श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 471–480
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 471–480
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अधि ० ४ सू ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४३७ फलस्योत्पत्त्यसंभवात् । स्वभावोपरा गाभ्यपगमे च हेतुस्वभावस्य फलकालावस्थायित्वे सति क्षणभङ्गाभ्युपगमत्यागप्रसङ्गः । विनैव वा स्वभावोपरागेण हेतुफलभावमभ्युपगच्छतः सर्वत्र तत्प्राप्तेरतिप्रसङ्गः । अपि चोत्पादनिरोधौ नाम वस्तुनः स्वरूपमेव वा स्यातामव-स्थान्तरं वा वस्त्वन्तरमेव वा, सर्वथापि नोपपद्यते । यदि तावद्वस्तुनः स्वरूपमेवोत्पाद-निरोधौ स्याताम्, ततो वस्तुशब्द उत्पादनिरोधशब्दौ च पर्यायाः प्राप्नुयुः । अथास्ति कश्चिद्विशेष इति मन्येतोत्पाद निरोधशब्दाभ्यां मध्यवर्तिनो वस्तुन आद्यन्ताख्ये अवस्थे अभिलप्येते इति, एवमप्याद्यन्तमध्यक्षणत्रय संबन्धित्वाद्वस्तुनः क्षणिकत्वाभ्युपगमहानिः । अथात्यन्तव्यतिरिक्तावेवोत्पाद निरोधौ वस्तुनः स्यातामश्वमहिषवत्, ततो वस्तु उत्पाद-निरोधाभ्यामसंसृष्टमिति वस्तुनः शाश्वतत्वप्रसङ्गः । यदि च दर्शनादर्शने वस्तुन उत्पाद निरोधौ स्याताम् 3 एवमपि द्रष्टृधर्मौ तौ न वस्तुधर्माविति वस्तुनः शाश्वतत्व-प्रसङ्ग एव । तस्मादप्यसंगतं सौगतं मतम् ॥ २० ॥
असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ २१ ॥
पदच्छेद - असति, प्रतिज्ञोपरोधः, यौगपद्यम्, अन्यथा । सूत्रार्थ - ( असति ) कारणके विना कार्योत्पत्ति माननेपर ( प्रतिज्ञोपरोधः ) प्रतिज्ञाका बाध होगा, ( अन्यथा ) कार्यं पर्यन्त कारणकी स्थिति होनेसे ( यौगपद्यम् ) दोनों को एक समयमें विद्यमान होने से क्षणिकत्व प्रतिज्ञाकी हानि होगी । तो हेतुस्वभावको फल ( कार्य ) पर्यंन्त स्थायी होनेपर क्षणभङ्ग सिद्धान्तका त्याग प्रसङ्ग हो जायगा । अथवा हेतुस्वभावसे उपरक्त हुए विना ही कार्यकारणभाव स्वीकार करनेवाले तुमको सर्वत्र उसकी प्राप्ति होने से अतिप्रसङ्ग होगा । किव उत्पाद और निरोध वस्तुका स्वरूप ही हो अथवा अन्य अवस्था हो वा अन्य वस्तु ही हो, सर्वथा भी उपपन्न नहीं होता । यदि उत्पत्ति और विनाश वस्तुके स्वरूप हों तो उससे वस्तु शब्द, उत्पत्ति और विनाश शब्द पर्याय होंगे अर्थात् एक हो पदार्थके दो नाम हैं । यदि उत्पत्ति और विनाश शब्दोंसे मध्यवर्ती वस्तुकी आदि और अन्तिम अवस्थाएँ हैं ऐसा कोई विशेष है, ऐसा मानें, तो ऐसा होनेपर भी वस्तुका आदि, मध्य और अन्त तीन क्षणके साथ सम्बन्ध होनेसे इसमें क्षणिकत्व सिद्धान्तकी हानि होगी । यदि अश्व और महिषके समान वस्तुसे अत्यन्त भिन्न हों, तो उससे उत्पाद और निरोधसे वस्तु असम्बद्ध होगी, होनेका प्रसंग हो जायगा । यदि दर्शन और अदर्शन वस्तुका उत्पाद और निरोध मी वे द्रष्टा धर्म होगे वस्तुके धर्म नहीं होंगे, इससे वस्तुके शाश्वत होनेका हो भी सौगत मत असंगत है ॥ २० ॥
सत्यानन्दी -दीपिका है । ' पृथिवी आदि समुदायसे शरीर उत्पन्न होता है ' यह द्वितीत प्रकार है । उत्पाद और निरोध इससे वस्तुके शाश्वत हों, तो ऐसा होनेपर प्रसङ्ग होगा । इससे उनमेंसे प्रथम प्रकार स्वीकारकर संघातकर्ता के अमावसे दूसरा प्रकार दूषित किया जा चुका है । अब भगवान् सूत्रकार ' उत्तर ' इस सूत्र से प्रथम प्रकारको मी दूषित करते हैं । बौद्ध लोग क्षणिक पदार्थको क्षण शब्दसे कहते हैं 1 । उनके मत प्रत्येक कार्य प्रथम क्षणमें उत्पन्न होकर द्वितीय क्षणमें स्वयं नष्ट होता हुआ अपने समान दूसरे कार्यको उत्पन्नकर नष्ट हो जाता है । यह नाशग्रस्त द्वितीय क्षण अन्य कार्यका उत्पत्ति क्षण कहलाता है । इसप्रकार पूर्वक्षण उत्तर क्षणका कारण है । ' भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैवोच्यते ' ( जिन क्षणिक पदार्थोंकी जो उत्पत्ति है वही क्रिया और वही कारण कही जाती है ) यह सिद्धान्त है | यदि उत्पत्ति ही व्यापार मानें तो मी कार्यकारणभाव नहीं हो सकता, क्योंकि हेतु के स्वरूपके साथ सम्बद्ध ( तादात्म्यापन ) हुए विना कार्यं उत्पन्न नहीं हो सकता ॥ २० ॥
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४३८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० * क्षणभङ्गवादे पूर्वक्षणो निरोघग्रस्तत्वान्नोत्तरस्य क्षणस्य हेतुर्भवतीत्युक्तम् । अथा-सत्येव हेतौ फलोत्पत्ति ब्रूयात्, ततः प्रतिज्ञोपरोधः स्यात् । चतुर्विधान्हेतून्प्रतीत्य चित्त-वैत्ता उत्पद्यन्त इतीयं प्रतिज्ञा होयेत । निर्हेतुकायां चोत्पत्तावप्रतिबन्धात्सर्वं सर्वत्रोत्प-द्येत । अथोत्तरक्षणोत्पत्तिर्यावत्तावदवतिष्ठते पूर्वक्षण इति ब्रूयात्ततो यौगपद्यं हेतुफलयोः स्यात् । तथापि प्रतिज्ञोपरोध एव त्यात् । क्षणिकाः सर्वे संस्कारा इतीयं प्रतिज्ञोपरुध्येत | २१ | प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्या निरोधाप्राप्तिरत्रिच्छेदात् ॥ २२ ॥
पदच्छेद - प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्या निरोधाप्राप्तिः, अविच्छेदात् । सूत्रार्थ - - - ( प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिः ) सन्तान और सन्तानियों में बुद्धिपूर्वक नारा और अबुद्धिपूर्वक नाशका सम्भव नहीं है, ( अविच्छेदात् ) क्योंकि सन्तान और सन्तानियोंका विच्छेद नहीं होता, इससे नाश द्वय नहीं हो सकता । * अपि च वैनाशिकाः कल्पयन्ति - बुद्धिबोध्यं त्र्यादन्यत्संस्कृतं क्षणिकं चेति । तदपिचन्त्रयं प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्या निरोधावाकाशं चेत्याचक्षते । त्रयमपि चैतदवस्त्व-भावमात्रं निरुपाख्यमिति मन्यन्ते, बुद्धिपूर्वकः किल विनाशो भावानां प्रतिसंख्या निरोधो नाम भाष्यते, तद्विपरीतोऽप्रतिसंख्यानिरोधः, आवरणाभावमात्रमाकाशमिति । तेषामाकाशं यह कहा गया है कि क्षणभङ्गवादमें पूर्वक्षण निरोध ग्रस्त होनेसे उत्तरक्षणका हेतु नहीं होता, यदि हेतुके न रहनेपर भी कार्योत्पत्ति कहो, तो उससे प्रतिज्ञाका बाध होगा । चार प्रकरके हेतु ओंको प्राप्त कर चित्त और चैत्त उत्पन्न होते हैं, इस प्रतिज्ञाकी हानि होगी । निर्हेतुक उत्पत्ति माननेपर प्रति-बन्धके न होनेसे संब सर्वत्र उत्पन्न होंगे । यदि यह कहो कि उत्तरक्षणको उत्पत्ति पर्यन्त पूर्वक्षण अवस्थित रहेगा, तो कार्य और कारण समकालोन हो जायँगे तो मी प्रतिज्ञाका बाध ही होगा । सब संस्कार क्षणिक हैं यह प्रतिज्ञा बाधित होगी ॥ २१ ॥
नाशिक और भी कल्पना करते हैं कि बुद्धि बोध्य ( प्रमेयमात्र ), उत्पाद्य और क्षणिक यह तीन भिन्न हैं । और उन तीनको भी प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध और आकाश, ऐसा कहते हैं 1 । ये तीन भी अवस्तु - अभाव मात्र तुच्छ हैं, ऐसा मानते हैं । भावोंका बुद्धिपूर्वक विनाश प्रतिसंख्यानिरोध, उनके विपरीत अप्रतिसंख्या निरोध और आवरणका अभाव मात्र अकाश है ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका * कार्यकी उत्पत्ति निर्हेतुक है अथवा सहेतुक? यदि हेतु रहित है तो प्रतिज्ञाकी हानि होती है, क्योंकि विषय, करण, सहकारी और संस्कार ये चार प्रकारके हेतु हैं I । ये बौद्ध ग्रंथोंमें क्रमशः आलम्बन-प्रत्यय, अधिपतिप्रत्यय, सहकारिप्रत्यय और समनन्तर प्रत्यय नामसे प्रसिद्ध हैं । यहाँ प्रत्ययका अर्थ कारण है । इनको प्राप्तकर चित्त रूप आदि विज्ञान और चैत्त चित्तात्मक सुख आदि उत्पन्न होते हैं, यह प्रतिज्ञा है | जैसे चित्त विषयके होनेपर ही विषयाकार होता है इसलिए विषय आलम्बन प्रत्यय है । चक्षु - करण - अधिपतिप्रत्यय हैं, आलोक सहकारी प्रत्यय है और संस्कार अव्यवहित पूर्ववृत्ति कारण है, इससे संस्कार समनन्तर - पूर्व प्रत्यय है । यदि इन कारणोंके विना भी कार्यकी उत्पत्ति मानें तो उक्त प्रतिज्ञाका बाध होगा इस प्रकार प्रतिज्ञा हानि पुरुषका दोष कहकर अब ' निर्हेतुकायाम् ' इत्यादिसे वस्तुके दोषको भी कहते हैं ॥ २१ ॥
* इस अधिकरणके प्रथम दो सूत्रोंसे समुदायका खण्डन किया गया और गत दो सूत्रोंसे कार्य -कारणभाव और क्षणिकत्वका निराकरण किया गया है । अब बौद्धके अभिमत दो प्रकारके विनाशको ' प्रतिसंख्या ' आदि से दूषित करते हैं - प्रतिसंख्यानिरोध - संख्या - बुद्धि, प्रति प्रतिकूल अर्थात् माव पदार्थ के प्रतिकूल बुद्धि - विद्यमानको अविद्यमान करता हूँ, इस प्रकारकी बुद्धि प्रतिसंख्या है, उससे
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अधि ० ४ सू ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४३ ९ परस्तात्प्रत्याख्यास्यति, निरोधद्वयमिदानीं प्रत्याचष्टे । प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्यानिरोधयोर-प्राप्तिः असंभव इत्यर्थः । कस्मात्? अविच्छेदात् । एतौ हि प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्या निरोधौ संतानगोचरौ वा स्यातां भावगोचरौ वा? न तावत्संतानगोचरौ संभवतः, सर्वेष्वपि संता-नेषु संतानिनामविच्छिन्नेन हेतुफलभावेन संतान विच्छेदस्यासंभवात् । नापि भावगोचरौ संभवतः, नहि भावानां निरन्वयो निरुपाख्यो विनाशः संभवति, सर्वास्वप्यवस्थासु प्रत्य-भिज्ञानबलेनान्वय्यविच्छेददर्शनात् । अस्पष्टप्रत्यभिज्ञानास्वप्यवस्थासु क्वचिद्दनान्व-य्यविच्छेदेनान्यत्रापि तदनुमानात् । तस्मात्परपरिकल्पितस्य निरोधद्वयस्यानुपपत्तिः । २ । उभयथा च दोषात् ॥ २३ ॥
पदच्छेद - उभयथा, च, दोषात् । सूत्रार्थ - ( उभयथा च ) अविद्याका सम्यग्ज्ञानसे नाश होता है अथवा अपने आप? दोनों प्रकारसे भी दोष होने के कारण सौगत मत असंगत है । * योऽयमविद्यादिनिरोधः प्रतिसंख्यानिरोधान्तः पाती परपरिकल्पितः, स-कहते हैं । उनमें से बाकाशका आगे प्रत्यख्यान करेंगे । इस समय दोनों निरोधोंका निराकरण करते हैं - प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रतिसंख्यानिरोधकी अप्राप्ति - असम्भव है, ऐसा अर्थ है । किससे? इससे कि उनका अविच्छेद है । ये प्रतिसंख्या निरोध और अप्रतिसंख्यानिरोध सन्तान गोचर होंगे अथवा मांव-गोचर? सन्तान गोचर तो नहीं हो सकते, क्योंकि सर्वे सन्तानों में सन्तानियोंके विच्छेद रहित कार्य-कारणभाव होनेसे सन्तानके विच्छेदका सम्भव नहीं है । इसी प्रकार भाव गोचर भी नहीं हो सकते, क्योंकि भावोंका निरन्वय अवस्तु - अलीक विनाश नहीं हो सकता, कारण कि सब अवस्थाओं में भी प्रत्य-भिज्ञानके बलसे अन्वयीका विच्छेद नहीं देखा जाता, अस्पष्ट प्रत्यभिज्ञानवाली अवस्थाओं में भी कहीं पर देखे गये अन्वयीके अविच्छेदसे अन्यत्र भी उसका अनुमान होता है । इसलिए वैनाशिक परिकल्पित निरोध द्वयकी अनुपपत्ति है ॥ २२ ॥
प्रतिसंख्यानिरोधके अन्तर्भू त जो यह अविद्यादि निरोध पर परिकल्पित है, वह सहायक साधन सत्यानन्दी - दीपिका किया हुआ विनाश प्रतिसंख्या निरोध है । इससे विपरीत अबुद्धिपूर्वक अपने आप नष्ट होनेवाले स्तम्भ आदिका नाश अप्रतिसंख्या निरोध है । ये दोनों निरोध सन्तानमें है कि सन्तानियों में? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं हैं, क्योंकि भाबपदार्थोंका कार्यकारणरूपसे प्रवाह सन्तान है । उसका अन्तिम - द्वितीयक्षण अन्य क्षणको उत्पन्न करता है कि नहीं? प्रथमपक्ष तो वह अन्तिम क्षण नहीं कहा जायगा, क्योंकि सन्तान-रूप प्रवाहका विच्छेद नहीं होता । यदि अन्तिम क्षण अन्य क्षणको उत्पन्न नहीं करता तो असत् होगा, क्योंकि अर्थक्रियाकारी ( प्रयोजनवाला ) ही सत् होता है और तद्भिन्न असत् । इसलिए सन्तानके विच्छेदका असम्भव होनेसे निरोधका भी असम्भव है । दूसरापक्ष - सन्तानियों में निरोध है, तो भाव पदार्थोंका निरन्वय अथवा निरूपाख्य विनाश नहीं होता, जैसे घट, कपाल, चूर्ण आदि अवयवों में यह वही मृत्तिका है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा होनेसे अन्वयिभाव मृत्तिका आदिका अत्यन्त विनाश नहीं होता । जहाँ अङ्कर आदिमें ' यह वही बीज है ' ऐसी स्पष्ट प्रत्यभिज्ञा नहीं होती, वहाँपर ' अंकुरादयः अनुस्यूतान्वथिमावस्थाः कार्यत्वात् घटवत् ' ( अंकुरादि अनुस्युतान्वयी पदार्थ में स्थित हैं, कार्यं होने से घटके समान ) इस प्रकार अन्वयीका अनुमान किया जाता है । ' उदविन्दौ च सिन्धौ च तोयभावो न मिथते । विनष्टेऽपि विन्दावस्ति तस्यान्वयोऽम्बुधौ ' ( जलविन्दु और समुद्र में जलरूपसे भेद नहीं है, इसलिए जलविन्दुका समुद्र में विनाश होनेपर भी उसका समुद्र में अन्बय है ) इससे सिद्ध हुआ कि किसी भी पदार्थका निरन्वय नाश नहीं होता, इसलिए दोनों निरोध असंगत है ॥ २२ ॥
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४४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ सम्यग्ज्ञानाद्वा सपरिकरात्स्यात्स्वयमेव वा? पूर्वस्मिन्विकल्पे निर्हेतुकविनाशाभ्युपग-महानिप्रसङ्गः । एवमुभयथापि दोषप्रसङ्गादसमञ्जसमिदं दर्शनम् ॥२३ ॥
आकाशे चाविशेषात् ॥ २४ ॥
पदच्छेद- आकाशे, च, अविशेषात् । सूत्रार्थ - ( आकाशे च ) ' आत्मन आकाशः सम्भूतः ' इस श्रुतिसे और शब्द गुण विशिष्ट होनेसे आकाश में भी ( अविशेषान् ) पृथिवीत्व आदिके समान वस्तुत्वकी प्रतीति होती हैं, अतः अवस्तु नहीं है । * यच्च तेषामेवाभिप्रेतम् - निरोधद्वयमाकाशं च निरुपाख्यमिति, तत्र निरोध-द्वयस्य निरुपाख्यत्वं पुरस्तान्निराकृतम्, आकाशस्येदानीं निराक्रियते । आकाशे चायुक्तो निरुपाख्यत्वाभ्युपगमः, प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्यानिरोधयोरिव वस्तुत्वप्रतिपत्तेरविशेषात् । आगमप्रामाण्यात्तावत् ‘ आत्मन आकाशः संभूतः ( तै ० २1१ ) इत्यादिश्रुतिभ्य आकाशस्य च वस्तुत्वप्रसिद्धिः । विप्रतिपन्नान्प्रति तु शब्दगुणानुमेयत्वं वक्तव्यम्, गन्धादीनां गुणानां पृथिव्यादिवस्त्वाश्रयत्वदर्शनात् । अपि चावरणाभावमात्रमा काशमिच्छतामेकस्मिन्सुपर्णे पतत्यावरणस्य विद्यमानत्वात्सुपर्णान्तरस्योत्पित्सतोऽनवकाशत्वप्रसङ्गः । यत्रावरणा-भावस्तत्र पतिष्यतीति चेत् — येनावरणाभावो विशेष्यते तत्तर्हि वस्तुभूतमेवाकाशं स्यात्, सहित सम्यग्ज्ञानसे है अथवा स्वयं ही । पूर्व विकल्पमें निर्हेतुक विनाशके अभ्युपगमकी हानिका प्रसङ्ग होगा । द्वितीय विकल्पमें मार्गोपदेशका अनर्थक्यं प्रसङ्ग होगा । इस प्रकार दोनों प्रकारचे दोषका प्रसङ्ग होनेसे भी यह दर्शन असंगत है ॥ २३ ॥
जो उन बौद्धोंको अभिप्रेत है कि दोनों निरोध और आकाश निरुपाख्य - तुच्छ हैं, उनमें से दोनों निरोधोंका तुच्छत्ध पहले निराकरण किया गया, अब आकाशके तुच्छत्वका निराकरण किया जाता है । आकाशमें तुच्छत्व त्वीकार अयुक्त है, क्योंकि उसमें प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रतिसंख्यानिरोधके समान वस्तुत्व की प्रतिपत्तिसमान है । उसमें आगम प्रमाणसे वस्तुत्व है, ' आत्मन ० ' ( आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि श्रुतियोंसे आकाश में वस्तुत्व प्रसिद्धि है । आगम प्रामाण्य न माननेवाले प्रति-पक्षियोंके लिए आकाश शब्द गुणानुमेय है ऐसा कहना चाहिए । कारण कि गन्ध आदि गुणोंका पृथिवी आदि वस्तु आश्रयरूपसे देखनेमें आते हैं । किश्व आकाशको आवरणाभाव मात्र माननेवालोंके मतमें एक पक्षीके उड़नेपर आवरण विद्यमान होनेसे उड़नेके अभिलाषी अन्य पक्षीको अनवकाशत्व प्रसङ्ग होगा । यदि कहो कि जहाँपर आवरणका अभाव है वहाँ पर उड़ेगा, तो जिससे आवरण अभाव विशेषित होता है तब तो वस्तुभूत आकाश है आवरणका अभावमात्र नहीं है । और आवरणके सत्यानन्दी - दीपिका * यम, नियम आदि और श्रवण, मनन आदि सम्यग्ज्ञानकी सामग्री है । यदि इसप्रकार सामग्री सहित सम्यग्ज्ञानसे अविद्या आदिका विनाश मानें तो विना कारणके नाशका सिद्धान्त बाधित हो जायगा । ' सर्व क्षणिकं क्षणिकम्, सर्वं दुःखं दुःखम्, सर्वं स्वलक्षणं स्वलक्षणम् ' ( सर्व क्षणिक है क्षणिक है, सर्व दुःख है दुःख है, सर्व स्वलक्षण है स्वलक्षण ( अन्यसे व्यावृत्त व्यक्तिमात्र ) है, सर्वशून्य है शून्य है ) इन भावनाओंके अभ्यास से परिपक्व होनेपर निर्वाण होता है यह बौद्ध सिद्धान्त है । जब अविद्या स्वतः ही निवृत्त हो जायगी तो यह मार्गोपदेश व्यथं हो जायगा, इस प्रकार दोनों पक्षोंके दूषित होने से यह बौद्धदर्शन अयुक्त है ॥ २३ ॥
' अकाशं वस्तु कार्यत्वात् घटवत् ' ( आकाश वस्तु है, क्योंकि वह कार्य है, जैसे घट ) यद्यपि ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इत्यादि श्रुतियोंसे आकाश कार्यत्व सिद्ध है, तो भी श्रुतिप्रमाणको न माननेवालोंके लिए अनुमानसे सिद्ध किया जाता है । ' शब्दः सामान्यविशेषसमवायेभ्यो मिन्नः शब्दत्वात् '
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अघि ० ४ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४४१ नावरणाभावमात्रम् । अपि चावरणाभावमात्रमाकाशं मन्यमानस्य सौगतस्य स्वाभ्युपगम-विरोधः प्रसज्येत । सौगते हि समये ' पृथिवी मगवः किं संनिश्रया ' इत्यस्मिन्प्रतिवचनप्रवाहे पृथिव्यादीनामन्ते ' वायुः किं संनिश्रयः ' इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनं भवति - ' वायुराकाशसंनिश्रयः ’ इति । तदाकाशस्यावस्तुत्वे न समञ्जसं स्यात् । तस्मादप्ययुक्तमाकाशस्यावस्तुत्वम् । अपि च निरोधद्वयमाकाशं च त्रयमप्येतन्निरुपाख्यमवस्तु नित्यं चेति विप्रतिषिद्धम् । न ह्यवस्तुनो नित्यत्वमनित्यत्वं वा संभवति, वस्त्वाश्रयत्वाद्धर्मधर्मिव्यवहारस्य । धर्मधर्मिभावे हि घटादि वस्तुत्वमेव स्यान्न निरुपाख्यत्वम् ॥ २४ ॥
अनुस्मृतेश्व || २५ || पदच्छेद - अनुस्मृतेः च । सूत्रार्थ - उपलब्धिके अनन्तर उत्पन्न हुआ स्मरण ही अनुस्मृति है, उससे भी प्रतीत होता हैं कि अनुभवकर्ता आत्मा क्षणिक नहीं है । अपि च वैनाशिकः सर्वस्य वस्तुनः क्षणिकतामभ्युपयन्नपलब्धुरपि क्षणिकतामभ्यु-पेयात् । न च सा संभवति, अनुस्मृतेः । अनुभवमुपलब्धिमनूत्पद्यमानं स्मरणमेवानुस्मृतिः । सा चोपलब्ध्येककर्तृका सती संभवति, पुरुषान्तरोपलब्धिविषये पुरुषान्तरस्य स्मृत्यदर्श अभावमात्रको आकाश माननेवाले बौद्धको अयने स्वीकार से विरोध प्रसक्त होगा, क्योंकि बौद्ध दर्शनमें ' पृथिवी भगवः ० ' ( हे भगवन्! पृथिवी किसमें आश्रित है ) इस प्रश्नोत्तरके प्रदाह में पृथिवी आदिके अन्त में ' वायुः किं ० ' ( वायु किसमें आश्रित है ) इस प्रश्नका ' वायुराकाश ० ' ( वायु आकाशमें आश्रित है ) यह उत्तर है । आकाशको अवस्तु माननेपर वह संगत नहीं होगा; इससे मी आकाशका अवस्तुत्व अयुक्त है । और दोनों निरोध और आकाश ये तीनों निरुपाख्य, अवस्तु और नित्य हैं यह परस्पर विरुद्ध है, क्योंकि अवस्तु नित्य अथवा अनित्य नहीं हो सकती, कारण कि धर्मधर्मिव्यवहार वस्तु आश्रित है, धर्माव होनेपर घट आदिके समान वस्तुत्व ही होगा तुच्छत्व नहीं ॥ २४ ॥
और इसके अतिरिक्त वैनाशिक सब वस्तुको क्षणिकता स्वीकार करते हुए उपलब्धाकी भी क्षणिकता स्वीकार करे, वह नहीं हो सकेसा, क्योंकि अनुस्मृति है । अनुभव - उपलब्धिके अनन्तर उत्पन्न हुआ स्मरण ही अनुस्मृति है । उसका और उपलब्धिका एक कर्ता हो तभी वह हो सकती है, क्योंकि एक पुरुष के अनुभवके विषयमें मन्य पुरुषकी स्मृति नहीं देखी जाती । ' मैंने यह देखा, मैं यह सत्यानन्दी - दीपिका ( शब्द शब्दत्व जाति विशिष्ट होनेसे सामान्य, विशेष और समवायसे भिन्न है ) ' शब्दो गुणः स्पर्श-रहितवाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात् रूपादिवत् ' ( शब्द गुण है, क्योंकि स्पर्शं रहित बाह्येन्द्रियसे ग्राह्य है, जैसे रूपादि ) इस अनुमानसे शब्द गुण सिद्ध होनेपर वह किस द्रव्यका गुण है, आगे सिद्ध करते हैं - ' शब्दः वस्तुनिष्ठः गुणत्वात् गन्धादिवत् ' ( शब्द गुण होनेसे वस्तुनिष्ठ है, जैसे गन्ध आदि ) शब्द बाह्येन्द्रिय ग्राह्य होनेसे आत्मा और मनका गुण नहीं हो सकता । पृथिवी, जल, तेज, वायु और दिशा आदि श्रोत्र मात्र ग्राह्य शब्द गुणके आश्रय नहीं हो सकते । अवशिष्ट आकाश ही शब्दका आश्रय सिद्ध होता है । गुण वस्तुमें रहता है अवस्तु में नहीं, अतः आकाश वस्तु है । किश्व जैसे एक घटके विद्यमान होनेपर घट सामान्यका अभाव नहीं होता, वैसे ही एक पक्षीके विद्यमान होनेपर मूर्तं द्रव्य सामान्याभावात्मक आकाश नहीं है, इससे अन्य पक्षीका सञ्चार नहीं होगा । यदि उसकी सिद्धि के लिए किसी देश विशेषावच्छेदेन आवरणाभाव मानें तो अमावावच्छेदक देश ही तो आकारों है, क्योंकि तुच्छ देश-विशेष आदिसे विशिष्ट नहीं होता, इससे आकाश भावात्मक पदार्थ है ॥२४ ॥
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४४२ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० नात् । कथं ह्यहमदोऽद्राक्षमिदं पश्यामीति च पूर्वोत्तरदर्शिन्येकस्मिन्नसति प्रत्ययः स्यात्? अपि च दर्शनस्मरणयोः कर्तर्ये कस्मिन्प्रत्यक्षः प्रत्यभिज्ञाप्रत्ययः सर्वस्य लोकस्य प्रसिद्धोऽह-मदोऽद्राक्षमिदं पश्यामीति । यदि हि तयोर्भिन्नः कर्ता स्यात्ततोऽहं स्मराम्यद्राक्षीदन्य इति प्रतीयात्, नत्वेवं प्रत्येति कश्चित् । यत्रैवं प्रत्ययस्तत्र दर्शनस्मरणयोभिन्नमेव कर्तारं सर्व-लोकोऽवगच्छति - स्मराम्यहमसावदोऽद्राक्षीदिति । इह त्वहमदोऽद्राक्षमिति दर्शनस्मर-णयोर्वैनाशिको ऽप्यात्मानमेवैकं कर्तारमवगच्छति । न नाहमित्यात्मनो दर्शनं निर्वृत्तं निह्नते - यथाग्निरनुष्णोऽप्रकाश इति वा । तत्रैवं सत्येकस्य दर्शनस्मरणलक्षणक्षणद्रय-संबन्धे क्षणिकत्वाभ्युपगमहा निरपरिहार्या वैनाशिकस्य स्यात् । * तथाऽनन्तरामनन्त-रामात्मन एव ं प्रतिपत्ति प्रत्यभिजानन्ने ककर्तृकामोत्तमादुच्छ्वासादतीताश्च प्रतिपत्तीरा जन्मन आत्मैककर्तृकाः प्रतिसंदधानः कथं क्षणभङ्गवादी वैनाशिको नापत्रपेत? स यदि ब्रूयात्सादृश्यादेतत्संपत्स्यत इति । तं प्रति ब्रूयात् तेनेदं सदृशमिति द्वयायत्तत्वात्सादृश्यस्य, क्षणभङ्गवादिनः सदृशयोर्द्वयोर्वस्तुनोर्ग्रहीतुरेकस्याभावात्, सादृश्यनिमित्तं प्रतिसंधान-मिति मिथ्याप्रलाप एव स्यात् । स्याच्चेत्पूर्वोत्तरयोः क्षणयोः सादृश्यस्य ग्रहीतैकः, तथा-देखता हूँ ' यह प्रत्यय पूर्वोत्तर एक द्रष्टाके न होनेपर कैसे होगा? किन्तु अनुभव और स्मरणका एक कर्ता होनेपर ' मैंने यह देखा था, मैं यह देखता हूँ ' ऐसा प्रत्यक्ष प्रत्यभिज्ञाप्रत्यय सर्वलोक में प्रसिद्ध है । यदि उन दोनोंके भिन्न कर्ता हों, तो उससे ' मैं स्मरण करता हूँ, अन्यने देखा था ' ऐसी प्रतीति होगी । परन्तु किसीको भी ऐसी प्रतीति नहीं होती । जहाँ ऐसी प्रतीति होती है वहां ज्ञान और स्मरणके भिन्न कर्ताओंको सब लोग जानते हैं कि ' मैं स्मरण करता हूँ, उसने यह देखा । ' परन्तु यहाँ तो ' मैंने यह देखा ' इस दर्शन और स्मरणका एक ही कर्तारूपसे आत्माको वैनाशिक भी स्वीकार करते हैं । आत्माका जो कर्तारूपसे ज्ञान हुआ है उसका ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा कहकर अपलाप नहीं कर सकता, जैसे afrat ' अनुष्ण है अथवा अप्रकाश है ' ऐसा कहकर अपलाप नहीं कर सकता । वहाँ ऐसा होनेपर एकका दर्शन और स्मरणरूप दो क्षणोंके साथ सम्बन्ध होने से वैनाशिक को क्षणिकत्व सिद्धान्तकी हानि तो अपरिहार्यं ही होगी । उसी प्रकार वर्तमान दशासे लेकर अन्तिम उच्छ्वासपर्यन्त - मरण-पर्यन्त एकके पीछे एक अपनी ही प्रतीतिको जिसका आत्मा हो कर्ता है ऐसा जानता हुआ और जन्मसे लेकर वर्तमान क्षण पर्यन्त अभी तक हुई प्रतिपत्तियाँ आत्मकर्तृक प्रतिसन्धान करता हुआ क्षणमङ्ग-वादी वैनाशिक लज्जित क्यों नहीं होता? यदि वह ऐसा कहे सादृश्यसे यह प्रतिसंधान होता है, तो उसके प्रति कहना चाहिए ' तेनेदं सदृशम् ' ( यह उस जैसा है ) ऐसा सादृश्य दोके अधीन होत है, इससे दो सदृश वस्तुओंका ग्रहोंता क्षण मंगवादीके मतमें एकके न होनेसे सादृश्य निमित्तक प्रति-है, यह मिया प्रलाप ही होगा । यदि पूर्व और उत्तर क्षणके सादृश्यका एक ग्रहीता है, तो सत्यानन्दी दीपिका * बाह्यार्थवादी बौद्धोंके सिद्धान्तका खण्डन करते समय प्रसंगवश क्षणिक विज्ञानवादीका मत लिया गया है । उनके मतमें बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं है, केवल आन्तर क्षणिक विज्ञान ही है । विज्ञान प्रथम क्षणमें उत्पन्न होकर द्वितीय क्षणमें नष्ट होता हुआ अन्य विज्ञानको उत्पन्न कर स्वयं नष्ट हो जाता है । उनके मतमें जैसे दीप शिखा एक नहीं होती तो भी सादृश्यसे ' यह वही शिखा है ' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है, वैसे आत्माके विषय में सादृश्य दोषसे ' मैं वही हूँ ' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । सिद्धान्ती - ' तेनेदं सदृशम् ' यह सादृश्य अनुयोगी और प्रतियोगी दो पदार्थोंके अधीन होता है । जैसे ' चन्द्रवन्मुखम् ' जिसका सादृश्य वह प्रतियोगी और जिसमें सादृश्य वह अनुयोगी होता है । ' तेनेदं सदृशम् ' इसमें एक विज्ञानाकार होनेसे तीन पर्दोंका प्रयोग न होगा और उनसे सम्बद्ध तीन पदार्थोंका मान मी नहीं होगा, किन्तु यह लोक विरुद्ध है । पू ० - यद्यपि ' तेनेदं सदृशम् ' इसमें तीन पदार्थं प्रतीत होते
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अधि ० ४ सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४४३ श्यस्य ग्रहीतैकः, तथासत्येकस्य क्षणद्वयावस्थानात् क्षणिकत्वप्रतिज्ञा पीड्येत । तेनेदं सदृशमिति प्रत्ययान्तरमेवेदं न पूर्वोत्तरक्षणद्वयग्रहणनिमित्तमिति चेत् - न, तेनेदमिति भिन्न-पदार्थोपादानात् । प्रत्ययान्तरमेव चेत्सादृश्यविषयं स्यात्तेनेदं सदृशमिति वाक्यप्रयोगोऽ-नर्थकः स्यात् । सादृश्यमित्येव प्रयोगः प्राप्नुयात् । यदा हि लोकप्रसिद्धः पदार्थः परीक्ष-कैर्न परिगृह्यते, तदा स्वपक्षसिद्धिः परपक्षदोषो वोभयमप्युच्यमानं परीक्षकाणामात्मनश्च यथार्थत्वेन न बुद्धिसंतानमारोहति । एवमेवैषोऽर्थ इति निश्चितं यत्तदेव वक्तव्यम् । ततोऽ-न्यदुच्यमानं बहुप्रलापित्वमात्मनः केवलं प्रख्यापयेत् । न चायं सादृश्यात्संव्यवहारो युक्तः, तद्भावावगमात्तत्सदृशभावानवगमाच्च । भवेदपि कदाचिद्वाह्यवस्तुनि विप्रलम्भसंभवात्त-देवेदं स्यात्तत्सदृशं वेति संदेहः । उपलब्धरि तु संदेहोऽपि न कदाचिद्भवति - स एवाहं स्यां तत्सदृशो वेति य एवाहं पूर्वेद्युरद्राक्षं स एवाहमद्य स्मरामोति निश्चिततद्भावोप-लम्भात् । तस्मादप्यनुपपन्नो वैनाशिकसमयः ॥ २५ ॥
नासतोऽदृष्टत्वात् ॥२६ ॥
पदच्छेद –न, असतः, अदृष्टत्वात् । सूत्रार्थ - ( असत: ) अभावसे कार्यकी उत्पत्ति ( न ) नही हो सकती, ( अदृष्टत्वात् ) क्योंकि असत् नरशृङ्ग आदिसे कार्येत्पत्ति नहीं देखी जाती । इतश्चानुपपन्नो वैनाशिकसमयः, यतः स्थिर मनुयायिकारणमनभ्युपगच्छतामभावा-ऐसा होनेपर एक दो क्षण पर्यन्त अवस्थित होने से क्षणिकत्व प्रतिज्ञा बाधित होगी । यदि कहो कि ' तेनेदं सदृशम् ' यह भिन्न प्रत्यय है पूर्व और उत्तर दो क्षण ग्रहण निमित्तक नहीं है, तो ठीक नहीं है, क्योंकि ' तेन इदम् ' इस प्रकार भिन्न पदार्थोंका ग्रहण होता है । यदि यह सादृश्य विषयक अन्य प्रत्यय ही है, तो तेनेदं सदृशम् ' यह वाक्य प्रयोग अनर्थक होगा । ' सादृश्यम् ' ( सादृश्य ) ऐसा ही प्रयोग प्राप्त होगा । जब तक लोक प्रसिद्ध पदार्थका परीक्षकोंके द्वारा परिग्रहण न हो तब तक स्वपक्षकी सिद्धि अथवा पर पक्षका दोष दोनों कहे हुए भी यथार्थरूपसे परीक्षकोंके और अपने बुद्धि सन्तानमें नहीं आयेंगे । यह पदार्थ ऐसा ही है, ऐसा जो निश्चित है उसीको कहना चाहिए । उससे भिन्न कहता हुआ केवल अपने में बहुप्रलापित्व प्रख्यापन करेगा । यह संव्यवहार सादृश्यसे होना युक्त नहीं है, क्योंकि ' वही यह ' ऐसा तद्भावका ज्ञान होता है और ' उसके सदृश यह उस प्रकार तत्सदृशभाव अवगत नहीं होता है । बाह्य वस्तुमें विप्रलम्भके संभव होने से ' वही यह है ' अथवा ' उसके सदृश है ' ऐसा सन्देह कदाचित् हो भी, परन्तु उपलब्धा - आत्मामें तो ' वही मैं हूं अथवा उसके सदृश हूँ ' ऐसा सन्देह कभी नहीं होता है, क्योंकि जिस मैंने पहले दिन देखा था वही मैं आज स्मरण करता हूँ ' इस प्रकार निश्चित तद्भावका उपलम्भ ( ज्ञान ) होता है । इससे भी वैनाशिक दर्शन अनुपपन्न है ॥ २५ ॥
और इससे मी वैनाशिक दर्शन अयुक्त है, क्योंकि स्थिर और अनुयायी ( कार्य ) अनुस्यूत कारणका सत्यानन्दी - दीपिका हैं, तो भी वे विज्ञानसे मिन्न नहीं हैं अर्थात् बाह्य नहीं हैं । सि [ 0 ० - तब तो ' तेनेदं सदृशम् ' ऐसा वाक्य प्रयोग न होकर केवल ' सादृश्य ' ऐसा प्रयोग प्राप्त होगा, परन्तु होता नहीं है । * ' तेनेदं सदृशम् ' इससे प्रतियोगी, अनुयोगी और सादृश्यके ग्रहीताका स्थायित्व दुर्वार है । यदि बाह्य पदार्थ कल्पित है, विज्ञानमात्र ही सत्य है और आन्तर है । तो किसीकी भी बाह्य प्रतीति वा प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए । इससे पदार्थ बाहर है और वह अक्षणिक है । इसलिए असंदिग्ध और अविपर्यस्त प्रत्यभिज्ञाके होनेसे वैनाशिक दर्शन युक्त है ॥ २५ ॥
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II ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ द्भावोत्पत्तिरित्येतदापद्यते । दर्शयन्ति चाभावाद्भावोत्पत्तिम्- ' नानुपमृद्य प्रादुर्भावात् ' इति । विनष्टाद्धि किल बीजादङ्कुर उत्पद्यते, तथा विनष्टात्क्षीरादधि, मृत्पिण्डाच्च घटः । कूटस्थाच्चेत्कारणात्कार्यमुत्पद्येताविशेषात्सर्वं सर्वत उत्पद्येत । तस्मादभावग्रस्तेभ्यो बीजादिभ्योऽङ्कुरादीनामुत्पद्यमानत्वादभावाद्भावोत्पत्तिरिति मन्यन्ते । तत्रेदमुच्यते-' नासतोऽदृष्टत्वात् ' इति । नाभावाद्भाव उत्पद्यते, यद्यभावाद्भाव उत्पद्येताभावत्वाविशे-षात्कारणविशेषाभ्युपगमोऽनर्थकः स्यात् । नहि बीजादीनामुपमृदितानां योऽभावस्त-स्याभावस्य शशविषाणादीनां च निःस्वभावत्वाविशेषादभावत्वे कश्चिद्विशेषोऽस्ति, येन बीजादेवाङ्कुरो जायते क्षीरादेव दधीत्येवंजातीयकः कारणविशेषाभ्युपगमोऽर्थवान्स्यात् । निर्विशेषस्य त्वभावस्य कारणत्वाभ्युपगमे शशविषाणादिभ्यो ऽप्यङ्कुरादयो जायेरन् । न चैवं दृश्यते । यदि पुनरभावस्यापि विशेषोऽभ्युपगम्येतोत्पलादीनामिव नोलत्वादिस्ततो विशेषवत्त्वादेवाभावस्य भावत्वमुत्पलादिवत्प्रसज्येत । नाप्यभावः कस्यचिदुत्पत्तिहेतुः स्यात्, अभावत्वादेव, शशविषाणादिवत् । अभावाच्च भावोत्पत्तावभावान्वितमेव सर्वं कार्य स्यात् नचैवं दृश्यते, सर्वस्य च वस्तुनः स्वेन स्वेन रूपेण भावात्मनैवोपलभ्यमान-त्वात् । नच मृदन्विताः शरावादयो भावास्तन्वादिविकाराः केनचिदभ्युपगम्यन्ते । मृद्वि-कारानेव तु मृदन्वितान्भावांल्लोकः प्रत्येति । यत्तक्तम्- स्वरूपोपममन्तरेण कस्यचित्कू-टस्थस्य वस्तुनः कारणत्वानुपपत्तेरभावाद्भावोत्पत्तिर्भवितुमर्हतीति — तद्दुरुक्तम्, स्थिरस्वभावानामेव सुवर्णादीनां प्रत्यभिज्ञायमानानां रुचकादिकार्यकारणभावदर्श नात् । येष्वपि बीजादिषु स्वरूपोमद लक्ष्यते तेष्वपि नाऽसावुपमृद्यमाना पूर्वावस्थो-स्वीकार न करनेवालोंके मतमें अमावसे भावको उत्पत्ति होगी, ऐसा प्रसङ्ग होगा । और नानुपमृद्य ० ' ( कारण के नाश हुए विना कार्यका प्रादुर्भाव नहीं होता, इसलिए अमावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है ) इस प्रकार वे अभावसे भावकी उत्पत्ति दिखलाते हैं । निश्चय विनष्ट बीजसे अङ्कुर अ, विनष्ट दूधसे दधि और विनष्ट मृत्पिण्ड से घट उत्पन्न होते हैं । यदि कूटस्थ कारणसे कार्यं उत्पन्न हो, तो कुटस्थत्व समान होनेसे सब सबसे उत्पन्न होगा । इसलिए अभाव ग्रस्त बीज आदिसे अङ्कर आदि उत्पद्यमान होनेसे अमावसे भावकी उत्पत्ति होती है, ऐसा वे मानते हैं । उसपर यह कहते हैं - ' नासतोऽदृष्ट-त्वात् ' अभावसे भाव उत्पन्न नहीं होता, यदि अमावसे भाव उत्पन्न हो, तो अभावत्वके ' सर्वत्र समान होनेसे कारण विशेषका स्वीकार निष्फल हो जायगा । विनष्ट हुए बीज आदिका जो अभाव हैं उस अभावमें और शशविषाण आदिके निःस्वभावत्व - स्वरूपहितत्व में समानता होनेसे अमावत्वसे कुछ विशेष नहीं है, जिससे कि बीजसे ही अङ्कुर उत्पन्न होता है और दूधसे दधि, इस प्रकारके कारण विशेषका स्वीकार प्रयोजनवाला होना चाहिए । और निर्विशेष- विशेषरहित अभावको कारणरूप स्वीकृत करनेसे शशविषाण आदिसे भी अङ्कुर आदि उत्पन्न होंगे, परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता । जैसे नीलत्व आदि कमल आदिके विशेष हैं, वैसे यदि अभाबका भी विशेष स्वीकार किया जाय, तो विशेषवत्त्वके होनेसे कमल आदिके समान अभावको भी भावत्व प्रसक्त होगा । अभाव मी किसकी उत्पत्तिका हेतु नहीं होता, क्योंकि वह शशविषाण आदिके समान अभाव है । यदि अमावसे भावकी उत्पत्ति होती तो सब कार्य अभावान्वित ही होते, परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता, क्योंकि सब पदार्थ अपने अपने स्वरूप भावरूपसे ही उपलब्ध होते हैं । मृत्तिका अन्वित शराव आदि पदार्थोंको तन्तु आदिके विकाररूपसे कोई भी स्वीकृत नहीं करता । लोग मृत्तिकाके विकारोंको मृत्तिकासे अन्वित हुए भावरूपसे ग्रहण करते हैं । जो यह कहा गया है कि स्वरूपके नाश हुए विना किसी कूटस्थ वस्तुका कारणत्व अनुपपन्न होनेसे अमावसे अभावकी उत्पत्ति होना युक्त है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यभिज्ञाके विषयभूत स्थिर स्वभाववाले सुवर्ण आदिका रुचिक आदिके साथ कार्यकारण भाव देखने में आता है ।
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अधि ० ५ सू ० २७-२८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४४५ त्तरावस्थायाः कारणमभ्युपगम्यते, अनुपमृद्यमानानामेवानुयायिनां बीजाद्यवयवानामङ्कु-रादिकारणभावाभ्युपगमात् । तस्मादसद्भयः शशविषाणादिभ्यः सदुत्पत्त्यदर्शना-त्सद्भयश्च सुवर्णादिभ्यः सदुत्पत्तिदर्शनादनुपपन्नोऽयमभावाद्भावोत्पत्त्यभ्युपगमः । अपि च चतुर्भिश्चित्तचैत्ता उत्पद्यन्ते, परमाणुभ्यश्च भूतभौतिकलक्षणः समुदाय उत्पद्यत इत्यभ्युपगम्य पुनरभावाद्भावोत्पत्ति कल्पयद्भिरभ्युपगतमपह्न वानैवैनाशिकैः सर्वो लोक आकुलीक्रियते ॥२६ ॥
उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २७ ॥
पदच्छेद - उदासीनानाम्, अपि, च, एवम्, सिद्धिः । सूत्रार्थ - ( च ) और ( एवम् ) अभावसे भावोत्पत्ति मानने में ( उदासीनानामपि ) तत् तत् कार्य सिद्धिमें प्रवृत्त न हुए लोगों को भी ( सिद्धि: ) अपने अपने अभीष्ट कार्यं सिद्ध होंगे, इससे मी बौद्धमत भ्रान्तिसूलक है । यदि चाभावाद्भावोत्पत्तिरभ्युपगम्येत, एवं सत्युदासीनानामनीहमानानामपि जनानामभिमतसिद्धिः स्यात् अभावस्य सुलभत्वात् । कृषीवलस्य क्षेत्रकर्मण्यप्रयतमान-स्यापि सस्यनिष्पत्तिः स्यात् । कुलालस्य च मृत्संस्क्रियायामप्रयतमानस्याप्यमत्रोत्पत्तिः । तन्तुवायस्यापि तन्तूनतन्वानस्यापि तन्वानस्येव वस्त्रलाभः । स्वर्गापवर्गयोश्च न कश्चि-त्कथंचित्समीहेत । न चैतद्युज्यतेऽभ्युपगम्यते वा केनचित् । तस्मादप्यनुपपन्नोऽयम-भावाद्भावोत्पत्त्यभ्युपगमः ॥२७ ॥
( ५ अभावाधिकरणम् । सू ० २८-३२ ) नामाव उपलब्धेः ॥ २८ ॥
पदच्छेद – न, अभाव:, उपलब्धेः । सूत्रार्थ - ( अभाव: ) विज्ञानसे अतिरिक्त पदार्थोंका अभाव ( न ) नहीं हो सकता, ( उप-लब्धेः ) क्योंकि विज्ञानसे अतिरिक्त पदार्थों की उपलब्धि होती है । * एवं बाह्यार्थवादमाश्रित्य समुदायाप्राप्त्यादिषु दूषणेषूद्भावितेषु विज्ञानवादी जिन बीज आदिमें भी स्वरूपका नाश देखनेमें आता है उनमें भी नष्ट होती हुई यह पूर्वावस्था उत्तरा -वस्थाकी कारण नहीं मानी जाती, विनष्ट न हुए अनुयायी- अनुस्यूत बीज आदिके अवयवोंको ही अङ्कर आदिके प्रति कारणभाव स्वीकार किया जाता है, इससे असत् शशविषाण आदिसे सत् की उत्पत्ति नहीं देखी जातो और सत् सुवर्ण आदिसे सत्की उत्पत्ति देखने में आती है, अतः ' अमावसे भावकी उत्पत्ति ' यह अभ्युपगम अनुपपन्न है । किश्व अधिपति आदि चार कारणोंसे चित्त ( विज्ञान ) और चैत्त ( सुख आदि ) उत्पन्न होते हैं और परमाणुओंसे भूत भौतिक समुदाय उत्पन्न होता है, ऐसा स्वीकारकर पुनः अभावसे भावकी उत्पत्तिकी कल्पना करनेवाले और पूर्वस्वीकृतका निषेध करनेवाले बौद्धोंसे सब लोग व्याकुल किये जाते हैं ॥ २६ ॥
और यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति स्वीकार करें तो ऐसा माननेपर चेष्टा रहित उदासीन पुरुषों को भी अभिमत सिद्धि हो जायगी, क्योंकि अभाव सर्वत्र सुलभ है । खेत के कार्य में प्रयत्न न करने वाले किसानको भी अन्नकी प्राप्ति हो जायगी । मृत्तिकाकी संस्कारक्रियामें प्रयत्न न करनेवाले कुलालके वर्तन उत्पन्न हो जायँगे, तन्तुओंको ताना भरनी न करनेवाले जुल्लाहेको भी बुननेवालेके समान वस्त्र लाभ हो जायगा, स्वर्ग और मोक्षके लिए कोई भी किसी प्रकारका प्रयत्न नहीं करेगा । यह युक्त नहीं है और कोई स्वीकार भी नहीं करता । इसलिए भी अभावसे भावकी उत्पत्तिका यह स्वीकार अनुपपन्न है | २७ ॥ इसप्रकार बाह्यार्थवादका आश्रयकर समुदायकी अप्राप्ति आदि दूषणोंके उद्भावित किए जाने-सत्यानन्दी - दीपिका * विज्ञानवादी योगाचारके मतमें क्षणिक विज्ञानके भिन्न बाहर कोई पदार्थ नहीं है, घटः पद
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ बौद्ध इदानीं प्रत्यवतिष्ठते — केषांचित्किल विनेयानां बाह्ये वस्तुन्यभिनिवेशमा लक्ष्य तद-नुरोधेन बाह्यार्थवादप्रक्रियेयं विरचिता । नासौ सुगताभिप्रायः । तस्य तु विज्ञानैकस्कन्ध-वाद एवाभिप्रेतः । तस्मिंश्च विज्ञानवादे बुद्धया रूढेन रूपेणान्तस्थ एव प्रमाणप्रमेयफल-व्यवहारः सर्व उपपद्यते, सत्यपि बाह्येऽर्थे बुद्धयारोहमन्तरेण प्रमाणादिव्यवहारा-नवतारात् । कथं पुनरवगम्यतेऽन्तस्थ एवायं सर्वव्यवहारो न विज्ञानव्यतिरिक्तो बाह्योऽर्थोऽस्तीति? तदसंभवादित्याह -- स हि बाह्योऽर्थोऽभ्युपगम्यमानः परमाणवो वा स्युस्तत्समूहा वा स्तम्भादयः स्युः । तत्र न तावत्परमाणवः स्तम्भादिप्रत्ययपरिच्छेद्या भवितुमर्हन्ति, परमाण्वाभासज्ञानानुपपत्तेः । नापि तत्समूहाः स्तम्भादयः, तेषां परमाणु-भ्योऽन्यत्वानन्यत्वाभ्यां निरूपयितुमशक्यत्वात् । एवं जात्यादीनपि प्रत्याचक्षीत ॥ * अपि चानुभावमात्रेण साधारणात्मनो ज्ञानस्य जायमानस्य योऽयं प्रतिविषयं पक्षपातः स्तम्भज्ञानं कुडयज्ञानं घटज्ञानं परज्ञानमिति, नासौ ज्ञानगतविशेष-पर अब विज्ञानवादी बौद्ध विवादके लिए उपस्थित होता है - किन्हीं ( मन्दबुद्धि ) शिष्योंका बाह्य पदार्थोंमें आग्रह देखकर उनके अनुरोधसे इस बाह्यार्थवाद प्रक्रियाकी रचना की । वस्तुतः यह सुगतका अभिप्राय नहीं है I । उसे तो केवल एक विज्ञानस्कन्धवाद ही अभिप्रेत है । उस विज्ञानवादमें बुद्धिमें आरूढरूपसे अन्तःस्थ होते हुए ही सब प्रमाण, प्रमेय और फल व्यवहार उपपन्न होते हैं, क्योंकि बाह्यार्थंके होनेपर भी बुद्धिमें आरूढ हुए विना प्रमाण आदि व्यवहार नहीं हो सकते । परन्तु कैसे अवगत हो कि यह सर्वव्यवहार अन्तःस्थ ही है विज्ञानसे भिन्न बाह्यार्थं नहीं है? उसका बाहर संभव न होनेसे ऐसा कहते हैं – स्वीकार किया हुआ वह बाह्यार्थ परमाणु हो है अथवा उनका समूह स्तम्भ आदि हैं? उनमें परमाणु तो स्तम्भ आदि ज्ञानके विषय नहीं हो सकते, क्योंकि परमाणुका प्रतीति-रूप ज्ञान नहीं हो सकता, और न स्तम्भ आदि उनके समूह हैं, क्योंकि उनका परमाणुओंसे अन्यरूपसे वा अनन्यरूपसे निरूपण नहीं किया जा सकता । इसोप्रकार जाति आदिका मी प्रत्यख्यान करना चाहिए । और भी, अनुभवमात्रसे जायमान साधारणरूप ज्ञानका स्तम्मज्ञान, कुड्यज्ञान, घटज्ञान, सत्यानन्दी - दीपिका आदि विज्ञानके आकार विशेष हैं और आन्तर हैं बारह भ्रमसे प्रतीत होते हैं । बुद्ध को केवल विज्ञान-स्कन्धवाद ही अभिप्रेत था । इस विषय में धर्मकीर्तिने भी कहा है-- ' देशना लोकनाथनां सत्त्वाशय-वशानुगाः ' ( सुगतके उपदेश शिष्यों की बुद्धिके अनुसार हैं ) यद्यपि बाह्यार्थके न होनेसे प्रमाण, प्रेमय. आदि व्यवहार अनुपपन्न हैं, तो भी विज्ञान हो कल्पित घट, पट आदि आकाररूपसे प्रेमय है, वस्तु के अवमासरूपसे प्रमाणफल - प्रमिति, शक्तिस्वरूपसे प्रमाण और शक्तिके आश्रयरूपसे प्रमाता है, इसप्रकार भेदकी कल्पना से व्यवहार हो जायगा । बाह्यार्थके अभाव में यह अनुमान है - ' ज्ञेयं ज्ञानातिरेकेणासत् तदतिरेकेणाऽसम्भवात् नरशृंगवत् ' ( ज्ञेय ज्ञानसे भिन्न नहीं है, क्योंकि उससे भिन्न उसका असम्भव है जैसे नरश्शृङ्ग ) विज्ञानवादी बाह्यार्थवादी बौद्ध मतका खण्डन करते हुए बाह्यार्थ के असम्भवको विवरण करते हैं- यदि बाह्याथं परमाणुरूप हो तो उनके अतीन्द्रिय होनेसे ' एक स्थूल स्तम्भ है ' ऐसा ज्ञान नहीं होगा और परमाणुओंका समूह स्तम्भ तो बाहर असत् है उसकी प्रतीति कैसे होगी? परन्तु बाह्यार्थ परमाणु अथवा अवयवी न होनेपर भी जाति आदि होंगे? बाह्यार्थ जाति, गुण और कर्म भी नहीं है, क्योंकि ये धर्मसे अभिन्न हैं अथवा अत्यन्त भिन्न? यदि अभिन्न हैं तो धर्मी के समान धर्मधर्म-भाव नहीं होगा, उसीप्रकार अत्यन्त भिन्न होनेपर अन्य धर्मीके समान घर्मधर्मिभाव नहीं होगा । इनमें भेदाभेद मानना मी युक्त नहीं है, क्योंकि परस्पर विरुद्ध है । इसलिए जाति आदि बाह्यार्थ नहीं है । * ' सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः । भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानैर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ '