श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 551–560
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 551–560
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अधि ० १५ सू ० ३ ९ -४० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित सत्यां च बुद्धेः कर्तृशक्तौ तस्या एवाहंप्रत्ययविषयत्वमभ्युपगन्तव्यम्, अहङ्कारपूर्विकाया एव प्रवृत्तेः सर्वत्र दर्शनात् । अहं गच्छाम्यहमागच्छाम्यहं भुञ्जे ऽहं पिबामीति च । तस्याश्च कर्तृशक्तियुक्तायाः सर्वार्थकारि करणमन्यत्कल्पयितव्यम् । शक्तोऽपि हि सन्कर्ता करणमुपादाय क्रियासु प्रवर्तमानो दृश्यत इति । ततश्च संज्ञामात्रे विवादः स्यात्, न वस्तुभेदः कश्चित्, करणव्यतिरिक्तस्य कर्तृत्वाभ्युपगमात् ॥ ३८ ॥
समाध्यभावाच्च ॥ ३ ९ ॥ पदच्छेद - समाध्यमावात् च । सूत्रार्थ -- और आत्मा के कर्ता न होनेपर वेदान्त में प्रतिपादित ब्रह्मके साक्षात्कारका साधन-भूत समाधिका अभाव हो जायगा, अतः आत्मा कर्ता है । योऽप्ययमौपनिषदात्मप्रतिपत्तिप्रयोजनः समाधिरुपदिष्टो वेदान्तेषु -- ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः ' ( बृह ० २।४।५ ), ‘ ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् ' ( मुण्ड ० २।२।६ ) इत्येवंलक्षणः, सोऽप्यसत्यात्मनः कर्तृत्वे नोपपद्येत । तस्मादप्यस्य कर्तृत्वसिद्धिः ॥ ३ ९ ॥ ( १५ तक्षाधिकरणम् । सू ० ४० ) यथा च तक्षोभवथा ॥ ४० ॥
पदच्छेद - यथा च तक्षः, उभयथा । सूत्रार्थ - ( च ) परन्तु ( यथा ) जैसे लोक में ( तक्षः ) बढई ( उमयथा ) वसुला आदि करणों की अपेक्षा कर्ता होकर दुःखी होता है और उनकी अपेक्षा न कर स्वरूपसे अकर्ता एवं सुखी होता है, वैसे आत्मा भी बुद्धि आदि करणोंकी अपेक्षा कर्ता, संसारी है, उनकी अपेक्षा न कर स्वरूपसे अकर्ता एवं परमानन्दघन ही है । एवं तावच्छास्त्रार्थवत्त्वादिभिर्हेतुभिः कर्तृत्वं शारीरस्य प्रदर्शितम्, तत्पुनः स्वाभाविकं वा स्यादुपाधिनिमित्तं वेति चिन्त्यते । तत्रैतैरेव शास्त्रार्थवत्त्वादिभिर्हेतुभिः स्वाभाविकं कर्तृत्वम्, अपवादहेत्वभावादिति । एवं प्राप्ते ब्रूम -- न स्वाभाविकं कर्तृत्व-मात्मनः संभवति, अनिर्मोक्षप्रसङ्गात् । कर्तृत्वस्वभावत्वे ह्यात्मनो न कर्तृत्वान्निर्मोक्षः क्योंकि ' मैं जाता हूँ ' ' मैं आता हूँ ' ' मैं खाता हूँ ' ' मैं पान करता हूँ ' इस प्रकार अहंकार पूर्वक ही सर्वत्र प्रवृत्ति देखने में आती है । कर्तृशक्ति युक्त उसको सर्वार्थकारी अन्यकरणकी कल्पना करनी चाहिए | कर्ता समर्थ होता हुआ भी करणका ग्रहणकर क्रियाओंमें प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है । उससे केवल नाममें विवाद है वस्तु में कोई भेद नहीं है, क्योंकि करणसे व्यतिरिक्त कर्ता स्वीकार किया गया है || ३८ | ' आत्मा वा अरे ० ' ( हे मैत्रेयी! आत्मा दर्शन करनेके योग्य है, अतः उसका श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए, अन्वेषण करना चाहिए, उसकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए ) और ' ओमित्येवं ० ' ( ओम्, इस प्रकार उस आत्माका ध्यान करो ) इस प्रकारकी जो यह औपनिषद् आत्मप्रतिपत्तिरूप प्रयोजनवाली समाधि - निदिध्यासन वेदान्तवाक्योंमें उप-दिष्ट है वह भी आत्मा कर्ता न होनेपर उपपन्न नहीं होगी । इससे भी आत्मा कर्ता सिद्ध होता है ॥३ ९ ॥ इसप्रकार शास्त्रार्थवत्त्व आदि हेतुओंसे जीवात्माका कर्तृत्व दिखलाया जा चुका है । किन्तु वह स्वाभाविक है अथवा उपाधि निमित्तक है, इसपर विचार किया जाता है । उस विचारमें इन शास्त्रार्थवत्त्व आदि हेतुओंसे स्वाभाविक कर्तृत्व है, क्योंकि उसका अपवादक कोई हेतु नहीं है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - आत्मा में स्वाभाविक कर्तृत्व संभव नहीं है, क्योंकि
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५१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ संभवति, अग्नेरिवौष्ण्यात् । नच कर्तृत्वादनिर्मु कस्यास्ति पुरुषार्थसिद्धिः, कर्तृत्वस्य दुःखरूपत्वात् । ननु स्थितायामपि कर्तृत्वशक्तौ कर्तृत्व कार्यपरिहारात्पुरुषार्थः सेत्स्यति, तत्परिहारश्च निमित्तपरिहारात् । यथाऽग्नेर्दहनशक्तियुक्तस्यापि काष्ठ वियोगाद्दहन-कार्याभावस्तद्वत् । न, निमित्तानामपि शक्तिलक्षणेन संबन्धेन संबद्धानामत्यन्तपरि-हारासंभवात् । ननु मोक्षसाधनविधानान्मोक्षः सेत्स्यति -व, साधनायत्तस्यानित्यत्वात् । अपि च नित्यशुद्धबुद्धमुक्तात्मप्रतिपादनान्मोक्षसिद्धिरभिमंता । तादृगात्मप्रतिपादनं च न स्वाभाविके कर्तृत्वकल्पेत् । तस्मादुपाधिधर्माध्यासेनैवात्मनः कर्तृत्वं न स्वाभावि कम् । तथा च श्रुतिः - ' ध्यायतीव लेलायतीव ' ( बृह ० ४ | ३ | ७ ) इति । ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्या-हुर्मनीषिणः ' ( कठ ० ३ | ४ ) इति चोपाधिसंपृक्तस्यैवात्मनो भोक्तृत्वादिविशेषलाभं दर्शयति । * नहि विवेकिनां परस्मादन्यो जीवो नाम कर्ता भोक्ता वा विद्यते, ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( बृह ० ४।३।२३ ) इत्यादिश्रवणात् । पर एव तर्हि संसारी कर्ता भोक्ता च प्रसज्येत, परस्मादन्यश्चेच्चितिमाञ्जीवः कर्ता बुद्धयादिसंघातव्यतिरिक्तो न स्यात् - न, अविद्या-प्रत्युपस्थापितत्वात्कर्तृत्वभोक्तृत्वयोः । तथा च शास्त्रम् - ' यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति ' ( बृह ० २।४।१४ ) इत्यविद्यावस्थायां कर्तृत्वभोक्तृत्वे दर्शयित्वा विद्यावस्थायां ते एव कर्तृत्वभोक्तृत्वे निवारयति - ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृह ० २ | ४ | १४ ) इति । तथा स्वप्नजागरितयोरात्मन उपाधिसंपर्ककृतं श्रमं श्येनस्येवाकाशे विपरि-पततः श्रावयित्वा तदभावं सुषुप्तौ प्राज्ञे नात्मना संपरिष्वक्तस्य श्रावयति - ' तद्वा अस्यैतदाप्त-ऐसा मानने पर आत्माका मोक्षाभाव प्रसंग होगा । आत्माका कर्तृत्व स्वाभाविक होनेपर जैसे अग्निका औष्ण्यसे गोक्ष नहीं होता, वैसे ही आत्माका कर्तृत्वसे मोक्ष नहीं हो सकता । कर्तृत्वसे मुक्त न हुएके पुरुषार्थंकी सिद्धि नहीं होती, क्योंकि कर्तृत्व दुःखरूप है । परन्तु कर्तृत्व शक्तिकी स्थिति होनेपर भी कर्तृत्व कार्यके परिहारसे पुरुषार्थं सिद्ध हो जायगा और उसका परिहार कारणके परिहारसे हो जायगा । जैसे दाहशक्ति युक्त अग्निमें काष्ठ वियोगसे दहन कार्यका अभाव है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए । परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि शक्तिरूप सम्बन्ध से सम्बद्ध निमित्तोंका अत्यन्त परिहार नहीं हो सकता । परन्तु मोक्ष साधनके विधानसे मोक्ष सिद्ध हो जायगा? नहीं, क्योंकि जो साधनके अधीन है वह अनित्य है, और नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मा के प्रतिपादनसे मोक्ष सिद्धि अभिमत है, उसप्रकार का आत्मप्रतिपादन स्वाभाविक कर्तृत्वमें नहीं हो सकता, इसलिए उपाधि धर्मके अध्याससे ही आत्मामें कर्तृत्व है स्वाभाविक नहीं है । जैसे कि ' ध्यायतीव ० ' ( मानो ध्यान करता है, मानो चलता है ) यह श्रुति है । और ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं ० ' ( शरीर, इन्द्रिय और मनसे युक्तको विवेकी लोग भोक्ता संसारी कहते हैं ) इसप्रकार श्रुति उपाधि सम्बद्ध आत्मामें ही मोक्तृत्व आदि विशेष लाभ दिखलाती है । क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतिसे विवे-कियोंको दृष्टिमें परब्रह्म से अन्य कर्ता भोक्ता नामका जीव नहीं है । तो इससे परमात्मा ही संसारी, कर्ता, भोक्ता है ऐसा प्रसक्त होगा । चेतन युक्त कर्ता जीव यदि परमात्मासे अन्य हो तो बुद्धि आदि संघातसे व्यतिरिक्त न होगा, ऐसा नहीं, क्योंकि कर्तृत्व, मोक्तृत्व अविद्या से प्रत्युपस्थापित है, तथा ' यत्र हि द्वतमिव ० ' ( जिस अवस्था में द्वैत - सा होता है वहीं अन्य अन्यको देखता है ) इसप्रकार अविद्या अवस्थामें कर्तृत्व, भोक्तृत्व दिखलाकर ' यत्र त्वस्य ० ' ( किन्तु जहाँ इसके लिए सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किसके द्वारा किसे देखे ) इसप्रकार विद्या अवस्थामें कर्तृत्व, मोक्तृत्वका श्रुति निवा-रण करती है । उसी प्रकार स्वप्न और जागरित अवस्थामें आकाश में उड़नेवाले श्येनके श्रमके समान आत्माका उपाधिके सम्पर्कसे उत्पन्न हुए श्रमका श्रवण कराकर श्रुति सुषुप्ति में प्राज्ञ आत्मा के साथ सम्पर्क ऐक्य हुएका श्रमाभाव श्रवण कराती है - ' तद्वा ० ' ( इस ज्योतिः स्वरूप आत्माका आस-
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अधि ० १५ सू ० ४० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५१ ९ काममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ' ( बृह ० ४ | ३ | २१ ) इत्यारभ्य ' एषास्य परमा गतिरेपास्य परमा संपदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्दः ' ( बृह ० ४ | ३ | ३२ ) इत्युपसंहारात् । तदेतदाहाचार्यः - ' यथा च तक्षोभयथा ' इति । त्वर्थे चायं चः पठितः । नैवं मन्तव्यं-स्वाभाविकमेचात्मनः कर्तृत्वमग्नेरिवौष्ण्यमिति । यथा तु तक्षा लोके वास्यादिकरणहस्तः कर्ता दुःखी भवति, स एव स्वगृहं प्राप्तो विमुक्तवास्यादिकरणः स्वस्थो निर्वृतो निर्व्या-पारः सुखी भवत्येवमविद्याप्रत्युपस्थापितद्वैतसंपृक्त आत्मा स्वप्नजागरितावस्थयोः कर्ता दुःखी भवति, स तच्छ्रमापनुत्तये स्वमात्मानं परं ब्रह्म प्रविश्य विमुक्त कार्यकरण-संघातोऽकर्ता सुखी भवति संप्रसादावस्थायाम् । तथा मुक्त्यवस्थायामप्यविद्याध्वान्तं विद्याप्रदीपेन विधूयात्मैव केवलो निर्वृतः सुखी भवति । तक्षदृष्टान्तश्चैतावतांऽशेन द्रष्टव्यः । तक्षा हि विशिष्टेषु तक्षणादिव्यापारेष्वपेक्ष्यैव प्रतिनियतानि करणानि वास्यादीनि कर्ता भवति, स्वशरीरेण त्वकर्तैव । एवमयमात्मा सर्वव्यापारेष्वपेक्ष्यैव मन आदीनि करणानि कर्ता भवति, स्वात्मना त्वकर्ते वेति । नत्वात्मनस्तक्ष्ण इवाव-यवाः सन्ति यैर्हस्तादिभिरिव वास्यादीनि तक्षा मन आदीनि करणान्यात्मोपाददीत म्यस्येद्वा । यत्तूक्तम् - शास्त्रार्थवत्त्वादिभिर्हेतुभिः स्वाभाविकमात्मनः कर्तृत्वमिति, तन, विधिशास्त्रं तावद्यथाप्राप्तं कर्तृत्वमुपादाय कर्तव्य विशेषमुपदिशति, न कर्तृत्व-मात्मनः प्रतिपादयति । नच स्वाभाविकमस्य कर्तृत्वमस्ति ब्रह्मात्मत्वोपदेशादित्य-वोचाम, तस्मादविद्याकृतं कर्तुत्वमुपादाय विधिशास्त्रं प्रवर्तिष्यते । ' कर्ता विज्ञानात्मा काम, आत्मकाम, अकाम और शोक शून्य स्वरूप है ) ऐसा आरम्भकर ' एषास्य ० ' ( यह इस पुरुषकी परगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परम लोक है, यह इसका परम आनन्द है ) ऐसा उपसंहार है । इससे आचार्यने ' यथा च तक्षोमयथा ' यह कहा है । सूत्रस्थ यह ' च ' शब्द ' तु ' अर्थ में पठित है । और ऐसा नहीं मानना चाहिए कि अग्निकी उष्णताके समान आत्माका कर्तृत्व स्वाभाविक है । परन्तु जैसे लोकमें बसुला आदि करण युक्त हाथ वाला तक्ष [ बढ़ई ] कर्ता होकर दुःखी होता है, वही अपने घर जाकर बसुला आदि करणोंसे विमुक्त हुआ स्वस्थ, शान्त, व्यापार शून्य और सुखी होता है, वैसे ही अविद्यासे प्रत्युपस्थापित द्वैतसे सम्बद्ध आत्मा स्वप्न और जागरित अवस्थाओं में कर्ता होकर दुःखी होता है, वह आत्मा उस श्रमको निवृत्त करनेके लिए स्वस्वरूप परब्रह्ममें प्रवेशकर कार्य - करण संघातसे मुक्त होता हुआ सुषुप्ति अवस्थामें अकर्ता होकर सुखी होता है । उसी प्रकार मुक्ति अवस्था में भी व्यविद्या अन्धकारको विद्या प्रदीपसे निवृत्तकर आत्मा ही केवल शान्त और सुखी होता है । तक्ष दृष्टान्त इतने अंश में समझना चाहिए । तक्ष ही तक्षण [ छीलना ] आदि विशिष्ट व्यापारोंसे प्रतिनियत वसुला आदि करणोंकी अपेक्षासे ही कर्ता होता है, अपने शरीरसे तो अकर्ता ही है; वैसे यह आत्मा समस्त व्यापारोंमें मन आदि करणोंकी अपेक्षासे ही कर्ता होता है, अपने स्वरूपसे तो अकर्ता ही है । तक्षके समान आत्माके अवयव नहीं हैं जिससे कि जैसे तक्ष हस्त आदि द्वारा वसुला आदिका ग्रहण और त्याग करता है, वैसे आत्मा मी मन आदि करणोंका ग्रहण करे अथवा त्याग करे । जो यह कहा गया है कि शास्त्रार्थवत्त्व आदि हेतुओंसे आत्माका स्वाभाविक कर्तृत्व है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि विधि शास्त्र तो यथाप्राप्त [ लोक प्रसिद्ध ] कर्तृत्वको लेकर कर्तव्य विशेषका उपदेश करता है, आत्मामें कतृत्वका प्रतिपादन नहीं करता । आत्माका कर्तृत्व स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि उसमें ब्रह्मात्मत्वका उपदेश है, ऐसा हम कह चुके हैं । इसलिए अविद्या-सत्यानन्दी - दीपिका * ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि विधि शास्त्र कर्ता के विना अनुपपन्न होता हुआ अपनी सार्थकता के लिए आत्मा में स्वाभाविक कर्तृत्व सिद्ध करता है । इसका समाधान ' तत्र ' आदिसे कहते हैं ।
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५२० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ पुरुषः ' इत्येवंजातीयकमपि शास्त्रमनुवादरूपत्वाद्यथाप्राप्तमेवाविद्याकृतं कर्तृत्वमनु-वदिष्यति । एतेन विहारोपादाने परिहृते तयोरप्यनुवादरूपत्वात् । ननु संध्ये स्थाने प्रसुप्तेषु करणेषु स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तन इति विहार उपदिश्यमानः केवलस्या-त्मनः कर्तुत्वमावहति । तथोपादानेऽपि ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय ' ( बृह ० २।१ । १७ ) इति करणेषु कर्मकरणविभक्ती श्रूयमाणे केवलस्यात्मनः कर्तृत्वं गमयत इति । अत्रोच्यते- न तावत्संध्ये स्थानेऽत्यन्तमात्मनः करणविरमणमस्ति, ' सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति ' ( ' बृह ० ४।३।७ ) इति । तत्रापि धीसंबन्धश्रवणात् । तथा च स्मरन्ति-' इन्द्रियाणामुपरमे मनोऽनुपरतं यदि । सेवते विषयानेव तद्विद्यात्स्वप्नदर्शनम् ॥ ' इति । ' कामादयश्च मनसो वृत्तयः ' इति श्रुतिः । ताच स्वप्ने दृश्यन्ते, तस्मात्समना एव स्वप्ने विहरति । * विहारोऽपि च तत्रत्यो वासनामय एव नतु पारमार्थिकोऽस्ति । तथा च श्रुति-रिवकारानुबद्धमेव स्वप्नव्यापारं वर्णयति – ' उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ' ( बृह ० ४ । ३ । १३ ) इति । लौकिका अपि तथैव स्वप्नं कथयन्ति - आरु क्षमिव गिरिशृङ्गम्, अद्राक्षमिव वनराजिमिति । तथोपादानेऽपि यद्यपि करणेषु कर्मकरण-विभक्तिनिर्देशः, तथापि तत्संपृक्तस्यैवात्मनः कर्तृत्वं द्रष्टव्यम्, केवले कर्तृत्वासंभवस्य कृत कर्तृत्व को लेकर विधि शास्त्र प्रवृत्त होगा । ' कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष: ' इसप्रकारका शास्त्र भी अनुवादरूप होनेसे यथाप्राप्त अविद्याकृत कतृत्वका ही अनुवाद करेगा । इससे विहार और उपा-दानका परिहार हुआ, क्योंकि वे भी अनुवादरूप हैं । परन्तु स्वप्नावस्थामें करणोंके प्रसुप्त होने अपने शरीरमें यथेष्ट परिवर्तन करता है, इसप्रकार उपदेश किया हुआ विहार केवल आत्मामें कर्तृत्व को सिद्ध करता है, एवं उपादानमें मी ' तदेषां प्राणानां ० ' [ वह बुद्धिसे इन इन्द्रियोंकी शक्तिकी ग्रहण कर सोता है. ] इसप्रकार करणोंमें श्रयमाण कर्म और करण विभक्ति केवल आत्माका कर्तृत्व ज्ञात कराती. । इसपर कहते हैं— स्वप्नावस्था में आत्माका करणोंसे अत्यन्त विराम नहीं हैं, क्योंकि ' सधीः स्वप्नो ० ' ( बुद्धि सहित स्वप्न होकर इस लोकका अतिक्रमण करता है ) इसप्रकार स्वप्नमें भी बुद्ध साथ सम्बन्धका श्रवण है । जैसे कि ' इन्द्रियाणामुपरमे ० ' ( इन्द्रियोंके उपरत होनेपर यदि मन उपरत न होकर विषयोंका सेवन करता है तो उसको स्वप्नदर्शन समझना चाहिए ) ऐसी स्मृति भी है, ' कामादयश्च मनसो वृत्तय: ' ( काम आदि मनकी वृत्तियाँ हैं ) ऐसी श्रुति है । वे वृत्तियाँ स्वप्नमें देखी जाती हैं, इसलिए आत्मा स्वप्न में मन सहित ही विहार करता है । और स्वप्नावस्थाका विहार भी वासनामय ही है पारमार्थिक नहीं है । इसप्रकार ' उतेव स्त्रीभिः ० ' ( स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, मित्रोंके साथ हँसता हुआ तथा व्याघ्र आदि से मय देखता हुआ रहता है ) यह श्रुति ' हव ' से अनुबद्ध ही स्वप्न व्यापारका वर्णन करती है । लोग भी उसी प्रकार स्वप्नका वर्णन करते हैं- मानो मैं गिरिके शिखरपर चढा, मानों मैंने वनपंक्ति देखीं ' । वैसे ही उपादान में भी यद्यपि करणोंमें द.मं सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे ' योधा युध्यन्ते योधै राजा युध्यते ' यहाँ पहले योधाओं में कतृत्वकी विवक्षासे प्रथमा - कतृ -विभक्ति है, पुनः उनमें करणत्वकी विवक्षासे ' योध ': ' तृतीया विभक्ति है । वैसे ही ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' यहाँ कर्तृत्व विवक्षा में ' विज्ञान ' पदमें प्रथमा है और ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय ' यहाँ करणत्वकी विवक्षा विज्ञानपदसे तृतीया विभक्ति है, पूर्वमें विज्ञान जीव है, ऐसा अङ्गीकार कर ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' यह श्रुति कही गई । अब उस श्रुतिसे उपाधि रहित आत्मामें कर्तृत्व प्राप्त होने पर यहाँ विज्ञानशब्द बुद्धिवाचक है, अतः उसमें कर्तृत्व है । आत्मामें तो बुद्धि उपाधिसे कर्तृत्व है स्वतः नहीं । ' स एष वाच: ० ' ( चित्तसे देवताका ध्यान कर वाणी द्वारा मन्त्र आदि उच्चारण किये जाते हैं और मन्त्रोंसे यज्ञ सम्पन होता है, इसप्रकार चित्त और वाणीका पूर्वोत्तरमाव ही यज्ञ है ) ।
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अधि ० १५ सू ० ४० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५२१ दर्शितत्वात् । भवति च लोकेऽनेकप्रकारा विवक्षा - योधा युध्यन्ते, योधै राजा युध्यत इति । अपि चास्मिन्नुपादाने करणव्यापारोपरममात्रं विवक्ष्यते, न स्वातन्त्र्यं कस्य-चिदबुद्धिपूर्वकस्यापि स्वापे करणव्यापारोपरमस्य दृष्टत्वात् । यस्त्वयं व्यपदेशो दर्शितः-' विज्ञानं यज्ञ ं तनुते ' इति, स बुद्धेरेव कर्तृत्वं प्रापयति, विज्ञानशब्दस्य तत्र प्रसिद्धत्वात्, मनोनन्तरं पाठाच्च । ' तस्य श्रद्वैव शिरः ' ( तै ० २1४ ) इति च विज्ञानमयस्यात्मनः श्रद्धाद्यवययवत्वसंकीर्तनात् " श्रद्धादीनां च बुद्धिधर्मत्वप्रसिद्धे, ' विज्ञान देवाः सर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते ' ( तै ० २।५।१ ) इति च वाक्यशेषात्, ज्येष्ठत्वस्य च प्रथमंजत्वस्य बुद्धौ प्रसिद्धत्वात् । स एष वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरक्रमा यद्यज्ञः ' इति च श्रुत्यन्तरे यज्ञस्य वाग्बुद्धि-साध्यत्वावधारणात् । नच बुद्धेः शक्तिविपर्ययः करणानां कर्तृत्वाभ्युपगमे भवति, सर्वकारकाणामेव स्वस्वव्यापारेषु कर्तृत्वस्यावश्यंभावित्वात् । उपलब्ध्यपेक्षं त्वेषां करणत्वम्, साचात्मनः । नच तस्यामप्यस्य कर्तृत्वमस्ति, नित्योपलब्धिस्वरूपत्वात् । अहङ्कारपूर्वकमपि कर्तृत्वं नोपलब्धुर्भवितुमर्हति अहङ्कारस्याप्युपलभ्यमानत्वात् । न चैवं सति करणान्तरकल्पनाप्रसङ्गः, बुद्ध ेः करणत्वाभ्युपगमात् । समाध्यभावस्तु शास्त्रार्थवत्त्वेनैव परिहृतः, यथाप्राप्तमेव कर्तृत्वमुपादाय समाधिविधनात् । तस्मात्कर्तृत्व-मप्यात्मन ' उपाधिनिमित्तमेवेति स्थितम् ॥४० ॥
विभक्ति और करण विभक्तिका निर्देश है, तो भी उनसे सम्बंधित आत्माका ही कर्तृत्व समझना चाहिए, क्योंकि केवल आत्मा में कतृत्वका असंभव दिखलाया गया है । ' योधा युद्ध करते हैं योधाओं द्वारा राजा युद्ध करता है ' इसतरह लोकमें अनेक प्रकारकी विवक्षा होती है और इस उपादानमें करण के व्यापारका विराममात्र विवक्षित है, किसीका स्वातन्त्र्य विवक्षित नहीं है, क्योंकि स्वप्न में अबुद्धि-पूर्वकमी करणका व्यापार उपरम देखा जाता हैं । ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' ( विज्ञान यज्ञका विस्तार करता है ) यह जो व्यपदेश दिखलाया गया है, वह बुद्धि में कर्तृत्व प्राप्त कराता है, क्योंकि विज्ञानशब्द उसमें प्रसिद्ध है और मनके अनन्तर उसका पाठ है । ' तस्य श्रद्धैव शिरः ' ( उसका श्रद्धा ही शिर है ) विज्ञानमय आत्माके श्रद्धा आदि अवयव कहे गये हैं और श्रद्धा आदि बुद्धि के धर्मरूपसे प्रसिद्ध हैं । तथा ' विज्ञानं देवा: ' ० ( सब देव विज्ञानको ब्रह्मरूपसे, ज्येष्ठरूपसे उपासना करते हैं ) ऐसा वाक्यशेष है । ज्येष्ठत्व और प्रथमजत्व बुद्धिमें प्रसिद्ध हैं, क्योंकि ' स वा एष ० ' ( जो वाणी और चित्तका उत्तरोत्तर क्रम है, वही यह यज्ञ है ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें यज्ञ वाणी और बुद्धिसे साध्य अवधारित होता है । करणोंमें कर्तृत्व स्वीकार करनेपर बुद्धिकी शक्तिका विपर्यय नहीं होता, क्योंकि सब कारकोंका अपने अपने व्यापारमें कर्तृत्व अवश्यंभावी है । परन्तु उन करणोंमें करणत्व उपलब्धिकी अपेक्षासे है और वह उपलब्धि आत्माकी है । उसमें इसका कर्तृत्व नहीं है, क्योंकि वह नित्य उपलब्धि स्वरूप है । महङ्कार पूर्वक कर्तृत्व भी उपलब्धाका नहीं हो सकता, क्योंकि अहङ्कार भी उपलभ्यमान है । ऐसा होनेपर अन्य करणकी कल्पनाका प्रसङ्ग भी नहीं है, क्योंकि बुद्धिको करणरूपसे स्वीकृत किया गया है । समाधिके अभावका तो शास्त्रार्थवत्त्वसे ही परिहार किया जा चुका है, क्योंकि यथा प्राप्त कर्तृत्वको लेकर ही समाधि ( निदिध्यासितव्यः ) का विधान है । इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्मामें कर्तृत्व भी उपाधि निमित्त ही है ॥ ४० ॥
सत्यानन्दी - दीपिका # अखण्ड साक्षी चैतन्य बुद्धि वृत्तियोंसे भिन्न होता हुआ विषयावच्छिन्नरूपसे उत्पन्न होता है, विषयावच्छिन्न चैतन्यको उपलब्धिमें बुद्धि आदि करण हैं, इसलिए बुद्धि उपहित आत्मामें कर्तृत्व है, केवल आत्मामें नहीं । इस प्रकार बुद्धि विशिष्ट आत्मा में कर्तृत्व मानने से विशेषणीभूत जड़ बुद्धि में
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५२२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ ( १६ परायत्ताधिकरणम् । सू ० ४१-४२ ) परात्तु तच्छ्रुतेः ॥ ४१ ॥
पदच्छेदे - परात्, तु, तच्छ्रुतेः । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्काकी निवृत्तिके लिए है, जीवका कर्तृत्व आदि स्वभावतः नहीं है, ( परात् ) परमात्मासे प्राप्त होता है, ( तच्छ्रतेः ) क्योंकि ' एष ह्येव ' इत्यादि श्रुतिमें ऐसा प्रतिपादित है । यदिदमविद्यावस्थायामुपाधिनिबन्धनं कर्तृत्वं जीवस्याभिहितम्, तत्किमन-पेक्ष्येश्वरं भवत्याहोस्विदीश्वरापेक्षमिति भवति विचारणा । तत्र प्राप्तं तावत् - नेश्वरम पेक्षते जीवः कर्तृत्व इति । कस्मात्? अपेक्षा प्रयोजनाभावात् । अयं हि जीवः स्वयमेव रागद्वेषादिदोषप्रयुक्तः कारकान्तरसामग्रीसंपन्नः कर्तृत्वमनुभवितुं शक्नोति । तस्य किमीश्वरः करिष्यति? नच लोके प्रसिद्धिरस्ति कृष्यादिकासु क्रियास्वनडुहादिवदी-श्वरोऽपरोऽपेक्षितव्य इति । क्लेशात्मकेन च कर्तृत्वेन जन्तून्संसृजत ईश्वरस्य नैर्घृण्यं प्रसज्येत विषमफलं चैषां कर्तृत्वं विदधतो वैषम्यम् । ननु ' वैषम्य नैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् ' ( ब्र ० २।१।३४ ) इत्युक्तम् | सत्यमुक्तम्, सति त्वीश्वरस्य सापेक्षत्वसंभवे । सापेक्षत्वं चेश्वरस्य संभवति सतोर्जन्तूनां धर्माधर्मयोः, तयोश्च सद्भावः सति जीवस्य कर्तृत्वे । तदेव चेत्कर्तृत्वमीश्रापेक्षं स्वात्किविषयमीश्वरस्य सापेक्षत्वमुच्येत? अकृताभ्यागमश्चैवं जीवस्य प्रसज्येत । तस्मात्स्वत एवास्य कर्तृत्वमिति । एतां प्राप्तितु-अविद्या अवस्थामें जो यह उपाधि निमित्तक जीवमें कर्तृत्व कहा गया है, क्या वह ईश्वरकी अपेक्षाके विना होता है अथवा ईश्वरकी अपेक्षासे होता है, इस प्रकार विचार होता है । इसमें पूर्वपक्ष प्राप्त होता है— जीव अपने कर्तृत्वमें ईश्वरकी अपेक्षा नहीं करता, किससे? इससे कि अपेक्षाका प्रयो-जन नहीं है । यह जीव स्वयं ही राग, द्वेष आदि दोषोंसे प्रयुक्त होता हुआ कारक सामग्री से सम्पन्न होकर कर्तृत्व अनुभव करने में समर्थ होता है । उसका ईश्वर क्या करेगा? लोकमें ऐसी प्रसिद्धि नहीं है कि कृषि आदि क्रयाओं में अनडुह ( बैल ) आदिके समान ईश्वर अपेक्षितव्य है । क्लेशात्मक कर्तृत्वसे जन्तुओंको उत्पन्न करनेवाले ईश्वरमें नैघृण्य प्रसक्त होगा और इन प्राणियोंके विषम फलवाले कर्तृत्वको उत्पन्न करनेवाले ईश्वर में वैषम्य प्रसक्त होगा । परन्तु यह कहा जा चुका है कि ' वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् ' ( प्राणियों के कर्मकी अपेक्षासे ईश्वर में वैषम्य और नैघृण्य नहीं है ) ठीक, ऐसा कहा जा चुका है । परन्तु ईश्वरमें सापेक्षत्व होनेपर ही यह उपपन्न होगा । प्राणियोंके धर्माधर्म होनेपर ईश्वर में सापेक्षत्व संभव है । जीवका कर्तृत्व होनेपर उनका ( धर्म और अधर्मका ) सद्भाव है । यदि वही कर्तृत्व ईश्वरकी अपेक्षासे हो तो ईश्वरका - सापेक्षत्व किस विषयका कहा जायगा । ऐसा होनेपर जीवको अकृताभ्यागम प्रसक्त सत्यानन्दी - दीपिका करणत्वकी उपपत्ति हो सकती है, अतः अन्य करणकी कल्पना युक्त नहीं है । हाँ, जो केवल बुद्धिको कर्त्री मानते हैं, उनको तो अन्य करणकी कल्पना दुर्वार है । अतः आत्मामें औपाधिक कर्तृत्वको लेकर विधि आदि शास्त्र प्रवृत्त होते हैं । इसलिए ' असङ्गत्व ' प्रतिपादक श्रुतियोंके साथ विधिद्वारा कर्तृत्व प्रतिपादकश्रुतियोंका कोई विरोध नहीं है । पूर्वपक्ष में आत्माका स्वाभाविक कर्तृत्व है, सिद्धान्त में औपाधिक कर्तृत्व है ॥ ४० ॥
* जैसे चन्दन आदि सामग्रीके होनेपर धर्मके अभाव में सुखके अभावका यद्यपि ज्ञान नहीं होता, तो भी ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति ' ( बृह ० ३।२।१३ ) ( यह पुरुष पुण्य कर्मसे पुण्यशाली होता है ) इत्यादि शास्त्र प्रमाणसे सुखके प्रति धर्ममें हेतुता सिद्ध होती है, वैसे शास्त्रबलसे ईश्वर भी कारयिता सिद्ध होता है ॥ ४१ ॥
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अधि ० १६ सू ० ४२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५२३ शब्देन व्यावर्त्य प्रतिजानीते - ' परात् ' इति । अविद्यावस्थायां कार्यकरणसंघाताविवेक-दर्शिनो जीवस्याविद्यातिमिरान्धस्य सतः परस्मादात्मनः कर्माध्यक्षात्सर्वभूताधिवासा-त्साक्षिणश्चेतयितुरीश्वरात्तदनुज्ञया कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणस्य संसारस्य सिद्धिः, तदनु-ग्रहहेतुकेनैव च विज्ञानेन मोक्षसिद्धिर्भवितुमर्हति । कुतः? तच्छ्रुतेः । यद्यपि दोषप्रयुक्तः सामग्रीसंपन्नश्च जीवः, यद्यपि च लोके कृष्यादिषु कर्मसु नेश्वरकारणत्वं प्रसिद्धम्, तथापि सर्वास्वेव प्रवृत्तिष्वीश्वरो हेतुकर्तेति श्रुतेरवसीयते । तथा हि श्रुतिर्भवति - ' एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते । एष ह्येवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते ॥ ' ( कौषी ० ३।८ ) इति । ' य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति ' इति चैवंजातीयका ॥ ४१ ॥
नन्वेवमीश्वरस्य कारयितृत्वे सति वैषम्यनैर्घृण्ये स्यातामकृताभ्यागमश्च जीवस्येति, नेत्युच्यते-कृत प्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ॥ ४२ ॥
पदच्छेद -- कृतप्रयत्नापेक्षः, तु, विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है, ( विहित प्रतिषिद्धा वैयर्थ्यादिभ्यः ) वेदमें विहित और प्रतिषिद्ध कर्म व्यर्थं आदि न हों, इसलिए ईश्वर अपने कारयितृत्व में ( कृतप्रयत्नापेक्षः ) जीव कृत प्रयत्नकी अपेक्षा करता है । तुशब्दचोदितदोषव्यावर्तनार्थः । कृतो यः प्रयत्नो जीवस्य धर्माधर्मलक्षणस्तदपेक्ष एवैनमीश्वरः कारयति । ततश्चैते चोदिता दोषा न प्रसज्यन्ते । जीवकृतधर्माधर्मवैषम्या-पेक्ष एवं तत्तत्फलानि विषमं विभजेत्पर्जन्यवदीश्वरो निमित्तत्वमात्रेण । यथा लोके नाना-विधानां गुच्छगुल्मादीनां त्रीहियवादीनां चासाधारणेभ्यः स्वस्वबीजेभ्यो जायमानानां साधारणं निमित्तं भवति पर्जन्यः । न ह्यसति पर्जन्ये रसपुष्पपलाशादिवैषम्यं तेषां जायते, होगा, इससे जीवका स्वतः ही कर्तृत्व है । इस पूर्वपक्षकी प्राप्तिको ' तु ' शब्द से निराकरण कर सूत्रकार प्रतिज्ञा करते हैं - ' परात् ' इत्यादि । अविद्यावस्था में कार्य - करण संघातके साथ अभेददर्शी और अविद्या-रूप अन्धकारसे अन्ध होते हुए जीवके कर्तृत्व, मोक्तृत्वरूप संसारकी सिद्धि कर्मोंके अध्यक्ष, सम्पूर्णं भूतोंके अधिष्ठान साक्षी, चेतयिता परमात्मा ईश्वरसे उसकी अनुज्ञाद्वारा है, उसके अनुग्रह हेतुक विज्ञानसे मोक्ष सिद्धि हो सकती है, किससे? इससे कि उसकी श्रुति है । यद्यपि राग आदि दोषोंसे प्रयुक्त एवं सामग्री सम्पन्न जीव है । यद्यपि लोकमें कृषि आदि कर्मोंमें ईश्वर कारणरूपसे प्रसिद्ध नहीं है, तो मी सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंमें ईश्वर हेतु कर्ता ( प्रयोजककर्ता ) है, ऐसा श्रुतिसे निश्चित होता है । जैसे कि ' एष ० ' ( यही जिसको ऊपर ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है और जिसको नीचे ले जाना चाहता है उससे यही अशुभ कर्म कराता है ) और ' य आत्मनि ० ' ( जो आत्मा में रहकर आत्माका नियमन करता है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ हैं ॥४१ ॥
परन्तु इस प्रकार ईश्वरको कारयितृत्व होनेपर वैषम्य और नैघृण्य प्रसक्त होंगे और जीवको अकृभ्यागम प्रसक्त होगा । नहीं, ऐसा कहते हैं-' तु ' शब्द शङ्कित दोषोंकी व्यवृत्तिके लिए है । जीवसे किया गया जो धर्माधर्मरूप प्रयत्न है उसकी अपेक्षा करनेवाला ईश्वर उसको कराता है, उससे वे शङ्कित दोष प्रसक्त नहीं होते । जीवकृत धर्माधर्मके वैषम्यको अपेक्षा करनेवाला ही ईश्वर मेंघके समान केवल निमित्तरूपसे तत् तत् फलों को विषमरूपसे विभक्त करता है । जैसे लोकमें अपने - अपने असाधारण बीजोंसे जायमान अनेक प्रकारके गुच्छ, गुल्म ( छोटी लताएँ ) व्रीहि, यव आदिके प्रति साधारण कारण पर्जन्य होता है । पर्जन्यके न होनेपर उनमें रस, पुष्प, फल, पत्र आदिका वैषम्य उत्पन्न नहीं होता है । और अपने - अपने बीजके न
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५२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ नाप्यसत्सु स्वस्वबीजेषु, एवं जीवकृतप्रयत्नापेक्ष ईश्वरस्पेषां शुभाशुभं विदध्यादिति श्लिष्यते । ननु कृतप्रयत्नापेक्षत्वमेव जोवस्य परायत्ते कर्तृत्वे नोपपद्यते, नैष दोषः परायत्तेऽपि हि कर्तृत्वे करोत्येव जीवः कुर्वन्तं हि तमीश्वरः कारयति । अपि च पूर्व-प्रयत्नमपेक्ष्येदानीं कारयति, पूर्वतरं च प्रयत्नमपेक्ष्य पूर्वमकारयदित्यनादित्वात्संसारस्ये-त्यनवद्यम् । * कथं पुनरवगम्यते कृतप्रयत्नापेक्ष ईश्वर इति? ' विहितप्रतिषिद्धा वैयर्थ्या-दिभ्य इत्याह । एवं हि ' स्वर्गकामो यजेत ' ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्येवंजातीयकस्य विहितस्य प्रतिषिद्धस्य बावैयर्थ्यं भवति, अन्यथा तदनर्थकं स्यात्, ईश्वर एव विधिप्रतिषेधयोर्नियु-ज्येत्, अत्यन्तपरतन्त्रत्वाज्जीवस्य । तथा विहितकारिणमप्यनर्थेन संसृजेत्प्रतिषिद्धकारि-णमप्यर्थेन, ततश्च प्रामाण्यं वेदस्यास्तमियात् । ईश्वरस्य चात्यन्तानपेक्षत्वे लौकिक-स्यापि पुरुषकारस्य वैयर्थ्यम्, तथा देशकालनिमित्तानाम्, पूर्वोक्तदोषप्रसङ्गश्चेत्येवंजा-तीयकं दोषजातमादिग्रहणेन दर्शयति ॥ ४२ ॥
( १७ अंशाधिकरणम् । सू ० ४३-५३ ) अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके ॥ ४३ ॥
पदच्छेद - अंशः, नानाव्यपदेशात्, अन्यथा, च, अपि, दाशकितवादित्वम्, अधीयते, एके । सूत्रार्थ - ( अंशः ) जीव ईश्वरका कल्पित अंश है, ( नानाव्यपदेशात् ) क्योंकि ' य आत्मनि तिष्ठन् ' इत्यादि श्रुतिमें दोनोंका भेद व्यपदेश है, ( अन्यथा चापि ) और उसी प्रकार अन्यथा - अभेदका मी व्यपदेश है, कारण कि ( एके ) एक शाखावाले ( दाशकितवादित्वम् ) ' ब्रह्म दाशा ' इसप्रकार ब्रह्ममें दाश कितवत्व आदिका ( अधीयते ) पाठ करते हैं । * जीवेश्वर योरुप कार्योपकारकभाव उक्तः । स च संबद्धयोरेव लोके दृष्टो यथा होनेपर भी वैषम्य उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही जीव कृत प्रयत्नकी अपेक्षा करनेवाला ईश्वर उनके शुभ और अशुभका विधान करे, यह युक्त है । परन्तु जीवका परमेश्वर अधीन कर्तृत्व होनेपर ईश्वरमें जीव-कृत प्रयत्नकी अपेक्षा उपपन्न नहीं होती । यह दोष नहीं है, क्योंकि ईश्वरसे प्राप्त कर्तृत्व होनेपर भी जीव करता ही है, करते हुए उसको ईश्वर कराता है । और पूर्व प्रयत्नकी अपेक्षाकर इस समय उसे कराता है, और पूर्वतर प्रयत्नकी अपेक्षाकर पूर्व में कराया, इस प्रकार संसारके अनादि होनेसे दोष नहीं है । परन्तु यह कैसे अवगत हो कि ईश्वर जीव कृत प्रयत्नको अपेक्षा करनेवाला है? ' विहितप्रतिषिद्धा-वैयर्थ्यादिभ्यः ' ऐसा कहा है । ऐसा होनेपर ' स्वर्गकामो यजेत ' ( स्वर्गकी कामना करनेवाला याग करे ) ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' ( ब्राह्मणका हनन नहीं करना चाहिए ) इसप्रकार के विहित और प्रतिषिद्ध व्यथं नहीं होते, अन्यथा वे निरर्थक हो जायँगे, ईश्वर ही विधि और प्रतिषेधमें नियुक्त करे, क्योंकि जीव अत्यन्त परतन्त्र है । वैसे [ वेद ] विहित कर्म करनेवालेका अनर्थके साथ और प्रतिषिद्ध करनेवालेका अर्थके साथ सम्बन्ध होने लग जायगा तो उसे वेदका प्रामाण्य अस्त हो जायगा । ईश्वरकी अत्यन्त अनपेक्षा होनेपर लौकिक पुरुषार्थं भी व्यर्थ हो जायगा, वैसे ही देश, काल और निमित्तोंके पूर्वोक्त दोष प्रसङ्ग इसप्रकारके दोष समुदाय आदिके ग्रहणसे दिखलाते हैं ॥४२ ॥
जीव और ईश्वरका उपकार्य - उपकारक भाव कहा गया, और लोकमें वह सम्बद्धोंका ही देखा सत्यानन्दी -दीपिका * जीवोंको न किये कर्मो का फल भी भोगना पड़ेगा । ईश्वरमें वैषम्य और नैघृण्य दोष प्रसक्त होगा, इसलिए जीवकृत शुभाशुभ कर्मोकी अपेक्षा करनेवाले ईश्वर में कारयित्व होनेसे ' एष ह्येव साधुकर्म कारयति ' इत्यादि श्रुतिका ' स्वर्गकामो यजेत ' ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि विधि - प्रतिषेध श्रुतियोंके साथ कोई विरोध नहीं है ॥४२ ॥
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अधि ० १७ सू ० ४३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीकासहित ५२५ स्वामिभृत्ययोर्यथा वाग्निविस्फुलिङ्गयोः । ततश्च जीवेश्वरयोरप्युपकार्योपकारकभावाभ्यु-पगमाकि स्वामिभृत्यवत्संबन्ध आहोस्विदग्निविस्फुलिङ्गवदित्यस्यां विचिकित्सायाम-नियमो वा प्राप्नोति । अथवा स्वामिभृत्यप्रकारेष्वेवेशित्रीशितव्यभावस्य प्रसिद्धत्वात्त-द्विध एव संबन्ध इति प्राप्नोति । अतो ब्रवोति अंश इति । जीव ईश्वरस्यांशो भवितु-मर्हति, यथाऽग्नेर्विस्फुलिङ्गः । अंश इवांशः, न हि निरवयवस्य मुख्योंऽशः संभवति । कस्मात्पुनर्निरवयवत्वात्स एव न भवति? नानाव्यपदेशात् । ' सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासि-तव्यः ' ( छा ० ८ | ७ | १ ) एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति ', ' य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति ' इति चैवं जातीयको भेदनिर्देशो नासति भेदे युज्यते । ननु चायं नानाव्यपदेशः सुतरां स्वामिभृत्यसारूप्ये युज्यते इत्यत आह- अन्यथा चापीति । नच नानाव्यपदेशादेव केवलादशत्वप्रतिपत्तिः । किं तर्हि? अन्यथा चापि व्यपदेशो भवत्यनानात्वस्य प्रति-पादकः । तथा हि- एके शाखिनो दाशकितवादिभावं ब्रह्मण आमनन्त्याथर्वणिका ब्रह्मसूक्ते - ' ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवा: ' इत्यादिना । दाशा य एते कैवर्ताः प्रसिद्धाः, ये चामी दासाः स्वामिष्वात्मानमुपक्षपयन्ति ये चान्ये कितवा द्यूतकृतस्ते सर्वे ब्रह्मैवेति हीनजन्तूदाहरणेन सर्वेषामेव नामरूपकृतकार्यकरणसंघातप्रविष्टानां जीवानां ब्रह्मत्वमाह । तथान्यत्रापि ब्रह्मप्रक्रियायामेवायमर्थः प्रपञ्च्यते - ' त्वं स्त्रीत्वं पुमानसि स्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ' ( इत्रे ० ४।३ ) जाता है, जैसे स्वामी और सेवकका अथवा जैसे अग्नि और विस्फुलिङ्गका । उससे जोव और ईश्वरका भी उपकार्योपकारकभाव स्वीकार होनेसे क्या वह स्वामी और सेवकके समान है अथवा अग्नि और विस्फुलिङ्गके समान है? इसप्रकार संशय होनेपर अनियम प्राप्त होता है । अथवा स्वामी और सेवकके प्रकारोंमें जिस प्रकारका ईशितृ और ईशितव्यभाव प्रसिद्ध है उसी प्रकारका ही सम्बन्ध प्राप्त होता है । इससे कहते हैं - ' अंश: ' इत्यादि । जीव ईश्वरका अंश हो सकता है, जैसे अग्निका विस्फुलिङ्ग । अंशके समान अंश है, कारण कि निरवयवका मुख्य अंश संभव नहीं है । परन्तु निरवयव होनेसे परमात्मा ही जीव क्यों नहीं होता है? ' नानाव्यपदेशात् ' ( भेदका व्यपदेश है ) ' सोऽन्वेष्टव्यः ० ' ( उसका अन्वेषण करना चाहिए और उसकी विशेष जिज्ञासा करनी चाहिए ) ' एतमेव ० ' ( उसीको जानकर मुनि होता है ) ' य आत्मनि ० ' ( जो आत्माके अन्तर रहकर आत्माका नियमन करता है ) इस प्रकारका भेदनिर्देश भेद न होनेपर नहीं घटता । परन्तु यह भेदव्यपदेश स्वामी और सेवक सासुतरां घट सकता है । इसपर कहते हैं - ' अन्यथा चापि ' अन्य प्रकारसे भी । केवल भेद-व्यपदेश से ही अंशत्व ज्ञान नहीं होता, किन्तु अन्य प्रकारसे मी अभेद प्रतिपादक व्यपदेश है । जैसे एक आथर्वण शाखावाले ' ब्रह्मदाशा ० ' ( ब्रह्म ही दाश धीवर हैं, ब्रह्म ही दास हैं ब्रह्म ही ये कितव-जुआरी हैं ) इत्यादिसे ब्रह्मसूक्त में ब्रह्मके दारा और कितव आदि भावका कथन करते हैं । दाशा - जो ये कैवर्तरूपसे प्रसिद्ध हैं । और ये जो दास हैं -- स्वामी के लिए अपनेको उपक्षय करते हैं । और जो अन्य कितव द्यूत करनेवाले हैं, वे सब ब्रह्म ही हैं । इसप्रकार हीन जन्तुओंके उदाहरण से नाम - रूपकृत कार्य-करण संघात में प्रविष्ट सभी जीवोंको ब्रह्म कहा है । इसी प्रकार अन्यत्र ब्रह्म प्रकरणमें भी यही अर्थ विस्तृत किया जाता है - ' त्वं स्त्री ० ' ( तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू कुमार है अथवा कुमारी है और सत्यानन्दी - दीपिका * आत्मामें वित्यत्व, अकर्तृत्व आदि कहकर अब उसका ब्रह्मके साथ अभेद सिद्ध करते हैं, इसप्रकार हेतुहेतुमद्भाव संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है । पूर्वपक्ष में प्रत्यक्से अभिन्न ब्रह्म असिद्ध है और सिद्धान्त में सिद्ध है, इसप्रकार दोनोंमें मेद है ॥ ४३ ॥
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५२६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ इति । ' सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽमिवदन्यदास्ते ' इति च । ' नान्योऽतोऽस्ति दृष्टा ' ( बृह ० ३।७।२३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्चास्यार्थस्य सिद्धिः 1 । चैतन्यं चाविशिष्टं जीवेश्वर-योर्यथाऽग्निविस्फुलिङ्गयोरौष्ण्यम् । अतो भेदाभेदावगमाभ्यामंशत्वावगमः ॥ ४३ ॥
कुतश्वांशत्वावगमः? - -मन्त्रवर्णाच्च ॥ ४४ ॥
पदच्छेद - मन्त्रवर्णात् च । सूत्रार्थ - और ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ० ' इस मन्त्रसे जीवमें अंशत्व अवगम होता है । * मन्त्रवर्णश्चैतमर्थमवगमयति- ' तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ' ( छा ० ३ | १२ | ६ ) इति । अत्र भूतशब्देन जीवप्रधानानि स्थावरजङ्गमानि निर्दिशति, ' अहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः ' इति प्रयोगात् । अंशः पादो
भाग इत्यनर्थान्तरम् । तस्मादव्यंशत्वावगमः ॥ ४४ ॥
कुतश्चांशत्वावगमः? -अपि च स्मर्यते ॥ ४५ ॥
पदच्छेद --अपि च, स्मयंते । सूत्रार्थ - ( अपिच ) और ( स्मर्यते ) ' ममैवांशो ० ' इस स्मृतिमें भी जीव ईश्वरका अंश कहा गया है । * ईश्वरगीतास्त्रपि चेश्वरांशत्वं जीवस्य स्मर्यते- ' ममैवांगो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' ( गी ० १५/७ ) इति । तस्मादप्यंशत्वावगमः । यत्तूक्तम् - स्वामिभृत्यादिष्वेवेशित्री शितव्य भावो तू ही वृद्ध होकर दण्डके सहारे चलता है, तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होकर अनेकरूप हो जाता है ) और ' सर्वाणि रूपाणि ० ' ( सत्र रूपोंका निर्माणकर नाम रखकर शब्द व्यवहार करता हुआ रहता है ) ' नान्यो ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतियोंसे उसी अर्थकी सिद्धि होती है । जैसे अग्नि और विस्फुलिङ्गका औष्य समान है, वैसे जीव और ईश्वरका चैतन्य समान है । अतः भेद और अभेदके अवगमसे अंशत्वका अवगम होता है ॥ ४३ ॥
जीवमें अंशका अवगम किससे होता है? ' तावानस्य ० ' ( उतनी ही इस ( गायत्र्याख्य ब्रह्म ) की महिमा है, तथा इससे भी निर्विकार पुरुष उत्कृष्ट है । सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका त्रिपाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ) यह मन्त्रवर्णं उसी अर्थका अवगम कराता है । यहाँ श्रुति भूतशब्दसे जीवप्रधान स्थावर और जङ्गमोंका निर्देश करती है, क्योंकि ' अहिंसन् ० ' ( तीर्थों - शास्त्रोक्तं कर्मोंसे अन्यत्र सब भूतोंकी अहिंसा करता हुआ ) ऐसा प्रयोग है । अंश, पाद, माग इनका अन्य अर्थं नहीं है अर्थात् एकार्थं वाची शब्द हैं । इससे भी जीवमें अंशत्वका अवगम होता है ॥ ४४ ॥
और जीव में अंशत्वका अवगम किससे होता है? ' ममैवांशो ० ' ( इस जीव लोक ( देह ) में यह सनातन जीवात्मा मेरा अंश है ) इसप्रकार भगवद्-सत्यानन्दी - दीपिका ' तावानस्य ० ' इस मन्त्र में भूतशब्द से ' भवन्तीति भूतानि ' इस व्युत्पत्ति से कार्यमात्रका ग्रहण है, क्योंकि ' भर्हिसन् सर्वभूतान्यन्यन्त्र ' इस मन्त्र में भूतशब्द प्राणीमात्रका वाचक है । यद्यपि ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस मन्त्रमें भूतोंको पाद शब्दसे निर्देश किया गया है, तो भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि अंश, पाद, भाग एकार्थवाची शब्द हैं, इसलिए जीव ईश्वरका अंश है ॥ ४४ ॥
* अविद्यासे कल्पित भेदको लेकर जीव ईश्वरका अंशांशिभाव है । इसप्रकार शास्त्र