श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 61–70

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 61–70

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित तस्माद्यथोक्तसाधनसंपत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या । * ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा । ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणं ' जन्माद्यस्य यतः ' इति । अत एव न ' ब्रह्म ' शब्दस्य जात्याद्यर्था -न्तरमाशङ्कितव्यम् । ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी, न शेषे; जिज्ञास्यापेक्षत्वाजिज्ञासायाः, जिज्ञास्यान्तरानिर्देशाच्च । ननु शेषषष्ठीपरिग्रहेऽपि ब्रह्मणो जिज्ञासाकर्मत्वं न विरुध्यते, ( ब्रह्मज्ञानी मोक्षस्वरूप पर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुति वाक्य ब्रह्मज्ञानसे ही परमपुरुषार्थं ( मोक्ष ) को दिखलाता है । इसलिए यथोक्त साधन सम्पत्ति के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए । ब्रह्मकी जिज्ञासा ब्रह्म जिज्ञासा है । ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्र में वक्ष्यमाण लक्षणवाला ब्रह्म है । अतएव ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए कि ' ब्रह्म ' शब्दका जाति आदि अन्य अर्थ है | ' ब्रह्मणः ' यह कर्ममें षष्ठी है शेषमें नहीं, क्योंकि जिज्ञासाको जिज्ञास्यकी अपेक्षा होती है और यहाँ ( ब्रह्मके सिवा ) अन्य सत्यानन्दी - दीपिका “ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ॥ " ( गो ० ९ ।२१ ) ( हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सब लोक पुनरावर्ति स्वभाववाले हैं । वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि श्रुति, स्मृति वाक्य पुण्य कर्मोंसे संपादित स्वर्गं आदि फलको अनित्य कहते हैं । और ' यत्कृतकं तदनित्यम् ' ( जो जन्य है वह अनित्य है ) यह व्याप्ति भी है । ' अपाम सोमममृता अभूम ' इत्यादि श्रुतिमें जो स्वर्ग आदि लोकोंका अमृतत्व प्रतिपादित है, उसका अभिप्राय यह है कि पृथिवी आदि लोकोंकी अपेक्षा स्वर्ग आदि लोक अधिक काल स्थायी हैं, अतः उनमें अपेक्षाकृत अमृतत्व है स्वरूपसे नहीं । किञ्च ' आभूतसम्पलवं स्थानम-मृतत्वं हि भाष्यते ' ( विष्णुपुराण ) ( प्रलयपर्यन्त स्थायी ये स्वर्ग आदि लोक अमृत शब्दसे कहे जाते हैं ) परन्तु वास्तव में ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( ब्रह्मसे भिन्न सब दुःखरूप मिथ्या है ) इससे स्वर्गं आदि लोकस्थ भोग्य पदार्थोंसे भी विवेकीको अवश्य वैराग्य होता है । इस प्रकार साधन संपत्ति सिद्ध होनेपर अधिकारी भी सिद्ध है, उसके सिद्ध होनेसे उसके द्वारा ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए यह सिद्ध हुआ । इस तरह इस ग्रन्थके आरम्भ करनेमें विप्रतिपत्तिको कोई स्थान नहीं है । * शंका – “ धर्माय जिज्ञासा ' धर्मजिज्ञासा अर्थात् धर्मके लिए जिज्ञासा, क्या इसके समान ' ब्रह्मजिज्ञासा ' इस समस्त पदमें भी ' ब्रह्मणे जिज्ञासा ' ब्रह्मजिज्ञासा अर्थात् ब्रह्मके लिए जिज्ञासा इस प्रकार चतुर्थी तत्पुरुष समास है? समाधान - ' जिज्ञासा ' पद ' ज्ञा ' धातुसे इच्छा अर्थमें ' सन् ' प्रत्ययसे निष्पन्न हुआ है, इच्छाकी उत्पत्ति ज्ञानसे होती है । ज्ञान ज्ञेयके विना नहीं होता, एवं जिज्ञासा भी ज्ञानके विना नहीं होती । इसलिए इच्छा पहले अपने ज्ञानरूप कर्मकी अपेक्षा करती है पश्चात् फलकी । ज्ञानका कर्म ज्ञेय ब्रह्म है । इससे प्रथम इच्छाके कर्मरूप ज्ञानके लिए ' ब्रह्मणो-जिज्ञासा - ब्रह्मजिज्ञासा - ब्रह्मकी जिज्ञासा ' यहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास ही युक्त है । यह षष्ठी विभक्ति कर्म अर्थमें है अन्य अर्थमें नहीं, क्योंकि कर्मका ग्रहण होनेपर फल भी अपने आप अर्थतः सिद्ध हो जाता है | इच्छाका जो कर्म है वही फल है । धर्मजिज्ञासामें स्वर्गं आदि फलको मुख्य रखकर चतुर्थी तत्पुरुष समास किया गया है, परन्तु प्रकृतमें ऐसा नहीं है । यद्यपि ' ब्राह्मणो न हन्तव्य ' ( ब्राह्मणकी हिंसा नहीं करनी चाहिए ) ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् ' ( जो ब्रह्माको प्रथम उत्पन्न करता अथवा धारण करता है ) ' कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ' ( कर्म ब्रह्म वेदसे उत्पन्न हुआ जानो ) ' ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति ' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है ) इस प्रकार ब्रह्म शब्द ब्राह्मणत्व जाति, ब्रह्मा, वेद, परमात्मा आदि अनेक अर्थोंमें प्रयुक्त होता देख सन्देह होता है, तथापि प्रकृत ब्रह्म शब्द परमात्माका ही बोधक है अन्यका नहीं । जिस ब्रह्मविषयक जिज्ञासाका उल्लेख किया गया है उस ब्रह्मका लक्षण अग्रिम सूत्र २ में कहा जायगा । यहाँ जिज्ञासाका जिज्ञास्य ( विषय ) केवल ब्रह्म ही है ।

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२८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ सम्बन्धसामान्यस्य विशेषनिष्ठत्वात् । एवमपि प्रत्यक्षं ब्रह्मणः कर्मत्वमुत्सृज्य सामान्य-द्वारेण परोक्षं कर्मत्वं कल्पयतो व्यर्थः प्रयासः स्यात् । न व्यर्थः, ब्रह्माश्रिताशेषविचार-प्रतिज्ञानार्थत्वादिति चेन्न प्रधानपरिग्रहे तदपेक्षितानामर्थाक्षिप्तत्वात् । ब्रह्म हि ज्ञानेना-' तुमिष्टतमत्वात्प्रधानम् । तस्मिन्प्रधाने जिज्ञासाकर्मणि परिगृहीते यैर्जिज्ञासितैर्विना ब्रह्म जिज्ञासितं न भवति, तान्यर्थाक्षिप्तान्येवेति न पृथक्सूत्रयितव्यानि । यथा राजासौ गच्छती त्युक्ते सपरिवारस्य राज्ञो गमनमुक्तं भवति, तद्वत् । * श्रुत्यनुगमाच्च । ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ( तैत्ति ० ३।१ ) इत्याद्याः श्रुतयः, ' तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म ' ( तैत्ति ० ३।१ ) इति प्रत्यक्षमेव जिज्ञास्यका निर्देश नहीं है । यदि कहो कि शेष में षष्ठीके स्वीकार करनेपर भी ब्रह्म में जिज्ञासा - कर्मत्व विरुद्ध नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध सामान्य विशेषमें भी रहता है । इसप्रकार भी ब्रह्म में प्रत्यक्ष कर्मत्वको छोड़कर सामान्य - सम्बन्ध द्वारा परोक्ष कर्मत्वकी कल्पना करनेवाले तुमको व्यर्थ ही प्रयास होगा । यदि ऐसा कहो कि यह प्रयास व्यर्थ नहीं है, क्योंकि ब्रह्मके आश्रित सब पदार्थों के विचारकी प्रतिज्ञाके लिए है? तो यह युक्त नहीं है, कारण कि प्रधानका परिग्रहण होनेपर तदपेक्षित सब पदार्थों का अर्थतः आक्षेप ( ग्रहण ) हो जाता है । ब्रह्म ही ज्ञानसे प्राप्त करनेके लिए इष्टतम होनेसे प्रधान है । जिज्ञासाके कर्म उस प्रधानका परिग्रह होनेपर जिन जिज्ञासितोंके विना ब्रह्म जिज्ञासित नहीं होता वे तो अर्थतः आक्षिप्त ( ग्रहण ) किये जाते हैं, अतः उनको पृथक् सूत्रित नहीं करना चाहिए अर्थात् सूत्रमें उनके पृथक् ग्रहणकी अपेक्षा नहीं है । जैसे कि ' यह राजा जाता है ' ऐसा कहने से सपरिवार राजाके गमनका कथन हो जाता है, वैसे ही । और श्रुतिके अनुगमसे भी कर्ममें षष्ठी है, ‘ यतो वा ० ' ( जिससे ये प्राणी उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतियाँ ' तद्विजिज्ञासस्व ' ( उसकी जिज्ञासा कर सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि यह हो सकता है कि वेदान्तवाक्य जिज्ञासा के कर्म हों, ब्रह्म और जिज्ञासाका शेषशेषिभाव सम्बन्ध हो, तथापि इच्छा के कर्मरूपसे श्रुत ब्रह्मको छोड़कर अश्रुतकी कल्पना करना ' करस्थं पायसं त्यक्त्वा कूर्पर लेढि मूढधीः ( मूर्खका हाथपर रखी खीरको छोड़कर कुहुनीके चाटने के समान होगा ) निष्कर्ष यह है कि कर्ममें षष्ठी स्वीकार करनेपर सूत्रद्वारा जिज्ञासाका ब्रह्म ही श्रुत कर्म है । शंका-‘ षष्ठी शेषे ' ( पा ० सू ० २।३।५० ) इस व्याकरण सूत्रके अनुसार सम्बन्ध सामान्य प्रतीत होता है । सामान्य सम्बन्धके ज्ञात होनेपर विशेष सम्बन्धकी आकांक्षा होती है? समाधान - इस प्रकार से कर्मका लाभ होनेपर भी प्रत्यक्षतः ' कर्तृकर्मणोः कृति ' ( पा ० सू ० २।३५ ) ( कृदन्तके योगमें कर्तृवाचक और कर्मवाचक पदसे षष्ठी विभक्ति होती है ) इस सूत्र के अनुसार ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा, इस पदसे कृदन्त ' तुमुन् ' प्रत्यय प्रथम प्रत्यक्ष कर्मका ज्ञान कराता है । इसलिए ब्रह्म में प्रत्यक्ष कर्मको छोड़कर ' षष्ठी शेषे ' इस सूत्र अश्रुत कर्मकी कल्पना करना व्यर्थ प्रयास मात्र ही तो है । शेषमें षष्ठी माननेवाले पूर्व -पक्षीके अभिप्रायको ' न व्यर्थ: ' इत्यादिसे अभिव्यक्त करते हैं । * पूर्वपक्षी - ' षष्ठी शेषे ' इस व्याकरण सूत्रके अनुसार शेषमें षष्ठी मानने से ' ब्रह्मणो जिज्ञासा ' इसका ' ब्रह्मसम्बन्धी जिज्ञासा ' ऐसा अर्थ सिद्ध होगा, इससे ब्रह्म और ब्रह्म सम्बन्धी लक्षण, प्रमाण, 1 युक्ति, ज्ञान, साधन और फल इन सबके विचारकी भी प्रतिज्ञा हो जाएगी, क्योंकि इनकी जिज्ञासा से ही ब्रह्मज्ञान होता है । कर्ममें षष्ठी मानने से जिज्ञासाके कर्मभूत ब्रह्मका ही केवल विचार होता है, ब्रह्मसम्बन्धी लक्षण आदिका नहीं, इस आशयसे यहाँ ' शेषमें षष्ठी ' का ग्रहण किया गया है, अतः तत्सम्बन्धी प्रयास व्यर्थं नहीं है । सिद्धान्ती ' न ' इत्यादिसे इसका समाधान करते हैं, ' तद्विजिज्ञासस्व '

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित २ ९ ब्रह्मणो जिज्ञासाकर्मत्वं दर्शयन्ति । तच्च कर्मणि षष्ठीपरिग्रहे सूत्रेणानुगतं भवति । तस्माद्-ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी । ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा । अवगतिपर्यन्तं ज्ञानं सन्वाच्याया इच्छायाः कर्मः फलविषयत्वादिच्छायाः । ज्ञानेन हि प्रमाणेनावगन्तुमिष्टं ब्रह्म । ब्रह्माव-गतिर्हि पुरुषार्थः, निःशेष संसारबीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात् । तस्माद्ब्रह्म विजिज्ञासि-वह ब्रह्म है ) इस वाक्यके द्वारा प्रत्यक्षरूप से ब्रह्मको ही जिज्ञासाका कर्म दिखलाती हैं । वह कम में षष्ठी मानने से हो सूत्र से अनुगत होता है अर्थात् सूत्रके साथ श्रुतिकी एकवाक्यता होती है, इसलिए ' ब्रह्मणः ' यह कर्ममें षष्ठी है । जानने की इच्छाका नाम जिज्ञासा है । ब्रह्म साक्षात्कार पर्यन्त ज्ञान सन् प्रत्ययवाच्य इच्छाका कर्म है, क्योंकि इच्छा फल विषयक होती है । ब्रह्म ज्ञानरूप प्रमाणसे जानने योग्य है । ब्रह्मका साक्षात्कार ही पुरुषार्थ है, क्योंकि उससे निःशेष संसारके बीजभूत अविद्या आदि अनर्थोकी निवृत्ति होती है । अतः ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए । वह ब्रह्म प्रसिद्ध है सत्यानन्दी - दीपिका ( उस ब्रह्मकी जिज्ञासा कर ) यह श्रुति वाक्य भी ब्रह्मजिज्ञासाका ही प्रतिपादन करता है 1 । सारांश यह है कि ' कर्ममें षष्ठी ' माननेसे श्रुति और सूत्रकी एकवाक्यता भी होती है । * ' श्रुत्यनुगमाच्च ' यह संग्रह वाक्य है । ' विस्तरेणोपदिष्टानामर्थानां सूत्रभाष्ययोः । निबन्धो यः समासेन संग्रहं तं विदुर्बुधाः ॥ ' ( सूत्र तथा माध्यमें विस्तारसे उपदिष्ट अर्थोंका जो संक्षेपसे निबन्ध उसे विद्वान् लोग संग्रहरूपसे जानते हैं अर्थात् उसे संग्रहवाक्य कहते हैं ) यह संग्रहवाक्यका लक्षण है । भगवान् भाष्यकार इसकी स्वयं व्याख्या करते हैं । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस सूत्र के साथ ' तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म ' इस श्रुति वाक्यको एकवाक्यता - एकार्थप्रतिपादकता है अर्थात् ब्रह्म ही जिज्ञासाका कर्म है । इसप्रकार दोनोंका एक ही अर्थ है । परन्तु श्रुति और सूत्रका यह अर्थं तभी सिद्ध हो सकता है जब कर्ममें षष्ठी स्वीकार की जाय, अतः उक्तार्थकी सिद्धिके लिए ' ब्रह्मणः जिज्ञासा ' यह कर्ममें षष्ठी है । * यद्यपि अन्तःकरणका वृत्त्यात्मक ज्ञान इच्छाका कारण है, क्योंकि ' जानाति इच्छति ततो यतते ' पहले किसी वस्तुका ज्ञान होता है, अनन्तर उसके पानेकी इच्छा, तदनन्तर उस वस्तु की प्राप्ति के लिए यत्न, इसप्रकार ज्ञान इच्छाका कारण है, तथापि ' मैं प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप हूं ' ऐसी अखण्ड ब्रह्माकार अन्तःकरणकी वृत्ति अनावृत प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूपके साक्षात्कारमें हेतु है, अतः ब्रह्मसाक्षात्कार पर्यन्त वृत्त्यात्मक ज्ञान इच्छाका कर्म है । क्योंकि जिज्ञासा के विना वेदान्त - वाक्योंके श्रवण आदिसे यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, इसलिए उक्त ज्ञान इच्छाका कर्म है और आवरण रहित ब्रह्मस्वरूपकी अभिव्यक्ति ही फल है, वही मोक्ष है । इस तरह आत्मसाक्षात्कार पर्यंन्त ज्ञान सन् · प्रत्यय वाच्य इच्छाका कर्म है । इसी ज्ञानको विद्या शब्दसे कहा जाता है । उससे ' मैं प्रत्यगभिन्न ब्रह्म-स्वरूप नहीं हूँ ' इस अज्ञान तथा उसके कार्यं भूत अनर्थमय संसारकी भी निवृत्ति हो जाती है, परन्तु रज्जु में कल्पित सर्प आदिकी रज्जुके ज्ञानसे जैसे अत्यन्त निवृत्ति होती है, वैसे यहाँ संसारकी अत्यन्त निवृत्ति नहीं होती, अपितु बाधितानुवृत्तिरूप निवृत्ति होती है अर्थात् जैसे अज्ञानावस्था में यह जगत् सत्य प्रतीत होता हैं, वैसे ज्ञानावस्था में प्रतीत नहीं होता प्रत्युत मिथ्या प्रतीत होता है, अतः अनर्थमय जगत्की निवृत्तिके लिए ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए । इस प्रकार ' अथ ' तथा ' अतः ' शब्दसे साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी सिद्ध होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि अधिकारीके लिए ब्रह्म जिज्ञासितव्य है । इति तृतीय वर्णक ।

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३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ तव्यम् । तत्पुनर्ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् । यदि प्रसिद्धं, न जिज्ञासितव्यम् । अथाऽ-प्रसिद्धं, नैव शक्यं जिज्ञासितुमिति । उच्यते - अस्ति तावदब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं, सर्वज्ञं, सर्वशक्तिसमन्वितम्; ब्रह्मशब्दस्य हि व्युत्पाद्यमानस्य नित्यशुद्धत्वादयोऽर्थाः प्रतीयन्तेः बृहतेर्धातोरर्थानुगमात् । सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्तित्वप्रसिद्धिः । सर्वो ह्यात्मा-स्तित्वं प्रत्येति, न नाहमस्मीति । यदि हि नात्मास्तित्वप्रसिद्धिः स्यात् सर्वो लोको नाहमस्मीति प्रतीयात् । आत्मा च ब्रह्म । * यदि तर्हि लोके ब्रह्मात्मत्वेन प्रसिद्धमस्ति, अथवा अप्रसिद्ध? यदि प्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा नहीं होनी चाहिए, यदि अप्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा ही नहीं हो सकती । इसपर कहते हैं - नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्ति-सम्पन्न ब्रह्म तो प्रसिद्ध है । ' बृह ' धातुके अर्थके अनुगमहोनेसे व्युत्पत्ति सिद्ध ब्रह्म शब्द से नित्यत्व शुद्धत्व आदि अर्थ प्रतीत होते हैं और सबका आत्मा होनेसे ब्रह्मका अस्तित्व प्रसिद्ध है । आत्मा अस्तित्वका अनुभव सबकों होता है । ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा ज्ञान किसीको नहीं होता । यदि आत्माका अस्तित्व प्रसिद्ध न होता तो सब लोग ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा अनुभव करते । आत्मा ही ब्रह्म है । सत्यानन्दी - दीपिका * ब्रह्मज्ञानके प्रति साधनरूपसे इस ग्रन्थका आरम्भ युक्त नहीं है, क्योंकि जो ब्रह्म जिज्ञास्य कहा जाता है, क्या वह वेदान्त विचारसे पूर्व ज्ञात है अथवा अज्ञात? यदि ज्ञात है तो शास्त्रसे अप्रतिपाद्य होनेके कारण इस ग्रन्थका विषय नहीं हो सकेगा । किञ्च ब्रह्मके अज्ञानका अभाव होनेसे अज्ञानकी निवृत्तिरूप फल भी नहीं हो सकेगा, तब शास्त्रका विचार करना अयुक्त है । यदि अज्ञात है, तो उसके विषय में कोई भी विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि अज्ञात पदार्थ विचारका विषय नहीं होता । बुद्धि - विचारके क्षेत्रमें न आ सकनेवाले पदार्थका विचारात्मक शास्त्रसे अथवा वेदान्तसे प्रतिपादन नहीं हो सकता । विषय और शास्त्रका प्रतिपाद्य - प्रतिपादकभाव न होनेसे ज्ञान भी उत्पन्न नहीं हो सकता, ज्ञानके न होनेसे अज्ञानकी निवृत्तिरूप फल भी नहीं हो सकेगा । इस प्रकार प्रयोजन आदिका अभाव होनेके कारण यह शास्त्र आरम्भणीय नहीं है अथवा ब्रह्म जिज्ञासितव्य नहीं है, ऐसा पूर्वपक्षीका आशय है । इस शंकाका ' उच्यते ' इत्यादिसे समाधान करते हैं । * भाष्यमें नित्य शुद्ध आदि शब्दोंसे उपाधि रहित निर्गुण ब्रह्मका तथा सर्वज्ञ आदि शब्दोंसे सोपाधिक सगुण ब्रह्मका प्रतिपादन है । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको व्यापक कहती हैं । तथा ' बृहि वृद्धौ ' इसप्रकार व्याकरणके अनुसार निरतिशय महत्त्व अर्थमें ' बृहि ' धातुसे ब्रह्म शब्द निष्पन्न हुआ है और ' बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाद्वात्मैव ब्रह्मेति गीयते ' ( भामती ) ( वृद्धिका कारण और बृहत् होनेसे आत्मा ही ब्रह्म कहा जाता है ) इस व्युत्पत्ति से भी ब्रह्म शब्दका अर्थ व्यापक है । इससे देश, काल तथा वस्तु परिच्छेद - इयता से रहित ब्रह्म नित्य सिद्ध है । इस तरह ' तत्वमसि ' इस वाक्यस्थ ' तत् ' पदसे ब्रह्मका सामान्यरूप ज्ञात होनेपर भी उसके विशेषरूपकी जिज्ञासा होती है, प्रत्येक वस्तुका सामान्य ज्ञान ही उसके विशेष ज्ञानके प्रति हेतु माना गया है । किञ्च ' त्वम् ' पदार्थ - आत्मासे भी ब्रह्म प्रसिद्ध है । जैसे ‘ अयमात्मा ब्रह्म ', अतः ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए । यह सब ' सर्वस्य ' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं । ' सर्व शून्यं शून्यम् ' ( सब शून्य ही है ) शून्यवादी बौद्ध के अनुसार शून्यके अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व अप्रसिद्ध है, शून्य ही आत्मा है । शून्यका अर्थ है अस्तित्व रहित अर्थात् कुछ नहीं । यदि आत्मा शून्य है तो ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा ही सब लोगोंको ज्ञान हो, परन्तु इसके विपरीत नव जात शिशुसे लेकर वृद्ध पर्यन्त सबको ' मैं हूँ ' ऐसा निर्वाध ज्ञान होता है । इसलिए आत्माका अस्तित्व सर्वलोक

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३१ ततो ज्ञातमेवेत्यजिज्ञास्यत्वं पुनरापन्नम् । न; तद्विशेषं प्रति विप्रतिपत्तेः । देहमात्रं चैतन्य-विशिष्टमात्मेति प्राकृता जना लोकायतिकाश्च प्रतिपन्नाः । इन्द्रियाण्येव चेतनान्यात्मेत्यपरे । यदि लोक में ब्रह्म आत्मरूप से प्रसिद्ध है तो वह ज्ञात ही है, इस प्रकार पुनः ब्रह्ममें अजिज्ञास्यत्व प्राप्त हुआ? ऐसी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उसके विशेष ज्ञानमें विप्रतिपत्ति ( विवाद ) है । जैसे कि चैतन्यविशिष्ट देहमात्र आत्मा है, ऐसा प्राकृत जन तथा लोकायतिक ( चार्वाक ) मानते हैं । परन्तु दूसरे चेतन इन्द्रियोंको ही आत्मा कहते हैं । और कुछ मनको ही आत्मा मानते हैं । कोई क्षणिक सत्यानन्दी - दीपिका प्रसिद्ध है । ' यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यश्वास्य संततो भावस्तस्मादात्मेति भाष्यते ” ॥ ( लिङ्ग ० पु ० १।७०।९ ६ ) ' आप्लु व्याप्तौ ' ( इस धातु अर्थके अनुसार यह सबको व्याप्त करता है । सबका अपनेमें संहार करता है, स्वचैतन्यावभास से सब विषयोंका उपलब्धा है, कल्पित पदार्थोंका अधिष्ठान होकर निरन्तर सत्ता, स्फूर्ति प्रदान करता है, इसलिए इसे आत्मा कहते हैं ) । इत्यादि श्रुति, स्मृति वाक्योंसे यह सिद्ध होता है कि आत्मा ही ब्रह्म है । ' शंका- ' मैं हूँ ' इस प्रकार जब आत्मरूप से ब्रह्म सर्वलोक प्रसिद्ध है, तो आत्माके ज्ञात होनेपर ब्रह्म भी स्वभावत: ज्ञात हुआ । इस तरह ब्रह्म ज्ञात होनेपर जिज्ञासाका विषय नहीं हो सकता । अज्ञात वस्तु ही जिज्ञासाका विषय होती है । अज्ञात ब्रह्म ग्रन्थका विषय है, वेदान्त - वाक्योंके विचारसे ज्ञात होनेपर वह प्रयोजन है । यह ठीक है, परन्तु प्रसङ्गमें तो इसके विपरीत आत्मरूपसे ब्रह्म सदा सबको ज्ञात है, अत: वह जिज्ञास्य न होनेके कारण ग्रन्थ से प्रतिपाद्य भी नहीं होगा, इससे उसका ज्ञान भी नहीं होगा, उसके न होनेसे ज्ञान निवर्त्य अज्ञानको निवृत्तिरूप प्रयोजन भी सिद्ध न होगा । इस प्रकार विषय और प्रयोजनका अभाव होनेपर यह ग्रन्थ आरभणीय नहीं है । सि ० - समाधान - ' मैं हूँ ' आत्मा इस सत् चैतन्यरूप सामान्य धर्मसे यद्यपि ब्रह्म ज्ञात है, तो भी ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि विशेष धर्मो ब्रह्म ज्ञात नहीं है । यदि ब्रह्म विशेषरूपसे ज्ञात होता तो वादियोंका आत्मविषयक परस्पर मतभेद नहीं होता? उनकी विप्रतिपत्तिसे यह सिद्ध होता है कि आत्माके सामान्यरूप से ब्रह्म ज्ञात होनेपर भी विशेषरूपसे अज्ञात है । यद्यपि ब्रह्म में सामान्य और विशेष दोनों रूप कल्पित हैं, तथापि यह सब जिज्ञासुओं को समझानेके लिए कहा गया है । ब्रह्म विशेषरूपसे अज्ञात होनेपर ' देहमात्रम् ' इत्यादि माष्य से स्थूल और सूक्ष्म क्रमसे वादियोंका मतभेद दिखलाया जाता है । शास्त्र विचार रहित जन प्राकृत कहे जाते हैं । इनके मतमें स्वतन्त्र अथवा अस्वतन्त्ररूपसे चैतन्य नहीं है, किन्तु पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार भूतोंकी देहाकारमें परिणिति ही चैतन्य है । इस विषय में इन्हीं लोगोंकी यह “ अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्य्यनलानिलाः । चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ” ॥ उक्ति भी है । ' मैं मनुष्य हूँ ' तथा ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्त ' ( कठ ० ३।४ ) स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ' ( तै ० आ ० २।१।१ ) ( यह पुरुष अन्नरसमय है ) इस प्रकार देहके आत्मत्वमें लोक प्रतीति और श्रुति प्रमाण भी है, यह देहात्मवादियोंका मत है । वे केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानते हैं, क्योंकि इनके मतमें अतीन्द्रिय कोई पदार्थ नहीं है, इसलिए इन्हें अनुमान आदि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है । मरणको ही वे अपवर्ग कहते हैं । ' इन्द्रियाण्येव ' इत्यादि भाष्यसे इन्द्रिय आत्मवादी मतका उल्लेख है - जाग्रत् अवस्थामें रूप - आदिका ज्ञान नेत्र आदि इन्द्रियोंसे होता है, अन्धादिको रूपादिका ज्ञान नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक से यह सिद्ध होता है कि ज्ञानका आश्रय इन्द्रियाँ हैं देह नहीं, देह तो केवल नेत्र आदि इन्द्रियोंका आधारभूत व जड़ है चैतन्य नहीं । सुषुप्ति में सर्वलोक प्रसिद्ध इस स्थूल शरीरके विद्यमान

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३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० १ मन इत्यन्ये । विज्ञानमात्रं क्षणिक मित्येके । शून्यमित्यपरे । अस्ति देहादिव्यतिरिक्तः संसारी कर्ता भोक्तेत्यपरे । भोक्तैव केवलं न कर्तेत्येके । अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्व-विज्ञान मात्र ( बुद्धि ) को ही आत्मा कहते हैं । किन्हींके मत में शून्य आत्मा है । अन्य कहते हैं कि देह आदिसे भिन्न संसारी कर्ता भोक्ता आत्मा है । कोई ऐसा मानते हैं कि आत्मा केवल भोक्ता है कर्ता नहीं । कोई कहते हैं कि जीवसे भिन्न ईश्वर सर्वज्ञ, सर्व शक्ति सम्पन्न है । वह ईश्वर भोक्ता सत्यानन्दी - दीपिका और इन्द्रियोंके अविद्यमान होनेसे ज्ञान नहीं होता, इस अन्वयव्यतिरेकसे भी ज्ञानका आश्रय इन्द्रियाँ ही हैं । ' पश्यामि शृणोमि, जिघ्रामि ' ( देखता हूँ, सुनता हूँ, सूँघता हूँ ) इत्यादि प्रत्यक्ष लौकिक प्रतीतिसे तथा इन्द्रिय संवादमें ' ते ह वाचमुचुः ' ( बृह ० १।३।२ ) ( उन चक्षु आदिने वाणीसे कहा ) इत्यादिश्रुति सिद्ध होता कि इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । ' मन इत्यन्ये ' इस भाष्यसे मनको आत्मा माननेवालों का मत दिखाया गया है । यदि इन्द्रियाँ आत्मा हों तो स्वप्नमें नेत्र आदि इन्द्रियोंके न होनेसे किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होना चाहिए, किन्तु ' जानामि ' इत्यादि ज्ञान तो वहाँ भी सर्वानुभव सिद्ध है, वह ज्ञान मनसे होता है । जाग्रत् में भी ज्ञान मनसे होता है, इन्द्रियाँ तो केवल साधन मात्र हैं । यदि इन्द्रियोंको आत्मा मानें तो सब इन्द्रियों के आत्मा होनेसे कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि उन सबका ऐकमत्य होना सम्भव नहीं है । यदि उनका कोई एक नियामक मानें तो वही आत्मा होगा तब उनमें आत्मत्व प्रतिज्ञा बाधित हो जायगी । इसलिए ' मैं जानता हूँ ' इस प्रतीति तथा ' अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः ' ( तै ० ६।३ ) ( प्राणमयके भीतर और उससे भिन्न आत्मा मनोमय है ) इत्यदि श्रुति प्रमाणसे भी मन ही आत्मा सिद्ध होता है । ' विज्ञानमात्रं क्षणिकम् ' इस भाष्यसे क्षणिक विज्ञानवादी योगाचार मतका उल्लेख है । विज्ञान-वादी - बुद्धि मनको जानती है, अतः बुद्धि ही आत्मा है मन नहीं । बुद्धिसे भिन्न बाह्य कोई भी पदार्थं नहीं है, मन भी बुद्धिका ही आकार ( परिणाम ) विशेष है । बुद्धि ( विज्ञान ) अपने उत्पत्ति क्षणसे द्वितीय क्षणमें नष्ट हो जाती है, अतः क्षणिक कही जाती है । इस विषयमें ' अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः ' ( तै ० २।४ ) ( मनसे आन्तर और भिन्न आत्मा विज्ञानमय है ) इत्यादि श्रुति प्रमाण मी है । ' शून्यमित्यपरे ' इस भाष्यसे शून्यवादी माध्यमिक मतका उल्लेख है - क्षणिक विज्ञान आत्मा नहीं हो सकता, क्योंकि सुषुप्ति में वस्तुतः विज्ञानका भी अभाव है अर्थात् आन्तर बाह्य शून्य है, अकस्मात् ‘ अहं प्रत्यय ' उदय होता है और वह असत्को विषय करता है । इस प्रत्यक्ष प्रतीतिसे तथा ‘ असदेवेमदग्र आसीत् असतः सज्जायत ' ( छा ० ६ । २ ।१ ) ( आरम्भमें यह एक मात्र अद्वितीय असत् ही था, ` असत्से सत्की उत्पत्ति हुई ) इत्यादि श्रुतिसे यह सिद्ध होता है कि शून्य ही आत्मा है । ' अस्ति ' इत्यादि भाष्यसे नैयायिक आदिका मत दिखाया गया है । जब ' अस्यात्मा ' ( आत्मा है ) ' अहमस्मि ' ( मैं हूँ ) ' अहं जानामि ' ( मैं जानता हूँ ) इत्यादि प्रत्यक्ष प्रतीतिसे तथा ' मन्ता बोद्धा कर्ता ' ( प्रश्न ४।९ ) इत्यादि श्रुतिसे कर्ता, भोक्ता आत्मा उपलब्ध होता है तो ' शून्य आत्मा है ' यह शून्यवादीका कथन केवल उपहास मात्र है । ' मोकैव केवलम् ' इस भाष्यसे सांख्य मतका उल्लेख है । सांख्य — ' मैं कर्ता हूँ ' इस प्रतीतिसे आत्मामें कर्तृत्व मानना युक्त नहीं है, क्योंकि यह प्रतीत अहंकारमें कर्तृत्वको विषय करती है, कारण कि ' असङ्गो नहि सज्जते ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है । किञ्च ' मै सुखी, मैं दुःखी ' इस प्रत्यक्ष प्रतीतिसे तथा ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्य ' ( श्वेता ० ४।६ ) ( ईश्वर और जीव इन दोनोंमेंसे अन्य ( जीव ) कर्मफल भोक्ता है ) आदि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३३ शक्तिरिति केचित् । आत्मा स भोक्तुरित्यपरे । एवं बहवो विप्रतिपन्ना युक्तिवाक्यतदा-भाससमाश्रयाः सन्तः । तत्राविचार्य यत्किंचित्प्रतिपद्यमानो निःश्रेयसात्प्रतिहन्येतानर्थं चेयात् । तस्माद् ब्रह्मजिज्ञासोपन्यासमुखेन वेदान्तवाक्यमीमांसा तदविरोधितर्कोपकरणा निःश्रेयसप्रयोजना प्रस्तूयते ॥ १ ॥

( जीव ) का आत्मा ( स्वरूप ) है कोई ऐसा मानते हैं । इस प्रकार युक्ति, वाक्य तथा उनके आभासों का आश्रयकर अनेक मतभेद हैं । उन सबका वास्तविक विचार किए विना जिस किसी मतको प्राप्त करने-वाला मोक्षसे वञ्चित रहेगा और साथ ही अनर्थको प्राप्त होगा । इसलिए ब्रह्म जिज्ञासाके कथनद्वारा जिसमें अविरोधी तर्क साधनरूप हैं ऐसी मोक्ष प्रयोजनवाली वेदान्तवाक्योंकी मीमांसा प्रस्तुतकी जाती है ॥ १ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका कि आत्मा केवल भोक्ता है । इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन, क्षणिकविज्ञान, शून्य, कर्ता भोक्ता, केवल भोक्ता आदि ' त्वम् ' पद वाच्य आत्मामें वादियोंका संक्षेपसे मतभेद दिखलाया गया है । अब ' तत् ' पद वाच्य ईश्वर में मी ' अस्ति तद्व्यतिरिक्तः ' इत्यादि भाष्यसे मतभेद दिखलाते हैं । वेद प्रामाण्यको माननेवाले मीमांसक आदि कई लोग ' तत् ' पद वाच्य ईश्वरको नहीं मानते, अतः उनके मतमें ईश्वर विषयक चर्चाका अवकाश ही नहीं है । परन्तु ईश्वरवादी मतको लेकर यह विप्रतिपत्ति दिखाई जाती है । उपर्युक्त विवेचनसे जो देह आदिसे भिन्न कर्ता, भोक्ता आदि रूप जीव सिद्ध हुआ है, वह ईश्वरसे भिन्न है अथवा अभिन्न? इस विषयमें योग मतवाले ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुति और ' क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर: ' ( यो ० सू ० १४ ) ( अविद्या आदि क्लेश, शुभाशुभ आदि कर्म, जन्म, आयु और मोगरूप फल और उनसे उत्पन्न वासनाओंसे असम्बन्धित पुरुष विशेष ईश्वर है ) इस सूत्र के आधारपर सर्वज्ञ, सर्ववित्, शर्वशक्ति सम्पन्न ईश्वर ' तत् ' पद वाच्य है और वह जीवसे भिन्न है । परन्तु लक्षणावृत्तिसे वेदान्तमतावलम्बी तो अविद्या उपाधि विशिष्ट ' त्वम् ' पदवाच्य कर्ता, भोक्ता जीवात्माको ' तत् ' पदवाच्य ईश्वर स्वरूप सिद्ध करते हैं, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिवाक्य जीव ईश्वरसे भिन्न नहीं है अपितु तत्स्वरूप ही है ऐसा कहते हैं । इसमें ' जीवो ब्रह्मैव आत्मत्वात् ब्रह्मवत् ' आत्मा होनेसे जीव ब्रह्म ही है जैसे ब्रह्म, इत्यादि युक्ति भी है । शेष मत तो युक्त्याभास और वाक्याभासोंका अवलम्बन कर केवल विवाद करते हैं । जो युक्ति न होकर युक्ति के संदृश तथा प्रमाण न होकर प्रमाणके सदृश प्रतीत हों वे युवत्याभास तथा प्रमाणाभास कहे जाते हैं । ' देहोऽनात्मा भवितुमर्हति ज्ञेयत्वात् जड़त्वात्, परिच्छिन्नत्वात् घटादिवत् ' देह अनात्मा होने योग्य है, क्योंकि ज्ञेय, जड़ और परिच्छिन्न है जैसे घट आदि इत्यादि युक्तियों तथा ' आनन्द-मयोऽभ्यासात् ' ( ब्र ० सू ० १।१।१२ ) इत्यादि सूत्रोंसे अन्योंके मत किस प्रकार युक्त्याभास और प्रमाणाभासरूप हैं यह सब आगे दिखलाया जायगा । शंका - वादियों द्वारा एकवस्तु विषयक मतभेद दिखलाए जानेपर तो सन्देह होगा अथवा जिसकी जिस मतमें श्रद्धा होगी उसका अवलम्बनकर वह अपना प्रयोजन सिद्ध कर लेगा, तो पुनः ब्रह्मविषयक विचार करनेका क्या प्रयोजन? समाधान -' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' ' तत्त्वज्ञानादेव निःश्रेयसमधिगमः ' ( जीव ब्रह्मैक्य ज्ञानसे ही मोक्ष होता है ) यह वेदोंका सारभूत सिद्धान्त है । यदि इस श्रुति सम्मत सिद्धान्तको छोड़कर मुमुक्षु अन्य मतको अपनाएगा तो वह कदापि मोक्षको प्राप्त नहीं होगा, अपितु अनर्थमय संसारको प्राप्त होगा, क्योंकि “ असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । ताँस्ते प्रत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः ॥ ” . ( ईश ० ३ ) ( सत्, चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म मैं हूँ ) जो ऐसा ज्ञान न प्राप्तकर आत्माको कर्ता,

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३४ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ( २ जन्माद्यधिकरणम् सू ० २ ) * ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम् । किंलक्षणं पुनस्तद्ब्रह्मेत्यत आह भगवान्सूत्रकारः-प्रथम अधिकरणमें कहा गया है कि ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए । अब यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उस ब्रह्मका लक्षण ( स्वरूप ) क्या है? इसपर भगवान् सूत्रकार कहते हैं-जन्माद्यस्य यतः ॥ २ ॥

पदच्छेद - जन्मादि, अस्य, यतः । सूत्रार्थ - ( अस्य ) इस जगत् की ( जन्मादि ) उत्पत्ति, स्थिति तथा लय ( यतः ) जिससे होते हैं, वह ब्रह्म है । * जन्मोत्पत्तिरादिरस्येति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः । जन्मस्थितिभिङ्गं समा-जन्म - उत्पत्ति है आदि में जिनके वे जन्मादि, यह तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि समास है । उत्पत्ति, स्थिति सत्यानन्दी - दीपिका भोक्ता, संसारी आदि समझते हैं, वे आत्मघाती अज्ञानसे आवृत असुर योनियोंको प्राप्त होते हैं ) ' " योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥ " ( जो पुरुष आत्माका जैसा सत्, चित् आनन्दस्वरूप है वैसा न समझकर उसे कर्ता भोक्ता आदि समझता है, उस आत्मापहारी चौरने कौन - सा पाप नहीं किया ) इत्यादि श्रुति, स्मृति प्रमाण हैं । सारांश यह है कि बन्ध अध्यासमूलक है और उसकी निवृत्ति ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे होती है, एतावता इस ग्रन्थके विषय और प्रयोजन सिद्ध ही हैं । वेदान्त विचार पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रोंसे सिद्ध नहीं है, इसलिए वेदान्त विचारार्थं इस ग्रन्थका आरम्भ आवश्यक है । विषय और ग्रन्थका प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव और अधि-कारीका प्राप्य प्रापकभाव आदि सम्बन्ध हैं, इस प्रकार विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारीके सिद्ध होनेपर परम निःश्रेयसकी साधन भूत एवं तत्त्वज्ञान ( जीवब्रह्मैक्य ज्ञान ) की प्रयोजक यह ब्रह्ममीमांसा आरम्भ की जाती है ॥ १ ॥

* प्रथम सूत्रसे शास्त्रक्के आरम्भकी उपपत्ति दिखलाकर शास्त्रका आरम्भ करते हुए भगवान् भाष्यकार पूर्व और उत्तर अधिकरणकी संगति सूचित करनेके लिए उक्तका पुनः ' ब्रह्म ' इत्यादिसे उल्लेख करते हैं । पहले यह कहा जा चुका है कि मुमुक्षुको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति के लिए वेदान्त वाक्योंका विचार करना चाहिए । इस कथनसे यद्यपि प्रधानरूपसे ब्रह्म प्रतिज्ञात होनेपर तदङ्गभूत प्रमाण आदि भी प्रतिज्ञात हो जाते हैं, तो भी ब्रह्म विषयक प्रमाण तथा युक्ति ( साधक, बाधक प्रमाणोंके सहकारी तर्क ) आदिका विचार ब्रह्म के विशेषज्ञानके विना नहीं हो सकता, अतः ब्रह्मके यथार्थ ज्ञानके लिए प्रथम ब्रह्मका लक्षण कहना चाहिए । शंका - परन्तु अनुभूत वस्तु निश्चय ही परिमित, जड़, मलिन तथा विनाशी होती हैं । इस अनुभूयमान दृश्यरूपसे तथा तदतिरिक्त नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव ब्रह्मका स्वरूप ज्ञात नहीं हो सकता । प्रसिद्धका ही लक्षण होता है अत्यन्त अप्रसिद्धका नहीं? सि०-समाधान - प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध के विषयमें यह बात है कि जो इतर प्रमाणसे अप्रसिद्ध है वह शब्द प्रमाणसे प्रसिद्ध ही है । परन्तु यहाँ तो शब्दसे भी प्रसिद्ध नहीं है, क्योंकि लक्षणीय ब्रह्म अत्यन्त अप्रसिद्ध है इस आशयसे ' किं लक्षणं ब्रह्म ' ऐसा कहा है अर्थात् ब्रह्मका लक्षण नहीं हो सकता, अतः उसकी जिज्ञासा भी नहीं हो सकती । पूर्वपक्षी के इसप्रकार के आक्षेपसे इस अधिकारणका आरम्भ है, इसलिए पूर्व अधिकरणकी इस अधिकरण के साथ आक्षेपसंगति है । जो पहले आक्षेप किया गया है कि अत्यन्त अप्रसिद्ध ब्रह्मका लक्षण नहीं हो सकता ।

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ३५ सार्थः । जन्मनश्चादित्वं श्रुतिनिर्देशापेक्षं वस्तुवृत्तापेक्षं च । श्रुतिनिर्देशस्तावत्- ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ( तैत्ति ० ३ | १ ) इत्यस्मिन्वाक्ये जन्मस्थितिप्रलयानां क्रमदर्शनात् । वस्तुवृत्तमपि जन्मना लब्धसत्ताकस्य धर्मिणः स्थितिप्रलयसंभवात् । अस्येति प्रत्यक्षादि-संनिधापितस्य धर्मिण इदमा निदशः । षष्ठी जन्मादिधर्मसंबन्धार्था । यत इति कारण-निर्देशः । अस्य जगतो नामरूपाभ्यां व्याकृतस्यानेककर्तृभोक्त संयुक्तस्य प्रतिनियतदेश कालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसाव्यचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभङ्गं यतः सर्वज्ञा-और नाश यह समासका अर्थ है | श्रुति निर्देशसे तथा वस्तुस्थितिकी अपेक्षा जन्म आदि है | श्रुति निर्देश है ' यतो वा इमानि ० ' ( जिससे ये आकाश आदि सारे भूत उत्पन्न होते हैं ) इस वाक्य में उत्पत्ति, स्थिति और नाशका क्रम दिखाई देता है । वस्तु स्थिति भी ऐसी है कि जन्मसे सत्ताको प्राप्त धर्मीकी ही स्थिति और लयका संभव है । ' अस्य ' प्रत्यक्ष आदिसे सिद्ध धर्मीका ' इदम् ' शब्दसे निर्देश है | और ' अस्य ' इसमें षष्ठी विभक्ति जन्म आदि धर्मोका धर्मी ( जगत् ) के साथ सम्बन्ध द्योतनके लिए है । ' यतः ' यह शब्द कारणका निर्देशक है । जो नाम रूपसे अभिव्यक्त हुआ है तथा अनेक कर्ता और भोक्ताओंसे संयुक्त है, जो प्रतिनियत देश, काल और निमित्तसे क्रिया और फलका आश्रय है एवं मनसे भी अचिन्त्य रचनारूपवाले इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय सत्यानन्दी - दीपिका अब इसका सूत्र और भाष्यद्वारा ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुतिवाक्यकी पृष्ठभूमि में समाधान किया जाता है । इस नाम रूपात्मक प्रपञ्च की उत्पत्ति, स्थिति और लय जिससे होते हैं वह ब्रह्म है । इसप्रकार ब्रह्मका लक्षण उपपन्न होता है । इससे सिद्ध होता है कि कल्पित जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान - उभयात्मक कारण ब्रह्म है । उत्पत्ति आदिमें है जिनके ऐसे स्थिति और प्रलय जन्मादि कहे जाते हैं, यहाँ बहुब्रीहि समास है । वह दो प्रकारका है, एक तद्गुणसंविज्ञान और दूसरा अतद्गुणसंविज्ञान । जहाँ विशेषण पदार्थोंका क्रियामें अन्वय हो वहाँ तद्गुणसंविज्ञान समझना चाहिए | अथवा सत्र पदार्थ विशेषण तथा गौण हों और अन्य पदार्थ विशेष्य तथा प्रधान हों तो वह तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि समास है । यथा ' लम्बकर्णकमानय ' ' लम्बे कानवाले ( गर्दभ ) को ले आओ ' यहाँ ' लम्बे कान ' यह विशेषण है और ' आनय ' कियामें अन्वित होता है । अथवा ' पीताम्बरो हरिः ' ' पीतानि अम्बराणि यस्य सः पीताम्बरो हरिः ' यहाँ ' पीतवस्त्र ' विशेषण है और ' हरि ' विशेष्य है । यहाँ विशेषण गौण है और विशेष्य प्रधान है अर्थात् जहाँ समासके घटकी भूत विशेषण पदार्थ गौणरूपसे ज्ञात हों वह तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि समास है । जहाँ समासके घटकी भूत विशेषण पदार्थोंका क्रियामें अन्वय न हो वह अतद्गुणसंविज्ञान कहा जाता है । यथा ' दृष्ट-सागरमानय ' ' दृष्टसागरको ले आओ ' अर्थात् जिसने सागर देखा है उसे ले आओ ' यहाँ व्यक्तिके साथ सागरका क्रियामें अन्वय नहीं है, अतः यह अतद्गुणसंविधान बहुब्रीहि समास है । प्रकृतमें तो तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि सहैं, क्योंकि यहाँ ' जन्मादि ' सूत्रमें स्थिति और लय विशेष्यों के साथ उत्पत्ति रूप विशेषणका भी ग्रहण है । किञ्च ' अस्य ' इस ' इदद् ' पदसे कार्य मात्रका ग्रहण किया गयाँ है अर्थात् सूत्रमें प्रत्यक्ष - श्रुति ( इदं सर्वमसृजत ), अनुमान - स्मृति आदिसे सिद्ध कार्यमात्रका निर्देश किया गया है । और ' अस्य ' इस इदम् पदमें षष्ठी विभक्ति आकाश आदि सम्पूर्ण प्रपञ्चका जन्म आदि धर्मोके साथ सम्बन्ध सूचित करती है । इससे यह सिद्ध हुआ कि सम्पूर्ण जगत् के जन्म आदि ब्रह्म होते हैं । * जैसे कुम्हार ' घट ' नामकी वस्तुके नाम और रूपका पहले अपने अन्तःकरणमें विचारकर

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३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ त्सर्वशक्तेः कारणाद्भवति, तद्ब्रह्मेति वाक्यशेषः । अन्येषामपि भावविकाराणां त्रिष्वे-वान्तर्भाव इति जन्मस्थितिनाशानामिह ग्रहणम् । यास्कपरिपठितानां तु ' जायतेऽस्ति ' इत्यादीनां ग्रहणे तेषां जगतः स्थितिकाले संभाव्यमानत्वान्मूलकारणादुत्पत्तिस्थितिनाशा जगतो न गृहीताः स्युरित्याशङ्कयेत, तन्मा शङ्कीति योत्पत्तिर्ब्रह्मणस्तत्रैव स्थितिः प्रलयश्च तएव गृह्यन्ते । * न यथोक्तविशेषणस्य जगतो यथोक्तविशेषणमीश्वरं मुक्त्वान्यतः जिस सर्वज्ञ, शक्तिमान् कारणसे होते हैं ' वह ब्रह्म है ' यह वाक्यशेष है । अन्य भावविकारोंका भी इन तीनोंमें ही अन्तर्भाव है, इसलिए उत्पत्ति, स्थिति और नाशका यहाँ ( सूत्र में ) ग्रहण है । यास्कमुनि से पठित ' जायते ' ( उत्पन्न होता है ) ' अस्ति ' ( है ) इत्यादि छ भावविकारोंका ग्रहण किए जानेपर जगत्को स्थिति कालमें उनकी संभावना होनेसे मूल कारणसे जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और नाश गृहीत नहीं होंगे, संभव है कोई यह आशङ्का करे ऐसी शंका न करे, इसलिए ब्रह्मसे इस जगत् की जो उत्पत्ति, उसीमें जो स्थिति और लय श्रुति में प्रतिपादित हैं वे ही जन्म स्थिति और लय यहाँ गृहीत होते हैं । पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त जगत्की यथोक्त विशेषण विशिष्ट ईश्वरको छोड़कर सत्यानन्दी - दीपिका अनन्तर उसे बाहर बनाता है, वैसे ही परम कारण ब्रह्म भी अपने प्रत्यक्ष किए हुए जगत्को नाम - रूपसे अभिव्यक्त करता है । इसमें ' विवादास्पदं जगत् चेतनकर्तृकं कार्यत्वात् नाम-रूपात्मकत्वाच्च घटवत् ’ ‘ जैसे नामरूपात्मक तथा कार्य होनेसे घट चेतनकर्तृक है, वैसे ही विवादका विषयभूत यह जगत् भी नामरूपात्मक तथा कार्यं होनेसे चेतनकर्तृक है ' यह अनुमान भी है । इससे सांख्यसम्मत जड़ प्रधान कर्तृत्व तथा बौद्ध सम्मत स्वरूप रहित शून्य कर्तृत्वका निषेध होता है । यह जगत् अनेकविध कर्ता तथा भोक्ताओंसे युक्त है । यहाँ कोई केवल कर्ता है और कोई केवल भोक्ता । ऋत्विज् यज्ञ आदिका केवल कर्ता है और यजमान कर्मफल भोक्ता है । श्राद्ध आदिमें पितृगण केवल मोक्ता और पुत्र आदि केवल कर्ता हैं । वैश्वानरेष्टिमें पिता कर्ता और पुत्र फल भोक्ता है । हाँ, क्वचिद् भोजनादिमें कर्ता भी भोक्ता है, इससे यहाँ कर्ता और भोक्ताका पृथक् पृथक् ग्रहण किया गया है । व्याकरणानुसार परस्मैपदसे भी यही सिद्ध होता है कि याज्ञिकोंसे फल भोक्ता यजमान पृथक् है, अन्यथा परस्मैपदका प्रतिपादन व्यर्थ हो जायगा अथवा उसका सर्वथा लोप हो जायगा । किञ्च सम्पूर्ण क्रियाके फलका आश्रयभूत इस जगत् में देश काल और निमित्त आदिकी पूर्णरूप से व्यवस्था है । कोई प्रतिनियत देश में उत्पन्न होते हैं, जैसे कृष्णमृग, केसर आदि । कोई प्रतिनियत कालमें होते हैं, यथा कोकिलका आलाप आदि वसन्त ऋतु में होते हैं । इसप्रकार कोई प्रतिनियत निमित्तसे होते हैं, जैसे बलाकाके गर्भ धारणका नियमित निमित्त नवघन ध्वनि है । कोई नियत क्रियावाले होते हैं, यथा ब्राह्मण ही याजक होते हैं अन्य नहीं । कोई नियत फलवाले होते हैं, जैसे कोई सुखी, कोई दुःखी और कोई दोनों । इसप्रकार इस विचित्र जगत् की रचना परमेश्वरसे ही होती है । * शंका— “ जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्द्धतेऽपक्षीयते विनश्यति " ( निरुक्त १1१1३ ) ( शरीर उत्पन्न होता है, उत्पन्न होकर अस्तित्वको प्राप्त होता है; परिणामको प्राप्त होता है, बढ़ता है अर्थात् बाल, युवा आदि अवस्थाओंको प्राप्त होता है, क्षीण होता है, नाशको प्राप्त होता है ) यह यास्कमुनिका वचन है । इसके अनुसार जब प्रत्येक भाव पदार्थं छः विकारोंवाला है, तो जन्मादि सूत्रमें वृद्धि आदिका ग्रहण क्यों नहीं किया गया है? समाधान - वृद्धि अवयवोंका बढ़ना, यथा