु आदि शिष्टोंने ग्रहण नहीं किया है, अत: ( अत्यन्तमनपेक्षा ) कल्याणार्थी पुरुषोंको उसमें अत्यन्त अनपेक्षा करनी चाहिए । * प्रधानकारणवादो वेदविद्भिरपि कैश्चिन्मन्वादिभिः सत्कार्यत्वाद्यंशोपजीवनाभि-प्रायेणोपनिबद्धः । अयं तु परमाणु कारणवादो न कैश्चिदपि शिष्ठैः केनचिदप्यंशेन परिगृहीत इत्यत्यन्तमेवानादरणीयो वेदवादिभिः । अपि च वैशेषिकास्तन्त्रार्थभूतान्षट्पदार्थान्द्रव्य-ये चारभूत अधिक और न्यून गुणवाले स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम तारतम्यसे युक्त लोकमें देखे जाते हैं । इसी प्रकार स्थूल सूक्ष्म पृथिवी जलादिके समान उनके परमाणु भी उपचित ( अधिक ) अपचित ( न्यून ) गुणवाले कल्पना किये जाते हैं कि नहीं? दोनों प्रकारसे दोषकी प्रसक्ति अपरिहार्यं ही होगी । उपचित और अपचित गुणत्व विशिष्ट परमाणुओंकी कल्पना करनेपर तो उपचित गुणवाले परमाणुओं की मूर्ति ( आकार ) के उपचय ( स्थूल ) होनेसे अपरमाणुत्वका प्रसङ्ग होगा । मूर्तिके उपचय के विना मी गुणोंका उपचय होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कार्य भूतोंमें गुणोंके उपचय होनेपर मूर्तिका उपचय देखनेमें आता है । यदि उपचित और अपचित गुणत्व विशिष्ट पर-माणुओं की कल्पना न कर परमाणुत्वके साम्य सिद्धि ( रक्षा ) के लिए सब परमाणु एक एक गुण युक्त माने जायँ, तो तेजमें स्पर्शकी, जलमें रूप और स्पर्शकी, पृथिवी में रस, रूप और स्पर्शकी उपलब्धि नहीं होगी, क्योंकि कार्य के गुण कारण गुण पूर्वक होते हैं । यदि सब चार गुण युक्त ही कल्पना किये जायँ, तो जलमें भी गन्धकी, तेजमें गन्ध और रसकी और वायुमें गन्ध, रूप और रसकी उपलब्धि
होगी । परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता । इसलिए भी परमाणु कारणवाद अनुपपन्न है ॥ १६ ॥
कई एक वेदवित् मनु आदिने, प्रधान कारणवाद सत्कार्यत्व आदि अंशोंका उपजीवन करता है इस अभिप्रायसे उसे अपने स्मृति ग्रन्थोंमें स्थान दिया है । परन्तु यह परमाणु कारणवाद तो किसी भी अंशमें किन्हीं भी शिष्ट पुरुषोंसे गृहीत नहीं है, इसलिए वेदवादियोंसे अत्यन्त ही अनादरणीय है | और वैशेषिक अपने शास्त्र के अर्थभूत द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय नामके सत्यानन्दी - दीपिका * द्रव्य आदि छः भाव और एक अभाव इस प्रकार वैशेषिक मतमें सात पदार्थ हैं । छः माव पदार्थं परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं और उनके लक्षण भी भिन्न - भिन्न हैं । भाष्यमें अन्वयव्यतिरेकसे भी यही सिद्ध किया गया है कि गुणादि द्रव्यकी एक अवस्था विशेष है । यह द्रव्य है यह गुण है इत्यादि भेद व्यवहार तो कल्पित भेदको लेकर हो सकता है, क्योकि जैसे अत्यन्त भेद में धर्मधर्मिभाव