श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 481–490
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 481–490
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अधि ० ५ सू ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४४७ मन्तरेणोपपद्यत इत्यवश्यं विषयसारूप्यं ज्ञानस्याङ्गी कर्तव्यम् । अङ्गीकृते च तस्मि -विषयाकारस्य ज्ञानेनैवावरुद्धत्वादपार्थिका बाह्यार्थसद्भावकल्पना । अपि च सहो-पलम्भनियमादभेदो विषय विज्ञानयोरापतति । न हानयोरेकस्यानुपलम्भेऽन्यस्योपलम्भो-ऽस्ति, न चैतत्स्वभावविवेके युक्तंम्, प्रतिबन्धकारणाभावात्, तस्मादप्यर्थाभावः । स्वप्ना-दिवच्चेदं द्रष्टव्यम् । यथा हि स्वप्नमायामरीच्युदकगन्धर्वनगरादिप्रत्यया विनैव बाह्येनार्थेन ग्राह्यग्राहकाकारा भवन्ति, एवं जागरितगोचरा अपि स्तम्भादिप्रत्यया भवितुमर्हन्तीत्यव-गम्यते, प्रत्ययत्वाविशेषात् । कयं पुनरसति बाह्यार्थे प्रत्ययवैचित्र्यमुपपद्यते? वासना-वैचित्र्यादित्याह, अनादौ हि संसारे बोजाङ्क ुरवद्विज्ञानानां वासनानां चान्योन्यनिमित्त-नैमित्तिकभावेन वैचित्र्यं न विप्रतिषिध्यते । अपि चान्वयव्यतिरेकाभ्यां वासनानिमित्त-मेव ज्ञानवैचित्र्यमित्यवगम्यते, स्वप्नादिष्वन्तरेणाप्यर्थं वासनानिमित्तस्य ज्ञानवैचित्र्य-स्योभाभ्यामप्यावाभ्यामभ्युपगम्यमानत्वात्, अन्तरेण तु वासनामर्थनिमित्तस्य ज्ञानवैचि-त्र्यस्य मयानभ्युपगम्यमानत्वात्, तस्मादप्यभावो बाह्यार्थस्येति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - ' नाभाव उपलब्धेः ' इति । न खल्वभावो बाह्यस्यार्थस्याध्यवसातु ं शक्यते । कस्मात्? उपलब्धेः । उपलभ्यते हि प्रतिप्रत्ययं बाह्योऽर्थः स्तम्भः कुड्यं घटः पट इति । न चोपलभ्यमानस्यै-वाभावो भवितुमर्हति । यथा हि कश्चिद्भुञ्जानो भुजिसाध्यायां तृप्तौ स्वयमनुभूयमानाया-पटज्ञान यह जो प्रत्येक विषयमें पक्षपात है, वह ज्ञान गत विशेषके विना नहीं हो सकता, इससे ज्ञानमें विषयका सारूप्य ( सादृश्य ) अवश्य अंगीकार करना चाहिए । ज्ञानमें विषयकें सारूप्यका अंगीकार करनेपर विषयाकारको ज्ञानसे अवरुद्ध होनेसे बाह्यार्थके सद्भावकी कल्पना व्यर्थ है । और भी, सहो-पलम्भके नियमसे विषय और विज्ञानका अभेद प्राप्त होता है, क्योंकि उनमें एकके उपलम्भ न होनेपर अन्यका उपलम्भ नहीं होता । और यह स्वभाव भेदमें युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबन्धका कोई कारण नहीं है, इससे भी अर्थका अभाव है, और यह स्वप्न आदिके. समान समझना चाहिए । जैसे स्वप्न, माया, मरीच्युदक, गन्धर्वनगर आदि ज्ञान बाह्यार्थके विना ही ग्राह्य और ग्राहकरूपसे होते हैं, वैसे जाग्रत् विषयक स्तम्भ आदि ज्ञान भी हो सकते हैं, ऐसा अवगत होता है, क्योंकि दोनों ज्ञानोंमें ज्ञानत्व समान है । परन्तु बाह्य अर्थके न होनेपर ज्ञानोंमें वैचित्र्य कैसे उपपन्न होता है? वासनाओंके वैचित्र्यसे होता है, ऐसा कहते हैं । क्योंकि अनादि संसार में बीजाङ्करके समान विज्ञानों और वासनाओंके परस्पर निमित्तनैमित्तिक कार्यकारणभावसे वैचित्र्यका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता और अन्वय और व्यतिरेकसे यह भी अवगत होता कि ज्ञान वैचित्र्य वासनानिमित्तक ही है । कारण कि स्वप्न आदिमें अर्थके विना वासनानिमित्तक ज्ञानवैचित्र्यको हम दोनों स्वीकार करते हैं, किन्तु वासनाके विना अर्थ निमित्तक ज्ञानवैचित्र्यको मैं स्वीकार नहीं करता, इससे भी बाह्य अर्थका अभाव है । सिद्धान्ती — - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- ' नाभाव उपलब्धेः ' बाह्य अर्थके अभावका निश्चय नहीं किया जा सकता, किससे? इससे कि उसकी उपलब्धि होती है । प्रत्येक ज्ञानमें स्तम्भ, कुड्य, घट, पट इसप्रकार बाह्य अर्थं उपलब्ध होता है । उपलभ्यमान अर्थका अभाव नहीं हो सकता । जैसे कोई भोजन करता हुआ भोजन साध्य स्वयं अनुभूयमान तृप्तिके होनेपर ऐसा कहे कि मैं भोजन नहीं करता सत्यानन्दी - दीपिका ( सहोपलम्भके नियमसे नील और उसके ज्ञानका अभेद है । और भेद भ्रान्तिविज्ञानोंसे देखा जाता है जैसे एक चन्द्रमा में ) ' जाग्रद्विज्ञानं न बाह्यालम्बनं विज्ञानत्वात् स्वप्नादिविज्ञानवत् ' ( जाग्रत् विज्ञान बाह्य अर्थके आलम्बनसे नहीं होता, क्योंकि यह विज्ञान है जैसे स्वप्नादि विज्ञान ) इससे भी वैभाषिक और सौत्रान्तिक मतमें स्वीकृत बाह्य अर्थका अभाव है ।
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ मेवं ब्रूयात् - नाहं भुञ्जे न वा तृप्यामीति, तद्वदिन्द्रियसंनिकर्षेण स्वयमुपलभमान एव बाह्यमर्थ नाहमुपलभे न च सोऽस्तीति ब्रुवन्कथमुपादेयवचनः स्यात्? ननु नाहमेवं ब्रवीमि -न कंचिदर्थमुपलभ इति किंतूपलब्धिव्यतिरिक्तं नोपलभ इति ब्रवीमि । बाढमेवं ब्रवीषि, निरङ्कुशत्वात्ते तुण्डस्य । न तु युक्त्युपेतं ब्रवीषि, यत उपलब्धि-व्यतिरेकोऽपि बलादर्थस्याभ्युपगन्तव्यः, उपलब्धेरेव । नहि कश्चिदुपलब्धिमेव स्तम्भः कुड्यं चेत्युपलभते, उपलब्धिविषयत्वेनैव तु स्तम्भकुड्यादीन्सर्वे लौकिका उपलभन्ते । अतश्चैवमेव सर्वे लौकिका उपलभन्ते यत्प्रत्याचक्षाणा अपि बाह्यार्थमेव व्याचक्षते - यदन्तर्ज्ञेयरूपं तद्बहिर्वदवभासत इति । तेऽपि सर्वलोकप्रसिद्धां बहिरवभास-मानां संविदं प्रतिलभमानाः प्रत्याख्यातुकामाश्च बाह्यमर्थ बहिर्वदिति वत्कारं कुर्वन्ति । इतरथा हि कस्माद्बहिर्वदिति ब्रूयुः? नहि विष्णुमित्रो वन्ध्यापुत्रवदवभासत इति कश्चिदा-चक्षीत । तस्मांद्यथानुभवं तत्त्वमभ्युपगच्छद्भिर्वहिरेवावभासत इति युक्तमभ्युपगन्तुम्, नतु बहिर्वदवभासत इति । ननु बाह्यस्यार्थस्यासंभवाद्वहिर्वदवभासत इत्यध्यवसितम् । नायं साधुरध्यवसायः, यतः प्रमाणप्रवृत्त्यप्रवृत्तिपूर्वको संभवासंभवावधार्येते, न पुनः संभवासंभवपूर्विके प्रमाणप्रवृत्त्यप्रवृत्ती । यद्धि प्रत्यक्षादीनामन्यतमेनापि प्रमाणेनोपल-भ्यते तत्संभवति, यत्तु न केनचिदपि प्रमाणेनोपलभ्यते तन्न संभवति । इह तु यथास्वं अथवा मैं तृप्त नहीं हूँ, वैसे ही इन्द्रियके संनिकर्ष ( संयोग आदि सम्बन्ध ) से बाह्य अर्थको उपलब्ध होता हुआ मैं उपलब्ध नहीं करता और वह नहीं है, ऐसा कहता हुआ पुरुष उपादेयवचन कैसे होगा? पू ० - मैं ऐसा नहीं कहता कि किसी अर्थको मैं उपलब्ध नहीं करता किन्तु उपलब्धिसे भिन्न उपलब्ध नहीं करता, ऐसा कहता हूँ । ठीक तुम ऐसा कहते हो, क्योंकि तुम्हारा मुख निरङ्कुश है । परन्तु तुम युक्ति युक्त नहीं कहते हो, क्योंकि उपलब्धिसे अर्थका भेद भी बलात् स्वीकार करना होगा, कारण कि ऐसी ही अर्थकी उपलब्धि होती है । कोई भी उपलब्धिको ही स्तम्भ और कुड्यरूपसे उप-लब्ध नहीं करता, किन्तु स्तम्भ और कुड्य बादिको उपलब्धिके विषयरूपसे ही सब लोग उपलब्ध करते हैं और इससे भी उसीप्रकार ही सब लोग उपलब्ध करते हैं बाह्य अर्थका प्रत्यख्यान करते. हुए भी उसका ऐसा व्याख्यान करते हैं कि जो अन्तर्ज्ञेयरूप है वह ' बहिर्वत् ' अवभासित होता है । वे भी सर्वलोक प्रसिद्ध बहिरवभासमान संविद्को उपलब्ध करते हुए और बाह्य अर्थके प्रत्यख्यानकी कामना करते हुए ' बहिर्वत् ' इसप्रकार ' वत् ' का प्रयोग करते हैं, नहीं तो ' बहिर्वत् ' ऐसा क्यों कहते । विष्णुमित्र बन्ध्यापुत्रके समान प्रतीत होता है, ऐसा कोई नहीं कहता । इसलिए अनुभवके अनुसार तत्त्वको स्वीकार करनेवालोंसे पदार्थ बाहर ही भासता है, ऐसा स्वीकार करना युक्त है न कि ' बहिर्वत् ' अवभासित होता है । परन्तु बाह्य अर्थके असम्भव होनेसे ' बहिर्वत् ' अवभासित होता है ऐसा निश्चय किया गया है | यह निश्चय ठीक नहीं है, क्योंकि प्रमाणको प्रवृत्ति और अप्रवृत्ति पूर्वक सम्भव और असम्भवका निश्चय किया जाता है, न कि सम्भव और असम्भव पूर्वक प्रमाणकी प्रवृत्ति और अप्रवृत्तिका । प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंमेंसे एक प्रमाणसे भी जो उपलब्ध होता है उसका सम्भव है और जो किसी भी प्रमाणसे उपलब्ध नहीं होता उसका सम्भव भी नहीं होता । यहाँ तो स्वभावके अनुसार सब सत्यानन्दी - दीपिका * यदि बाह्य अर्थं अत्यन्त असत् हो तो उसकी नरविषणके समान प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे कदापि उपलब्धि नहीं होगी और दृष्टान्तके अभाव होनेसे ' बहिर्वत् ' शब्दका प्रयोग भी नहीं होगा । इसलिए ज्ञान और ज्ञेयके अबाधित भेदके अनुभव से ' बहिर्वत् ' ( बाहर के समान ) ऐसा प्रयोग न कर ' बहिरेव ' बाहर ही पदार्थ है ऐसा प्रयोग करना चाहिए । इस बातको भाष्यमें ' बहिरेव ' आदिसे सूचित किया गया ।
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अधि ० ५ सु ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४४ ९ सर्वरेव प्रमाणैर्बाह्योऽर्थ उपलभ्यमानः कथं व्यतिरेकाव्यतिरेकादिविकल्पैर्न संभवती त्युच्येतोपलब्धेरेव? * नच ज्ञानस्य विषयसारूप्याद्विषयनाशो भवति, असति विषये विषयसारूप्यानुपपत्तेः, बहिरुपलब्धेश्च विषयस्य । अत एव सहोपलम्भनियमो ऽपि प्रत्ययविषययोरुपायोपेयभावहेतुको नाभेदहेतुक इत्यभ्युपगन्तव्यम् । अपि च घटज्ञानं पटज्ञानमिति विशेषणयोरेव घटपटयोर्भेदो न विशेष्यस्य ज्ञानस्य, यथा शुक्लो गौः कृष्ण गौरिति शौक्ल्य कार्ण्ययोरेव भेदो न गोत्वस्य द्वाभ्यां च भेद एकस्य सिद्धो भवत्येकस्माच्च द्वयोः, तस्मादर्थज्ञानयोर्भेदः । तथा घटदर्शनं घटस्मरणमित्यत्रापि प्रतिपत्तव्यम्, अत्रापि हि विशेष्ययोरेव दर्शनस्मरणयोर्भेदोन विशेषणस्य घटस्य । यथा क्षीरगन्धः क्षीररस इति विशेष्ययोरेव गन्धरसयोर्भेदो न विशेषणस्य क्षीरस्य, तद्वत् । * अचि च द्वयोर्निज्ञानयोः पूर्वोत्तरकालयोः स्वसंवेदनेनैवोपक्षीणयोरितरेतरग्राह्यग्राह-कत्वानुपपत्तिः, ततश्च विज्ञानभेदप्रतिज्ञा क्षणिकत्वादिधर्मप्रतिज्ञा स्वलक्षणसामान्य-लक्षणवास्यवासकत्वाऽविद्योपल्पवसद सद्धर्मबन्धमोक्षादिप्रतिज्ञाश्च स्वशास्त्रगतास्ता प्रमाणोंसे उपलभ्यमान बाह्य अर्थका व्यतिरेक - भेद और अव्यतिरेक- अभेद आदि विकल्पोंसे असंभव है यह किस प्रकार कहा? क्योंकि बाह्यार्थकी उपलब्धि होती है । ज्ञानमें विषयके सारूप्य होनेसे विषयका नारा नहीं होता, किन्तु विषयके न होनेपर विषयका सारूप्य नहीं हो सकता, क्योंकि विषयकी बाहर उपलब्धि होती है । अतएव ज्ञान और विषयका सहोपलम्भ नियम भी उपायोपेयभाव हेतुक है - अभेद हेतुक नहीं है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए । और मी घटज्ञान, पटज्ञान इसमें घट पट विशेषणोंका ही भेद है विशेष्य ज्ञानका भेद नहीं है, जैसे शुक्ल गौ, कृष्ण गौ इसमें शुक्लत्व और कृष्णत्वका ही भेद है गोत्वमें भेद नहीं है, एकका का दोसे भेद सिद्ध होता है और एकसे दोका भेद सिद्ध होता है, इससे अर्थ और ज्ञानका भेद है । उसीप्रकार घट ज्ञान और घटः स्मरण इसमें भी समझना चाहिए । यहाँ पर भी विशेष्य ज्ञान और स्मरणका ही भेद है विशेषण घटका नहीं । जैसे क्षीरगन्ध, क्षीर-रस इसमें विशेष्य गन्ध और रसका ही भेद है, वैसे विशेषण क्षीरमें भेद नहीं है । और मी स्वसंवेदनसे ही उपक्षीण पूर्व और उत्तरकालीन दोनों विज्ञानोंका परस्पर ग्राह्य ग्राहकमाव नहीं हो सकता है, इससे विज्ञानभेदकी प्रतिज्ञा, क्षणिकत्व आदि धर्मकी प्रतिज्ञा, स्वलक्षण, सामान्यलक्षण, वायवासकमाव, अविद्या संसर्ग से सदसद्धर्म और बन्ध, मोक्ष आदि स्वशास्त्रगत प्रतिज्ञा उनकी हानि हो जायगी 1 । किञ्च विज्ञान, विज्ञान इस प्रकार स्वीकार करते हुए तुमसे स्तम्भ, कुड्य इस प्रकारका सत्यानन्दी - दीपिका * सहोपलम्भ नियम भी ज्ञान और विषयके अभेदका साधक नहीं है, क्योंकि नेत्र से रूप-प्रत्यक्षके साथ प्रकाश भी उपलब्ध होता है, इससे रूप और आलोकके सहोपलम्भसे दोनोंका अभेद नहीं हो जाता, इसलिए प्रकरण में निमित्तनैमित्तकभाव से सहोपलभ्भ समझना चाहिए । अंत: ज्ञान और अर्थका स्पष्ट भेद है । * विज्ञानवादीने विज्ञानको क्षणिक और चैतन्य मानकर यह भी स्वीकार किया है कि ज्ञान अपनेको विषय करता है । परन्तु एकमें विषयविषयिभाव विरुद्ध है । पूर्वविज्ञान अपनी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें नष्ट हो जाता है, दूसरे विज्ञानके उत्पत्ति क्षण में पूर्व ज्ञान नहीं है तो वह विषय कैसे और विषय विना द्वितीय विज्ञान विषयी कैसे होगा । यदि पूर्वज्ञान उत्तरज्ञानका विषय होनेके लिए एक क्षण अधिक ठहरेगा, तो क्षणिकत्वको हानि होगी । इसप्रकार विज्ञान भेदकी प्रतिज्ञा मी युक्त नहीं है, क्योंकि भेदके अनुयोगी और प्रतियोगीका एकका दूसरेसे ग्रहण न होनेके कारण भेदका ग्रहण कैसे होगा? इसलिए उनके भेदका ग्राहक उनसे भिन्न स्थायी आत्मा मानना चाहिए । इस प्रकार
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४५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ हीयेरन् । किंचान्यत् - विज्ञानं विज्ञानमित्यभ्युपगच्छता बाह्योऽर्थः स्तम्भः कुड्य-मित्येवं जातीयकः कस्मान्नाभ्युपगम्यत इति वक्तव्यम् । विज्ञानमनुभूयत इति चेत्-बाह्योऽप्यर्थोऽनुभूयत एवेति युक्तमभ्युपगन्तुम् । * अथ विज्ञानं प्रकाशात्मकत्वात्प्रदीप-वत्स्वयमेवानुभूयते न तथा बाह्योऽप्यर्थ इति चेत् — अत्यन्तविरुद्धां स्वात्मनि क्रिया-मभ्युपगच्छस्यग्निरात्मानं दहतीतिवत्, अविरुद्धं तु लोकप्रसिद्धं स्वात्मव्यतिरिक्तेन विज्ञानेन बाह्योऽर्थोऽनुभूयत इति नेच्छस्यहो पाण्डित्यं महद्दर्शितम् । न चार्थाव्यतिरिक्त-मपि विज्ञानं स्वयमेवानुभूयते, स्वात्मनि क्रियाविरोधादेव । ननु विज्ञानस्य स्वरूपव्यति-रिक्तग्राह्यत्वे तदप्यन्येन ग्राह्यं तदप्यन्येनेत्यनवस्था प्राप्नोति । अपि च प्रदीपवदवभासा-त्मकत्वाज्ज्ञानस्य ज्ञानान्तरं कल्पयतः समत्वादवभास्यावभासकभावानुपपत्तेः कल्पना-नर्थक्यमिति तदुभयमप्यसत् । विज्ञानग्रहणमात्र एव विज्ञानसाक्षिणो ग्रहणाकांक्षानुत्पा-दादनवस्थाशङ्कानुपपत्तेः, साक्षिप्रत्यययोश्च स्वभाववैषम्यादुपलब्धुपलभ्यभावोपपत्तेः, स्वयंसिद्धस्य च साक्षिणोऽप्रत्याख्येयत्वात् । किंचान्यत्-- प्रदीपवद्विज्ञानमवभास-बाह्य अर्थ क्यों स्वीकार नहीं किया जाता? यह कहना चाहिए । यदि कहो कि विज्ञानका अनुभव होता है, तो बाह्य अर्थका भी अनुभव होता ही है, ऐसा स्वीकार करना युक्त है । यदि कहो कि विज्ञान प्रकाशात्मक होनेसे प्रदीपके समान स्वतः ही अनुभवका विषय होता है उस प्रकार बाह्य अर्थ अनुभवमें नहीं आता, तो अग्नि अपनेको जलाती है, इसके समान अपने आत्मामें अत्यन्त विरुद्ध क्रिया ( कमं कर्तृभाव ) स्वीकार करते हो । परन्तु अपनेसे ( वस्तु से ) भिन्न विज्ञान से बाह्य अर्थं अनुभवका विषय होता है, ऐसी अविरुद्ध लोक प्रसिद्ध बातको तुम नहीं मानते, अहो! तुमने अपना महान् पाण्डित्य दिखलाया । अर्थसे अभिन्न होता हुआ भी विज्ञान स्वयं ही अनुभवका विषय नहीं होता है, क्योंकि अपने क्रियाका विरोध ही है । परन्तु विज्ञान अपने से भिन्नसे ग्राह्य हो, तो वह भी अन्यसे ग्राह्य हीगा और वह मी अन्यसे, इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होती है । ज्ञानको प्रदीपके समान अवभासात्मक होने से ज्ञानके अन्य ज्ञानकी कल्पना करनेवालेके मतमें दोनों ज्ञानोंके समान ( अवभासात्मक ) होनेसे उनमें अवमास्य और अवभासक भाव अनुपपन्न है, अतः कल्पना अनर्थक होगी । सि ० परन्तु ये दोनों शङ्काएँ ठीक नहीं हैं, क्योंकि विज्ञानके ग्रहणमात्रमें ही विज्ञानके साक्षीके ग्रहणकी आकांक्षा उत्पन्न न होनेसे अनवस्थाकी शङ्का नहीं हो सकती, साक्षी और ज्ञानमें स्वभाव के वैषम्यसे उपलब्धा और उपलभ्य-भाव उपपन्न होता है, कारण कि स्वयं सिद्ध साक्षीका प्रत्याख्यान नहीं होता । और दूसरी बात-सत्यानन्दी- दीपिका पक्ष, साध्य हेतु और दृष्टान्तमें भेद न होनेसे ' यह क्षणिक और असत् है ' यह प्रतिज्ञा युक्त नहीं है । अन्यसे व्यावृत्त व्यक्तिमात्र स्वलक्षण, अनेकोंमें अनुगत अतद्व्यावृत्तिरूप सामान्य, यथा गोत्व, यह भी अनेक ज्ञान साध्य है । पूर्व विज्ञान अपने संस्कारोंको उत्तरज्ञानमें संक्रमण करता है, जैसे कस्तुरीकी गन्ध कपड़े की एक सतहसे दूसरी सतहमें जाती है । पूर्व नीलज्ञान वासक और उत्तर नीलज्ञान वास्य है, यह प्रतिज्ञा युक्त नहीं, क्योंकि उनके भेदका ज्ञाता नहीं है । अविद्या संसर्गसे घट आदि सत् और शशविषाण आदि असत् यह सदसद्धर्मं प्रतिज्ञा और अज्ञानसे बन्ध और ज्ञानसे मोक्ष इत्यादि तुम्हारे शास्त्र में प्रतिपादित प्रतिज्ञाएँ बाधित हो जायेंगी, क्योंकि प्रत्येक प्रतिज्ञा अनेक ज्ञान साध्य है । अनेक ज्ञान अनेक बाह्य अर्थके विना नहीं हो सकते । अतः प्रतिज्ञासिद्धिके लिए भेदपूर्वक ग्राह्यग्राहक-भाव स्वीकार करना चाहिए । और विज्ञानके समान बाह्य अर्थ भी मानना चाहिए । * साक्षी स्वयं सिद्ध है, उसकी सिद्धिके लिए किसी प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, अतः अनवस्था नहीं है । वृत्तिज्ञान जड़ और साक्षी चेतन होने से दोनोंमें वैषम्य होने के कारण समता दोष भी नहीं है । सिद्धान्तीके कहनेका अभिप्राय यह है- बौद्धोंसे अभीप्सित विज्ञान अन्तःकरणकी वृत्तिविशेष ही है, अतः वह जड़ और विनाशशील है ॥ २८ ॥
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अधि ० ५ सू ० २ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४५१ कान्तरनिरपेक्षं स्वयमेव प्रथत इति ब्रुवताऽप्रमाणगम्यं विज्ञानमनवगन्तृकमित्युक्तं स्यात्, शिलाघनमध्यस्थप्रदीप सहस्रप्रथनवत् । बाढमेवम्, अनुभवरूपत्वात्तु विज्ञानस्येष्ठो नः पक्षस्त्वयाऽनुज्ञायत इति चेत् - न, अन्यस्यावगन्तुश्चक्षुः साधनस्य प्रदोपादिप्रथनदर्श-नात् । अतो विज्ञानस्याप्यवभास्यत्वाविशेषात्सत्येवान्यस्मिन्नवगन्तरि प्रथनं प्रदीपवदि-त्यवगम्यते । साक्षिणोऽवगन्तुः स्वयंसिद्धतामुपक्षिपता स्वयं प्रथते विज्ञानमित्येष एव मम पक्षस्त्वया वाचोयुक्त्यन्तरेणाश्रित इति - न, विज्ञानस्योत्पत्तिप्रध्वंसानेकत्वादिवि-शेषवत्त्वाभ्युपगमात्, अतः प्रदीपवद्विज्ञानस्यापि व्यतिरिक्तावगम्यत्वमस्माभिः प्रसाधितम् ॥ २८ ॥
वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥२ ९ ॥ पदच्छेद- वैधर्म्यात्, च, न, स्वप्नादिवत् । सूत्रार्थ - ( वैधर्म्याच्च ) स्वप्नविज्ञान और जाग्रत् विज्ञानके बाधित और अबाधित विषयरूप वैधम्यंसे ( न स्वप्नादिवत् ) स्वप्नादिके दृष्टान्तसे जाग्रत् ज्ञान निराधार नहीं हो सकता । * यदुक्तम् - बाह्यार्थापलापिना स्वप्नादिप्रत्ययवज्जागरितगोचरा अपि स्तम्भा-दिप्रत्यया विनैव बाह्येनार्थेन भवेयुः, प्रत्ययत्वाविशेषादिति । तत्प्रतिवक्तव्यम्, अत्रोच्यते-न स्वप्नादिप्रत्ययवज्जाग्रत्प्रत्यया भवितुमर्हन्ति । कस्मात्? वैधर्म्य हि भवति स्वप्नजा-गरितयोः । किं पुनर्वैधर्म्यम्? बाधाबाधाविति ब्रूमः । बाध्यते हि स्वप्नोपलब्धं वस्तु प्रति-प्रदीपके समान विज्ञान अन्य अवभासककी अपेक्षाके विना स्वयं ही प्रकाशित होता है, इस प्रकार कथन करनेवाले तुमसे विज्ञान अप्रमाणगम्य और अवगन्ता रहित है, ऐसा कहना होगा, जैसे शिलाधनके मध्यमें स्थित सहस्र प्रदीप, वैसे ही है । पू ० – परन्तु विज्ञानके अनुभवरूप होने से हमारा अभिमत पक्ष तुमने स्वीकारकर लिया । सि ० - ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, क्योंकि नेत्र जिसका साधन है ऐसे अन्य ज्ञाताको प्रदीप आदिका प्रकाश देखने में आता है, इससे विज्ञानमें भी अवभास्यत्व समान होनेसे अन्य अवगन्ता के होने पर प्रदीपके समान उसका प्रकाश है, ऐसा अवगत होता है । पू ० - अवगन्ता साक्षीकी स्वयं सिद्धताका समर्थन करते हुए तुमने ' विज्ञान स्वयं प्रकाशित होता है ' इस प्रकार मेरे पक्षका ही अन्य शब्द विशेषसे आश्रयण किया है, सि ० - ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विज्ञानमें उत्पत्ति, नाश और अनेकत्व आदि विशेष स्वीकार किये जाते हैं, अतः प्रदीपके समान विज्ञान भी अन्यसे अवगम्य है, ऐसा हमने सिद्ध किया है ॥ २८ ॥
स्वप्न आदि ज्ञानोंके समान जाग्रत् विषयक स्तम्भ आदि ज्ञान भी बाह्य अर्थके विना ही होने चाहिए, क्योंकि दोनों ज्ञानोंमें ज्ञानत्त्व समान है, ऐसा बाह्य अर्थका प्रतिषेध करनेवालेने जो कहा है, उसका परिहार करना चाहिए । इस विषय में कहते है - जाग्रत् ज्ञान स्वप्न आदि ज्ञानके समान नहीं हो सकते, किससे? इससे कि दोनोंमें वैधर्म्यं है । स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाके ज्ञानोंमें वैधर्म्य है । पुनः वह वैधम्यं क्या है? हम कहते हैं - बाघ और अबाध है, क्योंकि स्वप्न अवस्था में उपलब्ध वस्तु जाग्रत् सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि सिद्धान्ती भी विज्ञान ( आत्मा ) से अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थकी पृथक् सत्ता नहीं मानते, तो भी प्रत्यगभिन्न ब्रह्म साक्षात्कार के पूर्वं व्यवहार दशा में उसकी व्यावहारिक सत्ता मानते हैं । इस प्रकार दोनों पक्षों में अन्तर है । स्वप्न और जाग्रत् प्रत्ययों में यही वैधभ्यं है कि स्वप्न प्रत्यय बाधित होता है और जाग्रत् प्रत्यय बाधित नहीं होता । ऐसा तो तुमको भी स्वीकार करना होगा, अन्यथा स्वप्न प्रत्यय में मिथ्यात्व निश्चय नहीं होगा । यदि जाग्रत् प्रत्यय मी स्वप्न प्रत्यय के समान हो तो वह
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I ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ बुद्धस्य मिथ्या मयोपलब्धो महाजनसमागम इति, न ह्यस्ति मम महाजन समागमो निद्रा-ग्लानं तु मे मनो बभूव तेनैषा भ्रान्तिरुद्बभूवेति । एवं मायादिष्वपि भवति यथायथं बाधः । नैवं जागरितोपलब्धं वस्तु स्तम्भादिकं कस्यांचिदप्यवस्थायां बाध्यते । अपि च स्मृतिरेषा यत्स्वप्नदर्शनम्, उपलब्धिस्तु जागरितदर्शनम्, स्मृत्युपलब्ध्योश्च प्रत्यक्षमन्तरं स्वयमनुभूयते ऽर्थविप्रयोगसंप्रयोगात्मकमिष्टं पुत्रं स्मरामि, नोपलभे, उपलब्धुमिच्छा-मीति । तत्रैवं सति न शक्यते वक्तुं मिथ्या जागरितोपलब्धिरुपलब्धित्वात्स्वप्नोपलब्धि-वदित्यु भयोरन्तरं स्वयमनुभवता । नच स्वानुभवापलापः प्राज्ञमानिभिर्युक्तः कर्तुम् । अपि चानुभवविरोधप्रसङ्गाज्जागरितप्रत्ययानां स्वतो निरालम्बनतां वक्तुमशक्नुवता स्वप्न-प्रत्ययसाधर्म्याद्वक्तुमिष्यते । न च यो यस्य स्वतो धर्मो न संभवति सोऽन्यस्य साधर्म्या-त्तस्य संभविष्यति । न ह्यग्निरुष्णोऽनुभूयमान उदकसाधर्म्याच्छीतो भविष्यति । दर्शितं तु वैधर्म्य स्वप्नजागरितयोः ॥ २ ९ ॥ न भावोऽनुपलब्धेः ॥३० ॥
पदच्छेद – न, मावः, अनुपलब्धेः । सूत्रार्थ - ( अनुपलब्धेः ) तुम्हारे मतमें बाह्य अर्थकी उपलब्धि न होने से ( न मावः ) तद्-जन्य वासना भी नहीं हो सकती । यदयुक्तम् - विनाप्यर्थेन ज्ञानवैचित्र्यं वासना वैचित्र्यादेवावकल्पत इति तत्प्रति-पुरुषको बाधित होती है कि मुझे जो महाजन समागम उपलब्ध हुआ था वह मिथ्या है, मुझे महाजन समागम हुआ नहीं मेरा मन निद्रासे ग्लानि युक्त हुआ जिससे यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई । इस प्रकार माया आदिमें मी यथा योग बाघ होता है । परन्तु जाग्रत् में उपलब्ध स्तम्भ आदि वस्तु किसी भी अवस्था में इस प्रकार बाधित नहीं होती । और भी जो स्वप्न ज्ञान है वह स्मृति है और जागरित दर्शन उपलब्धि ( अनुभव ) है, जैसे इष्ट पुत्रका स्मरण करता हूँ उपलब्ध नहीं करता, उपलब्ध करना चाहता हूँ, इस प्रकार स्मृति और उपलब्धि में अर्थ विप्रयोग और संप्रयोगात्मक प्रत्यक्षरूपसे भेद स्वयं अनुभव होता है । ऐसा ( वैधर्म्यसिद्ध ) होनेपर दोनोंका अन्तर स्वयं अनुभव करनेवाला तुमसे यह नहीं कहा जा सकता कि ' जागरित उपलब्धि मिथ्या है, उपलब्धि होनेसे स्वप्न उपलब्धिके समान ' । बुद्धिमानोंसे अपने अनुभवका अपलाप करना युक्त नहीं है । अनुमवके साथ विरोध प्रसंगके मयसे जाग्रत् प्रत्ययोंको स्वयं निरालम्बनता कहने में असमर्थ होकर स्वप्न प्रत्ययके साधम्यसे उसका धर्मं नहीं हो सकेगा । अग्नि उष्ण अनुभूयमान होनेपर जलके साधर्म्यसे शीतल नहीं हो जायगी । स्वप्न और जाग्रत् प्रत्ययोंका वैधर्म्यं तो दिखलाया गया है ॥ २ ९ ॥ बाह्य अर्थ विना भी ज्ञान वैचित्र्य वासनाके वैचित्र्यसे ही हो सकता है, ऐसा जो कहा गया है, उसका प्रत्याख्यान ( परिहार ) करना चाहिए । इस विषयपर कहा जाता है— वासनाओंका सत्यानन्दी -दीपिका स्वप्न प्रत्ययका बाधक नहीं होगा, इसलिए बाघ और अबाधरूप वैधर्म्यसे स्वप्न प्रत्यय के समान जाग्रत् प्रत्यय बाह्य अर्थके विना नहीं हो सकता । * यदि दोनों प्रत्यय बाह्य अर्थके विना हैं तो ' यह स्वप्न है यह जाग्रत् ' इस भेदका हेतु कौन है? इससे तुम्हारे मतमें बाध्य बाधक आदि सब व्यवहार लुप्त हो जायँगे । जैसे अग्नि जलके द्रव्यत्व साधर्म्यसे शीतल नहीं होती, वैसे प्रत्ययत्व के साधम्यंसे जाग्रत् - प्रत्यय स्वप्न प्रत्ययके समान निरालम्बन नहीं हो सकते ॥ २ ९ ॥
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अधि ० ५ सू ० ३१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४५३ वक्तव्यम् । अत्रोच्यते - न भावो वासनानामुपपद्यते त्वत्पक्षेऽनुपलब्धेर्बा द्यानामर्थानाम् । अर्थोपलब्धिनिमित्ता हि प्रत्यर्थ नानारूपा वासना भवन्ति । अनुपलभ्यमानेषु त्वर्थेषु किंनिमित्ता विचित्रा वासना भवेयुः? अनादित्वेऽप्यन्धपरम्परान्यायेनाप्रतिष्ठैवानवस्था व्यवहारलोपिनी स्यान्नाभिप्राय सिद्धिः । यावप्यन्वयव्यतिरेकावर्थापलापिनोपन्यस्तौ वासनानिमित्तमेवेदं ज्ञानजातं नार्थनिमित्तमिति, तावप्येवं सति प्रत्युक्तौ द्रष्टव्यौ । विनार्थोपलब्ध्या वासनानुपपत्तेः । अपि च विनापि वासनाभिरर्थोपलब्ध्युपगमाद्विना त्वर्थोपलब्ध्या वासनोत्पत्स्यनभ्युपगमादर्थ सद्भावमेवान्वयव्यतिरेकावपि प्रतिष्ठापयतः । अपि च वासना नाम संस्कारविशेषाः । संस्काराश्च नाश्रयमन्तरेणावकल्पन्ते; एवं लोके दृष्टत्वात् । नच तव वासनाश्रयः कश्चिदस्ति प्रमाणतोऽनुपलब्धेः ॥ ३० ॥
क्षणिकत्वाच्च ॥ ३१ ॥
पदच्छेद – क्षणिकत्वात् च । सूत्रार्थ - आलयविज्ञानको क्षणिक माननेसे वह मी वासनाका आश्रय नहीं हो सकता । * यदप्य यविज्ञानं नाम वासनाश्रयत्वेन परिकल्पितम्, तदपि क्षणिकत्वाभ्युपगमा-दनवस्थितस्वरूपं सत्प्रवृत्तिविज्ञानवन्न वासनानामाधिकरणं भवितुमर्हति । नहि कालत्रय-संबन्धिन्येकस्मिन्नन्वयिन्यसति कूटस्थे वा सर्वार्थदर्शिनि देशकालनिमित्तापेक्षवासना-घीनस्मृतिप्रति संचानादिव्यवहारः संभवति । स्थिरस्वरूपत्वे त्वालय विज्ञानस्य सिद्धान्त-हानिः । अपि च विज्ञानवादेऽपि क्षणिकत्वाभ्युपगमस्य समानत्वाद्यानि बाह्यार्थवादे क्षणि-अस्तित्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि तुम्हारे मतमें बाह्य अर्थोंकी उपलब्धि नहीं है । अर्थकी उपलब्धिसे ही प्रत्येक अर्थमें अनेक प्रकारकी वासनाएँ उत्पन्न होती हैं । अर्थोके अनुपलभ्यमान होनेपर विचित्र वासनाएँ किस निमित्तसे होंगी । वासनाओंको अनादि माननेपर भी अन्धपरम्परा न्यायसे व्यवहार लोपिनी अप्रतिष्ठारूप अनवस्था ही होंगी इससे अभिप्रायकी सिद्धि नहीं होगी । वासना निमित्तक हो यह ज्ञान समूह है अर्थं निमित्तक नहीं है, इस प्रकार बाह्य अर्थका निषेध करनेवालेने जो अन्वय-व्यतिरेकका उपन्यास किया है, ऐसा होनेपर ( अर्थ निमित्तक वासना होनेपर ) वे दोनों भी निराकृत हुए समझने चाहिए, कारण कि अर्थकी उपलब्धिके विना वासना नहीं हो सकती । किञ्च वासनाओंके विना मी अर्थको उपलब्धि स्वीकार है और अर्थकी उपलब्धिके विना वासना स्वीकार नहीं की जाती, इससे यह अन्वय - व्यतिरेक भी अर्थका सद्भाव ही प्रतिष्ठापित करते हैं । अन्य मी - वासनाएं संस्कार विशेष हैं और संस्कार आश्रयके विना नहीं हो सकते, क्योंकि व्यवहारमें ऐसा देखा गया है । तुम्हारे मत में वासनाका कोई आश्रय नहीं है, क्योंकि उसकी प्रमाणसे उपलब्धि नहीं है ॥ ३० ॥
आयविज्ञानी भी वासनाओंके आश्रयरूपसे कल्पनाकी गयी है, वह भी क्षणिकत्वके स्वीकारसे अनवस्थित स्वरूप होता हुआ प्रवृत्तिविज्ञानके समान वासनाओंका आश्रय नहीं हो सकता है । तीनों कालसे सम्बन्ध रखनेवाला एक अन्वयी कूटस्थ अथवा सर्वार्थदर्शी के न होनेपर देश, काल और निमित्तकी अपेक्षा से वासनाके अधीन स्मृति और प्रत्यभिज्ञा आदि व्यवहार नहीं हो सकता । [ किसी पुस्तक में ' वासनाधानस्मृति ' ऐसा पाठ भी है । वासनाओंका आधान - स्थापन और उसके अधीन स्मृति ] यदि आलयविज्ञान स्थिर स्वरूप हो तो क्षणिकत्व सिद्धान्तकी हानि होगी । और सत्यानन्दी - दीपिका * बौद्ध विषयक कुछ विवेचन इसप्रकार है— बुद्धके उपदेश मागधी भाषामें मौखिक ही होते थे । उनकी रक्षार्थं बुद्धके निर्वाणकालमें उनके शिष्य आनन्द आदिके सहयोगसे सुत्तपिटक
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४५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ०२ कत्वनिबन्धनानि दूषणान्युद्भावितानि ' उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ' ( ब ० सू ० २।२।२० ) इत्येवमादीनि तानीहाप्यनुसंधातव्यानि । एवमेतौ द्वावपि वैनाशिकपक्षौ निराकृती-बाह्यार्थवादिपक्षो विज्ञानवादिपक्षश्च । शून्यवादिपक्षस्तु सर्वप्रमाणविप्रतिषिद्ध इति तन्नि-राकरणाय नादरः क्रियते, नह्ययं सर्वप्रमाणप्रसिद्ध लोकव्यवहारोऽन्यत्तत्त्वमनधिगम्य शक्यतेऽपह्नोतुमपवादाभाव उत्सर्गप्रसिद्धेः ॥ ३१ ॥
सर्वथानुपपत्तेश्च ॥३२ ॥:
पदच्छेद- सर्वथा, अनुपपत्तेः, च । सूत्रार्थ - ( सर्वथा ) बौद्ध दर्शन सब प्रकारसे ( अनुपपत्तेः ) असंगत होनेसे ( च ) मी मुमुक्षुओंसे आदरणीय नहीं है । * किं बहुना, सर्वप्रकारेण यथायथाऽयं वैनाशिक समय उपपत्तिमत्त्वाय परीक्ष्यते, तथा तथा सिकताकूपवद्विदीर्यत एव न कांचिदप्यत्रोपपत्तिं पश्यामः अतश्चानुपपन्नो विज्ञानवाद में भी क्षणिकत्व सिद्धान्त समान होने से बाह्य अर्थवाद में क्षणिकत्व के अधीन ' उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ' इत्यादि जो दूषण उद्भावित किये गये हैं उनका यहाँ मी अनुसंधान करना चाहिए । इसप्रकार बाह्यार्थवादि पक्ष और विज्ञानवादि पक्ष थे दोनों वैनाशिक पक्ष भी निराकृत किये गये । शून्यवादि पक्ष तो सर्वप्रमाण विरुद्ध है, इससे उसके निराकरण में आदर नहीं किया जाता है । सवं प्रमाण सिद्ध इस लोकव्यहारका कोई भिन्न तत्त्व स्वीकार किए विना निषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि अपवादके अभाव में उत्सगं प्रसिद्ध है ॥ ३१ ॥
बहुत कहने से क्या प्रयोजन, सब प्रकारसे ज्यों - ज्यों इस वैनाशिक सिद्धान्तकी उपपत्ति - युक्त करनेके लिए परीक्षा की जाती है त्यों त्यों सिकताकूपके समान विदीर्णं ही होता है । इसमें हम कोई सत्यानन्दी - दीपिका ( बुद्ध के उपदेश ) विनयपिटक ( आचार सम्बन्धी ग्रंथ ) और अभिधम्मपिटक ( दार्शनिक विषयों-का विवेचनात्मक ग्रन्थ ) का संङ्कलन किया गया । किञ्च वैभाषिक बाह्यार्थं प्रत्यक्षवाद, सौत्रान्तिक बाह्यार्थानुमेयवाद, योगाचार - विज्ञानवाद और माध्यमिक - शून्यवाद, इन सभी मतोंके सिद्धान्तों का वर्णन बड़ी सुन्दर रीति से इस श्लोक में किया गया है-' मुख्य माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्, योगाचारमते तु सन्ति मतयस्तासांविवर्तोऽखिलः । अर्थोऽस्ति क्षणिकस्त्वसावनुमितो बुद्धय ति सौत्रान्तिकः, प्रत्यक्षं क्षणमङ्गुरं च सकलं वैभाषिको माषते ॥ ( मुख्य माध्यमिक यह अखिल जगत् शुन्यका विवतं मानते हैं । योगचार मतमें विज्ञान अनेक हैं, उनका ही यह सम्पूर्ण जगत् विवतं है, यह बाह्यार्थं क्षणिक है और वह बुद्धि - ज्ञानसे अनुमित है, यह सान्तिका मत है । वैभाषिक कहते हैं कि सब प्रत्यक्ष है और क्षणिक हैं ) इनके दो संप्रदाय हैं-हीनयान स्थविरवाद - प्राचीनपरम्परा - असंशोधनवादी और महायान महासंघिक संशोधनवादी । इन चार सम्प्रदायोंमें वैभाषिकका सम्बन्ध हीनयानसे है । सौत्रान्तिकका भी हीनयानकी ओर झुकाव है, और शेषका सम्बन्ध महायानसे है । निर्वाणके विषयमें भी इनका मतभेद है - वैभाषिक तथा प्राचीन-मत में संसार सत्य, निर्वाण सत्य है । माध्यमिक मतमें संसार असत्य, निर्वाण असत्य है । सौत्रान्तिक मत संसार सत्य, निर्वाण असत्य है | योगाचार मतमें संसार असत्य, निर्वाण सत्य है । किव ' अभिधमं विभाषाशास्त्र ' इस भाषा के आधारपर प्रतिष्ठित होनेसे इस संप्रदायका नाम वैभाषिक पड़ा है । बुद्ध के सूत्रान्त के आधारपर प्रतिष्ठित होनेसे इस संप्रदायका नाम सौत्रान्तिक पड़ा है ॥ १ ॥
# यहाँ वेदको प्रमाणरूपसे न माननेवाली प्रजा समझनी चाहिए । इसप्रकार सुगतका सिद्धान्त लोक और वेदके विरुद्ध होनेके कारण भ्रान्तिमूलक है । इसलिए उसका वेदान्त सिद्धान्तसे कोई विरोध नहीं है ॥ ३२ ॥
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अधि ० ६ सू ० ३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित वैनाशिकतन्त्रव्यवहारः । अचि च बाह्यार्थविज्ञानशून्यवाद त्रयमितरेतर विरुद्धमुपदिशता सुगतेन स्पष्टीकृतमात्मनोऽसंबद्धप्रलापित्वम्, प्रद्वेषो वा प्रजासु विरुद्धार्थप्रतपत्त्या विमुह्ये-रिमाः प्रजा इति । सर्वथाप्यनादरणीयोऽयं सुगत समयः श्रेयस्कामैरित्यभिप्रायः ॥ ३२ ॥
( ६ एकस्मिन्नसंभवाधिकरणम् । सू ० ३३-३६ ) नैकस्मिन्नसंभवात् ॥ ३३ ॥
पदच्छेद – न, एकस्मिन्, असंभवात् । सूत्रार्थ - ( एकस्मिन् ) एक परमार्थरूप वस्तु में ( असंभवात् ) विरुद्ध धर्मोका संभव न होनेसे ( न ) वस्तु अनेकरूपता नहीं है । * निरस्तः सुगतसमयः, विवसनसमय इदानीं निरस्यते । तप्त चैषां पदार्थाः संमता जीवाजीवास्रवसंवर निर्जरबन्धमोक्षा नाम । संक्षेपतस्तु द्वावेव पदार्थों जीवाजीवाख्यौ । यथायोगं तयोरेवेतरान्तर्भावादिति मन्यन्ते । तयोरिममपरं प्रपञ्चमाचक्षते - पञ्चास्तिकाया नाम - जीवास्तिकायः पुद्गलास्तिकायो धर्मास्तिकायोऽधर्मास्तिकाय आकाशास्तिकाय -भी उपपत्ति नहीं देखा हैं । अतः वैनाशिक तन्त्र व्यवहार अनुपपन्न है । बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद और शून्यवाद परस्पर विरुद्ध इन तीन वादोंका उपदेश करते हुए सुगत ( बुद्ध ) ने अपना असम्बद्ध प्रलापित्व स्पष्ट किया है, अथवा विरुद्ध अर्थ प्रतिपत्तिसे ये प्रजाएँ मोहको प्राप्त हों इसप्रकार प्रजाके प्रति अतिविद्वेष किया है । इसलिए श्रेयः अभिलाषी पुरुषोंसे सब प्रकारसे यह सुगत सिद्धान्त अना-दरणीय है, ऐसा अभिप्राय है ॥ ३२ ॥
सुगत मतका निराकरण किया गया, अब जैनमतका निराकरण किया जाता है । इनको जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बंध और मोक्ष इसप्रकार सात पदार्थ अभीमत हैं । संक्षेपसे तो जीव और अजीव नामके दो ही पदार्थ हैं, क्योंकि अन्योंका उन दोनोंमें यथायोग अन्तर्भाव है, ऐसा वे मानते हैं । जीवास्तिकाय, पुद्गलांस्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय ये पाँच अस्तिकाय उन दोनोंका यह दूसरा विस्तार कहते हैं । उन सबके स्वशास्त्रोंमें परिकल्पित बहुत प्रकारके सत्यानन्दी - दीपिका * सुगत मतका परिहारकर प्रसंगसे बुद्धिस्थ दिगम्बर जैन मतका निराकरण करनेके लिए प्रथम उस मतका उपन्यास करते हैं— जीवास्तिकाय तीन प्रकारका है — बद्ध, मुक्त और नित्यसिद्ध । ' अस्ति कायते इति अस्तिकायः ' ' जो अस्तिशब्दसे कहा जाय वह अस्तिकाय है यह जैन ग्रन्थोंमें पारि-भाषिक शब्द पदार्थवाची है । पुद्गलास्तिकाय छः हैं- पृथिवी आदि चार भूत स्थावर ( वृक्ष आदि ) और जङ्गम- मनुष्य आदि । ' पूर्यन्ते गलन्तीति पुद्गलाः ' पूर्ण हो और गल जायँ वे पुद्गल हैं ' यह लक्षण पृथिवी आदि छः और परमाणु समुदायमें घटता है, अतः वे पुद्गल कहे जाते हैं । सम्यक् प्रवृत्तिसे अनुमेय धर्मं है । ऊर्ध्वगमनशील जीवकी देहमें स्थितका हेतु अधर्मं है । आवरणका अभाव आकाश है, वह लोकाकाश और आलोकाकाश इस भेदसे दो प्रकारका है । ऊष्वं ऊष्वं लोकोंके अन्तर विद्यमान आकाश लोकाकाश और उससे भी ऊध्वं मोक्षस्थान आलोकाकारा है, वह केवल मुक्त पुरुषोंका आश्रय स्थान है । मिथ्या प्रवृत्ति आस्रव है और सम्यक् प्रवृत्ति संवर और निर्जर है । विषयो -के अभिमुख इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति आस्रव है । दूसरे लोक कर्मोंको आस्रव कहते हैं, क्योंकि वे कर्ताको व्याप्तकर फल देनेके लिए उसके पीछे रहते हैं, यह मिथ्याप्रवृत्ति अनर्थका हेतु है । शम, दम आदि प्रवृत्ति संवर है, यह इन्द्रियोंकी विषयोंमें प्रवृत्तिको रोकनेसे संवर कहा जाता है । अनादि कालके पुण्य पापरूपी कषायोंका जो नाशक वह निर्जर है, जैसे तप्तशिला आरोहण, केशोंका लुंचन इत्यादि
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४५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ श्वेति । सर्वेषामप्येषामवान्तरप्रभेदान्बहुविधान्स्वसमयपरिकल्पितान्वर्णयन्ति । सर्वत्र चेमं सप्तभङ्गीनयं नाम न्यायमवतारयन्ति - स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तव्यः, स्यादस्ति चावक्तव्यश्च, स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च, स्यादस्ति च नास्ति चावक्त-व्यश्चेति । एवमेवैकत्वनित्यत्वादिष्वपीमं सप्तभङ्गीनयं योजयन्ति । अत्राचक्ष्महे - नायम-भ्युपगमो युक्त इति । कुतः? एकस्मिन्नसंभवात् । न ह्येकस्मिन्धर्मिणि युगपत्सदसत्त्वादि-विरुद्धधर्मसमावेशः संभवति, शीतोष्णवत् । य एते सप्तपदार्था निर्धारिता एतावन्त एवं-अवान्तर प्रभेदोंका वर्णन करते हैं । और सर्वत्र इस सप्तभंगी नयनामक न्यायका अवतरण करते हैं-' स्यादस्ति ' ( कथंचित् है ) ' स्यान्नस्ति ' ( कथंचित् नहीं है ) ' कथंचित् है और कथंचित् नहीं भी है ' ' कथंचित् अवक्तव्य है ' ' कथंचित् है और कथंचित् अवक्तव्य भी है ' ' कथंचित् नहीं है और कथंचित् अवक्तव्य भी है ' ' कथंचित् है कथंचित् नहीं है और कथंचित् अवक्तव्य भी है ' । इसीप्रकार एकत्व और नित्यत्व आदि में भी इस सप्तभङ्गी सिद्धान्तकी योजना करते हैं । सिद्धान्ती - इस विषय में हम कहते हैं-यह जैन सिद्धान्त युक्त नहीं है, क्योंकि एकमें संभव नहीं है । एक धर्मी में एक ही समय सत्त्व और असत्त्व आदि विरुद्ध धर्मोका शीतोष्णके समान समावेश संभव नहीं है, जो ये सात पदार्थ इतने और सत्यानन्दी - दीपिका देहकष्ट । तत्त्वज्ञानसे मोक्ष नहीं होता, यह विपरीतभावना ज्ञानावरणीय है । आहंत दर्शनके अभ्याससे मोक्ष नहीं होता यह भावना दर्शनावरणीय है । बहुत तीर्थंकरोंसे परस्पर विरुद्ध प्रदर्शित मार्गों में निश्चयाभाव मोहनीय है । मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति में विघ्नकारक अन्तराय है । ये ज्ञानावरणीय आदि चार कल्याणके घातक होनेसे घाति असाधु कर्म कहे जाते हैं । मुझे यह तत्त्व ज्ञातव्य है, ऐसा अभि-मान वेदनीय है, मैं इस नामका हूँ, ऐसा अभिमान नामिक है, मैं पूज्य देशिक अहंतके शिष्य वंशमें प्रविष्ट हूँ, यह अभिमान गोत्रिक है और शरीर स्थितिके लिए कर्म आयुष्क है । तत्त्वज्ञानके अनुकूल होने से ये वेदनीय आदि चारों कर्म तत्त्वावेदक पुण्यवत् शरीरके साथ सम्बन्धी होनेसे अघातीकमं- साधु कर्म कहे जाते हैं । इसप्रकार ये आठ प्रकारके कर्म जन्मके हेतु होनेसे आस्रव आदि द्वारा पुरुषको बाँधते हैं, अतः बन्धरूप हैं । समस्त क्लेश कर्म पाशका नाशकर ज्ञानद्वारा सबके ऊपर आलोका-काशमें सतत सुखपूर्वक स्थितिका नाम मोक्ष है अथवा ऊर्ध्वगमनशील जीव धर्माधर्मसे मुक्त होकर सतत ऊर्ध्वको गमन करता है. यही उसका मोक्ष है । इसप्रकार जीव और अजीवका संक्षेप और विस्तार से उपन्यास किया गया । * सात अस्तित्व आदि भङ्गो प्रकारोंका समहार सप्त भङ्गी है उसका नय - न्याय । यदि घट आदि सर्वात्मना सदा एक हों, तो प्राप्यरूपसे भी वे हैं, इसलिए उनकी प्राप्तिके लिए कोई यत्न नहीं करेगा, अतः घटत्वादिरूपसे कथंचित् है और प्राप्यत्व आदिरूपसे कथंचित् नहीं है । इस प्रकार वे वस्तुमात्रमें अनेकन्तवाद स्वीकार करते हैं ' स्यात् ' यह तिङन्त सदृश अव्यय है, इसका अर्थ कथंचित् है । अर्थात् ' स्यादस्ति ' ( कथंचित् है ) ' वस्तु है ' ऐसी इच्छा होनेपर ' स्यादस्ति ' यह प्रथमभंग प्रकार, ' नहीं है ' ऐसी इच्छा होनेपर ' स्यादवक्तव्यः ' यह द्वितीय मङ्ग, क्रमसे दोनों इच्छाएं होनेपर ' स्यादस्ति च नास्ति च ' यह तृतीय भङ्ग, युगपद् दोनों इच्छाएं होनेपर ' अस्ति और नास्ति ' इसप्रकार दो शब्दों को एक कालमे नहीं कहे जा सकने के कारण ' स्यादवक्तव्यः ' यह चतुर्थ मङ्ग, आद्य और चतुर्थ भङ्गकी इच्छा होने पर ' स्यादस्ति च अवक्तव्यश्व ' यह पांचवां भङ्ग, द्वितीय और चतुर्थ मङ्गकी इच्छा-होनेपर ' स्यान्नस्ति चावक्तव्यश्च ' यह छठवाँ भङ्ग, तृतीय और चतुर्थं मङ्गकी इच्छा होनेपर ' स्यादस्ति च नास्ति च अवक्तव्यश्च ' यह सातवां मङ्गप्रवृत्त होता है । इसप्रकार ' स्यादेकः ' ' स्यादनेकः ' ' स्यादे-कोऽनेकश्च ' इसप्रकार ' स्यात् नित्य: ' इस तरह इनमें भी सात भङ्ग समझने चाहिए । इसप्रकार वस्तु