श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 461–470

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 461–470

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अधि ० ३ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४२७ गुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाख्यानत्यन्तभिन्नान्भिन्नलक्षणानभ्युपगच्छन्ति, यथा मनु-ष्योऽश्वःशश इति । तथात्वं चाभ्युपगम्य तद्विरुद्धं द्रव्याधीनत्वं शेषाणामभ्युपगच्छन्ति । तन्नोपपद्यते, कथम्? यथा हि लोके शशकुशपलाशप्रभृतीनामत्यन्तभिन्नानां सतां नेतरेत-राधीनत्वं भवति, एवं द्रव्यादीनामत्यन्तभिन्नत्वान्नैव द्रव्याधीनत्वं गुणादीनां भवितुम-र्हति । अथ भवति द्रव्याधिनत्वं गुणादीनाम्, ततो द्रव्यभावे भावाद्द्रव्याभावेऽभावाद द्रव्य-मेव संस्थानादिभेदादनेकशब्दप्रत्ययभाग्भवति । यथा देवदत्त एक एव सन्नवस्थान्तरयो-गादनेकशब्द प्रत्ययभाग्भवति, तद्वत् । तथा सति सांख्यसिद्धान्तप्रसङ्गः स्वसिद्धान्तविरोध-' श्चापद्येयाताम् । नन्वग्नेरन्यस्यापि सतो धूमस्याग्न्यधीनत्वं दृश्यते । सत्यं दृश्यते, भेदप्रती-तेस्तु तत्राग्निधूमयोरन्यत्वं निश्चीयते, इह तु शुक्लः कम्बलो रोहिणी धेनुर्नीलमुत्पलमिति द्रव्यस्यैव तस्य तस्य तेन तेन विशेषणेन प्रतीयमानत्वान्नैव द्रव्यगुणयोरग्निधूमयोरिव भेद-प्रतीतिरस्ति, तस्माद्द्रव्यात्मकता गुणस्य । एतेन कर्मसामान्यविशेषसमवायानां द्रव्यात्म-मनुष्य, अश्व और शशकके समान अत्यन्त भिन्न और भिन्न लक्षणवाले छः पदार्थ स्वीकार करते हैं । और इसी प्रकार अङ्गीकार कर उसके विरुद्ध शेष सब पदार्थं द्रव्यके अधीन मानते हैं । परन्तु वह उपपन्न नहीं होता । क्यों? जैसे व्यवहारमें ही शशक, कुश, पलाय आदि अत्यन्त भिन्न होते हु एक दूसरेके अधीन नहीं होते हैं, वैसी ही द्रव्य आदिके भी अत्यन्त भिन्न होनेसे गुण आदि द्रव्यके अधीन नहीं हो सकते । यदि गुण आदि द्रव्यके अधीन होते हैं, तो द्रव्यके भावमें भाव और द्रव्यके अभाव में अभाव होनेसे द्रव्य ही संस्थान आदि भेदसे अनेक शब्द और प्रतीतिका भागी होता है । जैसे देवदत्त एक होता हुआ भी अन्य अवस्थाके सम्बन्धसे अनेक शब्द और प्रत्ययका भागी होता है । ऐसा माननेपर सांख्य ( वेदान्त ) सिद्धान्तका प्रसंग और स्वसिद्धान्तका विरोध प्रसंग हो जायगा । परन्तु अग्निसे भिन्न होता हुआ धूम अग्निके अधीन देखा जाता है, ठोक देखा जाता है, भेद प्रतीतिसे तो वहाँ अग्नि और धूमका अन्यत्व निश्चित होता है । परन्तु यहाँ शुक्ल कम्बल, लाल गौ और नील-कमल इस प्रकार तत् तत् द्रव्य तत् तत् विशेषणसे प्रतोयमान होनेके कारण अग्नि और धूमके समान द्रव्य और गुणकी भेद प्रतीति नहीं है, इसलिए गुण द्रव्यात्मक है, इससे कम, सामान्य, विशेष और सम-वाय द्रव्यात्मक व्याख्यात हुए । यदि कहो कि द्रव्य और गुण अयुतसिद्ध हैं, इससे गुण आदि द्रव्यके सत्यानन्दी - दीपिका नहीं होता, वैसे अत्यन्त अभेदमें भी नहीं होता है । इसलिए यदि गुण और द्रव्यका तादात्म्य स्वीकार करें तो वेदान्त सिद्धान्तका प्रसङ्ग और अपने सिद्धान्तसे विरोध होगा । * पूर्वपक्षी यहाँ अधीनका अर्थ कार्य मानकर व्यभिचारकी शङ्का करते हैं— जैसे धूम अग्निका कार्य है और उससे भिन्न है, वैसे गुण आदि द्रव्यके कार्य हैं और उससे भिन्न हैं । परन्तु यह दृष्टान्त विषम है, क्योंकि जैसे धूम और अग्निका महानस आदिमें प्रत्यक्ष भेद उपलब्ध होता है, वैसे द्रव्य और गुणका भेद उपलब्ध नहीं होता । शुक्लकम्बल, शुक्लपट आदि स्थलोंमें सामानाधिकरण्य प्रतीति से द्रव्य और गुणकी अभिन्नता ही उपलब्ध होती है । भिन्न देशस्थ घट आदि पदार्थ संयोग द्वारा संयुक्त होते हैं वे युतसिद्ध कहे जाते हैं और अवयव अवयवी, गुण गुणी, जाति व्यक्ति, क्रिया क्रियावान् और नित्यद्रव्योंमें विशेष इनका अविनाभाव है, इसलिए ये अयुतसिद्ध कहलाते हैं, इनका सम्बन्ध समवाय है । अब अयुतसिद्ध विकल्पों में से प्रथम विकल्पपर- समवायसम्बन्धसे पट तन्तुमें उत्पन्न होता है, इसलिए पटका देश तन्तु है पट नहीं । तन्तु गुण पटके गुणोंके आरम्भक हैं । वे गुण पटमें उत्पन्न होते हैं, इससे उनका देश पट है तन्तु नहीं । इसप्रकार पटका तन्तु और पटके गुणोंका पट देश है । इस तरह भिन्न - भिन्न देश होनेसे द्रव्य और गुणका अपृथग्देशस्व अयुत सिद्धत्व बाधित है ।

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I ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ कता व्याख्याता । गुणदीनां द्रव्याधीनत्वं द्रव्यगुणयोरयुत सिद्धत्वादिति यद्यच्येत तत्पुन-रयुत सिद्धत्वमपृथग्देशत्वं वा स्यादपृथक्कालत्वं वाऽपृथक्स्वभावत्वं वा सर्वथापि नोपपद्य-ते । अपृथग्देशत्वे तावत्स्वाभ्युपगमो विरुध्येत । कथम्? तन्त्वारब्धो हि पटस्तन्तुदेशो-ऽभ्युपगम्यते, न पटदेशः । पटस्य तु गुणाः शुक्लत्वादयः पटदेशा अभ्युपगम्यन्ते, न तन्तुदेशाः । तथा चाहु - ' द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारमन्ते गुणाश्च गुणान्तरम् ' ( वै ० १।१।१० ) इति । तन्तवो हि कारणद्रव्याणि कार्यद्रव्यं पटमारभन्ते, तन्तुगताश्चं गुणाः शुक्लादयः कार्य-द्रव्ये पटे शुक्लादिगुणान्तरमारभन्त इति हि तेऽभ्युपगच्छन्ति । सोभ्युपगमो द्रव्यगुण-यो पृथग्देशत्वेऽभ्युपगम्यमाने बाध्येत । * अथापृथक्कालत्वमयुतसिद्धत्वमुच्येत सव्य-दक्षिणयोरपि गोविषाणयोरयुतसिद्धत्वं प्रसज्येत । तथाऽपृथक्स्वभावत्वे त्वयुतसिद्धत्वे न द्रव्यगुणयोरात्मभेदः संभवति, तस्य तादात्म्येनैव प्रतीयमानत्वात् । युतसिद्धयोः संबन्धः संयोगोऽयुतसिद्धयोस्तु समवाय इत्ययमभ्युपगमो मृषैव तेषाम्, प्राक्सि-स्य कार्याकारणस्यायुतसिद्धत्वानुपपत्तेः । अथान्यतरापेक्ष एवायमभ्युपगमः स्याद-युतसिद्धस्य कार्यस्य कारणेन संबन्धः समवाय इति, एवमपि प्रागसिद्धस्यालव्धात्म-कस्य कार्यस्य कारणेन संबन्धो नोपपद्यते, द्वयायत्तत्वात्संबन्धस्य | सिद्धं भूत्वा संबध्यत इति चेत्, प्राक्कारणसंबन्धात्कार्यस्य सिद्धावभ्युपगम्यमानायामयुतसिद्धयभावा-अधीन हैं, तो वह अयुत सिद्धत्व अपृथग्देशत्व है वा अपृथक्कालत्व है अथवा अपृथक्स्वभावत्व है, सर्वथापि वह उपपन्न नहीं होता । यदि अपृथग्देशत्व हो तो स्वसिद्धान्तसे विरोध होगा, क्योंकि तन्तुमें उत्पन्न हुए पटका तन्तुदेश स्वीकार किया जाता है पट देश नहीं, एवं पटके शुक्लत्व आदि गुण पट देशवाले माने जाते हैं तन्तु देशवाले नहीं । वैशेषिक कहते हैं - ' द्रव्याणि ० ' ( द्रव्य अन्य द्रव्यको आरम्भ करते हैं और गुण अन्य गुणको ) इस प्रकार कारण द्रव्य तन्तु कार्यद्रव्य पटको आरम्भ करते हैं और तन्तु गत शुक्ल आदि गुण कार्यद्रव्य पटमें अन्य शुक्ल आदि गुणोंको आरम्भ करते हैं, ऐसा वे स्वीकार करते हैं । द्रव्य और गुणका अपृथग्देशत्व स्वीकार करनेपर वह सिद्धान्त बाधित हो जायगा । यदि अपृथक्कालत्व अयुतसिद्धत्व कहो, तो गौके वाम और दक्षिण सींग भी अयुत सिद्ध हो जायेंगे । उसीप्रकार अपृथक्स्वभावत्व आयुतसिद्धत्व हो तो द्रव्य और गुणका स्वरूप भेद असंभव है, क्योंकि वह ( गुण ) तो तादात्म्यसे ही प्रतीयमान है । युतसिद्ध पदार्थोंका सम्बन्ध संयोग है और अयुतसिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध समवाय, इसप्रकार उनका यह सिद्धान्त मिथ्या ही है । कारण कि कार्यसे पूर्व सिद्ध कारण अयुतसिद्ध नहीं हो सकता, यदि कहो कि दोमेंसे एककी अपेक्षा यह अंगीकार होगा इससे अयुतसिद्ध कार्यका कारण के साथ सम्बन्ध समवाय है । तो ऐसा माननेपर भी जिसने अपना स्वरूप ही प्राप्त नहीं किया है ऐसे पूर्व असिद्ध कार्यका कारणके साथ सम्बन्ध उपपन्न नहीं होता, क्योंकि सम्बन्ध दोके अधीन होता है । यदि कहो कि कार्य सिद्ध होकर कारणके साथ सम्बद्ध होता है, तो सत्यानन्दी - दीपिका * द्वितीय विकल्प ' सव्यदक्षिणयोरपि ' आदिसे कहते हैं । तृतीय विकल्पमें तो ' स्वभाव ' का अर्थ स्वरूप है, इससे वेदान्तसिद्धान्तका प्रसंग हो जायगा । छः पदार्थ अत्यन्त भिन्न हैं यह अनुभव विरुद्ध होनेसे अयुत सिद्धत्व बाधित है । अयुत सिद्धि दोकी है कि एककी? इसको ' प्राक्सिद्धस्य ' आदिसे कहते हैं । # ' अप्राप्त सत् पदार्थोंकी प्राप्ति संयोग है ' यह विभु आकाश आदिके संयोगमें नहीं घटेगा, क्योंकि वे नित्य प्राप्त हैं, यदि मानें तो तन्तु और पटका भी संयोग हो जायगा, यह अपसिद्धान्त है । उत्पत्तिकालीन द्रव्य निर्गुण और निष्क्रिय मानते हैं, क्योंकि यदि उत्पत्तिके समय द्रव्य गुण और

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अधि ० ३ सु ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४२ ९ त्कार्यकारणयोः संयोगविभागौ न विद्येते इतीदं दुरुक्तं स्यात् । यथा चोत्पन्नमात्रस्याक्रियस्य कार्यद्रव्यस्य विभुभिराकाशादिभिर्द्रव्यान्तरैः संबन्धः संयोग एवाभ्युपगम्यते, न समवायः, एवं कारणद्रव्येणापि संबन्धः संयोग एव स्यान्न समवायः । नापि संयोगस्य समवायस्य वा संबन्धस्य संबन्धिव्यतिरेकेणास्तित्वे किंचित्प्रमाणमस्ति । संबन्धिशब्द प्रत्ययव्यतिरेकेण संयोगसमवायशब्दप्रत्ययदर्शनात्तयोरस्तित्वमिति चेत् न, एकत्वेऽपि स्वरूपबाह्यरूपा-पेक्षयानेकशब्दप्रत्यय दर्शनात् । यथैकोऽपि सन् देवदत्तो लोके स्वरूपं संबन्धिरूपं चापेक्ष्यानेकशब्दप्रत्ययभाग्भवति - मनुष्यो ब्राह्मणः श्रोत्रियो वदान्यो बालो युवा स्थविरः पिता पुत्रः पौत्रो भ्राता जामातेति यथा चैकापि सती रेखा स्थानान्यत्वेन निविशमा नै कदशशतसहस्रादिशब्द प्रत्यय भेदमनुभवति, तथासंबन्धिनोरेव संबन्धि-शब्दप्रत्ययव्यतिरेकेण संयोगसमवायशब्दप्रत्ययार्हत्वम्, न व्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वेन, इत्युपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरभावो वस्त्वन्तरस्य । * नापि संबन्धिविषयत्वे संबन्धशब्दप्रत्ययोः संततभावप्रसङ्गः । स्वरूपबाह्यरूपापेक्षयेत्युक्तोत्तरत्वात् । तथाऽण्वात्ममनसामप्रदेशात्वान्न संयोगः सम्भवति, प्रदेशवतो द्रव्यस्य प्रदेशवता द्रव्यान्तरेण संयोगदर्शनात् । कल्पिताः प्रदेशा अण्वात्ममनसां भविष्यन्तीति कारण सम्बन्धसे पूर्व कार्यको सिद्धि स्वीकार करनेपर अयुसिद्धिका अभाव होने से ' कार्यकारणके संयोग और विभाग नहीं होते ' यह उक्त कथन असंगत हो जायगा । और जैसे उत्पन्नमात्र उत्पद्यमान क्रिया-रहित द्रव्यका विभु आकाश आदि अन्य द्रव्योंके साथ सम्बन्ध संयोग ही स्वीकार किया जाता है समवाय नहीं, वैसे कारण द्रव्यके साथ भी सम्बन्ध संयोग ही होगा समवाय नहीं । सम्बन्धियों से भिन्न संयोग अथवा समवाय सम्बन्धके अस्तित्वमें कोई भी प्रमाण नहीं है । यदि कहो कि ' सम्बन्धी ' इस शब्द और प्रत्ययके अतिरिक्त संयोग और समवाय शब्द और प्रतीतिके दर्शनसे उनका पृथक् अस्तित्व है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि एकमें भी स्वरूप और बाह्यरूपकी अपेक्षा अनेक शब्द और प्रत्यय देखनेमें आते हैं । जैसे देवदत्त एक होता हुआ मी व्यवहारमें स्वरूप और सम्बन्धिरूपकी अपेक्षाकर मनुष्य, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, दाता, बालक, युवा, वृद्ध, पिता, पुत्र, पौत्र, भ्राता जामाता इस प्रकार अनेक शब्द और प्रत्ययों का भागी होता है । और जैसे रेखा एक होती हुई भी स्थानभेदसे नियोजित हुई एक, दश, शत, सहस्र आदि शब्द और प्रत्ययविशेषके अनुभवका विषय होती है । वैसे दो सम्बन्धी ही ( सम्बन्धका अनुयोगी और प्रतियोगी ) ' सम्बन्धी ' शब्द और प्रत्ययके भेदसे संयोग और सयवाय इन शब्द और प्रत्ययके योग्य होते हैं, किन्तु अतिरिक्त वस्तुके अस्तित्वसे नहीं । इस प्रकार उपलब्धिरूप लिङ्गसे प्राप्त अन्य पदार्थका ( संयोग आदि सम्बन्धियोंसे भिन्न हैं इस ) अनुपलब्धिसे अभाव निश्चित होता है । उसी प्रकार ' सम्बन्ध ' शब्द और प्रत्ययका सम्बन्धी विषय होनेपर भी उसका निरन्तर अस्तित्व प्रसंग भी न होगा, क्योंकि वह स्वरूप और पररूपकी अपेक्षासे है, ऐसा उत्तर कह दिया गया है । उसी प्रकार परमाणु, आत्मा और मनका प्रदेश न होने से संयोग संभव नहीं है । प्रदेश विशिष्ट ( सावयव ) द्रव्यका प्रदेश युक्त ( सावयव ) अन्य द्रव्यके साथ संयोग देखनेमें सत्यानन्दी - दीपिका क्रिया युक्त उत्पन्न हो तो अपने गुणोंके प्रति वह कारण सिद्ध नहीं होगा, कारण कार्य से पूर्ववृत्ति होना चाहिए । उपलब्धिरूप लिङ्गसे प्राप्त संयोग और समवाय आदि पदार्थोंकी सम्बन्धियोंसे भिन्नरूपसे उपलब्धि न होनेके कारण उनका अभाव निश्चित होता है । * अदृष्ट विशिष्ट आत्माके साथ परमाणुका संयोग परमाणु में क्रियाका कारण है । आत्मा और मनका संयोग ज्ञान आदिका असमवायिकारण है । अब इसका ' तथाऽण्वात्ममनसाम ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं । किश्व अविद्यमानकी कल्पनासे ही सब अर्थकी सिद्धि होनेसे बन्ध और मुक्ति के नियम भी लुप्त हो जायंगे ।

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४३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० व पा ० २ चेत् - न, अविद्यामानार्थकल्पनायां सर्वार्थसिद्धिप्रसङ्गात् इयानेवाविद्यमानो विरुद्धो-ऽविरुद्धो वार्थः कल्पनीयो नातोऽधिक इति नियमहेत्वभावात्, कल्पनायाश्च स्वायत्त-त्वात्प्रभूतत्वसंभवाच्च । नच वैशेषिकैः कल्पितेम्यः षड्भ्यः पदार्थेभ्योऽन्येऽधिकाः शतं सहस्रं वाऽर्था न कल्पयितव्या इति निवारको हेतुरस्ति । तस्माद्यस्मै यस्मै यद्यद्रोचते तत्तत्सिध्येत् । कश्चित्कृपालुः प्राणिनां दुःखबहुलः संसार एव मा भूदिति कल्पयेत् । अन्यो वा व्यसनी मुक्तानामपि पुनरुत्पत्ति कल्पयेत् । कस्तयोर्निवारकः स्यात्? * किंचान्यत् - द्वाभ्यां परमाणुभ्यां निरवयवाभ्यां सावयवस्य द्वयणुकस्याकाशेनेव संश्लेषानुपपत्तिः । न ह्याकाशस्य पृथिव्यादीनां च जतुकाष्ठवत्संश्लेषोऽस्ति । कार्यकारण-द्रव्ययोराश्रिताश्रयभावोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यवश्यं कल्प्यः समवाय इति चेत् - न, इतरेतराश्रयत्वात् | कार्यकारणयोर्हि भेदसिद्धावाश्रिताश्रयभावसिद्धिः आश्रिताश्रयभाव-सिद्धौ च तयोर्भेदसिद्धिः कुण्डवदरवदितीतरेतराश्रयता स्यात् । न हि कार्यकारणयोर्भेद आश्रिताश्रयभावो वा वेदान्तवादिभिरभ्मुपगम्यते, कारणस्यैव संस्थानमात्रं कार्यमित्यभ्यु पगमात् । किंचान्यत् -- परमाणूनां परिच्छिन्नत्वाद्यावत्यो दिशः षडष्टौ दश वा तावद्भिरवयवैः सावयवास्ते स्युः सावयवत्वादनित्याश्चेति नित्यत्वनिरवयवत्वाभ्युपगमो बाध्येत । यांस्त्वं दिग्भेदभेदिनोऽवयवान्कल्पयसि त एव परमाणव इति चेत् न, आता है । यदि कहो कि अणु, आत्मा और मनके कल्पित प्रदेश होंगे, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि . अविद्यमान पदार्थ की कल्पना करनेपर सर्वार्थ सिद्धि होने का प्रसंग हो जायगा । इतनी ही अविद्यमान, विरुद्ध अथवा अविरुद्ध अर्थकी कल्पना करनी चाहिए, इससे अधिक नहीं, इस विषय में कोई नियम हेतु नहीं है । कल्पना तो अपने अधीन होती है इससे उसके अधिक होने की भी संभावना है । वैशेषिकों द्वारा कल्पित छः पदार्थोंसे भिन्न अतिरिक्त ( अधिक ) शत, अथवा सहस्र पदार्थोंकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, इसका कोई निवारक हेतु नहीं है, इसलिए जिस जिसको जो जो रुचिकर होगा वह वह सिद्ध हो जायगा । कोई कृपालु ऐसी कल्पना करेगा कि प्राणियोंके लिए यह दुःख बहुल संसार ही न हो अथवा अन्य कोई व्यसनी मुक्त पुरुषोंकी पुनरुत्पत्तिकी कल्पना करेगा । ऐसी स्थिति में उनका कौन निवारक होगा । और इससे भिन्न दूसरा दोष यह है - आकाशके साथ सावयव द्व्यणुकके समान निरवयव दो परमाणुओंका संश्लेष नहीं हो सकता । आकाश और पृथिवी आदिका लाख और काष्ठके समान संश्लेष ( मिलाप ) नहीं है । कार्य कारण द्रव्योंका आश्रिताश्रयभाव अन्यथा उपपन्न न होगा, इसलिए समवायकी अवश्य कल्पना करनी चाहिए । ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि अन्योन्याश्रय हो जायगा । कार्यं कारणका कुण्डबदरके समान भेद सिद्ध हो तो आश्रिताश्रय-भावकी सिद्धि हो, आश्रिताश्रयभावकी सिद्धि हो तो उनका भेद सिद्ध हो, इसप्रकार अन्योन्याश्रय होगा । वेदान्तवादी कार्य और कारणका भेद अथवा आश्रिताश्रयभाव स्वीकार नहीं करते, क्योंकि कारणका ही संस्थान ( आकार विशेष ) मात्र कार्य है, ऐसा वे मानते हैं । अन्य दोष यह है-परमाणुओंके परिच्छिन्न होने से जितनी दिशाएं छः, आठ अथवा दश हैं । उतने अवयवोंसे वे सावयव हो जायंगे, सावयव होनेसे अनित्य हो जायंगे, इससे उनका नित्यत्व निरवयवत्व सिद्धान्त बाधित हो जायगा । यदि कहो कि दिशाके भेदसे भेदविशिष्ट जिन अवयवोंकी तुम कल्पना करते हो वे ही हमारे मतमें परमाणु हैं । तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि स्थूल, सूक्ष्मके तारतम्यक्रमसे परम कारण सत्यानन्दी - दीपिका * समवायका अन्योन्याश्रय दोषसे खण्डनकर अब परमाणुका नित्यत्व, निरवयवत्व खण्डन करते हैं— ' परमाणवः सावयवाः परिच्छिन्नध्वात् घटवत् ' ( परमाणु सावयव हैं परिच्छिन्न होनेसे घटके समान ) इसलिए परमाणुका द्वयणुकके समान पृथिवीत्व एक जातीय होनेसे विनाश होता है ।

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अधि ० ४ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४३१ स्थूलसूक्ष्मतारतम्यक्रमेणापरमकारणाद्विनाशोपपत्तेः । यथा पृथिवी द्वयणुकाद्यपेक्षया स्थूलतमा वस्तुभूतापि विनश्यति, ततः सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं च पृथिव्येकजातीयकं विनश्यति, ततो द्वयणुकं, तथा परमाणवोऽपि पृथिव्येकजातीयकत्वाद्विनश्येयुः । * विनश्यन्तोऽ-व्यवयवविभागेनैव विनश्यन्तीति चेत्- नायं दोषः यतो घृतकाठिन्यविलयनवदपि विनाशोपपत्तिमवोचाम । यथा हि घृतसुवर्णादीनामविभज्यमानावयवानामप्यग्निसंयो-गाद्रवभावापत्त्या काठिन्यविनाशो भवति, एवं परमाणूनामपि परमकारणभावापत्त्या मूर्त्यादिविनाशो भविष्यति । तथा कार्यारम्भोऽपि नावयवसंयोगेनैव केवलेन भवति, क्षीरजलादीनामन्तरेणाप्यवयवसंयोगान्तरं दधिहिमादिकार्यारम्भदर्शनात् । तदेव-मसारतरतर्क संदृब्धत्वादीश्वरकारणश्रुतिविरुद्धत्वाच्छ्रतिप्रवणैश्च शिष्टैर्मन्वादिभिरपरि गृहीतत्वादत्यन्तमेवानपेक्षाऽस्मिन्परमाणुकारणवादे कार्या आर्यैः श्रेयोर्थिभिरिति वाक्यशेषः ॥ १७ ॥

( ४ समुदायाधिकरणम् सू ० १८-२७ ) समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ १८ ॥

पदच्छेद – समुदाये, उभयहेतुके, अपि तदप्राप्तिः । सूत्रार्थ - ( उमयहेतुकेऽपि समुदाये ) परमाणु हेतुक बाह्यं समुदाय और स्कन्ध हेतुक आध्यात्मिक समुदाय में भी ( तदप्राप्तिः ) समुदायकी प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि अचेतन परमाणु और स्कन्धोंका अपने आप समुदाय असंभव है, अन्य किसी कूटस्थ चेतन संघात कर्ताका अभाव है, अतः उनका मत भ्रान्तिमूलक हैं । * वैशेषिकराद्धान्तो - दुर्युक्तियोगाद्वेदविरोधाच्छिष्टापरिग्रहाच्च नापेक्षितव्य पर्यन्त विनाश उपपन्न होता है । जैसे पृथिवी द्वयणुक आदिकी अपेक्षासे स्थूलतम और वस्तुभूत होती हुई भी विनष्ट होती है । उससे सूक्ष्म सूक्ष्मतर पृथिवीरूप एक जातीय नष्ट होता है, और तदनन्तर द्व्यणुक । उसी प्रकार परमाणु मी पृथिवीत्व एक जातीय होनेसे विनष्ट होने चाहिए । यदि कहो कि विनष्ट होते हुए भी अवयवविभागसे ही विनष्ट होते हैं, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि घृत-काठिन्य विलयनके समान भी विनाश हो सकता है, ऐसा हम कह चुके हैं, जैसे अविभज्यमान अवयववाले घृत सुवर्णं आदिके भी अग्निके संयोगसे द्रवभाव प्राप्ति होनेसे काठिन्यका विनाश होता है, वैसे परमाणुओंका भी परम कारणभाव प्राप्तिसे मूर्ति आदि विनाश होगा । उसी प्रकार कार्यका आरम्भ भी केवल अवयव संयोगसे नहीं होता है, क्योंकि अन्य अवयव संयोगके विना भी क्षीर, जल आदिका दधि, हिम आदि कार्य आरम्भ देखने में आता है । इस प्रकार परमाणु कारणवाद असारतर तर्कोंसे विरचिंत तथा ईश्वर कारणत्व प्रतिपादक श्रुतिसे विरुद्ध, श्रुतिप्रवण ( श्रुति समर्थक ) शिष्ट मनु आदि द्वारा अस्वीकृत होनेसे श्रेय चाहनेवाले आयं पुरुषों को परमाणु कारणवादमें अत्यन्त ही उपेक्षा करनी चाहिए ऐसा वाक्यशेष है ॥ १७ ॥

पूर्व में यह कहा गया है कि कुतर्कके योग, वेद विरुद्ध और शिष्ट पुरुषोंसे अस्वीकृत होनेसे सत्यानन्दी - दीपिका * ब्रह्म से भिन्न सब द्रव्य पदार्थ अज्ञानसे जन्य होनेसे निरवयव नहीं हो सकते हैं, इसलिए प्रलयमें उनका अदृष्ट आदि निमित्तोंके विनाशसे विनाश हो सकता है । अतएव परमाणुके अस्तित्व में कोई प्रमाण नहीं है । अतः भ्रान्तिमूलक वैशेषिक मतसे वेदान्तसमन्वयका विरोध नहीं है ॥ १७ ॥

* इस प्रकार अधं वैनाशिक वैशेषिक मतका निराकरण कर अब बुद्धिस्य सर्ववैनाशिक मतका निराकरण करते हैं, इस तरह अवान्तर प्रसंगसंगतिसे ' वैशेषिक ' आदिसे कहते हैं । वैशेषिक निश्चित

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४३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ इत्युक्तम् । सोऽर्धवैनाशिक इति वैनाशिकत्वसाम्यात्सर्ववैनाशिकराद्धान्तो नतराम-पेक्षितव्य इतीदमिदानीमुपपादयामः । स च बहुप्रकार: प्रतिपत्तिभेदाद्विनेयभेदाद्वा । तत्रैते त्रयो वादिनो भवन्ति केचित्सर्वास्तित्ववादिनो बाह्यमान्तरं च वस्त्वभ्युपगच्छन्ति भूतं भौतिकं च चित्तं चैत्तं च, तांस्तावत्प्रतिब्रूमः । तत्र भूतं पृथिवीधात्वादयः । भौतिकं वैशेषिक सिद्धान्त अपेक्षा करने योग्य नहीं है । वह अर्धव नाशिक है, इसलिए वैनाशिकत्व सादृश्यसे सर्ववैनाशिक सिद्धान्त अत्यन्त अपेक्षा करने योग्य नहीं है । इससे अब हम इसका उपपादान करते हैं । प्रतिपत्तिके भेदसे अथवा " शिष्योंके भेदसे वह बहुत प्रकारका है । उसमें ये तीन वादी हैं— कोई सर्वास्तित्ववादी हैं, कोई केवल विज्ञानास्तित्व वादी हैं और पुनः अन्य सर्वशून्यत्ववादी हैं । उनमें जो सर्वास्तित्ववादी बाह्य - भूत और भौतिक, आन्तर - चित्त और चैत्त स्वीकार करते हैं । पहले उनके सिद्धान्तका हम निराकरण करते हैं - उनमें भूत- पृथिवी धातु आदि हैं, भौतिक रूप आदि और चक्षु सत्यानन्दी - दीपिका अर्धवैनाशिक हैं, क्योंकि वे परमाणु, आकाश, दिशा, काल, आत्मा, मन, सामान्य, विशेष और समवाय । शब्द, स्पर्श, रूप आदि गुण और कर्म इनमें से कुछको नित्य मानते हैं और कुछका नाश । आधेका विनाश मानने से वे अर्धवेनाशिक हैं । इनका उपन्यास वैनाशिकत्वके सादृश्यसे सर्ववैना-शिकोंका स्मरण कराता है । जब वैशेषिकमत अर्धवैनाशिक होनेसे अनुपादेय है, तब सर्व वैनाशिकों का सिद्धान्त तो अत्यन्त ही अनुपादेय समझना चाहिए । बुद्धके शिष्यों में चार संप्रदाय थे-- वैभाषिक, सौत्रान्ति, योगाचार और माध्यमिक । उनमेंसे बुद्धके वचनोंके अनुसार उसके विवरणभूत विभाषा शास्त्र जिसका नाम अभिधर्मविभाषा है उसे प्रमाणरूपसे माननेवाला वैभाषिक है । सूत्रपर्यन्त जो gah वचन हैं जिनका पाली भाषामें सूत्तान्त नाम है उसे प्रमाणतमरूपसे माननेवाला सौत्रान्तिक है । योग ( समाधि ) द्वारा आलयविज्ञानका साक्षात्कार करनेवाला योगाचार है । और ' अतोभावाभावान्त-द्वयरहितत्वात्सर्वस्वभावानुत्पत्तिलक्षणा शून्यता मध्यमा प्रतिपत् समध्यमो मार्गः ॥ ' इति ( माध्यमिक-वृत्ति ) ( भाव और अभाव दोनों पदार्थोंसे रहित होनेसे सर्वस्वभावकी अनुत्पत्तिरूप शून्यता मध्यम प्रतिपत् अर्थात् वह मध्यममार्ग है ) इस प्रकार जो मध्यमका अवलम्बन कर प्रवृत्त हुए वे माध्यमिक कहे जाते हैं । बाह्य पृथिवी आदि और आन्तर वित्त आदि बिद्यमान होते हुए भी उनमें ' सर्व शून्यम् ' ( सब शून्य है ) यह प्रथम शिष्योंको उपदेश किया । विज्ञानमें आग्रह रखनेवाले दूसरे शिष्यों को ' विज्ञानमेवैकं सत ' ( एक विज्ञान ही सत् है ) ऐसा उपदेश किया । बाह्य और आन्तर उमय पदार्थों में आस्था रखनेवाले शिष्यों को ' उमयं सत्यम् ' ऐसा उपदेश किया है । वैभाषिक और सौत्रान्तिकका यद्यपि बाह्य पदार्थोंके प्रत्यक्षत्व और अप्रत्यक्षत्वमें विवाद है, तो भी सर्वास्तित्ववादमें विवाद नहीं है । इसलिए दोनोंको एककर तीन मत दिखाये गये हैं । सर्वास्तित्ववादी के मत में पृथिवी आदि चार भूत हैं और आकाश आवरणका अभावमात्र है । इन पृथिवी आदि भूतोंसे उत्पन्न हुए पर्वत आदि कार्यं भौतिक हैं ये बाह्य हैं । चित्त और चित्तसे उत्पन्न हुए काम आदि चैत्त आन्तर हैं । इस प्रकार सब भूत भौतिक पदार्थं परमाणुओंका ही समुदाय है अवयवोंसे अतिरिक्तं अवयवी नहीं है । पृथिवीके परमाणु कठिन, जलके स्नेह, अग्निके उष्ण और वायुके चलन स्वभाववाले होते हैं, इस प्रकार यह बाह्य समुदाय है । रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार इस प्रकार पाँच स्कन्ध हैं, स्कन्धका अर्थ समुदाय है । ' जिससे निरूपण किया जाय अथवा जिसका निरूपण किया जाय वह रूप है ' इस प्रकार करण और कमं व्युत्पत्ति से रूप शब्दका अर्थ - इन्द्रिय और विषय दोनों हैं, इसलिए विषय सहित इंन्द्रिय रूपस्कन्ध है । यद्यपि रूप आदि विषय बाह्य हैं तो भी देहस्थ इन्द्रियोंसे ग्राह्य होनेसे आध्यात्मिक हैं ' अहम्, अहम् ' १. देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगाः । भिद्यन्ते बहुधा लोक उपायैर्बहुभिः पुनः ॥ १ ॥

गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा । भिन्नापि देशानाऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा ॥ २ ॥

( बोधिचित्तविवरण )

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अधि ० ४ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४३३ रूपादयश्चक्षुरादयश्च । चतुष्टये च पृथिव्यादिपरमाणवः खरस्नेहोष्णे रणस्वभावास्ते पृथिव्यादिभावेन संहन्यन्त इति मन्यन्ते । तथा रूपविज्ञानवेदनासंज्ञा संस्कारसंज्ञकाः पञ्चस्कन्धाः । तेऽप्याध्यात्मं सर्वव्यवहारास्पद भावेन संहन्यन्त इति मन्यन्ते । * तत्रे-दमभिधीयते - योऽयमुभयहेतुक उभयप्रकारः समुदायः परेषामभिप्रेतोऽणुहेतुकश्च भूतभौतिकसंहतिरूपः स्कन्धहेतुकश्च पञ्च स्कन्धी रूपः तस्मिन्नुभयहेतुकेऽपि समुदायेऽभि-प्रेमाणे तदप्राप्तिः स्यात्समुदायाप्राप्तिः, समुदाय भावानुपपत्तिरित्यर्थः । कुतः? समुदायि-' नामचेतनत्वात् । चित्ताभिज्वलनस्य च समुदायसिद्ध्यधीनत्वात् अन्यस्य च कस्य-चिच्चेतनस्य भोक्तः प्रशासितुर्वा स्थिरस्य संहन्तुरनभ्युपगमात् निरपेक्षप्रवृत्यभ्युपगमे च प्रवृत्त्यनुपरमप्रसङ्गात् । आशय स्याप्यन्यत्वानन्यत्वाभ्यामनिरूप्यत्वात् । क्षणिकत्वा-भ्युपगमाच्च निर्व्यापारत्वात्प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । तस्मात्समुदायानुपपत्तिः । समुदायानुप-पत्तौ च तदाश्रया लोकयात्रा लुप्येत ॥ १८ ॥

आदि हैं । पृथिवी आदिके चार प्रकारके परमाणु कठिन, स्नेह, उष्ण वे पृथिवी आदि रूपसे संघटित होते हैं, ऐसा मानते हैं । उसी प्रकार संस्कार नामके पाँच स्कन्ध हैं । वे भी आध्यात्मिक ( शरीर सम्बन्धी ) संघटित होते हैं, ऐसा मानते हैं । सिद्धान्ती- - इस विषयमें कहते हैं— जो यह उभयहेतुक, tant अभिप्रेत है अणु है हेतु जिसका ऐसा भूत भौतिक संघातरूप पाँच स्कन्धरूप उस उभयहेतुक समुदायके स्वीकार करनेपर भी और चलन स्वभाववाले होते हैं रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा, और होकर संवं व्यवहारके विषयरूपसे उभय प्रकारका समुदाय अन्य-और स्कन्ध है हेतु जिसका ऐसा तदप्राप्ति - समुदाय की अप्राप्ति है, समुदाय भावकी अनुपपत्ति है ऐसा अर्थ है I । किससे? इससे कि समुदायो अचेतन हैं, क्योंकि चित्ता-भिज्वलन समुदाय सिद्धि के अधीन है और अन्य किसी स्थिर चेतन भोक्ता वा शासिताको संघातकर्तृरूपसे स्वीकृत नहीं किया गया है । अपेक्षा रहित प्रवृत्ति स्वीकार करें तो प्रवृत्तिका अनुपरम प्रसङ्ग हो जायगा । आशय - सन्तान ( विज्ञान प्रवाह ) का भी संतानीसे अन्यरूपसे अथवा अनन्यरूपसे निरूपण नहीं किया जा सकता और उसे क्षणिक स्वीकार करनेसे व्यापार रहित होनेके कारण उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, इसलिए समुदायकी अनुपपत्ति है । समुदायको अनुपपत्ति होनेपर तदाश्रय लोकयात्रा ( व्यवहार ) लुप्त हो जायगी ॥ १८ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका ( मैं, मैं ) ऐसा आलय विज्ञानका प्रवाह विज्ञान स्कन्ध है । सुखादिका अनुभव वेदना स्कंन्ध है । राग, द्वेष, मोह, धर्म, अधर्म आदि संस्कार स्कन्ध है । इनमें विज्ञान स्कन्ध - चित्त - आत्मा कहा जाता है और अन्य चार स्कन्ध चैत्त - चित्तके कार्य कहे जाते हैं, यह आध्यात्मिक स्कन्ध है । यह सर्व लोकयात्राका निर्वाहक है | अवयवोंसे मिन्न अववयीकी उपलब्धि न होनेसे अवयवोंका ही समुदायमात्र है । जो सत् है वह क्षणिक है यथा विद्युत् । बाह्य और आन्तर सब क्षणिक है, यह उनका सिद्धान्त है । * सिद्धान्ती —– सृष्टिके आरम्भ में परमाणुओं अथवा स्कन्धोंका समुदाय स्वतः नहीं हो सकता, क्योंकि वे अचेतन हैं । चित्तसंज्ञक विज्ञान भी समुदाय का हेतु नहीं है, कारण कि देहाकार संघात होनेपर विज्ञान होता है और विज्ञान होनेपर देहाकार संघात होता है, इसप्रकार अन्योन्याश्रय दोष होगा । क्षणिक विज्ञानसे मिन्न किसी संघातकर्तुं स्थिर भोक्ता चेतन जीव अथवा शास्ता ईश्वरको तुम स्वीकृत नहीं करते । यदि कहो कि किसी अन्यकी अपेक्षा किए विना अणु और स्कन्ध स्वयं ही संघात करनेके लिए प्रवृत्त होते हैं, तो ऐसा माननेपर किसी अन्य नियामकके न होनेके कारण संतत प्रवृत्ति होनेसे मोक्षाभाव प्रसङ्ग होमा । यदि कहो कि आलयविज्ञान संतान संघातकर्ता है, तो वह संतानियोंसे मिन है अथवा अभिन्न? यदि भिन्न है तो स्थिर है कि क्षणिक? यदि स्थिर है तो विज्ञान नामसे

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४३४. ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - इतरेतरप्रत्ययत्वात् इति चेत्, न, उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् । सूत्रार्थ - ( इतरेतरप्रत्ययत्वात् ) अविद्या आदिके परस्पर कारण होनेसे घटीयन्त्रके समान अविद्या आदिके सदा घूमनेपर अर्थात् आक्षिप्त संघातकी उपपत्ति होती है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, ( उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ) क्योंकि वे केवल उत्पत्ति निमित्त हैं । * यद्यपि भोक्ता प्रशासिता वा कश्चिच्चेतनः संहन्ता स्थिरो नाभ्युपगम्यते, तथाप्यविद्यादीनामितरेतरकारणत्वादुपपद्यते लोकयात्रा । तस्यां चोपपद्यमानायां न किंचिदपरमपेक्षितव्यमस्ति । ते चाविद्यादयोऽविद्या संस्कारो विज्ञानं नाम रूपं षडाय-तनं स्पर्शो वेदना तृष्णा उपादानं भवो जातिर्जरा मरणं शोकः परिदेवना दुःखं दुर्मनस्ते-त्येवं जातीयका इतरेतरहेतुकाः सौगते समये क्वचित्संक्षिप्ता निर्दिष्टाः क्वचित्प्रपञ्चिताः । सर्वेषामप्ययमविद्यादि कलापोऽप्रत्याख्येयः । तदेवमविद्यादिकलापे परस्परनिमित्तनैमित्ति-पूर्वपक्षीयद्यपि मोक्ता अथवा प्रशासिता, संघातकर्ता कोई स्थिर चेतन स्वीकार नहीं किया जाता है, तो भी अविद्या आदि परस्पर कारण होनेसे लोक यात्रा हो सकती है, उसके उपपद्यमान ( सिद्ध ) होनेपर अन्य कोई अपेक्षितव्य नहीं है । अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम, रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिवेदना, दुःख और दुमंनस्ता इस-प्रकारके परस्पर कारणभूत वे अविद्या आदि बौद्ध सिद्धान्तमें कहीं संक्षेपसे और कहीं विस्तारसे निर्दिष्ट किये गये हैं । यह अविद्या आदि कलाप सब वादियोंसे भी प्रत्यख्यान करनेके योग्य नहीं है । इसलिए यदि कहो कि इसप्रकार अविद्या आदि समुदायके परस्पर निमित्त - नैमित्तकमाव कार्यकारणरूपसे घटी -सत्यानन्दी -दीपिका आत्मा ही है, इससे वेदान्त सिद्धान्तका प्रसङ्ग होगा । क्षणिक मानें तो उसमें किसी उत्पत्तिका हेतु-भूत व्यापार नहीं हो सकता, इसलिए परमाणु आदिका मेलन करनेके लिए उस सन्तानमें प्रवृत्ति अनुपपन्न है । यदि उसमें प्रवृत्ति मानें तो वह क्षणिक नहीं रहेगा । इस मतमें प्रथम क्षणमें वस्तु उत्पन्न होकर द्वितीयक्षणमें नष्ट होती है, अतः वह क्षणिक कही जाती है । इससे इस मध्यमें प्रवृत्ति-जनक व्यापार नहीं हो सकता । इसप्रकार परमाणु मी क्षणिक हैं उनमें मी समुदाय होने की क्रिया नहीं हो सकती । यदि संतान संतानियोंसे अनन्य है तो पूर्वोक्त मन्योन्याश्रय दोष है । इसलिए संघात कर्ता के न होनेसे दोनों प्रकारका समुदाय नहीं हो सकता है ॥ १८ ॥

* क्षणिक पदार्थोंमें स्थिर बुद्धि अविद्या है अर्थात् अनित्य, अशुचि, असत् और क्षणिक ७ शरीर आदि आकार में परिणत अनात्मपदार्थों में नित्य, शुचि, सत् और आत्मबुद्धि अविद्या है । उससे राग, द्वेष, मोह आदि संस्कार उत्पन्न होते हैं जो विषयोंमें प्रवृत्त करते हैं । उन संस्कारोंसे ' गर्भस्थका आद्य विज्ञान उत्पन्न होता है । उससे पृथिवी आदि चारभूत जो नामका आश्रय होनेसे नाम शब्दसे कहे जाते हैं, उत्पन्न होते हैं । उनसे रूप: सित - शुक्र और असित शोणित उत्पन्न होते हैं | विज्ञान, पृथिवी आदि चार भूत और रूप यह छ: जिस इन्द्रिय समूह के स्थान हैं, अतः वह इन्द्रिय षडायतन है । नाम, रूप और इन्द्रियोंका परस्पर संयोग स्पर्श है । उससे सुख आदिका अनुभवरूप वेदना उत्पन्न होती है । उससे विषयोंकी तृष्णा होती है । उससे वाणी और शरीर आदिकी चेष्टारूप प्रवृत्ति उपादान है । उससे जन्मके हेतुभूत धर्म आदि उत्पन्न होते हैं । उससे जन्म- पाँच स्कन्ध समुदाय उत्पन्न होता है । उत्पन्न स्कन्धोंका परिपाक जरा है, इनका नाश मरण है । मरते हुए पुरुषको पुत्र आदि स्नेहसे जो अन्तर्दाह वह शोक है । उससे हा पुत्र! इत्यादि विलाप परिवेदना है । अनिष्टका

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अधि ० ४ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४३५ कभावेन घटीयन्त्रवदनिशमावर्तमानेऽर्थाक्षिप्त उपपन्नः संघात इति चेत्- तन्न, कस्मात्? उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् । भवेदुपपन्नः संघातो यदि संघातस्य किंचिन्निमित्तमवगम्येत, न त्ववगम्यते यत इतरेतरप्रत्ययत्वेऽप्यविद्यादीनां पूर्वपूर्वमुत्तरोत्तरस्योत्पत्तिमात्रनिमित्तं भवद्भवेन्न तु संघातोत्पत्तेः किंचिन्निमित्तं संभवति । नन्वविद्यादिभिरर्थादाक्षिप्यते संघात इत्युक्तम् । अत्रोच्यते - यदि तावदयमभिप्रायोऽविद्यादयः संघातमन्तरेणात्मानमलभमाना अपेक्षन्ते संघातमिति, ततस्तस्य संघातस्य निमित्तं वक्तव्यम् । तच्च नित्येष्वप्यणुष्वभ्युप-गम्यमानेष्वाश्रयाश्रयिभूतेषु च भोक्तृषु सत्सु न संभवतीत्युक्तं वैशेषिकपरीक्षायाम् । किमङ्ग पुनः क्षणिष्वप्य गुषु भोक्तरहितेष्वाश्रयाश्रयिशून्येषु वाभ्युपगम्यमानेषु संभवेत्? अथायमभिप्रायोऽविद्यादय एव सङ्घातस्य निमित्तमिति, कथं तमेवाश्रित्यात्मानं लभमाना-स्तस्यैव निमित्तं स्युः? अथ मन्यसे सङ्घाता एवानादौ संसारे संत त्यानुवर्तन्ते तदाश्रयाश्चा-विद्यादय इति, तदपि सङ्घातात्सङ्घातान्तरमुत्पद्यमानं नियमेन वा सदृशमेवोत्पद्येत, अनियमेन वा सदृशं विसदृशं वोत्पद्येत । * नियमाभ्युपगमे मनुष्यपुङ्गलस्य देवतिर्यग्यो-निनारकप्राप्त्यभावः प्राप्नुयात् । अनियमाभ्युपगमेऽपि मनुष्य पुद्गलः कदाचित्क्षणेन हस्ती यन्त्र के समान सर्वदा आर्वतमान होनेसे अर्थात् आक्षिप्त संघात उत्पन्न होता है । सिद्धान्ती - वह युक्त नहीं है, किससे? इससे कि वे उत्पत्ति मात्रके निमित्त हैं । यदि संघातका कोई निमित्त अवगत हो, तो संघात उत्पन्न हो, परन्तु उसका कोई निमित्त अवगत नहीं होता, क्योंकि अविद्या आदि परस्पर कारण होने-पर भी पूर्व पूर्व उत्तरोत्तरकी केवल उत्पत्तिका निमित्त होता हो, तो हो, परन्तु संघातोत्पत्तिका कोई निमित्त नहीं हो सकता । परन्तु ऐसा कहा गया है कि अविद्यादिसे अर्थात् संघात आक्षिप्त होता है । इसपर कहते हैं - यदि यह अभिप्राय हो कि अविद्या आदि संघात विना अपने स्वरूपको न प्राप्त होते हुए संघातकी अपेक्षा करते हैं, तो उससे उस संघातका निमित्त कहना चाहिए । यह वैशेषिक परीक्षा में कह दिया गया है कि अणुओंको नित्य मानने और आश्रयाश्रयिभूत स्थायी मोक्ताओं के विद्यमान होनेपर भी संघात नहीं हो सकता, तो हे अङ्ग! भोक्तृरहित अथवा आश्रयाश्रयिभावसे शून्य क्षणिक परमाणुओके माननेपर कैसे संभव होगा? यदि यह अभिप्राय हो कि अविद्या आदि ही संघातके निमित्त हैं, तो उसका ही आश्रयकर अपने स्वरूपको प्राप्त होते हुए उसके ही निमित्त किंसप्रकार होंगे? ऐसा यदि मानते हो कि संघात हीं अनादि संसार में निरन्तर प्रवाहरूपसे आवर्तमान है और उनके आश्रयसे अविद्या आदि हैं, तो मी संघातसे उत्पन्न होता हुआ अन्य संघात नियमसे समान ही उत्पन्न होगा अथवा अनियमसे समान अथवा असमान उत्पन्न होगा । नियम स्वीकार करनेपर मनुष्य शरीरको देवत्व, तिर्यग्योनित्व, नारकीयत्व प्राप्तिका अभाव प्राप्त होगा । अनियम स्वीकार करनेपर भी मनुष्य शरीर कभी क्षणमरमें हस्ति होकर अथवा देव अथवा पुनः मनुष्य होगा, ऐसा प्राप्त सत्यानन्दी - दीपिका अनुभव दुःख है । इससे मनोव्यथा दुमंनस्ता होती है, और ' इति ' शब्दसे मान, अपमान आदि क्लेशों का संग्रह है । इसप्रकार अविद्या आदिका परस्पर कार्यकारण भाव होता है, इससे आक्षिप्त समुदाय उपपन्न होता है । * अविद्या आदि संघातको उत्पन्न करते हैं और संघात अविद्याको उत्पन्न करता है, ऐसा मानने से अन्योन्याश्रय दोष स्पष्ट है । * ' पूर्यते गलति चेति पुद्गलः - देह: ' ' बढ़ता है और क्षीण होता है, अतः देह पुद्गल है । ' अथवा ' पूर्यन्ते गलन्ति चेति पुद्गलाः शरीरम्भकाः परमाणवः ' भोग और मोक्ता दोनों क्षणिक होनेसे न भोग है और न भोक्ता हो । इसलिए भोग और मोक्षका कथन असंगत है । भोग और मोक्ष

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४३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ भूत्वा देवो वा पुनर्मनुष्यो वा भवेदिति प्राप्नुयात् । उभयमप्यभ्युपगमविरुद्धम् । अपि च यद्भोगार्थः सङ्घातः स्यात्स नास्ति स्थिरो भोक्तेति तवाभ्युपगमः ततश्च भोगो भोगार्थ एव, स नान्येन प्रार्थनीयः तथा मोक्षो मोक्षार्थ एवेति मुमुक्षुणा नान्येन भवितव्यम् । अन्येन चेत्प्रार्थ्यतोभयम्, भोगमोक्षकालावस्थायिना तेन भवितव्यम् । अवस्थायित्वे क्षणिकत्वा-भ्युपगमविरोधः । तस्मादितरेतरोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वमविद्यादीनां यदि भवेद्भवतु नाम, नतु सङ्घातः सिध्येत्, भोक्त्रभावादित्यभिप्रायः ॥१ ९ ॥ उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥२० ॥

पदच्छेद — उत्तरोत्पादे, च, पूर्वनिरोधात् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( उत्तरोत्पादे ) उत्तर कार्यक्षणकी उत्पत्ति के समय में ( पूर्वनिरोधात् ) कारण क्षणका नाश माननेपर सुगत मतमें हेतुके अधीन मी कार्योंत्पत्ति नहीं हो सकती * उक्तमेतत् - अविद्यादीनामुत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वान्न सङ्घातसिद्धिरस्तीति । तदपि तूत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वं न सम्भवतीतीदमिदानीमुपपाद्यते । क्षणभङ्गवादिनोऽयमभ्युपगम उत्तरस्मिन्क्षण उत्पद्यमाने पूर्वः क्षणो निरुध्यत इति । न चैवमभ्युपगच्छता पूर्वोत्तरयोः क्षणयोर्ह तुफलभावः शक्यते संपादयितुम् । निरुध्यमानस्य निरुद्धस्य वा पूर्वक्षणस्याभाव-ग्रस्तत्वादुत्तरक्षणहेतुत्वानुपपत्तेः । अथ भावभूतः परिनिष्पन्नावस्थः पूर्वक्षण उत्तरक्षणस्य हेतुरित्यभिप्रायस्तथापि नोपपद्यते, भावभूतस्य पुनर्व्यापारकल्पनायां क्षणान्तरसम्बन्ध प्रसङ्गात् । अथभाव एवास्य व्यापार इत्यभिप्रायस्तथापि नैवोपपद्यते, हेतु स्वभावानुपरक्तस्य-होगा । किन्तु ये दोनों सिद्धान्त के विरुद्ध हैं । और जिसके भोगके लिए संघात होगा, वह मोक्ता स्थिर नहीं है ऐसा तुम्हारा स्वीकार - सिद्धान्त हैं, उससे भोग भोगके लिए होगा दूसरेसे प्रार्थनीय न होगा । उसीप्रकार मोक्ष मोक्षके लिए ही होगा, इससे अन्य मुमुक्षु नहीं होना चाहिए । यदि दोनों अन्य से प्रार्थित हैं तो भोग और मोक्ष काल पर्यन्त वह स्थायी होना चाहिए | स्थायित्व मानने पर क्षणिकत्व सिद्धान्तका विरोध होता है । इसलिए यदि अविद्या आदि केवल परस्परकी उत्पत्ति में निमित्त होते हों, तो हों, परन्तु स्थायी मोक्ताके न होनेसे संघात सिद्ध नहीं होगा, ऐसा अभिप्राय है ॥१ ९ ॥ यह कहा गया है कि अविद्या आदि परस्पर केवल उत्पत्तिमें निमित्त होनेसे संघातकी सिद्धि नहीं होती, परन्तु वे उत्पत्तिमात्र के भी निमित्त नहीं हो सकते, अब इसका उपपादन किया जाता है । क्षणभङ्गवादीका यह स्वीकार - सिद्धान्त है कि उत्पद्यमान उत्तर क्षण में पूर्वक्षणका नाश होता है । ऐसा स्वीकार करनेवाले तुमसे पूर्व और उत्तर क्षणका कार्यकारणभाव सम्पादन नहीं किया जा सकता, नष्ट होता हुआ अथवा नष्ट हुआ पूर्वक्षण अभावग्रस्त होनेसे उत्तरक्षणका कारण नहीं हो सकता । यदि यह अभिप्राय है कि भावरूप सिद्धावस्थापन पूर्वक्षण उत्तरक्षणका हेतु है, तो मी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि भावरूपमें पुनः व्यापारकी कल्पना करने पर अन्य क्षणके साथ सम्बन्ध प्रसङ्ग होगा । यदि यह अभिप्राय हो कि भाव ( उत्पत्ति ) ही इसका व्यापार है, तो मी उपपन्न नहीं होगा, कारण कि हेतु-स्वभावसे उपरक्त ( सम्बद्ध ) न हुए कार्यकी उत्पत्ति संभव नहीं है स्वभावसे उपराग स्वीकार करें, सत्यानन्दी - दीपिका अपने लिए नहीं होते, किन्तु अन्यके लिए । अतः भोग और मोक्षकी सार्थकताके लिए मोक्ता और मुमुक्षु भोग और मोक्ष पर्यन्त स्थायी मानने होंगे, तब तो क्षणिक सिद्धान्तका बाध होगा । इसलिए स्थायी चेतन भोक्ताके विना संघात असिद्ध है ॥ १ ९ ॥ * बौद्ध लोग दो प्रकारकी कार्योत्पत्ति मानते हैं-- एक हेतुके अधीन और दूसरी समुदायके अधीन । उन दोमें ' अविद्यासे संस्कारकी उत्पत्ति और संस्कार से विज्ञानकी उत्पत्ति ' यह पहला प्रकार