श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 521–530

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 521 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ४ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४८७ * छान्दोग्ये सन्मूलत्वं तेतसः श्रावितम्, तैत्तिरीयके तु वायुमूलत्वम् । तत्र तेजो-योनिं प्रति श्रुतिविप्रतिपत्तौ सत्यां प्राप्तं तावद्द्ब्रह्मयोनिकं तेज इति । कुतः? ' सदेव ' इत्यु-पक्रम्य ‘ तत्तेजोऽसृजत ' इत्युपदेशात् । सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायाश्च ब्रह्मप्रभवत्वे सर्वस्य संभवात् । ‘ तज्जलान् ' ( छा ० ८।७।१ ) इति चाविशेषश्रुतेः, ' एतस्माज्जायते प्राण: ' ( मुण्ड २।१।३ ) इति श्रुत्यन्तरे सर्वस्याविशेषेण ब्रह्मजत्वोपदेशात्, तैत्तिरीयके च स तपस्तप्त्वा, इदं सर्वमसृजत ' यदिदं किञ्च ' ( तै ० ३ | ६ | १ ) इत्यविशेषश्रवणात् । तस्मात् ' वायोरग्निः ' इति क्रमोपदेशो द्रव्यो वायोरनन्तरमग्निः संभूत इति । * एवं प्राप्त उच्यते - तेजोऽतो मातरिश्वत्तो जायत इति । कस्मात्? तथा ह्याह- ' वायोरग्निः ' इति । अव्यवहिते हि तेजसो ब्रह्मत्वे सति " असति वायुजत्वे वायोरग्निरितीयं श्रुतिः कदर्शिता स्यात् । ननु क्रमा-थैषा भविष्यतीत्युक्तम् । नेति ब्रूमः - ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २।१।१ ) इति पुरस्तात्संभवत्यपादानस्यात्मनः पश्चमीनिर्देशात्, तस्यैव च संभवतेरिहाधि कारात् परस्तादपि च तदधिकारे ' पृथिव्या ओषधयः ' ( तै ० २1१1१ ) इत्यपादानपञ्चमी-दर्शनाद्वायोरग्निरित्यपादानपञ्चम्येवैषेति गम्यते । अपिच वायोरूर्ध्वमग्निः संभूत इति छान्दोग्यमें तेजको सत् मूलत्व सुनाया गया है अर्थात् तेजका मूल सत् है और तैत्तिरीयकमें तो वायु मूलत्व अर्थात् तेजका मूल वायु कहा गया है । उन दोनोंमें तेजके कारण के प्रति श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर ब्रह्म कारणक तेज है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि ' सदेव ' ' सत् ही इसप्रकार आरम्भकर ‘ तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) ऐसा उपदेश है । ' तज्जलान् ' इस अविशेष श्रुतिसे सबको ब्रह्म जन्य होनेपर सर्वविज्ञान प्रतिज्ञाका सम्भव है । ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( इससे प्राण उत्पन्न होता है ) ऐसा उपक्रमकर अन्य श्रुतिमें सब समानरूपसे ब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, इसप्रकार उपदेश है । और तैत्तिरीयकमें ' स तपस्तप्त्वा ० ' ( उसने तप ( ज्ञान ) करके ही यह जो कुछ है सबकी रचनाकी ) यह अविशेष श्रुति है । इसलिए ' वायोरग्निः ' ( वायुसे अग्नि उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार वायुके अनन्तर अग्नि उत्पन्न हुआ यह क्रमोपदेश समझना चाहिए । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं -- तेज अतः - वायुसे उत्पन्न होता है, किससे? इससे कि ' वायोरग्निः ' ऐसा कहा है । तेजकी ब्रह्म व्यवधान रहित ( सीधी ) उत्पत्ति होनेपर और वायुसे उत्पत्ति न होनेपर ' वायोरग्निः ' यह श्रुति बाधित हो जायगी । परन्तु यह जो कहा गया है कि यह श्रुति क्रमके लिए होगी । हम कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इसप्रकार पूर्व में उत्पत्ति क्रिया के अपादान आत्माका पञ्चमीसे निर्देश है, उसी उत्पत्ति क्रियाका यहाँ अधिकार है । आगे भी उसके अधिकारमें ' पृथिव्या ओषधयः ० ' ( पृथिवीसे ओषधियाँ उत्पन्न हुई ) इसप्रकार सत्यानन्दी - दीपिका हैं । अतः कारणत्व हेतुके बाध होनेसे जन्मश्रुतिका कार्य - कारणके चाहिए । अतः ब्रह्म समन्वयका कोई विरोध नहीं है ॥ ९ ॥

* सामान्यसे सामान्यको उत्पत्ति मत हो, सामान्य ब्रह्मसे प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष है । पूर्वपक्षमें कार्यमात्र ब्रह्मका विवर्त नहीं हो सकता, इसलिए ब्रह्म ही तेजका कारण है । अतः ' वायोः ' दान अर्थ में नहीं है । अपादान पञ्चमीका दर्शन -निर्देश है । अभेदको लेकर व्याख्यान करना विशेष तेजकी उत्पत्ति हो इसप्रकार होनेसे कल्पित वायु तेजका कारण यह पञ्चमी विभक्ति क्रममें है उपा-* ' वायोरग्निः ' यहाँ तो प्रकृति रूप अपादान कारक तो निरपेक्ष पञ्चमीसे प्रतीत होता है और पञ्चमीका अपादान अर्थं निश्चित है । विरोध होनेपर निश्चितसे कल्पितका बाध होता है, अतः वायुसे अग्नि उत्पन्न होती है ।

पृष्ठ 522

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 522 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ कल्प्य उपपदार्थयोगः, क्लप्तस्तु कारकार्थयोगो वायोरग्निः संभूत इति । तस्मादेषा श्रुतिर्वायुयोनित्वं तेजसोऽवगमयति । नन्वितरापि श्रुतिर्ब्रह्मयोनित्वं तेजसोऽवगम-यति ' ' तत्तेजोऽसृजत ' इति, नः तस्याः पारम्पर्यजत्वेऽप्यविरोधात् । यदापि ह्याकाशं वायुं च सृष्ट्रा वायुभावापन्नं ब्रह्म तेजोऽसृजतेति कल्प्यते, तदापि ब्रह्मजत्वं तेजसो न विरु-ध्यते, यथा तस्याः शृतं तस्या दधि तस्या आमिक्षेत्यादि । दर्शयति च ब्रह्मणो विक-रात्मनावस्थानं ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( तै ० २ | ७१ ) इति । तथा चेश्वरस्मरणं भवति -' बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः ' ( म ० गी ० १०।४ ) इत्याद्यनुक्रम्य ' भवन्ति मावा भूतानां मत्त एव पृथ-ग्विधाः ' ( म ० गी ० १०।५ ) इति । यद्यपि बुद्धयादयः स्वकारणेभ्यः प्रत्यक्षं भवन्तो दृश्यन्तेः तथापि सर्वस्य भावजातस्य साक्षात्प्रणाड्या वेश्वरवंश्यत्वात् । एतेनाक्रम-वत्सृष्टिवादिन्यः श्रुतयो व्याख्याताः; तासां सर्वथोपपत्तेः क्रमवत्सृष्टिवादिनीनां त्वन्य-थानुपपत्तेः, प्रतिज्ञापि सद्वंश्यत्वमात्रमपेक्षते, नाव्यवहितजन्यत्वमित्यविरोधः ॥ १० ॥

( ५ अबधिकरणम् । सू ० ११ ) आपः ॥ ११ ॥

सूत्रार्थ - जल तेजसे उत्पन्न होता है, क्योंकि ' अग्नेराप ' यह श्रुति है । इससे ' वायोरग्निः ' यह अपादान पञ्चमी है, ऐसा ज्ञात होता है । और ' वायोरूर्ध्वमग्निः ' ( वायु के अनन्तर अग्नि उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार उपपदके अर्थके योगकी कल्पना करनी पड़ती है, और ' बायोरग्निः ' ( वायु से अग्नि उत्पन्न हुआ ) इसमें कार के अर्थका योग तो निश्चित है । इसलिए यह श्रुति तेज वायुकारणक बोध कराती है अर्थात् तेजका कारण वायु है । परन्तु ' तत्तेजोऽसृजत ' यह अन्य श्रुति भी तेजको ब्रह्मकारणत्व बोध कराती है । ऐसा नहीं, क्योंकि परम्परासे तेज ब्रह्मसे उत्पन्न होनेपर भी उस श्रुतिका विरोध नहीं है । यदि आकाश और वायुको उत्पन्नकर वायुभावापन्न ब्रह्मने तेज उत्पन्न किया, ऐसी कल्पना की जाय, तो मी तेज + ब्रह्मसे उत्पन्न होता है इसमें विरोध नहीं है । जैसे ‘ तस्याः शृतं ० ' ( गौका गरम किया हुआ दूध, उसकी दही, उसकी आमिक्षा - पनीर ) इत्यादि । ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( उसने स्वयं अपनेको रचा ) यह श्रुति ब्रह्मकी विकाररूपसे अवस्थिति दिखलाती है । इसप्रकार भववद्गीता भी है- ' बुद्धिर्ज्ञानमसंमोह: ' ( बुद्धि, ज्ञान और अमूढता ) इत्यादि उपक्रम कर ' मवन्ति भावा ० ' ( प्राणियोंके नाना प्रकारके बुद्धि आदि भाव मेरेसे ही होते हैं ) यद्यपि बुद्धि आदि स्वकारणोंसे प्रत्यक्ष उत्पन्न होते हुए देखे जाते हैं, तो भी सम्पूर्ण पदार्थ साक्षात् वा परम्परासे ईश्वरसे उत्पन्न होते हैं । इस कथनसे क्रम रहित सृष्टि प्रतिपादक श्रुतियोंका व्याख्यान हो गया, क्योंकि उनकी सर्वप्रकारसे उपपत्ति होती है । परन्तु क्रम युक्त सृष्टि प्रतिपादक श्रुतियाँ अन्यथा अनुपपन्न हैं, इससे प्रतिज्ञा भी सत्से उत्पत्ति मात्रको अपेक्षा करती है, अव्यवहित उत्पत्तिकी नहीं, इसलिए बविरोध है ॥ १० ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे गौसे दूध, दूधसे दही, दहीसे पनीर । पनीर साक्षात् दहीसे उत्पन्न होनेपर मी परम्परासे गौसे उत्पन्न होने में कोई विरोध नहीं है, वैसे साक्षात् अथवा परम्परासे सब विकार ब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं । ‘ तज्जलान् ' ' इदं सर्वमसृजत ' इत्यादि अक्रम प्रतिपादक श्रुतियां साक्षात् अथवा परम्परासे सब पदार्थं ब्रह्मसे उपन्न होते हैं इस अर्थ में उपपन्न होती हैं । अता बलवतो क्रम बोधक श्रुतियोंके अनुसार ' तत्तेजोऽसृजत ' इस प्रकारकी अक्रम बोधक श्रुतियोंको एकवाक्यता होनेसे गति हो सकती है अन्यथा नहीं, इसप्रकार क्रम अथवा अक्रम बोधक श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है । इस-लिए वेदान्तका ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध है || १० |

पृष्ठ 523

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 523 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ६ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४८ ९ ' अतस्तथाह्याह ' इत्यनुवर्तते । आपोऽतस्तेजसो जायन्ते । कस्मात्? तथाह्याह-‘ तदपोऽसृजत ' इति ‘ अग्नेरापः ' इति च । सति वचने नास्ति संशयः । तेजसस्तु सृष्टि व्याख्याय पृथिव्या व्याख्यास्यन्नपोऽन्तरियामित्याप इति सूत्रयांबभूव ॥ ११ ॥

( ६ पृथिव्यधिकरणम् | सू ० १२ ) पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ १२ ॥

पदच्छेद - ( पृथिवी ), अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः । सूत्रार्थ - ( पृथिवी ) अन्नशब्द से यहाँ पृथिवी विवक्षित है ओदन आदि नहीं, ( अधिकार-रूपशब्दान्तरेभ्यः ) क्योंकि ' तत्त ' जोऽसृजत ' इसप्रकार महाभूतोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, ' यत्कृष्णं तदन्नस्य ' ( जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है ) इसप्रकार पृथिवीत्व के ज्ञापक कृष्णरूपका श्रवण है और ' अद्भ्य पृथिवी ' इसप्रकार अन्य श्रुति है । ‘ ता आप ऐक्षन्त बह्वयः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त ' ( छा ० ६।२।४ ) इति श्रूयते । तत्र संशयः - किमनेनान्नशब्देन व्रीहियवाद्यभ्यवहार्यं वा ओदनाद्युच्यते, किंवा पृथिवीति । तत्र प्राप्तं तावद्द्व्रीहियवाद्योदनादि वा परिग्रहीतव्यमिति । तत्र ह्यन्नशब्दः प्रसिद्धो लोके, वाक्यशेषोऽप्येतमर्थमुपोद्वलयति । ' तस्माद्यत्र क्वचन वर्षति तदेव भूयिष्ठमनं भवति ' इति । व्रीहियवाद्येव हि सति वर्षणे बहु भवति न पृथिवीति । एवं प्राप्ते ब्रूमः पृथिव्ये -वयमन्नशब्देनाद्भयो जायमाना विवक्ष्यत इति । कस्मात्? अधिकाराद्रूपाच्छब्दान्तराच्च । अधिकारस्तावत् ' तत्तेजोऽसृजत ' ' तदपोऽसृजत ' इति महाभूतविषयो वर्तते । तत्र क्रमप्राप्तां पृथिवीं महाभूतं विलङ्घन्य नाकस्माद्व्रीह्यादिपरिग्रहो न्याय्यः । तथा रूपमपि वाक्यशेषे ' अतस्तथाह्याह ' इसकी पूर्व सूत्रसे अनुवृत्ति है । जल अत: - तेजसे उत्पन्न होता है, क्योंकि ‘ तदपोऽसृजत ' ( उसने जल उत्पन्न किया ) और ' अग्नेराप: ' ( अग्निसे जल उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार श्रुतियाँ कहती हैं । श्रुतिवाक्य होनेपर संशय नहीं है । तेजकी सृष्टिका व्याख्यान कर पृथिवीकी सृष्टि-का व्याख्यान करते हुए सूत्रकारने मध्यमें जलकी सृष्टि भी आ जाय, इसलिए ' आप ' इस सूत्रकी रचना की ॥ ११ ॥

' ता आप ऐक्षन्त ० ' ( उस जलने ईक्षण किया ' हम बहुत हो जायँ - अनेक रूपसे उत्पन्न हों ' उसने अन्नकी रचना की ) ऐसी श्रुति है । यहाँ संशय होता है कि क्या इस अन्न शब्दसे व्रीहि, यव आदि कहे जाते हैं अथवा मक्ष्य ओदन आदि वा पृथिवो कही जाती है । पूर्वपक्षी - यहाँ व्रीहि, यव आदि अथवा ओदन आदिका ग्रहण करना चाहिए, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि लोकमें अन्तशब्द उनमें प्रसिद्ध है, और ' तस्माद्यत्र क्वचन ० ' ( इससे जहाँ कहीं वृष्टि होती है वहाँ बहुत अन्न होता है ) यह वाक्यशेष भी इसी अर्थको पुष्ट करता है, क्योंकि वृष्टि होनेपर व्रीहि, यव आदि ही बहुत होते हैं, पृथिवी नहीं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— जलसे जायमान यह पृथिवी ही अन्नशब्द-से विवक्षित है, किससे? इससे कि अधिकार - प्रकरण है, रूप है और अन्य श्रुति है । ' तत्तेजोऽसृजत ' ' तदपोऽसृजत ' ( उसने तेजकी सृष्टि की, उसने जलकी सृष्टि की ) इसप्रकार महाभूत विषयक अधि-कार है । उसमें क्रमप्राप्त महाभूत पृथिवीका उलङ्घनकर अकस्मात् व्रोहि, यव आदिका ग्रहण उचित सत्यानन्दी - दीपिका * केवल श्रुतिका अविरोध जाननेके लिए ही यह अतिदेय नहीं है, किन्तु पश्चमभूत पृथिवीके उत्पत्तिक्रमका निर्णय करने के लिए भी है । इसलिए तेजोभावापन्न ब्रह्मसे जलके उत्पन्न होनेपर इन श्रुतियों में कोई विरोध नहीं है अर्थात् इनका ब्रह्ममें समन्वय है ॥ ११ ॥

पृष्ठ 524

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 524 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४ ९ ० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ पृथिव्यनुगुणं दृश्यते- ' यत्कृष्णं तदन्नस्य ' इति । न ह्योदनादेरभ्यवहार्यस्य कृष्णत्वनियमो ऽस्ति, नापि व्रीह्मादीनाम् । * ननु पृथिव्या अपि नैव कृष्णत्वनियमोऽस्तिः पयः पाण्डुरस्या-ङ्गाररोहितस्य च क्षेत्रस्य दर्शनात् । नायं दोषः; बाहुल्यापेक्षत्वात् । भूयिष्ठं हि पृथिव्याः कृष्णं रूपं न तथा श्वेतरोहिते । पौराणिका अपि पृथिवीछायां शर्वरीमुपदिशन्ति । सा च कृष्णाभासेत्यतः कृष्णं रूपं पृथिव्या इति श्लिष्यते । श्रुत्यन्तरमपि समानाधिकारम् -'अद्भयः पृथिवी ' इति भवति । ' तद्यदपां शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत् ' ( बृ ० १।२।२ ) इति च । पृथिव्यास्तु व्रीह्यादेरुत्पत्ति दर्शयति- ' पृथिव्या ओषधयः ओषधीभ्योऽन्नम् ' इति च । एवमधि-कारादिषु पृथिव्याः प्रतिपादकेषु सत्सु कुतो व्रीह्यादिप्रतिपत्तिः? प्रसिद्धिरप्यधिकारादि-भिरेव बाध्यते । वाक्यशेषोऽपि पार्थिवत्वादन्नाद्यस्य तद्वारेण पृथिव्या एवाद्भयः प्रभवत्वं

सूचयतीति द्रष्टव्यम् । तस्मात्पृथिवीयमन्नशब्देति ॥ १२ ॥

( ७ तदभिध्यानाधिकरणम् । सू ० १३ ) तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ १३ ॥

पदच्छेद - तदमिध्यानाद् एव तु तल्लिङ्गात्, सः । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है ( स ) वह ईश्वर ही ( तदभिध्यानादेव ) तत्-तत् कार्यं विषयक ईक्षणात्मक अभिध्यानसे ही ईक्षित भूतोंका अधिष्ठाता होकर तत् तत् कार्यको उत्पन्न करता है, ( तल्लिङ्गात् ) क्योंकि ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् ' इत्यादि श्रुतियोंसे उस परमात्माका सर्व निय-तृत्व लिङ्ग सुना गया है । इसलिए परमेश्वरसे अधिष्ठित भूत स्रष्टा है, केवल नहीं । इसप्रकार श्रुतियोंकी एक वाक्यता है । 8 किमिमानि वियदादीनि भूतानि स्वयमेव स्वविकारान्सृजन्ति, आहोस्वित्पर-नहीं हैं । इसप्रकार ' यत्कृष्णं तदन्नस्य ' ( जो कृष्णरूप है वह अन्नका है ) इस वाक्यशेषमें रूप भी पृथिवीके अनुकूल ही देखा जाता है, क्योंकि मक्ष्य ओदन आदिमें कृष्णरूप होनेका नियम नहीं है । और व्रीहि आदिमें भी नहीं है । परन्तु पृथिवीका भी कृष्णरूप होनेका नियम नहीं है, क्योंकि दूध - सा सफेद, अङ्गार - सा रक्त क्षेत्र देखनेमें आता है । यह दोष नहीं है, कारण कि बहुलताकी अपेक्षासे है । पृथिवीका बहुधा कृष्ण ही रूप है, उसीप्रकार खेत और रक्त नहीं है । पौराणिक भी पृथिवीकी छायाको रात्रि कहते हैं । रात्रि तो कृष्णरूप है, अतः पृथिवीका कृष्णरूप है यह संगत है । इसप्रकार ' अद्द्भ्यः पृथिवी ' ( जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है ) और ' तद्यदपां शर ० ' ( सृष्टिकालमें उस जलका जो स्थूल भाग ( फेन ) वह संहत हो गया, यह पृथिवी हो गई ) इसप्रकार यह समान प्रकरण वाली अन्य श्रुतियाँ भी हैं । ' पृथिव्या ओषधयः ० ' ( पृथिवीसे ओषधियाँ और ओषधियों से अन्न होता है ) यह श्रुति पृथिवीसे व्रीहि आदिकी उत्पत्ति दिखलाती है । इसप्रकार पृथिवीके प्रतिपादक अधिकार आदिके होते हुए अन्नशब्दसे व्रीहि आदिकी प्रतिपत्ति कैसे होगी? प्रसिद्धिका भी प्रकरण आदिसे बाध होता है । वाक्यशेष भी अन्न आदिके पार्थिव होनेसे उसके द्वारा पृथिवीका ही जल प्रभवत्व सूचित

करता है, ऐसा समझना चाहिए । इसलिए यह पृथिवी ही अन्न शब्द वाच्य है ॥ १२ ॥

क्या ये आकाश आदि भूत स्वयं ही अपने विकारोंको उत्पन्न करते हैं अथवा परमेश्वर ही सत्यानन्दी - दीपिका ' अतः ' अद्भ्यः पृथिवी ' इस बलवती तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार ' अन्नमसृजत ' इस छान्दोग्य श्रुतिको गौण मानने से भूतसृष्टिवांचक श्रुतियोंका ब्रह्ममें समन्वय अविरुद्ध है ॥ १२ ॥

# आकाश आदि भूत अपने कार्योंको स्वयं ही उत्पन्न करते हैं अथवा आकाश आदि भूतोंके

पृष्ठ 525

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 525 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ८ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४ ९ १ मेश्वर एव तेन तेनात्मनावतिष्ठमानोऽभिध्यायंस्तं तं विकारं सृजतीति संदेहे सति प्राप्तं तावत् - स्वयमेव सृजन्तीति । कुतः? ' आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः ' इत्यादिस्वातन्त्र्यश्रवणात् । नन्वचेतनानां स्वतन्त्राणां प्रवृत्तिः प्रतिषिद्धा । नैष दोषः; ' तत्तेज ऐक्षत ', ' ता आप ऐक्षन्त ' ( छा ० ६।२1४ ) इति च भूतानामपि चेतनत्वश्रवणादिति । * एवं प्राप्तेऽभिधोयते - स एव परमेश्वर स्तेन तेनात्मनावतिष्ठमानोऽभिध्यायंस्तं तं विकारं सृजतीति । कुतः? तल्लिङ्गात् । तथा हि शास्त्रम् - ' यः पृथिव्यां तिष्ठन्यः पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति ' ( वृ ० ३।७।३ ) इत्येवंजातीकं साध्यक्षाणामेव भूतानां प्रवृत्ति दर्श-यति । तथा ‘ सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय ' इति प्रस्तुत्य ' सच्च त्यच्चाभवत् । तदात्मानं स्वयम-कुरुत ' ( तै ० २।६।१ ) इति च तस्यैव च सर्वात्मभावं दर्शयति । यत्त्वीक्षणश्रवणमतेजसो-स्तत्परमेश्वरा वेशवशादेव द्रष्टव्यम्; ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( बृ ० ३।७।२३ ) इतीक्षित्रन्तरप्रतिषे-धात्, प्रकृतत्वाच्च सत ईक्षितुः ' तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय ' ( छा ० ६ । २ । ३ ) इत्यत्र ॥ १३ ॥

( ८ विपर्ययाधिकरणम् । सू ० १४ ) विपर्ययेण तु क्रमोत उपपद्यते च ॥ १४ ॥

पदच्छेद - विपर्ययेण, तु, क्रम:, अतः, उपपद्यते, च । सूत्रार्थ - ( तु ) किन्तु ( अतः ) उत्पत्तिक्रम से ( विपर्ययेण ) विपरीतक्रमसे ही ( क्रमः ) तत्, तत् - रूपसे अवस्थित हुआ ईक्षण करता हुआ उस उस विकारको उत्पन्न करता है, ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षीये भूत स्वयं ही अपने विकारोंको उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्यों? क्योंकि ' आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः ' ( आकाशसे वायु और वायुसे अग्नि उत्पन्न हुआ है ) इत्यादि स्वतन्त्रताका श्रवण होता है । परन्तु स्वतन्त्र अचेतनों की प्रवृत्ति निषिद्ध है । यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तत्तेजो ऐक्षत ० ' ( उस तेजने ईक्षण किया उस जलने ईक्षण किया ) इसप्रकार भूतोंमें भी चेतनत्वका श्रवण होता है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - वही परमेश्वर तत्, तत्- रूपसे अवस्थित हुआ ईक्षण करता हुआ तत्, तत् विकारको उत्पन्न करता है, किससे? इससे कि उसका लिङ्ग है । जैसे कि ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् ० ' ( जो पृथिवीमें रहता हुआ पृथिवीके आभ्यन्तर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है और भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है ) इसप्रकारकी श्रुति साध्यक्ष ही भूतों की प्रवृत्ति दिखलाती है । इसप्रकार ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामनाकी बहुत होऊ, उत्पन्न होऊँ ) ऐसा प्रस्तुतकर ‘ सच्च त्यच्चामवत् ' ( वह सत्- मूर्त और स्यत् - अमृतं हुआ, उसने स्वयं अपनेको रक्षा ) यह श्रुति उसका ही सर्वात्मभाव दिखलाती है । जल और तेजकी जो ईक्षण श्रुति है वह परमेश्वरके आवेश ( सम्बन्ध ) के अधीन ही समझनी चाहिए, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इससे अन्य ईक्षिताका प्रतिषेध है और ' तदैक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया बहुत होऊँ उत्पन्न होऊँ ) यहाँ सत् ईक्षणकर्ता प्रकृत है ॥ १३ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका अधिष्ठातृ देवता विकारोंकी सृष्टि करनेमें प्रवृत्त होते हैं? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि ' रचना-नुपपत्तेश्च ' इस न्यायसे विरोध है । द्वितीयपक्ष ' ता आप ऐक्षन्त ' इसप्रकार जल आदि में ईक्षण सुना जाता है, अत: प्रकाश आदि भूतोंके अधिष्ठातृ देवता ही स्वतन्त्ररूपसे तत् तत् कार्यकी सृष्टि करते हैं, क्योंकि वे मी चेतन हैं । इससे समस्त जगत्का कारण ब्रह्म है, यह बाधित है । * परमेश्वर ही आकाश आदि भावापन्न होकर तत् तत् विकारोंकी सृष्टि करता है, अतः ब्रह्म समन्वयमें कोई विरोध नहीं है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 526

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 526 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ प्रलय क्रम है, क्योंकि अपने कारणमें ही कार्योंका लय देखा जाता है ( उपपद्यते च ) और ऐसा उपपन्न होता है । भूतानामुत्पत्तिक्रमश्चिन्तितः । अथेदानी मध्ययक्रमश्चिन्त्यते - किमनियतेन क्रमेणा-प्ययः, उतोत्पत्तिक्रमेणाथवा तद्विपरीतेनेति? त्रयोऽपि चोत्पत्तिस्थितिप्रलया भूतानां ब्रह्मायत्ताः श्रूयन्ते -'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंवि-शन्ति ' ( तै ०३ । १ । १ ) इति । तत्रानिय मोऽविशेषादिति प्राप्तम् । अथवोत्पत्तेः क्रमस्य श्रुतत्वा-त्प्रलयस्यापि क्रमाकाङ्क्षिणोः स एव क्रमः स्यादिति । * एवं प्राप्तं ततो ब्रूमः - विपर्ययेण तु प्रलयक्रमोऽत उत्पत्तिक्रमाद्भवितुमर्हति । तथा हि लोके दृश्यते येन क्रमेण सोपानमा-रूढस्ततो विपरीतेन क्रमेणावरोहतीति । अपि च दृश्यते- मृदोजातं घटशरावाद्यप्ययकाले मृद्भावमध्येति, अद्भ्यश्च जातं हिमकरकाद्यब्भावमप्येतीति । अतश्चोपपद्यत एतत् यत्पृथि-व्यद्भ्यो जाता सती स्थितिकालव्यतिक्रान्तावपोऽपीयादापश्च तेजसो जाताः सत्यस्तेजो-ऽपीयुः । एवं क्रमेण सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं चानन्तरमनन्तरतरं कारणमपीत्य सर्व कार्यजातं परम-कारणं परमसूक्ष्मं च ब्रह्माप्येतीति वेदितव्यम् । नहि स्वकारणव्यतिक्रमेण कारणकारणे कार्याप्ययो न्याय्यः । स्मृतावप्युत्पत्तिक्रमविपर्ययेणैवाप्ययक्रमस्तत्र तंत्र दर्शित - ' जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते । ज्योतिष्यापः प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते ' इत्येवमादौ । उत्पत्ति-क्रमस्तूत्पत्तावेव श्रुतत्वान्नाप्यये भवितुमर्हति । न चासावयोग्यत्वादव्ययेनाकाङ्क्षयते । नहि भूतोंके उत्पत्तिक्रमका विचार किया गया । अब प्रलय क्रमका विचार किया जाता है — क्या अनियत क्रमसे प्रलय होता है अथवा उत्पत्तिक्रमसे वा उसके विपरीतक्रमसे? ' यतो वा ० ' ( जिससे निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके आश्रयसे जीवित रहते हैं और प्रवेश करते हुए जिसमें ये लीन होते हैं ) यह श्रुति भूतोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ये तीनों ब्रह्म के अधीन कहती है | परन्तु श्रुतिमें किसी प्रकारका विशेष न होनेसे प्रलयके विषयमें कोई नियम नहीं है, ऐसा प्राप्त होता है ।, अथवा उत्पत्ति क्रम श्रुतिमें प्रतिपादित होनेसे क्रमाकांक्षा प्रलयका मो वही ( सृष्टि ) क्रम होना चाहिए । ऐसा प्राप्त होता है, सि ०. - अतः हम कहते हैं - प्रलयक्रम अतः - उत्पत्तिक्रम से विपरीत होना चाहिए, जैसे लोकमें देखा जाता है कि जिस क्रमसे सीढियोंपर चढता है उससे विपरीत क्रमसे उतरता है, और भी देखा जाता है कि मृत्तिकासे उत्पन्न हुए घट, शराव आदि लयकालमें मृत्तिका -भावको प्राप्त होते हैं और जलसे उत्पन्न हुए हिम, करक आदि जलभावको प्राप्त होते हैं । इससे यह उपपन्न होता है कि जलसे उत्पन्न होती हुई पृथिवी स्थिति कालका अवसान होनेपर जलमें लीन होती है । तेजसे उत्पन्न होता हुआ जल तेजमें लीन होता है । इसप्रकार क्रमसे अनन्तर अनन्तरंतर सूक्ष्म सूक्ष्मतर कारणमें लीन होकर सम्पूर्ण कार्यं समुदाय परमकारण परम सूक्ष्म ब्रह्म में लय होता है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि अपने कारणका व्यतिक्रमकर कारणके कारणमें कार्यंका लय उचित नहीं है | क्योंकि ‘ जगत्प्रतिष्ठा ० ' ( हे देवर्षे! जगत् की आधार भूत पृथिवी जलमें प्रलीन होती है, एवं जल तेजमें लीन होता है और तेज वायुमें लीन होता है ) इत्यादि स्मृतियोंमें भी उत्पत्ति क्रमसे विपरीतरूपले प्रलय क्रम तत् तत् स्थलमें दिखलाया गया है । उत्पत्तिक्रम तो उत्पत्ति में श्रुत है, इससे वह प्रलय में होना युक्त नहीं । और अयोग्य होनेसे भी वह ( उत्पत्तिक्रम ) प्रलयसे आकांक्षित नहीं है । कार्यके सत्यानन्दी -दीपिका # गत अधिकरणमें भूतोंका उत्पत्तिक्रम कहकर अब बुद्धिस्थ उनका लयक्रम कहा जाता है, इसप्रकार प्रसंगसंगति है । सिद्धान्तमें भूतोंके प्रतिलोमतः लय ध्यान पूर्वक प्रत्यग्ब्रह्ममें मनका समाघान फल है और पूर्वपक्षमें कारणका नाश होनेपर कार्यका नाश होता है, इससे सम्पूर्ण लयके आधार भूत ब्रह्मकी असिद्धि होनेसे मनका समाधान असिद्ध है । जो प्रलय नहीं मानते उनके लिए

पृष्ठ 527

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 527 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ९ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४ ९ ३ कार्ये ध्रियमाणे कारणस्याप्ययो युक्तः, कारणाप्यये कार्यस्यावस्थानानुपपत्तेः, कार्याप्यये तु कारणस्यावस्थानं युक्तं - मृदादिष्वेवं दृष्टत्वात् ॥ १४ ॥

( ९ अन्तराविज्ञानाधिकरणम् सू ० १५ ) अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥ १५ ॥

पदच्छेद - अन्तरा, विज्ञानमनसी, क्रमेण, तल्लिङ्गात्, इति चेत्, न, अविशेषात् । सूत्रार्थ - ( अन्तरा ) आत्मा और भूतोंके मध्य में ( तल्लिङ्गात् ) ' एतस्माज्जायते प्राणः ० ' इत्यादि सृष्टि बोधक वाक्य से ( विज्ञानमनसी ) बुद्धि, इन्द्रिय और मनका अनुक्रम होता है, इससे आत्मासे बुद्धि, इन्द्रिय और मन उत्पन्न होते हैं । ( क्रमेण ) इस क्रमसे सृष्टि क्रमका विरोध है, ( इति चेन्न ) तो यह युक्त नहीं है, ( अविशेषात् ) क्योंकि इन्द्रिय, बुद्धि और मनके भौतिक होनेसे भूतोत्पत्ति क्रमसे इन्द्रिय आदिके उत्पत्तिक्रमका साम्य है, इसलिए कोई विरोध नहीं है । * भूतानामुत्पत्तिप्रलयावनुलोमप्रतिलोमक्रमाभ्यां भवत इत्युक्तम्, आत्मादिरु-त्पत्तिः प्रलयश्चात्मान्त इत्यप्युक्तम् । सेन्द्रियस्य तुमनसो बुद्धेश्वसद्भावः प्रसिद्धः श्रुति-स्मृत्योः - ' बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च । इन्द्रियाणि हयानाहुः ' ( कठ ० ३।३ ) इत्यादि -लिङ्गेभ्यः । तयोरपि कस्मिंश्चिदन्तराले क्रमेणोत्पत्तिप्रलयाबुपसंग्राह्यौ, सर्वस्य वस्तुजा-तस्य ब्रह्मत्वाभ्युपगमात् । अपि चाथर्वण उत्पत्तिप्रकरणे भूतानामात्मनश्चान्तराले करणान्यनुक्रम्यन्ते । ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुज्योंतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ' ( मुण्ड ० २ १ ३ ) इति । तस्मात्पूर्वोक्तोत्पत्तिप्रलयक्रमभङ्गप्रसङ्गो भूताना-मिति चेत् - न, अविशेषात् । यदि तावद्भौतिकानि करणानि, ततो भूतोत्पत्तिप्रलयाभ्यामे-रहनेपर कारणका विनाश युक्त नहीं है, क्योंकि कारण के विनाश होनेपर कार्यकी अवस्थिति नहीं हो सकती । कार्यके विनाश - प्रलय होनेपर कारणकी अवस्थिति युक्त है, क्योंकि मृत्तिका आदिमें इस-प्रकार देखा जाता है ॥ १५ ॥

भूतों की उत्पत्ति और प्रलय जिस अनुलोम और प्रतिलोम क्रमसे होते हैं, वह कहा गया है । • और यह भी कहा जा चुका है कि आत्मासे उत्पत्ति आदि और आत्मा पर्यन्त प्रलय होता है । ' बुद्धि तु ० ' ( बुद्धिको सारथि जान, मनको लगाम समझ, विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको अश्व कहते हैं ) इत्यादि लिङ्गोंसे इन्द्रिय सहित मन और बुद्धिका सद्भाव श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है । समस्त वस्तुओंको ब्रह्म जन्य स्वीकार करनेसे उनके भी क्रमसे उत्पत्ति और प्रलयका किसीके मध्य में संग्रह करना चाहिए । ' एतस्माज्जायते प्राणः ० ' ( उससे प्राण उत्पन्न होता है, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और विश्वको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है ) इस प्रकार आथर्वणमें उत्पत्तिके प्रकरणमें भूत और आत्माके मध्यमें इन्द्रियोंका अनुक्रम है । यदि कहो कि इससे भूतों की पूर्वोक्त उत्पत्ति और प्रलयक्रमका भङ्ग होगा; तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अविशेष है - यदि इन्द्रियाँ मौतिक हैं, तो भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयसे ही इनकी उत्पत्ति और प्रलय होते हैं, अतः इनके लिए अन्य क्रमकी खोज नहीं सत्यानन्दी - दीपिका ' यतो वा ० ' इत्यादि श्रुति ७ प्रमाण है । जिस प्रकार साक्षात् अथवा परम्परासे समस्त कार्यं ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है, उस प्रकार प्रलयमें भी साक्षात् अथवा परम्परासे ब्रह्म में ही लय होता है ॥ १४ ॥

* बुद्धि, इन्द्रिय और मनके उत्पत्ति क्रमका विचार किया जाता है — भूतोंका उत्पत्तिक्रम इन्द्रियों के उत्पत्तिक्रमसे विरुद्ध हैं कि नहीं और इन्द्रियाँ भौतिक हैं कि नहीं? इस प्रकार संशय होता है । ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इस श्रुतिमें इन्द्रियोंका उत्पत्तिक्रम मूतोंके उत्पत्तिक्रमसे पूर्व है और

पृष्ठ 528

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 528 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४ ९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ वैषामुत्पत्तिप्रलयौ भवत इति नैतयोः क्रमान्तरं मृग्यम् । भवति च भौतिकत्वे लिङ्गं करणा-नाम् - ' अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाकू ' ( छा ० ६।५।४ ) इत्येवंजातीय-कम् । व्यपदेशोऽपि क्वचिद्भुतानां करणानां च ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन नेतव्यः । अत त्वभौतिकानि करणानि, तथापि भूतोत्पत्तिक्रमो न करणैर्विशेष्यते - प्रथमं करणान्युत्पद्यन्ते चरमं भूतानि, प्रथमं वा भूतान्युत्पद्यन्ते चरमं वा करणानीति । आथर्वणे तु समाम्नाय -क्रममात्रं करणानां भूतानां च न तत्रोत्पत्तिक्रम उच्यते । तथान्यत्रापि पृथगेव भूतक्रमा-त्करणक्रम आम्नायते - ' प्रजापतिर्वा इदमग्र आसीत्स आत्मानमैक्षत स मनोऽसृजत तन्मन एवासीत्तदात्मानमैक्षत तद्वाचमसृजत ' इत्यादिना । तस्मान्नास्ति भूतोत्पत्तिक्रमस्य भङ्गः | १५ | ( १० चराचरव्यपाश्रयाधिकरणम् सू ० १६ ) चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्वयपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॥ १६ ॥

पदच्छेद - चराचरव्यपाश्रयः, तु, स्यात्, तद्वयपदेशः, माक्तः, तद्भावभावित्वात् । सूत्रार्थ - ( तद्वयपदेशः ) जन्म और मरणका जो यह लौकिक व्यवहार है, ( चराचरव्यपाश्रयः ) वह स्थावर और जङ्गम देह विषयक मुख्य है और ( माक्तः ) जीवमें गौण है, ( तद्भावमावित्वात् ) क्योंकि जन्म - मरणका व्यपदेश देहकी उत्पत्ति और नाशके अन्वय और व्यतिरेकका अनुसरण करता है । देहका प्रादुर्भाव होनेसे ही जातकर्म आदिका विधान है, अतः जीवके नित्यत्व प्रतिपादक शास्त्रका कोई विरोध नहीं है । * स्तो जीवस्याप्युत्पत्तिप्रलयौ, जातो देवदत्तो मृतो देवदत्त इत्येवंजातीयका लौकि करनी चाहिए | ' अन्नमयं हि सोम्य मन ० ' ( हे सोम्य! मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाणी तेजो-मयी है ) इस प्रकारका इन्द्रियों के भौतिकत्वमें लिङ्ग है । कहीं पर भूत और इन्द्रियोंका व्यपदेश ( शब्द प्रयोग ) भी ब्राह्मण - परिव्राजक न्यायसे ग्रहण करना चाहिए । यदि इन्द्रियाँ अभौतिक हैं, तो मी भूतोंका उत्पत्तिक्रम इन्द्रियोंसे पृथक् नहीं है- - प्रथम इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं अनन्तर भूत, अथवा प्रथम भूत उत्पन्न होते हैं पश्चात् इन्द्रियां । आथर्वणमें तो भूत और करणोंका केवल पाठक्रम है, वहाँ उत्पत्ति क्रम नहीं कहा । इस प्रकार ' प्रजापतिर्वा इदमग्र आसीत् ० ' ( आरम्भमें यह प्रजापति था उसने अपने विषय में ईक्षण किया, उसने मन की रचनाकी, वह मन ही था, उसने अपने विषय में ईक्षण किया, उसने वाणी उत्पन्न की ) इत्यादिसे अन्य स्थलोंमें भी करणक्रम भूतक्रमसे पृथक् ही कहा जाता है । इससे भूतोत्पत्तिक्रमका भङ्ग नहीं है ॥ १५ ॥

जीवके भी उत्पत्ति और प्रलय होते हैं, क्योंकि देवदत्त उत्पन्न हुआ, देवदत्त मर गया, इस सत्यानन्दी - दीपिका ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इस तैत्तिरीय श्रुतिमें आकाश आदि भूतोंकी उत्पत्तिक्रम पहले है । इस प्रकार इन्द्रियोंके उत्पत्तिक्रमसे भूतोंके उत्पत्ति और प्रलयक्रमका बाध होता है । किश्व ' एतस्माज्जायते प्राण: ' इस श्रुतिमें इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भूतोंकी उत्पत्तिसे पृथक होनेसे इन्द्रियाँ भौतिक भी नहीं है । अतः आथवंण और तैत्तिरीय श्रुतियों का परस्पर विरोध होनेसे श्रुतियोंका ब्रह्म में समन्वय असिद्ध है । सिद्धान्तमें उत्पत्ति श्रुतियोंका विरोध न होनेपर उसका ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध है । सिद्धान्ती – न, अवि-शेषात् ' आदिसे कहते हैं । ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इस श्रुतिमें भूतोंसे इन्द्रियोंका पृथक् ग्रहण ब्राह्मण-परिव्राजकन्यायसे गौण है ॥ १५ ॥

* पहले ' तत्त्वमसि ' इस श्रुति वाक्यस्थ ' तत् ' पद वाच्य कारणका निर्णय करनेके लिए भूत श्रुतियोंके परस्पर विरोधका परिहार किया गया है; अब पादकी समाप्ति पर्यन्त ' त्वम् ' पदके अर्थकी

पृष्ठ 529

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 529 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ११ सू ० १७ ] भाषानुवाद -सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४ ९ ५ कव्यपदेशात् जातकर्मादिसंस्कारविधानाच्चेति स्यात्कस्यचिद्भ्रान्तिस्तामपनुदामः । न जीवस्योत्पत्तिप्रलयौ स्तः, शास्त्रफलसंबन्धोपपत्तेः । शरीरानुविनाशिनि हि जीवे शरी-रान्तरगतेष्टानिष्प्रप्राप्ति परिहारार्थौ विधिप्रतिषेधावनर्थकौ स्याताम् । श्रूयते च-- ' जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते ' ( छा ० ६।११।३ ) इति । ननु लौकिको जन्ममरणव्यप-देशो जीवस्य दर्शितः । सत्यं दर्शितः । भातस्त्वेष जोवस्य जन्ममरणव्यपदेशः । किमा-श्रयः पुनरयं मुख्यो यदपेक्षया भाक्त इति? उच्यते- चराचरव्यपाश्रयः । स्थावरजङ्गम-शरीरविषयौ जन्ममरणशब्दौ । स्थावरजङ्गमानि हि भूतानि जायन्ते च म्रियन्ते च, अतस्तद्विषयो जन्ममरणशब्दौ मुख्यौ सन्तौ तत्स्थे जीवात्मन्युपचर्यते, तद्भावभावि-त्वात् । शरीरप्रादुर्भावतिरोभावयोहिं सतो जन्ममरणशब्दौ भवतः, नासतोः । नहि शरीरसंबन्धादन्यत्र जीवो जातो मृतो वा केनचिल्लक्ष्यते । ' स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसंपद्यमानः स उत्क्रामन् म्रियमाण: ' ( बृ ० ४ | ३ | ८ ) इति च शरीरसंयोगवियोगनिमि-त्तावेव जन्ममरणशब्दौ दर्शयति । जातकर्मादिविधानमपि देहप्रादुर्भावापेक्षमेव द्रष्टव्यम्, अभावाजीवप्रादुर्भावस्य । जीवस्य परस्मादात्मन उत्पत्तिर्वियदादीनामिवास्ति नास्ति वेत्येतदुत्तरेण सूत्रेण वक्ष्यति । देहाश्रयौ तावज्जीवस्य स्थूलाबुत्पत्तिप्रलयौ न स्त इत्ये-तदनेन सूत्रेणावोचत् ॥१६ ॥

( ११ आत्माधिकरणम् । सू ० १७ ) नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ १७ ॥

पदच्छेद – न, आत्मा, अश्रु, ते ), नित्यत्वात्, च, ताभ्यः । प्रकारका लौकिक व्यवहार होता है और जातकर्म आदि संस्कारोंका विधान है, किसीको इस प्रकारकी भ्रान्ति हो, हम उसको निवृत्त करते हैं - जीवकी उत्पत्ति और प्रलय नहीं होते, क्योंकि शास्त्रफलके सम्बन्धकी उपपत्ति होती है । शरीर विनाश के साथ जीवका विनाश हो तो अन्य शरीरगत इष्टकी प्राप्ति और अनिष्ट परिहार के लिए विधि और निषेध व्यर्थ हो जायेंगे । और ' जीवापेतं ० ' ( जीव रहित यह शरीर मरता है जीव नहीं मरता ) ऐसी श्रुति है । परन्तु लौकिक जन्म - मरणका व्यपदेश तो जीवमें दिखलाया गया है । सत्य, दिखलाया गया है । यह जन्म - मरण व्यपदेश जीवमें गौण है, तो पुनः इस मुख्य व्यपदेशका आश्रय कौन है, जिसको अपेक्षासे यह गौण है? कहते हैं — चर ( जंगम ) और अचर ( स्थावर ) शरीरोंके आश्रित यह मुख्य है । स्थावर और जंगम शरीर विषयक ही जन्म - मरण शब्द है, क्योंकि स्थावर और जंगम भूत उत्पन्न होते और मरते हैं, इसलिए उनमें जन्म - मरण शब्द मुख्य होते हुए उसमें स्थित जीवात्मामें गौण हैं, क्योंकि तद्भाव भावो हैं 1 । शरीरके आविर्भाव और तिरोभाव होते हुए जन्म और मरण शब्द होते हैं, न होनेपर नहीं होते । शरीर सम्बन्धके विना अन्यत्र ' जीव उत्पन्न हुआ अथवा मर गया ' ऐसा किसीसे नहीं देखा जाता । और ' स वा अयं ' ( वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्ममावसे प्राप्त होता है वह शरीरसे निकलते हुए मरा हुआ होता है ) यह श्रुति शरीर के संयोग और वियोग निमित्तक जन्म मरण शब्द दिखलाती है । जात कर्म आदिका विधान मी देहके आविर्भावकी अपेक्षासे समझना चाहिए, क्योंकि जीवके प्रादुर्भावका अभाव है । tant परमात्मा से आकाश आदिके समान उत्पत्ति है अथवा नहीं, यह आगे सूत्रसे कहेंगे । देहाश्रय स्थूल उत्पत्ति और प्रलय जीवोंमें नहीं हैं, ऐसा सूत्रकारने इस सूत्र से कहा है ॥ १६ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका शुद्धिके लिए जीव श्रुतियोंके विरोधका परिहार किया जाता है । पूर्वपक्षमें जीव और ब्रह्मका ऐक्य सिद्ध है और सिद्धान्तमें वह सिद्ध है ॥ १६ ॥

पृष्ठ 530

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 530 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ सूत्रार्थ - ( आत्मा ) जीव ( न ) उत्पन्न नहीं होता, ( अश्रुतेः ) क्योंकि उसकी उत्पत्ति विषयक श्रुति नहीं है, ( ताभ्यः ) ' स वा एष महानज आत्मा ' ( च ) और ' अजो नित्यः ' इत्यादि श्रुतियोंसे जीव नित्य प्रतीत होता है । * अस्त्यात्मा जीवाख्यः शरीरेन्द्रियपञ्जराध्यक्षः कर्मफलसंबन्धी । व्योमादिवदुत्पद्यते ब्रह्मणः, अहोस्विद्ब्रह्मवदेव नोत्पद्यत इति श्रुतिविप्रतिपत्तेर्विशयः । कासुचिच्छ्रतिष्वग्निविस्फुलिङ्गादिनिदर्शनैर्जीवात्मनः परस्माद्ब्रह्मण उत्पत्तिराम्नायते, कासुचित्त्वविकृतस्यैव परस्य ब्रह्मणः कार्यप्रवेशेन जीवभावो विज्ञायते, न चोत्पत्ति-राम्नायत इति । तत्र प्राप्तं तावदुत्पद्यते जीव इति । कुतः? प्रतिज्ञानुपरोधादेव । ' एकस्मिन्विदिते सर्वमिदं विदितम् इतीयं प्रतिज्ञा सर्वस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मप्रभवत्वे सति नोपरुध्येत, तस्वान्तरत्वे तु जीवस्य प्रतिज्ञेयमुपरुध्येत । न चाविकृतः परमात्मैव जीव इति शक्यते विज्ञातुं लक्षणभेदात् । अपहतपाप्मत्वादिधर्मको हि परमात्मा, तद्विपरीतो हि जीवः, विभागाच्चास्य विकारत्वसिद्धिः यावान्ह्याकाशादिः प्रविभक्तः स सर्वो विकारः, तस्य चाकाशादेरुत्पत्तिः समधिगता जीवात्मापि पुण्यापुण्यकर्मा सुखदुःखयुक्प्रतिशरीरं प्रविभक्त इति तस्यापि प्रपञ्चोत्पत्त्यवसर उत्पत्तिर्भवितुमर्हति । अपि च ' यथाऽग्नेः क्षुद्रा शरीर और इन्द्रियरूपी पञ्जरका स्वामी और कर्मफलका सम्बन्धी जीव नामक आत्मा है, क्या वह आकाश आदिके समान ब्रह्मसे उत्पन्न होता है अथवा ब्रह्मके समान उत्पन्न नहीं होता है? इस प्रकार श्रुतियों के परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है । किन श्रुतियोंमें अग्नि विस्फुलिङ्ग आदि दृष्टान्तोंसे जीवात्मा की परब्रह्मसे उत्पत्ति कही जाती है, और किन श्रुतियोंमें अविकृत परब्रह्म का ही कार्यमें प्रवेशके द्वारा जीवभावसे जाना जाता है, परन्तु उत्पत्ति नहीं कही जाती । इस प्रकार संशय होनेपर यह प्राप्त होता है कि जीव उत्पन्न होता है, किससे? इससेकि प्रतिज्ञाका अनुपरोध- अबाध ही है । ' एकस्मिन्विदेते ० ' ( एकके विदित होनेपर सब विदित होता है ) यह प्रतिज्ञा सम्पूर्ण वस्तु समूहके ब्रह्म जन्य होनेपर बाषित नहीं होगी । जीवके अन्य तत्त्व होनेपर तो यह प्रतिज्ञा बाधित होगी । अविकृत परमात्मा ही जीव है, इस प्रकार मी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि लक्षणभेद है । परमात्मा पापरहित आदि धर्मवाला है और जीव उससे विपरीत है और विभागसे भी जीवमें विकारत्व सिद्ध है । जो आकाश आदि प्रविभक्त हैं । वे सब विकार हैं, उन आकाश आदिकी उत्पत्ति मी निश्चित है । इस प्रकार जीवात्मा पुण्य पाप कर्म -वाला, सुख दुःखसे युक्त प्रति शरीर में विभक्त है, अतः प्रपञ्चकी उत्पत्तिके अवसरमें उसकी भी उत्पत्ति हो सकती है । और भी ' यथाग्नेः ० ' ( जैसे अग्निसे छोटी - छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे इस आत्मासे सत्यानन्दी - दीपिका * ' अग्नेर्विस्फुलिङ्गवदेतस्मात्परमात्मनः सर्वे जीवात्मनो ब्युच्चरन्ति ' ( जैसे अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं वैसे इस परमात्मासे सब जीव निकलते हैं ) इत्यादि जीवोत्पत्ति प्रतिपादक श्रुतियों और ' स एष इह प्रविष्ट आनखाप्रेभ्य अज आत्मा ' ० ( बृह ० ११४१७ ) ( यह इस शरीर में नखके अग्र पर्यन्त प्रविष्ट है वह आत्मा अज है ) इत्यादि जीवकी अनुत्पत्ति सूचक श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है । परन्तु देहके जन्म - मरणसे जीवका जन्म - मरण मत हो, क्योंकि अन्य देहसे भोगे जाने-वाले स्वर्ग आदिके निमित्त विधि आदिका असंभव हो जायगा । परन्तु कल्पके आदि और अन्तमें जैसे आकाशकी उत्पत्ति और प्रलय होते हैं, वैसे जीवको भी उत्पत्ति और प्रलय हों, क्योंकि उनका सम्भव है । इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे पूर्वपक्ष है । इसलिए जीवकी उत्पत्ति मानना चाहिए, इससे ‘ एक विज्ञान से सर्वविज्ञान ' यह प्रतिज्ञा भी सिद्ध होगी, अन्यथा प्रतिज्ञाका बाध होगा । * ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( उसने स्वयं अपने को किया ) इसके समान प्रवेश श्रुतिका ' विकार