श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 531–540

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 531–540

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अधि ० ११ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४ ९ ७ विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः ' ( वृ ० २।१।२० ) इति प्राणादेर्भाग्यजातस्य सृष्टिशिष्ट्वा ' सर्व एव आत्मानो व्युच्चरन्ति ' इति भोक्तृणामात्मनां पृथक्सृष्टि शास्ति । ' यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैत्रापियन्ति ' ( सुण्ड ० २1१1१ ) इति च जीवात्मनामुत्पत्तिप्रलयावुच्येते । सरूपवच-नातू जीवात्मानो हि परमात्मना सरूपा भवन्ति, चैतन्ययोगात् । नच क्वचिदश्रवण-मन्यत्र श्रुतं वारयितुमर्हति श्रुत्यन्तरगतस्याप्यविरुद्धस्याधिकस्यार्थस्य सर्वत्रोपसंहर्तव्य-त्वात् । प्रवेशश्रुतिरप्येवं सति विकारभावापत्त्यैव व्याख्यातव्या, ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ’ ( तै ( ० २ ) इत्यादिवत् । तस्मादुत्पद्यते जीव इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - नात्मा जीव उत्पद्यत इति । कस्मात्? अश्रुतेः । न हास्योत्पत्तिप्रकरणे श्रवणमस्ति भूयःसु प्रदेशेषु । ननु क्वचिदश्रवणमन्यत्र श्रुतं न वारयतीत्युक्तम् । सत्यमुक्तम् । उत्पत्तिरेव त्वस्य न संभव-तीति वदामः । कस्मात्? नित्यत्वाच्च ताभ्यः । चशब्दादजत्यादिभ्यश्च । नित्यत्वं ह्यस्य श्रुतिभ्योऽवगम्यते तथाऽजत्वमविकारित्वमविकृतस्यैव ब्रह्मणो जीवात्मनावस्थानं ब्रह्मा-त्मना चेति । न चैवंरूपस्योत्पत्तिरुपपद्यते । ताः काः श्रुतयः? ' न जीवो म्रियते ' ( छा ० ६।११।३ ), ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽमयो ब्रह्म ' ( बृ ० ४।४।२२ ), ' न जायते म्रियते वा विपश्चित् ' ( कठ ० २।१८ ) ' अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणा ' ( कठ ० २।१८ ), ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' ( तै ० २ | ६ | १ ), ' अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि ' प्राण निकलते है ) इसप्रकार प्राण आदि भोग्य समुदायकी सृष्टि कहकर ' सर्व एव ( ये सब आत्मासे निकलते हैं ) इसप्रकार श्रुति मोक्ता जोवात्माओं की पृथक् सृष्टिका उपदेश करती है और ' यथा सुदी -प्तात् ० ' ( जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्निसे उसीके समानरूपवाली सहस्रशः चिनगारियां निकलती हैं, हे सोम्य! उसी प्रकार उस अक्षरसे अनेकों भाव उत्पन्न होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं ) इस प्रकार जीवात्माओं की उत्पत्ति और प्रलय कहे जाते हैं, क्योंकि श्रुतिमें सरूपवचन ( जीववचन ) है | जीवात्मा परमात्मा के समान होते हैं, क्योंकि चैतन्यका योग है । कहींपर अश्रवण अन्यत्र श्रुतका वारण नहीं कर सकता, क्योंकि अन्य श्रुतिगत अविरुद्ध अधिक अर्थका मी सर्वत्र उपसंहार ( ग्रहण ) करना चाहिए । ऐसा होनेपर ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' इत्यादि श्रुति के समान प्रवेश श्रुतिका भी विकारभावापत्ति से ही व्याख्यान करना चाहिए । इससे जीवात्मा उत्पन्न होता है । सिद्धान्ती -- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- आत्मा जीव उत्पन्न नहीं होता, किससे? इससे कि श्रुति नहीं है । अनेक स्थलोंमें उत्पत्ति प्रकरण में इसकी श्रुति नहीं है । परन्तु जो यह कहा गया है कि कहींपर अश्रवण अन्यत्र श्रुतका वारण नहीं करता । ठीक कहा है, किन्तु हम कहते हैं कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती, इससे कि उन श्रुतियों से वह नित्य प्रतिपादित है । च शब्द से अजत्व आदि धर्मोंसे अवगत होता है । उसका नित्यत्व तथा अजत्व, अविकारित्व और अविकृत ब्रह्मका ही जीवरूपसे और ब्रह्मरूपसे अवस्थान श्रुतियोंसे ही अवगत होता है । अतः इसप्रकार रूपवाले जीवकी उत्पत्ति युक्त नहीं है । वे कौन-सी श्रुतियाँ हैं? ' न जीवो म्रियते ' ( जीव मरता नहीं ) ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अज आत्मा है, अजर, अमर, अमृत और समय ब्रह्म है ) ' न जायते ० ' ( विद्वान् जन्मता मरता नहीं है ) ' भजो ० ' ( यह जन्म रहित, नित्य, शाश्वत और पुराण है ) ' तत्सृष्ट्वा ० ' ( उसे उत्पन्नकर उसमें प्रविष्ट हुआ ) ' अनेन ० ' ( इस जीव रूपसे अनुप्रवेशकर नाम और रूपको अभिव्यक्त करूँ ) ' स एष इह ० ' ( वह यह सत्यानन्दी - दीपिका जीवरूपसे ईश्वर प्रविष्ट हुआ ऐसा अर्थं करना चाहिए । अतः प्रवेशश्रुति गौण है और उत्पत्ति श्रुति मुख्य है ।

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४ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ ( छा ० ६।३।२ ), ' स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यः ' ( बृ ० १।४।७ ), ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६ ८ ७ ) ' अहं ब्रह्मास्मि ' ( बृ ० १।४।१० ), ' अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः ' ( बृ ० २ / ५ / १ ९ ), इत्येवमाद्या नित्यत्ववादिन्यः सत्यो जीवस्योत्पत्ति प्रतिबध्नन्ति । ननु प्रविभक्तत्वाद्विकारोविकारत्वा-चोत्पद्यत इत्युक्तम्, अत्रोच्यते नास्य प्रविभागः स्वतोऽस्ति, ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ' ( श्वे ० ६।११ ) इति श्रुतेः । बुद्धयाद्युपाधिनिमित्तं त्वस्य प्रविभागप्रतिभान-माकाशस्येव घटादि संबन्धनिमित्तम् । तथा च शास्त्रम् -'स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोतमय: ' ( बृ ० ४ | ४ | ५ ) इत्येवमादि ब्रह्मण एवाविकृतस्य सतो-ऽप्येकस्यानेकबुद्धयामियत्वं दर्शयति । तन्मयत्वं चास्य विविक्तस्वरूपानभिव्यक्त्या तदु-परक्तस्वरूपत्वं स्त्रीमयो जाल्म इत्यादिवद्द्रष्टव्यम् । * यदपि क्वचिदस्योत्पत्तिप्रलयश्रवणं तदप्यत एवोपाधिसंबन्धान्नेतव्यम् । उपाध्युत्पत्त्याऽस्योत्पत्तिस्तत्प्रलयेन च प्रलय इति । तथा च दर्शयति - प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति ' ( बृ ० ४।५।१३ ) इति तथोपाधिप्रलय एवायं नात्मविलय इत्येतदपि ' अत्रैव मा भगवान्मोहान्त-मापीपदन्न वा अहमिमं विजानामि न प्रेत्य संज्ञास्ति ' इति प्रश्नपूर्वकं प्रतिपादयति- ' न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति ' ( ब्र ० ४/५/१४ ) इसमें नखाग्रपर्यन्त प्रविष्ट है ) ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) ' अहं ब्रह्मास्मि ' ( मैं ब्रह्म हूँ ) ' अयमात्मा ० ( यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियाँ जीवका नित्यत्व कहती हुई जीवकी उत्पत्तिका निषेध करती हैं । परन्तु ऐसा कहा गया है कि जीवात्मा विभक्त होनेसे विकार है और विकार होनेसे उत्पन्न होता है । इसपर कहते है - इसका विभाग स्वतः नहीं है, क्योंकि ' एको देव: ० ' ( एक देव सब भूतोंमें गूढ, सर्वव्यापी और सब भूतोंका अन्तरात्मा है ) ऐसी श्रुति है । जैसे आकाशका विभाग घट आदि सम्बन्ध निमित्तक मासता है, वैसे बुद्धि आदि उपाधिके निमित्तसे इसमें ( जीवमें ) प्रविभाग मासता है । जैसे कि ' स वा अयमात्मा ० ' ( यह आत्मा ब्रह्म है, वह विज्ञानमय, मनोमय प्राणमय, चक्षुमंय और श्रोत्रमय है ) इत्यादि शास्त्र अविकृत एक होते हुए भी ब्रह्मा अनेक बुद्धि आदि मयत्व दिखलाता है । [ स्त्रीपरतन्त्र कामीपुरुषको ] जैसे ' स्त्रीमय जाल्म ' ( काम जड़ ) कहा जाता है, वैसे विविक्तस्वरूपकी अनभिव्यक्ति से उस बुद्धि आदिसे उपरोक्त स्वरूपत्व ( तादात्म्यापन्नत्व ) इसका तन्मयत्व है, ऐसा समझना चाहिए । जो भी कहीं पर इसके उत्पत्ति और प्रलयका श्रवण है, वह भी इस उपाधिके सम्बन्धसे समझना चाहिए । उपाधिकी उत्पत्ति से इसकी उत्पत्ति और उसके प्रलयसे प्रलय है । और जैसे ' प्रज्ञानघने ० ' ( भूतोंके द्वारा यह प्रज्ञानधन समुत्थान- अभिव्यक्त होकर इन भूतोंके नाशके साथ ही साथ नष्ट हो जाता है, मरणानन्तर संज्ञा नहीं रहती ) यह श्रुति दिखलाती है । इस प्रकार उपाधिका ही यह प्रलय है आत्माका प्रलय नहीं है, यह भी ' अत्रैव मा भगवान् ० ' ( मैत्रेयी - हे भगवन्! यहीं मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है । मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती कि मरणानन्तर संज्ञा नहीं है ) इस प्रकार प्रश्न पूर्वक प्रतिपादन करते हैं— ' न वा अरेऽहं मोहं ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी! मैं मोहकी बात नहीं कर रहा हूँ । अरी! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी है, अपरिणामी है विषयोंके साथ उनका सम्बन्ध नहीं है ) इस प्रकार सत्यानन्दी - दीपिका * उत्पत्ति आदि श्रुवियाँ तो आत्मामें अव्यस्त उत्पत्ति आदिका अनुवादमात्र करती हैं, आत्माका नित्यत्व प्रतिपादक श्रुतियाँ बलवती हैं, इसलिए कोई विरोध नहीं है । अतः जीवात्माकी उत्पत्ति और प्रलय नहीं होते हैं ॥ १७ ॥

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अधि ० १२ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४ ९९ इति, प्रतिज्ञानुपरोधोऽप्यविकृतस्यैव ब्रह्मणो जीवभावाभ्युपगमात् । लक्षणभेदोऽप्यनयो-रुपाधिनिमित्तएव ' ' अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहि ' ( वृ ० ४ | ३ | १५ ) इति च प्रकृतस्यैव विज्ञान-मयस्यात्मनः सर्वसंसारधर्मं प्रत्याख्यानेन परमात्मभावप्रतिपादनात् । तस्मान्नैवात्मो-त्पद्यते प्रविलीयते चेति ॥ १७ ॥

( १२ ज्ञाधिकरणम् | सू ० १८ ) ज्ञोऽव एव ॥ १८ ॥

पदच्छेद - ज्ञः, अतः, एव । सूत्रार्थ - [ जीव ] ( ज्ञः ) स्वयं ज्योति: स्वरूप है, [ अतएव ] क्योंकि उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । * स किं कणभुजानामिवागन्तुक चैतन्यः; स्वतोऽचेतनः, आहोस्वित्सांख्यानामिव नित्यचैतन्यस्वरूप एवेति वादिविप्रतिपत्त ेः संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? आगन्तुकमा-त्मनश्चैतन्यमात्ममनः संयोगजमग्निघटसंयोगजरोहितादिगुणवदिति प्राप्तम् । नित्य-चैतन्यत्वे हि सुप्तमूच्छितग्रहाविष्टानामपि चैतन्यं स्यात् । ते पृष्टाः सन्तो न किंचिद्वयमचेतयामहोति जल्पन्ति, स्वस्थाश्च चेतयमाना दृश्यन्ते । अतः कादाचित्क-चैतन्यत्वादागन्तुकचैतन्य आत्मेति । * एवं प्राप्ते ऽभिधीयते -- ज्ञो नित्यचैतन्योऽय-अविकृत ब्रह्मा ही जीवभाव स्वीकार करनेसे प्रतिज्ञाका अबाध है । इनका ( जीव और ब्रह्मका ) लक्षणभेद भी उपाधि निमित्तक ही है । कारण कि ' अत ऊर्ध्व ० ' ( इसके आगे विमोक्षके लिए उपदेश कीजिए ) यह भी प्रकृत विज्ञानमय आत्माके ही सब धर्मोके निराकरणसे परमात्मभाव प्रतिपादित करता है । इससे आत्मा न उत्पन्न होता है और न प्रविलय होता है ॥ १७ ॥

वह ( जीवात्मा ) क्या कणादमतके समान बागन्तुक चैतन्य वाला होता हुआ स्वतः अचेतन है, अथवा सांख्योंके समान नित्य चैतन्य स्वरूप ही है? इस प्रकार वादियोंको विप्रतिपत्तिसे संशय होता है । तो क्या प्राप्त हुआ? अग्नि और घटके संयोगसे [ घटमें ] उत्पन्न हुए रक्त आदि गुणोंके समान जीवात्मामें आत्मा और मनके संयोगसे जन्य आगन्तुक चैतन्य है, ऐसा प्राप्त हुआ । नित्य चैतन्य होनेपर सुप्त, मूच्छित और ग्रहाविष्टोंको भी चैतन्यकी प्राप्ति होगी । परन्तु वे पूछे जानेपर ' हम कुछ भी नहीं जानते हैं ऐसा बोलते हैं और स्वस्थ होनेपर चेतनता युक्त देखे जाते हैं । इसलिए कभी कभी चैतन्य होनेसे जीवात्मा आगन्तुक चैतन्य है । ऐसा प्राप्त होने पर कहते हैं - यह आत्माज्ञ - नित्य चैतन्यरूप है, अतएव - क्योंकि वह उत्पन्न नहीं होता, इससे अविकृत परब्रह्म हो सत्यानन्दी - दीपिका * जीवात्मा विषयक उत्पत्ति और प्रलयका प्रतिषेधकर अब उसे स्वप्रकाशरूप सिद्ध करनेके लिए पूर्वपक्षकी अवतरणिका दिखाते हैं - ' आत्मैवास्य ज्योति: ' ( बृह ० ४।३।६ ) ( आत्मा ही इसको ज्योति है ) इत्यादि श्रुति आत्माको स्वप्रकाश कहती हैं । और ' पश्यञ्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रम् ' ( बृह ० १।४।७ ) ( दर्शन करता हुआ चक्षु है, श्रवण करता हुआ श्रोत्र है ) इत्यादि श्रतियाँ अनित्य ज्ञानका प्रतिपादन करती हैं । इस प्रकार श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर संशय होता है कि जीव ब्रह्मरूप होनेसे नित्य-ज्ञानरूप होनेपर ज्ञानकी उत्पत्तिके इन्द्रिय आदि साधन व्यर्थ होंगे, इससे आत्मा अनित्य ज्ञानवाला मानना चाहिए । सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में मी ज्ञानका अभाव प्रतीत होता है । अतः आत्मा और मनके संयोगसे जीवात्मामें ज्ञान उत्पन्न होता है, यह पूर्वपक्ष है । पूर्वोक्त जीवकी अनुत्पत्तिरूप हेतुको लेकर स्वप्रकाशत्वके साधनसे हेतुहेतुमद्भाव संगति है । * आत्मा नित्य चैतन्यस्वरूप और असङ्ग है, अतः उसका विषयोंके साथ स्वतः सम्बन्ध न होनेके

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५०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ मात्मात एव यस्मादेव नोत्पद्यते परमेव ब्रह्माविकृनमुपाधिसंपर्काजीवभावेनाव-तिष्ठते । परस्य हि ब्रह्मणश्चैतन्यस्वरूपत्वमाम्नातम् - ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृ ० ३।९ ।२८ ), ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २1१1१ ), अनन्तरोऽबाह्य कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ' ( बृ ० ४ | ५ | १३ ), इत्यादिषु श्रुतिषु । तदेव चेत्परं ब्रह्म जीवस्तस्माजीवस्यापि नित्यचैतन्यस्वरूपत्व-मग्न्यौष्ण्यप्रकाशवदिति गम्यते । विज्ञानमयप्रक्रियायां च श्रुतयो भवन्ति —– ' असुप्तः ' सुप्तानभिचाकशीति ' ( बृ ० ४ | ३ | ११ ) ' अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ' ( वृ ० ४ | ३ | ९ ) इति, ' हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ' ( वृ ० ४ | ३ | ३० ) इत्येवंरूपा: । ' अथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा ' ( छा ० ८ | १२ | ४ ) इति च सर्वैः करणद्वारैरिदं वेदेदं वेदेति विज्ञानेना-नुसंधानात्तद्रूपत्वसिद्धिः । नित्यचैतन्यस्वरूपत्वे घ्राणाद्यानर्थक्यमिति चेत्-न, गन्धादिविषयविशेषपरिच्छेदार्थत्वात् । तथा हि दर्शयति- ' गन्धाय घ्राणम् ' इत्यादि । * यत्तु सुप्तादयो न चेतयन्त इति तस्य श्रुत्यैव परिहारोऽभिहितः । सुषुप्तं प्रकृत्य ' यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति । नहि द्रष्टुर्दृष्येर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीयमस्ति उपाधिके सम्बन्धसे जीवभाव से अवस्थित है । कारण कि ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' अनन्तरो ० ' ( अन्तर रहित, बाह्य रहित, कृत्स्न विज्ञानैकरस है ) इत्यादि श्रुतियों में परब्रह्मका ही चैतन्यस्वरूप कहा गया है । यदि वही परब्रह्म जीव है तो इससे अग्निकी उष्णता और प्रकाशके समान जीवका भी नित्य चैतन्यस्वरूप है, ऐसा ज्ञान होता है । और ‘ असुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ' ( स्वयं न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है ) ' अत्रायं ० ' ( स्वप्नावस्था में यह पुरुष स्वयं ज्योति: स्वरूप होता है ) ' नहि विज्ञातुः ० ' ( विज्ञाताकी विज्ञान शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता ) इस प्रकरकी श्रुतियाँ विज्ञानमयके प्रकरण में हैं । ' अथ यो वेदेदं ० ' ( जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं सूंघें वह आत्मा है ) इस प्रकार सब इन्द्रियों द्वारा इसको जानता है, इसको जानता है इत्याकारक विज्ञानके साथ अनुसंधान होनेसे तद्रूपत्व- ज्ञानरूपत्व सिद्ध होता है । यदि यह कहो कि नित्य चैतन्यस्वरूप होनेपर घ्राण आदि व्यर्थ होंगे, तो ऐसा नहीं, क्योंकि वे गन्ध आदि विषय विशेषाकारवृत्ति के लिए हैं । उसी प्रकार ' गन्धाय घ्राणम् ' ( गन्ध विषयक अन्तःकरणी वृत्तिके लिए प्राण है ) इत्यादि श्रुति दिखलाती है । सुप्त आदि नहीं जानते, ऐसा जो कहा गया है, उसका सुषुप्तका उपक्रमकर ' यद्वै तन्न पश्यति ० ( सुषुप्तावस्थामें वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता, द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है, उस समय उससे अन्य विभक्त द्वितीय नहीं है, जिसे देखे ) इत्यादि श्रुतिसे ही परिहार कहा गया है । तात्पर्य यह है कि विषयके सत्यानन्दी - दीपिका कारण विषयोंके साथ सम्बन्ध घटकी भूत वृत्तियोंके लिए इन्द्रिय आदि ज्ञानके साधन अवश्य स्वीकृत हैं । यहाँ परिच्छेदका अर्थ वृत्ति है । * सुषुप्ति में बुद्धि, इन्द्रिय, विषय आदि निशेष ज्ञानकी उत्पादक सामग्री नहीं है । इससे विशेष-ज्ञानके अभाव होनेसे स्वरूपात्मक ज्ञानका अभाव नहीं होता । और ' शृण्वन् श्रोत्रम् ' इस श्रुतिसे जो जीवात्माका ज्ञान अनित्य कहा गया है, वह भी वृत्ति विषयक है, ' आत्मा न ज्ञानं द्रव्यत्वात् ' ' आत्मा ज्ञान स्वरूप नहीं है, क्योंकि वह द्रव्य है ' यह तर्क ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतियोंसे afra है, क्योंकि निरवयव आत्माका निरवयव मनके साथ सम्बन्ध न होनेसे उसमें अनित्य ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होगा और समवायके न होनेसे अपनेमें समवाय सम्बन्धसे उत्पन्न ज्ञानद्वारा आत्मा वेद्य है, यह अयुक्त है, क्योंकि कर्मकर्तृभाव विरोध है । जिसको वैशेषिक मतमें ज्ञान कहा जाता है, वस्तुतः वह वृत्तिज्ञान है, ' कामः सङ्कल्पः ' इत्यादि श्रुति ' सब मन ही है ' ऐसा कहती है । इसलिए आत्मा नित्य चैतन्य स्वरूप है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 535

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अधि ० १३ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५०१ ततोऽन्यद्विमक्तं यत्पश्येत् ' ( बृ ० ४ | ३ | २३ ) इत्यादिना । एतदुक्तं भवति - विषयाभावादिय-मचेतयमानता, न चैतन्याभावादिति । यथा वियदाश्रयस्य प्रकाशस्य प्रकाश्याभावा-दनभिव्यक्तिर्न स्वरूपाभावात्तद्वत् । वैशेषिकादितर्कश्च श्रुतिविरोध आभासीभवति । तस्मान्नित्यचैतन्यस्वरूप एवात्मेति निश्चिनुमः ॥ १८ ॥

( १३ उत्क्रान्तिगत्यधिकरणम् । सू ० १ ९ -३२ ) उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम ॥ १ ९ ॥ सूत्रार्थ - ' अस्माच्छरीरादुत्क्रामति ' ' चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ' तस्माल्लोकात्पुनरेति ' इस प्रकार उत्क्रमण, गति और आगतिके श्रवणसे जीव अणु है, अतः जीवकी सर्वव्यापक प्रतिपादक ' सर्वव्यापी ' श्रुतिका ' एषोऽणुरात्मा ' इस श्रुतिके साथ विरोध है । इदानीं तु किं परिमाणो जीव इति चिन्त्यते - किमणुपरिमाण उत मध्यमपरिमाण आहोस्विन्महापरिमाण इति । ननु च नात्मोत्पद्यते नित्यचैतन्यश्चायमित्युक्तम् । अतश्च पर एवात्मा जीव इत्यापतति, परस्य चात्मनोऽनन्तत्वमाम्नातम्, तत्र कुतो जीवस्य परिमाणचिन्तावतार इति? उच्यते - सत्यमेतत्, उत्क्रान्तिगत्या गतिश्रवणानि तु जीवस्य परिच्छेदं प्रापयन्ति । स्वशब्देन चास्य क्वचिदणुपरिमाणत्वमाम्नायते । तस्य सर्वस्यानाकुलत्वोपपादनायायमारम्भः । तत्र प्राप्तं तावदुत्कान्तिगत्यागतीनां श्रवणात्प-रिच्छिन्नोऽणुपरिमाणो जीव इति । उत्क्रान्तिस्तावत् - ' स यदास्माच्छरीरादुत्क्रामति सहैवैतैः सर्वैरुत्क्रामति ' ( कौषीत ० ३ | ३ ) इति । गतिरपि ' ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ( कौषीत ० १।२ ) इति । आगतिरपि ' तस्माल्लोकात्पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मणे ' ( बृ ० ४।४।६ ) इति । आसामुत्कान्तिगत्यागतीनां श्रवणात्परिच्छिन्नस्तावज्जीव इति प्राप्नोति । नहि विभोश्चलनमवकल्पत इति । सति च परिच्छेदे शरीरपरिमाणत्वस्या-हतपरीक्षायां निरस्तत्वादणुरात्मेति गम्यते ॥१ ९ ॥ अभावसे यह चेतनताका अभाव है चैतन्यके अभावसे नहीं । जैसे आकाश आश्रय प्रकाशको प्राकश्यके अमावसे अनभिव्यक्ति है स्वरूपके अभावसे नहीं । वैशेषिक आदिके तर्क तो श्रुतिके विरोध होनेपर अभास होते हैं । इससे हम यह निश्चय करते हैं कि नित्य चैतन्य स्वरूप ही आत्मा है ॥ १८ ॥

जीव किस परिमाणवाला है अर्थात् जीवका क्या परिमाण है, अब यह विचार किया जाता है – क्या वह अणुपरिमाणवाला है, वा मध्यम परिमाणवाला है अथवा महत्परिमाणवाला है? परन्तु यह कहा जा चुका है कि यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और नित्यचैतन्य है, अतः जीव परमात्मा है, ऐसा प्राप्त होता है, परमात्मा अनन्त है ऐसा श्रुतिमें कहा गया है, तो पुनः जीवके परिमाण विषयक चिन्ता - विचारका अवतरण कैसे हुआ? कहते हैं - यह ठीक है, तो भी उत्कान्ति, गति, आगतिका श्रवण जीवका परिच्छिन्नत्व प्राप्त कराता है । कहींपर श्रुति स्वशब्दसे इसको अणुपरिमाण कहती है । उन सबका अनाकुलत्व - अबाधत्व उपपादन करने के लिए यह आरस्म है । ऐसा प्राप्त हुआ । पूर्वपक्षी - जीव परिच्छिन्न और आणु परिमाण है, क्योंकि उत्क्रान्ति, गति और आगतिका श्रवण हैं, ' स यदास्माच्छरीरादु ० ' ( वह जब मरण समय इस शरीर से उत्क्रमण करता है तब इन सबके साथ उत्क्रमण करता है ) यह उत्क्रान्ति श्रुति है । ' ये वै के ' ( और जो कोई इस लोकसे प्रयाण करते हैं, वे सब चन्द्रलोकको ही जाते हैं ) यह श्रुति गति भी कहती है । और ' तस्माल्लोकात् ० ' ( उस लोकसे पुन: इस कर्मलोक में आता है ) इस प्रकार यह श्रुति आर्गात भी कहती है । इन उत्क्रान्ति, गति, और आगति विषयक श्रुतियोंसे जीव परिच्छिन्न है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि विभुको गति नहीं हो सकती है । परिच्छिन्नत्व प्राप्त होनेपर शरीर परिमाणका अहंत मतकी परीक्षा में निराकरण होने से आत्मा -अणु है, ऐसा ज्ञात होता है ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 536

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५०२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २० ॥

पदच्छेद - स्वात्मना च, उत्तरयोः । सूत्रार्थ - ( उत्तरयोः ) उत्क्रमणके अनन्तर होनेवाले गमन और आगमनका ( स्वात्मना ) स्वात्मा कर्ता के साथ सम्बन्ध होनेसे आत्मा अणु सिद्ध होता है । उत्क्रान्तिः कदाचिदचलतोऽपि ग्रामस्वाम्यनिवृत्तिवद्देहस्वाम्यनिवृत्त्या कर्मक्षये-णावकल्पेत । उत्तरे तु गत्यागती नाचलतः संभवतः । स्वात्मना हि तयोः संबन्धो भवति, गमेः कर्तृस्थक्रियात्वात् । अमध्यमपरिमाणस्य च गत्यागती अणुत्व एव संभ-वतः । सत्योश्च गत्यागत्योरुत्क्रान्तिरप्यपसृप्तिरेव देहादिति प्रतीयते । न नपसृप्तस्य देहाद्गत्यागती स्याताम् । देहप्रदेशानां चोत्क्रान्तावपादानत्ववचनात् । ' चक्षुष्टो वा मूर्ध्न वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः ' ( बृ ० ४ ॥ २ ) इति । स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति ' ( वृ ० ४ | ४ | १ ), ' शुक्रमादाय पुनरेति स्थानम् ' ( बृ ० ४ | ३ | ११ ) इति

चान्तरेऽपि शरीरे शारीरस्य गत्यागती भवतः । तस्मादव्यस्याणुत्वसिद्धिः ॥ २० ॥

नाणुरच्छ्रतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॥ २१ ॥

पदच्छेद -- न, अणुः, अतच्छ्रुतेः, इति चेत्, न, इतराधिकारात् । सूत्रार्थ - ( नाणुः ) जीव अणु परिमाण नहीं है, ( अतच्छ्रुतेः ) क्योंकि ' सर्वभ्यापी ' इत्यादि श्रुति जीवको सर्वत कहती हैं, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो 6 युक्त नहीं है, ( इतराधिकारात् ) इतर- ब्रह्मका प्रकरण है । * अथापि स्यान्नाणुरयमात्मा । कस्मात्? अतच्छ्रुतेः । अणुत्वविपरीतपरिमाण-श्रवणादित्यर्थः । स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ( बृ ० ४ | ४ | १२ ), ' आकाश-वत्सर्वगतश्च नित्यः ', ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २ | १ | १ ) इत्येवंजातीयका हि श्रुतिरात्मनो-कदाचित् उत्क्रान्ति तो अचल आत्माकी भी ग्रामके स्वामित्वको निवृत्ति के समान देहके स्वा-मित्व निवृत्तिसे कर्मक्षय होनेसे हो सकती है । परन्तु आगेकी गति और आगति तो अचल आत्माकी नहीं हो सकती, क्योंकि उनका सम्बन्ध अपने आत्माके साथ होता है, कारण कि ' गम् ' धातु कर्तृनिष्ठ क्रिया है । मध्यम परिमाण रहित जीवके अणु होनेपर ही गति और आगति हो सकती हैं । गति और आगतिके होने पर देहसे अपसृप्ति ( बाहर निकलना ) ही उत्क्रान्ति है, ऐसा प्रतीत होता है । देहसे बाहर न निकले हुए की गति और आगति नहीं होती । ' चक्षुष्टो ० ' ( उसीसे यह आत्मा चक्षुसे, मूर्धा अथवा शरीरके अन्य भागोंसे बाहर निकलता है ) इसप्रकार देह प्रदेश उत्क्रान्तिमें अपादानरूपसे कहे गये हैं । ‘ एतास्तेजो ० ' ( वह आत्मा इन तेजोमात्राओं ( इन्द्रिय समूह ) का सम्यक् प्रकारसे ग्रहणकर हृदयमें ही अनुक्रान्त- अभिव्यक्त ज्ञानवान् होता है ) ' शुक्रमादाय ० ' ( प्रकाशक इन्द्रिय मात्राको लेकर आत्मा पुन: जागरित स्थानमें आता है ) इसप्रकार शरीरके आन्तर भी जीवात्माकी

गति और आगति होती हैं । इससे भी इस ( जीव ) की अणुत्व सिद्धि है ॥ २० ॥

तो मी शङ्का होती है कि यह जीवात्मा अणु नहीं है, किससे? इससे कि अतच्छ्रति है - अणु परिमाणके विपरीत परिमाणकी श्रुति है, ऐसा अर्थ है । ' स वा एष महानज ० ' ( यह महान् II अज आत्मा है जो वह प्राणों में विज्ञानमय है ) ' आकाशवत् ० ' ( आकाशके समान सवंगत और नित्य है ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' सत्यानन्दी - दीपिका * शास्त्रदृष्टिसे जैसे गर्भस्थ वामदेवने ' अहं मनुरभवं सूर्यश्च ' ( मैं ही मनु हुआ और सूर्य भी ) जीव होते हुए भी परमार्थं दृष्टिसे कहा है, वैसे विकाररूप जीव कारण ब्रह्मसे परमार्थसे अभिन्न

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अधि ० १२ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५०३ S णुत्वे विप्रतिषिध्येतेति चेत् - नैष दोषः, कस्मात्? इतराधिकारात् । परस्य ह्यात्मनः प्रक्रियायामेवा परिमाणान्तरश्रुतिः परस्यैवात्मनः प्राधान्येन वेदान्तेषु वेदितव्यत्वेन प्रकृतत्वात् विरजः पर आकाशादित्येवंविधाच्च परस्यैवात्मनस्तत्र तत्र विशेषाधिका-रात् । ननु ' योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ( वृ ० ४।४, २२ ) इति शारीर एव महत्त्व संबन्धित्वेन प्रतिनिर्दिश्यते । शास्त्रदृष्ट्या त्वे निर्देशो वामदेववद्रष्टव्यः । तस्मात्प्राज्ञविषयत्वा-त्परिमाणान्तरश्रवणस्य न जीवस्याणुत्वं विरुध्यते ॥२१ ॥

स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ॥ २२ ॥

पदच्छेद — स्वशब्दोन्मानाभ्याम्, च । सूत्रार्थ - ' एषोऽणुरात्मा ' इस अणुत्व वाचक श्रुति और ' बालाग्रशत भागस्य ' इस श्रुतिमें अत्यन्त अपकृष्ट परिमाणसे जीव अणु है । इतश्चाणुरात्मा, यतः साक्षादेवास्याणुत्ववाची शब्दः श्रूयते - एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ' ( मुण्ड ० ३ | १ | ९ ) इति । प्राणसंबन्धाच्च जीव एवाय-मणुरभिहित इति गम्यते । तथोन्मानमपि जीवस्याणिमानं गमयति- ' बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । मागो जीवः स विज्ञेय: ' ( श्वे ० ५१ ९ ) ' भाराप्रमात्रो झवरोऽपि दृष्टः ' ( श्वे ० ५१८ ) इति चोन्मानान्तरम् ॥ २२ ॥

नन्वत्वे सत्येकदेशस्थस्य सकलदेहगतोपलब्धिर्विरुध्यते । दृश्यते च जाह्नवी-हृदनिमग्नानां सर्वाङ्गशैत्योपलब्धिर्निदाघसमये च सकलशरीरपरितापोपलब्धिरिति, अत उत्तरं पठति-इस प्रकारकी श्रुतियाँ आत्माको अणु मानने पर विरुद्ध होंगी । पू ० - ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, क्यों? क्योंकि इतरका अधिकार है - परमात्मा के प्रकरणमें यह अन्य परिमाणकी श्रुति है, क्योंकि परमात्मा ही मुख्यरूपसे वेदान्तोंमें वेदितव्यरूपसे प्रकृत है । और ' विरजः ० ' ( वह विरज हैं और आकाश पर है ) इसप्रकारके वचनोंसे परमात्माका ही तत् तत् स्थलमें विशेष अधिकार है । परन्तु ' योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ऐसा शारीर ( जीवात्मा ) का ही महत्त्व सम्बन्धिरूपसे प्रतिनिर्देश किया जाता है । यह निर्देश तो शास्त्रदृष्टिसे वामदेव के समान समझना चाहिए । इसलिए अन्य परिमाण विषयक श्रुति प्राज्ञ ( परमात्मा ) विषयक होनेसे जीवका अणुत्व विरुद्ध नहीं है ॥२१ ॥

और इससे भी जीवात्मा अणु है, क्योंकि ' एषोऽणुरात्मा ० ' ( यह अणु - सूक्ष्म आत्मा, केवल विशुद्ध विज्ञानसे जानने योग्य है, जिस शरीरमें प्राण पांच प्रकारका होकर प्रविष्ट है ) इसप्रकार साक्षात् ही इसका अणुत्व वाचक शब्द ( श्रुति ) सुना जाता है । और ऐसा ज्ञात होता है कि प्राणके सम्बन्धसे यह जीव ही अणु कहा गया है । उसीप्रकार ' बालाग्रशतभागस्य ० ' ( सौ भागों में विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौव माग है, उसके समान जीवको जानना चाहिए ) यह उन्मान ( अत्यन्त सूक्ष्मपरिमाण ) मी जीवको अणु बतलाता है । ' आराप्रमात्रो ० ' ( लकड़ो के डण्डेमें लगे सूक्ष्म लोह कण्टकके समान अकारवाला आत्मा देखा गया है ) यह अन्य उन्मान - अत्यन्त अपकृष्ट परिमाण है || २२ ॥ परन्तु जीवके अणु होनेपर देहके एक देशस्थित जीवको सम्पूर्ण शरीर गत उपलब्धिका विरोध होगा, क्योंकि गङ्गा अथवा तालाब में स्नान करनेवालोंको सर्वाङ्गमें शैत्यकी उपलब्धि और उष्णकालमें सम्पूर्ण शरीरमें परितापकी उपलब्धि देखने में आती है । इससे उत्तर कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका होनेके कारण अभेददृष्टिसे महत्त्व परिमाणका निर्देश है । इससे जीवमें स्वतः अणुत्वका विरोध नहीं है अर्थात् जीवात्मा अणु है ॥ २१ ॥

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५०४ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ अविरोधश्चन्दनवत् ॥ २३ ॥

पदच्छेद - अविरोधः, चन्दनवत् । सूत्रार्थ -- ( चन्दनवत् ) जैसे शरीर के एक अवयव में स्थित चन्दन बिन्दु शरीर व्यापी सुखको उत्पन्न करता है, वैसे अणु जीव भी देहव्यापी शीत आदिकी उपलब्धि करेगा, अतः ( अविरोधः ) कोई विरोध नहीं है । यथा हि हरिचन्दनबिन्दुः शरीरैकदेशसंबद्धोऽपि सन्सकलदेहव्यापिनमाह्लादं करोति, एवमात्मापि देहैकदेशस्थः सकलदेहव्यापिनी मुपलब्धि करिष्यति । त्वक्संबन्धा-च्चास्य सकलशरीरगता वेदना न विरुध्यते । त्वगात्मनोर्हि सम्बन्धः कृत्स्नायां त्वचि वर्तते, त्वक्च कृत्स्नशरीरव्यापिनीति ॥ २३ ॥

अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमादि हि ॥ २४ ॥

पदच्छेद – अवस्थितिवैशेष्यात्, इति चेत्, न, अभ्युपगमाद्, हृदि, हि । सूत्रार्थ - ( अवस्थितिवैशेष्यात् ) प्रत्यक्षरूपसे चन्दनबिन्दुकी शरीरके एक भागमें अव-स्थिति देखी जाती है, परन्तु जीवकी इसप्रकार नहीं देखी जाती । अतः अतुल्य होने से चन्दन दृष्टान्त युक्त नहीं है, इति चेन्न ) तो यह कथन युक्त नहीं है, ( अभ्युपगमात् ) क्योंकि जीवका अणुत्व स्वीकार है, ( हृदि ) अल्पपरिमाण हृदय में ' हृद्यन्तज्र्ज्योति: ' इत्यादि श्रुतिमें जीवका पाठ है, ( हि ) इससे जीवका अणुत्व स्वीकार है, इसप्रकार दृष्टान्त में भी वैषम्य नहीं है । * अत्राह - यदुक्तमविरोधश्चन्दनवदिति - यदयुक्तम् दृष्टान्तदान्तिकयोर-तुल्यत्वात् । सिद्धे ह्यात्मनो देहैकदेशस्थत्वे चन्दनदृष्टान्तो भवति, प्रत्यक्षं तु नन्द-नस्यावस्थितिवैशेष्यमेकदेशस्थत्वं सकलदेहाह्लादनं च । आत्मनः पुनः सकल-देहोपलब्धिमात्रं प्रत्यक्षं नैकदेशवर्तित्वम् । अनुमेयं तु तदिति यदप्युच्येत । न चात्रानुमानं सम्भवति । किमात्मनः सकलशरीरगता वेदना त्वगिन्द्रियस्येव सकलदे हव्यापिनः सतः? किं वा विभोर्नभस इव, आहोस्विच्चन्दनबिन्दो -रिवाणोरेकदेशस्थस्येति संशयानतिवृत्तेरिति? अत्रोच्यते- नायं दोषः कस्मात्? जैसे शरीरके एक देश से सम्बद्ध होता हुआ भी हरिचन्दन बिन्दु सकल देहव्यापी आह्लाद उत्पन्न करता है, वैसे आत्मा भी देहके एक देशस्थ होता हुआ सकल देहव्यापी उपलब्धि करेगा । इसका त्वचा के सम्बन्धसे सम्पूर्ण शरीर गत वेदना विरुद्ध नहीं है, क्योंकि त्वक् और आत्माका सम्बन्ध सम्पूर्ण त्वचा में है और त्वक् समस्त शरीरव्यापी है ॥ २३ ॥

यहाँ कहते हैं -- जो यह कहा गया है कि चन्दनके समान अविरोध है, वह प्रयुक्त है, क्योंकि दृष्टान्त और दाष्टन्तिकमें समानता नहीं है, आत्माका देहके एकदेशस्थत्व सिद्ध होनेपर चन्दन दृष्टान्त हो सकता है । परन्तु चन्दनका अवस्थितिविशेष एक देशमें स्थिति और सम्पूर्ण देहमें आह्लाद तो प्रत्यक्ष है । और पुनः आत्माका सम्पूर्ण देहमें उपलब्धि मात्र प्रत्यक्ष है न कि एक देशवर्तित्व है । * यदि कहो कि वह अनुमेय है, तो यहाँ अनुमान भी नहीं हो सकता, क्योंकि क्या आत्माकी सकल शरीरमें प्राप्त वेदना त्वक् इन्द्रियके समान सकल शरीरव्यापी आत्माकी है अथवा आकाशके समान व्यापक आत्माकी है अथवा हरिचन्दन बिन्दुके समान एक देशस्थ अणु आत्माकी है । इसप्रकार के सत्यानन्दी - दीपिका * ' आत्मा, " अल्पः, व्यापी कार्यकारित्वात् चन्दनबिन्दुवत् ' ( आत्मा अणु है, क्योंकि व्यापी कार्य करनेवाला है, जैसे चन्दन बिन्दु ) इस अनुमानसे आत्माकी चन्दन बिन्दुके समान एक देश अव-

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अधि ० १३ सू ० २५ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५०५ अभ्युपगमात् | अभ्युपगम्यते ह्यात्मनोऽपि चन्दनस्येव देहैकदेशवृत्तित्वमवस्थितिवैशे-व्यम् । कथमति? उच्यते - हृदि ह्येष आत्मा पठ्यते वेदान्तेषु । ' हृदि ह्येष आत्मा ' ( प्रश्न ० ३।६ ) ' स वा एष आत्मा हृदि ' ( छा ० ८ | ३ | ३ ) ' कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्त-ज्योंतिः पुरुषः ' ( बृह ४/३/७ ) इत्याद्युपदेशेभ्यः । तस्माद्दृष्टान्तदार्शन्तिकयोर वैषम्या-युक्तमेवैतदविरोधश्चन्दनवदिति || २४ || गुणाद्व लोकवत् ॥ २५ ॥

पदच्छेद- गुणाद, वा, लोकवत् । सूत्रार्थ - ( वा ) अथवा ( लोकवत् ) जैसे लोकमें गृहमध्यवर्ती दीपकके अल्प होनेपर भी ( गुणात् ) उसके प्रमारूप गुणसे गृहव्यापी प्रकाश आदि कार्य होते हैं, वैसे ही आत्मा के अणु होने पर भी आत्मनिष्ठ चैतन्य गुणको व्यापक माननेसे व्यापी गुणसे व्यापी कार्य हो जायगा । * चैतन्यगुणव्याप्तेर्वा ऽणोरपि सतो जीवस्य सकलदेहव्यापि कार्यं न विरुध्यते । यथा लोके मणिप्रदीप प्रभृतीनामपवरकै कदेशवर्तिनामपि प्रभाऽपवरकव्यापिनी सती कृत्स्ने surar के कार्य करोति, तद्वत् । स्यात्कदाचिच्चन्दनस्य सावयवत्वात्सूक्ष्मावयव-विसर्पणेनापि सकलदेह आह्लादयितृत्वं न त्वणोर्जीवस्यावयवाः सन्ति यैरयं सकलदेहं विप्रसर्पेदित्याशङ्कय ' गुणाद्वा लोकवत् ' इत्युक्तम् ॥२५ ॥

कथं पुनर्गुणो गुणिव्यतिरेकेणान्यत्र वर्तेत? न हि पटस्य शुक्लो गुणः पटव्यतिरे-केणान्यत्र वर्तमानो दृश्यते । प्रदीपप्रभावद्भवेदिति चेत् - न, तस्या अपि द्रव्यत्वाभ्युपगमात् । यी निवृत्ति नहीं होती । पू ० - इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है, क्यों? क्योंकि अभ्युपगम है । आत्माका भी चन्दनके समान देहके एकदेश में वृत्तित्व - अवस्थिति विशेषत्व स्वीकार किया जाता है । कैसे? कहते हैं - ' हृदि ह्येष आत्मा ' ' यह आत्मा हृदयमें है ' ' स वा एष ० ' ( वह यह आत्मा हृदयमें है ) ' कतम आत्मेति ० ' ( आत्मा कौन है? ) यह जो प्राणोंमें - बुद्धि वृत्तियों के मीतर रहनेवाला विज्ञानमय है, हृदयके अन्तर ज्योतिः स्वरूप है ) इत्यादि उपदेशोंसे वेदान्त - वाक्योंमें हृदयमें ही यह आत्मा पढा जाता है । इसलिए दृष्टान्त और दार्शन्तिकमें वैषम्य न होनेसे चन्दनके समान यह अविरोध युक्त है || २४ | अथवा चैतन्य गुणकी व्याप्तिसे जीवके अणु होनेपर भी सकल देहव्यापी कार्यं विरुद्ध नहीं है । जैसे लोकमें गृहके एक देशवर्ती मणि, प्रदीप आदिकी भी प्रभा गृहव्यापी होती हुई सम्पूर्ण गृहमें कार्य ( प्रकाश ) करती है । इसप्रकार प्रकरणमें भी समझना चाहिए । चन्दन सावयव है, अतः सूक्ष्म अवयवोंके फैलनेसे कदाचित् वह सकल देहमें आह्लाद कर सकता है, परन्तु अणु जीवके अवयव नहीं है जिससे कि वह सकल देहमें फैले । ऐसी आशङ्काकर ' गुणाद्वा लोकवद् ' ऐसा कहा है || २५ || परन्तु गुण गुणीको छोड़कर अन्यत्र किस प्रकार रहेगा? क्योंकि पटका शुक्ल गुण पट सत्यानन्दी - दीपिका स्थिति सिद्ध होती है । परन्तु इस अनुमानका हेतु व्यभिचारी है, क्योंकि त्वगिन्द्रियमें हेतु है साध्य नहीं है । त्वक् समस्त शरीरव्यापी है, इसलिए व्यभिचारी हेतु पक्षमें साध्यकी सिद्धि नहीं कर सकता । इस प्रकार त्वचाके दृष्टान्तसे संशयकी निवृत्ति नहीं हो सकती है । यह दोष नहीं है, क्योंकि आत्माके अणुत्वमें केवल अनुमान प्रमाण नहीं है, किन्तु ' स वा एष आत्मा हृदि ' इत्यादि श्रुति मी प्रमाण है, इसलिए चन्दन दृष्टान्त के साथ कोई विरोध नहीं है ॥ २४ ॥

* अणु आत्मा निरवयव है और चन्दन सावयत्र है, इससे कार्यमें भी विषमता है, इस अरुचिसे प्रदीपका दृष्टान्त दिया गया है ॥ २५ ॥

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५०६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ निबिडावयवं हि तेजोद्रव्यं प्रदीपः, प्रविरलावयवं तु तेजोद्रव्यमेव प्रभेति । अत उत्तरं पठति-व्यतिरेको गन्धवत् ॥२६ ॥

पदच्छेद - व्यतिरेकः, गन्धवत् । सूत्रार्थ - ( गन्धवत् ) जैसे गुण होते हुए भी गन्धकी स्थिति गुणी द्रव्यसे पृथक् उपलब्ध होती है, वैसे आत्मा गुण चैतन्यकी आत्मासे ( व्यतिरेकः ) पृथक् अवस्थिति हो सकती है । * यथा गुणस्यापि सतो गन्धस्य गन्धवद्द्रव्यव्यतिरेकेण वृत्तिर्भवति 1 । अप्राप्ते-ष्वपि कुसुमादिषु गन्धवत्सु कुसुमगन्धोपलब्धेः । एवमणोरपि सतो जीवस्य चैतन्य-गुणव्यतिरेको भविष्यति । अतश्चानैकान्तिकमेतद्गुणत्वाद्रूपादिवदाश्रय विश्लेषानुप-पत्तिरिति, गुणस्यैव सतो गन्धस्याश्रयविश्लेषदर्शनात् । गन्धस्यापि सहैवाश्रयेण विश्लेष इति चेत् न, यस्मान्मूलद्रव्याद्विश्लेषस्तस्य क्षयप्रसङ्गात् । अक्षीयमाणमपि तत्पूर्वावस्थातो गम्यते । अन्यथा तत्पूर्वावस्थैर्गुरुत्वादिभिर्हीयेत । स्यादेतत्--गन्धाश्रयाणां विश्लिष्टानामवयवानामल्पत्वात्सन्नपि विशेषो नोपलक्ष्यते । सूक्ष्मा हि गन्धपरमाणवः सर्वतो विप्रसृप्ता गन्धबुद्धिमुत्पादयन्ति नासिकापुटमनुप्रविशन्ति इति चेत् — न, अतीन्द्रियत्वात्परमाणूनां स्फुटगन्धोपलब्धेश्च नागकेसरादिषु । न च लोके प्रतीतिर्गन्धवद्द्रव्यमाघ्रातमिति । गन्ध एवाघ्रात इति तु लौकिकाः प्रतियन्ति । रूपादिष्वाश्रयव्यतिरेकानुपलब्धेर्गंन्धस्याप्ययुक्त आश्रयव्यतिरेक इति चेत्-न, प्रत्यक्षत्वादनुमानाप्रवृत्तेः । तस्माद्यद्यथा लोके दृष्टं तत्तथैवानुमन्तव्यं निरूपकैर्ना-व्यतिरिक्त अन्यत्र वर्तमान होता हुआ नहीं देखा जाता । यदि कहो कि प्रदीप प्रमाके समान हो जायगा, तो यह युक्त नहीं है, कारण कि वह भी द्रव्य माना गया है । घन अवयव तेजोद्रव्य ही प्रदीप है और प्रविरल अवयव तेजोद्रव्य ही तो प्रभा है । इससे उत्तर कहते हैं-जैसे गुण होते हुए भी गन्धकी गन्धवद् द्रव्यसे अतिरिक्त वृत्ति होती है, क्योंकि गन्ध युक्त कुसुम आदि अप्राप्त होनेपर मी कुसुम गन्धकी उपलब्धि होती है, वैसे जीवके अणु होनेपर भी चैतन्य गुणका व्यतिरेक होगा । इसमे ' गुण होनेसे रूप आदिके समान आश्रयसे उसका विश्लेष अनुपपन्न है ' यह व्यभिचरित है । कारण कि गुण होते हुए गन्धका ही आश्रयसे विश्लेश देखा जाता है । यदि कहो कि गन्धका भी आश्रयके साथ ही विश्लेश होता है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि जिस मूल द्रव्यसे विश्लेष है उसका क्षय प्रसंग होगा । परन्तु वह मूलद्रव्य पूर्वावस्थासे अक्षीण होता हुआ ज्ञात होता है, अन्यथा वह पूर्व अवस्थिति गुरुत्व आदिसे रहित हो जायगा । ऐसा होनेपर भी पृथक हुए गंधके आश्रय अवयवोंके अल्प होनेसे विशेष होता हुआ भी वह उपलक्षित - ज्ञात नहीं होता । क्योंकि चारों ओर फैले हुए सूक्ष्म गन्ध परमाणु नसिका पुटमें प्रवेश करते हुए गंधज्ञान उत्पन्न करते हैं, ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं और नाग केसरमें स्पष्ट गंधकी उपलब्धि होती है । लोक में ' गन्धवद् द्रव्य मैंने सूंघा ' ऐसी प्रतीति नहीं होती, प्रत्युत ' गन्ध ही मैंने सूंघा ' इसप्रकार लोग अनुभव करते हैं । यदि कहो कि रूप आदिकी आश्रयसे व्यतिरिक्त उपलब्धि नहीं होती, तो एतावता गंधका मी आश्रय व्यतिरेक अयुक्त है, तो यह ठीक नहीं है, कारण कि प्रत्यक्ष होनेसे अनुमान प्रवृत्त नहीं होगा । अतः जो जैसे लोकमें देखा गया हो उसका उसके सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्ती पूर्वपक्ष वारणके लिए अनुमान कहते हैं - ' ज्ञानं न गुणिव्यतिरिक्तदेशव्यापी गुण-स्वात, रूपवत् ' ( ज्ञान गुणी आत्मासे अधिक देश व्यापी नहीं है, क्योंकि वह गुण है जैसे रूप ) प्रभाके द्रव्य होनेसे उसमें व्यभिचार नहीं है । पू ० – - परन्तु गंधमें व्यभिचार है, इसलिए वह हेतु पक्षमें साध्यको