श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 511–520
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 511–520
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अधि ० १ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४७७ यन्ति - ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( छा ० ६।८।७ ) इत्यारभ्याप्रपाठकपरिसमाप्तेः । * तद्यद्या-काशं न ब्रह्मकार्य स्यान्न ब्रह्मणि विज्ञात आकाशं विज्ञायेत, ततश्च प्रतिज्ञाहानिः स्यात् । नच प्रतिज्ञाहान्या वेदस्याप्रामाण्यं युक्तं कर्तुम् । तथा हि- प्रतिवेदान्तं ते ते शब्दास्तेन तेन दृष्टान्तेन तामेव प्रतिज्ञां ख्यापयन्ति ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( बृ ० २।४।६ ), ' ब्रह्म-वेदममृतं पुरस्तात् ' ( मुण्ड - २२ | ११ ) इत्येवमादयः । तस्माज्ज्वलनादिवदेव गगनमप्युत्प-द्यते । यदुक्तमश्रुतेर्न वियदुत्पद्यत इति तदयुक्तम्; वियदुत्पत्तिविषयश्रुत्यन्तरस्य दर्शित-त्वात् ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २1१ ) इति । सत्यं दर्शितम्; विरुद्धं तु ' तत्तेजोऽसृजत ' इत्यनेन श्रुत्यन्तरेण, नः एकवाक्यत्वात्सर्वश्रुतोनाम् । भवत्वेकवाक्यत्वम-विरुद्धानाम्; इह तु विरोध उक्तः, सकृच्छ्रुतस्य स्रष्टुः स्रष्टव्यद्वयसंबन्धासंभवाद्-द्वयोश्च प्रथमजत्वासंभवाद्विकल्पासंभवाच्चेति । नैष दोषः - तेजः सर्गस्य तैत्तिरीयके तृती यत्वश्रवणात् ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः ' ( तै ० २ | १ ) इति । अशक्या हीयं श्रुतिरन्यथा परिणेतुम् । शक्या तु परिणेतुं छान्दोग्यश्रुतिस्तदा-काशं वायुं च सृष्ट्वा ‘ तत्तेजोऽसृजत ' इति । * न हीयं श्रुतिस्तेजोजनिप्रधाना सती श्रुत्यन्त-रप्रसिद्धामाकाशस्योत्पत्ति वारयितुं शक्नोति; एकस्य वाक्यस्य व्यापारद्वयासंभवात् । ( उस- सत्ने ईक्षण - संकल्प किया, उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार ब्रह्मसे कार्य समूहकी उत्पत्ति दिखलाकर ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( एतद्रूप ही यह सब है ) ऐसा आरम्भकर प्रपाठक- अध्यायकी समाप्ति पर्यन्त अव्यतिरेक ( अभेद ) दिखलाते हैं । इसलिए यदि आकाश ब्रह्मका कार्यं न हो तो ब्रह्म विज्ञात होनेपर आकाश विज्ञात नहीं होगा और उससे प्रतिज्ञाका बाध होगा । प्रतिज्ञाकी हानिसे वेदका अप्रामाण्य करना युक्त नहीं है, क्योंकि ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( यह सब आत्मा ही है ) ' ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् ' ( यह अमृत ब्रह्म ही आगे है ) इत्यादि वे वे श्रुतिवाक्य प्रत्येक उपनिषद् में तत्, तत् दृष्टान्तसे उसी प्रतिज्ञाका ज्ञापन करते हैं । इसलिए अग्नि आदिके समान ही आकाश भी उत्पन्न होता है । जो यह कहा गया है कि श्रुतिके न होने से आकाश उत्पन्न नहीं होता, वह प्रयुक्त है । क्योंकि ' तस्माद्वा-एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इसप्रकार आकाशकी उत्पत्ति विषयक अन्य श्रुति दिखलाई गई है । ठीक, दिखलाई गई है । परन्तु ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इस अन्य श्रुतिसे तो वह विरुद्ध है । ऐसा नहीं, कारण कि सर्व श्रुतियोंकी एकवाक्यता है । पू ० – अविरुद्ध वाक्योंकी एक वाक्यता भले हो, किन्तु यहाँ तो विरोध कहा गया है । कारण कि एक वार श्रुत स्रष्टाका दो स्रष्टव्योंके साथ सम्बन्धका सम्भव नहीं है, दोनोंकी प्रथमोत्पत्तिका असम्भव और विकल्पका असम्भव है । सि ० - यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन ० ' ( इस प्रत्यगभिन्न उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे अग्नि ) इसप्रकार तैत्तिरीयकमें तेजकी सृष्टि तीसरी सुनी गई है, अतः यह श्रुति अन्यथा परिणत नहीं की जा सकती है । परन्तु ' तदाकाशं ० ' ' उसने आकाश और वायुको उत्पन्नकर उसने तेज उत्पन्न किया ' इसप्रकार छान्दोग्य श्रुति तो परिणतकी जा सकती है । यह श्रुति तेजकी उत्पत्ति प्रधान होती हुई अन्य श्रुतिमें प्रसिद्ध आकाशकी उत्पत्तिका निवारण करनेमें सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्ती — अपौरुषेय वेद वाक्योंमें अप्रामाण्य कल्पना करनेकी अपेक्षा एकवाक्यता द्वारा प्रामाण्य मानना युक्त है । बलवती श्रुतिके साथ दुर्बल श्रुतिकी एकवाक्यता युक्त है । तैत्तिरीय श्रुति प्रबल है, क्योंकि उसमें हेतुवाचक पञ्चमीसे क्रम पूर्वक उत्पत्ति कही गई है । छान्दोग्यमें केवल ' तत्ते-जोऽसृजत ' तेजकी उत्पत्ति श्रुत है, इसलिए तैत्तिरीय श्रुतिके अनुसार तेजकी उत्पत्ति प्रतिपादक छान्दोग्य श्रुतिको परिणत करना चाहिए, इससे तेजकी उत्पत्ति तीसरे नम्बर में होगी । इसप्रकार दोनों श्र तियोंकी एकवाक्यतासे कोई विरोध नहीं है ।
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ स्रष्टा त्वेोऽपि क्रमेणानेकं स्रष्टव्यं सृजेत् - इत्येकवाक्यत्वकल्पनायां संभवन्त्यां न विरु-द्वार्थत्वेन श्रुतितिया । न चास्माभिः सकृच्छ्रुतस्य स्रष्टः स्रष्टव्यद्रयसंबन्धोऽभिप्रेयते; श्रुत्यन्तरवशेन स्रष्टव्यान्तरोप संग्रहात् । यथा च ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान् ' ( छा ० ३ | १४ | १ ) इत्यत्र साक्षादेव सर्वस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मजत्वं श्रूयमाणं न प्रदेशान्तरविहितं तेजःप्रमुखमुत्पत्तिक्रमं वारयति, एवं तेजसोऽपि ब्रह्मजत्वं श्रूयमाणं न श्रुत्यन्तरविहितं नभः प्रमुखमुत्पत्तिक्रमं वारयितुमर्हति । ननु शमविधानार्थमेतद्वा-क्यम्, ' तज्जलानिति शान्त उपासीत ' इति श्रुतेः " नैतत्सृष्टिवाक्यम्, तस्मादेतन्न प्रदेशान्तर -प्रसिद्धं क्रममुपरोद्धुमर्हतीति तत्तेजोऽसृजत ' इत्येतत्सृष्टिवाक्यम्, तस्मादत्र यथाश्रुति क्रमो ग्रहीतव्य इति । * नेत्युच्यते - नहि तेजः प्राथस्यानुरोधेन श्रुत्यन्तरप्रसिद्धो वियत्पदार्थः परित्यक्तव्यो भवति, पदार्थधर्मत्वात्क्रमस्य । अपि च ' तत्तेजोऽसृजत ' इति नात्र क्रमस्य वाचकः कश्चिच्छन्दोऽस्ति अर्थात् क्रमोऽवगम्यते स च ' वायोरग्निः ' इत्यनेन श्रुत्यन्तर-प्रसिद्धेन क्रमेण निवार्यते । विकल्पसमुच्चयौ तु वियत्ते जसोः प्रथमजत्वविषयावसंभवान-समर्थ नहीं है, क्योंकि एक वाक्यमें दो व्यापारोंका सम्भव नहीं है । स्रष्टा एक होनेपर भी वह क्रमसे अनेक स्रष्टव्योंको उत्पन्न करे, इसप्रकार एकवाक्यता की कल्पनाका सम्भव होनेपर विरुद्ध अर्थसे श्रुतिकी हानि नहीं करनी चाहिए । एक वार श्रुत स्रष्टाका दो स्रष्टव्यों के साथ सम्बन्ध हमें भी अभीष्ट नहीं है, क्योंकि अन्य श्रुतिके वाले अन्य स्रव्यका संग्रह होता है । जैसे ' सर्वं खल्विदं ० ' ( निश्चय यह सब ब्रह्म हो है यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है ) इसमें समस्त कार्य समुदायकी ब्रह्मते साक्षात् उत्पत्ति श्रयमाण है वह अन्य स्थानोंमें विहित तेज प्रमुख उत्पत्ति क्रमका वारण नहीं करती, वैसे तेजकी मी ब्रह्मसे श्रूयमाण उत्पत्ति अन्य श्रुतिमें ० विहित आकाश प्रमुख उत्पत्ति क्रमका वारण करने से समर्थ नहीं है । पू ० - परन्तु ' तज्जलानिति शान्त उपासीत ' ( उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला, और उसीमें चेष्टा करनेवाला है, अतः शान्त होकर उसकी उपासना करनी चाहिए ) इस श्रुतिसे यह वाक्य शसके विधान के लिए है । इसलिए यह सृष्टिवाक्य नहीं है, अतः यह अन्य प्रदेश में प्रसिद्ध क्रमका विरोध नहीं कर सकता । ' तत्तेजोऽसृजत ' यह सृष्टि वाक्य है । इससे यहाँ श्रुतिके अनुसार क्रमका ग्रहण करना चाहिए । सि ० - नहीं, ऐसा कहते हैं-तेजकी प्रथमता के अनुरोधसे अन्य तैत्तिरीय श्रुवि प्रसिद्ध आकाश पदार्थं परित्याग करने योग्य नहीं होता, क्योंकि क्रम पदार्थका धर्म है । और ' तत्तेजोऽसृजत ' इस श्रुतिमें क्रम वाचक कोई शब्द नहीं है | परन्तु अथतः क्रम अवगत होता है? ता उसका ' वायोरग्निः ' ( वायुसे अग्नि ) इस अन्य श्रुति प्रसिद्ध सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान् ' इस श्रुतिमें सम्पूर्ण जगत्की ब्रह्मसे. उत्पत्ति माननेपर भी जैसे ‘ तत्तेजोऽसृजंत ' ऐसा कहने से कोई विरोध नहीं है, वैसे क्रम बोधक तैत्तिरीय श्रुतिके साथ छान्दोग्य श्रुतिका विरोध नहीं होना चाहिए । पू ० - ' तज्जलान् ' यह श्रुति तो ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' ( जो शब्द जिसके लिए होता है वही शब्दका अर्थ होता है ) इस न्यायके अनुसार शम परक है सृष्टि परक नहीं । इससे छान्दोग्य श्रुति में प्रसिद्ध सृष्टि क्रमका बाध नहीं हो सकता, क्योंकि ' तत्तेजोऽसृजत ' यह सृष्टिवाक्य है, अतः श्रुतिके अनुसार तेजकी प्रथमता स्वीकार करनी चाहिए । * आकाश और तेजके प्रथमोत्पत्ति विषयक और समुच्चय ( गौके दक्षिण और वाम शृङ्गके समान एक साथ उत्पन्न होना ) न सम्भव है और न स्वीकार किया गया है, क्योंकि वस्तुमें विकल्प नहीं होता और समुच्चयमें कोई प्रमाण नहीं है । समुच्चय होने में ' वायोरग्निः ' इस श्रौत क्रमका बाध होगा, अतः दोनों श्रुतियोंमें विरोध नहीं है ।
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अधि ० १ सू ० ६ ] भावानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४७ ९ भ्युपगमाभ्यां निवारिती । तस्मान्नास्ति श्रुत्योर्विप्रतिषेधः । अपि च छान्दोग्ये ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इत्येतां प्रतिज्ञां वाक्योपक्रमे श्रुतां समर्थयितुमसमाम्नातमपि वियदुत्पत्ता-वुपसंख्यातव्यम्, किमङ्ग पुनस्तैत्तिरीयके समाम्नातं नभो न संगृह्यते?. यच्चोत्तमाका-शस्य सर्वेणानन्य देशकालत्वाब्रह्मणा तत्कार्येश्च सह विदितमेव तद्भवत्यतो न प्रतिज्ञा हीयते नच ' एतीयम् ' इति श्रतिकोपो भवति, क्षीरोदकवदब्रह्मनभसोरव्यति-रेकोपपत्तेरिति । * अत्रोच्यते-- न क्षीरोदकन्यायेनेदमेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं नेतव्यम्, मृदादिदृष्टान्तप्रणयनाद्धि प्रकृ तविकारन्यायेनैवेदं सर्वविज्ञानं नेतव्यमिति गम्यते । क्षीरोदकन्यायेन च सर्वविज्ञानं कल्यमानं न सम्यग्विज्ञानं स्यात् । नहि क्षीरज्ञानगृहीत-स्योदकस्य सम्यग्विज्ञान गृहीतत्वमस्ति । नच वेदस्य पुरुषाणामिव मायालीकवञ्चनादि-भिरर्थावधारणमुपपद्यते । सावधारणा चेयम् ' एकमेवाद्वितीयम् ' इति श्रुतिः क्षीरोदकन्या-येन नीयमाना पीडयेत । नच स्वकार्यापेक्षयेदं वस्त्वेकदेशविषयं सर्वविज्ञानमेकमेवा, द्वितीयत्तावधारणं चेति न्याय्यम्, मृदादिष्वपि हि तत्संभवान्न तदपूर्ववदुपन्य सितव्यं भवति ' श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' ( छा ० ६।१।१ ) इत्यादिना । तस्म दशेषवस्तुविषयमेवेदं सर्वविज्ञानं सर्वस्य ब्रह्मकार्यतापेक्षयोपन्यस्यत इति द्रष्टव्यम् ॥ ६ ॥
क्रमसे निवारण होता है । आकाश और तेजके प्रथमोत्पत्ति विषयक विकल्प और समुच्चय तो असम्भव और अस्वीकार से निरस्त हैं, अतः श्रुतियों ( तैत्तिरीय और छान्दोग्य ) में विरोध नहीं है । किञ्च छान्दो-ग्यमें ' येनाश्रुतं ० ' ( जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है ) इस वाक्योपक्रममें इस श्रुतप्रतिज्ञाके समर्थन के लिए अश्रु • आकाशका भी उत्पत्तिप्रकरण में उपसंख्यान ( ग्रहण ) करना चाहिए । तो हे अङ्ग! तैत्तिरीयमें पठित आकाशका संग्रह क्यों न हो? और जो यह कहा गया है कि आकाशका सबके साथ अनन्य देश काल होने के कारण ब्रह्म और उसके कार्योंके साथ वह विदित ही होता है, अतः प्रतिज्ञाकी हानि नहीं होती । और ' एकमेवाद्वितीयम् ' इस श्रुतिका मी बाध नहीं होता । क्योंकि क्षीर और उदकके समान ब्रह्म और आकाशका अव्यतिरेक- अभेद उपपन्न होता है । सिद्धान्ती — इसपर कहते हैं— क्षीरोदक न्यायसे ' एक विज्ञानसे सर्वं विज्ञान ' नहीं लेना चाहिए, किन्तु मृत्तिका आदि दृष्टान्तोंके ग्रहण करनेसे प्रकृतिविकार न्यायसे यह सर्व विज्ञान लेना चाहिए, यह ज्ञात होता है । क्षीरोदक न्यायसे कल्प्यमान सर्वविज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि क्षीरज्ञानसे गृहीत उदकका यथार्थ ज्ञानसे ग्रहण नहीं है । वेदका अर्थनिश्चय पुरुषोंके समान मायासे मिथ्या भाषण और उससे वञ्चना आदिसे उपपन्न नहीं होता, किन्तु ' एकमेवाद्वितीयम् ' यह सावधारण श्रुति क्षीरोदक न्यायसे ली जाय तो बाधित होगी । ' सर्वविज्ञान ' और ' एक ही अद्वितीय है ' यह निश्चय स्वकार्यकी अपेक्षासे वस्तु एक देश विषयक है, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि मृत्तिका आदिमें भी उसका सम्भव है, और ' श्वेतकेतो यन्नु ० ' ( उद्दालक - हे सोम्य श्वेतकेतु! तू जो ऐसा महामना, पण्डितमन्य और अविनीत हो जिस आदेश से अश्रुतश्रुत हो जाता है, वह आदेश तुमने आचार्य से पूछा हैं? ) इत्यादिसे उसका अपूर्ववत् उपन्यास योग्य नहीं है । इसलिए समस्त वस्तु विषयक यह सर्वविज्ञान सबके ब्रह्म कार्यत्वकी अपेक्षासे उपन्यस्त है, ऐसा समझना चाहिए || ६ || सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षीने देशकालके अभेदसे ब्रह्म और उसके कार्यके साथ आकाश भी विदित होता है, इसमें ' क्षीरोदक ' का दृष्टान्त दिया है । परन्तु क्षीरके ज्ञानसे तद् देश कालसे अभिन्न जलबिन्दु ज्ञात नहीं होते, कारण कि वे क्षीरसे अत्यन्त भिन्न हैं । यहाँ तो कार्यकारण न्यायसे प्रतिज्ञा सिद्ध हो सकती है, क्योंकि कार्य कारणका अभेद है अन्यका नहीं, अतः आकाश आदि समस्त जगत् ब्रह्मका कार्य है । इसकी अपेक्षा से ही ' एकके विज्ञान से सर्वविज्ञानकी ' प्रतिज्ञाका उपन्यास किया गया है || ६ ||
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४८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०२ पा ० ३ यत्पुनरेतदुक्तमसंभवाद्गौणी गगनस्योत्पत्तिश्रुतिरिति, अत्र ब्रूमः --यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ ७ ॥
पदच्छेद - यावद्विकारम्, तु विभागः, लोकवत् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्ष के निवारण के लिए है, ( यावद्विकारम् ) जितने घट शरावादि विकार हैं, ( विभागः ) उन सबका विभाग है और विभक्त होनेसे वे सब कार्य हैं, ( लोकवत् ) उन लौकिक पदार्थोंके समान आकाश भी विभक्त होनेसे कार्य है । * तुशब्दोऽसंभावाशङ्काव्यावृत्त्यर्थः । न खल्वाकाशोत्पत्ताव संभावाशङ्का कर्तव्या, यतो यावत्किचिद्विकारजातं दृश्यते - घटघटिकोदञ्चनादि वा कटककेयूरकुण्डलादि वा, सूचीनाराचनिस्त्रिंशादि वा - तावनेव विभागो लोके लक्ष्यते । न त्वविकृतं किंचित्कुतश्चिद्वि-भक्तमुपलभ्यते । विभागश्चाकाशस्य पृथिव्यादिभ्योऽवगम्यते, तस्मात्सोऽपि विकारो भवि-तुमर्हति । एतेन दिक्कालमनः परमाण्वादीनां कार्यत्वं व्याख्यातम् । नन्वात्माप्याकाशादिभ्यो. विभक्त इति तस्यापि कार्यत्वं घटादिवत्प्राप्नोति, न, ' आत्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २।१ ) इति श्रुतेः । यदि ह्यात्मापि विकारः स्यात्तस्मात्परमन्यन्न श्रुतमित्याकाशादि सर्व कार्य निरात्मकमात्मनः कार्यत्वे स्यात्, तथा च शून्यवादः प्रसज्येत । आत्मत्वाच्चात्मनो निरा-करणशङ्कानुपपत्तिः । न ह्यात्मागन्तुकः कस्यचित्, स्वयंसिद्धत्वात् । * न ह्यात्मात्मनः प्रमाणमपेक्ष्य सिध्यति । तस्य हि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणान्यप्रसिद्धप्रमेयसिद्धय उपादीयन्ते । न और जो यह कहा गया है कि उत्पत्तिके असम्भव होनेसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौणी है, इसपर हम कहते हैं-' तु ' शब्द असम्भवकी आशङ्का निवृत्तिके लिए है | आकाशकी उत्पत्तिमें असंभवकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो कुछ घट, घटिका, उदञ्चन आदि अथवा कटक, केयूर, कुण्डल आदि-अथवा सुई, बाण, खड्ग आदि विकार समूह देखा जाता है, वही लोकमें विभक्त देखनेमें आता है, और अविकृत पदार्थं किसीसे किंचित् विभक्त होकर उपलब्ध नहीं होता । आकाशका पृथिवी आदिसे विभाग अवगत होता है, इसलिए वह भी कार्य होना चाहिए । इससे ( विभागसिद्धिसे ) दिशा, काल, मन, परमाणु आदि कार्यरूपसे व्याख्यात हुए । परन्तु आत्मा मी आकाश आदिसे विभक्त है, इससे उसको भी घट आदिके समान कार्यत्व प्राप्त होता है? ऐसा नहीं, क्योंकि ' आत्मन आकाशः संभूतः ' ऐसी श्रुति है । यदि आत्मा भी कार्य हो तो उससे पर अन्य कुछ मी श्रुति प्रतिपादित नहीं है, अत: आत्मा कार्य होनेपर आकाश आदि सब कार्यं निरात्मक हो जायेंगे और उससे शून्यवाद प्रसक्त होगा । सबका आत्मा ( स्वरूप ) होनेसे आत्माके निराकरणकी शङ्का अनुपपन्न है । आत्मा किस कारणका आगन्तुक कार्य नहीं है, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध है । अपने में प्रमाणकी अपेक्षाकर आत्मा सिद्ध नहीं होता है, उसके प्रत्यक्ष आदि प्रमाण अप्रसिद्ध प्रमेयकी सिद्धिके लिए गृहीत होते हैं, क्योंकि सत्यानन्दी - दीपिका * ' आकाशो नोत्पद्यते सामग्रीशून्यत्वात् ' यह आकाशकी उत्पत्तिके असंभवमें पूर्वपक्षीका अनुमान है । सिद्धान्ती - ' भाकाशः, विकारः, विभक्तत्वात् घटादिवत् ' ' आकाश उत्पन्न होता है, क्योंकि वह विभक्त है जैसे घट आदि ' यह सत्प्रतिपक्ष हेतु । ' और जो अविकार है वह अविभक्त है जैसे आत्मा ' इस अन्वयव्यतिरेकसे भी आकाश कार्यं सिद्ध होता है । इससे दिशा आदि मी कार्य हैं, क्योंकि वे भी विभक्त हैं । * सत्ता - स्फूर्ति ही आत्माकी स्वयं सिद्धि है, आत्माकी सिद्धिके लिए किसी प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है ।
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अधि ० १ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४८१ ह्याकाशादयः पदार्थाः प्रमाणनिरपेक्षाः स्वयंसिद्धाः केनचिदभ्युपगम्यन्ते । आत्मा तु प्रमाणादिव्यवहाराश्रयत्वात्प्रागेव प्रमाणादिव्यवहारात्सिध्यति । न चेदृशस्य निराकरणं संभवति । आगन्तुकं हि वस्तु निराक्रियते, न स्वरूपम् । य एव हि निराकर्ता तदेव तस्य स्वरूपम् । न ह्यग्नेरौष्ण्यमग्निना निराक्रियते । तथाऽहमेवेदानीं जानामि वर्तमानं वस्त्वहमेवातीतमतीततरं चाज्ञासिष महमेवानागतमनागततरं च ज्ञास्यामीत्यतीताना-गतवर्तमानभावेनाऽन्यथाभवत्यपि ज्ञातव्ये न ज्ञातुरन्यथाभावोऽस्ति सर्वदा वर्तमान-स्वभावत्वात् । तथा भस्मीभवत्यपि देहे नात्मन उच्छेदो वर्तमानस्वभावादन्यथा-स्वभावत्वं वा न संभावयितुं शक्यम् । एवमप्रत्य ( ख्येयस्वभावत्वादेवाकार्यत्वमात्मनः atri atarra | यत्तक्तम् - समानजातीयमनेकं कारणद्रव्यं व्योम्नो नास्तीति, तत्प्रत्युच्यते- न तावत्समानजातीयमेवारभते न भिन्नजातीयमिति नियमोऽस्ति । नहि तन्तूनां तत्संयोगानां च समानजातीयत्वमस्ति; द्रव्यगुणत्वाभ्युपगमात् । नच निमित्तकारणानामपि तुरीवेमादीनां समानजातीयत्वनियमोऽस्ति । स्यादेतत् - सम-वायिकारणविषय एव समानजातीयत्वाभ्युपगमो न कारणान्तरविषय इति । तष्य-नैकान्तिकम्; सूत्रगोवालैर्ह्यनेकजातीयैरे का रज्जुः सृज्यमाना दृश्यते । तथा सूत्रैरूर्णा -आकाश आदि पदार्थ प्रमाण निरपेक्ष स्वयं सिद्ध हैं, ऐसा किसीने भी स्वीकार नहीं किया है । आत्मा तो प्रमाण आदि व्यवहारका आश्रय होनेसे प्रमाण आदि व्यवहारसे पूर्व ही सिद्ध है, ऐसे स्वयं सिद्ध आत्माका निराकरण नहीं हो सकता है । आगन्तुक वस्तुका ही निराकरण होता है, स्वरूपका निराकरण नहीं होता । जो हि निराकर्ता है वही उसका स्वरूप है । अग्निके औष्ण्यका अग्निसे निराकरण नहीं होता । उसी प्रकार मैं ही इस समय वर्तमान वस्तुको जानता हूँ, मैने ही भूत और उससे मी पूर्वकी वस्तुओंको जाना था, मैं ही भविष्य और उससे भी दूर भविष्यकी वस्तुओंको जानूंगा, इसप्रकार अतीत अनागत और वर्तमानरूपसे ज्ञातत्र्य वस्तुके अन्यथाभाव होनेपर भी ज्ञाताका अन्यथाभाव नहीं होता है, क्योंकि वह सर्वदा वर्तमान स्वभाव है । इसीप्रकार देहके मस्मीभूत होनेपर भी वर्तमानस्वभाव होनेसे आत्माके उच्छेद ( विनाश ) अथवा अन्यथास्वभावत्वको संभावना नहीं की जा सकती । इस प्रकार निराकरणके अयोग्यस्वभाव होनेसे आत्मा अकार्य है और आकाश कार्यं है । जो यह कहा गया है कि समानजातीय अनेक कारणद्रव्य आकाशके नहीं हैं, उसका निराकरण किया जाता है-समानजातीय ही आरम्मक होते हैं भिन्नजातीय आरम्भक नहीं होते, ऐसा कोई नियम नहीं है । तन्तु और उनका संयोग समानजातीय नहीं हैं, कारण कि उनको द्रव्य और गुणरूपसे स्वीकार किया गया है । इस प्रकार तुरी, वेम आदि निमित्तकारणों का भी समान जातीयत्व नियम नहीं है । अच्छा, ऐसा हो कि समवायिकारण विषयक ही समान जातीयत्व स्वीकार हो अन्य कारण विषयक नहीं । वह भी व्यभिचरित है, क्योंकि अनेक जातीय सूत्र गोवालों ( ऊन ) से सृज्यमान एक रस्सी देखी जाती है, सत्यानन्दी - दीपिका इस विषय में सुरेश्वराचार्यंने कहा है-i " प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं प्रमित्तिस्तथा । यस्य प्रसादात्सिध्यन्ति तत्सिद्धी किमपेक्ष्यते ॥ " ( प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति जिसके प्रसादसे सिद्ध होते हैं उसको सिद्धिमें किसकी अपेक्षा है? ) इससे जो देहके नाशसे आत्माका नाश मानते हैं उनका भी खण्डन हुआ समझना चाहिए । * यह समानजातीयत्व नियम कारणमात्र विषयक है अथवा निमित्तकारण वा समवायिकारण विषयक है? प्रथम विकल्प तो तन्तु और उनके संयोग में बाधित है, क्योंकि तन्तु द्रव्य और संयोग गुण है । द्वितीयपक्ष में ' न च ' आदि कहते हैं । तृतीयविकल्प क्या समवायिकारणतावच्छेदक धर्मसे सजातीय है अथवा सत्त्व सत्ता से सजातीय है? ' स्यादेतत् ' आदिसे कहते हैं ।
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ दिभिश्च बिचित्रान्कम्बलान्वितन्वते । सत्त्वद्रव्यत्वाद्यपेक्षया वा समानजातीयत्वे कल्प्य -माने नियमानर्थक्यम्, सर्वस्य सर्वेण समानजातीयकत्वात् । नाप्यनेकमेवारभते, नैकमिति नियमोऽस्ति, अणुमनसोराद्यकर्मारम्भाभ्युपगमात् । एकैको हि परमाणुर्मनश्चाद्यं कर्मा-रभते न द्रव्यान्तरैः संहत्येत्यभ्युपगम्यते । द्रव्यारम्भ एवाने कारम्भकत्वनियम इति चेत् - न; परिणामाभ्युपगमात् । भवेदेष नियमो यदि संयोगसचिवं द्रव्यं द्रव्यान्तरस्या-रम्भकमभ्युपगम्येत । तदेव तु द्रव्यं विशेषवदवस्थान्तर मापद्यमानं कार्य नामाभ्युपगम्यते । तच्च क्वचिदनेकं परिणमते मृद्वीजादि अङ्कुरादिभावेन; क्वचिदेकं परिणमते क्षीरादि दध्यादिभावेन । नेश्वरशासनमस्त्यनेकमेव कारणं कार्यं जनयतीति, अतः श्रुतिप्रामाण्या-देकस्मादुब्रह्मण आकाशादिमहाभूतोत्पत्तिक्रमेण जगजातमिति निश्चीयते । तथा चोक्तम्-' उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ' ( ब्र ० सू ० २।१।२४ ) इति । यच्चोत्तमाकाशस्योत्पत्तौ न पूर्वोत्तर कालयोर्विशेषः संभावयितुं शक्यत इति, तदयुक्तम्; येनैव हि विशेषेण पृथि व्यादिभ्यो व्यतिरिच्यमानं नभः स्वरूपवदिदानीमध्यवसीयते स एव विशेषः प्रागु-त्पत्तेर्नासीदिति गम्यते । यथा च ब्रह्म न स्थूलादिभिः पृथिव्यादिस्वभावैः स्वभाववत्, वैसे ही लोग सूत्र और उनसे विचित्र कम्बल बुनते हैं । अथवा सत्त्व और द्रव्यत्वकी अपेक्षासे समान जातीयत्वकी कल्पना की जाय तो नियम निष्फल है, क्योंकि सब सबके साथ समानजातीय हैं । अनेक ही आरम्भ हैं एक नहीं यह नियम भी नहीं है, कारण कि परमाणु और मन आद्य कर्मके आरम्भक स्वीकार किये गये हैं । एक - एक परमाणु और मन आद्य कर्मका आरम्भ करते हैं अन्य द्रव्यसे संहत होकर नहीं, ऐसा स्वीकार किया जाता है । यदि कहो कि द्रव्यके आरम्भमें ही यह अनेक आरम्भकत्व नियम है, तो युक्त नहीं है, क्योंकि परिणामको स्वीकार किया है । यह नियम हो सकता है यदि संयोग सचिव द्रव्य अन्य द्रव्यका आरम्भक स्वीकार किया जाय । परन्तु वही द्रव्य सविशेष अन्य अवस्थाओं को प्राप्त हुआ कार्यं नामसे स्वीकार किया जाता है । वह कहीं अनेक मृत्तिका बीजादि अङ्कर आदि भावसे परिणत होता है, और कहीं एक क्षीर आदि दधि आदि भावसे परिणत होता है । यह कोई ईश्वरका आदेश नहीं है कि अनेक कारण ही कार्यको उत्पन्न करते हैं । अतः श्रुतिप्रामाण्यसे एक ब्रह्मसे आकाश आदि महाभूतों की उत्पत्ति क्रमसे जगत् उत्पन्न हुआ, ऐसा निश्चित होता है । इस प्रकार कहा है – ' उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ' ( उपसंहार देखनेसे ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है, ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि क्षीरके समान उपपन्न होगा ) । और जो यह कहा गया है कि आकाशकी उत्पत्ति में पूर्व और उत्तरकालमें कुछ विशेष - वैलक्षण्य संभावित नहीं हो सकता, यह कथन अयुक्त है, क्योंकि जिस विशेषसे ही पृथिवी आदिसे व्यतिरिक्त हुआ आकाश स्वरूपवत् वर्तमानमें निश्चित होता है वही विशेष उत्पत्तिके पूर्व नहीं था, ऐसा ज्ञात होता है । जैसे ' अस्थूलमनणु ' ( वह सत्यानन्दी - दीपिका * क्या यह अनेक रम्भकत्व नियम आरम्भकमात्र में है अथवा द्रव्यके आरम्भकमें है? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अदृष्टवाले आत्माके साथ संयुक्त परमाणु और मन आद्यकर्मके आरम्भक हैं । उस प्रथम क्रियाका एक - एक परमाणु और मन समवायिकारण है । द्वितीयपक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि वही द्रव्य भिन्न - भिन्न अवस्थासे कार्य नामसे व्यवहारमें आता है । इसके अतिरिक्त ' यह द्रव्य है यह गुण है ' यह परिभाषा कणादसे कल्पित है 1 । उससे श्रुति अर्थंका निर्णय नहीं हो सकता । अतः ' आत्मन आकाशः संभूतः ' आदि श्रुति प्रमाणसे एक ही ब्रह्मसे आकाश आदि समस्त जगत्की उत्पत्ति निश्चित होती है । जिस शब्द आदि आश्रयरूप विलक्षणताको लेकर आकाश पृथिवी आदि से भिन्न ज्ञात होता है, वह वैलक्षण्य उत्पत्तिके पूर्व नहीं था । इसमें ' अनाकाशम् ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है ।
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अधि ० १ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित III ‘ अस्थूलमनणु ’ ( बृ ० ३।८।८ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः, एवमाकाशस्वभावेनापि न स्वभाववदना-काशमिति श्रुतेरवगम्यते । तस्मात्प्रागुत्पत्तेरनाकाशमिति स्थितम् । यदप्युक्तम्- पृथि-व्यादिवैधम्र्यादाकाशस्याजत्वमिति, तदप्यसत् श्रुतिविरोधे सत्युत्पत्त्यसंभवानुमान-स्याभासत्वोपपत्त ेः, उत्पत्स्यनुमानस्य च दर्शितत्वात् अनित्यमाकाशमनित्यगुणाश्रय-त्वादुद्घटादिवदित्यादिप्रयोगसंभवाच्च । आत्मन्यनैकान्तिकमिति चेत् - नः तस्यौपनिषदं प्रत्यनित्यगुणाश्रयत्वासिद्धेः, विभुत्वादीनां चाकाशस्योत्पत्तिवादिनं प्रत्यसिद्धत्वात् । यच्चोक्तमेतच्छन्दाच्चेति तत्रामृतत्वश्रुतिस्तावद्वियत्यमृता दिवौकस इतिवद्द्रष्टव्याः उत्पत्तिप्रलययोरुपपादितत्वात् । ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' इत्यपि प्रसिद्धमहत्त्वेनाकाशे-नोपमानं क्रियते निरतिशय महत्त्वाय, नाकाशसमत्वाय । यथेषुरिव सविता धावतीति क्षिप्रगतित्वायोच्यते, नेषुतुल्यगतित्वाय, तद्वत् । एतेनानन्तत्वोपमानश्रुतिर्व्याख्याता । ' ज्यायानाकाशात् ' इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ब्रह्मण सकाशादाकाशस्योनपरिमाणत्वसिद्धिः । ' न तस्य प्रतिमास्ति ' ( श्वे ० ४। १ ९ ) इति च ब्रह्मणोऽनुपमानत्वं दर्शयति । ‘ अतोऽन्यदार्तम् ' स्थूल नहीं है अणु नहीं है ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्म स्थूल आदि पृथिवी आदि स्वभावोंसे स्वभाववाला नहीं होता, वैसे आकाशके स्वभावसे भी स्वभाव वाला ब्रह्म नहीं है, ऐसा ' अनाकाशम् ' ( आकाश रहित ) इस श्रुति से अवगत होता है । इसलिए अकाशकी उत्पत्तिके पूर्व ब्रह्म अनाकारा था, ऐसा निश्चित हुआ है । जो यह कहा गया है कि पृथिवी आदिसे विरुद्ध धर्म ( विभुत्व, निरवयवत्ववाला ) होनेसे आकाश उत्पत्ति रहित है, वह मी ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुतिके साथ विरोध होनेपर उत्पत्ति के असंभवका अनुमान आभासमात्र उपपन्न होता है, और उत्पत्तिका अनुमान दिखलाया गया है-' आकाश अनित्य है, अनित्य गुणका आश्रय होनेसे, घट आदिके समान, इत्यादि प्रयोगका संभव है । यदि कहो कि अनित्य गुणाश्रयत्व हेतुका आत्मामें व्यभिचार है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि औप-निषवादीके मत में आत्मामें अनित्य गुणाश्रयत्व असिद्ध है । और आकाशके उत्पत्तिवादी प्रति आकाश में विभुत्व आदि असिद्ध हैं । ' शब्दाच्च ' ( शब्दसे भी ) जो यह कहा गया है — उसमें अमृतत्व श्रुति तो स्वर्ग में देवता अमृत हैं इसके समान समझनी चाहिए । कारण कि आकाशकी उत्पत्ति और प्रलयका उपपादन किया गया है । ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( आकाश के समान सर्वगत और नित्य है ) यह भी प्रसिद्ध महत्त्वसे [ ब्रह्म में ] निरतिशय महत्त्व दिखलाने के लिए आकाशके साथ उपमान किया है आकाश समत्व के लिए नहीं । जैसे ' बाणके समान सविता दौड़ता है ' यह क्षिप्रगति के लिए कहा जाता है बाणके तुल्य गतिके लिए नहीं, इससे अनन्तत्व उपमानवाली श्रुतिका मी व्यख्यान हुआ । ' ज्यायानाकाशात् ' ( आकाशसे बड़ा ) इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशका परिमाण ब्रह्मसे छोटा सिद्ध होता है । ' न तस्य ० ' ( उसकी उपमा नहीं है ) यह श्र ुति ब्रह्मको अनुपमत्व प्रतिपादित करतो है । ' अतोऽ-सत्यानन्दी - दीपिका * ' अकाश, उत्पन्न नहीं होता, सामग्री शून्य होनेसे । ' यह अनुमान ' आकाश उत्पन्न होता है, विभक्त होनेसे घट आदिके समान ' इस अनुमानसे बाधित है, अतः अनुत्पत्ति प्रतिपादक अनुमान आभासमात्र है । कणादके अनुयायी आत्माको विभु नित्य मानकर भी ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न आदि अनित्य गुणों का आश्रय मानते हैं । उनके मतमें तो अनित्य गुणाश्रयत्व हेतुका व्यभिचार मले हो, परन्तु वेदान्तमत में यह दोष नहीं है, क्योंकि निर्गुण आत्मा अनित्य गुणोंका आश्रय ही नहीं है । किश्व जैसे ' निर्जरा अमरा देवा: ' स्वर्गस्थ देवताओं में अमरत्व गौण है, वैसे आकाशमें मी नित्यत्व आदि गौण हैं । और ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इस उत्पत्ति श्रुति और उक्त अनुमानसे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होती है । अत: ‘ आत्मन आकाशः संभूतः ' इस बलवती तैत्तिरीय श्रुतिसे ' तेत्तेजोऽसृजत ' छान्दोग्य श्रविसे प्रति-पादित तेजकी प्रथमोत्पत्ति के गौण होनेसे दोनोंमें एकवाक्यता है, अतः स्रष्टा ब्रह्म में वेदान्त समन्वय-युक्त है ॥ ७ ॥
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४८४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ बृ ० ३।४।२ ) इति च ब्रह्मणोऽन्येषामाकाशादीनामार्तत्वं दर्शयति । तपसि ब्रह्मशब्दव-दाकाशस्य जन्मश्र ते गौणत्वमित्येतदाकाशसंभवश्रुत्यनुमानाभ्यां परिहृतम् । तस्माद् ब्रह्मकार्य वियदिति सिद्धम् ॥ ७ ॥
( २ मातरिश्वाधिकरणम् सू ० ८ ) एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ ८ ॥
पदच्छेद – एतेन, मातरिश्वा, व्याख्यातः । सूत्रार्थ - ( एतेन ) आकाश उत्पत्तिवाला है, इस कथन से ( मातरिश्वा ) वायु भी आकाशों-पाधिक ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, ( व्याख्याता ) यह व्याख्यान हुआ । * अतिदेशोऽयम् । एतेन वियद्व्याख्यानेन मातरिश्वापि वियदाश्रयो वायुर्व्या-ख्यातः । तत्राप्येते यथायोगं पक्षा रचयितव्याः - न वायुरुत्पद्यते छन्दोगानामुत्पत्तिप्र-करणेऽनाम्नानादित्येकः पक्षः । अस्ति तु तैत्तिरीयाणामुत्पत्तिप्रकरण आम्रानम्, ‘ आकाशा-द्वायुः ' ( तै ० २।१ ) इति पक्षान्तरम् । ततश्च श्रुत्योर्विप्रतिषेधे सति गौणी वायोरुत्पत्ति-श्रुतिः, असंभवादित्यपरोऽभिप्रायः । असंभवश्च ' सैषाऽनस्तभिता देवता यद्वायुः ' ( बृ ०१।५।२२ ) इत्यस्तमयप्रतिषेधात्, अमृतत्वादिश्रवणाच्च । प्रतिज्ञानुपरोधाद्यावद्विकारं च विभागाभ्यु न्यदार्तम् ' ( उससे अन्य आर्त- अनित्य हैं ) यह श्रुति ब्रह्मसे अन्य आकाश आदिका अनित्यत्व दिखलाती है | जैसे तपमें ब्रह्म शब्द गौण है, वैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौण है, इसका आकाशकी उत्पत्ति श्रुति और अनुमानसे परिहार किया गया है । इससे यह सिद्ध हुआ कि आकाश ब्रह्मका कार्य है ॥७ ॥
यह अतिदेश है । इस आकाशके व्याख्यानसे मातरिश्वापि आकाशाश्रय वायु मी व्याख्यात हुआ । उसमें भी यथायोग्य इन पक्षोंकी रचना करनी चाहिए - वायु उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि छान्दोग्य के उत्पत्तिप्रकरणमें पठित नहीं है, यह एक पक्ष है । तैत्तिरीयोंके उत्पत्ति प्रकरण में तो श्रुति है— ' आकाशाद्वायुः ' ( आकाशसे वायु उत्पन्न होता है ) यह अन्य पक्ष है । उससे श्रुतियोंका विरोध होनेपर वायुकी उत्पत्ति श्रुति गौण हैं, क्योंकि उत्पत्तिका असंभव है, यह अन्य अभिप्राय है । ' सैषाऽनस्तमिता ०, ' ( यह जो वायु है, वह अस्त - विनाश न होनेवाला देवता है ) इस प्रकार अस्तमयके प्रतिषेध और अमृतत्व आदिके श्रवणसे वायुकी उत्पत्तिका असम्भव है । प्रतिज्ञाका बाध न होनेसे और सम्पूर्ण सत्यानन्दी -दीपिका * ' तत्तेजोऽसृजत ' इस श्रुतिका ' आकाशाद्वायुः ' इस तैत्तिरीय श्रुतिसे विरोध है कि नहीं? इस प्रकार संशय होनेपर गौण पक्ष, पूर्वपक्ष और सिद्धान्तपक्षका ' तत्रापि ' इत्यादिसे अतिदेश करते हैं । तेजकी आकाशके अनन्तर उत्पत्ति तैत्तिरीयमें निर्णीत है । यदि उसमें वायु और तेजका आनन्तर्य समान हो, तो ' वायोरग्निः ' इस क्रम श्रुतिका बाघ होता है । और यदि दोनोंका पूर्वापर्यं मानें तो छान्दोग्यमें प्रतिपादित तेजकी प्रथमोत्पत्तिका मङ्ग होता है, इससे दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता नहीं होती । ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर ' ततश्च ' इत्यादिसे गौणवादीका अभिप्राय कहते हैं - छान्दोग्यमें वायुकी उत्पत्ति नहीं कही गई है, और ' वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम् ' ( बृह ० २३1२ ) ( वायु और आकाश ये अविनाशी हैं ) ' वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिः ' ( बृह ० ३।३।२ ) ( वायु ही व्यष्टि और वायु समष्टि है ) इस प्रकार वायु सर्वात्मा है । इससे ' आकाशाद्वायुः ' यह उत्पत्ति श्रुति गौणी है । सिद्धान्ती – ' वायु उत्पन्न होता है विभक्त होनेसे घट आदिके समान ' ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इस प्रतिज्ञाका बाध न होनेसे और विभाग होने से वायुकी उत्पत्ति श्रुति मुख्य है । अतः आकाश और वायुको उत्पन्नकर तेज उत्पन्न किया, इस प्रकार दोनों श्रुतियोंकी एक वाक्यतासे ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध है । यहाँ अतिदेश संगति है ।
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अधि ० ३ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४८५ पगमादुत्पद्यते वायुरिति सिद्धान्तः । अस्तमयप्रतिषेधो ऽपरविद्याविषय आपेक्षिक; अय्यादीनामिव वायोरस्तमयाभावात् । कृतप्रतिविधानं चामृतत्वादिश्रवणम् । ननु वायो-राकाशस्य च तुल्ययोरुत्पत्तिप्रकरणे श्रवणाश्रवणयोरेकमेवाधिकरणम्भयत्रिषयमस्तु किमतिदेशेनासति विशेष इति? उच्यते - सत्यमेवमेतत् । तथापि मन्दधियां शब्दमा-त्रकृताशङ्कानिवृत्त्यर्थोऽयमतिदेशः क्रियते; संवर्गविद्यादिषु ह्युपास्यतया वायोर्महाभाग-त्वश्रवणात्; अस्तमयप्रतिषेधादिभ्यश्च भवति नित्यत्वाशङ्का कस्यचिदिति ॥ ८ ॥
( ३ असंभवाधिकरणम् । सू ० ९ ) असंभवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥ ९ ॥
पदच्छेद - असंभवः, तु, सतः, अनुपपत्तेः । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्काको निवृत्तिके लिए है ( सतः ) सत्स्वरूप ब्रह्मकी ( असम्भवः ) उत्पत्ति असम्भव है, ( अनुपपत्तेः ) क्योंकि सत्सामान्यसे सत्सामान्यकी उत्पत्तिकी अनुपपत्ति है अर्थात् अतिशयके न होनेपर प्रकृति - विकारभावको अनुपपत्ति है । * वियत्पवनयोरसंभाव्यमानजन्मनोरप्युत्पत्तिमुपश्र ुत्य ब्रह्मणोऽपि भवेत्कुतश्चि-दुत्पत्तिरिति स्यात्कस्यचिन्मतिः । तथा विकारेभ्य एवाकाशादिभ्य उत्तरेषां विकाराणा-मुत्पत्तिमुपश्रुत्याकाशस्यापि विकारादेव ब्रह्मण उत्पत्तिरिति कश्चिन्मन्येत । तामाशङ्काम-विकारका विभाग स्वीकार होनेसे वायु उत्पन्न होता है, यह सिद्धान्त है । अस्तमयका प्रतिषेध अपर-विद्या विषयक और आपेक्षिक है, क्योंकि अग्नि आदिके समान वायु अस्त नहीं होता । अमृतत्व आदि श्रुतिका समाधान किया जा चुका है । परन्तु उत्पत्ति प्रकरण में वायु और आकाशका [ तैत्तिरीयमें ] श्रवण और ( छान्दोग्यमें ) अश्रवण तुल्य है, तो उमय विषयक ( दोनोंका ) एक ही अधिकरण हो, विशेष के न होनेपर अतिदेशका क्या प्रयोजन है? कहते हैं - यह सत्य है, तथापि स्वल्पबुद्धिवाले पुरुषोंकी शब्दमात्रसे उत्पन्न हुई आशङ्काकी निवृत्तिके लिए यह अतिदेश किया है, क्योंकि संवर्गविद्या आदिमें उपास्यरूपसे वायुमें महाभागत्वका श्रवण है । अस्तमयके प्रतिषेध आदिसे किसीको नित्यत्व की आशङ्का हो सकती है ॥ ८ ॥
जिनकी उत्पत्तिकी सम्भावना नहीं है ऐसे आकाश और वायुकी मी उत्पत्ति सुनकर ब्रह्मकी भी उत्पत्ति किसीसे होगी, ऐसी किसीकी बुद्धि हो सकती है । उसी प्रकार आकाश आदि विकारोंसे ही उत्तर ( वायु आदि ) विकारोंकी उत्पत्ति सुनकर आकाशकी भी उत्पत्ति विकार ब्रह्मसे ही होगी, ऐसा कोई मानें, उस शङ्काका निवारण करनेके लिए ' असंभवस्तु ० ' यह सूत्र है । सदात्मक ब्रह्मकी सत्यानन्दी -दीपिका * वायु असृत है, यह देवताओं में अमृतत्व व्यवहार के समान गौण है । किव संवर्गविद्यामें ' वापुह्येवैतान्सर्वान् ० संवृङ्क्ते ' ( प्रलयकालमें वायु ही अग्नि आदि इन सबका संहार करता है ) इस विषय में श्रुति अभिप्रायका विचार किये बिना किसीको वायुमें नित्यत्वकी शङ्का हो सकती है, उसकी निवृत्तिके लिए यह अतिदेश किया गया है । इस प्रकार दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता होनेसे ब्रह्ममें समन्वय है | ८ | * ‘ अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवम् ० ( कठ ० ३।१५ ) ( जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे पर और ध्रुव है ) ' न चास्य कश्विजनिता ० ' ( श्वेत ० ६ । ९ ) ( उसका कोई उत्पत्ति कर्ता नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मको अनादि और अनन्त कहती हैं । उनका ' त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ' ( तुम विश्वतोमुख उत्पन्न हुए हो ) इस उत्पत्ति श्रुतिके साथ विरोध होनेपर सन्देह होता है । जैसे गत अधिकरणमें बसम्भवोत्पत्तिवाले आकाश और वायुकी श्रुतिबलसे उत्पत्ति कही गई है, वैसे श्रुतिबलसे ब्रह्मकी
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४८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ पनेतुमिदं सूत्रम् -'असंभवस्तु ' इति । न खलु ब्रह्मणः सदात्मकस्य कुतश्चिदन्यतः संभवः-उत्पत्तिराशङ्कितव्या । कस्मात्? अनुपपत्तेः । सन्मात्रं हि ब्रह्म, न तस्य सन्मात्रादेवोत्पत्तिः_ संभवति, असत्यतिशये प्रकृतिविकार भावानुपपत्त ेः: । नापि सद्विशेषाद्दष्ट विपर्ययात् । सामान्याद्धि विशेषा उत्पद्यमाना दृश्यन्ते मृदादेर्घटादयो नतु विशेषेभ्यः सामान्यम् । नाप्य-सतः; निरात्मकत्वात् । ' कथमसतः सज्जा येत ' ( छा ० ८ | ७ | १ ) इति चाक्षेपश्रवणात् । ' स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्रिज्जनिता न चाधिपः ' ( वे ० ६।९ ) - इति च ब्रह्मणो जनयितारं वारयति । वियत्पचनयोः पुनरुत्पत्तिः प्रदर्शिता, नतु ब्रह्मणः सास्तीति वैषम्यम् । नच विका-रेभ्यो विकारान्तरोत्पत्तिदर्शनाद्ब्रह्मणोऽपि विकारत्वं भवितुमर्हति मूलप्रकृत्यनभ्युपगमे-ऽनवस्थाप्रसङ्गात् । या मूलप्रकृतिरभ्युपगम्यते तदेव च नो ब्रह्मेत्यविरोधः ॥ ९ ॥
( ४ तेजोधिकरणम् । सू ० १० ) तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥ १० ॥
पदच्छेद - तेजः, अतः, तथा, हि, आह । सूत्रार्थ - ( तेज: ) तेज अतः ) वायु से उत्पन्न होता है, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) ऐसा ही ( मह ) ' वायोरग्निः ' यह श्रुति I कहती है । किसी अन्यसे सम्भव व उ उत्पत्तिको आशङ्का नहीं करनी चाहिए, किससे? इससे कि उपपत्ति नहीं है | सन्मात्र ही ब्रह्म है, उसकी सन्मात्र से ही उत्पत्ति सम्भव नहीं है, कारण कि अतिशयके न होनेपर प्रकृत्ति विकार-भाव नहीं हो सकता है । सद्विशेषसे भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) सं विपर्यय ( विरोध ) है | सामान्य से ही विशेष उत्पन्न होते हुए देखे जाते हैं, जैसे मृत्तिका आदि से घट आदि । परन्तु विशेषोंसे सामान्य उत्पन्न होते हुए नहीं देखे जाते । इसप्रकार असत् ( शून्य ) से भी सत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वह निरात्मक है ' कथमसतः सज्जायेत ' ( असत् से सत् किस प्रकार उत्पन्न होगा? ) ऐसे आक्षेपका श्रवण है । ' सं कारणं ० ' ( वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता taar स्वामी है, उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है ) यह श्रुति ब्रह्मके उत्पत्तिकर्ताका वारण करती है । आकाश और वायुकी उत्पत्ति दिखलाई गयी है । परन्तु वह ब्रह्मको नहीं है, ऐसा वैषम्य है । विकारोंसे अन्य विकारोंकी उत्पत्ति देखनेसे ब्रह्म भी विकार हो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मूलप्रकृतिका स्वीकार न करनेपर अनवस्था प्रसङ्ग होगा । जो मूलप्रकृति स्वीकार की जाती है वही हमारा ब्रह्म है, अतः विरोध नहीं है ॥ ९ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका ब्रह्मसे उत्पत्ति हो । इसप्रकार दृष्टान्तसंगीतसे पूर्वपक्ष करते हैं- जैसे वायु आदिमें अमृतत्व आदि ' आत्मन भाकाशः संभूत आकाशाद्वायुः ' इत्यादि उत्पत्ति श्रुतिके बलसे आपेक्षिक माने गये हैं, वैसे ब्रह्मके अनादित्व आदि मी आपेक्षिकं मानने चाहिए । और ' ब्रह्म कुतश्चिजायते कारणत्वात् आकाशवत् ' ( ब्रह्म किसीसे उत्पन्न होता है कारण होनेसे आकाशके समान ) इस अनुमान से अनुगृहीत ' स्वं जातो भवसि ' यह जन्म श्रुति अधिक बलवती है । अनादिको कारण न माननेपर अनवस्था भी नहीं होगी, क्योंकि बीजाङ्करके समान अनादित्व उपपन्न हो सकता है । जैसे एक दीप अन्य दीपसे उत्पन्न होता है, वैसे एक ब्रह्मसे अन्य ब्रह्म उत्पन्न होता है, अतः ' त्वं जातो भवसि ' इस उत्पत्ति श्रुति से " अनाद्यनन्तं ० ' अनादि श्रुतिको गौण मानना चाहिए । इससे अनादि और अनन्त ब्रह्मका समन्वय असिद्ध है । सिद्धान्ती - ' ब्रह्म नोत्पद्यते कारणशून्यत्वात् नरविषाणवत, व्यतिरेकेण घटवत् ' ( ब्रह्म उत्पन्न नहीं होता, कारण शून्य होनेसे जैसे नर विषाण ' जो कारण शून्य नहीं वह अनुत्पन्न मी नहीं है जैसे घट ) इस अनुमानसे अनुगृहीत अनादि प्रतिपादक श्रुतियाँ उत्पत्ति श्रुतिसे अधिक बलवती