श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 571–580
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 571–580
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५३७ प्राणाच्छ्रद्वां खं वायुज्योंतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नम् ' ( प्र ० ६ । ४ ) इति चैवमादिप्रदेशेषु । तत्र तत्र श्रुतिविप्रतिषेधादन्यतरनिर्धारणकारणानिरूपणाच्चाप्रतिपत्तिः प्राप्नोति । अथवा प्रागुत्पत्तेः सद्भावश्रवणाङ्गौणी प्राणानामुत्पत्तिश्रुतिरिति प्राप्नोति । अत उत्तरमिदं पठति - ' तथा प्राणाः ' इति । कथं पुनरत्र तथेत्यक्षरानुलोम्यम्? प्रकृतोपमानाभावात् । सर्वगतात्मबहुत्ववादिदूषणमतीतानन्तरपादान्ते प्रकृतम्, तत्तावन्नोपमानं संभवति, साह-श्याभावात् । सादृश्ये हि सत्युपमानं स्यात् - यथा सिंहस्तथा बलवर्मेति । अदृष्टसास्यप्रति-पादनार्थमिति यद्युरुयेत, यथाऽदृष्टस्य सर्वात्मसंनिधावुत्पद्यमानस्यानियतत्वमेवं प्राणा-नामपि सर्वात्मनः प्रत्यनियतत्वमिति तदपि देहानियमेनैवोक्तत्वात्पुनरुक्तं भवेत् । नच जीवेन प्राणा उपमयेरन्, सिद्धान्तविरोधात् । जीवस्य ह्यनुत्पत्तिराख्याता । प्राणानां तूत्पत्तिर्व्याचिख्यासिता । तस्मात्तथेत्यसंबद्धमिव प्रतिभाति । न उदाहरणोपात्तेनाप्युप-मानेन संबन्धोपपत्तेः । अत्र प्राणोत्पत्तिवादिवाक्यजातमुदाहरणम् -'एतस्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति ' ( बृह ० २।१।२० ) इत्येवंजातीयकम् । तत्र यथा लोकादयः परस्माद्ब्रह्मण उत्पद्यन्ते तथा प्राणा अपीत्यर्थः । तथा - ' एतस्माज्जा-यते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ' ( मुण्ड ० २।१।३ ) इत्येवमादिष्वपि खादिवत्प्राणानामुत्पत्तिरिति द्रष्टव्यम् । * अथवा ' पानव्यापच्च तद्वत् ' तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन और अन्नको उत्पन्न किया ) इत्यादि स्थलोंमें प्राणोंकी उत्पत्ति पढी जाती | पूर्वपक्षी - तत् तत् स्थलोंमें श्रुतियोंके परस्पर विरोध होनेसे और दोनों में एकपक्षके निर्धारण कारण अनिरूपित होनेसे अप्रितपत्ति प्राप्त होती है अथवा उत्पत्ति के पूर्वं इन्द्रियों के सद्भावकी श्रुति होने से प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गोणी है, ऐसा प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - इससे यह उत्तर कहते हैं- ' तथा प्राणाः ' परन्तु इस सूत्र में ' तथा ' यह अक्षर किस प्रकार अनुकूल होगा? क्योंकि प्रकृत उपमानका अभाव है । सर्वगत अनेक आत्मा हैं, ऐसा माननेवालेका दूषण गत पादके अन्तमें प्रकृत है, परन्तु सादृश्यके न होनेसे वह दूषण प्राणका उपमान नहीं हो सकता । जैसा सिंह है वैसा बलवर्मा, इसप्रकार सादृश्य होनेपर ही उपमान होता है । जैसे सब आत्माओं की संनिधिमें उत्पन्न हुआ अदृष्ट अनियत है, वैसे प्राण भी सब आत्माओंके प्रति अनियत हैं । इसप्रकार यदि कहो कि अदृष्ट के साथ साम्य प्रतिपादन करनेके लिए प्राणका उपमान है, तो वह भी देहके अनियम से ही उक्त होने से पुनरुक्त हो जायगा । सिद्धान्तके साथ विरोध होनेके कारण जीवके साथ भी प्राण उपमित नहीं किये जायंगे, कारण कि जीवकी अनुत्पत्ति कही गई है और प्राणोंकी उत्पत्ति कहने की इच्छा है | इसलिए ' तथा ' यह असम्बद्ध सा प्रतीत होता है । परन्तु यह आक्षेप युक्त नहीं है, क्योंकि उदाहरण में गृहीत उपमानसे सम्बन्ध उपपन्न होता है । इस विषय में ' एतस्मादात्मनः ० ' ( इस आत्मासे सब प्राण, सब लोक, सब देव और सब भूत विविधरूपसे निकलते हैं— उत्पन्न होते हैं ) इसप्रकारका प्राणोत्पत्तिवादी वाक्यसमुदाय उदाहरण है । उसमें जैसे लोक आदि परब्रह्म से उत्पन्न होते हैं, वैसे प्राण मी परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं यह अर्थ है । उसप्रकार - एतस्माज्जायते प्राणो ० ' ( इससे प्राण उत्पन्न होता है, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और विश्वको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है ) इत्यादि श्रुतियोंमें भी आकाश आदिके समान प्राणोंकी उत्पत्ति है, ऐसा समझना चाहिए । सत्यानन्दी -दीपिका गोणीवादी कहते है कि प्रलय में प्राणोंकी अस्तित्व बोधक श्रुति निरवकाश होनेसे विशेष बलवती है । इसलिए प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति जीवोत्पत्ति श्रुतिके समान गौणी है, इसप्रकार इनका अविरोध है । * ' तथा ' शब्द उपमानका द्योतक होता है अर्थात् वह यथाका आकर्षण करता है । परन्तु यहाँ उपमान नहीं है । क्या अव्यवहित पूर्वमें प्रतिपादित परपक्ष दूषण प्राणका उपमान है, अथवा
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५३८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ ( जै ० अ ० ३।४।१५ ) इत्येवमादिषु व्यवहितोपमानसंबन्धस्याप्याश्रितत्वात् । यथाऽतीता-नन्तरपादादायुक्ता वियदादयः परस्य ब्रह्मणो विकाराः समधिगतास्तथा प्राणा अपि परस्य ब्रह्मणो विकारा इति योजयितव्यम् । कः पुनः प्राणानां विकारत्वे हेतुः? श्रुतत्व-मेव । ननु केषुचित्प्रदेशेषु प्राणानामुत्पत्तिः श्रूयत इत्युक्तम् - तदयुक्तम्, प्रदेशान्तरेषु श्रवणात् । नहि क्वचिदश्रवणमन्यत्र श्रुतं निवारयितुमुत्सहते । तस्माच्छ्रुतत्वाविशेषा-दाकाशादिवत्प्राणा अप्युत्पद्यन्त इति सूक्तम् ॥ १ ॥
अथवा ' पानव्यापञ्च तद्वत् ' ( और सोमपान करनेसे व्यापत् - वमन हो, तो उसके समान ) इत्यादि स्थलोमें व्यवहित उपमानके सम्बन्धका भी आश्रयण किया गया है । जैसे गत पादके आरम्भमें उक्त आकाश आदि परब्रह्मके विकार निश्चित हैं, वैसे प्राण भी परब्रह्मके विकार हैं, ऐसी योजना करनी चाहिए । पुनः प्राणोंके विकारत्वमें हेतु कौन है? विकारत्व प्रतिपादक श्रुति ही हेतु है । परन्तु जो यह कहा गया है कि कई स्थलोंमें प्राणोंकी उत्पत्ति नहीं सुनी जाती, तो वह अयुक्त है, क्योंकि अन्य स्थलोंमें उनकी उत्पत्तिका श्रवण है । कहींपर अश्रवण अन्यत्र श्रुतका निवारण करनेमें उत्साह नहीं करता, इसलिए यह कथन सुसंगत है कि श्रवण ( श्रुति ) के समान होनेसे आकाश आदिके समान प्राण भी उत्पन्न होते हैं ॥ १ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका अदृष्ट वा जीव है? इन तीनों विकल्पोंका क्रमश । समाधान भाष्य में स्पष्ट है । जैसे आकाश आदि परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, वैसे प्राण भी परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, इसप्रकार उपमानोपमेय सिद्ध होता है, अतः तथा असम्बद्ध नहीं है । * दान्तिकका निकटवर्ती दृष्टान्त होना चाहिए? परन्तु ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि जैमिनि मुनिने व्यवहित दृष्टान्तका भी ग्रहण किया है । जैसे पूर्वमीमांसाके तृतीय अध्यायमें अश्व प्रति-ग्रहेष्टि अधिकरण है । उसका यह विषय वाक्य है- ' यावतोऽश्वान्प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणांश्चतुष्कपाला-निर्वपेत् ' ( जितने अश्वदान करे उतने ही वरुणके लिए चनुष्कपालोंमें निष्पन्न पुरोडाश होम करे ) इसके उत्तर अधिकरणमें यह वारुणीष्टि अश्व दाताको करनी चाहिए कि प्रतिग्रहीतको? ऐसा संशय होने पर पूर्वपक्ष में ' प्रतिगृह्णीयात् ' इस श्रुतिके बलसे दान लेनेवालेको करनी चाहिए । सिद्धान्त में दाताको करनी चाहिए, ऐसा निर्णय किया गया है । वहाँ ' प्रतिगृह्णीयात् ' - प्रतिग्राह्येत् ( दद्यात् ) ( दान देनेवाला ) ऐसा अर्थ करना चाहिए । इसप्रकार निर्णय होनेपर पुनः सन्देह होता है कि इष्टिका विधान वैदिक अश्वदानमें है अथवा लौकिक अश्वदानमें? ' न केसरिणो ददाति ' ( अश्वोंका दान नहीं करना चाहिए ) इस स्मृतिके अनुसार लौकिक अश्वदानमें इष्टि करनी चाहिए इसका समर्थन करते हुए ' दोषात्त्विष्टिलौकिके स्यात् ' ( जै ० सू ० ३।४।२८ ) यह सूत्र कहा गया है । सिद्धान्ती - ' भन्न हि वरुणो वा एतं गृह्णाति योऽश्वं प्रतिगृह्णाति ' ( जो अश्वका दान करता है उसको जलोदर रोग होता है ) इससे सम्बन्ध होनेके कारण वैदिक अश्वदानमें इस वारुणीष्टिका विधान है लोकमें नहीं, अतः यज्ञ सम्बन्धी अश्वदानमें यह इष्टि है ऐसा विचार किया गया है । आगे वमनाधिकरणमें ' पानव्यापच्च तद्वत् ' ( जै ० सू ० ३।४ । ३२ ) ( यदि सोमपानसे वमन हो, तो ' एतं सौमेन्द्रं श्यामाकं चरुं निर्वपेत् ' ( सोम और इन्द्र सम्बन्धी श्यामक चरुका होम करे ) इसप्रकार सोमपान निमित्त वमन होनेपर चरुका विधान किया गया है । यहाँपर सन्देह होता है कि क्या इस चरुका विधान वैदिक सोमपान निमित्त वमनमें है अथवा लौकिक सोमपान निमित्त वमनमें? पूर्वपक्ष - ' पानव्यापच्च तद्वत् ' उक्त चरुका विधान लौकिक सोमपान निमित्त वमन में होना चाहिए । ' तद्वत् ' ' उसी प्रकार ' अर्थात् ' दोषा-विष्टिलौकिके स्यात् ' ( दोष होनेसे लौकिक अश्वदानमें इष्टि करनी चाहिए ) इस सूत्र में कहे हुए के
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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५३ ९ गौण्यसंभवात् ॥ २ ॥
सूत्रार्थ - इन्द्रियोंकी उत्पत्ति प्रतिपादक श्रुति गौणी नहीं हो सकती, अतः इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं । * यत्पुनरुक्तम्– प्रागुत्पत्तेः सद्भावश्रवणाद्गौणी प्राणानामुत्पत्तिश्रुतिरिति । तत्प्रत्याह- गौण्यसंभवादिति । गौण्या असंभवो गौण्यसंभवः । नहि प्राणानामुत्पत्तिश्रुति-गौणी संभवति, प्रतिज्ञाहानिप्रसङ्गात् । ' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' ( मुण्ड ०१।१।२ ) इति हो कविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तत्साधनायेदमाम्नायते - ' एतस्मा-ज्ज्ञायते प्राणः ' ( मुण्ड ० २।१।३ ) इत्यादि । सा च प्रतिज्ञा प्राणादेः समस्तस्य जगतो ब्रह्म-विकारत्वे सति प्रकृतिव्यतिरेकेण विकाराभावात्सिध्यति । गौण्यां तु प्राणानामुत्पत्तिश्रुतौ प्रतिज्ञेयं हीयेत । तथा च प्रतिज्ञातार्थमुपसंहरति- ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ' ( मुण्ड ० ०।१।१० ) इति ' ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ' ( मुण्ड ० २।२।११ ) इति च । तथा ' आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ' इत्येवंजातीयकासु श्रुतिष्वेषैव प्रतिज्ञा योजयितव्या । * कथं पुनः प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावश्रवणम्? नैतन्मूलप्रकृतिविषयम्, ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ' ( मुण्ड ० २।१।२ ) इति मूलप्रकृतेः प्राणादिसमस्त-जो यह कहा गया है कि उत्पत्तिके पूर्व प्राणोंके सद्भावके श्रवणसे प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गोणी है । उसपर कहते हैं — ' गौण्यसंभवात् ' गौणीका असंभव वह गौण्यसंभव है । प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गौणी नहीं हो सकती, क्योंकि प्रतिज्ञाकी हानिका प्रसङ्ग आता है । ' कस्मिन्नु ० ' ( हे भगवन्! किसके विज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात होता है ) इस प्रकार एकके विज्ञानसे सबके विज्ञानकी प्रतिज्ञाकर उसके साधनके लिए ' एतस्माज्जायते ० ' ( उससे प्राण उत्पन्न होता है ) इत्यादि श्रुति है । वह प्रतिज्ञा प्राण आदि समस्त जगत् ब्रह्मका विकार होनेपर प्रकृतिसे व्यतिरिक्त विकार के अमावसे सिद्ध होती है । परन्तु प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गौणी होनेपर तो यह प्रतिज्ञा बाधित होगी । इस प्रकार ' पुरुष एवेदं ० ' ( यह समस्त जगत्, कर्म और तप- ज्ञान पुरुष ही है, वह पर और अमृतरूप ब्रह्म है ) और ब्रह्मैवेदं ० " ( यह समस्त जगत् वरिष्ठ ब्रह्म ही है ) यह श्रुति प्रतिज्ञात अर्थका उपसंहार करती है । और इस तरह ' आत्मनो वा अरे ० ' ( हे मैत्रेयी! आत्माके दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञानसे यह सब विदित होता है ) इस प्रकारकी श्रुतियोंमें ही इस प्रतिज्ञाकी योजना करनी चाहिए । तो पुनः उत्पत्तिके पूर्व प्राणोंके सद्भावकी श्रुति किस प्रकार है? यह मूल प्रकृति - विषयक नहीं है, क्योंकि ' अप्राणो ह्यमनाः ० ' ( अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध एवं श्रेष्ठ अक्षरसे मी उत्कृष्ट है ) इस प्रकार मूलप्रकृति प्राण व्यादि समस्त विशेषोंसे सत्यानन्दी - दीपिका समान । जैसे यहाँ ' तद्वत् ० ' ( जै ० सू ० ३।४।३२ ) के द्वारा व्यवहित ' दोषात्तु ' ( जै ० सू ० ३।४।२८ ) इत्यादि से उपमान दिया गया है । उसीप्रकार यहाँ व्यवहित उपमानका सम्बन्ध उपपन्न है अर्थात् गत पादके आरम्भमें जैसे आकाश आदि परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, वैसे प्राण भी परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं ॥ १ ॥
* यदि कहो कि उत्पत्ति श्रुतिके समान प्रतिज्ञा भी गौण हो, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारका पर्यालोचन करनेसे विवक्षित अद्वितीयत्वकी प्रतिज्ञाके अनुसार प्राणोत्पत्ति मुख्य ही है । मुण्डकोपनिषद् के समान अन्य उपनिषदोंमें भी प्रतिज्ञा देखी जाती है, इसलिए यह प्रतिज्ञा मुख्य ही है । प्राणोंकी उत्पत्तिके मुख्य होनेमें यह प्रतिज्ञा हेतुरूपसे समझनी चाहिए । * अब प्रलयमें प्राणोंके अस्तित्व विषयक विचार किया जाता है- ' ऋषयो वाव ते अग्रेऽसदा-सीत् ' ' प्राणा वाव ऋषयः ' यह वाक्य परकारण ब्रह्म विषयक नहीं है, क्योंकि ' अप्राणो ह्यमनाः ' इत्यादि
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५४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ विशेषरहितत्वावधारणात् । अवान्तरप्रकृतिविषयं त्वेतत्स्वविकारापेक्षं प्रागुत्पत्तेः प्राणा-नां सद्भावावधारणमिति द्रष्टव्यम्, व्याकृतविषयाणामपि भूयसीनामवस्थानां श्रुति-स्मृत्योः प्रकृतिविकारभावप्रसिद्धेः । वियदधिकरणे हि ' गौण्यसंभवात् ' इति पूर्वपक्षसूत्रत्वा-द्गौणी जन्मश्रुतिरसंभवादिति व्याख्यातम् । प्रतिज्ञाहान्या च तत्र सिद्धान्तोऽभिहितः । इह तु सिद्धान्तसूत्रत्वाद्गौण्या जन्मश्रुतेरसंभवादिति व्याख्यातम् । तदनुरोधेन त्विहापि गौणी जन्मश्रुतिरसंभवादिति व्याचक्षाणैः प्रतिज्ञाहानिरुपेक्षिता स्यात् ॥ २ ॥
तत्प्राक्तेश्व ॥ ३ ॥
पदच्छेद – तत्प्राश्रुतेः, च । सूत्रार्थ - ' जायते ' यह जन्म वाचक पद आकाश आदिकी अपेक्षासे प्राणोंमें श्रुत होनेसे प्राणों की उत्पत्ति मुख्य है । इतञ्चका शादीनामिव प्राणानामपि मुख्यैव जन्मश्रुतिः । यत् ' जायते ' इत्येकं जन्म-वाचिपदं प्राणेषु प्राक्तं सदुत्तरेष्वप्याकाशादिष्वनुवर्तते - ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( मु ०२।१।३ ) इत्यत्र, आकाशादिषु मुख्यं जन्मेति प्रतिष्ठापितं तत्सामान्यात्प्राणेष्वपि मुख्यमेव जन्म भवितु-मर्हति । न ह्येकस्मिन्प्रकरण एकस्मिश्च वाक्य एकः शब्दः सकृदुच्चरितो बहुभिः संबध्यमानः रहित अवधारित होती है । उत्पत्तिके पहले प्राणोंके सद्भावका अवधारण यह स्वविकारको अपेक्षासे अवान्तर प्रकृति विषयक है, ऐसा समझना चाहिए । कारण कि व्याकृत विषयक बहुत सी अवस्थाओं का भी प्रकृति - विकारभाव श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है । वियदधिकरण में ' गौण्यसंभवात् ' इसके पूर्वपक्ष सूत्र होनेसे जन्म श्रुति गौणी है, क्योंकि मुख्यका असंभव है, इस प्रकार व्याख्यान किया गया है और प्रतिज्ञाकी हानि होनेसे वहाँ सिद्धान्त कहा गया है । यहाँ तो सिद्धान्त सूत्र होनेसे ' गौणी जन्म श्रुतिका असंभव होनेसे ' ऐसा व्याख्यान किया है । परन्तु उसके अनुसार यहाँ भी ' जन्म श्रुति गौणी है, असंभव होनेसे ' ऐसा व्याख्यान करनेवालोंसे प्रतिज्ञा हानिकी उपेक्षाकी जायगी ॥ २ ॥
और इससे आकाश आदिके समान प्राणोंकी भी जन्मश्रुति मुख्य ही है; क्योंकि ' जायते ' ऐसा एक उत्पत्ति वाचक पद प्राणोंमें पहले श्रुत है, उसकी उत्तर आकाश आदिमें भी एतस्माज्जायते प्राणः ' यहाँपर अनुवृत्ति होती है । आकाश आदिका जन्म मुख्य है, ऐसा ९ प्रतिष्ठापित किया जा चुका है, उसके सादृश्वसे प्राणों का भी जन्म मुख्य ही हो सकता है । कारण कि एक प्रकरणमें और एक वाक्य में एक वार उच्चरित और बहुतों से सम्बद्ध हुआ एक शब्द कहीं मुख्य और कहीं गौण है, ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका श्रुति से वह तो प्राण आदि सब विशेषोंसे रहित निश्चित होता है । परन्तु प्राणके सद्भाव प्रतिपादक वाक्य अवान्तर प्रकृति - हिरण्यगर्म विषयक है, कारण कि अपने कार्यकी उत्पत्ति के पूर्व हिरण्यगर्भका सद्भाव निश्चित है । यह प्राण - हिरण्यगर्भका सद्भाव अवान्तर प्रलयमें सिद्ध होता है, उसके सद्भावकी श्रुति है । कारण कि ' एतस्माज्जायते प्राणः ० ' ( इससे प्राण उत्पन्न होता है ) ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' ( पूर्व में हिरण्यगर्भं हुआ ) इत्यादि श्रुति हिरण्यगर्भको उत्पत्ति कहती हैं । और ' आदिकर्ता स भूतानाम् ' ( वह भूतोंका आदि कर्ता है ) इत्यादि स्मृतिमें हिरण्यगर्भको स्थूल जगत्का कारण कहा गया है । इस प्रकार परब्रह्मकी अपेक्षासे हिरण्यगर्भ कार्य और अपने कार्यकी अपेक्षा कारणरूपसे श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है, अतः अवान्तर प्रकृति विषयक प्राणके अस्तित्वकी श्रुति है । और यहाँ वियदधि-करणके अनुसार सूत्रकी व्याख्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करनेसे प्रतिज्ञाका बाध हो जायगा, इसलिए ' एतस्माज्जायते प्राण: ' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित प्राणोत्पत्ति मुख्य ही है ॥ २ ॥
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अधि ० १ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५४१ क्वचिन्मुख्यः क्वचिद्नौण इत्यध्यवसातुं शक्यम्, वैरूप्यप्रसङ्गात् । तथा स प्राणमसृजत प्राणाच्छूद्धाम् ' ( प्रश्न ० ६ । ४ ) इत्यत्रापि प्राणेषु श्रुतः सृजतिः परेष्वप्युत्पत्तिमत्सु श्रद्धादि-ष्वनुषज्यते । यत्रापि पश्चाच्छुत उत्पत्तिवचनः शब्दः पूर्वैः संबध्यते तत्राप्येष एव न्यायः । यथा ' सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति ' इत्ययमन्ते पठितो व्युच्चरन्तिशब्दः पूर्वैरपि प्राणादिभिः संबध्यते ॥ ३ ॥
तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥ ४ ॥
पदच्छेद -- तत्पूर्वकत्वात्, वाचः । सूत्रार्थ - ( वाच: ) ' अन्नमयं हि सोम्य ० ' इत्यादिसे मन और प्राण सहित वाणी में ( तत्पूर्व-कत्वात् ) ब्रह्मप्रकृतिक तेज, जल और अन्न पूर्वकत्व कथन है, अतः इन्द्रियोंकी उत्पत्ति श्रुति है । * यद्यपि ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६ । २ । ३ ) इत्येतस्मिन्प्रकरणे प्राणानामुत्पत्तिर्न पठ्यते, तेजोबन्नानामेव च त्रयाणां भूतानामुत्पत्तिश्रवणात् । तथापि ब्रह्मप्रकृतिकतेजो-बन्न पूर्वकत्वाभिधानाद्वाक्प्राणमनसां तत्सामान्याच्च सर्वेषामेव प्राणानां ब्रह्मप्रभवत्वं सिद्धं भवति । तथा हि - अस्मिन्नेव प्रकरणे तेजोबन्न पूर्वकत्वं वाक्प्राणमनसामाम्ना-यते— ' अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक् ' ( छा ० ६/५/४ ) इति । तत्र यदि तावन्मुख्यमेवैषामन्नादिमयत्वं ततो वर्तत एव ब्रह्मप्रभवत्वम् । अथ भाक्तं - तथापि ब्रह्मकर्तृकायां नामरूपव्याक्रियायां श्रवणात्, ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' ( छा ० ६।१।३ ) इति चोपक्रमात् ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( छा ० ६ ८७ ) इति चोपसंहाराच्छ्रुत्यन्तरप्रसिद्धेश्व ब्रह्मकार्यत्वप्रपञ्चनार्थमेव मनआदीनामन्नादिमयत्ववचनमिति गम्यते । तस्मादपि प्राणानां ब्रह्मविकारत्वसिद्धिः ॥ ४ ॥
निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे वाक्य विरूप ( भेद ) प्रसङ्ग हो जायगा । इस प्रकार ‘ स प्राणमसृजत ० ' ( उसने प्राणको उत्पन्न किया, प्राणसे श्रद्धाको ) यहाँ भी प्राणोंमें श्रुत ' सृज् ' धातु अनन्तर उत्पन्न होनेवाले अन्य श्रद्धा आदिमें अनुवृत्त होता है । जहाँ भी पश्चात् श्रुत उत्पत्ति वाचक शब्द पूर्वोके साथ सम्बन्धित होता है वहाँ भी यही न्याय है । जैसे ' सर्वाणि भूतानि ० ' ( सत्र भूत निकलते हैं ) इस प्रकार यह अन्तमें पठित ' न्युच्चरन्ति ' शब्द पूर्व प्राण आदिसे भी सम्बन्धित होता है || ३ || यद्यपि ' तत्तेजोऽसृजत ' इस प्रकरणमें प्राणों की उत्पत्ति पठित नहीं है, कारण कि तेज, जल और अन्न इन तीन भूतोंकी उत्पत्तिका ही श्रवण है, तथापि वाक्, प्राण और मनका ब्रह्म प्रकृतिक तेज, जल और अन्न पूर्वक अभिधान होनेसे और उनके सादृश्यसे सब इन्द्रियोंमें ब्रह्म प्रभवत्व सिद्ध होता है । जैसे कि ' अन्नमयं हि सोम्य ० ' ( हे सोम्य! मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाणी तेजो-मयी है ) इसी प्रकरणमें वाणी, प्राण और मन तेज जल और अन्नपूर्वक कहे गये हैं । उसमें यदि उनके अन्नमयत्व आदि मुख्य ही हैं तो उससे उनमें ब्रह्म जन्यत्व ही हैं, और यदि उनमें अन्नमयत्व आदि गौण हों, तो भी ब्रह्म कर्तृक नाम, रूपके व्यकरण ( अभिव्यक्ति ) में श्रवण होनेसे ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' ( जिससे अश्रुत श्रुत होता है ) इसप्रकार उपक्रम होने से ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( एतद्रूप -आत्मरूप ही यह सब है ) ऐसा उपसंहार होनेसे और अन्य श्रुतिमें प्रसिद्ध होने से मन बादिमें अन्न-मयत्व आदि वचन ब्रह्म कार्यत्व विस्तारके लिए ही है, ऐसा ज्ञात होता है । इससे भी प्राण ब्रह्मके विकार हैं, यह सिद्ध होता है ॥ ४ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * यहाँ वाणी प्राण और मनका उपलक्षण है, इसलिए सूत्रस्थ वाणी पदसे प्राण बोर मनका भी ग्रहण करना चाहिए । यहाँ प्राणोत्पत्ति श्रुतियों का सृष्टिके पूर्व प्राणोंके सद्भाव प्रतिपादक श्रुति साथ कोई विरोध नहीं है, अतः कारण ब्रह्म में समन्वय सिद्ध है ॥ ४ ॥
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५४२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० ४ ( २ सप्तगत्यधिकरणम् । सू ० ५-६ ) सप्त गते विंशेषितत्वाच्च ॥ ५ ॥
पदच्छेद - सप्त, गते, विशेषितत्वात् च । सूत्रार्थ -- ( सप्त ) इन्द्रियाँ सात हैं, ( गतेः ) क्योंकि श्रुतिसे उनके सप्तत्वका ज्ञान होता है, ( च ) और ( विशेषितत्वात् ) ' सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः ' इस शास्त्र से शीर्षण्यत्वसे वे इन्द्रियाँ विशेषित हैं । * उत्पत्तिविषयः श्रुतिविप्रतिषेधः प्राणानां परिहृतः । संख्याविषय इदानीं परि-ह्रियते । तत्र मुख्यं प्राणमुपरिष्टाद्वक्ष्यति । संप्रति तु कतीतरे प्राणा इति संप्रधारयति । श्रुतिविप्रतिपत्तेश्चात्र विशयः । क्वचित्सप्त प्राणाः संकीर्त्यते - ' सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् ' ( मुण्ड ० २।१।८ ) इति । क्वचिच्चाष्टौ प्राणा ग्रहत्वेन गुणेन संकीर्त्यन्ते - ' अष्टौ ग्रहा अष्टावति-ग्रहाः ' ( बृह ० ३ | २ | १ ) इति । क्वचिन्नव - ' सप्त वै शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाञ्चौ ' ( तै ० सं ० ५/१/७/१ ) इति । कचिद्दश - ' नव वै पुरुषे प्राणा नामिर्दशमी ' इति । क्वचिदेकादश-- ' दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः ' ( बृह ० ३।९ ।४ ) इति । क्वचिदद्वादश - ' सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम् ( बृह ०२ | ४ | ११ ) इत्यत्र । क्वचित्त्रयोदश ' चक्षुश्च द्रष्टव्यं च ' ( बृह ० ४।८ ) इत्यत्र । एवं हि विप्रतिपन्नाः प्राणेयत्तां प्रति श्रुतयः । किं तावत्प्राप्तम्? सप्तैव प्राणा इति । कुतः? गतेः । यतस्तावन्तोऽव-गम्यन्ते - ' सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् ' ( मुण्ड ० २।१८ ) इत्येवंविधासु श्रुतिषु । प्राणों की उत्पत्ति विषयक श्रुतियोंके परस्पर विरोधका परिहार किया गया । अब संख्याविषयक श्रुतिविरोधका परिहार किया जाता है । उनमें मुख्य प्राणको सूत्रकार आगे कहेंगे । अभी तो अन्य प्राण ( इन्द्रिय ) कितने हैं, यह निर्णय करते हैं । और श्रुति विरोधसे यहाँ संशय है । ' सप्त प्राणाः ० ' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) इस तरह कहीं पर सात प्राण कहे जाते हैं, और ' अष्टौ ग्रहा ० ' आठ ग्रह और आठ अतिग्रह ) इस प्रकार कहीं आठ प्राण ग्रहत्व गुणसे वर्णित हैं । और ‘ सप्त वै शीर्षण्याः ० ' ( सात शीर्षण्य प्राण हैं और दो नीचे के हैं ) इस तरह कहीं नौ प्राण कहे जाते हैं, और कहीं ' नव वै पुरुषे ० ' ( पुरुष - देहमें नौ प्राण हैं और दसवीं नाभि है ) इसप्रकार दस प्राण पठित हैं, और ' दशेमे पुरुषे ० ' ( देहमें दस प्राण हैं और ग्यारहवाँ मन है ) कहीं एकादश हैं, और ' सर्वेषां स्पर्शानां ० ' ( समस्त स्पर्शोका त्वक् एक अयन - स्थान है ) इस तरह कहीं द्वादश हैं, और कहीं ' चक्षुश्च द्रष्टव्यं च ' ( चक्षु और द्रष्टव्य ) इस तरह तेरह हैं । इसप्रकार प्राणोंकी इयत्ताके प्रति [ संख्याविषयक ] श्रुतियाँ परस्पर विरुद्ध हैं । तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्ष - प्राण सात हैं, किससे? अवगतिसे, क्योंकि ' सप्त प्राणाः ० ' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) इसप्रकारको श्रुतियोंमें उतने ही अवगत होते हैं, और ' सप्त वै शीर्षण्याः ० ' ( शिरमें रहनेवाले प्राण सात हैं ) इस श्रुतिमें सत्यानन्दी - दीपिका * आकाश आदिकी उत्पत्तिके समान प्राणोंकी भी उत्पत्ति कही गई । बे प्राण कितने हैं, अब उनका संख्या विषयक विचार किया जाता है, इसप्रकार आश्रयाश्रयिमाव संगतिसे कहते हैं । परन्तु इस विषय में श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेचे संशय होनेपर पूर्वपक्ष दिखलाते हैं -कहीं सात-नेत्र, श्रोत्र, घ्राण, रसना, त्वक् ये पांच ज्ञानेन्द्रिय, वाणी और मन ये सात प्राण हैं । नेत्र आदि सात और हस्त - कर्मेन्द्रिय, इसप्रकार आठ हैं, ये बन्धनके हेतु होनेसे ग्रह हैं, और इनके रूप आदि विषय अतिग्रह हैं । विषय इन्द्रियोंसे स्वतन्त्र और इनको आकर्षित करते हैं, इससे इन्द्रियाँ विषयके अधीन होती हैं । दो नेत्र, दो श्रोत्र, दो नासिकाएँ और वाणी ये सात शिरमें रहनेवाले प्राण हैं, गुदिया और लिङ्गेन्द्रिय ये दो नीचे के, इसप्रकार मिलकर नौ होते हैं । अथवा कहीं उक्त नौ प्राण
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अधि ० २ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५४३ विशेषिताश्चैते ' सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः ' इत्यत्र । ननु ' प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ' ( मुण्ड ०२ / १८ ) इति वीप्सा श्रूयते सा सप्तभ्योऽतिरिक्तान्प्राणान्गमयतीति । नैष दोषः, पुरुषभेदाभिप्रायेयं वीप्सा प्रतिपुरुषं सप्त सप्त प्राणा इति, न तत्त्वभेदाभिप्राया सप्त सप्तान्येऽन्ये प्राणा इति । नन्वष्टत्वादिकापि संख्या प्राणेषूदाहृता, कथं सप्तैव स्युः? सत्यमुदाहृता, विरोधात्त्वन्यतमा संख्याऽध्यवसातव्या । तत्र स्तोककल्पनानुरोधात्सप्त-संख्याध्यवसानम् । वृत्तिभेदापेक्षं च संख्यान्तरश्रवणमिति मन्यते ॥ ५ ॥
अत्रोच्यते-हस्तादयस्तु स्थिते तो नैवम् ॥ ६ ॥
पदच्छेद - हस्तादय:, तु, स्थिते, अतः, न, एवम् । सूत्रार्थ - ( तु ) पूर्वपक्ष निरासार्थं है, ( हस्तादयः ) ' हस्तौ वै ग्रहः ' इत्यादि श्रुतिमें हाथ आदि भी अधिक प्राण प्रतिपादित हैं, ( स्थिते ) इससे सात से अधिक प्राणोंके होनेपर ( अतः ) इस कारण ( नैवम् ) सात ही प्राण नहीं हो सकते । हस्तादयस्त्वपरे सप्तभ्योऽतिरिक्ताः प्राणाः श्रूयन्ते — ' हस्तौ वै ग्रहः स कर्मणाऽति-ग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ' ( बृह ० ३।२।८ ) इत्येवमाद्यासु श्रुतिषु । स्थिते च सप्तत्वातिरेके सप्तत्वमन्तर्भावाच्छक्यते संभावयितुम् । हीनाधिकसंख्याविप्रतिपत्तौ ह्यधिका संख्या संग्राह्या भवति, तस्यां हीनाऽन्तर्भवति नतु हीनायामधिका । अतश्च नैवं मन्तव्यं स्तोककल्पनानुरोधात्सप्तैव प्राणाः स्युरिति । उत्तरसंख्यानुरोधात्त्वे-कादशैव ते प्राणाः स्युः । तथा चोदाहृता श्रुतिः - ' दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः ' ( बृह ० ये विशेषित हैं । परन्तु ' प्राणा गुहाशया निहिता: ० ' ( हृदयमें स्थित प्राण अपने स्थान में सात - सात स्थापित हैं ) इसप्रकार वीप्सा सुनी जाती है, वह सातसे अधिक प्राणोंका बोध कराती है । यह दोष नहीं है, क्योंकि यह वीप्सा प्रत्येक पुरुषमें सात सात प्राण हैं, इसप्रकार पुरुष भेदके अभिप्रायसे है । सात सात अन्य अन्य प्राण हैं, इस तरह तत्त्वभेदके अभिप्रायसे नहीं है । परन्तु आठ आदि संख्या मी प्राणोंमें उदाहृत है, तो पुनः सात ही किस प्रकार होंगे? यह ठीक है, उदाहृत है । परन्तु संख्या विषयक श्रुति विरोध होनेसे किसी एक संख्याका निश्चय करना चाहिए । उसमें अल्प कल्पनाके अनुसार सात संख्याका निश्चय है, और अन्य संख्याका श्रवण ( प्राणोंकी ) वृत्ति भेदकी अपेक्षासे ही है, ऐसा मानते हैं ॥ ५ ॥
सिद्धान्ती — इस पर कहते हैं— परन्तु ' हस्तौ वै ग्रहः ० ' ( हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं, क्योंकि प्राणी हस्तोंसे ही कर्म करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें अन्य हस्त आदि सातोंसे अतिरिक्त प्राण सुने जाते हैं । प्राण सात से अतिरिक्त निश्चित होनेपर उनमें सातके अन्तर्भाव की संभावना की जा सकती है, क्योंकि न्यून और अधिक संख्या की विप्रतिपत्ति होनेपर अधिक संख्या ही ग्राह्य होती है, कारण कि उसमें न्यूनका अन्तर्भाव होता है, परन्तु न्यूनमें अधिक संख्याका अन्तर्भाव नहीं होता । इससे अल्प कल्पनाके अनुसार सात ही प्राण होंगे, ऐसा नहीं मानना चाहिए । किन्तु उत्तर संख्याके अनुरोधसे तो एकादश ही वे प्राण होंगे जैसे कि ' दशेमे पुरुषे ० ' ( देहमें ये दस प्राण हैं और मन एकादश है ) इस प्रकार श्रुति सत्यानन्दी -दीपिका और दसवीं नाभि, इसप्रकार दस प्राण हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन यह एकादश हैं | ये बुद्धिके साथ मिलकर बारह प्राण होते हैं और अहंकार के साथ तेरह हैं । इसप्रकार प्राणोंकी संख्या विषयक श्रुतियोंका परस्पर विरोध है ॥ ५ ॥
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५४४ ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ ३ / ९ / ४ ) इति | आत्मशब्देन चात्रान्तःकरणं परिगृह्यते, करणाधिकारात् । नन्वेकादशत्वा-दप्यधिके द्वादशत्रयोदशत्वे उदाहृते । सत्यमुदाहृते, न त्वेकादशभ्यः कार्यजातेभ्योऽधिकं कार्यजातमस्ति यदर्थमधिकं करणं कल्प्येत । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धविषयाः पञ्च बुद्धि-भेदास्तदर्थानि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि । वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाः पञ्च कर्मभेदास्त-दर्थानि च पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । सर्वार्थविषयं त्रैकाल्यवृत्ति मनस्त्वेकमनेकवृत्तिकम्, तदेव वृत्तिभेदात् क्वचिद्भिन्नवद्व्यपदिश्यते - ' मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं च ' इति । तथा च श्रुतिः कामाद्या नानाविधा वृत्तीरनुक्रम्याह - ' एतत्सर्वं मन एव ' ( बृह ० १/५/३ ) इति । * अपि च सप्तैव शीर्षण्यान् प्राणानभिमन्यमानस्य चत्वार एव प्राणा अभिमताः स्युः । स्थानभेदाद्धयेते चत्वारः सन्तः सप्त गण्यन्ते - ' द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके एका वाक् ' इति । नच तावतामेव वृत्तिभेदा इतरे प्राणा इति शक्यते वक्तुं हस्तादिवृत्तीनामत्यन्त विजातीयत्वात् । तथा ' नव बै पुरुषे प्राणा नाभिर्दशमी ' इत्यत्रापि देहच्छिद्रभेदाभिप्रायेणैव दश प्राणा उच्यन्ते, न प्राणतत्त्वभेदाभिप्रायेण, ' नाभिर्दशमीति ' वचनात् । नहि नाभिर्नाम कश्चित्प्राणः प्रसिद्धोऽस्ति | मुख्यस्य तु प्राणस्य भवति नाभिरप्येकं विशेषायतनमित्यतो नाभि-दशमीत्युच्यते । कचिदुपासनार्थं कतिचित्प्राणा गण्यन्ते, क्वचित्प्रदर्शनार्थम् । तदेवं विचित्रे प्राणयत्तानाने सति क्व किंपरमाम्नानमिति विवेक्तव्यम् । कार्यजातवशात्वेकाद-शत्वाम्नानं प्राणविषयं प्रमाणमिति स्थितम् । इयमपरा सूत्रद्वययोजना - सप्तैव प्राणाः उदाहृत है । यहाँ आत्मशब्द से अन्तःकरणका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि करणका प्रकरण है । परन्तु एकादश से अधिक द्वादश, त्रयोदश उदाहृत हैं? ठीक उदाहृत है । परन्तु एकादश कार्यं समुदायसे अधिक कार्य नहीं है, जिसके लिए अधिक करणकी कल्पनाकी जाय । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषयक पाँच प्रकारकी बुद्धि है, उसके लिए पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं । वचन, आदान- ग्रहण, विहरण ( चलना ) उत्सर्ग ( मलादिका त्याग ) आनन्द ( विषय जन्य - सुख अनुभव ) ये पाँच कर्मके भेद हैं, उनके लिए पाँच कर्मेन्द्रिय हैं । सब पदार्थोंको विषय करनेवाला, तथा त्रिकाल विषयक वृत्तिवाला मन एक है और वह अनेक वृत्तियोंवाला है । उसका ही ' मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तं च ' ( मन, बुद्धि, अहङ्कार और वित्त ) इस प्रकार वृत्तिके भेदसे कहोंपर भिन्नके समान व्यपदेश किया जाता है । उसी प्रकार श्रुति अनेक प्रकारकी काम आदि वृत्तियोंका अनुक्रम कर कहती है- ' एतत्सर्वं मन एव ० ' ( यह सब मन हा है ) । और सात ही शीर्षण्य प्राणोंके माननेवालेको चार ही प्राण अभिमत होंगे, ये चार होते हुए स्थानभेदसे सात गिने जाते हैं ( दो श्रोत्र, दो नेत्र, दो नासिका, एक वाणी ) तब अन्य प्राण उनके वृत्तिभेद हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि हस्त आदिकी वृत्तियाँ अत्यन्त विजातीय हैं । इसप्रकार ' नव वै पुरुषे ० ' ( देहमें नौ ही प्राण हैं और दसवीं नाभि है ) यहाँ मी देहके छिद्र भेदके अभिप्रायसे दस प्राण कहे जाते हैं, प्राणतत्त्वके भेदके अभिप्रायसे नहीं, कारण कि ' नामि दसवीं है ' ऐसा वचन है | नाभि नामका कोई प्राण प्रसिद्ध नहीं है, किन्तु मुख्य प्राणका नामि भी एक विशेष स्थान है, अतः ' नामि दसवीं ' ऐसा कहा i जाता है । कहीं उपासना के लिए कई प्राण गिने जाते हैं और कहीं प्रदर्शन के लिए । इसप्रकार प्राणोंकी संख्याविषयक भिन्न - भिन्न श्रुतियों के होनेपर किस स्थलमें किस अर्थ विषयक यह श्रुति है, ऐसा विचार करना चाहिए । कार्य समुदायके बलसे प्राण विषयक एकादशत्व सत्यानन्दी - दीपिका * हस्त आदिकी अदान आदि वृत्तियाँ श्रोत्र आदि से अत्यन्त विलक्षण हैं । यदि वे श्रोत्र आदिकी वृत्ति हों, तो अन्ध, बधिर आदिसे आदान - प्रदान आदि नहीं होंगे । इसलिए ' सप्त प्राणाः प्रभवन्ति ' यह उपासनाके लिए है और ' अष्टौ ग्रहाः ' यह उपलक्षणार्थं है, कारण कि पायु, उपस्थ
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अधि ० २ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीकासहित ५४५ स्युर्यतः सप्तानामेव गतिः श्रूयते ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वे प्राण अनूत्क्रामन्ति ' ( बृह ० ४।४।२ ) इत्यत्र । ननु सर्वशब्दोऽप्यत्र पठ्यते, तत्कथं सप्तानामेव गतिः प्रतिज्ञायत इति? विशेषितत्वादित्याह - सप्तैव हि प्राणाश्चक्षुरादयस्त्वक्पर्यन्ता विशेषिता इह प्रकृताः ' स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ्पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ' ( बृह ० ४।४।१ ) ' एकीभवति न पश्यतीत्याहु: ' ( बृह ० ४।४।२ ) इत्येवमादिनाऽनुक्रमणेन । प्रकृतगामी च सर्व-शब्दो भवति - यथा सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्या इति, ये निमन्त्रिताः प्रकृता ब्राह्मणास्त एव सर्वशब्देनोच्यन्ते नान्ये । एवमिहापि ये प्रकृताः सप्त प्राणास्त एव सर्वशब्देनोच्यन्ते, नान्य इति । नन्वत्र विज्ञानमष्टममनुक्रान्तम्, कथं सप्तानामेवानुक्रमणम्? नैष दोषः, मनोविज्ञानयोस्तत्त्वाभेदावृत्तिभेदेऽपि सप्तत्वोपपत्तेः । तस्मात्सप्तैव प्राणा इति । * एवं प्राप्ते ब्रूम - हस्तादयस्त्वपरे सप्तभ्योऽतिरिक्ताः प्राणाः प्रतीयन्ते - ' हस्तौ वै ग्रहः ' ( बृह ० ३/२८ ) इत्यादिश्रुतिषु । ग्रहत्वं च बन्धनभावः, गृह्यते बध्यते क्षेत्रज्ञोऽनेन ग्रह-संज्ञकेन बन्धनेनेति, स च क्षेत्रज्ञो नैकस्मिन्नेव शरीरे बध्यते, शरीरान्तरेष्वपि तुल्यत्वा-द्वन्धनस्य । तस्माच्छरीरान्तरसंचारीदं ग्रहसंज्ञकं बन्धनमित्यर्थादुक्तं भवति । तथा च स्मृति: - ' पुर्यष्टकेन लिङ्गेन प्राणाद्येन स युज्यते । तेन बद्धस्य वै बन्धो मोक्षो मुक्तस्य तेन च ॥ ' इति प्राङ्मोक्षादग्रहसंज्ञकेनानेन बन्धनेनावियोगं दर्शयति । आथर्वणे च विषयेन्द्रिया-प्रतिपादक श्रुति प्रमाण है, यह निश्चित होता है । दोनों सूत्रोंकी यह दूसरी योजना है - प्राण सात ह होंगे, क्योंकि ' तमुत्क्रामन्तं ० ' ( उस जीवके शरीर से उत्क्रमण करनेपर उसके अनन्तर ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके पीछे उत्क्रमण करनेपर अनन्तर सम्पूर्ण प्राण ( इन्द्रियवर्ग ) उत्क्रमण करते हैं ) इस श्रुतिमें सातकी गति सुनी जाती है । परन्तु इस श्रुतिमें सवं शब्द मी पठित है, तो सातकी ही गतिकी किस प्रकार प्रतिज्ञा की जाती है? विशेषित होने से, ऐसा कहते हैं, क्योंकि ' स यत्रैष ० ' ( जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सर्वं ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूषु रूपज्ञान हीन हो जाता है ) ( चक्षु इन्द्रिय लिङ्गात्मासे एक रूप हो जाती है, तो लोग ' नहीं देखता ' ऐसा कहते हैं ) इत्यादि अनुक्रमणसे चक्षु आदिसे त्वक् पर्यन्त सात ही विशेषित प्राण यहाँ प्रकृत हैं । ' सर्वे प्राणाः ' यहाँपर सर्वशब्द प्रकृतगामी होता है अर्थात् सात इन्द्रियोंको विषय करता है । जैसे " सब ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिए " यहां जो निमन्त्रित प्रकृत ब्राह्मण हैं वे ही सर्वं शब्दसे कहे जाते हैं अन्य नहीं । वैसे ही यहाँ मी जो प्रकृत सात प्राण हैं वे ही सर्वशब्दसे कहे जाते हैं अन्य नहीं, परन्तु यहाँ आठवें विज्ञानका अनुक्रमण भी है, तो सातका ही अनुक्रमण कैसे कहते हो? यह दोष नहीं है, क्योंकि मन और विज्ञानका अभेद होनेसे वृत्ति भेद होनेपर भी सप्तत्वकी उपपत्ति होती है, इसलिए सात ही प्राण हैं । ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— ' हस्तो वै ग्रहः ' ( ही ग्रह है ) इत्यादि श्रुतियोंमें दूसरे हस्त आदि सातसे अतिरिक्त प्राण प्रतीत होते हैं, ग्रहत्व बन्धनभाव ग्रहीत होता है । क्षेत्रज्ञ - जीव इस ग्रह नामक बन्धनसे बांधा जाता है और वह एक ही शरीरमें नहीं बाँधा जाता है, क्योंकि अन्य शरीरोंमें भी बन्धन तुल्य है, इससे यह ग्रह संज्ञक बन्धन अन्य शरीरमें संचारशील है, ऐसा अर्थसे उक्त होता है । जैसे कि ' पुर्यष्टकेन लिङ्गेन ० ' ( वह प्राण आदि पुर्यष्टक लिङ्गसे युक्त होते हैं । उससे बद्धका बन्धन और उससे मुक्तका मोक्ष होता है ) यह स्मृति मोक्षके पूर्व इस ग्रह संज्ञक बन्धन से अवियोग सत्यानन्दी - दीपिका और पाद ये भी समानरूपसे बंधक हैं । अतः एकादश कार्य हैं, तदनुसार ' दशेमे पुरुषे प्राणा आत्म-कादशः ' यह एकादश इन्द्रिय प्रतिपादक श्रुति प्रमाण है । * ' वागादिपञ्च श्रवणादिपञ्च प्राणादिपञ्चाश्रमुखानि पञ्च । बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीमाहुः ॥ ' ( वि ० चू ० )
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५४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०२ पा ० ४ नुक्रमणे ' चक्षुश्च द्रष्टव्यं च ' इत्यत्र तुल्यवद्धस्तादीनीन्द्रियाणि सविषयाण्यनुक्रामति-' हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्वानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च ' ( प्र ० ४।८ ) इति । तथा ' दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरान्मयदुत्क्रामत्यथ रोद-यन्ति ' ( वृ ० ३।९ ।४ ) इत्येकादशानां प्राणानामुत्क्रान्ति दर्शयति । सर्वशब्दोऽपि त्र प्राणशब्देन संबध्यमानोऽशेषान्प्राणानभिदधानो न प्रकरणवशेन सप्त स्वेवावस्थापयितुं शक्यते, प्रकरणाच्छब्दस्य बलीयस्त्वात् । सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्या इत्यत्रापि सर्वेषा -मेवावनिवर्तिनां ब्राह्मणानां ग्रहणं न्याय्यम्, सर्वशब्दसामर्थ्यात् । सर्वभोजनासंभवात्तु तत्र निमन्त्रितमात्रविषया सर्वशब्दस्य वृत्तिराश्रिता, इह तु न किंचित्सर्वशब्दार्थसङ्को-चने कारणमस्ति । तस्मात्सर्वशब्दे नात्राशेषाणां प्राणनां परिग्रहः । प्रदर्शनार्थं च सप्ता-नामनुक्रमणमित्यनवद्यम् । तस्मादेकादशैव प्राणाः - शब्दतः कार्यतश्चेति सिद्धम् ॥६ ॥
( ३ प्राणाणुत्वाधिकरणम् । सू ० ७ ) अणवश्व ॥ ७ ॥
पदच्छेद - अणवः, च । सूत्रार्थ - और प्राण ( इन्द्रियाँ ) अणु सूक्ष्म हैं, क्योंकि वे इन्द्रियोंसे अग्राह्य हैं । * अधुना प्राणानामेव स्वभावान्तरमभ्युच्चिनोति । अणवश्चैते प्रकृताः प्राणाः प्रति-दिखलाती है, और आथर्वणमें विषय और इन्द्रियके अनुक्रमणमें ' चक्षुश्च द्रष्टव्यं च ' ( चक्षु और द्रष्टव्य ) इसमें समानरूपसे सविषय हस्त आदि इन्द्रियोंको ' हस्तौ चादतव्यं ० ' ( हस्त और ग्रहणं करनेयोग्य वस्तु, उपस्थ और आनन्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय, पाद और गन्तव्य स्थान ) इस प्रकार गिनाते हैं । इसप्रकार ' दशेमे पुरुषे ० ' ( देहमें ये दश प्राण हैं और मन ग्यारहा है ये जिस समय इस मयं शरीरसे उत्क्रमण करते हैं उस समय अपने सम्बन्धियोंको रोदन कराते हैं इसलिए रुद्र कहलाते हैं ) यह श्रुति एकादश प्राणोंकी उत्क्रान्ति दिखलाती है । सर्वं शब्द भी प्राणशब्द के साथ सम्बन्धित होता हुआ वशेष प्राणोंका अभिधान करता हुआ प्रकरण के बलसे सातमें ही अव-स्थापित नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रकरण से श्रुति बलवती है । ' सब ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ' यहाँपर भी पृथिवीपर रहनेवाले समस्त ब्राह्मणोंका ही ग्रहण न्याय है, कारण कि सर्व शब्दकी सामथ्यं है | परन्तु सबके भोजनका संभव न होनेसे वहाँ सर्वशब्दकी वृत्ति निमन्त्रित ब्राह्मणमात्र विषयक ग्रहण की जाती है । परन्तु यहाँ तो सर्वशब्दके अर्थके संकोचमें कोई भी कारण नहीं है, इस-लिए यहाँ सर्वशब्दसे समस्त प्राणोंका परिग्रह है और प्रदर्शनके लिए सातोंका अनुक्रमण है, यह भी दोषरहित है, अतः शब्द ( श्रुति ) से और कार्यसे एकादश ही प्राण हैं, यह सिद्ध हुआ || ६ || अब सूत्रकार प्राणोंके इन्द्रियोंके ही अन्य स्वभावका समुच्चय कहते हैं । ये प्रकृत प्राण अणु सत्यानन्दी - दीपिका ( वागादि पांच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पाँच ज्ञानेन्द्रियां, प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान ये पाँच प्राण, आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूत, अन्तःकरण चतुष्टय, अविद्या, काम और कर्म इनको पुर्यष्टक अथवा लिङ्गशरीर कहते हैं, क्योंकि आत्माके ज्ञापक हैं ) मरण समय ये सब जीवके साथ रहते हैं जबतक जीव इनसे मुक्त नहीं होता तबतक उसका मोक्ष नहीं होता है । * इसप्रकार संख्या विषयक श्रुतियोंका परस्पर विरोध न होनेपर एकादश इन्द्रियोंके कारण-भूत ब्रह्ममें श्रुतियोंका समन्वय सिद्ध है || ६ || * ‘ प्राणाः सर्वे अनन्ताः ' ( सब प्राण अनन्त हैं ) यह श्रुति इन्द्रियोंको विभु कहती है । सांख्य-