श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 541–550
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 541–550
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अधि ० १३ सू ० २७-२८-३९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५०७ न्यथा । नहि रसो गुणो जिह्वयोपलभ्यत इत्यतो रूपादयोऽपि गुणा जिह्वयैवोपलभ्येर-निति नियन्तुं शक्यते ॥२६ ॥
तथा च दर्शयति ॥। २७ ॥
पदच्छेद — तथा, च, दर्शयति । सूत्रार्थ - ( च ) और ' आ लोमभ्य आ नखाग्रेभ्यः ' इत्यादि श्रुति ( तथा ) आत्माका ज्ञानसे सम्पूर्ण शरीर व्यापित्व ( दर्शयति ) प्रतिपादित करती है । हृदयायतनत्वमणुपरिमाणत्वं चात्मनोऽभिधाय तस्यैव ' आ लोमभ्य आ नखाग्रेभ्यः ' ( छा ० ८/८/१ ) इति चैतन्येन गुणेन समस्तशरीरख्यापित्वं दर्शयति ॥२७ ॥
पृथगुपदेशात् ॥ २८ ॥
पदच्छेद – पृथक्, उपदेशात् । सूत्रार्थ - ' प्रज्ञया शरीरं समारुह्य ० ' इस श्रुतिसे आत्मा और ज्ञानका कर्तृकरणरूपसे ( पृथक् ) पृथक् ( उपदेशात् ) उपदेश है, अतः जीवका गुणद्वारा सकल शरीर व्यापित्व है । ‘ प्रज्ञया शरीरं समारुह्य ' ( कौषी ० ३।६ ) इति चात्मप्रज्ञयोः कर्तृकरणभावेन पृथगुप-देशाच्चैतन्यगुणेनैवास्य शरीरव्यापिता गम्यते । ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय ' ( बृ ० २।१।१७ ) इति च कर्तुः शारीरात्पृथग्विज्ञानस्योपदेश एतमेवाभिप्रायमुपोद्वलयति तस्मादणुरात्मेति ॥ २८ ॥
एवं प्राप्ते ब्रूमः -तद्गुणसारत्वात्त तद्वयपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ ९ ॥ पदच्छेद - तद्गुणसारत्वात्, तु, तद्वयपदेशः, प्राज्ञवत् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है, ( तद्गुणसारत्वात् ) बुद्धि और आत्माके तादात्म्य होने से जीवमें बुद्धिके अणुत्व, उत्क्रमण, गमन, आगमन, सुख - दुःख आदि गुण प्रधान हैं उससे उसमें ( तद्वयपदेश: ) अणुत्व व्यपदेश होता है, वह स्वाभाविक नहीं है ( प्राज्ञवत् ) जैसे परमात्माकी सगुणोपासनाओंमें दहर आदि उपाधियोंके कारण उसमें अणुत्वादि व्यवहार होता है । * तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । नैतदस्ति - अणुरात्मेति । उत्पत्त्यश्रवणाद्धि परस्यैव तु अनुसार ही निरूपकों से अनुमान करना चाहिए अन्यथा नहीं । रस गुण जिह्वासे उपलब्ध होता है, तो इससे रूप आदि गुण भी जिह्वा से ही उपलब्ध हों, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता ॥ २६ ॥
आत्माका हृदयमें स्थान और अणुपरिमाण कहकर उसका ही ' आ लोमभ्य ० ' ( हम अपने इस आत्माको लोमपर्यन्त और नखपर्यन्त ज्योंका त्यों देखते हैं ) यह श्रुति चैतन्य गुणसे समस्त शरीर व्यापित्व दिखलाती है ॥। २७ ॥ ' प्रज्ञया शरीरं ० ' ( प्रज्ञाद्वारा शरीर पर सम्यग्रूपसे आरूढ होकर सुख, दुःखका अनुभव करता है ) इसप्रकार आत्मा और प्रज्ञाका कर्तृ - करणभावसे पृथक् उपदेश होनेसे उसकी चैतन्यगुणद्वारा ही शरीर व्यापिता ज्ञात होती है । ' तदेषां ० ' ( सुषुप्ति में यह वाग् आदि प्राणोंके विषय ग्रहण करने की सामर्थ्य को अपने चैतन्य गुणसे ग्रहण कर सोता है ) इस प्रकार कर्ता जीवात्मासे पृथक् विज्ञानका उपदेश इसी ( चैतन्यगुण व्याप्ति विषयक ) अभिप्रायको पुष्ट करता है, इसलिए आत्मा अणु है || २८ || ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका सिद्ध नहीं कर सकता । अतः ज्ञान भी गन्धके समान आत्मासे अधिक देशवृत्ति हो सकता है ॥ २६ ॥
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५०८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ ब्रह्मणः प्रवेशश्रवणात्तादात्म्योपदेशाच्च परमेव ब्रह्म जीव इत्युक्तम् । परमेव चेद्ब्रह्म जीवस्तस्माद्यावत्परं ब्रह्म तावानेव जीवो भवितुमर्हति । परस्य च ब्रह्मणो विभुत्व-माम्नातम्, तस्माद्विभुर्जीवः । तथा च ' स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ( बृह ० ४।४।२२ ) इत्येवंजातीयका जीवविषया विभुत्ववादाः श्रौताः स्मातश्चि समर्थिता भवन्ति । न चाणोर्जीवस्य सकलशरीरगता वेदनोपपद्यते । त्वक्संबन्धात्स्या-दिति चेत् न, कण्टकतोदनेऽपि सकलशरीरगतैव वेदना प्रसज्येत त्वक्कण्टकयोर्हि संयोगः कृत्स्नायां त्वचि वर्तते -- त्वक्च कृत्स्नशरीरव्यापिनीति । पादतल एव तु कण्टकनुन्नो वेदनां प्रतिलभते । न चाणोर्गुणव्याप्तिरुपपद्यते, गुणस्य गुणिदेशत्वात् । गुणत्वमेव हि गुणिनमनाश्रित्य गुणस्य हीयेत । प्रदीपप्रभायाश्च द्रव्यान्तरत्वं व्या-ख्यातम् । * गन्धोऽपि गुणत्वाभ्युपगमात्साश्रय एव संचरितुमर्हति । अन्यथा गुणत्वहानिप्रसङ्गात् । तथा चोक्तं द्वैपायनेन – ' उपलभ्याप्सु चेद्गन्धं केचिद्वयुरनैपुणाः । पृथिव्यामेव तं विद्यादपो वायुं च संश्रितम् ॥ ' इति । यदि च चैतन्यं जीवस्य समस्तं शरीरं व्याप्नुयान्नाणुर्जीवः स्यात् । चैतन्यमेव हास्य स्वरूपमग्नेरिवौष्ण्यप्रकाशौ । नात्र तु शब्द [ पूर्व ] पक्षकी व्यावृत्ति करता है । आत्मा अणु है, यह ठीक नहीं है, क्योंकि आत्माकी उत्पत्तिके अश्रवणसे परब्रह्म के ही प्रवेश श्रवणसे और तादात्म्यके उपदेशसे परब्रह्म ही जीव है, ऐसा कहा गया है । यदि परब्रह्म ही जीव है तो उससे जितना परब्रह्म है उतना ही जीव हो सकता है । परब्रह्मको श्रुतियों में विभु कहा गया है उससे जीव मी विभु है । उसी प्रकार ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अज आत्मा है जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है ) इस प्रकारके जीव विषयक श्रौत और स्मार्तं विभुत्ववाद समर्थित होते हैं । और अणु जीवमें सम्पूर्ण शरीर गत वेदना उपपन्न नहीं होती । यदि कहो कि त्वक् के सम्बन्धसे होगी, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि त्वचा में काँटा चुभने पर भी सकल शरीर गत ही वेदना प्रसक्त होगी, कारण कि त्वचा और काँटेका संयोग ( सम्बन्ध ' ) सम्पूर्ण त्वचा में है और त्वक् समस्त शरीर व्यापी है । परन्तु काँटा चुभनेवालेको पैर के तलवेमें वेदना उपलब्ध होती है । अणुके गुणकी व्याप्ति उपपन्न नहीं होती, कारण कि गुणका गुणो प्रदेश होता है । यदि गुण गुणीके अनाश्रित होकर रहे तो गुणका गुणत्व ही न रहेगा । प्रभा तो अन्य द्रव्य है, ऐसा व्याख्यान किया जा चुका है । गन्ध भी गुण स्वीकार करने से आश्रय सहित ही संचारके योग्य हो सकता है, अन्यथा गुणत्वकी हानि प्रसक्त होगी । इस प्रकार भगवान् द्वैपायनने कहा - ' उपलभ्याप्सु ० ' ( जलमें गन्ध उपलब्धकर कई अनिपुण पुरुष उसमें गन्ध है ऐसा कहते हैं, परन्तु जल और वायुमें स्थित गन्ध पृथिवीका ही है ऐसा जानना चाहिए ) यदि जीवका चैतन्य समस्त शरीरको व्याप्त करेगा तो जीव अणु न होगा, क्योंकि जैसे औष्य और प्रकाश अग्निका स्वरूप है, वैसे चैतन्य ही जीवका स्वरूप है । इसमें गुणगुणि-सत्यानन्दी - दीपिका * इस अधिकरणमें आत्मा के अणुत्व और विभुत्व प्रतिपादक श्रुतियोंका परस्पर विरोध होने से उनमें अप्रामाण्य प्राप्त होनेपर पूर्वपक्षीद्वारा जीव अणु है और ईश्वर विभु हैं, इस प्रकार दोनों का भेदकर श्रुतियोंका अविरोध दिखलाया गया है । सिद्धान्ती - जीव अणु नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ० ' ' ' अनेन जीवेनात्मना ' इत्यादि श्रुतियोंसे शरीर आदि कार्यमें जीवरूपसे परब्रह्मका ही प्रवेश प्रतिपादित है, और ' तत्त्वमसि ' इत्यादि श्रुतियोंसे जीवकी ब्रह्मरूपता उपदिष्ट है, अतः ब्रह्मका परिमाण ही जीवका परिमाण है इसमें ' स वा एष महानज आत्मा ' ' नित्यः सर्वगतः स्थाणुः ' ( म ० गी ० २२४ ) इत्यादि श्रुति और स्मृति भी प्रमाण हैं । * अब तक तो चैतन्यको आत्माका गुण मानकर उसीकी व्याप्तिसे गुणी आत्माका अणुत्व निराकृत किया गया है । आगे चैतन्य जीवका स्वरूप है गुण नहीं है, इसे ' चैतन्यमेव ' आदिसे कहते
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अधि ० १३ सू ० २ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५० ९ विभाग विद्यत इति । शरीरपरिमाणत्वं च प्रत्याख्यातम् । परिशेषाद्विभुर्जीवः । कथं तर्ह्यणुत्वादिव्यपदेश इत्यत आह - ' तद्गुणसारत्वात्तु तद्द्व्यपदेशः ' इति । तस्या बुद्धे-गुणास्तद्गुणा इच्छा द्वेषः सुखं दुःखमित्येवमादयस्तद्गुणाः सारः प्रधानं यस्यात्मनः संसारित्वे संभवति स तद्गुणसारस्तस्य भावस्तद्गुणसारत्वम् । नहि बुद्धेर्गुणैर्विना केव-लस्यात्मनः संसारित्वमस्ति । बुद्धयुपाधिधर्माध्यासनिमित्तं हि कर्तृत्वभोक्तृत्वादिलक्षणं संसारित्वमकर्तुरभोक्तुश्चासंसारिणो नित्यमुक्तस्य सत आत्मनः । तस्मात्तद्गुणसारत्वा-बुद्धिपरिमाणेनास्य परिमाणव्यपदेशः, तदुत्क्रान्त्यादिभिश्चास्योत्क्रान्त्यादिव्यपदेशो न स्वतः । * तथा च- ' बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चान-न्त्याय कल्पते ॥ ’ ( श्वे ० ५।९ ) इत्यणुत्वं जीवस्योक्त्वा तस्यैव पुनरानन्त्यमाह । तच्चैवमेव समञ्जसं स्याद्यद्यौपचारिकमणुत्वं जीवस्य भवेत्पारमार्थिकं चानन्त्यम् । न ह्युभयं मुख्य-मवकल्पेत । न चानन्त्यमौपचारिकमिति शक्यं विज्ञातुम्, सर्वोपनिषत्सु ब्रह्मात्मभावस्य प्रतिपिपादयिषितत्वात् । तथेतरस्मिन्नप्युन्माने ' बुद्धगुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यवरोऽपि दृष्टः ' ( श्वे ० ५।८ ) इति च बुद्धिगुणसंबन्धेनैवाराग्रमात्रतां शास्ति न स्वेनेवात्मना । ' एषो-ऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः ' ( मुण्ड ० ३ | १ | ९ ) इत्यत्रापि न जीवस्याणुपरिमाणत्वं शिष्यते, विभाग नहीं है । जीवका शरीर परिमाण तो पूर्व ही खण्डित किया जा चुका है । परिशेषसे जीव विभु है । तो उसमें अणुत्व आदि व्यपदेश किस प्रकार है? इसपर कहते हैं - ' तद्गुणसारत्वात्तु तद्वय-पदेशः ' उसके बुद्धिके गुण वे तद्गुण - इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख इत्यादि, तद्गुण सार प्रधान जिस आत्माके संसारित्वमें संभव है वह तद्गुणसार, उसका भाव तद्गुणसारत्व है, क्योंकि बुद्धिके गुणोंके बिना केवल आत्मामें संसारित्व नहीं है । अकर्ता, अभोक्ता, असंसारी, नित्य मुक्त होते हुए आत्माका कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि रूप संसारित्व बुद्धि उपाधिके धर्मोके अध्यासके कारण ही है । इसलिए तद्गुणसारत्व होनेसे बुद्धिके परिमाणसे इसका परिमाणव्यपदेश है और बुद्धिकी उत्क्रान्ति आदिसे जीवकी उत्क्रान्ति आदिका व्यपदेश है । उसके परिमाण और उत्क्रमण आदि स्वाभाविक नहीं हैं । और इसी प्रकार ' बालाग्रशतभागस्य ० ' ( सो सागों में विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है उसके समान जीवको जानना चाहिए, किन्तु वह स्वतः अनन्तके लिए समर्थ है ) इसप्रकार जीवको अणु कहकर पुनः उसको ही श्रुति अनन्त कहती है । वह तभी संगत हो सकता है जब जीवमें अणुत्व गौण हो और आनन्त्य पारमार्थिक हो । दोनों मुख्य नहीं हो सकते, और आनन्त्य गौण है, ऐसा जाननेको समर्थ नहीं है । सभी उपनिषदों में ब्रह्मात्मभाव प्रतिपादन करना अभिलषित है । उसी प्रकार ' बुद्धेर्गुणेन ० ' ( बुद्धि गुण निमित्तक आत्मामें अध्यस्त गुणसे- अध्यस्त आत्मगुणसे जीव भी आरके नोकके समान आकारवाला देखा गया है ) इस तरह अन्य उन्मानमें बुद्धिगुणके सम्बन्धसे ही आराग्र-परिमाणका उपदेश करता है अपने स्वरूपसे नहीं । ' एषोऽणुरात्मा ० ' ( यह आत्मा अणु है; विशुद्ध ज्ञानद्वारा जानने योग्य है ) इसमें भी जीवके अणुपरिमाणका उपदेश नहीं है, क्योंकि परमात्मा ही चक्षु सत्यानन्दी -दीपिका हैं । आत्मा में अणुत्वका व्यपदेश औपाधिक है । जैसे ' अन्तरा विज्ञानमनसी ' ( ब्र ० सू ० २।३।१५ ) ( विज्ञान और मनके बीच में ) ' हृदि हि ' ( ब्र ० सू ० २ | ३ | २४ ) ( हृदय में ) इस प्रकार बुद्धिके गुणों का अध्यास होनेसे आत्मामें अणुत्व आदि व्यवहार होता है, स्वतः नहीं । * किश्व जैसे पत्थरसे बनी मूर्ति पत्थर ही है, तो भी ' पत्थर की मूर्ति ' ऐसा केवल काल्पनिक
भेद व्यवहार होता है । वैसे प्रकरण में भी समझना चाहिए ॥ २ ९ ॥
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५१० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ परस्यैवात्मनश्चक्षुराद्यनवग्राह्यत्वेन ज्ञानप्रसाद्गम्यत्वेन च प्रकृतत्वात् । जीवस्यापि च मुख्याणुपरिमाणत्वानुपपत्तेः । तस्मादुदुर्ज्ञानत्वाभिप्रायमिदमणुत्ववचनमुपाध्यभिप्रायं वा द्र्ष्टव्यम् । तथा ‘ प्रज्ञया शरीरं समारुह्य ' ( कौषी ० ३।९ ) इत्येवं जातीयकेष्वपि भेदोपदेशेषु बुद्धचैवोपाधिभूतया जीवः शरीरं समारुह्येत्येवं योजयितव्यम् । व्यपदेशमात्रं वा शिला-पुत्रकस्य शरीरमित्यादिवत् । नह्यत्र गुणगुणिविभागोऽपि विद्यत इत्युक्तम्, हृदयायत-नत्ववचनमपि बुद्धेरेव तदायतनत्वात् । तथोत्क्रान्त्यादीनामप्युपाध्यायत्ततां दर्शयति-' कस्मिन्न्वहमुत्कान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ' ( प्रश्न ० ६ । ३ ) ‘ स प्राणमसृजत ' ( प्र ० ६ । ४ ) इति । उत्क्रान्त्यभावे हि गत्यागत्योरप्यभावो विज्ञायते । न ह्यनपसृप्तस्य देहाद्गत्यागतो स्याताम् । एवमुपाधिगुणसारत्वाज्जीवस्याणुत्वा दिव्य-पदेशः, प्राज्ञवत् । यथा प्राज्ञस्य परमात्मनः सगुणेषूपासनेषूपाधिगुणसारत्वादणीयस्त्वा-दिव्यपदेशः -- ' अणीयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा ' ( छा ०३ | १४ | ३ ) ' मनोमयः प्राणशरीरः सर्वगन्धः सर्वरसः
सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' ( छा ० ३ । १४ । २ ) इत्येवंप्रकारस्तद्वत् ॥ २ ९ ॥
स्यादेतत् - यदि बुद्धिगुणसारत्वादात्मनः संसारित्वं कल्प्येत, ततो बुद्धयात्म-नोर्भिन्नयोः संयोगावसानमवश्यंभावीत्यतो बुद्धिवियोगे सत्यात्मनो विभक्तस्यानालक्ष्य-त्वादसत्त्वमसंसारित्वं वा प्रसज्येतेति । अत उत्तरं पठति-यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ ३० ॥
पदच्छेद - यावदात्ममावित्वात् च, न दोषः, तद्दर्शनात् । सूत्रार्थ - बुद्धिका संयोग ( ' यावदात्म भावित्वात् ) जबतक आत्मज्ञानसे संसारकी निवृत्ति नहीं होती तबतक रहता है । ( न दोष: ) अतः उक्त दोष नहीं है ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि देहका वियोग होनेपर भी बुद्धिका संयोग ' समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ' इत्यादि श्रुतिमें देखा जाता है । नेयमनन्तरनिर्दिष्टदोषप्राप्तिराशङ्कनीया । कस्मात्? यावदात्मभावित्वादबुद्धिसंयो आदिसे अग्राह्य और ज्ञान प्रसादगम्य होनेसे प्रकृत है, जीवका मी अणुपरिमाण मुख्य नहीं हो सकता । जीव अणुत्व वचन दुर्विज्ञेयत्व अभिप्रायसे अथवा उपाधिके अभिप्रायसे समझना चाहिए । इस प्रकार ' प्रज्ञया ० ' ( प्रज्ञाद्वारा शरीरपर समारुढ होकर सुख दुःखका अनुभव करता है ) इस प्रकारके भेदो-पदेशोंमें मी उपाधिरूप बुद्धिसे ही जीव शरीरपर समारोहण कर, ऐसी योजना करनी चाहिए । अथवा ' शिलापुत्रका शरीर ' इत्यादिके समान यह व्यपदेशमात्र है । यहाँ गुण गुणी विभाग भी नहीं हैं, ऐसा कहा जा चुका है I । ' जीवका स्थान हृदय है, यह वचन भी बुद्धिके अभिप्रायसे है, क्योंकि बुद्धिका ही स्थान हृदय है । उसी प्रकार ' कस्मिन्न्वहमु ० ' ( किसके उत्कान्त होनेपर मैं उत्कान्त होऊँगा और किसके प्रतिष्ठित होने पर प्रतिष्ठित होऊँगा ) ' स प्राणमसृजत ' ( उसने प्राण उत्पन्न किया ) इसप्रकार उत्क्रान्ति आदि उपाधि के अधीन हैं, ऐसा श्रुति दिखलाती है । उत्क्रान्तिके अभाव होनेपर गति और आगतिका भी अभाव जाना जाता है । देहसे न निकले हुए की गति और आगति नहीं होती । इसप्रकार उपाधि गुणकी प्रधानतासे प्राज्ञके समान जीवमें अणुत्व आदि व्यपदेश है । जैसे ' अणीयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा ' ( हृदय कमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे मी सूक्ष्म है ) ' मनोमय: ० ' ( वह ब्रह्म मनोमय, प्राणशरीर, सर्वगन्ध, सर्वरस, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है ) इसप्रकार सगुण उपासनाओंमें उपाधिके गुणोंकी प्रधानतासे प्राज्ञ- परमात्मामें अणुत्व मादिका व्यपदेश है, वैसे यहां भी समझना चाहिए || २ ९ ॥ ऐसा हो, यदि बुद्धिके गुणकी प्रधानतासे आत्मामें संसारित्वको कल्पना करो, तो परस्पर भिन्न बुद्धि और आत्मा संयोगका अवसान ( अन्त ) अवश्यंभावी है, इससे बुद्धिका वियोग होनेपर विभक्त बात्मा के अनालक्ष्य होनेसे उसका असत्त्व अथवा असंसारित्व प्रसक्तं होगा? इसपर उत्तर कहते हैं-
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अधि ० १३ सू ० ३० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५११ गस्य । यावदयमात्मा संसारी भवति, यावदस्य सम्यग्दर्शनेन संसारित्वं न निवर्तते, ताव-दस्य बुद्धया संयोगो न शाम्यति । यावदेव चायं बुद्धय पाधिसंबन्धस्तावज्जीवस्य जीवत्वं संसारित्वं च । परमार्थतस्तु न जीवो नाम बुद्धय पाधिसंबन्धपरिकल्वितस्वरू-पव्यतिरेकेणास्ति । नहि नित्यमुक्तस्वरूपात्सर्वज्ञादीश्वरादन्यश्चेतनो धातुर्द्वितीयो वेदान्तार्थनिरूपणायामुपलभ्यते । ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता ' ( बृह ० ०३/७/२३ ), ' नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ श्रोतृ मन्तृ विज्ञातृ ' ( छा ० ६८७ ) ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।११६ ), ' अहं ब्रह्मास्मि ' ( बृह ०१।४।७ ) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः । कथं पुनरवगम्यते यावदात्मभावी बुद्धि-संयोग इति? तद्दर्शनादित्याह । तथा हि शास्त्रं दर्शयति - ' योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्य-न्तज्योंतिः पुरुषः स समानः सन्नुमौ । लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव ' ( बृह ० । ३।७ ) इत्यादि । तत्र विज्ञानमय इति बुद्धिमय इत्येतदुक्तं भवति, प्रदेशान्तरे ' विज्ञानमयो मनो-मयः प्राणमय श्रक्षुर्मयः श्रोत्रमयः ' इति विज्ञानमयस्य मन आदिभिः सह पाठात् । बुद्धिमयत्वं च तद्गुणसारत्वमेवाभिप्रेयते । यथा लोके स्त्रीमयो देवदत्त इति स्त्रीरागादिप्रधानोऽ भिधीयते, तद्वत् । ' स समानः सन्न मौ लोकावनुसंचरति ' इति च लोकान्तरगमनेऽप्यवियोगं बुद्धा दर्शयति । केन समानः? तयैव बुद्धय ेति गम्यते, संनिधानात् । तच्च दर्शयति-' ध्यायतीव लेलायतीव ' ( बृह ० ५ | ३ | ८ ) इति । एतदुक्तं भवति - नायं स्वतो ध्यायति, नापि चलति, ध्यान्त्यां बुद्धौ ध्यायतीव, चलन्त्यां बुद्धौ चलतीवेति । अपि च मिथ्या-ज्ञानपुरःसरोऽयमात्मनो बुद्धय ुपाधिसंबन्धः । नच मिथ्याज्ञानस्य सम्यग्ज्ञा-पूर्व में कही हुई यह दोष प्राप्तिकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, किससे? इससे कि बुद्धिका संयोग यावदात्मभावी है । जबतक यह आत्मा संसारी है, जबतक इसका तत्त्वज्ञानसे संसारित्व निवृत्त नहीं होता, तबतक इसका बुद्धिके साथ सम्बन्ध निवृत्त नहीं होता । जबतक यह बुद्धिरूप उपाधिका सम्बन्ध है तब तक जीवमें जीवत्व और संसारित्व हैं । वास्तवमें तो बुद्धि उपाधिके सम्बन्धसे परिकल्पित स्वरूपसे व्यतिरिक्त जीव नाम है ही नहीं, क्योंकि ' नान्योऽतो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है ) ' नान्यदतो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है ) ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे नित्य मुक्त स्वरूप सर्वज्ञ ईश्वरसे अन्य द्वितीय चेतन तत्त्व वेदान्त अर्थका निरूपण करनेपर उपलब्ध नहीं होता । परन्तु बुद्धिका संयोग यावदात्मभावी है, यह कैसे जाना जाता है? इसके उत्तरमें ' वह श्रुतिमें प्रतिपादित है ' ऐसा सूत्रकारने कहा है । जैसे कि ' योऽयं विज्ञानमयः ० ' ( जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है बुद्धि में ज्योतिःस्वरूप पुरुष, वह समान - बुद्धि के सहय हुआ इस लोक और परलोक में संचार करता है, [ बुद्धि वृत्तिके अनुसार ] मानो ध्यान करता है । [ प्राणवृत्ति होकर ] मानों अत्यर्थं चेष्टा करता है ) इत्यादि शास्त्र दिखलाता है । इसमें ' विज्ञानमयः ' इस पदसे ' बुद्धिमय ' यह उक्त होता है, क्योंकि अन्य स्थलमें ' विज्ञानमयो ० ' ( विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षु मंय, श्रोत्रमय ) इस प्रकार विज्ञानमयका मन आदिके साथ पाठ है । बुद्धिमयत्वसे तद्गुणसारत्व ही अभिप्रेत है । जैसे लोकमें स्त्री में राग आदिकी प्रधानतासे ' देवदत्त स्त्रीमय है ' कहा जाता है | ‘ स समान: ० ' ( वह बुद्धि समान होकर दोनों लोकोंमें संचरण करता है ) यह श्रुति लोकान्तर गमन करनेमें आत्माका बुद्धि के साथ अवियोग प्रतिपादित करती है । किसके समान? सान्निध्यसे उस बुद्धिके समान ऐसा ज्ञात होता है । उस ( समानत्व ) को ' ध्यायतीव लेलायतीव ' ( ध्यान करता - सा प्रतीत होता है, चलता - सा प्रतीत होता है ) यह श्रुति दिखलाती है । तात्पर्य यह है कि यह आत्मा स्वतः न ध्यान करता है और न चलता ही है । परन्तु बुद्धिके ध्यानस्थ होनेपर वह ध्यान करता - सा प्रतीत होता है और बुद्धिके चलने पर वह चलता - सा ज्ञात होता है । आत्माका यह बुद्धिरूप उपाधिके साथ सम्बन्ध मिथ्याज्ञान पुरः सर है । मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति यथार्थज्ञानके विना नहीं होतीं । इसलिए जबतक ï
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५१२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ९ पा ० ३ नादन्यत्र निवृत्तिरस्तीत्यतो यावद्ब्रह्मात्मतानवबोधस्तावदयं बुद्धयपाधिसंबन्धो न शाम्यति । दर्शयति च ' वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाऽ-तिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ' ( व ेता ० ३।८ ) इति ॥ ३० ॥
ननु सुषुप्तप्रलययोर्न शक्यते बुद्धिसम्बन्ध आत्मनोऽभ्युपगन्तुम् । ' सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति ' ( छा ० ६ | ८ | १ ) इति वचनात् । कृत्स्नविकारप्रलया-भ्युपगमाच्च । तत्कथं यावदात्मभावित्वं बुद्धिसंबन्धस्येति? अत्रोच्यते-पुंस्त्वादिवच्त्रस्य सप्तोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ ३१ । पदच्छेद- पुंस्त्वादिवत्, तु, अस्य, सतः, अभिव्यक्तियोगात् । सूत्रार्थ - ( पुंस्त्वादिवत् ) जैसे बाल्यावस्था में विद्यमान ही पुंस्त्व आदि यौवन में विकसित होते हैं, वैस ( सत: ) सुषुप्ति अवस्था में सूक्ष्मरूपसे विद्यमान ( अस्य ) बुद्धि संयोग जाग्रत् आदि अवस्था में ( अभिव्यक्तियोगात् ) अभिव्यक्त होता है । इसलिए बुद्धि सम्बन्ध यावदात्ममावी है । * यथा लोके पुंस्त्वादीनि बीजात्मना विद्यमानान्येव वाल्यादिष्वनुपलभ्यमाना-न्यविद्यमानवदभिप्रेयमाणानि यौवनादिष्याविर्भवन्ति नाविद्यमानान्युत्पद्यन्ते षण्डादी-नामपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् - एवमयमपि बुद्धिसंबन्धः शक्त्यात्मना विद्यमान एव सुषुप्त-प्रलययोः पुनः प्रबोधप्रसवयोराविर्भवति । एवं ह्येतद्युज्यते, न ह्याकस्मिकी कस्यचिदु-त्पत्तिः संभवति, अतिप्रसङ्गात् । दर्शयति च सुषुप्तादुत्थानमविद्यात्म कबीज सद्भावकारि-तम् - ' सति संपद्य न विदुः संति संपद्यामह इति ', ' त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा ' ( छा ० ६।९ १३ ) इत्या-दिना । तस्मात्सिद्धमेतद्यावदात्मभावी बुद्ध्याद्युपाधिसंबन्ध इति ॥ ३१ ॥
ब्रह्मात्माका अज्ञान है तबतक यह बुद्धिरूप उपाधि सम्बन्ध निवृत्त नहीं होता । ऐसा ' वेदाहमेतं. ' ( मैं इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ । उसे ही जानकर मृत्युको पार करता है इसके सिवा परमपद प्राप्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है ) यह श्रुति भी दिखलाती है ॥ ३० ॥
सुषुप्ति और प्रलय में आत्माका बुद्धिके साथ सम्बन्ध स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! सुषुवि में यह सत् ( परब्रह्म ) के साथ सम्पन्न हो जाता है यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) ऐसा श्रुतिवचन है । और सम्पूर्ण विकारका प्रलय स्वीकार किया गया है, तो बुद्धि सम्बन्ध यावदात्मभावी कैसे है? इसपर कहते हैं— जैसे लोकमें पुंस्त्व आदि बीजरूपसे विद्यमान ही बाल्य आदिमें अनुपलब्ध एवं अविद्यमान के समान अभिप्रेत होनेपर भी यौवन आदिमें आविर्भूत होते हैं, अविद्यमान उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि षण्ड ( नपुंसक ) आदिमें भी उसकी उत्पत्तिका प्रसंग हो जायगा, वैसे यह बुद्धि सम्बन्ध भी सुषुप्ति और प्रलय में शक्तिरूपसे विद्यमान ही पुनः प्रबोध ( जाग्रत् ) और प्रसव ( सृष्टिकाल ) में आविभूत होता है, क्योंकि यह ऐसा ही युक्त - संगत है । किसीकी आकस्मिक ( विना कारण ) उत्पत्ति नहीं हो सकती, कारण कि अतिप्रसंग हो जायगा । और “ सति संपद्य ० ' ( सुषुप्ति में यह सम्पूर्ण प्रजा सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत् ( ब्रह्म ) को प्राप्त हो गयी ) इससे ' त इह ० ’ ( वे इस लोकमें वाघ या सिंह जो सुषुप्ति पूर्वं होते हैं, वे ही पुनः होते हैं ) इत्यादिते श्रुति अविद्यत्मक बीजके सद्भावसे किया हुआ सुषुप्तिसे उत्थान दिखलाती है । इससे यह सिद्ध हुआ कि बुद्धि आदिरूप उपाधिका सम्बन्ध यावदात्मभावी है ॥ ३१ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * यदि बुद्धिका सम्बन्ध यावदात्ममावी मानें तो सुषुप्ति में सम्बन्ध के होनेपर ब्रह्मसंपत्ति नहीं होगी और प्रलय में होनेपर प्रलय न होगा । परन्तु स्थूल और सूक्ष्मरूपसे सम्बन्ध विद्यमान है ॥ ३१ ॥
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अधि ० १३ सू ० ३२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५१३ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ॥ ३२ ॥
पदच्छेद – नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः, अन्यतरनियमः, वा, अन्यथा । सूत्रार्थ - अन्तःकरणका अस्तित्व अवश्य मानना चाहिए | ( अन्यथा ) यदि उसे न मानें तो ( नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः ) आत्मा, इन्द्रिय आदि साधन विद्यमान होने से नित्योपलब्धिका प्रसङ्ग होगा । यदि साधन होते हुए भी अनुपलब्धि मानें तो नित्यानुपलब्धि प्रसङ्ग आ जायगा । ( वा ) अथवा ( अन्यतरनियम: ) आत्मा वा इन्द्रियका प्रतिबन्ध मानना होगा, तो वह मी ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा अविक्रिय है और इन्द्रियोंकी भी अकस्मात् शक्तिका प्रतिबन्ध नहीं हो सकता है, इसलिए उपलब्धि सामान्य कारण अन्तःकरणको अवश्य मानना चाहिए । * तच्चात्मन उपाधिभूतमन्तःकरणं मनोबुद्धिर्विज्ञानं चित्तमिति चानेकधा तत्रतत्रा-भिलप्यते । कचिच्च वृत्तिविभागेन संशयादिवृत्तिकं मन इत्युच्यते, निश्चयादिवृत्तिकं बुद्धिरिति । तच्चैवंभूतमन्तःकरणमवश्यमस्तीत्यभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा ह्यनभ्युपगम्य-माने तस्मिन्नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः स्यात् । आत्मेन्द्रियविषयाणामुपलब्धिसाधनानां संनिधाने सति नित्यमेवोपलब्धिः प्रसज्येत । अथ सत्यपि हेतुसमवधाने फलाभावस्ततो नित्यमेवानुपलब्धिः प्रसज्येत । न चैवं दृश्यते । अथवाऽन्यतरस्यात्मन इन्द्रियस्य बा शक्तिप्रतिबन्धोऽभ्युपगन्तव्यः । न चात्मनः शक्तिप्रतिबन्धः संभवति, अविक्रियत्वात् । नापीन्द्रियस्य, नहि तस्य पूर्वोत्तरयोः क्षणयोरप्रतिबद्धशक्तिकस्य सतोऽकस्माच्छक्तिः प्रतिबध्येत । तस्माद्यस्यावधानानवधन्नाभ्यामुपलब्ध्यनुपलब्धी भवतस्तन्मनः । तथा न्य श्रुतिः – ' अन्यत्र मना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम् ' ( वृ ० १ | ५ | ३ ) इति, ‘ मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति ' ( बृह ० १।५।३ ) इति । कामादयश्चास्य वृत्तय इति दर्शयति आत्माका उपाधिभूत वह अन्तःकरण भिन्न भिन्न स्थलों पर मन, बुद्धि, विज्ञान और चित्त इस तरह अनेक प्रकारसे कहा जाता है । कहीं वृत्तिविभागसे संशय आदि वृत्तिवालेको मन कहते हैं, और निश्चय आदि वृत्तिवालेको बुद्धि कहते हैं । इसप्रकारका वह अन्तःकरण अवश्य है, यह स्वीकार करना चाहिए । अन्यथा - उसके स्वीकार न किये जानेपर नित्योपलब्धि अथवा नित्य अनुपलब्धिका प्रसङ्ग होगा । उपलब्धिके साधन भूत आत्मा, इन्द्रिय और विषयके सन्निधान होनेपर नित्य ही उप-लब्धि प्रसक्त होगी । यदि हेतुके संनिधान होनेपर भी फलका अभाव है, तो नित्य ही अनुपलब्धि प्रसक्त होगी । परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता । अथवा आत्मा वा इन्द्रिय दोनोंमें से एककी शक्तिका प्रतिबन्ध स्वीकार करना चाहिए । आत्माकी शक्तिका प्रतिबन्ध तो संभव नहीं है, क्योंकि वह अवि-क्रिय है । इन्द्रियका भी शक्ति प्रतिबन्ध संभव नहीं है, क्योंकि पूर्व और उत्तर क्षणमें अप्रतिबद्ध शक्ति वालेकी शक्ति अकस्मात् प्रतिबद्ध नहीं हो सकती, इसलिए जिसकी सावधानी और असावधानीसे उपलब्धि और अनुपलब्धि होती हैं वह मन है । तथा ' अन्यत्र मना ० ' ( अन्यत्र मन था, अतः मैंने नहीं देखा, अन्यत्र मन था, इससे नहीं सुना, इसप्रकार मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है ) यह सत्यानन्दी - दीपिका * आत्माकी बुद्धिरूप उपाधिके सद्भावमें अनेक प्रमाण हैं - ' चेतसा वेदितव्यः ' ( शुद्ध चित्तसे जानना चाहिए ) ' चित्तं च चेतयितव्यं च ' ( प्र ० ४।८ ) ( चित्त और चित्तका विषय ) ' मनसे-वानुद्रष्टव्यम् ' ( मनसे ही देखना चाहिए ) ' यस्तु विज्ञानवान्मवति ' ( कठ ० १ | ३ | ६ ) ( परन्तु जो बुद्धिरूप सारथि युक्त होता है ) ' मनसस्तु परा बुद्धि: ' ( कठ ० १ | ३ | १० ) ( मनसे बुद्धि पर है ) इत्यादि श्रुतियोंसे अन्तःकरण चित्त, मन, विज्ञान, बुद्धि अनेक नामोंसे प्रतिपादित है । इन्द्रिय और विषय आदिके होनेपर भी कदाचित् विषयोपलब्धि होती है कदाचित् नहीं होती इसका कारण केक्ल
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५१४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ ‘ कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिहींर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव ' ( बृह ० ० | ५ | ३ ) इति । तस्माद्युक्तमेतत् ' तद्गुणसारत्वात्तद्व्यपदेशः ' इति ॥ ३२ ॥
( १४ कर्त्रधिकरणम् । सू ० ३३-३९ ) कर्ता शास्त्रार्थवत्वात् ॥ ३३ ॥
पदच्छेद- कर्ता, शास्त्रार्थवत्त्वात् । सूत्रार्थ -- ( कर्ता ) आत्मा ही कर्ता है बुद्धि नहीं, ( शास्त्रार्थवत्त्वात् ) विधि आदि शास्त्र सार्थक होता है । * तद्गुणसारत्वाधिकारेणैवापरोऽपि जीवधर्मः प्रपञ्च्यते । स्यात् । कस्मात्? शास्त्रार्थवत्त्वात् । एवं ' यजेत ', ' जुहुयात् ', ' दद्यात् ' क्योंकि ऐसा माननेसे कर्ता चायं जीवः इत्येवंविधं विधि-शास्त्रमर्थवद्भवति । अन्यथा तदनर्थकं स्यात् । तद्धि कर्तुः सतः कर्तव्यविशेषमुपदिश-ति । न चाऽसति कर्तृत्वे तदुपपद्येत । तथेदमपि शास्त्रमर्थवद्भवति ' एष हि द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष: ' ( प्र ० ९ / ५ ) इति ॥ ३३ ॥
विहारोपदेशात् ॥ ३४ ॥
सूत्रार्थ - जीवकर्ता है, क्योंकि उसके विषयमें विहारका उपदेश है । इतश्च जीवस्य कर्तृत्वम्, यज्जीवप्रक्रियायां संध्ये स्थाने विहारमुपदिशति - ' स ईयतेऽमृतो यत्र कामम् ' ( बृह ० ४ | ३ | १२ ) । इति, ' स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ' ( बृह ० २।१।१८ ) इति च ॥ ३४ ॥
श्रुति है | ' कामः संकल्पः ० ' ( काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, प्रज्ञा, भय यह सब मन ही है ) यह श्रुति कामादि मनकी वृत्तियाँ हैं, ऐसा दिखलाती है । इससे ' तद्गुणसार-वात्तद्वयपदेशः ' यह युक्त है | ॥ ३२ ॥
तद्गुणसारत्वके प्रकरणसे ही जीवके अन्य धर्मका मी विस्तारसे विचार किया जाता है । यह जीव कर्ता होना चाहिए, क्योंकि इससे शास्त्र अर्थवान् ( सार्थक ) होता है । इसप्रकार ' यजेत ' ( याग करे ) ' जुहुयात् ' ( होम करे ) ' दद्याद् ' ( दान करे ) इसप्रकारका विधि शास्त्र प्रयोजनवाला होता है, अन्यथा वह निरर्थक होगा, क्योंकि वह शास्त्र कर्ता के होनेपर कर्तव्य विशेषका उपदेश करता है | कर्ताके न होनेपर वह उपपन्न नहीं होगा । इसप्रकार ' एष हि द्रष्टा ० ' ( यही आत्मा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता और विज्ञानरूप है ) यह शास्त्र भी सार्थक होता है ॥ ३३ ॥
इससे भी जीव कर्ता है, क्योंकि ' स ईयते ० ' ( वह अकेला विचरनेवाला अमृत जीव जहाँ इच्छा होती है वहाँ चला जाता है ) और ' स्वे शरीरे ० ' ( उसी प्रकार प्राणोंको ग्रहण कर वह अपने शरीरमें यथेष्ट विचरता है ) इसप्रकार श्रुति जीवकी प्रक्रिया में स्वप्नावस्था में विहारका उपदेश करती है ॥ ३४ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका मन ही है, अतएव यह कथन युक्त ही है कि बुद्धिके गुणोंकी प्रधानतासे आत्मामें अणुत्व, संसारित्व आदि व्यवहार होते हैं स्वतः नहीं ॥ ३२ ॥
* गत अधिकरणमें आत्मा में अणुत्वको अध्यस्त कहकर वास्तविक महत्त्वकी स्थापना की गई है । अब इस प्रसंग में आत्माके कर्तृत्व धर्मका विचार किया जाता है कि यह नित्य चिद्रूप महान् आत्मा कर्ता है कि नहीं? ' असङ्गो ह्ययं पुरुष: ' इस असङ्गत्व प्रतिपादक श्रुति और ' यजेत ' इस विधिं श्रुतिका परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है, परन्तु सिद्धान्त में ' तद्गुणसारत्वसे ' आत्मामें कर्तृत्व औपाधिक है । उससे विधि - निषेध शास्त्र, बन्ध - मोक्ष शास्त्र सार्थक होता है और ' शास्त्रफलं प्रयोक्तरि ' ( विधि - याग
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अधि ० १४ सु ० ३५-३६ ] भाषानुवाद - लत्यानन्दी - दीपिकासहित ५१५ उपादानात् || ३५ || सूत्रार्थ -- जीव कर्ता है, क्योंकि श्रुतिमें इसके द्वारा इन्द्रियोंका ग्रहण कहा गया है । इतश्चास्य कर्तृत्वम्, यज्जीवप्रक्रियायामेव करणानामुपादानं संकीर्तयति - ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय ' ( बृह ० २१।१।१७ ) इति, ' प्राणान्गृहीत्वा ' ( बृह ० २।१।१८ ) इति च ॥ ३५ ॥
व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निदेशविपर्ययः ॥ ३६ ॥
पदच्छेद -- व्यपदेशात्, च, क्रियायाम्, न चेत्, निर्देशविपर्ययः । सूत्रार्थ - ( च ) और ( व्यपदेशात् ) ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' यहाँ विज्ञान शब्द वाच्य जीव ( क्रियायाम् ) लौकिक आदि क्रियाका कर्ता कहा गया है, ( न चेत् ) यदि विज्ञान शब्द जीव परक न मानकर बुद्धि परक मानें तो ( निर्देशविपर्ययः ) निर्देश विपर्यय होगा अर्थात् बुद्धिके करण होनेसे तद्वाचक विज्ञान पदमें प्रथमापेक्षा ' विज्ञानेन ' इस प्रकार तृतीया होगी । इतश्च जीवस्य कर्तृत्वम्, यदस्य लौकिकीषु वैदिकीषु च क्रियासु कर्तृत्वं व्यप-शति शास्त्रम्- ' विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च ' ( तै ० २।५ | १ ) इति । ननु विज्ञानशब्दो बुद्धौ समधिगतः, कथमनेन जीवस्य कर्तृत्वं सूच्यत इति? नेत्युच्यते । जीवस्यैवैष निर्देशो न बुद्धेः । न चेजीवस्य स्यान्निर्देशविपर्ययः स्यात्, विज्ञानेनेत्येवं निरदेक्ष्यत् । तथा ह्यन्यत्र बुद्धिविवक्षायां विज्ञानशब्दस्य करणविभक्तिनिर्देशो दृश्यते ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञान-मादाय ' ( बृह ० २।१।१७ ) इति । इह तु ' विज्ञानं यज्ञ ं तनुते ' ( तै ० २/५1१ ) इति कर्तृसामाना-धिकरण्यनिर्देशादबुद्धिव्यतिरिक्तस्यैवात्मनः कर्तृत्वं सूच्यत इत्यदोषः ॥ ३६ ॥
अत्राह - यदि बुद्धिव्यतिरिक्तो जीवः कर्ता स्यात्स स्वतन्त्रः सन्प्रियं हितं चैवात्मनो नियमेन संपादयेन्न विपरीतम् । विपरीतमपि तु संपादयन्नु पलभ्यते । न च स्वतन्त्रस्यात्मन ईदृशी प्रवृत्तिरनियमेनोपपद्यत इति, अत उत्तरं पठति-इससे मी जीव कर्ता है, क्योंकि ' तदेषां ' ( वह बुद्धि द्वारा इन वाग् आदि इन्द्रियोंकी शक्तिको ग्रहणकर सोता है ) और ' प्राणान्गृहीत्वा ० ' ( उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमें यथेष्ट विचरता है ) इस प्रकार श्रुति जीवके प्रकरण में ही इन्द्रियोंका ग्रहण वर्णन करती है ॥ ३५ ॥
और इससे भी जीव कर्ता है, क्योंकि ' विज्ञानं यज्ञ ं तनुते ० ' ( विज्ञान जीव यज्ञका विस्तार करता है और कर्मोंका भी विस्तार करता है ) इस प्रकार यह श्रुति जीवका लौकिक और वैदिक क्रियाओंमें कर्तृत्व व्यपदेश करती है । परन्तु विज्ञान शब्द तो बुद्धिमें निश्चित है, तो फिर उससे जीव कर्ता है, यह किस प्रकार सूचित किया जाता है? नहीं, ऐसा कहते हैं — यह जीवका ही निर्देश है बुद्धिका नहीं । यदि यह निर्देश जीवका न हो तो निर्देश विपर्यय होगा ' विज्ञानेन ' ( विज्ञानसे ) ऐसा निर्देश होगा । इस प्रकार ' तदेषां ' ( बुद्धि द्वारा इन्द्रियोंकी शक्तिको ग्रहण कर वह सोता है ) इस तरह अन्य श्रुतिमें विज्ञानशब्दसे बुद्धिकी विवक्षा में विज्ञानशब्दका करण विभक्तिसे निर्देश देखा जाता है । किन्तु यहाँ तो ' विज्ञानं यज्ञ ' तनुते ' इस प्रकार कर्ताके सामानाधिकरण्य निर्देश से बुद्धिसे व्यतिरिक्त आत्माका ही कर्तृत्व सूचित होता है, अतः दोष नहीं है ॥ ३६ ॥
इस प्रकार कहते हैं - यदि बुद्धिसे भिन्न जीव कर्ता हो तो वह स्वतन्त्र होता हुआ अपना और हित नियमसे संपादन करेगा विपरीत नहीं, किन्तु विपरीत मी संपादन करता हुआ उपलब्ध होता सत्यानन्दी - दीपिका आदिसे उत्पन्न स्वर्गं व्यादि फल यजमानको प्राप्त होता है । इस जैमिनि न्यायसे भी भोक्ता आत्मा ही कर्ता सिद्ध होता है बुद्धि नहीं । पूर्वपक्ष में श्रुतियों का विरोध है और सिद्धान्तमें उनका अविरोध है ॥३३ ॥
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५१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ उपलब्धिवदनियमः ॥ ३७ ॥
पदच्छेद -- उपलब्धिवत् अनियमः । सूत्रार्थ -- ( उपलब्धिवत् ) जैसे उपलब्धिमें स्वतन्त्र होता हुआ भी इष्ट और अनिष्ट उपलब्ध करता है, वैसे ( अनियम: ) इष्ट और अनिष्टका भी अनियमसे संपादन करता है । * यथाऽयमात्मोपलब्धि प्रति स्वतन्त्रोऽप्यनियमेनेष्टमनिष्टं चोपलभत एवमनि-यमेनैवेष्टमनिष्टं च संपादयिष्यति । उपलब्धावप्यस्वातन्त्र्यं मुपलब्धिहेतूपादानोपलम्भा-दिति चेत् - न, विषयप्रकल्पनामात्र प्रयोजनत्वादुपलब्धिहेतूनाम्, उपलब्धौ त्वनन्या-पेक्षत्वमात्मनश्चैतन्ययोगात् । अपि चार्थक्रियायामपि नात्यन्तमात्मनः स्वातन्त्र्यमस्ति, देशकालनिमित्तविशेषापेक्षत्वात् । न च सहायापेक्षस्य कर्तुः कर्तृत्वं निवर्तते । भवति धोदकाद्यपेक्षस्यापि पक्तुः पक्तुत्वम् । सहकारिवैचित्र्याच्चेष्टानिष्टार्थक्रियायामनिय मेन प्रवृत्तिरात्मनो न विरुध्यते ॥३७ ॥
शक्तिविपर्ययात् ॥ ३८ ॥
सूत्रार्थ - बुद्धिको कर्त्री मानें तो करणशक्तिका विपर्यय होगा । इतश्च विज्ञानव्यतिरिक्तो जीवः कर्ता भवितुमर्हति । यदि पुनर्विज्ञानशब्दवाच्या बुद्धिरेव कर्त्री स्यात्ततः शक्तिविपर्ययः स्यात् । करणशक्ति बुद्धेर्हीयेत कर्तृशक्तिश्वापद्येत । है । स्वतन्त्र आत्माकी अनियमसे ऐसी प्रवृत्ति उपपन्न नहीं होती, मतः उत्तर कहते हैं— जैसे यह आत्मा उपलब्धिके प्रति स्वतन्त्र होता हुआ भी अनियमसे इष्ट और अनिष्ट उपलब्ध करता है, वैसे अनियमसे ही इष्ट और अनिष्टका संपादन करेगा । यदि कहो कि उपलब्धिमें भी आत्मा स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि उपलब्धिके हेतुका उपादान ( ग्रहण ) उपलब्ध है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उपलब्धि हेतुओं का प्रयोजन केवल विषयकी कल्पना मात्र है । उपलब्धिमें तो आत्माको अन्यकी अपेक्षा नहीं है, कारण कि चैतन्यका योग है | और अर्थ - क्रिया में भी आत्माको अत्यन्त स्वतन्त्रता नहीं है, क्योंकि देश - काल और निमित्तविशेषकी अपेक्षा है । सहकारीकी अपेक्षा करनेवाले कर्ताका कर्तृत्व निवृत्त नहीं होता, क्योंकि काष्ठ, जल आदिकी अपेक्षा करनेवाले पाचकमें भी पाककर्तृत्व व्यवहार होता है । सहकारीके वैचित्र्यसे ही इष्ट और अनिष्ट अर्थ क्रियामें नियमके विना आत्माकी प्रवृत्ति विरुद्ध नहीं है ॥ ३७ ॥
इससे भी विज्ञानसे भिन्न जीव कर्ता हो सकता है । पुनः यदि विज्ञान कर्त्री होगी तो उससे शक्तिका विपर्यय होगा - बुद्धिकी करण शक्तिका नाश होगा प्रसक्त होगी । और बुद्धिमें कर्तृशक्तिके होनेपर उसमें ही अहंप्रत्यय विषयता सत्यानन्दी - दीपिका * यदि जीव स्वतन्त्र है तो सवंदा इष्टका संपादन करेगा, अन्यथा वह क्योंकि ‘ स्वतन्त्रः कर्ता ' ( पा ० सू ० १ | ४ | ५४ ) कर्ता स्वतन्त्र होता है । परन्तु शब्द वाच्य बुद्धि ही और उसको कर्तृशक्ति स्वीकार करनी पड़ेगी, कर्ता ही नहीं होगा, जीवके स्वतन्त्र होनेपर मी कारककी विचित्रतासे उसकी प्रवृत्ति अनियमित है । यदि आत्मा विषय सम्बन्धके लिए करणोंकी अपेक्षा करता है तो वह स्वतन्त्र कैसे है? केवल स्वभिन्नकी अपेक्षा न करनेका नाम स्वतन्त्रता प्रसक्त होगी, इससे स्वभिन्न कारकोंका प्रयोजक होकर जो स्वयं कारकोंसे प्रेरित न हो वह स्वतन्त्र है । इस प्रकार स्वतन्त्र होता हुआ भी जीव इष्ट साधनताकी भ्रान्तिसे अनिष्ट साधनका मी अनुष्ठान करता है, अतः अनियमित प्रवृत्ति और स्वतन्त्रता दोनों जीवमें अविरुद्ध हैं ॥ ३७ ॥