श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 491–500

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 491–500

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अधि ० ६ सू ० ३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४५७ रूपाश्चेति ते तथैव वा स्युर्नैव वा तथा स्युः 1 । इतरथा हि तथा वा स्युरतथा वेत्यनिर्धा-रितरूपं ज्ञानं संशयज्ञानवदप्रमाणमेव स्यात् । नन्वनेकात्मकं वस्त्विति निर्धारित रूपमेव ज्ञानमुत्पद्यमानं संशयज्ञानवन्नाप्रमाणं भवितुमर्हति । नेति ब्रूमः निरङ्कुशं धनेकान्तत्वं सर्ववस्तुषु प्रतिजानानस्य निर्धारणस्यापि वस्तुत्वाविशेषात्स्यादस्ति स्यान्नास्तीत्यादिवि-कल्पोपनिपातादनिर्धारणात्मकतैव स्यात् । एवं निर्धारयितुर्निर्धारण फलस्य च स्यात्पक्षे-S स्तिता स्याच्च पक्षे नास्तितेति । एवं सति कथं प्रमाणभूतः संस्तीर्थकरः प्रमाणप्रमेयप्र-मातृप्रमितिष्वनिर्धारितालूपदेष्टुं शक्नुयात्? कथं वा तदभिप्रायानुसारिणस्तदुपदिष्टेऽ-र्थेऽनिर्धारितरूपे प्रवर्तेरन्? ऐकान्तिकफलत्वनिर्धारणे हि सति तत्साधनानुष्ठानाय सर्वो लोकोऽनाकुलः प्रवर्तते, नान्यथा । अतश्चानिर्धारितार्थ शास्त्रं प्रणयन्मत्तोन्मत्तवदनुपादेय-वचनः स्यात् । तथा पञ्चानामस्तिकायानां पञ्चत्वसंख्यास्ति वा नास्ति वेति विकल्प्यमाना, स्यात्तावदेकस्मिन्पक्षे, पक्षान्तरे तु न स्यादित्यतो न्यून संख्यात्वमधिकसंख्यात्वं वा प्राप्नु-यात् । न चैषां पदार्थानामवक्तव्यत्वं संभवति, अवक्तव्याश्चेन्नोच्येरन्, उच्यन्ते चावक्तव्या-इस रूपवाले निर्धारित हैं, वे वैसे ही प्रकार के हों अथवा वैसे नहीं ही हों, अन्यथा उस प्रकारके हों अथवा उस प्रकारके न हों, ऐसा अनिर्धारित ज्ञान संशयज्ञानके समान अप्रमाण ही होगा । परन्तु वस्तु अनेकात्मक है, इसमें निर्धारितरूपसे ही उत्पन्न हुआ ज्ञान संशयज्ञानके समान अप्रमाण नहीं हो सकता है | हम कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि सब वस्तुओं में निरङ्कुश अनेकान्तत्वकी प्रतिज्ञा करनेवालेके मतमें निर्धारणको भी वस्तुत्व के समान होने पर ' स्यादस्ति स्यान्नास्ति ' ( कथंचित् है और कथंचित् नहीं है ) इस प्रकार विकल्पके प्राप्त होनेसे अनिर्धारणात्मकत्व ही होगा । इसप्रकार निर्धारण करनेवाले का और निर्धारणफलका पक्षमें अस्तित्व होगा और पक्ष में नास्तित्व होगा । ऐसा होनेपर प्रमाणभूत होता हुआ मी तीर्थङ्कर प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता और प्रमितिके अनिर्धारित होनेपर उपदेश करने में कैसे समर्थ होगा । अथवा उसके अभिप्रायका अनुसरण करनेवाले शिष्य उसके उपदिष्ट अनिर्धारितरूप अर्थ में कैसे प्रवृत्त होंगे । परन्तु अव्यभिचरित फलका निर्धारण होनेपर उसके साधना-नुष्ठानके लिए सब लोग अनाकुल- निःसन्देह प्रवृत्त होते हैं, अन्यथा नहीं । इसलिए अनिर्धारित अर्थ -वाले शास्त्रका प्रणयन करता हुआ मत्त और उन्मत्तमें समान अनुपादेयवचन होगा । इसी प्रकार पांच अस्तिकायोंकी विकल्पित की हुई पंचत्व संख्या है अथवा नही है । एक पक्षमें ' स्यात् ' ' ऐसा होगा ' सत्यानन्दी - दीपिका अनेकरूप होनेसे उसमें प्राप्ति और त्याग आदि व्यवहार होते हैं । ऐकान्तिक - एकरूपमें सर्वं सर्वदा सर्वत्र ही है । उनमें प्राप्ति और परिहार व्यवहार लुप्त हो जायगा । इसलिए सबके अनेकान्त होनेसे एकरूप ब्रह्मका बाध है । * यह अनेकान्तवाद ठीक नहीं है, क्योंकि जो वस्तु सत्य है, वह सर्वथा सर्वदा सर्वत्र सर्वरूपसे है ही जैसे ब्रह्मात्मा । शङ्का - ऐसी परिस्थितिमें तो उसकी प्राप्तिके लिए यत्न नहीं होगा? क्योंकि वह नित्य प्राप्त है । समाधान - यह अप्राप्त है, ऐसी अप्राप्तिकी भ्रान्ति से उसकी प्राप्तिके लिए यत्न हो सकता है । उसी प्रकार जो नहीं है वह नहीं ही है, जैसे नरविषाण आदि । जो कदाचित् क्वचित् कथंचित् उपलब्ध होता है यह सत्, असत् से विलक्षण अनिवर्चनीय - प्रपञ्च है, इसलिए एकान्तवाद ही ठीक है अनेकान्तवाद नहीं । कारण कि एक ही वस्तुमें एक ही समय परस्पर विरूद्ध सत्त्व और असत्त्व आदि धर्म नहीं रह सकते, क्योंकि वस्तुमें विकल्प नहीं हो सकता । अतः ' स्थाणुर्वा पुरुषो वा ' इस संशयात्मक ज्ञानके समान सप्तत्व, पञ्चत्व निर्धारित फलमें, प्रमातामें, करणमें, प्रमाणमें और प्रमेय गत सप्तत्व और पञ्चत्वमें सत्त्व और असत्त्व विषयक संशय होने से वे अप्रामाणिक हैं । इसलिए व्यवहार के अनुसार प्रपञ्च एकरूप है ।

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४५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ श्वेति विप्रतिषिद्धम् । उच्यमानाश्च तथैवावधार्यन्ते नावधार्यन्त इति च । तथा तदवधार-णफलं सम्यग्दर्शनमस्ति वा नास्ति वा, एवं तद्विपरीतमसम्यग्दर्शनमप्यस्ति वा नास्ति वेति प्रलपन्मत्तोन्मत्तपक्षस्यैव स्यान्न प्रत्यायितव्यपक्षस्य । स्वर्गापवर्गयोश्च पक्षे भावः पक्षे चाभावस्तथा पक्षे नित्यता पक्षे चानित्यतेत्यनवधारणायां प्रवृत्त्यनुपपत्तिः । * अना-दिसिद्धजीवप्रभृतीनां च स्वशास्त्रावधृतस्वभावानामयथावधृतस्वभावत्वप्रसङ्गः । एवं जीवादिषु पदार्थेष्वेकस्मिन्धर्मिणि सत्त्वासत्त्वयोर्विरुद्धयोर्धर्मयोर संभवात्सत्त्वे चैकस्मि धर्मेऽसत्वस्य धर्मान्तरस्यासंभवादसत्त्वे चैवं सरवस्यासंभवादसंगतमिदमार्हतं मतम् । एतेनैकानेक नित्यानित्यव्यतिरिक्ताव्यतिरिक्ताद्यनेकान्ताभ्युपगमा निराकृता मन्तव्याः । यत्तु पुद्गलसंज्ञकेभ्योऽणुभ्यः संघाताः संभवन्तीति कल्पयन्ति तत्पूर्वेणैवाणुवादनिरा-करणेन निराकृतं भवतीत्यतो न पृथक्तन्निराकरणाय प्रयत्यते ॥ ३३ ॥

एवं चात्माकात्त्रयम् ॥ ३४ ॥

पदच्छेद - एवम्, च, आत्मा, अकात्र्यम् । सूत्रार्थ - ( एवञ्च ) और इसी प्रकार जैनमत में ( आत्मा ) आत्मा में ( अकात्स्न्यंम् ) परि-च्छिन्नत्व दोष भी प्रसक्त होगा, इससे आत्मा घट आदिके समान अनित्य होगा । यथैकस्मिन्धर्मिणि विरुद्धधर्मासंभवो दोषः स्याद्वादे प्रसक्त एवमात्मनोऽपि जीव-स्याकात्स्नर्यमपरो दोषः प्रसज्येत । कथम्? शरीरपरिमाणो हि जीव इत्यार्हता मन्यन्ते । और दूसरे पक्षमें ' न स्यात् ' ' ऐसा न होगा ' इससे न्यून संख्यात्व अथवा अधिक संख्यात्व प्राप्त होगा । इन पदार्थोंमें अवक्तव्यत्व भी सम्भव नहीं है, यदि अवक्तव्य हैं तो नहीं कहे जायेंगे, परन्तु कहे जाते हैं और पुनः अवक्तव्य हैं यह विरुद्ध है । और ये उच्यमान पदार्थ उसी प्रकार अवधारित होते हैं अवधारित नहीं होते और उसी प्रकार उसका अवधारण फल सम्यग्दर्शन है अथवा नहीं है, एवं उससे विपरीत असम्यग्दर्शन भी है अथवा नहीं । इस प्रकार प्रलाप करता हुआ मत्तोन्मत्त पक्षका होगा निश्चयात्मक पक्षका न होगा । स्वर्ग और अपवर्गका पक्षमें भाव और पक्षमें अभाव होगा, उसी प्रकार किसी पक्षमें नित्यता और किसी पक्ष में अनित्यता प्राप्त होगी इस प्रकार अवधारण न होनेपर उसमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती । तथा अनादि सिद्ध जीव आदि जिनका स्वभाव अपने शास्त्रमें निश्चित किया है उनको उससे विपरीत स्वभाव होनेका प्रसङ्ग होगा! एवं जीव आदि पदार्थोंमेंसे एक धर्मीमें विरूद्ध धर्मं सत्त्व और असत्त्वके असम्भव होनेसे सत्त्वरूप एक धर्म में अन्य असत्त्व धर्मका असंभव होनेके कारण और इसकार असत्त्वमें सत्त्वका संभव न होनेसे यह आहंतमत असंगत है । इस प्रकार सत्त्व और असत्त्व के निराकरणसे एक, अनेक, नित्य, अनित्य, भिन्न और अभिन्न आदि अनेकान्त स्वीकारोंका निरा-करण हुआ समझना चाहिए । पुद्गल संज्ञक अणुओंसे ( पृथिवी आदि ) संघात उत्पन्न होते हैं ऐसी जो कल्पना करते हैं, उसका तो पूवं अणुवादके निराकरण से निराकरण हो जाता है । अतएव उसके निराकरण के लिए पृथक यत्न नहीं किया जाता ॥ ३३ ॥

जैसे स्याद्वाद में एकधर्मी में विरुद्ध धर्मों ( सत्त्व और असत्त्व ) का असंभव दोष प्रसक्त है, और सत्यानन्दी - दीपिका * अर्हन् मुनि अनादि सिद्ध नित्य मुक्त जीव है, अन्य जीव साधनोंके अनुष्ठानसे मुक्त होते हैं और मोक्षके साधनोंका अनुष्ठान न करनेवाले दूसरे जीव बद्ध कहे जाते हैं । इस प्रकार अपने शास्त्रमें जिनका स्वभाव निश्चित किया है । अब ' स्यादस्ति ' ' स्यान्नास्ति ' इत्यादि कल्पना के होनेसे उनका भी स्वभाव वैसा नहीं रहेगा, इत्यादि दोष होंगे ॥ ३३ ॥

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अधि ० ६ सू ० ३५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो- दीपिकासहित ४५ ९ शरीरपरिमाणतायां च सत्यामकृत्स्नोऽसर्वगतः परिच्छिन्न आत्मेत्यतो घटादिवदनित्यत्व-मात्मनः प्रसज्येत | शरीराणां चानवस्थितपरिमाणत्वान्मनुष्य जीवो मनुष्यशरीरपरि-माणो भूत्वा पुनः केनचित्कर्मविपाकेन हस्तिजन्म प्राप्नुवन्न कृत्स्नं हस्तिशरीरं व्याप्नुयात्, पुत्तिकाजन्म च प्राप्नुवन्न कृत्स्नः पुत्तिकाशरीरे संमीयेत । समान एष एकस्मिन्नपि जन्मनि कौमारयौवनस्थाविरेषु दोषः । स्यादेतत् - अनन्तावयवो जीवस्तस्य त एवा-वयवा अल्पे शरीरे संकुचेयुर्महति च विकसेयुरिति । तेषां पुनरनन्तानां जीवावयवानां समानदेशत्वं प्रतिहन्यते वा न वेति वक्तव्यम् । प्रतिघाते तावन्नानन्तावयवाः परिच्छिन्ने देशे संमीयेरन् । अप्रतिघातेऽप्येकावयवदेशत्वोपपत्तेः सर्वेषामवयवानां प्रथमानुप-पत्तेर्जीवस्याणुमात्रत्वप्रसङ्गः स्यात् । अपि च शरीरमात्र परिच्छिन्नानां जीवावयवानामा-नन्त्यं नोत्प्रेक्षितुमपि शक्यम् ॥ ३४ ॥

अथ पर्यायेण बृहच्छरीरप्रतिपत्तो के चिज्जीवावयवा उपगच्छन्ति तनुशरीरप्रति-पत्तौ च केचिदपगच्छन्तीत्युच्येत तत्राप्युच्यते-न च पर्यायादप्यविरोधी विकारादिभ्यः ॥ ३५ ॥

पदच्छेद – न, च, पर्यायात्, अपि, अविरोधः " ", विकारादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( पर्यायादपि ) क्रमशः अवयवोंके हटने और प्राप्त होनेपर भी ( न अविरोधः ) शरीरपरिमाणत्वका अविरोध नहीं है, ( विकारादिभ्यः ) क्योंकि सावयव होनेसे आत्मामें विकार आदि दोष प्रसक्त होंगे और आत्माके अनित्य होनेपर बन्ध और मोक्ष व्यवस्था बाधित होगी । * न च पर्यायेणाप्यवयत्रोपगमपगम ( भ्यमेतद्देहपरिमाणत्वं जीवस्याविरोधेनोप-जीवात्माका भी परिछिनत्व दूसरा दोष प्रसक्त होगा, कैसे? ऐसे कि जीव शरीर परिमाणवाला है ऐसा आहंत लोग मानते हैं । शरीर परिमाणत्व होनेपर आत्मा अकृत्स्न - असवंगत परिच्छिन्न होगा, इससे आत्माको घट आदिके समान अनित्यत्व प्रसक्त होगा । शरीरोंका अनिश्चित परिमाण होनेसे मनुष्य-जोव मनुष्यशरीरपरिमाण होकर पुनः किसी कर्मविपाकसे हस्तिजन्म प्राप्त कर सम्पूर्णं हस्ति शरीरको व्याप्त नहीं करेगा और चींटोका जन्म पाकर पूर्णरूपसे चींटीके शरीर में नहीं समायेगा । एक जन्म में भी कोमार, यौवन, वार्द्धक्य में यह दोष समान है । पूर्वपक्षी - परन्तु जीव अनन्त अवयववाला है, उसके वे हो अवयव अन शरीरमें संकुचित होंगे और बड़े शरीरमें विकसित होंगे, यदि ऐसा हो, तो पुनः जीवके उन अनन्त अवयवोंके एक देशत्वका प्रतिघात होता है कि नहीं? यह कहना चाहिए । प्रतिघात होनेपर तो अनन्व अवयव परिच्छिन्न देयमें नहीं समायेंगे, और अपविघात होनेपर भी एक अवयव देशत्वको उपपत्ति होनेसे सब अवयवोंको प्रथिमा स्थूलता अनुपपन्न होनेसे जीवको अणुमात्रत्व प्रसङ्ग होगा, और शरोरमात्र परिच्छिन्न जीव अवयवोंके आनन्त्यकी कल्पना नहीं की जा सकती || ३४ || ऐसा यदि कहो कि क्रमसे बृहत् शरीर प्राप्त होनेपर कुछ जीवावयव पास आ जाते हैं और अल-शरीर प्राप्त होनेपर कुछ जीवावयव दूर हो जाते हैं, तो इसपर कहते हैं-और क्रमशः अवयवोंके आने और जानेसे जीवमें देहगत परिमाणत्वका अविरोधसे उपपादान सत्यानन्दो- दीपिका * जीव अनन्त अवयव है, अतः जिस प्रकार घटमें दीपकके अवयव संकुचित और गृहमें विक-सित होते हैं, वैसे जीव अवयव भी छोटे बड़े शरीरमें जाकर संकुचित और विकसित होते हैं । परन्तु दीपकका उदाहरण असंगत है, क्योंकि दीपकका घटमें प्रदीप्त प्रकाश और गृहमें विस्तृत होनेसे मन्द होता है । इस प्रकार चोंटो शरोरमें जानेपर चेतनता महानू होगी और हस्ति शरीरमें विस्तृत होनेसे चेतनता अल्प होगा, इस प्रकार अवयवोंके संकोच और विकास में दोष है और लोक विरुद्ध भी है ॥३४ ॥

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ पादयितुं शक्यते । कुतः? विकारादिदोषप्रसङ्गात् । अवयवोपगमापगमाभ्यां ह्यनिशमापूर्य-माणस्यापक्षीयमाणस्य च जीवस्य विक्रियावत्त्वं तावदपरिहार्यम्, विक्रियावत्त्वे च चर्मा-दिवदनित्यत्वं प्रसज्येत ततश्च बन्धमोक्षाभ्युपगमो बाध्येत, कर्माटकपरिवेष्ठितस्य जीव-स्यालाबुवत्संसारसागरे निमग्नस्य बन्धनोच्छेदादूर्ध्वगामित्वं भवतीति । किचान्यत्-आगच्छतामपगच्छतां चावयवानामागमापायधर्मवत्त्वादेवानात्मत्वं शरीरादिवत् । तत-श्चावस्थितः कश्चिदवयव आत्मेति, नच स निरूपयितुं शक्यतेऽयमसाविति । किंचान्यत्-आगच्छन्तश्चैते जीवावयवाः कुतः प्रादुर्भवन्त्यपगच्छन्तश्च क्व वा लीयन्त इति वक्तव्यम् । नहि भूतेभ्यः प्रादुर्भवेयुर्भूतेषु च निलीयेरन्; अभौतिकत्वाज्जीवस्य । नापि कश्चिदन्यः . साधारणोऽसाधारणो वा जीवानामवयवाधारो निरूप्यते; प्रमाणाभावात् । किंचान्यत्-अनवधृतस्वरूपश्चैवंसत्यात्मा स्यात् । आगच्छतामपगच्छतां चावयवानामनियतपरिमा णत्वात् । अत एवमादिदोषप्रसङ्गान्न पर्यायेणाप्यवयवोपगमापगमाचात्मन आश्रयितुं शक्येते । * अथवा पूर्वेण सूत्रेण शरीरपरिमाणस्यात्मन उपचितापचितशरीरान्तरप्रति-नहीं किया जा सकता किससे? इससे कि विकार आदि दोषों का प्रसङ्ग है । अवयवोंके आगमन और गमनसे सर्वदा पूर्ण और अपक्षय होते हुए जीवका विकारवत्त्व अपरिहार्य होगा और विकारयुक्त होने-पर चर्मके समान उसे अनित्यत्वं प्रसक्त होगा, उससे बन्ध मोक्षका स्वीकार बाधित होगा । आठ प्रकारके कर्मोंसे परिवेष्टित संसार सागर में निमग्न जीव बंधन के उच्छेद होनेके अनन्तर तुम्बीके समान ऊर्ध्वगामी होता है, और दूसरी बात यह है- आने और जानेवाले अवयव आगम और अपाय धर्मं युक्त होनेसे शरीरके समान अनात्मा होंगे, उससे अवस्थित कोई अवयव आत्मा होगा, वह यही है, ऐसा उसका निरूपण नहीं किया जा सकता । किंचान्यत् - आते हुए इतने जीव अवयव कहाँसे प्रादुर्भूत होते हैं और जाते हुए किसमें विलीन होते हैं, यह कहना चाहिए? भूतोंसे आविर्भूत होंगे और भूतों में विलीन होंगे, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि जीव अभौतिक है । इस प्रकार जीओोंके अवयवोंका साधारण अथवा असाधारण किसी दूसरे आधारका निरूपण नहीं किया जाता, क्योकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है | किंचान्यत् - ऐसा होनेपर आत्माका स्वरूप अनिश्चित ही रहेगा, कारण कि आने और जानेवाले अवयवोंका अनियत परिमाण है । अतएव इत्यादि दोषोंके प्रसंगसे क्रमसे भी अवयवोंका आगमन और गमन आत्मामें स्वीकार नहीं किया जा सकता है । अथवा पूर्वसूत्र से शरीरपरिमाणवाले आत्माको उपचित, अपचित अन्य शरीरके प्राप्त ह नेपर अकृत्स्त प्रसङ्ग होगा, इससे अनित्यताकी शङ्का सत्यानन्दी -दीपिका * तुम्हारे मतमें जीवके अवयव आने और जानेवाले हैं । तो वे अवयत्र आत्मा हैं अथवा नहीं? प्रथमपक्ष ' विकारादिदोष: ' आदिसे कहते हैं । द्वितीयपक्ष - जीवके अवयव शरीर के समान अनात्मा हैं, तो उनके ज्ञानसे मोक्ष नहीं होगा, जैसे अनात्मशरीर आदिके ज्ञानसे मोक्ष नहीं होता । दूसरी बात यह है कि उन जीवावयवोंका भी ज्ञान नहीं कि कितने हैं, अतः उनके ज्ञान न होनेसे भी • मोक्ष नहीं होगा । यदि कहो कि स्थिर एक अवयव आत्मा है, तो ' वह यही है ' ऐसा अनुसंन्धान नहीं होगा, अवयव परमाणुरूप होने से अतीन्द्रिय हैं । यदि आत्मा अवयवी है, तो अनित्य होगा । अवयवोंका समुदाय मानें, तो असत् होगा । जीवके प्रत्येक अवयवमें चेतनता है अथवा अवयव समूहमें? यदि प्रत्येक अवयवमें है तो सब एक अभिप्रायवाले न होनेसे कोई भी कार्य नहीं होगा । समुदाय में है, तो हस्ति शरीर में व्याप्त न होनेसे कुछ भाग चेतनता रहित होनेसे जड़ होगा, और चींटी शरीरमें पूर्ण-रूपसे न जा सकनेके कारण उनमें चेतनता नहीं आयगी,, इत्यादि दोषोंसे आगमन और गमन अवयवों-वाला आत्मा नहीं हो सकता ।

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अधि ० ७ सू ० ३६-३७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित I पत्तावकात्र्त्यप्रसञ्जनद्वारेणानित्यतायां चोदितायां पुनः पर्यायेण परिमाणानवस्थानेऽपि स्रोतः संताननित्यतान्यायेनात्मनो नित्यता स्यात् । यथा रक्तपटानां विज्ञानानवस्थानेऽपि तत्संताननित्यता तद्वद्वि सिचामपीत्याशङ्कयानेन सूत्रेणोत्तरमुच्यते । संतानस्य तावद -वस्तुत्वे नैरात्म्यवादप्रसङ्गः । वस्तुत्वेऽप्यात्मनो विकारादिदोषप्रसङ्गादस्य पक्षस्यानुप-पत्तिरिति ॥ ३५ ॥

अन्त्यावस्थितेश्वोमयनित्यत्वादविशेषः ॥ ३६ । पदच्छेद - अन्त्यावस्थिते:, च, उभयनित्यत्वात्, अविशेषः । सूत्रार्थ -- ( अन्त्यावस्थितेः ) मोक्षावस्थापन्न जीवपरिमाण नित्य होनेसे ( उमयनित्यत्वात् ) आदि और मध्य परिमाणों में ( च ) मी नित्यत्व प्रसङ्ग होगा, इससे ( अविशेष: ) तीनों परिमाणोंमें साम्य हो जायगा, अतः बौद्धमतके समान यह मत भी अप्रामाणिक है । अपि चान्त्यस्य मोक्षावस्थाभाविनो जीवपरिमाणस्य नित्यत्वमिष्यते जैनैः । तद्व-त्पूर्वयोरप्याद्यमध्यमयोर्जीव परिमाणयोर्नित्यत्वप्रसङ्गादविशेषप्रसङ्गः स्यात् । एकशरीर-परिमाणतैव स्यान्नोपचितापचितशरीरान्तरप्राप्तिः । अथवाऽन्त्यस्य जीवपरिमाणस्या-वस्थितत्वात्पूर्वयोरप्यवस्थयोरवस्थितपरिमाण एव जीवः स्यात्, ततश्चाविशेषेण सर्वदैवाणुर्महान्वा जीवोऽभ्युपगन्तव्यो न शरीरपरिमाणः । अतश्च सौगतवदार्हतमपि मतमसंगत मित्युपेक्षितव्यम् ॥ ३६ ॥

( ७ पत्यधिकरणम् । ३७-४१ ) पत्युरसामञ्जस्यात् ॥ ३७ ॥

पदच्छेद – पत्युः, असामञ्जस्यात् । सूत्रार्थ - ( पत्युः ) ईश्वर प्रधान आदि उपादानोंका प्रेरक होनेसे जगत्‌का निमित्तकारण नहीं हो सकता, ( असामञ्जस्यात् ) क्योंकि विषम सृष्टिमें प्रवृत्त होनेसे राग द्वेष आदि के प्रसङ्गसे असंगत है । होनेपर पुनः क्रमसे परिमाण अनिश्चित होता है, तो मी जैसे स्रोतका सन्तान ( प्रवाह ) नित्य है उस न्यायसे वैसे आत्मा नित्य होगा । अथवा जैसे रक्त वस्त्रोंमें बौद्ध विज्ञानकी अवस्थिति न होनेपर भी उसका सन्तान नित्य है, वैसे ही दिगम्बरका सन्तान नित्य है, इस प्रकारकी शङ्काकर इस सूत्रसे उत्तर कहते हैं | सन्तानके अवस्तु होनेपर नैरात्म्यवाद प्रसङ्ग होगा, सन्तान के वस्तु होनेपर भी आत्मा के विकार आदि दोषोंका प्रसङ्ग होने से इस पक्षकी अनुपपत्ति है ॥ ३५ ॥

और अन्त्य - मोक्षावस्था भावी जीवपरिमाणको जैन नित्य मानते हैं, उसी प्रकार पूर्वके आदि और मध्य जीवपरिमाणोंको नित्यत्व प्रसङ्ग होनेसे तीनों परिमाण समान हो जायेंगे । यदि एक शरीर परिमाणके समान आत्मा होगा तो उसे अन्य स्थूल और सूक्ष्म शरीरको प्राप्ति नहीं होगी । अथवा अन्तिम जीवपरिमाणके अवस्थित होनेसे पूर्व अवस्थाओं में भी जीव अवस्थित परिमाणवाला ही होगा, उससे समानरूपसे सर्वदा ही जीव अणु अथवा महान् स्वीकार करना चाहिए शरीर परिमाण-वाला नहीं, इसलिए बौद्धमत के समान आहंतमत मी असंगत है, अतः वह उपेक्षणीय है ॥ ३६ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * अब दूसरी रीतिसे खण्डन करते हैं - यदि कहो कि वैनाशिक रक्त वस्त्र आदिमें विज्ञानको स्थिति न होनेपर भी विज्ञानका प्रवाह नित्य मानते हैं, वैसे आत्मा मी नित्य होगा? तो सन्तान अवस्तु है कि वस्तु? यदि सन्तान अवस्तु है तो उसे आत्मा माननेसे शून्यवाद प्रसक्त होगा । यदि सन्तान वस्तु है, तो वह विज्ञान- सन्तानीसे भिन्न है कि अभिन्न? यदि भिन्न है तो नित्य होने से कूटस्थ आत्मवाद प्रसक्त होगा । यदि अभिन्न है, तो क्षणिक होने से अनित्यत्व आदि पूर्वोक्त दोष प्रसक्त होंगे, इसलिए सन्तान प्रवाह पक्ष अनुपपन्न है ॥३५ ॥

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ * इदानीं केवलाधिष्ठात्री श्वरकारणवादः प्रतिषिध्यते । तत्कथमवगम्यते? ' प्रकृ-तिश्च प्रतिज्ञादृष्ठान्तानुपरोधात् ', ' अभिध्योपदेशाच्च ' ( ब ० १।४।२३ - २४ ) इत्यत्र प्रकृतिभावेनाधि-ष्ठातृभावेन चोभयस्वभावस्येश्वरस्य स्वयमेवाचार्येण प्रतिष्ठापितत्वात् । यदि पुनर-विशेषेणेश्वरकारणवादमात्रमिह प्रतिषिध्येत पूर्वोत्तर विरोधाद्व्याहताभिव्याहारः सूत्र-कार इत्येतदापद्येत । तस्मादप्रकृतिरधिष्ठाता केवलं निमित्तकारणमीश्वर इत्येष पक्षो वेदान्तविहितब्रह्मैकत्वप्रतिपक्षत्वाद्यत्नेनात्र प्रतिषिध्यते । सा चेयं वेदबाह्येश्वर कल्पना-नेकप्रकारा- केचित्तावत्सांख्ययोगव्यपाश्रयाः कल्पयन्ति - प्रधानपुरुषयोरधिष्ठाता केवलं निमित्तकारणमीश्वर इतरेतरविलक्षणाः प्रधानपुरुषेश्वरा इति । माहेश्वरास्तु मन्यन्ते - कार्यकारणयोगविधिदुःखान्ताः पञ्च पदार्थाः पशुपतिनेश्वरेण पशुपाशविमो -क्षणायोपदिष्टाः, पशुपतिरीश्वरो निमित्तकारणमिति वर्णयन्ति । तथा वैशेषिकादयोऽपि केचित्कथंचित्स्वप्रक्रियानुसारेण निमित्तकारणमीश्वर इति वर्णयन्ति । अत उत्तर-मुच्यते - ' पत्युरसामञ्जस्यात् ' इति । पत्युरीश्वरस्य प्रधानपुरुषयोरधिष्ठातृत्वेन जग-त्कारणत्वं नोपपद्यते । कस्मात्? असामञ्जस्यात् । किं पुनरसामञ्जस्यम्? हीनमध्य अब केवल आष्टा ( निमित्त ) ईश्वर कारणवादका प्रतिषेत्र किया जाता है । वह कैसे अवगत हो? कारण कि ' प्रकृतिश्च ० ' ' अभिध्योपदेशाच्च ' इन सूत्रोंमें प्रकृतिरूपसे और अधिष्ठातृ-रूपसे उभयस्वभाव ईश्वरको आचार्यने स्वयं ही प्रतिष्ठापित किया है । यदि यहाँ समानरूपसे ईश्वर कारणवादमात्रका प्रतिषेध किया जाय, तो पूर्वोत्तरका विरोध होनेसे सूत्रकार परस्पर विरुद्ध वचन कहते हैं, ऐसा प्रसक्त होगा । इसलिए ईश्वर प्रकृति नहीं है अधिष्टाता - केवल निमित्त कारण है, इस पक्षका वेदान् विहित ब्रह्मैकत्वके विरोधी होने से यहाँ यत्नसे प्रतिषेव किया जाता है । वह वेद बाह्य ईश्वरकल्पना अनेक प्रकारकी है । कुछ लोग तो सांख्ययोगका आश्रयकर कल्पना करते हैं- प्रधान और पुरुषका अधिष्ठाता ईश्वर केवल निमित्तकारण है, प्रधान, पुरुष और ईश्वर ये परस्पर विल-क्षण हैं । माहेश्वर तो ऐसा मानते हैं - कार्य, कारण, योग, विधि और दुःखान्त ( मोक्ष ) ये पाँच पदार्थं पशुपति ईश्वरसे पशुपाश - जीवबन्धके विनाशके लिए उपदिष्ट हैं । पशुपति ईश्वर निमित्त-कारण है, ऐसा वर्णन करते हैं । उसीप्रकार कोई वैशेषिक आदि मो कथंचित् अपनी प्रक्रिया के अनुसार ईश्वर निमित्तकारण है, ऐसा वर्णन करते हैं । सिद्धान्ती - इससे उत्तर कहते हैं- ' पत्युरसा-मञ्जस्यात् ' पति - ईश्वर प्रधान और पुरुषका अधिष्ठातृरूपसे जगत्का कारण नहीं हो सकता, किससे? इससे कि असामञ्जस्य है । पुनः वह असामञ्जस्य क्या है? होन, मध्यम और उत्तममावसे भिन्न - भिन्न प्राणियों को सत्यानन्दी - दीपिका # दिगम्बर जैनमतका निराकरणकर अब बुद्धिस्थ शैव मतका निराकरण कहते हैं - वेदान्तमें ईश्वर उपादान और निमित्तकारण कहा गया है । शैव ईश्वरको केवल निमित्तकारण मानते हैं, जैसे सत्य और असत्य एकत्र संभव नहीं हैं, वैसे उपादान और निमित्त भी नहीं है, क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि कार्य घटके प्रति मृत्तिका उपादानकारण है और कुलाल निमित्तकारण है, उसी प्रकार कार्यं प्रपञ्चके प्रति भी ईश्वर केवल निमित्तकारण है । इस प्रकार पूर्वपक्ष करते हुए अवान्तर भेद दिखाते हैं - यहाँ सांख्य शब्दसे ईश्वर वादी पातञ्जलका ग्रहण है । शैव, पाशुपत, कारुणिक-सिद्धान्ती और कापालिक इस प्रकार माहेश्वरके चार भेद हैं 1 । ये सब महेश्वरसे उपदिष्ट शास्त्र के अनुयायी होने से माहेश्वर कहलाते हैं । जीव पशु है और कमं बन्धन पाश है, उसकी निवृत्तिके लिए पशुपति ईश्वरने पाँच पदार्थोंका उपदेश किया है । कार्य- महद् आदि, कारण प्रधान और ईश्वर, योग - मनकी समाहित अवस्था, विधि - त्रिषवण स्नान आदि और दुःखान्त मोक्ष | माहेश्वर आगम

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अधि ० ७ सू ० ३८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४६३ मोत्तमभावेन हि प्राणिभेदान्विदधत ईश्वरस्य ईश्वरस्य रागद्वेषादिदोषप्रसक्तेरस्मदादि-वदनीश्वरत्वं प्रसज्येत । प्राणिकर्मापेक्षितत्वाददोष इति चेत् — नः कर्मेश्वरयोः प्रवर्त्य -प्रवर्तयितृत्वे इतरेतराश्रयदोषप्रसङ्गात् । नः अनादित्वादिति चेत् - नः वर्तमानकाल-वदतीतेष्वपि कालेष्वितरेतराश्रयदोषाविशेषादन्धपरम्परान्यायापत्तेः । अपि च ' प्रवर्तनालक्षणा दोषाः ' ( न्याय - सू ० १।१।१८ ) इति न्यायवित्समयः । नहि कश्चिददो-प्रयुक्तः स्वार्थे परार्थे वा प्रवर्तमानो दृश्यते । स्वार्थ प्रयुक्त एव च सर्वा जनः परार्थेऽपि पवर्तत इत्येवमप्यसामञ्जस्यम्: स्वार्थवत्त्वादीश्वरस्यानीश्वरत्वप्रसङ्गात् । पुरुषविशेष-त्वाभ्युपगमाच्चेश्वरस्य, पुरुषस्य चौदासीन्याभ्युपगमादसामञ्जस्यम् ॥ ३७ ॥

संबन्धानुपपत्तेश्च ॥ ३८ ॥

पदच्छेद – सम्बन्धानुपपत्तेः, च । सूत्रार्थ - और प्रेर्य प्रधान आदिके साथ प्रेरक ईश्वरके सम्बन्धकी अनुपपत्ति होनेसे ईश्वर प्रेरक नहीं हो सकता । * पुनरप्यसामञ्जस्यमेव, न हि प्रधानपुरुषव्यतिरिक्त ईश्वरोऽन्तरेण संबन्धं प्रधान-पुरुषयोरीशिता । न तावत्संयोगलक्षणः संबन्धः संभवति, प्रधानपुरुषेश्वराणां सर्व-गतत्वान्निरवयवत्वाच्च । नापि समवायलक्षणः संबन्धः; आश्रयाश्रयिभावानिरूपणात् । नाप्यन्यः कश्चित्कार्यगम्यः संबन्धः शक्यते कल्पयितुं, कार्यकारणभावस्यैवाद्याप्यसिद्ध-उत्पन्न करनेवाले ईश्वरमें राग, द्वेष आदि दोषोंके प्रसंग होनेसे हमलोगों के समान अनीश्वरत्व प्रसक्त होगा । यदि कहो कि प्राणियोंके कर्मों की अपेक्षा होनेसे दोष नहीं है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि कर्म और ईश्वरका प्रवर्त्य और प्रवर्तयितृभाव होनेपर अन्योन्याश्रय दोष प्रसङ्ग होगा । ऐसा नहीं, क्योंकि वह अनादि है, ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि वर्तमान कालके समान अतीत कालोंमें भी अन्योन्याश्रय दोष समान होनेसे अन्धपरम्परा न्याय प्रसक्त होगा । और ' प्रवर्तनालक्षणा दोषाः ' ( प्रवृत्ति के हेतुभूत दोष हैं ) यह न्यायवेत्ताओं का सिद्धान्त है । कोई भी दोष के विना स्वार्थं अथवा परार्थमें प्रवृत्त हुआ नहीं देखा जाता | स्वार्थमें प्रयुक्त हुआ ही सब लोग परार्थमें भी प्रवृत्त होते हैं, यह भी असामञ्जस्य- असंगत है, कारण कि स्वार्थं युक्त होनेसे ईश्वरमें मनोश्वरत्व प्रसङ्ग होगा । ईश्वरको पुरुषविशेष स्वीकार किया गया है और पुरुषमें मोदासीन्य माना गया है यह असंगत है ॥ ३७ ॥

फिर भी असामञ्जस्य ही है, क्योंकि प्रधान और पुरुष से भिन्न ईश्वर सम्बन्धके विना प्रधान मोर पुरुषका ईशिता नहीं है, इनका संयोगरूप सम्बन्ध तो नहीं हो सकता, कारण कि प्रधान, पुरुष और ईश्वर सवंगत और निरवयव हैं, एवं समवायरूप सम्बन्ध भी नहीं हो सकता, क्योंकि आश्रया-श्रावका निरूपण नहीं है । उसी प्रकार कार्यंगम्य अन्य कोई सम्बन्ध भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, कारण कि अमितक कार्य कारणभाव ही असिद्ध है । यदि कहो कि ब्रह्मवादीके मत में किस सत्यानन्दी - दीपिका प्रमाणसे ईश्वर निमित्त कारण है । और वैशेषिक यादि ' जगत् सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत् ' ( जगत् सकतृक है, क्योंकि कार्यं है जैसे घट ) इस प्रकार अनुमान आदि द्वारा कार्य जगत् के प्रति ईश्वरको निमित्तकारण मानते हैं ॥ ३७ ॥

* ' देवात्मशक्तिम् ० ' ( श्वे ० १ ३ ) ब्रह्मवादी तो माया और ब्रह्मका अनिवर्चनीय तादात्म्य सम्बन्ध मानते हैं, इससे कोई दोष नहीं है 1 । बौर वेदको स्वतः प्रमाण मानने से मृत्तिका, कुम्हार आदि लौकिक दृष्टान्तोंकी अपेक्षा ही नहीं है ॥ ३८ ॥

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IIIII ब्रह्म सूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ त्वात् ब्रह्मवादिनः कथमिति चेत् - नः तस्य तादात्म्यलक्षणसंबन्धोपपत्तेः । अपि चागस-बलेन ब्रह्मवादी कारणादिस्वरूपं निरूपयतीति नावश्यं तस्य यथादृष्टमेव सर्वमभ्युपगन्त-व्यमितिनियमो ऽस्ति, परस्य तु दृष्टान्तबलेन कारणादिस्वरूपं निरूपयतो यथादृष्टमेव सर्व-मभ्युपगन्तव्यमित्ययमस्त्यतिशयः । परस्यापि सर्वज्ञप्रणीतागमसद्भावात्समानमागम-बलमिति चेत् - नः इतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गात् - आगमप्रत्ययात्सर्वज्ञत्वसिद्धिः सर्वज्ञ प्रत्यया-च्चागमसिद्धिरिति । तस्मादनुपपन्ना सांख्ययोगवादिनामीश्वर कल्पना । एवमन्यास्वपि वेदबाह्यास्वीश्वरकल्पनासु यथासंभवमसामञ्जस्यं योजयितव्यम् ॥ ३८ ॥

अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ ३ ९ ॥ पदच्छेद- अधिष्ठानानुपपत्तेः, च । सूत्रार्थ — और ईश्वर रूपादि हीन प्रधानका प्रेरक न होनेसे निमित्तकारण नहीं हो सकता है । इतश्चानुपपत्तिस्तार्किकपरिकल्पितस्येश्वरस्य । सहि परिकल्प्यमानः कुम्भकार इव मृदादीनि प्रधानादीन्यधिष्ठाय प्रवर्तयेत् । न चैवमुपपद्यते । न ह्यप्रत्यक्षं रूपादिहीनं च प्रधानमीश्वरस्याधिष्ठेयं संभवति; मृदादिवैलक्षण्यात् ॥ ३ ९ ॥ करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥ ४० ॥

पदच्छेद -- करणवत्, चेत्, न, भोगादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( करणवत् ) अप्रत्यक्ष होनेपर जैसे इन्द्रियां जीवसे प्रेरित होती हैं, वैसे ही अप्रत्यक्ष प्रधान भी ईश्वरसे प्रेरित हो जायगा, ( चेन्न ) तो यह युक्त नहीं है । ( भोगादिभ्यः ) क्योंकि ऐसा होनेपर जीवके समान ईश्वरको भी भोग आदि प्रसक्त होंगे । स्यादेतत् - यथा करणाग्रामं चक्षुरादिकमप्रत्यक्षं रूपादिहीनं च पुरुषोऽधितिष्ठत्येवं प्रधानमपीश्वरोऽधिष्ठास्यतीति । तथापि नोपपद्यते, भोगादिदर्शनाद्धि करणग्रामस्याधिष्ठि-तत्वं गम्यते । न चात्र भोगादयो दृश्यन्ते । करणग्राम साम्ये चाभ्युपगम्यमाने संसारिणा-प्रकार होता है? तो यह युक्त नहीं, क्योंकि उसके मत में तादात्म्यरूप सम्बन्ध उपपन्न है । और ब्रह्म-वादी तो आगमबलसे कारण आदिका स्वरूप निरूपण करते हैं, इसलिए उसके लिए यह नियम नहीं है कि यथादृष्ट ही अवश्य सबको स्वीकार करना चाहिए । दृष्टान्तबलसे कारण आदिका स्वरूप निरूपण करते हुए पूर्वपक्षीको तो यथादृष्ट ही सब स्वीकार करना चाहिए, यह विशेष है । यदि कहो कि प्रति-पक्षीको भी सर्वज्ञ प्रणीत आगमके सद्भावसे आगमबल समान है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि आगम-ज्ञानसे सर्वज्ञत्वसिद्धि और सर्वज्ञत्व के ज्ञानसे आगमसिद्धि, इसप्रकार अन्योन्याश्रय प्रसङ्ग है । इससे सांख्ययोगवादीकी ईश्वर कल्पना अयुक्त है । इसी प्रकार वेद बाह्य अन्य ईश्वर कल्पनाओं में मी यथा सम्भव असामञ्जस्यकी योजना करनी चाहिए ॥ ३८ ॥

और इससे भी तार्किक परिकल्पित ईश्वरकी अनुपपत्ति है । जैसे कुम्हार मृत्तिका आदिको अधिष्ठितकर प्रवृत्त करता है, वैसे वही परिकल्पित हुआ ( ईश्वर ) प्रधान आदिको अधिष्ठितकर प्रवृत्त करेगा । परन्तु इसप्रकार उपपन्न नहीं होता, क्योंकि अप्रत्यक्ष और रूप आदि हीन प्रधान ईश्वरका अधिष्ठेय नहीं हो सकता, कारण कि वह मृत्तिका आदिसे विलक्षण है ॥ ३ ९ ॥ ऐसा हो, परन्तु जैसे अप्रत्यक्ष, रूप आदि रहित ( उद्भूत रूप आदि रहित ) नेत्र आदि करण समुदायको पुरुष अधिष्ठित करता है, वैसे ईश्वर प्रधानको मी अधिष्ठित करेगा । उस प्रकार भी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि भोगादिके दर्शनते ही करण समुदायका अधिष्ठित्व अवगत होता है । परन्तु यहाँ ( ईश्वर में ) भोग आदि नहीं देखे जाते । इन्द्रिय समुदाय के साथ ( प्रधानका ) साम्य स्वीकार किए

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अधि ० ७ ० ४१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४६५ मिवेश्वरस्यापि भोगादयः प्रसज्येरन् । अन्यथा वा सूत्रद्वयं व्याख्यायते - ' अधिष्ठानानु पपत्तेश्च'- इतश्चानुपपत्तिस्तार्किक परिकल्पितस्येश्वरस्य । साधिष्ठानो हि लोके सशरीरो राजा राष्ट्रस्येश्वरो दृश्यते, न निरधिष्ठानः, अतश्च तद्द्दृष्टान्तवशेनादृष्टमीश्वरं कल्पयितु-मिच्छत ईश्वरस्यापि किंचिच्छरीरं करणायतनं वर्णयितव्यं स्यात्, न च तद्वर्णयितुं शक्यतेः सृष्ट्युत्तरकालभावित्वाच्छरीरस्य प्राक्सृष्टे स्तदनुपपत्तेः । निरधिष्ठानत्वे चेश्वरस्य प्रवर्तकत्वानुपपत्तिः, एवं लोके दृष्टत्वात् । ' करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ' - अ लोक-दर्शनानुसारेणेश्वरस्यापि किंचित्करणानामायतनं शरीरं कामेन कल्प्येत, एवमपि नोप-पद्यते । सशरीरत्वे हि सति संसारिवद्भोगादिप्रसङ्गादीश्वरस्याप्यनीश्वरत्वं प्रसज्येत | ४० | अन्तवत्वमसर्वज्ञता वा ॥। ४१ ॥ पदच्छेद - अन्तवत्त्वम्, असर्वज्ञता, वा । सूत्रार्थ - प्रधान, जीव और अपनी संख्या ( वा ) अथवा परिमाणका निश्चय ईश्वर करता है कि नहीं? प्रथमपक्षमें ( अन्तवत्त्वम् ) परिच्छिन्न संख्या और परिच्छिन्न परिमाण होनेसे तीनों घटके समान विनाशी होंगे, द्वितीयपक्ष में ( असर्वज्ञता ) ईश्वर में असर्वज्ञत्व सिद्ध होगा, इससे माहेश्वर सिद्धान्त भ्रान्ति मूलक है । * इतश्चानुपपत्तिस्तार्किक परिकल्पितस्येश्वरस्य स हि सर्वज्ञस्तैरभ्युपगम्यतेऽ-नन्तश्च । अनन्तं च प्रधानमनन्ताश्च पुरुषा मिथो भिन्ना अभ्युपगम्यन्ते । तत्र सर्वज्ञेनेश्व-रेण प्रधानस्य पुरुषाणामात्मनश्चेयत्ता परिच्छद्येत वा न वा परिच्छद्येत । उभयथापि दोषो s नुषक्त एव । कथम्? पूर्वस्मिस्तावद्विकल्प इयत्तापरिच्छिन्नत्वात्प्रधानपुरुषेश्व-जानेपर संसारीके समान ईश्वरको भी भोग आदि प्रसक्त होंगे । अथवा इन दो सूत्रोंका अन्य रीति से व्याख्यान किया जाता है- ' अधिष्ठानानुपपत्तेश्व ' इससे तार्किक परिकल्पितं ईश्वरकी अनुपपत्ति है, क्योंकि लोकमें अधिष्ठान सहित सशरीर राजा राष्ट्रका ईश्वर देखा जाता है अधिष्ठान रहित नहीं । अतः उस दृष्टान्तके बलसे अदृष्ट ईश्वरकी कल्पना करनेकी इच्छा करनेवालेको ईश्वरका इन्द्रियोंका आयतन कोई शरीर वर्णयितव्य होगा । परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि शरीर तो सृष्टिके उत्तर कालमावी है, सृष्टिके पूर्व उसकी अनुपपत्ति है । निरधिष्ठान होनेपर ईश्वर प्रवर्तक नहीं हो सकता, कारण कि लोकमें ऐसा देखा गया है । ' करणवच्चेन्न मोगादिभ्यः ' यदि लोक दर्शनके अनुसार ईश्वरका मी इन्द्रियों का आश्रय कोई शरीर अपनी इच्छासे कल्पना करो, तो इसप्रकार भी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि सशरीर होनेपर संसारीके समान मोग आदि प्रसङ्ग होनेसे ईश्वरको भी अनीश्वरत्व प्रसक्त होगा || ४० || इससे भी तार्किक परिकल्पित ईश्वरकी अनुपपत्ति है, क्योंकि वही ईश्वर सर्वज्ञ और अनन्त है, ऐसा वे स्वीकार करते हैं, और प्रधान अनन्त है, पुरुष अनन्त हैं और परस्पर भिन्न हैं, ऐसा स्वीकार करते हैं । उनमें सर्वज्ञ ईश्वर से प्रधान, पुरुष और अपनी इयत्ता ( संख्या अथवा परिमाण ). जानी जाती है अथवा नहीं जानी जाती? दोनों प्रकारसे दोष प्रसङ्ग ही है, क्यों? पूर्वं विकल्पमें तो इयत्ता परिच्छिन्न होनेसे प्रधान, पुरुष और ईश्वरका अन्तवत्त्वं अवश्यंभावी है । कारण कि व्यवहार सत्यानन्दी - दीपिका * जिस प्रकार शुष्क तर्कसे ईश्वर में केवल कर्तृत्व अनुपपन्न है, उसी प्रकार ईश्वर में नित्यत्व मोर सर्वज्ञत्व भी अनुपपन्न हैं । ' प्रधानपुरुषेश्वरत्रयम्, अनित्यम्, इयत्तापरिच्छिन्नत्वात् घटवत् । ' ' प्रधान, पुरुष और ईश्वर तीनों अनित्य हैं, क्योंकि इयत्तासे परिच्छिन्न हैं जैसे घट | ॥४१ ॥

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४६६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य. [ अ ० २ पा ० २ राणामन्तवत्त्वमवश्यंभावि, एवं लोके दृष्टत्वात् । यद्धि लोक इयत्तापरिच्छिन्नं वस्तु पटादि तदन्तवद्दृष्टं तथा प्रधानपुरुषेश्वर त्रयमपीयत्तापरिच्छिन्नत्वादन्तवत्स्यात् । संख्यापरिमाणं तावत्प्रधानपुरुषेश्वर त्रय रूपेण परिच्छिन्नम्, स्वरूपपरिमाणमपि तद्गतमीश्वरेण परिच्छिद्येतेति । पुरुषगता च महासंख्या । ततश्चेयत्तापरिच्छिन्नानां मध्ये ये संसारिणः संसारान्मुच्यन्ते तेषां संसारोऽन्तवान्, संसारित्वं च तेषामन्तवत् । एवमितरेष्वपि क्रमेण मुच्यमानेषु संसारस्य संसारिणां चान्तवत्त्वं स्यात् । * प्रधानं च सविकारं पुरुषार्थमीश्वरस्याधिष्ठेयं संसारत्वेनाभिमतम्, तच्छ्रन्यतायामीश्वरः किम-घितिष्ठेत्? किंविषये वा सर्वज्ञश्वरते स्याताम्? प्रधानपुरुषेश्वराणां चैवमन्तवत्त्वे सत्यादिमत्त्वप्रसङ्गः, आद्यन्तवत्त्वे च शून्यवादप्रसङ्गः । अथ मा भूदेष दोष इत्युत्तरो विकल्पोऽभ्युपगम्येत, न प्रधानस्य पुरुषाणामात्मनश्चेयत्तेश्वरेण परिच्छिद्यत इति, तत ईश्वरस्य सर्वज्ञत्वाभ्युपगमहानिरपरो दोषः प्रसज्येत । तस्मादप्यसंगत स्तार्किक परि-गृहीत ईश्वरकारणवादः ॥ ४१ ॥

( ८ उत्पत्त्यसंभवाधिकरणम् । सू ० ४२-४५ ) उत्पत्यसंभवात् ॥ ४२ ॥

सूत्रार्थ - वासुदेवसे जीवकी उत्पत्तिका संभव न होनेसे भागवत मत असंगत है । * येषामप्रकृतिरधिष्ठाता केवलनिमित्तकारणमीश्वरोऽभिमतस्तेषां पक्षः प्रत्या-ख्यातः । येषां पुनः प्रकृतिश्चाधिष्ठाता चोभयात्मकं कारणमीश्वरोऽभिमतस्तेषां पक्षः प्रत्याख्यायते । ननु श्रुतिसमाश्रयणेनाप्येवंरूप एवेश्वरः प्रा निर्धारितः - प्रकृतिश्चाधिष्ठाता में ऐसा देखा जाता है । लोकमें जो इयत्ता परिच्छिन्न पट आदि वस्तु है वह अन्तवान् देखी गई है, इसी प्रकार प्रधान, पुरुष और ईश्वर तोनों भी इयत्ता परिच्छिन्न होनेसे अन्तवान् होंगे । संख्या परिमाण तो प्रधान, पुरुष और ईश्वर त्रयरूपसे परिच्छिन्न हैं । उनमें स्थित स्वरूपपरिमाण मी ईश्वरसे जाना जाता है । पुरुषगत महासंख्या है । उससे इयत्तापरिच्छिन्नोंके मध्य में जो संसारी संसारसे मुक्त हो जाते हैं, उनका संसार अन्तवान् और उनका संसारित्व अन्तवान् होगा । इसप्रकार क्रमसे अन्यो मी मुक्त हो जानेपर संसार और संसारियोंका अन्तवत्त्व हो जायगा और विकार सहित प्रधान पुरुषके मोग और मोक्षके लिए ईश्वरका अधिष्ठेय है तथा संसाररूपसे अभिमत है, उसके शून्य होनेपर ईश्वर किसको अधिष्ठित करेगा अथवा किस विषय में सर्वज्ञत्व और ईश्वरत्व होगा? प्रधान, पुरुष और ईश्वरके इसप्रकार अन्तवत्त्व होनेपर आदिमान् होनेका प्रसङ्ग हो जायगा । एवं आदि और अन्तवाला होनेपर शून्यवाद प्रसङ्ग होगा । यह दोष न हो इसलिए यदि प्रधान, पुरुष और अपनी इयत्ता ईश्वरसे अवगत नहीं होती है, इस द्वितीय विकल्पको स्वीकार किया जाय, तो ईश्वरके सर्वज्ञत्व स्वीकारका त्याग दूसरा दोष प्रसक्त होगा, इससे भी तार्किक परिगृहीत ईश्वर कारणवाद असङ्गत है ॥४१ ॥

जिनको ईश्वर अप्रकृति — अनुपादान, अधिष्ठाता केवल निमित्त कारणरूपसे अभिमत है, उनके पक्षका निराकरण किया जा चुका है । परन्तु जिनको प्रकृति एवं अधिष्ठाता दोनों प्रकारके कारणरूपसे ईश्वर अभिमत है, अब उनके पक्षका निराकरण किया जाता है । परन्तु श्रुतिके आश्रयसे भी इसप्रकार का ईश्वर प्रकृति और अधिष्ठातारूपसे पूर्व में निर्धारित किया गया है । श्रुति अनुसारिणी स्मृति प्रमाण सत्यानन्दी -दीपिका * अब ईश्वरको उपादान और निमित्त दोनों कारण माननेवालोंके वेद अविरुद्ध अंशको स्वीकार कर वेदविरुद्ध जीवकी उत्पत्ति अंशका निराकरण करनेके लिए प्रत्युदाहरण संगति से इस अधिकरणका बारम्भ है |