श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 501–510

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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अधि ० ८ सू ० ४२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित III चेति । श्रुत्यनुसारिणी च स्मृतिः प्रमाणमिति स्थितिः । तत्कस्य हेतोरेष पक्षः प्रत्याचि-ख्यासित इति? उच्यते - यद्यप्येवं जातीय कोंऽशः समानत्वान्न विसंवादगोचरो भवत्यस्ति-त्वंशान्तरं विसंवाद स्थान मित्यतस्तत्प्रत्याख्यानायारम्भः । तत्र भागवता मन्यन्ते - भगवा-नेवैको वासुदेवो निरञ्जनज्ञानस्वरूपः परमार्थतत्त्वं स चतुर्धात्मानं प्रविभज्य प्रतिष्ठितः -वासुदेवव्यूहरूपेण, संकर्षणव्यूहरूपेण प्रद्युम्नव्यूहरूपेणानिरुद्धव्यूहरूपेण च । वासुदेवो नाम परमात्मोच्यते । संकर्षणो नाम जीवः । प्रद्युम्नो नाम मनः । अनिरुद्धो नामाहंकारः । तेषां वासुदेवः परा प्रकृतिरितरे संकर्षणादयः कार्यम् । तमित्थंभूतं परमेश्वरं भगवन्तमभि-गमनोपादानेज्या स्वाध्याययोगैर्वर्षशतमिष्टवा क्षीणक्लेशो भगवन्तमेव प्रतिपद्यते -इति । तत्र यत्तावदुच्येत योऽसौ नारायणः परोऽव्यक्तात्प्रसिद्धः परमात्मा सर्वात्मा स आत्मनात्मानमनेकधान्यूह्यावस्थित इति - तन्न निराक्रियते; ' स एकधा भवति त्रिधा भवति ' ( छा ० ७१२६१२ ) इयादिश्रुतिभ्यः परमात्मनाऽनेकधाभावस्याधिगतत्वात् । यदपि तस्य भगवतोऽभिगमनादिलक्षणमाराधनमजस्रमनन्यचित्ततयाभिप्रेयते तदपि न प्रतिषिध्यते; सी है, ऐसी स्थिति है, तो किस हेतुसे इस पक्ष के निराकरण करनेको इच्छा है? कहते हैं - यद्यपि इस प्रकारका अंश समान होनेसे विसंवादका विषय नहीं है, तो भी अन्य अंश विसंवादका स्थान है, इससे उसके निराकरणके लिए यह आरम्भ है । उस विषय में भागवत मानते हैं— केवल एक भगवान् वासुदेव ही निरञ्जन ज्ञानस्वरूप परमार्थतत्त्व है । वह अपनेको चार प्रकारसे विभक्तकर वासुदेवव्यूहरूपसे, संकर्षणव्यूहरूपसे, प्रद्युम्नब्यूहरूपसे और अनिरुद्धम्यूहरूपसे प्रतिष्ठित है । वासुदेव परमात्मा कहा जाता है, संकर्षण नाम जीव है । प्रद्युम्न नाम मन है और अनिरुद्ध नाम महङ्कार है । उनमें वासुदेव परा प्रकृति है और अन्य संकर्षण आदि कार्य हैं । इसप्रकारके उस भगवान् परमेश्वरकी अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय और योग द्वारा सौ वर्ष पूजाकर क्षीण क्लेश होकर जीव भगवान् को ही प्राप्त होता है । उसमें जो यह कहा जाता है कि जो वह नारायण अव्यक्तसे पर प्रसिद्ध परमात्मा सर्वात्मा है वह अपनेसे अपनेको अनेक प्रकारके व्यूहकर अवस्थित है, उसका निराकरण नहीं किया जाता, क्योंकि ' स ं एकधा भवति ' ० ( वह एक रूप होता है, तीन रूप होता हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे परमात्माका अनेक प्रकारका माव अधिगत होता है, और जो भी उस भगवान्का सदा अनन्य चित्तसे अभिगमन आदि रूप आराधन अभिप्रेत है, उसका भी प्रतिषेध नहीं किया जाता है, कारण कि श्रुति और स्मृतिमें ईश्वर प्रणिधान प्रसिद्ध है । परन्तु जो पुनः यह कहा जाता है - वासुदेवसे संकर्षण सत्यानन्दी - दीपिका * भागवत - पाँचरात्र आगम यहाँ विषय है । वह जीवके उत्पत्तिके अंश में प्रमाण है कि नहीं? ऐसा सन्देह होनेपर उसका बाधक उपलब्ध न होनेसे वह प्रमाणभूत है । पूर्वपक्ष में उसके आगमके साथ विरोध होने से जीवाभिन्न ब्रह्म समन्वयकी असिद्धि फल है । सिद्धान्तमें उस अंश में उस आगमके अप्रमाण होनेसे विरोध नहीं है, अतः जीवाभिन्न ब्रह्म समन्वयकी सिद्धि फल है । यहाँ व्यूहका अर्थ मूर्ति है । उस परमात्माकी प्राप्तिके साधन इस प्रकार हैं- वाक्, काय और चित्तको सावधानता पूर्वक देवगृहमें जाना अभिगमन है, पूजा योग्य द्रव्यका संग्रह उपादान है, इज्या - पूजा, स्वाध्याय- अष्टाक्षर आदि मन्त्र का जप, योग - ध्यान आदिसे बहुत वर्ष तक पूजा आदिकर क्षीण क्लेश होकर जीव भगवान्को प्राप्त होता है । ' समाहितः श्रद्धावितो भूत्वा ' ( समाहित और श्रद्धावान् होकर ) ' तं यथा यथोपासते ' ( जैसे जैसे उसकी उपासना करता है ) इत्यादि श्रुति और ' मत्कर्मकृन्मत्परमः ' ( गी ० १११५५ ) ( मेरे लिए कर्म करनेवाला है और मेरे ही परायण है ) इत्यादि स्मृतिमें ईश्वर प्रणिधान प्रसिद्ध है, षतः उसका प्रतिषेध नहीं किया जाता ।

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४६८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० २ श्रुतिस्मृत्योरीश्वरप्रणिधानस्यप्रसिद्धत्वात् । यत्पुनरिदमुच्यते - वासुदेवात्संकर्षण उत्प द्यते, संकर्षणाच्च प्रद्युम्नः, प्रद्युम्नाच्चानिरुद्ध इति, अत्र ब्रूमः - न वासुदेवसंज्ञकात्परमात्मनः संकर्षणसंज्ञकस्य जीवस्योत्पत्तिः संभवति; अनित्यत्वादिदोषप्रसङ्गात् । उत्पत्तिमत्त्वे हि जीवस्यानित्यत्वादयो दोषाः प्रसज्येरन्, ततश्च नैवास्य भगवत्प्राप्तिर्मोक्षः स्यात्; कारणप्राप्तौ कार्यस्य प्रविलयप्रसङ्गात् । प्रतिषेधिष्यति चाचार्यो जीवस्योत्पत्तिम्- ' नात्मा-ऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ' ( द्र ० सू ० २।३।१७ ) इति । तस्मादसंगतैषा कल्पना ॥ ४२ ॥

न च कतुः करणम् ॥ ४३ ॥

पदच्छेद – न, च, कर्तुः, करणम् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( कर्तुः ) कर्तासे ( करणम् ) करणकी ( न ) उत्पत्ति नहीं देखी जाती, इसलिए जीवसे मनकी उत्पत्ति असंगत है । इतश्चासंगतैषा कल्पना - यस्मान्न हि लोके कर्तुर्देवदत्तादेः करणं परश्वाद्युत्पद्यमानं दृश्यते । वर्णयन्ति च भागवताः कर्तुर्जीवात्संकर्षणसंज्ञकात्करणं मनः प्रद्युम्नसंज्ञकमुत्प-द्यते । कर्तृजाच्च तस्मादनिरुद्धसंज्ञकोऽहङ्कार उत्पद्यत इति । न चैतद्दृष्टान्तमन्तरेणाध्य-वसातुं शक्नुमः, न चैवंभूतां श्रुतिमुपलभामहे ॥ ४३ ॥

बिज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ ४४ ॥

पदच्छेद - विज्ञानादिभावे, वा, तदप्रतिषेधः । सूत्रार्थ - ( विज्ञानादिभावे वा ) संकर्षण आदि तीनोंके वासुदेवके समान विज्ञान आदि अथवा माव ( स्वरूप ) होनेपर भी ( तदप्रतिषेधः ) उत्पत्ति असम्भव दोषका प्रतिषेध नहीं होता । अथापि स्यान्न चैते संकर्षणादयो जीवादिभावेनाभिप्रेयन्ते; किं तर्हि? ईश्वरा एवैते सर्वे ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्य तेजोभिरैश्वर्यधर्मैरन्विता अभ्युपगम्यन्ते वासुदेवा एवैते सर्वे उत्पन्न होता है, संकषण से प्रद्युम्न और प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध । इसपर हम कहते हैं - वासुदेव संज्ञक परमात्मासे संकर्षण नामक जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि अनित्यत्व आदि दोषोंका प्रसङ्ग है । जीब उत्पत्तिमान् होनेपर निश्चित अनित्यत्व आदि दोष प्रसक्त होंगे, उससे इसका भगवत्प्राप्तिरूप मोक्ष नहीं होगा, क्योंकि कारणकी प्राप्ति में कार्यका प्रविलय प्रसङ्ग होगा | ' नात्माऽश्रुते: ० ' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता, कारण कि उत्पत्तिके प्रकरण में उसकी उत्पत्ति श्रुति नहीं है, अपितु इसके विपरीत श्रुतियोंसे उसकी नित्यता अवगत होती है ) इस सूत्र में आचार्य जीवकी उत्पत्तिका प्रतिषेध करेंगे । इसलिए यह कल्पना असंगत ही है ॥ ४२ । और इससे भी यह कल्पना असंगत है, क्योंकि लोकमें कर्ता देवदत्त आदिसे कुठार आदि करण उत्पद्यमान नहीं देखे जाते । भागवत वर्णन करते हैं—- संकर्षण नामक कर्ता जीवसे प्रद्युम्न संज्ञक करण मन उत्पन्न होता है, कर्तासे उत्पन्न उस ( मन ) से अनिरुद्ध संज्ञक अहंकार उत्पन्न होता है । परन्तु दृष्टान्त विना इसका निश्चय करनेमें हम समर्थ नहीं हैं, और न इसप्रकारकी हम श्रुति उपलब्ध करते हैं ॥ ४३ ॥

यदि ऐसा हो कि ये संकर्षण आदि जीव आदि भावसे अभिप्रेत नहीं हैं, किन्तु ये सब ज्ञान, सत्यानन्दी - दीपिका ' एष महानज आत्मा ० ' ( ह ० ४ | ४ | २० ) ( यह महान् अजन्मा आत्मा ) इत्यादि श्रुति और ‘ अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो ० ' ( गीता ० २।२० ) इत्यादि स्मृतिसे आत्मा नित्य अजन्मा सिद्ध होता है । इससे यह आगम अप्रामाणिक है । इसलिए जोवाभिन्न ब्रह्म समन्वय सिद्ध है ॥ ४२ ॥

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अधि ० ८ सु ० ४४-४५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४६ ९ निर्दोष निरधिष्टाना निरवद्याश्चेति, तस्मान्नायं यथावर्णित उत्पत्यसंभवो दोषः प्राप्नो-तीति । अत्रोच्यते - एवमपि तदप्रतिषेध उत्पत्त्यसंभवस्याप्रतिषेधः प्राप्नोत्येवायमुत्पत्त्य-संभवो दोषः प्रकारान्तरेणेत्यभिप्रायः । कथम्? यदि तावदयमभिप्रायः -- परस्परभिन्ना एवैते वासुदेवादयश्चत्वार ईश्वरास्तुल्यधर्माणो नैषामेकात्मकत्वमस्तीति, ततोऽनेकेश्वर-कल्पनानर्थक्यम्; एकेनैवेश्वरेणेश्वर कार्यसिद्धेः । सिद्धान्तहानिश्च; भगवानेवैको वासु-देवः परमार्थतत्त्वमित्यभ्युपगमात् । अथायमभिप्रायः - एकस्यैव भगवत एते चत्वारो व्यूहास्तुल्यधर्माण इति तथापि तदवस्थ एवोत्पत्त्यसंभवः । नहि वासुदेवात्संकर्षणस्यो-त्यत्तिः संभवति, संकर्षणाच्च प्रद्युम्नस्य, प्रद्युम्नाच्चानिरुद्धस्यः अतिशयाभावात् । भवि-तव्यं हि कार्यकारणयोरतिशयेन यथा मृद्घटयोः । न ह्यसत्यतिशये कार्य कारणमित्यव. कल्पते । न च पञ्चरात्रसिद्धान्तिभिर्वास देवादिष्वेकस्मिन्सर्वेषु वा ज्ञानैश्वर्यादि तारत-म्यकृतः कश्चिद्भेदोऽभ्युपगम्यते । वासुदेवा एव हि सर्वे व्यूहा निर्विशेषा इष्यन्ते । न चैते भगवद्व्यूहाश्चतुः संख्यायामेवावतिष्ठेरन्; ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य समस्तस्यैव जगतो भगवद्व्यूहत्वावगमात् ॥४४ ॥

विप्रतिषेधाच्च ॥ ४५ ॥

पदच्छेद - विप्रतिषेधात् च । सूत्रार्थ - और परस्पर विरुद्ध कथनसे भी यह मत असंगत है । * विप्रतिषेधश्चास्मिञ्छास्त्रे बहुविध उपलभ्यते - गुणगुणित्वकल्पनादिलक्षणः, ज्ञानै श्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजांसि गुणाः, आत्मान एवैते भगवन्तो वासुदेवा इत्यादिदर्शनात् । वेद-ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज रूप ईश्वर सम्बन्धी धर्मोसे युक्त ईश्वर ही स्वीकार किये जाते हैं । ये सब निर्दोष, निरधिष्ठान और निरवद्य वासुदेव ही हैं, इससे यथा वर्णित उत्पत्तिका असम्भव दोष प्राप्त नहीं है । इसपर कहते हैं — ऐसा होनेपर भी तदप्रतिषेध — उस उत्पत्ति के असम्भवका अप्रतिषेध है । यह उत्पत्तिका असम्भव दोष अन्य प्रकारसे प्राप्त होता ही है यह अभिप्राय है । किस प्रकार? यदि यह अभिप्राय हो कि परस्पर मिन्न ही ये वासुदेव आदि चार ईश्वर तुल्य धर्मवाले हैं, इनमें एकात्म-कत्व नहीं है, तो उससे अनेक ईश्वर कल्पना निष्फल है, क्योंकि एक ही ईश्वरसे ईश्वरकार्यं सिद्ध हो जायगा । और एक ही भगवान् वासुदेव परमार्थतत्त्व है, इसप्रकार स्वीकार होनेसे सिद्धान्त की भी हानि है । यदि यह अभिप्राय हो कि एक ही भगवान् के ये चार व्यूह समान धर्मंवाले हैं, तथापि उत्पत्तिका असम्भव वैसा ही है, क्योंकि अतिशय - विशेषभेद - वैलक्षण्यके अभावसे वासुदेवसे संकर्षण, संकर्षणसे प्रद्युम्न, और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है । कार्यं कारणमें अतिशय होना ही चाहिए, जैसे मृत्तिका और घटमें है । अतिशयके न होनेपर ' यह कार्य है, यह कारण है ' ऐसा नहीं हो सकता । और पञ्चरात्र सिद्धान्ती वासुदेव आदिमेंसे एकमें अथवा सबमें ज्ञान, ऐश्वयं आदि तारतम्यकृत कोई भेद स्वीकार नहीं करते । वासुदेव ही सब व्यूह निर्विशेष ( समान ) है, ऐसा मानते हैं । परन्तु भगवान् के ये व्यूह चार संख्या में ही अवस्थित न होंगे, क्योंकि ब्रह्मादिसे स्तम्भ पर्यन्त समस्त जगत् ही भगवद् व्यूहरूपसे अवगत होता है ॥ ४४ ॥

इस शास्त्र में गुण- गुणित्व कल्पना आदि रूप अनेक प्रकारका विरोध उपलब्ध होता है, क्योंकि ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीयं और तेज भगवान् के गुण हैं, वे आत्मा ही हैं भगवान् वासुदेव ही हैं, सत्यानन्दी - दीपिका * इस वक्ष्वमाण हेतुसे भी जीवोत्पत्ति असम्भव है । स्वयं ही गुण और गुणी हो यह विरुद्ध , है | आदि पदसे प्रद्युम्न और अनिरुद्ध मन और अहंकार आत्मासे भिन्न हैं ऐसा कहकर पुनः आत्मा

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४७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ विप्रतिषेधश्च भवति - चतुर्षु वेदेषु परं श्रेयोऽलब्ध्वा शाण्डिल्य इदं शास्त्रमधिगतवा -नित्यादि वेदनिन्दादर्शनात् । तस्मादसंगतैषा कल्पनेति सिद्धम् ॥४५ ॥

इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपाद कृतौ शारीरकमीमांसामाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ॥२ ॥

ऐसा देखने में आता है । उसी प्रकार वेद विरोध भी है, कारण कि चारों वेदोंमें परम श्रेय न मिलनेके कारण शाण्डिल्यने इस शास्त्रको प्राप्त किया अर्थात् पञ्चरात्रकी शरण ली, इत्यादि वेद निन्दाका दर्शन है, इससे सिद्ध हुआ कि यह कल्पना असंगत ॥४५ ॥

॥ स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके द्वितीयाध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥२ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका ही हैं, इसप्रकार इस विरुद्ध कथनका भी यहाँ ग्रहण है । और ' एकस्यापि तन्त्राक्षरस्य अध्येता ' चतुर्वेदिभ्योऽधिकः ' ( इस पंचरात्र तन्त्रके एक अक्षरका अध्येता चतुर्वेद वेत्ताओंसे अधिक है ) इस प्रकार वेदकी निन्दा की गई है । अतः यह सिद्ध हुआ कि परस्पर विरुद्ध पौरुषेय कल्पनाओंसे अपौरु-षेय वेदान्त समन्वयका विरोध नहीं है ॥४५ ॥

॥ स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के द्वितीयाध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥ २ ॥

द्वितीयाध्याये ] तृतीयः पादः । [ अत्र पादे पञ्चमहाभूतजीवादिश्रुतीनां विरोधपरिहारः ] ( इस पादमें पञ्चमहाभूत और जीव आदि श्रुतियोंमें विरोधका ( १ वियदधिकरणम् । सू ० १-७ ) विदः ॥ १ ॥

पदच्छेद - न, वियत्, अश्रुतेः । सूत्रार्थ --- ( वियत् ) आकाश ( न ) उत्पन्न नहीं होता, ( आश्रुतेः प्रतिपादक श्रुति नहीं है । * वेदान्तेषु तत्र तत्र भिन्नप्रस्थाना उत्पत्तिश्रुतय उपलभ्यन्ते । परिहार है ) ) क्योंकि उसकी उत्पत्ति केचिदाकाशस्योत्पत्ति-मामनन्ति केचिन्न । तथा केचिद्वायोरुत्पत्तिमामनन्ति केचिन्न । एवं जीवस्य प्राणानां च । वेदान्तोंमें तत् तत् स्थलोंपर भिन्न प्रस्थानवाली ( भिन्न प्रकरणस्थ ) उत्पत्ति श्रुतियाँ उपलब्ध होती हैं । कुछ श्रुतिवाक्य आकाशकी उत्पत्ति कहते हैं, कुछ नहीं कहते । उसीप्रकार कुछ श्रुतिवाक्य वायुकी उत्पत्ति कहते हैं, कुछ नहीं कहते । एवं कुछ श्रुतिवाक्य जीव और प्राणोंकी उत्पत्ति कहते हैं सत्यानन्दी - दीपिका * गत पादमें वेदान्तसमन्वयकी स्थापनाके लिए सांख्य आदि मतोंमें भ्रान्ति मूलकता सिद्ध की गई है | अब वेदान्त समन्वयकी स्थिति के लिए भूत, मोक्तृविषयक सृष्टि श्रुतियोंमें परस्पर विरोधका निराकरण करते हैं । जीवको अनुत्पत्ति के प्रसंगसे आकाशकी भी उत्पत्तिके असंभवकी आशङ्का कर

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अधि ० १ सू ० १-२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो - दोकासहित ४७१ एवमेव क्रमादिद्वारकोऽपि विप्रतिषेधः श्रुत्यन्तरेषूपलक्ष्यते । विप्रतिषेधाच्च पर पक्षाणामनपेक्षितत्वं स्थापितम्, तद्वत्स्वपक्षस्यापि विप्रतिषेधादेवानपेक्षितत्वमाशङ्कयेते-त्यतः सर्ववेदान्तगतसृष्टिश्रुत्यर्थनिर्मलत्वाय परः प्रपञ्च आरभ्यते । तदर्थनिर्मलत्वे च फलं यथोक्ताशङ्कानिवृत्तिरेव । तत्र प्रथमं तावदाकाशमाश्रित्य चिन्त्यते - किमस्याकाशस्यो-त्पत्तिरस्त्युत नास्तीति? तत्र तावत्प्रतिपद्यते - ' न वियदश्रुतेः ' इति । न खल्वाकाशमुत्प-द्यते । कस्मात्? अश्रुतेः । न ह्यस्योत्पत्तिप्रकरणे श्रवणमस्ति । छान्दोग्ये हि ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ) इति सच्छन्दवाच्यं ब्रह्म प्रकृत्य ' तदैक्षत ' ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६।२ । ३ ) इति च पञ्चानां महाभूतानां मध्यमं तेज आदि कृत्वा त्रयाणां तेजोबन्नानामुत्पत्तिः श्राव्यते । श्रुतिश्च नः प्रमाणमतीन्द्रियार्थविज्ञानोत्पत्तौ न चात्र श्रुतिरस्त्याकाशस्योत्पत्तिप्रतिपादिनी, तस्मान्नास्त्याकाशस्योत्पत्तिरति ॥१ ॥

अस्ति तु ॥ २ ॥

पदच्छेद - अस्ति, तु । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पक्षान्तरके परिग्रह अर्थ में है, ( अस्ति ) छान्योग्यमें आकाशको उत्पत्ति प्रतिपादकश्रुतिके न होनेपर भी तैत्तिरीयमें है, इसलिए विरोध वैसा ही है । और कुछ नहीं कहते । इसीप्रकार क्रम आदि द्वारक मी अन्य श्रुतियोंमें विरोध उपलक्षित होता है । और विरोध होने से पर पक्षोंका अनपेक्षत्व स्थापन किया गया है, उसीप्रकार स्वपक्षमें भी अनपेक्षत्वकी आशङ्का हो सकती है, इसलिए सर्ववेदान्तगत सृष्टि श्रुतिके अर्थकी निर्मलता के लिए अब आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । और उसके अर्थके निर्मल होनेपर यथोक्त शङ्काकी निवृत्ति ही फल है । उसमें पहले तो आकाशको अश्रयकर विचार किया जाता है— इस आकाशकी उत्पत्ति है अथवा नहीं है? उसमें प्रथम ' न वियदश्रुतेः ' ऐसा प्राप्त होता है । आकाश उत्पन्न नहीं होता, किससे? इससे कि श्रुति नहीं है, उसकी उत्पत्तिके प्रकरणमें श्रुति नहीं है, क्योंकि छान्दोग्यमें ही ' सदेव ० ' ( हे सोम्य! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) इस प्रकार सत् शब्द वाच्य ब्रह्मको प्रस्तुतकर ' तदैक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया, उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार पांच महाभूतों में मध्यम तेजको आदि ( आरम्भ ) कर तेज़, जल और अन्न तीनोंकी उत्पत्ति सुनाई जाती है । अतीन्द्रिय अर्थके विज्ञानकी उत्पत्ति में हमारे मतमें श्रुति प्रमाण है । परन्तु यहाँ आकाशकी उत्पत्ति प्रतिपादक श्रुति नहीं है, इसलिए आकाशकी उत्पत्ति नहीं है ॥ १ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका उसका परिहार करते हुए प्रथम ' न वियदश्रुतेः ' इससे एक देशीके मतको कहते हैं । जैसे परस्पर और पूर्वापर विरोध होनेके कारण पर पक्ष उपेक्ष्य है, वैसे श्रुति पक्ष भी उपेक्ष्य है । इसप्रकार की शङ्काकी निवृत्ति के लिए दृष्टान्तसंगति से यह पाद आरम्भ किया जाता है । तैत्तिरीयक आकाश और वायुकी उत्पत्ति कहते हैं, छान्दोग नहीं कहते । ' सर्व एत आत्मनो व्युच्चरन्ति ' ( ये सब आत्माचे निकलते हैं ) ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( मुण्ड २1१1३ ) ( इससे प्राण उत्पन्न होते हैं ) इसप्रकार माध्यंदिन और आथर्णविक जीव और प्राणकी उत्पत्ति कहते हैं । कहीं आकाश पूर्वक सृष्टि है, कहीं तेजपूर्वक सृष्टि है, इसप्रकार क्रमका विरोध है । ' स इमाँल्लोकान सृजत ' ( ऐ ० ११२ ) ( उसने इन लोकों को उत्पन्न किया ) इसप्रकार अक्रम है । एवं कहीं सात प्राण, कहीं आठ प्राण, इसप्रकार संख्या पूर्वक विरोध । इस तरह श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे प्रथम आकाशकी उत्पत्ति और अनुत्पत्ति विषयक श्रुतियों को लेकर विचार किया जाता है । पूर्वपक्षमें आकाशकी उत्पत्ति श्रुति नहीं है, अतः आकाशकी उत्पत्ति नहीं है ॥ १ ॥

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य | अ ० २ पा ० ३ तुशब्दः पक्षान्तरपरिग्रहे । मा नामाकाशस्य छान्दोग्ये भूदुत्पत्तिः, श्रुत्यन्तरे वस्ति । तैत्तिरीया हि समामनन्ति - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इति प्रकृत्य ' तस्माद्वा एत-स्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २।१ ) इति । ततश्च श्रुत्योर्विप्रतिषेधः - क्वचित्तेजः-प्रमुखा सृष्टिः क्वचिदाकाशप्रमुखेति । नन्वेकवाक्यताऽनयोः श्रुत्योर्युक्ता, सत्यं सा युक्ता, नतु सावगन्तुं शक्यते । कुतः? ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६ | २ | ३ ) इति सकृच्छ्रुतस्य स्रष्टुः स्रष्टव्यद्वयेन संबन्धानुपपत्तेः ' तत्त'जोऽसृजत ', ' तदाकाशमसृजत ' इति । ननु सकृच्छु-तस्यापि कर्तुः कर्तव्यद्वयेन संबन्धो दृश्यते यथा सूपं पक्त्वौदनं पचतीति, एवं तदा-काशं सृष्ट्वा ततेजोऽसृजतेति योजयिष्यामि । नैवं युज्यते, प्रथमजत्वं हि छान्दोग्ये तेजसोऽवगम्यते, तैत्तिरीयके वाकाशस्य, न चोभयोः प्रथमजत्वं संभवति । एतेनेतर-श्रुत्यक्षरविरोधोऽपि व्याख्यातः । ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ०२।१ ) इत्यत्रापि तस्मादाकाशः संभूतस्तस्मात्तेजः संभूतमिति सकृच्छ्रुतस्यापादानस्य संभवनस्य च वियत्तेजोभ्यां युगपत्संबन्धानुपपत्तेः । ' वायोरग्निः ' ( तै ० २1१ ) इति च पृथगाम्नानात् ॥२ ॥

अस्मिन्विप्रतिषेधे कश्चिदाह-गौण्यसंभवात् ॥ ३ ॥

पदच्छेद - गौणी, असंभवात् । सूत्रार्थ - ( गौणी ) आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौणी है, मुख्य नहीं, ( असंवात् ) क्योंकि आकाशको उत्पत्ति में समवायिकारण आदि सामग्रीका अभाव है और व्यापक होनेसे उसमें नित्यत्वका अनुमान होता है । अतः आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । ' तु ' शब्द अन्य पक्षके ग्रहण करनेमें हैं | आकाशकी उत्पत्ति छान्दोग्यमें मत हो, परन्तु अन्य श्रुतिमें तो है । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ऐसा प्रस्तुतकर ' तस्माद्वा ० ' ( इस प्रत्यगभिन्न उस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार तैत्तिरीय शाखावाले कहते हैं । इससे ' कहीं तेज प्रमुख सृष्टि है और कहीं आकाश प्रमुख सृष्टि है ' इस तरह दो श्रुतियोंमें विरोध है । परन्तु इन श्रुतियोंमें एक वाक्यता युक्त है । सत्य, वह युक्त है, किन्तु वह अवगत नहीं हो सकती । क्योंकि ' तत्तेजो ० ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार एक वार श्रुत स्रष्टाका ' तत्तेजोऽसृजत ' ' तदकाशमसृजत ' (. उसने आकाश उत्पन्न किया ) इसप्रकार दो स्रष्टव्योंके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता । परन्तु एक वार श्रुत कर्ताका भी दो कर्तव्यों के साथ सम्बन्ध देखा जाता है, जैसे ' दाल पकाकर चावल ( भात ) पकाता है ' वैसे ' उसने आकाशको उत्पन्नकर उसने तेज उत्पन्न किया ' ऐसी योजना करूँगा? किन्तु ऐसा युक्त नहीं हैं, क्योंकि छान्दोग्यमें तेजकी प्रथम उत्पत्ति अवगत होती है और तैत्तिरीयमें आकाशकी, और दोनोंकी प्रथम उत्पत्ति असंभव है, इस विरोध कथनसे अन्य श्रुतिवाक्योंके साथ विरोध भी व्याख्यात हुआ । क्योंकि ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इसमें भी ' उससे आकाश उत्पन्न हुआ ' ' उससे तेज उत्पन्न हुआ ' इसप्रकार एक वार श्रुत अपादान ( पञ्चम्यन्त तस्मात् ) और संभवन ( उत्पत्ति ) का आकाश और तेज के साथ युगपत् सम्बन्ध नहीं हो सकता और ' वायोरग्निः ' ( वायुसे अग्नि उत्पन्न होती है ) ऐसी पृथक् ( दूसरी ) श्रुति है । २ ॥ . इस विरोधके होनेपर कोई कहता है-सत्यानन्दी - दीपिका * ' वायोरग्निः ० ' इस अन्य श्रुतिमें भी विरोध है, क्योंकि छान्दोग्य श्रुतिमें तो सत्से तेजकी उत्पत्ति और तैत्तिरीय श्रुतिमें वायुसे अग्नि ( तेज ) की उत्पत्ति कही गई है । इसलिए दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता नहीं हो सकती ॥ २ ॥

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अधि ० १ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी -दीपिका सहित ४७३ नास्ति वियत उत्पत्तिरश्रुतेरेव । या त्वितरा वियदुत्पत्तिवादिनी श्रुतिरुदाहृता सा गौणी भवितुमर्हति, कस्मात्? असंभवात् । न ह्याकाशस्योत्पत्तिः संभावयितुं शक्या, श्रीमत्कणभुगभिप्रायानुसारिषु जीवत्सु । ते हि कारणसामग्रय संभवादाकाशस्योत्पत्तिवार-यन्ति । समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणेभ्यो हि किल सर्वमुत्पद्यमानं समुत्पद्यते । द्रव्यस्य चैकजातीयकमनेकं च द्रव्यं समवायिकारणं भवति । न चाकाशस्यैकजातीयकमनेकं च द्रव्यमारम्भकमस्ति यस्मिन्समवायिकार णे सति, असमवायिकारणे च तत्संयोगे, आकाश उत्पद्येत । तदभावात्तु तदनुग्रह प्रवृत्तं निमित्तकारणं दूरापेतमेवाकाशस्य भवति । उत्पत्ति-मतांच तेजःप्रभृतीनां पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभाव्यते - प्रागुत्पत्तेः प्रकाशादिकार्यं न बभूव, पश्चाच्च भवतीति । आकाशस्य पुनर्न पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभावयितुं शक्यते । * किं हि प्रागुत्पत्तेरनवकाशम सुषिरमच्छिद्रं बभूवेति शक्यतेऽध्यवसातुम्? पृथिव्या-दिवैधर्म्याच्च विभुत्वादिलक्षणादाकाशस्याजत्वसिद्धिः । तस्माद्यथा लोक आकाशं कुरु, आकाशो जात इत्येवंजातीयको गौणः प्रयोगो भवति, यथा च घटाकाशः करकाकाशो गृहाकाश इत्येकस्याप्याकाशस्यैवं जातीयको भेदव्यपदेशो गौणो भवति, वेदेऽपि ' आरण्या-नाकाशेष्वालभेरन् ' इति एवमुत्पत्तिश्रुतिरपि गौणी द्रष्टव्या ॥ ३ ॥

आकाशकी उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि श्रुति नहीं है । जो आकाशकी उत्पत्ति प्रतिपादक अन्य श्रुति उदाहृत है वह गौणी होनी युक्त है, क्योंकि असंभव है । श्रीमान् कणादके अभिप्रायका अनु-सरण करनेवालोंके जीवित रहनेपर आकाशकी उत्पत्तिकी संभावना नहीं की जा सकती, कारण कि वे कारण सामग्रीके असंभवसे आकाशकी उत्पत्तिका वारण करते हैं । सम्पूर्ण उत्पद्यमान कार्यं समवायी, असमवायी और निमित्तकारणों से उत्पन्न होता है । एकजातीय अनेक द्रव्य द्रव्यका समवायिकारण होते हैं | परन्तु आकाशके एक प्रकारके अनेक आरम्भक द्रव्य नहीं हैं, जिस समवायिकारण के होने पर और उनके संयोग असमवायिकारणके होनेपर आकाश उत्पन्न हो । उन कारणोंके न होनेसे उनके अनुग्रहसे प्रवृत्त आकाशका निमित्तकारण तो दूर ही रहा । तेजकी उत्पत्ति के पूर्व प्रकाश आदि कार्य नहीं थे उत्पत्तिके पश्चात् होते हैं, इसप्रकार उत्पत्तिमत् तेजः प्रभृतिमें पूर्वोत्तर कालमें विशेषकी संभावना की जा सकती है, किन्तु इसप्रकार आकाशके पूर्वोत्तरकालमें विशेषकी संभावना नहीं की जा सकती । उत्पत्तिके पूर्वं अनवकाश, असुषिर और अच्छिद्र था, क्या ऐसा निश्चय किया जा सकता है? पृथिवी आदिसे विरुद्ध धर्म और विभूत्व आदिरूप होनेसे आकाश अज सिद्ध होता है । इसलिए जैसे लोकमें ' आकाश करो ' ' आकाश उत्पन्न हुआ ' इस प्रकारका गौण प्रयोग होता है, और जैसे घटाकाश, करकाकाश, गृहाकाश इसप्रकारका एक आकाशमें भी भेद व्यपदेश गौण होता है । वेदमें भी ' अरण्यवासी पशुओंका आकाशमें आलमन करे ' ऐसा गौण व्यवहार होता है, वैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति भी गौण समझनी चाहिए ॥ ३ ॥

सत्यानन्द - दीपिका * अध्यायकी समाप्ति पर्यन्त अधिकरणोंमें प्रथम विरोधसे श्रुतिका अप्रामाण्य पूर्वपक्षका फल | मुख्य सिद्धान्तके साथ श्रुतियोंका ७ अविरोध होपर एकवाक्यता होनेसे ब्रह्म में समन्वयं सिद्ध होता है, ऐसा फल और क्रम है । दो श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' इस अध्ययन विधिसे गृहीत श्रुतियाँ अप्रामाणिक नहीं हो सकतीं, इससे आकाशकी उत्पत्ति असंभव है । इस तर्क से छान्दोग्य श्रुति मुख्य और तैत्तिरीय श्रुति गौण माननेपर कोई विरोध नहीं होगा । इस-प्रकारसे वैशेषिक मतका विवरण करते हैं- ' आकाशो नोत्पद्यते सामग्रीशून्यत्वात् आत्मवत् ' ' अकाश उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि सामग्री नहीं है जैसे आत्मा । '

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४७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ शब्दाच्च ॥ ४ ॥

पदच्छेद - शब्दात् च । सूत्रार्थ -- और वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम् ' इत्यादि श्रुतिमें आकाशमें अमृत शब्दका प्रयोग देखा जाता है, अतः आकाशकी उत्पत्ति नहीं होती । शब्दः खल्वाकाशस्याजत्वं ख्यापयति । यत आह- ' वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम् ' ( वृ ० २ | ३ | ३ ) इति । न मृतस्योत्पत्तिरुपपद्यते । ' आकाशवत् पर्वगतश्च नित्यः ' ( छा ० ३।१४।३ ) इति चाकाशेन ब्रह्म सर्वगतत्वनित्यत्वाभ्यां धर्माभ्यामुपभिमान आकाशस्यापि तौ धर्मो सूचयति । न च तादृशस्योत्पत्तिरुपपद्यते । ' स यथानन्तोऽयमाकाश एवमनन्त आत्मा वेदितव्यः ' इति चोदाहरणम् । ' आकाशशरीरं ब्रह्म ' ( तै ० १।६।२ ), ' आकाश आत्मा ' ( तै ० १।७।१ ) इति च । न ह्याकाशस्योत्पत्तिमत्त्वे ब्रह्मणस्तेन विशेषणं संभवति, नोलेनेवोत्पलस्य । तस्मा-नित्यमेवाकाशेन साधारणं ब्रह्मेति गम्यते ॥ ४ ॥

स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ ५ ॥

पदच्छेद - स्यात्, च, एकस्य, ब्रह्मशब्दवत् । सूत्रार्थ - ( ब्रह्मशब्दवत् ) जैसे एक ही प्रकरण में विषय भेदसे ' अन्नं ब्रह्म ' यहाँ ब्रह्म शब्द गौण है और ' आनन्दो ब्रह्म ' यहाँ मुख्य है, वैसे प्रकृत में भी विषय भेदसे ( एकस्य ) एक ही ' संभूतः ' शब्द गौण और मुख्य ( स्यात् ) होता है । * इदं पदोत्तरं सूत्रम् । स्यादेतत्- कथं पुनरेकस्य संभूतशब्दस्य ' तस्माद्वा एतस्मा-दात्मन आकाशः: संभूतः ' ( तै ० २1१ ) इत्यस्मिन्नधिकारे परे षु तेजःप्रभृतिष्वनुवर्तमानस्य मुख्य-त्वं संभवत्याकाशे च गौणत्वमिति? अत उत्तरमुच्यते - स्याच्चैकस्यापि संभूतशब्दस्य आकाश अज है ऐसा श्रुति कहती है, क्योंकि ' वायुश्चान्तरिक्षं ० ' ( वायु और अन्तरिक्ष ये अमृत हैं ) ऐसा श्रुति कहती है । अमृतकी उत्पत्ति उपपन्न नहीं होती । ' आकाशवत्सर्वगतश्च ० ' ( आकाशके समान सर्वगत और नित्य है ) इसप्रकार आकाशसे सर्वगतत्व और नित्यत्व धर्मोसे ब्रह्मको उपमा देती हुई श्रुति वे धर्मं आकाशके भी सूचित करती है । इससे उस प्रकारके सवंगत और नित्यकी उत्पत्ति उपपन्न नहीं होती । ' स यथा ० ' ( जैसे यह आकाश अनन्त है वैसे ही आत्मा अनन्त है ऐसा समझना चाहिए ) और ' आकाशशरीरं ब्रह्म ' ( ब्रह्म आकाश शरीर है ) ' आकाश आत्मा ० ' ( आकाश आत्मा है ) इसप्रकार यह उदाहरण है । जैसे नील उत्पलका विशेषण होता है, वैसे आकाश उत्पत्ति वाला हो तो वह ब्रह्मका विशेषण नहीं हो सकता । इससे यह ज्ञात होता है कि नित्य ही आकाशके तुल्य ब्रह्म है ॥ 8 ॥

यह सूत्र कुछ शङ्का के होनेपर उत्तर रूप है । ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इस अधिकार ( प्रकरण ) में अनुवर्तमान एक ही ' संभूतः ' शब्द अनन्तरोक्त तेज आदिमें मुख्य और आकाश में गौण कैसे हो सकता है? ऐसी शङ्का है । अतः इसका उत्तर कहा जाता है— ' संभूतः ' शब्द यद्यपि एक है, तो भी विषय विशेषके कारण ब्रह्म शब्द के समान उसका गौण और मुख्य प्रयोग होता है । सत्यानन्दी - दीपिका * और जैसे वेदमें एक आकाशमें ' आकाशेषु ' यह बहुवचन प्रयोग गौण है, वैसे आकाशकी उत्पत्ति प्रतिपादिक अति भी गौण है ॥ ३ ॥

* यदि आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौण मानें तो ब्रह्मके समान आकाश अनादि और अनन्त सिद्ध होनेपर ' एकमेवाद्वितीयम् ' इत्यादि अद्वैत प्रतिपादक श्रुतिका बाघ होगा ' एक ब्रह्मके विदित होनेपर

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अधि ० १ सू ०५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४७५ विषयविशेषवशाद्गौणो मुख्यश्च प्रयोगो ब्रह्मशब्दवत् । यथैकस्यापि ब्रह्मशब्दस्य ' तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्त्र, तपो ब्रह्म ' ( तै ० ३।२ ) इत्यस्मिन्नधिकारेऽन्नादिषु गौणः प्रयोग आनन्दे च मुख्यः । यथा च तपसि ब्रह्मविज्ञान साधने ब्रह्मशब्दो भक्त्या प्रयुज्यतेऽअसा तु विज्ञेये ब्रह्मणि तद्वत् । कथं पुनरनुत्पत्तौ नभसः ' एकमेवाद्वितीयम् ( छा ० ६ । २ ।१ ) इतीयं प्रतिज्ञा समर्थ्यते? ननु नभसा द्वितीयेन सद्वितीयं ब्रह्म प्राप्नोति । कथं च ब्रह्मणि विदिते सर्व विदितं स्यादिति? तदुच्यते - एकमेवेति तावत्स्वकार्यापेक्षयोपपद्यते । यथा लोके कश्चित्कु-म्भकारकुले पूर्वेद्युर्मृद्दण्डचक्रादीनि चोपलभ्यापरेद्युश्च नानाविधान्यमत्राणि प्रसारितान्यु-पलभ्य ब्रूयात्- मृदेवैकाकिनी पूर्वेद्युरासीदिति, स च तयावधारणया मृत्कार्यजातमेव पूर्वेद्युर्नासीदित्यभिप्रेयान्न दण्डचक्रादि, तद्वद्वितीयश्रुतिरधिष्ठात्रन्तरं वारयति । यथा मृदोऽमत्रप्रकृतेः कुम्भकारोऽधिष्ठाता दृश्यते " नैवं ब्रह्मणो जगत्प्रकृतेरन्योऽधिष्ठातास्तीति । * न च नभसापि द्वितीयेन सद्वितीयं ब्रह्म प्रसज्यते । लक्षणान्यत्वनिमित्तं हि नाना-त्वम् । न च प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मनभसोर्लक्षणान्यत्वमस्ति; क्षीरोदकयोरिव संसृष्टयोर्व्यापित्वा-मूर्तत्वादिधर्मसामान्यात् । सर्गकाले तु ब्रह्म जगदुत्पादयितुं यतते, स्तिमितमितरत्तिष्ठति, तेनान्यत्वमवसीयते । तथा च ' आकाशशरीरं ब्रह्म ' ( तै ० ११६२ ) इत्यादिश्रुतिभ्योऽपि ब्रह्माकाशयोरभेदोपचारसिद्धिः । अत एव च ब्रह्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानसिद्धिः । अपि च सर्व कार्यमुत्पद्यमानमाकाशेनाव्यतिरिक्त देशकालमेवोत्पद्यते " ब्रह्मणा चाव्यतिरिक्तदेश-जैसे एक ब्रह्म शब्दका भी ' तपसा ब्रह्म ० ' ( तपसे ब्रह्मको जानने की इच्छाकर, तप ब्रह्म है ) इस अधिकार में अन्न आदिमें गौण और आनन्दमें मुख्य प्रयोग हैं | और जैन ब्रह्मविज्ञानके साधन तनमें ब्रह्म-शब्द गौणवृत्तिसे प्रयुक्त है किन्तु मुख्यरूपसे तो विज्ञेय ब्रह्म में प्रयुक्त है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए । परन्तु आकाशकी उत्पत्ति न होनेपर ' एकमेवा ० ' ( एक ही अद्वितीय है ) इस प्रतिज्ञाका किस प्रकार समर्थन होगा? परन्तु दूसरे आकाशसे ब्रह्म सद्वितीय प्राप्त होता है, ब्रह्मके विदित होनेपर सर्वं किस प्रकार विदित होगा? उसको कहते हैं- ' एकमेव ' यह तो स्वकार्यकी अपेक्षासे उपपन्न होता है । जैसे लोकमें कुम्हारके घरमें पहले दिन मृत्तिका, दण्ड, चक्र आदिको देखकर और दूसरे दिन अनेक प्रकार के फैले हुए पात्रों को उपलब्धकर कोई यह कहे कि पहले दिन केवल एक मृत्तिका ही थी, वह उस निश्चयसे मृत्तिकाका कार्य समूह ही प्रथम दिन नहीं था, इस अभिप्रायसे कहता है, किन्तु दण्ड, चक्र आदि नहीं थे, इस अभिप्रायसे नहीं । वैसे ही अद्वितीय श्रुति अन्य अधिष्ठाताका निषेध करती है । जैसे घट आदि पात्रोंकी प्रकृति ( उपादानकारण ) मृत्तिकाका कुम्भकार अधिष्ठाता देखा जाता है, वैसे जगत् के उपादान कारण ब्रह्मका अन्य अधिष्ठाता नहीं है । और आकाश द्वितीयसे भी ब्रह्म सद्वितीय है, ऐसा प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि लक्षणभेदसे नानात्व है । परन्तु उत्पत्तिके पूर्व ब्रह्म और आकाश में लक्षणभेद नहीं है, कारण कि क्षीर और उदकके समान संसृष्टोंमें व्यापित्व और अमूर्तत्व धर्मं समान हैं । परन्तु सृष्टिकालमें तो ब्रह्म जगत्‌को उत्पन्न करनेके लिए यत्न करता है और अन्य आकाश निश्चल रहता है, उससे दोनों का भेद निश्चित होता है । उसी प्रकार ' भाकाशशरीरं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतियोंसे भी ब्रह्म और आकाशका अभेदोपचार सिद्ध होता है । अतएव ब्रह्मविज्ञानसे सर्व विज्ञानकी सिद्धि होती है, और उत्पद्यमान सब कार्य आकाशसे अव्यतिरिक्त देश काल में ही उत्पन्न होते हैं, और ब्रह्मसे अभिन्न देश कालमें ही आकाश होता है, अतः ब्रह्म और उसके कार्यके विज्ञान सत्यानन्दी- दीपिका सब विदित हो जाता है ' इस प्रतिज्ञाका बाध होगा, कारण कि ब्रह्मके जाननेपर अन्यका ज्ञान होनेपर मी आकाशका ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि वह ब्रह्मके समान पृथक्तत्त्व है । पू ० - ' तदुच्यते ' आदिसे कहते हैं | ५ |

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४७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ कालमेवाकाशं भवतीति, अतो ब्रह्मणा तत्कार्येण च विज्ञातेन सह विज्ञातमेवाकाशं भवति । यथा क्षीरपूर्णे घटे कतिचिदब्बिन्दवः प्रक्षिप्ताः सन्तः क्षीरग्रहणेनैव गृहीता भवन्ति, नहि क्षीरग्रहणादबिन्दु ग्रहणं परिशिष्यते, एवं ब्रह्मणा तत्कार्यैश्चाव्यतिरिक्तदेशकालत्वाद-गृहीतमेव ब्रह्मग्रहणेन नभो भवति । तस्माद्भाक्तं नभसः संभवश्रवणमिति ॥ ५ ॥

एवं प्राप्त इदमाह– प्रतिज्ञाऽहां निरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ ६ ॥

पदच्छेद - प्रतिज्ञाहानिः, अव्यतिरेकात्, शब्देभ्यः । सूत्रार्थ - ( अव्यतिरेकात् ) उपनिषद् प्रतिपादित ब्रह्मसे संम्पूर्ण वस्तुओंका अभेद होने से ( प्रतिज्ञाहानिः ) एकके विज्ञानसे सबके विज्ञानकी प्रतिज्ञा बाधित नहीं होती । ( शब्देभ्यः ) ' सदेव सोम्य ' ' ऐतदात्म्यमिदं ' इसप्रकार कार्यं कारणके अभेद प्रतिपादन परक श्रुतियोंसे भी प्रतिज्ञाकी सिद्धि अवगत होती है । ' येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् ' ( छा ० ६ । १ । ३ ) इति, ' आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम् ( बृ ० ४/५/६ ) इति, ' कस्मिन्नु मगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं मवति ' ( मुण्ड ० १।१।३ ) इति, ' न काचन मदहिर्धा विद्यास्ति ' इति चैवंरूपाप्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञा विज्ञायते । तस्याः प्रतिज्ञाया एवमहानिरनुपरोधः स्यात्, यद्यव्यतिरेकः कृत्स्नस्य वस्तु-जातस्य विज्ञेयाद्ब्रह्मणः स्यात् । व्यतिरेके हि सत्येकविज्ञानेन सर्वं विज्ञायत इतीयं प्रतिज्ञा हीयेत । स चाव्यतिरेक एवमुपपद्यते यदि कृत्स्नं वस्तुजातमेकस्माद्ब्रह्मण उत्पद्येत । शब्देभ्यश्च प्रकृतिविकाराव्यतिरेकन्यायेनैव प्रतिज्ञासिद्धिरवगम्यते । तथा हि- ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इति प्रतिज्ञाय मृदादिदृष्टान्तैः कार्यकारणाभेदप्रतिपादनपरैः प्रतिज्ञेषा समर्थ्यते । तत्साधनायैव चोत्तरे शब्दाः ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ), ' तदै-क्षत ', ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६ । २ । ३ ) इत्येवं कार्यजातं ब्रह्मणः प्रदश्यव्यतिरेकं प्रदर्श-होने के साथ आकाश विज्ञात ही होता है । जैसे दूध पूर्णं घटमें कुछ जल बिन्दु प्रक्षिप्त होते हुए दूधके ग्रहणसे ही गृहीत होते हैं । दूध ग्रहणसे जलबिन्दुका ग्रहण अवशिष्ट नहीं होता, वैसे ब्रह्म और उसके कार्योंके साथ [ आकाशका ] अभिन्न देश काल होनेसे ब्रह्म के ग्रहणसे आकाश गृहीत ही होता है, इसलिए आकाशकी सम्भव श्रुति गौण है ॥ ५ ॥

ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं-‘ येनाश्रुतं श्रुतं ० ' ( जिससे अश्रुत श्रुत, अमत मत और अविज्ञात विज्ञात हो जाता है ) ' आत्मनि खल्वरे ० ' ( हे मैत्रेयी! निश्चय ही आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर यह सब विदित हो जाता है ) ' कस्मिन्नु भगवो ० ' ( हे भगवन्! किसके विज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात हो जाता है ) और ' न काचन ० ' ( मुझसे भिन्न और कोई विद्या नहीं है ) इसप्रकारकी प्रतिज्ञा प्रत्येक वेदान्तमें ज्ञात होती है । यदि सम्पूर्ण वस्तु समूह विज्ञेय ब्रह्मसे अभिन्न हो तो उस प्रतिज्ञाकी इसप्रकार अहानि-अबाध होगा । भिन्न होनेपर तो ' एकके विज्ञानसे सबका विज्ञान होता है ' इस प्रतिज्ञाकी हानि होगी । वह अव्यतिरेक ( अभिन्नत्व ) इसप्रकार उपपन्न होता है - यदि सम्पूर्णं वस्तु समूह एक ब्रह्मसे उत्पन्न हो, और श्रुतियोंसे और ' प्रकृतिविकार - अव्यतिरेक न्यायसे ' ही प्रतिज्ञाकी सिद्धि अवगत होती है । जैसे ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इसप्रकार प्रतिज्ञाकर कार्यं और कारणके अभेद प्रतिपादन परक मृत्तिका आदि दृष्टान्तोंसे इस प्रतिज्ञाका समर्थन किया जाता है और उसके सिद्ध करनेके लिए उत्तर-शब्द - श्रुति ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' तदैक्षत ० '