श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 561–570

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 561 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १७ सू ० ४६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित लोके प्रसिद्ध इति, यद्यप्येषा लोके प्रसिद्धिस्तथापि शास्त्रात्त्वत्रांशांशित्वमीशित्रीशितव्य-भावश्च निश्चीयते । निरतिशयोपाधिसंपन्नश्चेश्वरो निहीनोपाधिसंपन्नाञ्जीवान्प्रशास्तीति न किंचिद्विप्रतिषिध्यते ॥ ४५ ॥

अत्राह - ननु जीवस्येश्वरांशत्वाभ्युपगमे तदीयेन संसारदुःखोपभोगेनांशिन ईश्वरस्यापि दुःखित्वं स्यात् यथा लोके हस्तपादाद्यन्यतमाङ्गगतेन दुःखेनाङ्गिनो देवद-तस्य दुःखित्वं तद्वत् । ततश्च तत्प्राप्तानां महत्तरं दुःखं प्राप्नुयात्, अतो वरं पूर्वावस्थः संसार एवास्त्विति सम्यग्दर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः स्यादिति, अत्रोच्यते-प्रकाशादिवन्न वं परः ॥ ४६ ॥

पदच्छेद - प्रकाशादिवत्, न, एवम्, परः । सूत्रार्थ -- जैसा जीवात्मा दुःखी होता है, ( एवम् ) वैसे ( परः ) परमात्मा ( प्रकाशादिवत् ) प्रकाश आदि समान ( न ) दुःखी नहीं होता । यथा जीवः संसारदुःखमनुभवति, नैवं पर ईश्वरोऽनुभवतीति प्रतिजानीमहे । जीवो ह्यविद्यावेश्वशाद्देहाद्यात्मभावमिव गत्वा तत्कृतेन दुःखेन दुःख्यहमित्यविद्यया कृतं दुःखोपभोगमभिमन्यते नैवं परमेश्वरस्य देहाद्यात्मभावो दुःखाभिमानो वाऽस्ति । जीव-स्याप्यविद्याकृतनामरूपनिर्वृत्तदेहेन्द्रियाद्युपाध्य विवेक भ्रमनिमित्त एव दुःखाभिमानो नतु पारमार्थिकोऽस्ति । यथा च स्वदेहगतदाहंच्छेदादिनिमित्तं दुःखं तदभिमानभ्रा-गीता में भी जीवको ईश्वरका अंश स्मरण किया जाता है । इससे भी अंशत्वका अवगम ( ज्ञान ) होता है । जो यह कहा गया है कि स्वामी और सेवकमें ईशितृ और ईशितव्यमाव लोकमें प्रसिद्ध है । यद्यपि लोक में ऐसी प्रसिद्धि है, तथापि यहाँ शास्त्र से अंशांशित्व, ईशितृ और ईशितव्यभाव निश्चय किया जाता है । निरतिशय उपाधि सम्पन्न ईश्वर हीन उपाधि सम्पन्न जीवोंपर शासन करता है, इसमें कुछ भी विरुद्ध नहीं है ॥। ४५ ॥ यहाँ कहते हैं— जैसे लोकमें हाथ, पैर आदिमें से किसी एक अङ्गगत दुःखसे अङ्गी देवदत्तको दुःख होता है, वैसे जीवको ईश्वरका अंश स्वीकार करनेपर उसके संसार दुःख के उपभोग से अंशी ईश्वरको मी दुःख होगा । उससे उसे ( ब्रह्मको ) प्राप्त हुए जनोंको महान् दुःख ( समष्टि दुःख ) प्राप्त होगा । इसलिए पूर्वावस्था वाला संसार ही तो श्रेष्ठ है, इससे सम्यग्ज्ञानको निरर्थक प्रसङ्ग होगा । इसपर कहते हैं- -जैसे जीव संसारदुःखका अनुभव करता है, वैसे परमेश्वर अनुभव नहीं करता, ऐसी हम प्रतिज्ञा करते हैं । जीव अविद्याके आवेशके बलसे देह आदिमें आत्मभाव - सा प्राप्त कर तत्कृत दुःखसे ' मैं दुःखी हूँ ' इस प्रकार अविद्याकृत दुःखके उपभोगका अभिमान करता है, वैसे परमात्माको देह आदिमें आत्मभाव अथवा दुःखाभिमान नहीं है । जीवका भी अविद्याकृत नाम रूपसे निवृत्त संपादित देह, इन्द्रिय आदि उपाधिके अविवेक भ्रमनिमित्तक ही दुःखाभिमान है पारमार्थिक नहीं है । जैसे अपने देहगत दाह छेदन आदि निमित्तक दुःखका उस देहके आत्माभिमानको भ्रान्तिसे अनुभव करता सत्यानन्दी - दीपिका और शासक भाव भी औपाधिक ही है । इस विषयमें सुरेश्वाराचार्यने भी कहा है-ईशेशितव्यसम्बन्धः प्रत्यगज्ञानहेतुजः । सम्यग्ज्ञाने तमोध्वस्तावीश्वराणामपीश्वरः ॥ ( ईश और ईशितव्यका सम्बन्ध प्रत्यगात्माके अज्ञान हेतुसे उत्पन्न होता है । सम्यग्ज्ञान होनेपर अज्ञान-तमके ध्वस्त होनेसे वह ईश्वरोंका भी ईश्वर है ) ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 562

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 562 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५२८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ३ न्त्याऽनुभवति, तथा पुत्रमित्रादिगोचरमपि दुःखं तदभिमान भ्रान्त्येवानुभवत्यहमेव पुत्रोऽ हमेव मित्रमित्येवं स्नेहवशेन पुत्रमित्रादिष्वभिनिविशमानः । ततश्च निश्चितमेतदवगम्यते-मिथ्याभिमानभ्रमनिमित्त एव दुःखानुभव इति । व्यतिरेकदर्शनाञ्चैवमवगम्यते, तथा हि पुत्रमित्रादिमत्सु बहुषूपविष्टेषु तत्संबन्धाभिमानिष्वितरेषु च पुत्रो मृतो मित्रं मृतमित्येव-माद्युद्घोषिते येषामेव पुत्रमित्रादिमत्त्वाभिमानस्तेषामेव तन्निमित्तं दुःखमुत्पद्यते, नाभि-मानहीनानां परिवाजकादीनाम् । अतश्च लौकिकस्यापि पुंसः सम्यग्दर्शनार्थवत्त्वं दृष्टम्, किमुत विषयशून्यादात्मनोऽन्यद्वस्त्वन्तरमपश्यतो नित्यचैतन्यमात्रस्वरूपस्येति । तस्मान्नास्ति सम्यग्दर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः । प्रकाशादिवदिति निदर्शनोपन्यासः - यथा प्रकाशः सौरचान्द्रमसो वा वियद्व्याप्यावतिष्ठमानोऽङ्गुल्याद्युपाधिसंबन्धात्तेष्वृजुवका-दिभावं प्रतिपद्यमानेषु तत्तद्भावमिव प्रतिपद्यमानोऽपि न परमार्थतस्तद्भावं प्रतिपद्यते । यथा चाकाशो घटादिषु गच्छत्सु गच्छन्निव विभाव्यमानोपि न परमार्थतो गच्छति, यथा चोदशरावादिकम्पनात्तद्गते सूर्यप्रतिबिम्बे कम्पमानेऽपि न तद्वान्सूर्यः कम्पते, एवमविद्याप्रत्युपस्थापिते बुद्धवाद्युपहिते जीवाख्यैऽशे दुःखायमानेऽपि न तद्वानीश्वरो दुःखायते । जीवस्यापि दुःखप्राप्तिर विद्यानिमित्तैवेत्युक्तम् । तथा चाविद्यानिमित्तजीव-भावव्युदासेन ब्रह्मभावमेव जीवस्य प्रतिपादयन्ति वेदान्ताः - ' तत्त्वमसि ' इत्येवमादयः, तस्मान्नास्ति जैवेन दुःखेन परमात्मनो दुःखित्वप्रसङ्गः ॥ ४६ ॥

स्मरन्ति च ॥ ४७ ॥

पदच्छेद - स्मरन्ति } च । सूत्रार्थ - और जीव दुःखसे परमेश्वर दुःखीं नहीं होता, इस विषयमें ' तत्र या परमात्मा ० ' यह स्मृति भी है । है, वैसे ' मैं ही पुत्र हूँ ' ' मैं ही मित्र हूँ ' इस प्रकार स्नेहवश पुत्र, मित्र आदिमें अभिनिवेश करता हुआ पुत्र, मित्र आदि विषयक दुःखका भी उनके अभिमान भ्रान्तिसे अनुभव. करता है । उससे यह निश्चित अवगत होता कि मिथ्याभिमान भ्रम निमित्तक ही दुःखका अनुभव है और व्यतिरेक दर्शनसे भी ऐसा अवगत होता है । जैसे कि पुत्र, मित्र आदि परिवारवाले उनमें सम्बन्धके अभिमानी और उस सम्बन्ध अभिमान रहित बहुतोंके बैठे रहनेपर वहाँ ' पुत्र मरा, मित्र मरा ' इत्यादि उद्घोषित होनेपर उन्हें ही तन्निमित्तक दुःख उत्पन्न होता है जिन्हें पुत्र मित्र आदिमत्त्वका अभिमान है, उनके अभिमान रहित संन्यासी आदिको नही होता । इससे लौकिक पुरुषका भी सम्यग्दर्शन सार्थक देखा जाता है, तो विषय शून्य आत्मासे भिन्न वस्तुको न देखनेवाले, नित्य चैतन्यमात्र स्वरूपमें स्थित पुरुषके विषय में कहना ही क्या है, इसलिए सम्यग्दर्शनका अनर्थक प्रसङ्ग नहीं है । ' प्रकाश आदिके समान ' यह दृष्टान्तका उपन्यास है - जैसे सूर्य अथवा चन्द्रमाका प्रकाश व्याकाशको व्याप्तकर अवस्थित होता हुआ अङ्गुलि आदि उपाधिके सम्बन्धसे उनमें ऋजु वक्रभाव प्राप्त होनेपर तत् तत् भाव - सा प्राप्त होता हुआ भी परमार्थसे तद्भावको प्राप्त नहीं होता, अथवा जैसे घट आदिके चलते होनेपर चलता हुआ - सा प्रतीयमान मी आकाश परमार्थसे नहीं चलता, अथवा जैसे जलपात्र आदिके कम्पनसे उद्गत सूर्य प्रतिविम्बके काँपने पर भी उस प्रतिविम्बवाला सूर्य नहीं काँपता है, वैसे अविद्या से प्रत्युपस्थापित बुद्धि आदि उपहित जीव नामक अंशके दुःखित - सा होनेपर भी उस अंशवाला ईश्वर दुःखी नहीं होता । जीवकी दुःखप्राप्ति भी अविद्या निमित्तक ही है, ऐसा कहा जा चुका है । इस प्रकार ' तत्त्वमसि ' इत्यादि वेदान्त अविद्यानिमित्तक जीवभावका निरसन कर जीवके ब्रह्मभावका ही प्रतिपादन करते हैं । इसलिए जीव सम्बन्धी दुःखसे परमात्मामें दुःखित्व प्रसङ्ग नहीं है ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 563

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 563 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १७ सू ० ४७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५२ ९ * स्मरन्ति च व्यासादयो - यथा जैवेन दुःखेन न परमात्मा दुःखायत इति । ' तन्त्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः । न लिप्यते फलैश्रापि पद्मपत्रमिवाम्भसा || कर्मात्मा परो योऽसौ मोक्षबन्धैः स युज्यते । स सप्तदगकेनापि राशिना युज्यते पुनः ॥ ' इति । चशब्दात्स-मामनन्ति चेति वाक्यशेषः । ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ' ( श्वे ० ४।६ ) इति । ' एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ' ( कठ ० ५/११ ) इति । च ॥ ४७ ॥

अत्राह – यदि तक एव सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा स्यात्कथमनुज्ञापरिहारौ स्यातां लौकिक वैदिकौ चेति? ननु चांशो जीव ईश्वरस्येत्युक्तम् । तद्भ दाच्चानुज्ञापरि-हारौ तदाश्रयावव्यतिकीर्णावुपपद्येते, किमत्र चोद्यत इति? उच्यते- नैतदेवम्, अनंशत्व-मपि हि जीवस्याभेदवादिन्यः श्रुतयः प्रतिपादयन्ति - ' यत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' ( तै ० २।६।१ ), ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( बृह ०३।७।२३ ), ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( बृह १०४ ०१ / ४ / -१ ९ ) ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ) अहं ब्रह्मास्मि ' ( बृह ० १ | ४ | १० ) इत्येवं जातीयकाः । ननु भेदा-भेदावगमाभ्यामंशत्वं सिद्धयतीत्युक्तम् । स्यादेतदेवम् - यद्युभावपि भेदाभेदौ प्रतिपिपाद-यिषितौ स्याताम्, अभेद एव त्वत्र प्रतिपिपादयिषितः, ब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तौ पुरुषार्थसिद्धेः । स्वभावप्राप्तस्तु भेदोऽनूद्यते । नच निरवयवस्य ब्रह्मणो मुख्योंऽशो जीवः संभवतीत्यु -क्तम् । तस्मात्पर एवैकः सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा जीवभावेनावस्थित इत्यतो वक्तव्याऽ-नुज्ञापरिहारोपपत्तिः । तां ब्रूमः -' तत्र यः परमात्मा ० ' ( उन दोनोंमें जो परमात्मा है वह नित्य निर्गुण कहा गया है, जैसे कमलपत्र जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे यह कर्मफलोंसे लिप्त नहीं होता है । और जो अन्य कर्मात्मा ( जीवात्मा ) है वह बन्ध और मोक्षसे युक्त होता है, वह इस सतरह राशिसे पुनः युक्त होता है ) इस प्रकार व्यास आदि कहते हैं कि जीव- सम्बन्धी दुःखसे परमात्मा दुःखी नहीं होता है । ' च ' शब्दसे ' समामनन्ति ' ( और श्रुतियाँ कहती हैं ) ऐसा वाक्यशेष है । ' तयोरन्यः ० ', ( उनमें एक उसके स्वादिष्ट फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ) ' एकस्तथा ० ' ( उसीप्रकार सम्पूर्ण भूतका एक ही अन्तरात्मा संसारके दुःखसे लिप्त नहीं होता, किन्तु उससे बाहर रहता है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं । ४७ ॥ इसपर हम कहते हैं - यदि एक ही सब भूतोंका अन्तरात्मा हो तो लौकिक और वैदिक विधि और निषेध कैसे होंगे? परन्तु ऐसा कहा जा चुका है कि जीव ईश्वरका अंश है । जीव और ईश्वरमें भेद होनेसे तदाश्रय अनुज्ञा ( विधि ) और परिहार ( प्रतिषेध ) असंकर होकर उपपन्न होंगे, तो यहाँ शङ्का किस प्रकार करते हो? कहते हैं - यह ऐसा नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ० ' ( उसे उत्पन्न कर उसमें ही अनुप्रवेश किया ) ' नान्यो ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) ' मृत्योः स ० ' ( जो इसमें नाना - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इसप्रकारकी अभेद प्रतिपादक श्रुतियाँ जीवको अनंश प्रतिपादित करती हैं । परन्तु भेद और अभेदके अवगमसे अंशत्व सिद्ध होता है, ऐसा कहा गया है । यह ऐसा होता यदि भेद और अभेद दोनोंका प्रतिपादन करना इष्ट होता, परन्तु अभेद ही यहाँ प्रतिपादित करना अभीष्ट है, क्योंकि ब्रह्मात्मत्व प्रतिपत्ति होनेपर पुरुषार्थं की सिद्धि है । अविद्याकृत भेदका तो केवल अनुवाद किया जाता है और यह भी कहा जा चुका है कि निरवयव ब्रह्मका मुख्य अंश जीव नहीं हो सकता । इसलिए एक परमात्मा ही सब भूतोंका अन्तरात्मा जीवरूपसें सत्यानन्दी - दीपिका बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया । शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते ॥ पञ्चदशी १ - २३ ॥ * पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्रणा, मन और बुद्धि इस सतरह तत्त्वोंके समुदायको प्राप्त करना बन्ध है और ज्ञानद्वारा उनसे मुक्त होना मोक्ष है । यह जीवमें होता है, किन्तु नित्यमुक्त परमात्मामें नहीं ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 564

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 564 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ प्रा ० ३ अनुज्ञापरिहारौ देहसंबन्धाज्ज्योतिरादिवत् ॥ ४८ ॥

पदच्छेद - अनुज्ञापरिहारी, देहसम्बन्धात्, ज्योतिरादिवत् । सूत्रार्थ - ( अनुज्ञापरिहारौ ) ' मित्रं सेव्यम् ' ' शत्रुः परिहर्तव्य: ' इस प्रकार अनुज्ञा और परिहार एक आत्मामें भी ( देहसम्बन्धात् ) ) देहके साथ तादात्म्य सम्बन्धसे उपपन्न हैं, ( ज्योतिरादिवत् ) जैसे अग्नि एक होनेपर भी श्मशानकी अग्नि परिहरणीय है अन्य नहीं । * ' ऋतौ भार्यामुपेयात् ' इत्यनुज्ञा, ' गुर्वङ्गनां नोपगच्छेत् ' इति परिहारः, तथा ' अग्नीषो-मीयं पशुं संज्ञपयेत् ' इत्यनुज्ञा, ' न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' इति परिहारः, एवं लोकेऽपि मित्रमु-पसेवितव्यमित्यनुज्ञा, शत्रुः परिहर्तव्य इति परिहारः, एवंप्रकारावनुज्ञापरिहारा वेकत्वेऽ-प्यात्मनो देहसंबन्धात्स्याताम् । देहैः संबन्धो देहसंबन्धः । कः पुनर्देहसंबन्धः? देहादि-रयं संघातोऽहमेवेत्यात्मनि विपरीतप्रत्ययोत्पत्तिः । दृष्टा च सा सर्वप्राणिनामहं गच्छा-म्यहमागच्छाम्यहमन्धोऽहमनन्धोऽहं मूढोऽहममूढ इतीत्येवमात्मिका । न ह्यस्याः सम्यग्दर्शनादन्यन्निवारकमस्ति । प्राक्तु सम्यग्दर्शनात्प्रततैषा भ्रान्तिः सर्वजन्तुषु । तदे-वमविद्यानिमित्त देहाद्युपाधिसंबन्ध कृताद्विशेषादैकात्म्याभ्युपगमेऽप्यनुज्ञापरिहाराववक-प्येते । सम्यग्दर्शिनस्तर्ह्यनुज्ञापरिहारानर्थक्यं प्राप्तम् । न, तस्य कृतार्थत्वान्नियोज्यत्वानु-पपत्तेः । हेयोपादेययोर्हि नियोज्यो नियोक्तव्यः स्यात् । आत्मनस्त्वतिरिक्तं हेयमुपादेयं वा वस्त्वपश्यन्कथं नियुज्येत? न चात्मात्मन्येव नियोज्यः स्यात् । शरीरव्यतिरेकदर्शिन अवस्थित है, इससे अनुज्ञा और परिहारकी उपपत्ति कहनी चाहिए? उसको हम कहते हैं-' ऋतौ मार्यामुपेयात् ' ( मासिक धर्मकी शुद्धि के अनन्तर स्त्रीके साथ गृहस्थ करना चाहिए ) यह विधि है और ' गुर्वङ्गनां ० ' ( गुरु पत्नी के साथ प्रसङ्ग नहीं करना चाहिए ) यह निषेध है । ' अग्नीषोमीयं ० ' ( अग्नीषोमीय पशुका वध करना चाहिए ) यह विधि है और ' न हिंस्यात् ० ' ( किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिए ) यह निषेध है । इस प्रकार लोकमें मी ' मित्रमुपसेवितव्यम् ' ( मित्रका उपसेवन करना चाहिए ) यह विधि है और ' शत्रुः परिहर्तव्यः ' ( शत्रुका त्याग करना चाहिए ) यह निषेध है | इस प्रकारके विधि और प्रतिषेध आत्माके एक होनेपर भी देहके सम्बन्धसे होंगे । देहोंके साथ सम्बन्ध देह सम्बन्ध है | परन्तु देहसम्बन्ध क्या है? यह देहादि संघात ' मैं ही हूँ ' इस प्रकार आत्मामें विपरीत प्रत्ययकी उत्पत्ति | वह ' मैं जाता हूँ, मैं आता हूँ, मैं अन्ध हूँ, मैं अन्ध नहीं हूँ, मैं मूढ हूँ, मैं मूढ नहीं हूँ, इस रूपसे सब प्राणियों में देखी जाती है । इसका सम्यग्दर्शनसे भिन्न निवारक नहीं है । तत्त्व-ज्ञान पूर्व यह भ्रान्ति सब प्राणियों में सन्तत ( निरन्तर ) है । इस कारण अविद्या निमित्त देह आदि उपाधिके सम्बन्ध से किये गये विशेष ( भेद ) से एकात्मत्व स्वीकार करनेपर भी विधि और प्रतिषेध हो सकते हैं । तब सम्यग्दर्शीके विधि और प्रतिषेध व्यर्थ हो जायँगे । नहीं, क्योंकि वह कृतार्थं होनेसे नियोज्य नहीं हो सकता है, इसलिए हेय और उपादेय में ही नियोज्य नियुक्त करने योग्य होता है । परन्तु आत्मासे भिन्न हेय और उपादेय वस्तुको न देखता हुआ वह कैसे नियुक्त होगा? और आत्मा अपनेमें ही नियोज्य नहीं होता । यदि कहो कि शरीरसे पृथक् अपनेको जाननेवाला ही नियोज्य है, सत्यानन्दी -दीपिका * यहाँ ' इदं मया कर्तव्यम् ( यह मुझे करना चाहिए ) ऐसी बुद्धि जिसमें हो वह नियोज्य कहा जाता है | भ्रान्ति अभावकाल ( सुषुप्ति ) में जब अज्ञानी भी नियोज्य नहीं है, तब आत्मवित् के विषयमें तो फिर जहना ही क्या है । अनात्मामें आत्माभिमान ही तो प्रवर्तक है, वह तत्त्ववित्का आत्मज्ञान से निवृत्त हो जाता है, अतः वह किससे भी प्रवृत्त्य नहीं है । जैसे - क्रव्यात् क्रव्यं मांसमत्ति इति क्रव्यात् अग्निः '

पृष्ठ 565

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 565 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १७ सू ० ४ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५३१ एव नियोज्यत्वमिति चेत् - न, तत्संहतत्वाभिमानात् । सत्यं व्यतिरेकदर्शिनो नियोज्यत्वं तथापिव्योमादिवद्देहाद्यसंहतत्वमपश्यत एवात्मनो नियोज्यत्वाभिमानः । नहि देहाद्यसंह-तत्वदर्शिनः कस्यचिदपि नियोगो दृष्टः, किमुतैकात्म्यदर्शिनः । नच नियोगाभावात्सम्यग्द शिनो यथेष्टचेष्टाप्रसङ्गः । सर्वत्राभिमानस्यैव प्रवर्तकत्वादभिमानाभावाच्च सम्यग्दर्शिनः । तस्माद्देहसंबन्धादेवानुज्ञापरिहारौ, ज्योतिरादिवत् । यथा ज्योतिष एकत्वेऽप्यग्निः क्रव्यात्परिहियते, नेतरः । यथा च प्रकाश एकस्यापि सवितुरमेध्यदेश संबद्धः परिहियते, नेतरः शुचिभूमिष्ठः । तथा भौमाः प्रदेशा वज्रवैडूर्यादय उपादोयन्ते, भौमा अपि सन्तो नरकलेवरादयः परिहियन्ते । तथा मूत्रपुरीषं गवां पवित्रतया परिगृह्यते तदेव जात्यन्तरे परिवर्ज्यते, तद्वत् ॥४८ ॥

असंत तेश्चाव्यतिकरः ॥ ४ ९ ॥ पदच्छेद – असन्वतेः, च, अव्यतिकरः । सूत्रार्थ - ( च ) परन्तु ( असन्ततेः ) जीवात्माका सब शरीरोंके साथ सम्बन्ध न होनेसे ( अव्यतिकर: ) कर्मफलका संकर नहीं होगा । * स्यातां नामनुज्ञापरिहारावेकस्याप्यात्मनो देहविशेषयोगात् । यस्त्यं कर्मफल-संबन्धः स चैकात्म्याभ्युपगमे व्यतिकीर्येत स्वास्येकत्वादिति चेत् - नैतदेवम्, असंततेः । नहि कर्तुर्भोक्तुश्चात्मनः संततः सर्वैः शरीरैः संबन्धोऽस्ति । उपाधितन्त्रो हि जीव इत्युक्तम् । उपाध्यसंतानाच्च नास्ति जीवसंतानः । ततश्च कर्मव्यतिकरः फलव्यतिकरो वा न भविष्यति ॥ ४ ९ ॥ तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि देह आदि संघातमें अभिमान वाला है । यद्यपि यह ठीक हैं कि देह आदि संघातसे मिन्न अपनेको जाननेवाला नियोज्य है, तथापि आकाश आदिके समान देह आदिसे असंहत अपनेको न जाननेवालेमें नियोज्यत्व अभिमान है । देह आदिसें असंहतत्व देखनेवाले किसी-का भी नियोग नहीं देखा गया है, तब आत्मैकत्वदर्शीके विषय में तो कहना हो क्या है । नियोगके न होनेसे सम्यग्दर्शीमें यथेष्ट चेष्टाका प्रसङ्ग भी नहीं है, क्योंकि सर्वत्र अभिमान ही प्रवर्तक है सम्य-दर्शमें अभिमान नहीं है । अतः देहके सम्बन्धसे ही ज्योति आदिके समान विधि और निषेध हैं । जैसे ज्योति एक होनेपर मी क्रव्यात् अति ( श्मशानकी अग्नि ) का परिहार किया जाता है, अन्यका नहीं । अथवा जैव एक सूर्यका भी अपवित्र देश सम्बद्ध प्रकाश परिहृत होता है अन्य पवित्र भूमिस्थ प्रकाश परिहृत नहीं होता । और वज्र, वैडूर्य आदि भूमि प्रदेशोंका उपादान ( ग्रहण ) होता है, परन्तु नरकलेवर आदि मौम होते हुए भी परिहृत होते हैं । और जैसे गौका मूत्र और गोबर पवित्ररूपसे गृहीत होते हैं, वे ही अन्य जातिके त्याग किये जाते हैं । ऐसा यहाँ प्रकरणमें भी समझना चाहिए | ४८ | आत्माके एक होनेपर मी देह विशेष सम्बन्धसे विधि और निषेध होंगे । परन्तु जो यह कर्म-फल सम्बन्ध है उसका एक आत्माके स्वीकार करनेमें संकर हो जायगा, क्योंकि स्वामी एक है । ऐसा यदि कहो तो यह ऐसा नहीं हैं, क्योंकि असन्तति है । कर्ता भोक्ता आत्माका सब शरीरोंके साथ सन्तत सम्बन्ध नहीं है । यह कहा जा चुका है कि जीव उपाधिके अधीन है । उपाधिके सन्तत न सत्यानन्दी - दीपिका श्मशान अग्निका परिहार किया जाता है अन्यका नहीं, वैसे आत्मा एक होनेपर भी उपाधिके सम्बन्धसे अनुज्ञा और परिहारके योग्य होता है और उपाधि रहित होने से वह अनुज्ञा और परिहारसे मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥

* तद्गुणसारत्वात् ' ( ब्र ० सू ० २।३।३० ) इस सूत्र से बुद्धि उपहित आत्माको ही कर्ता मोक्ता स्थापित किया गया है । देह भेदसे बुद्धि भेद, बुद्धि भेदसे कर्ता मोक्ताका भी भेद माना गया है ।

पृष्ठ 566

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 566 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ३ आमास एव च ॥ ५० ॥

पदच्छेद - आभासः " एव, च । सूत्रार्थ - ( च ) और ( आभास एव ) जीव परमात्माका अभास ही है, अतः कर्म अथवा कर्मफलका संकर नहीं है । * आभास एव चैष जीवः परस्यात्मनो जलसूर्यकादिवत्प्रतिपत्तव्यः । न स एव साक्षात् । नापि वस्त्वन्तरम् । अतश्च यथा नैकस्मिञ्जलसूर्यके कम्पमाने जलसूर्यकान्तरं कम्पते, एवं नै कस्मिञ्जीवे कर्मफलसंबन्धिनि जीवान्तरस्य तत्संबन्धः । एवमप्यव्यतिकर एव कर्मफलयोः । आभासस्य चाविद्याकृतत्वात्तदाश्रयस्य संसारस्याविद्याकृतत्वोपपत्तिरिति, तद्व्युदासेन च पारमार्थिकस्य ब्रह्मात्मभावस्योपदेशोपपत्तिः । येषां तु बहव आत्मनस्तेच सर्वे सर्वगतास्तेषामेवैष व्यतिकरः प्राप्नोति । कथम्? बहदो विभवश्वात्मानश्चैतन्यमात्र-स्वरूपा निगुणा निरतिशयाश्च । तदर्थं साधारणं प्रधानं तन्निमित्तैषां भोगापवर्गसिद्धिरिति सांख्याः । सति बहुत्वे विभुत्वे च घटकुड्यादिसमाना द्रव्यमात्रस्वरूपाः स्वतोऽचेतना आत्मानस्तदुपकरणानि चाणूनि मनांस्यचेतनानि । तत्रात्मद्रव्याणां मनोद्रव्याणां च संयो-गान्नवेच्छादयो वैशेषिका आत्मगुणा उत्पद्यन्ते । ते चाव्यतिकरेण प्रत्येकमात्मसु समवयन्ति स संसारः । तेषां नवानामात्मगुणानामत्यन्तानुत्पादो मोक्ष इति काणादाः । तत्र सांख्यानां

होनेसे जीव भी सन्तत नहीं है । उससे कर्म संकर अथवा फलसंकर नहीं होगा ॥ ४ ९ ॥

जगत सूर्य प्रतिबिम्ब आदिके समान यह जीव परमात्माका आभास - प्रतिबिम्ब ही समझना चाहिए । वह साक्षात् परमात्मा ही नहीं है और अन्य वस्तु मी नहीं है, इससे जैसे एक जलसूर्यक ( जलगत सूर्य प्रतिबिम्ब ) के काँपनेपर अन्य जलसूयंक नहीं काँपता है, वैसे ही एक जीव कर्मफल सम्बन्धी होनेपर अन्य जीवका उस ( कर्मफल ) के साथ सम्बन्ध नहीं होता । इस प्रकार भी कमं और फलका असंकर ही है और आभास अविद्याकृत होनेसे उसके आश्रित संसारमें भी अविद्याकृतत्व उपपन्न है उसके निराकरण से पारमार्थिक ब्रह्मात्वभावका उपदेश उपपन्न होता है । परन्तु जिनके मत आत्मा अनेक हैं और वे सब सर्वगत ( व्यापक ) हैं उनके मतमें ही यह संकर प्राप्त होता है । किस प्रकार? आत्मा बहुत, विभु, चैतन्यमात्र स्वरूप, निर्गुण और निरतिशय हैं, उनके लिए प्रधान साधारण हैं, तन्निमित्तक उनका मोग और अपवगं सिद्ध होता है, ऐसा सांख्य मानते हैं । आत्मा अनेक और विभू होने पर घट, कोठरी आदिके समान द्रव्यमात्र स्वरूप, स्वत: आत्मा अचेतन हैं और उनके उपकरण मन अणु और अचेतन हैं । उनमें आत्मद्रव्य और मनोद्रव्य के संयोग से इच्छा आदि नौ आत्माके विशेष गुण उत्पन्न होते हैं । वे संकरके विना प्रत्येक आत्मामें समवायसम्बन्धसे रहते हैं वह संसार है, और उन नौ आत्मगुणोंकी अत्यन्त अनुत्पत्ति मोक्ष है, ऐसा काणाद मानते हैं । सत्यानन्दी - दीपिका एक बुद्धिका दूसरे शरीर के साथ सम्बन्ध न होनेसे तदुपहितका भी सम्बन्ध नहीं है, अतः शरीर भेदसे जीवका भेद होनेपर कर्म अथवा कर्मफलका संकर नहीं होगा ॥ ४ ९ ॥ * जैसे घटाकाश घट उपाधिसे महाकाशका अंश - सा है, वैसे जीव बुद्धि उपाधि से परमात्माका अंश - सा है, यह कहा जा चुका है । परन्तु इस अवच्छेदवादमें अरुचि प्रदर्शित करनेके लिए ' एव ' और ' एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ' ( क ० २२४ ९ ) इत्यादि श्रुति सिद्ध प्रतिबिम्बवादको सूचित करनेके लिए भगवान् सूत्रकारने ' आभास एव च ' इस सूत्र में ' आभास ' पद दिया है | अनुपहित परमात्मा जीव नहीं हो सकता है, क्योंकि उपाधिका अनुभव होता है और जीव

पृष्ठ 567

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 567 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १७ सू ० ५१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५३३ तावच्चैतन्य स्वरूपत्वात्सर्वात्मनां संनिधानाद्यविशेषाच्चै कस्य सुखदुःखसंबन्धे सर्वेषां सुख-दुःखसंबन्धः प्राप्नोति । स्यादेतत् - प्रधानप्रवृत्तेः पुरुषकैवल्यार्थत्वाद् व्यवस्था भविष्यति । अन्यथा हि स्वविभूतिख्यापनार्था प्रधानप्रवृत्तिः स्यात् । तथा चानिर्मोक्षः प्रसज्येतेति । नैतत्सारम्, नह्यभिलषित सिद्धिनिबन्धना व्यवस्था शक्या विज्ञातुम् । उपपत्त्या तु कया-चिद्व्यवस्थोच्येत । असत्यां पुनरुपपत्तौ कामं मा भूदभिलषितं पुरुषकैवल्यम्, प्राप्नोति तु व्यवस्थाहेत्वभावाद्व्यतिकरः । काणादानामपि यदैकेनात्मना मनः संयुज्यते, तदाऽऽत्मा-न्तरैरपि नान्तरीयकः संयोगः स्यात्संनिधानाद्यविशेषात् । ततश्च हेत्व विशेषात्फला विशेष इत्येकस्यात्मनः सुखदुःखयोगे सर्वात्मनामपि समानं सुखदुःखित्वं प्रसज्येत ॥ ५० ॥

स्यादेतत् - अदृष्टनिमित्तो नियमो भविष्यतीति । नेत्याह-अदृष्टानियमात् ॥ ५१ ॥

सूत्रार्थ - अदृष्ट के नियम न होनेसे कर्मफलका संकर हो I बहुष्वात्मवाकाशवत्सर्वगतेषु प्रतिशरीरं बाह्याभ्यन्तरराविशेषेण संनिहितेषु मनो-वाक्कायैर्धर्माधर्मलक्षणमदृष्टमुपायते । सांख्यानां तावत्तदनात्मसमवायि प्रधानवर्ति उनमें सांख्योंके मतमें चैतन्यस्वरूप होने से सब आत्माओंके संनिधान आदिके अविशेष होनेके कारण एक आत्माके सुख दुःखके साथ सम्बन्ध होनेपर सबको सुख दुःखका सम्बन्ध प्राप्त होता है । ऐसा ही हो, परन्तु प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके कैवल्य के लिए होनेसे [ सुख - दुःखकी ] व्यवस्था हो जायगो, अन्यथा प्रधानकी प्रवृत्ति अपनी विभूति प्रसिद्धि के लिए होगी, तो इससे मोक्षाभाव प्रसक्त होगा । यह युक्त नहीं है, क्योंकि अभिलषित सिद्धिके अधीन व्यवस्था अवगत नहीं हो सकती, यदि कहो कि किसी उपपत्ति से व्यवस्था हो जायगी, तो उपपत्तिके न होनेपर यथेष्ट अभिलषित पुरुष कैवल्य नहीं होगा, अपितु व्यवस्थाका हेतु न होनेसे संकर प्राप्त होता है । कणाद अनुयायियों के मतमें भी जब एक आत्माके साथ मनका संयोग होता है, तब अन्य आत्माओंके साथ भी अवश्य संयोग होगा, क्योंकि निधन आदि समान हैं । उससे हेतु ( मन संयोग ) के अविशेष होने से फल मी अविशेष ( समान ) होगा, तो इस प्रकार एक आत्मामें सुख - दुःखका सम्बन्ध होनेपर सब आत्माओं में भी समान सुख दुःख प्रसक्त होंगे ॥ ५० ॥

यह हो कि अदृष्ट निमित्तक नियम हो जायगा, इसपर कहते हैं कि ऐसा नहीं -आकाशके समान सर्वगत प्रत्येक शरीर में अन्तर बाहर समानरूपसे संनिहित अनेक आत्माओं में मन, वाणी और शरीर द्वारा धर्माधर्मरूप अदृष्ट उपार्जन किया जाता है । सांख्यों के मत में वह मदृष्ट अनात्मसमवायी प्रधानवतीं है । प्रधानके साधारण होनेसे प्रत्येक आत्मामें वह सुख दुःखके उपभोगका सत्यानन्दी - दीपिका परमात्मासे भिन्न भी नहीं है, क्योंकि ' स एष इह प्रविष्टः ' ( बृह ० १ ४ ०७ ) इत्यादि अभेद प्रतिपादक श्रुतिसे विरोध होता है, अतः अविद्या, तत्कार्यं बुद्धिमें परमात्माका प्रतिबिम्ब ही जीव है । वैशेषिक मतमें आत्मा अनेक जड़ और द्रव्य हैं, और मन जड़ अनेक और द्रव्य हैं । उन दोनोंके संयोगसे आत्मामें बुद्धि ( ज्ञान ) इच्छा, प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष, धर्म, अधर्म और भावना नामका संस्कार ये नौ विशेष गुण उत्पन्न होते हैं । इनसे आत्माको संसार होता है । जब सब पदार्थोंका तत्त्वज्ञान होता है तो पुनः ये गुण उत्पन्न नहीं होते यही आत्माका मोक्ष है अर्थात् इनके मतमें श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण और मन ये छः इन्दियाँ, छः उनके विषय, छः विषयोंके ज्ञान, सुख, दुःख और शरीर, इस प्रकार इक्कीस दुःखोंका ध्वंसरूप मोक्ष है उनके मतमें भी आत्मा सर्वगत होनेसे कर्मफलका संकर प्राप्त होता है ॥५० ॥

पृष्ठ 568

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 568 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ०३ प्रधानसाधारण्यान्न प्रत्यात्मं सुखदुःखोपभोगस्य नियामकमुपपद्यते । काणादानामपि पूर्ववत्साधारणेनात्ममनः संयोगेन निर्वर्तितस्यादृष्टस्याप्यस्यैवात्मन इदमदृष्टमिति नियमे हेत्वभावादेष एव दोषः ॥ ५१ ॥

स्यादेतत् - अहमिदं फलं प्राप्नवानीदं परिहराणीत्थं प्रयता इत्थं करवाणीत्येवंविधा अभि-संध्यादयः प्रत्यात्मं प्रवर्तमाना अदृष्टस्यात्मनां च स्वस्वामिभावं नियंस्यन्तीति । नेत्याह-अभिसंध्यादिष्वपि चैवम् ॥ ५२ ॥

पदच्छेद - अभिसन्ध्यादिषु, च, एवम् । सूत्रार्थ - ( अभिसन्ध्यादिष्वपि ) संकल्प आदिमें मी ( चैवम् ) अदृष्टका नियामकत्व नहीं है, अतः पूर्वोक्त दोष वैसे ही है । अभिसंध्यादीनामपि साधारणेनैवात्ममनः संयोगेन सर्वात्मसंनिधौ क्रियमाणानां नियमहेतुत्वानुपपत्तेरुक्तदोषानुषङ्ग एव ॥ ५२ ॥

प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ ५३ ॥

पदच्छेद – प्रदेशात्, इति, चेत्, न, अन्तर्भावात् । सूत्रार्थ - ( प्रदेशात् ) आत्माओंके विभु होनेपर भी शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेश में मन संयोग हो, उसी आत्मप्रदेशसे संकलन आदिका नियम होगा, ( इति चेन्न ) ऐसा नहीं, ( अन्तर्भावात् ) क्योंकि सब शरीरोंमें उन आत्माओंका अन्तर्भाव है, अतः उक्त दोष ज्योंका त्यों है । अथोच्येत - विभुत्वेऽप्यात्मनः शरीरप्रतिष्ठेन मनसा संयोगः शरीरावच्छिन्न एवात्मप्रदेशे भविष्यति, अतः प्रदेशकृता व्यवस्थाऽभिसंध्यादीनामदृष्टस्य सुखदुःखयोश्च भविष्यतीति । तदपि नोपपद्यते, कस्मात्? अन्तर्भावात् । विभुत्वाविशेषाद्धि सर्व एवात्मानः सर्वशरीरेष्व-न्तर्भवन्ति । तत्र न वैशेषिकैः शरीरावच्छिन्नोऽध्वात्मनः प्रदेशः कल्पयितुं शक्यः । कल्प्यमा-नोऽप्ययं निष्प्रदेशस्यात्मनः प्रदेशः काल्पनिकत्वादेव न पारमार्थिकं कार्यं नियन्तुं शक्नो-ति । शरीरमपि सर्वात्मसंनिधावुत्पद्यमानमस्यैवात्मनो नेतरेषामिति न नियन्तुं शक्यम् । नियामक उपपन्न नहीं होता । काणादोंके मतमें भी पूर्वके समान साधारण आत्मा और मनके संयोग से संपादित अदृष्टके ' यह अदृष्ट इसी आत्माका है ' इस नियममें हेतुके न होनेसे यही दोष है ॥ ५१ ॥

ऐसा हो परन्तु मैं इस फलको प्राप्त करूँ, इसका परिहार करूँ, इसप्रकार प्रयत्नकर ऐसा करूँ ’ इसप्रकारके संकल्प आदि प्रत्येक में प्रवर्तमान होते हुए अदृष्ट और आत्माके स्वस्वमिभावका नियमन करेंगे । नहीं, ऐसा कहते हैं-साधारण आत्ममन संयोगसे सम्पूर्ण आत्मायोंकी संनिधिमें उत्पन्न किये हुए संकल्प आदिमें मी नियमका हेतुत्व नहीं हो सकता, अतः उक्त - अनियम दोष तदवस्थ ही है ॥ ५२ ॥

यदि ऐसा कहा जाय कि आत्माके विभू होनेपर भी शरीर में स्थित मनके साथ उसका संयोग शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशमें ही होगा, इससे संकल्प आदिकी, अदृष्टकी, सुख दुःखको प्रदेशकृत व्यवस्था होगी, वह भी उपपन्न नहीं है, किससे? इससे कि उनका अन्तर्भाव है । सब आत्माओंका विभूत्व समान होनेसे सब शरीरोंमें अन्तर्भाव है । इसप्रकार सब आत्माओंका समस्त शरीरोंमें अन्तर्भाव होनेपर वैशे-षिक लोग शरीरावच्छिन्न प्रदेशकी भी आत्मामें कल्पना नहीं कर सकते । निष्प्रदेश- निरवयव आत्मामें कल्पित किया हुआ यह प्रदेश मी काल्पनिक होनेसे पारमार्थिक कार्यके नियमन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । सब आत्माओं की संनिधिमें उत्पन्न हुआ शरीर भी इसी आत्माका है अन्योंका नहीं है, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता । प्रदेश विशेष स्वीकार करनेपर भी समान सुख दुःखके भागी दो आत्माओं का

पृष्ठ 569

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 569 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० १७ सू ० ५३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दौकासहित ५३५ प्रदेशविशेषाभ्युपगमेऽपि च द्वयोरात्मनोः समानसुखदुःखभाजोः कदाचिदेकेनैव ताव-च्छरीरेणोपभोगसिद्धिः स्यात्, समानप्रदेशस्यापि द्वयोरात्मनोरदृष्टस्य संभावत् । तथा हि - देवदत्तो यस्मिन्प्रदेशे सुखदुःखमन्वभूत्तस्मात्प्रदेशादपक्रान्ते तच्छरीरे यज्ञदत्त-शरीरे च तं प्रदेशमनुप्राप्ते तस्यापीतरेण समानः सुखदुःखानुभवो दृश्यते स न स्याद्यदि देवदत्तयज्ञदत्तयोः समानप्रदेशमदृष्टं न स्यात् । स्वर्गाद्यनुपभोगप्रसङ्गश्च प्रदेशवादिनः स्यात्, ब्राह्मणादिशरीरप्रदेशेष्वदृष्टनिष्पत्तेः प्रदेशान्तरवर्तित्वाच्च स्वर्गाद्युपभोगस्य, सर्वगतत्वानुपपत्तिश्च बहूनामात्मनां दृष्टान्ताभावात् । वद तावत्त्वं के बहवः समान-प्रदेशाश्चेति । रूपादय इति चेत् - न, तेषामपि धर्म्यंशेनाभेदाल्लक्षणभेदाच्च । नतु बहूना-मात्मनां लक्षणभेदोऽस्ति । अन्त्यविशेषवशाद्भेदोपपत्तिरिति चेत् - न, भेदकल्पनाया अन्त्यविशेषकल्पनायाश्चेतरेतराश्रयत्वात् । आकाशादीनामपि विभुत्वं ब्रह्मवादिनोऽसिद्धं कार्यत्वाभ्युपगमात् " तस्मादात्मैकत्वपक्ष एव सर्वदोषाभाव इति सिद्धम् ॥ ५३ ॥

इति श्रीमच्छङ्करमगवरपूज्यपादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥ ३ ॥

उपभोग कदाचित् एक ही शरीरसे सिद्ध हो जायगा, क्योंकि दो आत्माओंका अदृष्ट एक प्रदेशमें मी संभव है । जैसे कि जिस प्रदेशमें देवदत्तने सुख दुःखका अनुभव किया उसका शरीर उस प्रदेशसे दूर हो और यज्ञदत्तका शरीर उस प्रदेश में प्राप्त हो, तो उसको भी दूसरेके समान सुख दुःखका अनु-भव देखा जाता है, वह अनुभव यदि देवदत्त और यज्ञदत्तका अदृष्ट समान प्रदेश वाला न हो तो नहीं होगा । और प्रदेशवादीको स्वर्ग आदिके अनुपभोगका प्रसङ्ग आ जायगा, क्योंकि ब्राह्मण आदि शरीर प्रदेशों में अदृष्ट निष्पन्न होता है और स्वर्ग आदि उपभोग प्रदेशान्तरवर्ती है । अनेक आत्माओंका सर्वगत होना युक्त नहीं है, कारण कि इसमें दृष्टान्त नहीं है । तुम कहो तो बहुत और समान प्रदेशवाले कौन - से पदार्थं हैं? यदि कहो कि रूप आदि हैं, तो युक्त नहीं है, क्योंकि उनका भी धर्मीके अंशरूपसे अभेद और लक्षणमें भेद है । परन्तु बहुत आत्माओं में लक्षण भेद नहीं है । यदि कहो कि अन्त्य-विशेष के बलसे भेदकी उपपत्ति है तो यह ठीक नहीं है, कारण कि भेद कल्पना और अन्त्यविशेषकी कल्पनामें अन्योन्याश्रय है । ब्रह्मवादीके मतमें आकाश आदिका भी विभुत्व असिद्ध है, क्योंकि उनमें कार्यत्व स्वीकार है । इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्माके एकत्व पक्षमें ही सब दोषोंका अभाव है || ५३ ॥ स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य- भाषानुवाद के द्वितीयाध्यायका तृतीयपाद समाप्त ॥३ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * यदि कहो कि रूप आदि अनेक समान प्रदेशवाले हैं? कारण कि घट आदि में सब विद्यमान हैं, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह दृष्टान्त हमें सम्मत नहीं है । रूप तेजोमात्र है, रस जलमात्र है और गन्ध पृथिवीमात्र है, इस प्रकार तत् तत् गुण स्व स्व धर्मीके अंशरूपसे धर्मी से अभिन्न हैं, अतः तेज आदि धर्मी से भिन्न घटका अभाव है । इस प्रकार आत्मामें लक्षण भेद न होनेसे भेद नहीं है | अतः ' देवदत्तात्मा यज्ञदत्तात्मनो न भिन्नः, आत्मत्वात् यज्ञदत्तात्मवत् ' ( देवदत्तका आत्मा यज्ञदत्तात्मासे भिन्न नहीं है, क्योंकि आत्मा है, जैसे यज्ञदत्तका आत्मा ) यद्यपि आत्माओं में लक्षण भेद न होनेसे भेद सिद्ध नहीं होता, तो भी अन्त्यविशेषके भेदसे भेद सिद्ध हो जायगा । यह भी युक्त नहीं है, कारण कि आत्माका भेद सिद्ध हो तो विशेष सिद्ध हो, विशेष सिद्ध हो तो आत्मभेद सिद्ध हो, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष है, इसलिए आत्मामें भेद असिद्ध है । यदि अनेक आत्माओंके विभु होनेमें आकाश, दिक् आदिका दृष्टान्त उपस्थित करो तो वेदान्तसिद्धान्तमें सम्मत नहीं है, कारण ि ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इत्यादि श्रुति में आकाश आदिकी उत्पत्ति कही गई है । कार्य अनित्य और

पृष्ठ 570

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ द्वितीयाध्याये चतुर्थः पादः । [ अत्र पादे लिङ्गशरीरश्रुतीनां विरोधपरिहारः ] ' इस पादमें लिङ्गशरीर श्रुतियोंके विरोधका ( १ प्राणोत्पत्त्यधिकरणम् । सू ० तथा प्राणाः ॥ १ ॥

पदच्छेद - तथा, प्राणाः । सूत्रार्थ - ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इत्यादि श्रुतिमें जिस ( तथा ) उसी प्रकार ( प्राणाः ) प्राण - इन्द्रियों की उत्पत्ति भी कही गई * वियदादिविषयः श्रुतिविप्रतिषेधस्तृतीयेन पादेन परिहार है ' १-४ ) प्रकार आकाश आदिको उत्पत्ति है, है । अतः इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं । परिहृतः । चतुर्थेनेदानीं प्राण-विषयः परिहियते । तत्र तावत्- ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छान्दो ० ६।२।३ ) इति, ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तैत्ति ० २1१1१ ) इति चैवमादिषूत्पत्तिप्रकरणेषु प्राणानामुत्पत्तिर्नाम्नायते । क्वचिच्चानुत्पत्तिरेवैषामाम्नायते, ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' ( तै ० २२७ ) ' तदाहुः किं तदसदासी-दिव्यृषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः के ते ऋषय इति । प्राणा वाव ऋषयः ' इत्यत्र प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावश्रवणात् । अन्यत्र तु प्राणानामप्युत्पत्तिः पठ्यते - ' यथाऽग्नेर्ज्वलतः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणाः ' इति, ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' ( मुण्ड ० २1१1३ ) ' सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् ' ( मु ० २ | १ | ८ ) इति, स प्राणमसृजत आकाश आदि भूतविषयक श्रुतियोंके परस्पर विरोधका परिहार तृतीय पादसे किया गया । अब चतुर्थं पादसे इन्द्रिय ( उत्पत्ति, संख्या, स्वरूप ) विषयक श्रुतियोंके विरोधका परिहार किया जाता है । उसमें ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेजकी सृष्टिकी ) ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन. ' ( उस पर-मात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि उत्पत्तिं प्रकरणोंमें प्राणोंकी उत्पत्ति नहीं कही गई है । और कहीं पर इनकी अनुत्पत्ति सुनी जाती है, क्योंकि ' असद्वा इदमप्र ० ' ( पहले यह असत् अव्याकृत ही था ) ' तदाहुः ० ' ( वे कहते हैं - वह असत् क्या था, [ इसप्रकार विचार करने लगे ] उत्पत्तिके पूर्व वे ऋषि ही असत् थे, वे कहते हैं - वे ऋषि कौन हैं? प्राण ही ऋषि थे ) इसप्रकार उत्पत्तिके पूर्व प्राणोंके सद्भावकी श्रुति है । और अन्यत्र ' यथाऽग्नेर्ज्वलतः ० ' ( जैसे जलती हुई अग्निसे छोटे - छोटे विस्फुलिङ्ग निकलते हैं वैसे ही इस आत्मासे सम्पूर्ण प्राण निकलते हैं ) ' एतस्माज्जायते ० ' ( इससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं ) ' सप्तः प्राणाः ० ' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) ' स प्राणमसृजत ० ' ( उस पुरुषने प्राण हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया, फिर प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, सत्यानन्दी - दीपिका परिच्छिन्न होता है विभु नहीं, अतः आत्माको एक और विभू स्वीकृत करनेसे उक्त दोष नहीं होंगे, क्योंकि बुद्धि आदि उपाधि से ये सब व्यवहार उपपन्न होते हैं, इस प्रकार भूत और मोक्तृत्व आदि श्रुतियोंका विरोध न होनेपर अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध होता है ॥ ५३ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के द्वितीयाध्यायका तृतीय पाद समाप्त ॥३ ॥

* भूत और भोक्ता के विचारके अनन्तर मौतिक प्राणोंका उत्पत्तिविषयक विचार है, अतः दोनों पादोंकी हेतुहेतुमद्भाव संगति है । यद्यपि प्राणोंकी उत्पत्ति न मानने से ' एक विज्ञानसे सर्व-विज्ञानकी प्रतिज्ञा सिद्ध नहीं होती ' इसलिए वियदधिकरण न्याय से प्राणोंकी उत्पत्ति सिद्ध होती है, तो भी प्रलय में प्राणोंके सद्भाव प्रतिपादक श्रुतिकी गति कहनेके लिए यह अधिकरण है, इसलिए पुन-रुक्ति नहीं है । इस अधिकरणका विषय प्राण है । पूर्वपक्षमें उक्त श्रुतियोंमें अप्रामाण्य है । यहाँ