श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 581–590
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 581–590
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अधि ० ४ ०८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५४७ पत्तव्याः । अणुत्वं चैषां सौक्ष्म्यपरिच्छेदौन परमाणुतुल्यत्वम्, कृत्स्नदेहव्यापिकार्यानुप-पत्तिप्रसङ्गात् । सूक्ष्मा एते प्राणाः, स्थूलाश्चेत्स्युर्मरणकाले शरीरान्निर्गच्छन्तो बिलादहिरि-वोपलभ्येरप्रियम ( णस्य पार्श्वस्थैः । परिच्छिन्ना इचैते प्राणाः, सर्वगताश्चेत्स्युरुत्कान्तिगत्य-गतिश्रुतिव्याकोपः स्यात् । तद्गुगसारत्वं च जीवस्य न सिध्येत् । सर्वगतानामपि वृत्ति-लाभः शरीरदेशे स्यादिति चेत् - न, वृत्तिमात्रस्य करणत्वोपपत्तेः । यदेव ह्युपलब्धिसा-धनं वृत्तिरन्यद्वा तस्यैव नः करणत्वम्, संज्ञामात्रे विवाद इति करणानां व्यापित्वकल्पना निरर्थिका । तस्मात्सूक्ष्माः परिच्छिन्नाश्च प्राणा इत्यध्यवस्यामः ॥ ७ ॥
( ४ प्रणष्ठयाधिकरणम् । सू ० ८ ) श्रेष्ठश्च ॥ ८ ॥
पदच्छेद – श्रेष्ठः, च । सूत्रार्थ - और मुख्य प्राण भी इन्द्रियोंके समान ब्रह्मसे उत्पन्न होता है । मुख्यश्च प्राण इतर प्राण वद्ब्रह्म विकार इत्यतिदिशति । तच्चाविशेषेणैव सर्वप्राणानां ब्रह्मविकारत्वमाख्यातम्, ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' ( मुण्ड ० २1१1३ ) इति सेन्द्रिय मनोव्यतिरेकेण प्राणस्योत्पत्तिश्रवणात् । स प्राणमसृजत ' ( प्र ० ६ । ४ ) इत्यादिश्रवणे -भ्यश्च । किमर्थः पुनरतिदेश? अधिकाशङ्काऽपाकरणार्थः । नासदासीये हि ब्रह्मप्रधाने सूक्ते समझने चाहिए । इन प्राणोंकी अणुता - सूक्ष्मता और परिच्छिन्नता है, परमाणु तुल्यता नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर समस्त देह व्यापी कार्यकी अनुपपत्तिका प्रसङ्ग होगा । ये प्राण सूक्ष्म हैं, यदि स्थूल होते, तो मरण कालमें बिलसे निकले हुए सर्प के समान म्रियमाण पुरुष के शरीर से निकलते हुए वे पाश्वस्थ लोगोंसें उपलब्ध होते और ये प्राण परिच्छिन्न हैं । यदि सर्वगत हों, तो उत्क्रान्ति, गति और आगति श्रुतिका विरोध होगा और जीवमें अन्तःकरण गुण प्रधानत्व सिद्ध नहीं होगा । यदि कहो कि सर्वंगतोंका भी शरीर प्रदेश में वृत्तिलाम हो जायगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिमात्रमें करणत्व हो सकता है । वृत्ति हो अथवा अन्य हो जो उपलब्धिका साधन है वही हमारे मतमें करण है । संज्ञामात्रमें विवाद है, अतः करणोंमें व्यापित्व कल्पना निर्थक है, इससे हम ऐसा निश्चय करते कि इन्द्रिय सूक्ष्म और परिच्छन्न हैं ॥ ७ ॥
मुख्य प्राण भी अन्य प्राणोंके समान ब्रह्मका विकार है, इस प्रकार सुत्रकार अतिदेश करते हैं । वह ब्रह्मविकारत्व सब प्राणोंका समानरूपसे ही कहा गया है । ' एतस्माज्जायते ० ' ( इससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं ) और ' स प्राणमसृजत ' ( उसके प्राणको उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुतियोंसे भी इन्द्रिय सहित मनसे अतिरिक्त प्राणकी उत्पत्तिका श्रवण होता है । तो पुनः यह सत्यानन्दी - दीपिका मतमें महङ्कार जगत् व्यापी है, अतः इन्द्रियाँ उसका कार्यं होनेसे वे भी व्यापक सिद्ध होती हैं, किन्तु तत् तत् देहमें उनकी अभिव्यक्तिरूप प्रदेश वृत्तियाँ हैं । विभु होनेसे इन्द्रियोंकी उत्क्रान्ति आदि नहीं होते, इसप्रकार आक्षेप संगतिसे सांख्योंका पूर्वपक्ष है । इसप्रकार प्राणके परिमाणविषयक सन्देह होने पर सिद्धान्त कहते हैं - इन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं विभु नहीं, क्योंकि अनुद्भूतरूप और स्परांवाली हैं । यदि इन्द्रियाँ व्यापक हों, तो दूर और समीपस्थ सब पदार्थोंका ज्ञान प्रसक्त होगा और उत्कान्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियोंका बाध होगा । यदि बुद्धि व्यापक हो तो मात्मामें बुद्धिरूप उपाधि से ' एषोरणुरात्मा ' इस प्रकार अणुत्व सिद्ध नहीं होगा और जीवमें ' तद्गुणसारत्व ' न्यायका बाघ होगा । इसलिए ' प्राणाः अनन्ता: ' इस प्रकार श्रुति इन्द्रियोंमें प्रतिपादित अनन्तत्व उपासना के लिए है, अतः उसका उत्क्रान्ति आदि श्रुति के साथ कोई विरोध नहीं है ॥ ७ ॥
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582 ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ मन्त्रवर्णो भवति ' न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्नआसीत्प्रकेतः । आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किंचनास ' ( ऋ ० सं ० ८।७।१७ ) इति । आनीदिति प्राणकर्मोपादानात्प्रागु-त्पत्तेः सन्तमिव प्राणं सूचयति । तस्मादजः प्राण इति जायते कस्यचिन्मतिः । तामतिदेशे-नापनुदति । आनीच्छन्दोऽपि न प्रागुत्पत्त ेः: प्राणसद्भावं सूचयति, अवातमिति विशेषणात् ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ' इति च मूलप्रकृतेः प्राणादिसमस्त विशेष रहितत्वस्य दर्शितत्वात् । तस्मात्कारणसद्भावप्रदर्शनार्थ एवायमानीच्छन्द इति । 8 श्रेष्ठ इति च मुख्यं प्राणमभिद-धाति, ‘ प्राणो वाव ज्येष्टश्च श्रेष्ठश्व ' ( छा ०५ | १ | १ ) इति श्रुतिनिर्देशात् । ज्येष्ठश्च प्राणः, शुक्रनिषेक-कालादारभ्य तस्य वृत्तिलाभात् । न चेत्तस्य तदानीं वृत्तिलाभ. स्याद्योनौ निषिक्तं शुकं पूयेत, न संभवेद्वा । श्रोत्रादीनां तु कर्णशष्कुल्यादिस्थान विभागनिष्पत्तौ वृत्तिलाभान्न ज्येष्ठत्वम् । श्रेष्ठश्च प्राणः, गुणाधिक्यात्, ' न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुम् ' ( बृह ०६।१।१३ ) इति श्रुतेः || ८ || ( ५ वायुक्रियाधिकरणम् सू ० ९ -१२ ) न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ ९ ॥
पदच्छेद - न, वायुक्रिये, पृथगुपदेशात् । सूत्रार्थ - ( न वायुक्रिये ) मुख्य प्राण न वायु है और न इन्द्रियोंका व्यापार, किन्तु वायु विशेष है | ( पृथगुपदेशात् ) क्योंकि ' स वायुना ज्योतिषा ' ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इत्यादि श्रुतिमें उसका पृथक उपदेश है । * स पुनर्मुख्यः प्राणः किंस्वरूप इतीदान जिज्ञास्यते । तत्र प्राप्तं तावत् - श्रुतेर्वायुः अतिदेश किस लिए है? अधिक शङ्काके परिहार के लिए है । क्योंकि नासदासीय नामक ब्रह्म प्रधान सूक्तमें ' न मृत्युरासीदमृतं ' ( महाप्रलयकाल में मृत्यु नहीं थी और अमृत भी नहीं था, रात्रि तथा दिवसके चिह्न भूत चन्द्र और सूर्य नहीं थे, स्वधाके साथ अर्थात् पितृदेय भी नहीं था, वह अकेला व्यापार रहित [ ब्रह्म ] था, उससे पर अन्य कुछ नहीं था ) यह मन्त्रवर्ण है । ' आनीत् ' ( वह चेष्टा युक्त है ) यह शब्द प्राणकर्मका ग्रहण होनेसे उत्पत्तिके पूर्वं प्राणको विद्यमानकी माँति सूचित करता है इससे प्राण उत्पत्ति रहित है, इस प्रकार किसीको बुद्धि उत्पन्न हो सकती है, उसका अतिदेशसे निराकरण करते हैं । ' आनीत् ' शब्द मी उत्पत्ति के पूर्व प्राणके सद्भावको सूचित नहीं करता, क्योंकि ' अवातम् ' ( वात रहित ) यह विशेषण है और ' अप्राणो ० ' ( वह अप्राण, मन रहित और शुद्ध है ) इस प्रकार मूलप्रकृति प्राण आदि समस्त विशेषोंसे रहित दिखलाई गई है । इसलिए यह ' आनीत् ' शब्द कारणके सद्भाव प्रदर्शन के लिए ही है । ' प्राणो वा ० ' ( प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं ) इस श्रुति निर्देश से ' श्रेष्ठ ' यह शब्द मुख्य प्राणका अभिधान करता है । प्राण ज्येष्ठ है, क्योंकि वीर्यं निषेककाल ( गर्भाधान काल ) से लेकर उसका वृत्तिलाभ होता है । यदि उस समय उसका वृत्तिलाभ न हो तो गर्मा-में निषिक्त शुक्र दूषित हो जाता अथवा उसका संभव न होता । श्रोत्र आदि तो ज्येष्ठ नहीं है, क्योंकि कणं- शष्कुलि आदि स्थान विभाग निष्पन्न होनेपर उनका वृत्तिलाभ होता है, और गुणोंके आधिक्यसे प्राण श्रेष्ठ है, क्योंकि ' न वै ० ' ( तुम्हारे विना हम जीवित रहनेमें समर्थ नहीं हैं ) ऐसी श्रुति है || ८ || उस मुख्य प्राणका क्या स्वरूप है, इसप्रकारकी अब जिज्ञासा होती है । श्रुतिसे ऐसा प्राप्त सत्यानन्दी - दीपिका * वाणी आदिके जीवनका हेतुत्व प्राणका गुण है, इस गुणके अधिक्यसे प्राण श्रेष्ठ है । इसप्रकार ' आनीत् ' इस श्रुतिके साथ विरोध न होनेसे प्राणोत्पत्ति श्रुतिका ब्रह्ममें समन्वय है । मतः मख्य प्राण मी अन्य इन्द्रियोंके समान ब्रह्मसे उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
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अधि ० ५ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५४ ९ प्राण इति । एवं हि श्रूयते - ' यः प्राणः स वायुः स एष वायुः पञ्चविधः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः ' इति । अथवा तन्त्रान्तरीयाभिप्रायात्समस्तकरणवृत्तिः प्राण इति प्राप्तम् । एवं हि तन्त्रान्तरीया आचक्षते - ' सामान्या करणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्चे ' ति । अत्रो-च्यते न वायुः प्राणो नापि करणव्यापारः । कुतः? पृथगुपदेशात् । वायोस्तावत्प्राणस्य पृथगुपदेशो भवति - ' प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च ' ( छान्दो ० ३।१८।४ ) इति । नहि वायुरेव सन् वायोः पृथगुपदिश्येत । तथा करणवृत्तेरपि पृथगु-पदेशो भवति, वागादीनि करणान्यनुक्रम्य तत्र तत्र पृथक्प्राणस्यानुक्रमणात्, वृत्तिवृत्ति-मतोश्चाभेदात् । नहि करणव्यापार एव सन् करणेभ्यः पृथगुपदिश्येत । तथा ' एतस्मा-ज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुः ' ( मु ० २।१।३ ) इत्येवमादयोऽपि वायोः कर-णेभ्यश्च प्राणस्य पृथगुपदेशा अनुसर्तव्याः । नच समस्तानां करणानामेका वृत्तिः होता है कि प्राण वायु है, क्योंकि ' यः प्राणः स वायुः ० ' ( जो प्राण है वह वायु है वह वायु प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान भेदसे पाँच प्रकारका है ) ऐसी श्रुति है । अथवा अन्य ( सांख्य ) शास्त्रके अभिप्रायसे प्राण समस्त करणोंकी वृत्ति है, ऐसा प्राप्त होता है । क्योंकि ' इन्द्रियोंकी सामान्य वृत्ति प्राण आदि पाँच वायु है ' अन्य तन्त्रवाले ऐसा कहते हैं । इसपर कहते हैं—- प्राण वायु नहीं है और उसी प्रकार करणोंका व्यापार भी नहीं है । किससे? इससे कि उसका पृथगुपदेश है । ' प्राण एव ० ' ( प्राण ही मनोमय ब्रह्मका चतुर्थपाद है, वह वायुरूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है ) इसप्रकार प्राणका वायुसे पृथक् उपदेश है । प्राण वायु होता हुआ वायुसे पृथक् उपदिष्ट नहीं होना चाहिए । इसीप्रकार प्राणका इन्द्रिय व्यापारसे भी पृथक् उपदेश है, कारण कि वाणी आदि इन्द्रियोंक अनुक्रम कर तत् तत् प्रकरण में प्राणका पृथक् अनुक्रम है और वृत्ति और वृत्तिमानका अभेद है,. करणोंका व्यापार होता हुआ उसका करणोंसे पृथक् उपदेश नहीं होना चाहिए । उसीप्रकार ' एत-स्माज्जायते ० ' ( इससे प्राण, मन तथा सब इन्द्रियाँ, आकाश और वायु उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुति-योंका जिनमें प्राणका वायु और इन्द्रियोंसे पृथक् उपदेश है उनका मी अनुसरण करना चाहिए । समस्त सत्यानन्दी - दीपिका * इन्द्रियोंका विचार कर उनके व्यापारसे प्राणको पृथक् करनेके लिए प्राणकी उत्पत्तिका अतिदेश किया गया है । अब प्राणकी उत्पत्ति के अनन्तर प्रसंग संगति से उसके स्वरूपका विचार किया जाता है । क्या मुख्य प्राण वायुमात्र है वा इन्द्रियोंका साधारण व्यापार है अथवा अन्य तत्त्व है? इसप्रकार वायु और प्राण में भेद और अभेद श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे संशय होनेपर ' तन्त्र ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष दिखलाते हैं । सिद्धान्ती - ' अत्रोच्यते ' इत्यादिसे कहते हैं । किव मनोमय ब्रह्मके वाक्, प्राण, नेत्र और श्रोत्र ये चार पाद श्रुतिमें कहे गये हैं । प्राण अधिदैविक वायुद्वारा अभिव्यक्त होकर अपने व्यापार करनेमें समर्थ होता है, इसलिए श्रुतियोंमें प्राण और वागादि इन्द्रियोंके परस्पर संवादरूप लिङ्गसे और पृथक् उत्पत्तिरूप लिङ्गसे प्राण इन्द्रिय और उनके व्यापारसे पृथक् है । * प्राण प्रत्येक इन्द्रियका व्यापार है अथवा समुदायका? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि जो व्यापार नेत्र इन्द्रियसे साध्य है वह श्रोत्र इन्द्रियसे साध्य नहीं है । नेत्रका व्यापार रूप आदिका ग्रहण है, श्रोत्रका व्यापार शब्द ग्रहण है । प्रत्येक इन्द्रियका भिन्न - भिन्न व्यापार है । इनमें किसीका भी प्राणन व्यापार नहीं है । द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि उस समुदायमेंसे एक, दो, तीन अथवा चार इन्द्रियोंके न होनेसे प्राणन कार्य नहीं होगा । अतः प्राणन व्यापार श्रोत्र आदिके श्रवण आदि व्यापारसे अत्यन्त भिन्न है ।
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५५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ संभवति, प्रत्येकमेकैकवृत्तित्वात्समुदायस्य चाकारकत्वात् । ननु पञ्जरचालनन्यायेनै-तद्भविष्यति - यथैकपञ्जरवर्तिन एकादशपक्षिणः प्रत्येकं प्रतिनियतव्यापाराः सन्तः सं-भूयैकं पञ्जरं चालयन्ति एवमेकशरीरवर्तिन एकादश प्राणाः प्रत्येकं प्रतिनियतवृत्तयः सन्तः संभूयैकां प्राणाख्यां वृत्तिं प्रतिलप्स्यन्त इति । नेत्युच्यते युक्तं तत्र प्रत्येक वृत्तिभि-रवान्तरव्यापारैः पञ्जरचालनानुरूपैरेवोपेताः पक्षिणः संभूयैकं पञ्जरं चालयेयुरिति, तथा दृष्टत्वात् । इह तु श्रवणाद्यवान्तरव्यापारोपेताः प्राणां न संभूय प्राण्युरिति युक्तम्, प्रमाणाभावात्, अत्यन्त विजातीयत्वाच्च श्रवणादिभ्यः प्राणनस्य । * तथा प्राणस्य श्रेष्ठ-त्वाद्युद्घोषण, गुणभावोपगमश्च तं प्रति वागादीनाम्, न करणवृत्तिमात्रे प्राणेऽवकल्पते । तस्मादन्यो वायुक्रियाभ्यां प्राणः । कथं तर्हीयं श्रुतिः ' यः प्राणः स वायुः ' इति? उच्यते-वायुरेवायमध्यात्ममापन्नः पञ्चव्यूहो विशेषात्मनावतिष्ठमानः प्राणो नाम भण्यते, न
तत्त्वान्तरं नापि वायुमात्रम् । अतश्चोभे अपि भेदाभेदश्रुती न विरुध्येते ॥ ९ ॥
स्यादेतत् - प्राणोऽपि तर्हि जीववदस्मिञ्शरीरे स्वातन्त्र्यं प्राप्नोति, श्रेष्ठत्वाद्गुण-भावोपगमाच्च तं प्रति वागादीनामिन्द्रियाणम् । तथा ह्यनेकविधा विभूतिः प्राणस्य श्राव्यते-' सुप्तेषु वागादिषु प्राण एवैको हि जागर्ति प्राण एको मृत्युनाऽनाप्तः ' प्राणः संवर्गो वागादीन्संवृङ्क्ते प्राण इतरान्प्राणान्रक्षति मातेव पुत्रान् ' इति । तस्मात्प्राणस्यापि जीववत्स्वातन्त्र्यप्रसङ्गः । तं परिहरति-करणोंकी एक वृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि प्रत्येक इन्द्रियकी पृथक् एक एक वृत्ति है और समुदाय कारक नहीं है । परन्तु पञ्जर चालन न्याय से यह हो जायगा - जैसे एक पिंजरामें वर्तमान एकादश पक्षी प्रत्येक प्रतिनियत व्यापारवाले होते हुए भी मिलकर एक पिंजराको चलाते हैं, वैसे ही एक शरीरवर्ती एकादश त्राण प्रत्येक प्रतिनियत व्यापारवाले होते हुए भी मिलकर एक प्राण नामक वृत्तिको प्राप्त करेंगे । नहीं, ऐसा कहते हैं -- प्रत्येकमें रहनेवाले पिंजरा संचालनके अनुरूप अवान्तर व्यापारों से युक्त पक्षी मिलकर एक पिजराको हिलावें उसमें तो यह युक्त है, क्योंकि वैसा देखानेमें आता है । यहाँ तो श्रवण आदि अवान्तर व्यापारोंसे युक्त इन्द्रियाँ मिलकर प्राणन व्यापार करें यह युक्त नहीं है, कारण कि प्रमाण नहीं है और प्राणन व्यापार श्रवण मदिसे अत्यन्त विलक्षण है । इसीप्रकार प्राण में श्र ेष्ठत्व आदि उद्घोष और उसके प्रति वाक् आदिका गुणभाव स्वीकार यह करणवृत्तिमात्र प्राण में नहीं हो सकता, इसलिए प्राण वायु और इन्द्रियोंके व्यापार से भिन्न है । तो ' यः प्राणः स वायुः ' ( जो प्राण है वह वायु है ) यह श्रुति कैसे उपपन्न होगी? कहते हैं - यह वायु ही अध्यात्मभावापन्न पाँच प्रकारका होकर विशेषरूपसे अवस्थित होता हुआ प्राण नामसे कहा जाता है, वह न अन्य तत्त्व है और न वायु-मात्र है, इसलिए भेद श्रुति और अभेद श्रुति दोनों मी विरुद्ध नहीं हैं ॥ ९ ॥
ऐसा हो, परन्तु तब प्राणको भी इस शरीर में जीवके समान स्नातन्त्र्य प्राप्त होता है, क्योंकि वह श्रेष्ठ है. और वाणी आदि इन्द्रियाँ उसके अङ्गरूपसे स्वीकार हैं । इसीप्रकार ' सुप्तेषु ० ' ( वाक् आदि इन्द्रियोंके सुप्त होनेपर अकेला प्राण ही जागता है, अकेला प्राण ही मृत्युसे व्याप्त नहीं होता, वाक् आदिका अपनेमें संहरण करता है, अतः प्राण संवर्ग है, जैसे माता पुत्रोंकी रक्षा करती है, वैसे प्राण अन्य प्राणों - इन्द्रियोंकी रक्षा करता है ) इसप्रकार प्राणकी अनेक प्रकारकी विभूति सुनी जाती है । इसलिए प्राण में भी जीवके समान स्वातन्त्र्य प्रसंग है । उसका परिहार करते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका * यदि प्राणको इन्द्रियोंका व्यापार मानें, तो वाणी आदि ही प्रधान होंगे, तब श्रुतिगत प्राण और इन्द्रिय संवादसे विरोध होगा, इसलिए प्राण वायु और इन्द्रियोंके व्यापारसे भिन्न है, अतः देहमें प्राप्त प्राण आदि पाँच भेदवाला विकाररूपसे स्थित वायु ही प्राण है, यह अभेद श्रुतिका भाव है || ९ |
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अधि ० ५ सू ० १०-११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५५१ चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्टयादिभ्यः ॥ १० ॥
पदच्छेद - चक्षुरादिवत्, तु, तत्सहशिष्टयादिभ्यः । सूत्रार्थ – ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है । प्राण जीवात्मा के समान स्वतन्त्र नहीं है, किन्तु ( चक्षुरादिवत् ) चक्षु आदिके समान पराधीन है, क्योंकि प्राणोंके संवाद प्रकरण में ( तत्सह-शिष्टाचादिभ्यः ) चक्षु मादिके साथ प्राणका उपदेश है और उसमें अचेतनत्व आदिका प्रतिपादन है! * तुशब्दः प्राणस्य जीववत्स्वातन्त्र्यं व्यावर्तयति । यथा चक्षुरादीनि राजप्रकृति-वज्जीवस्य कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च प्रत्युपकरणानि न स्वतन्त्राणि, तथा मुख्योऽपि प्राणो राजमन्त्रिवजीवस्य सर्वार्थ करत्वेनोपकरणभूतो न स्वतन्त्रः । कुतः? तत्सहशिष्ट्या -दिभ्यः । तैश्चक्षुरादिभिः सहैव प्राणः शिष्यते प्राणसंवादादिषु । समानधर्मणां च सह शासनं युक्तं बृहद्रथंतरादिवत् । आदिशब्देन संहतत्वाचेतनत्वादीन्प्राणस्य स्वातन्त्र्य-निराकरणहेतून्दर्शयति ॥ १० ॥
स्यादेतत् - यदि चक्षुरादिवत्प्राणस्य जीवं प्रति करणभावोऽभ्युपगम्येत, विष-यान्तरं रूपादिवत्प्रसज्येत । रूपाद्यालोचनादिभिर्वृत्तिभिर्यथास्वं चक्षुरादीनां जीवं प्रति करणभावो भवति । अपि चैकादशैव कार्यजातानि रूपालोचनादीनि परिगणितानि यदर्थमेकादश प्राणाः संगृहीताः, नतु द्वादशमपरं कार्यजातमधिगम्यते यदर्थमयं द्वादशः प्राणः प्रतिज्ञायेतेति । अत उत्तरं पठति-अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॥ ११ ॥
पदच्छेद - अकरणत्वात्, च, न दोषः, तथा, हि, दर्शयति । ' तु ' शब्द जीवके समान प्राणकी स्वतन्त्रताकी व्यावृत्ति करता है । जैसे चक्षु आदि इन्द्रियाँ राजसेवकके समान जीवके कर्तृत्व, भोक्तृत्वके प्रति उपकरण हैं स्वतन्त्र नहीं हैं, वैसे ही मुख्य प्राण मी राजमन्त्रीके समान जीवका सर्वार्थं साधक होनेसे उपकरण भूत हैं स्वतन्त्र नहीं है । किससे? इससे कि उनके साथ इनका उपदेश आदि है । प्राणसंवाद आदिमें उन चक्षु आदिके साथ ही प्राणका शासन ( उपदेश ) किया जाता है और समान धर्मवालोंका बृहत् ( बृहदादित्ये प्रोतम् छा ० २ | १४ | १ ) रथान्तर ( रथन्तरमग्नौ प्रोतम् छा ० २।१२।१ ) आदिके समान एक साथ शासन युक्त है । भगवान् सूत्रकार सूत्रस्थ आदि शब्दसे संहतत्व, अचेतनत्व आदि प्राणके स्वातन्त्र्य निवारक हेतुओंको - दिखलाते हैं ॥ १० ॥
ऐसा हो, यदि प्राणका नेत्र आदिके समान जीवके प्रति करणभाव स्वीकार किया जाय, तो उसके भी रूप आदिके समान अन्य विषय प्रसक्त होगा । रूप आदिके आलोचन आदि अपनी वृत्तियों द्वारा चक्षु आदिका जीवके प्रति करणभाव होता है । और रूप अलोचन आदि एकादश कार्यं समु-दायकी ही गणना की गई है, जिनके लिए एकादश इन्द्रियोंका संग्रह किया गया है, किन्तु बारहवाँ अन्य कार्य समुदाय अधिगत नहीं होता, जिसके लिए इस बारहवें प्राणकी प्रतिज्ञाकी जाय । अतः इसका उत्तर कहते हैं— सत्यानन्दी - दीपिका * यदि प्राणको इन्द्रियोंका व्यापार न मानें, तो वह जीवके समान इस शरीमें स्वतन्त्र कर्ता, मोक्ता होगा? ' प्राणो न भोक्ता भोगोपकरणत्वात्, चक्षुरादिवत् ' ( प्राण भोक्ता नहीं है, क्योंकि भोगका साधन है जैसे चक्षु आदि ) जैसे बृहत् और स्थान्तर नामवाले सामविशेषका सर्वत्र साथ प्रयोग है अथवा सामत्व होनेके कारण दोनोंमें सादृश्य होनेसे साथ पाठ है, वैसे ही उपकरण रूपसे प्राणका इन्द्रियोंके साथ सादृश्य होने से उनके साथ पाठ है । ' प्राणो न भोक्ता सावयवत्वात् जड़त्वात् भौतिकत्वाच्च देहवत् ' ( प्राण मोक्ता नहीं है, क्योंकि वह देहके समान सावयव, जड़ और मौतिक है ) इसलिए प्राण इन्द्रियोंके समान उपकरण होने से इस शरीरमें स्वतन्त्र भोक्ता नहीं है ॥ १० ॥
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५५२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ सूत्रार्थ - ( अकरणत्वाच्च ) प्राणको ज्ञानमें करण न होनेसे ( न दोषः ) चक्षु आदिके समान अन्य विषय प्रसङ्गका दोष नहीं है, ( ही ) क्योंकि ( तथा ) उसीप्रकार ' तान्वरिष्ठः ' इत्यादि श्रुति शरीर और इन्द्रियोंका धारणरूप कार्यं प्राणमें ( दर्शयति ) दिखलाती है । * न तावद्विषयान्तरप्रसङ्गो दोषः, अकरणत्वात्प्राणस्य । नहि चक्षुरादिवत्प्राणस्य विषयपरिच्छेदेन करणत्वमभ्युपगम्यते । न चास्यैतावता कार्याभाव एव । कस्मात्? तथा हि श्रुतिः प्राणन्तरेष्वसंभाव्यमानं मुख्यप्राणस्य वैशेषिकं कार्यं दर्शयति प्राण-संवादादिषु - ' अथ ह प्राणा अहंश्रेयसि व्यूदिरे ' इत्युपक्रम्य ' यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतर-मिव दृश्यते स वः श्रेष्ठः ' ( छा ० ५।१।६, ७ ) इति चोपन्यस्य प्रत्येकं वागाद्युत्क्रमणेन तद्वृत्ति-मात्रहीनं यथापूर्वं जीवनं दर्शयित्वा प्राणोच्चिक्रमिषायां वागादिशैथिल्यापत्ति शरीरपात-प्रसङ्गं च दर्शयन्ती श्रुतिः प्राणनिमित्तां शरीरेन्द्रियस्थितिं दर्शयति I । ' तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामि ' इति चैतमेवार्थं श्रुतिराह - ' प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायम् ' ( बृह ० ४ | ३ | १२ ) इति च सुप्तेषु चक्षुरादिषु प्राण-निमित्तां शरीररक्षां दर्शयति । ' यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदैव तच्छुष्यति ' ( बृह ० १।३।१ ९ ) । ' तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति ' इति च प्राणनिमित्तां शरीरेन्द्रिय-पुष्टिं दर्शयति । ' कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि ’ इति, ' स प्राणमजसृजत ' इति च प्राणनिमित्ते जीवस्योत्कान्तिप्रतिष्ठे दर्शयति ॥ ११ ॥
यहाँ अन्य विषय प्रसङ्गदोष नही है, क्योंकि प्राण अकरण है । प्राणका चक्षु आदिके समान विषय परिच्छेद - निश्चयसे करणत्व स्वीकार नहीं किया जाता । इतने मात्रसे इसका कार्यमाव नहीं है, क्योंकि श्रुति अन्य प्राणोंमें न होनेवाला मुख्य प्राणका विशेषकार्यं प्राणसंवाद आदिमें दिखलाती है-' अथ ह प्राणा ० ' ( अनन्तर प्राणोंने अपनी श्रेष्ठता के लिए विवाद किया ) इसप्रकार आरम्भकर ‘ यस्मिन् व ० ' ( प्रजापति – तुममेंसे जिसके उत्क्रान्त होनेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ - सा दिखाई देने लगे घही तुममें श्रेष्ठ है ) ऐसा उपन्यास कर प्रत्येक वाक् आदिके उत्क्रमणसे केवल उसकी वृत्तिमात्र हीन पूर्वके समान जीवन दिखलाकर प्राणके उत्क्रमणकी इच्छा होनेपर वाक् आदिकी शैल्यप्राप्ति और शरीरपात प्रसङ्गको दिखलाती हुई श्रुति प्राण निमित्तक शरीर और इन्द्रियों की स्थिति दिखलाती है । ‘ तान्वरिष्ठः प्राण उवाच ० ' ( उनसे मुख्यप्राणने कहा – मोहको मत प्राप्त हो, मैं ही अपनेको पाँच प्रकारसे विभक्तकर इस कार्य करण संघातरूप शरीरको अवलम्बन कर धारण करता हूँ ) यह श्रुति भी इसी को कहती है । ' प्राणेन ० ' ( इस निकृष्ट शरीर नामक गृहकी प्राणसे रक्षा करता हुआ ) इसप्रकार यह श्रुति [ सुषुप्ति में ] चक्षु आदिके सुप्त होनेपर प्राण निमित्तक शरोरकी रक्षा दिखलाती है । ' यस्मात्कस्माच्चाङ्गात् ० ' ( जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण करता है, वह ( रस ) उसी जगह सूख जाता है ) और ' तेन यदश्नाति ० ' ( उस प्राणद्वारा जीव जो खाता है और जो पीता है उससे अन्य प्राणोंका रक्षण करता है ) इसप्रकार श्रुति प्राण निमित्तक शरीर और इन्द्रियों की पुष्टि दिखलाती है । ' कस्मिन्वहमुत्क्रान्त ० ', ( किसके देहसे उत्क्रान्त होनेपर मैं उत्कान्त होऊँगा और किसके देहमें प्रतिष्ठित होनेपर मैं प्रतिष्ठित होऊँगा ) यह विचार कर ' स प्राणमसृजत ० ' ( उसने प्राणको उत्पन्न किया ) इसप्रकार श्रुति जीवकी उत्क्रान्ति और प्रतिष्ठा प्राण निमित्तक दिखलाती है ॥ ११ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * ' यद्भोगकरणं तत् सविषयं दृष्टम् ' इस व्याप्तिका शरीरमें व्यभिचार है, क्योंकि शरीर एवं इन्द्रियोंका धारण और उत्क्रमण आदि प्राणके असाधारण कार्य हैं, अतः प्राणके निर्विषय होनेपर भी शरीर आणि समान उसमें उपकरणत्व अवश्यंभावी है ॥ ११. ॥
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अधि ० ५ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५५३ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्वयपदिश्यते ॥ १२ ॥
पदच्छेद - पञ्चवृत्तिः, मनोवत्, व्यपदिश्यते । सूत्रार्थ - प्राणको ' प्राणोऽपानो ० ' इत्यादि श्रुति से ( मनोवत् ) मनके समान ( पञ्चवृत्तिः ) पाँच वृत्तिवाला ( व्यपदिश्यते ) कहा जाता है । * इतश्चास्ति मुख्यस्य प्राणस्य वैशेषिकं कार्यम्, यत्कारणं पञ्चवृत्तिरयं व्यप-दिश्यते श्रुतिषु - ' प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः ' ( बृह ० १।५।३ ) इति । वृत्तिभेदश्चायं कार्यभेदापेक्षः प्राणः प्राग्वृत्तिरुच्छ्वासादिकर्मा, अपानोऽर्वाग्वृत्तिर्निश्वासादिकर्मा, व्यानस्तयोः संधौ वर्तमानो वीर्यवत्कर्महेतुः, उदान ऊर्ध्ववृत्तिरुत्क्रान्त्यादिहेतुः " समानः समं सर्वेष्वङ्गेषु योऽन्नरसान्नयतीति, एवं पञ्चवृत्तिः प्राणो मनोवत् । यथा मनसः पञ्च वृत्त एवं प्राणस्यापीत्यर्थः । श्रोत्रादिनिमित्ताः शब्दादिविषया मनसः पञ्च वृत्तयः प्रसिद्धाः, नतु कामः संकल्प इत्याद्याः परिपठिताः परिगृह्येरन्, पञ्चसंख्यातिरेकात् । नन्वत्रापि श्रोत्रादिनिरपेक्षा भूतभविष्यदादिविषयाऽपरा मनसो वृत्तिरस्तीति समानः पञ्चसंख्यातिरेकः । एवं तर्हि ' परमतमप्रतिषिद्धमनुमतं भवति ' इति न्यायादिहापि योगशास्त्र-प्रसिद्धा मनसः पञ्च वृत्तयः परिगृह्यन्ते -- ' प्रमाणविपर्यय विकल्पनिद्रास्मृतयः ' ( पात ० योग ० सू ० १।१।६ ) नाम । बहुवृत्तित्वमात्रेण वा मनः प्राणस्य निदर्शनमिति द्रष्टव्यम् । जीवो-पकरणत्वमपि प्राणस्य पञ्चवृत्तित्वान्मनोवदिति योजयितव्यम् ॥१२ ॥
और इस हेतु से भी मुख्यत्राणका विशेष कार्य है, क्योंकि ' प्राणोऽपानो ० ' ( प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान ) इस प्रकार श्रुतियों में यह प्राण पाँच वृत्तिवाला कहा जाता है । प्राण - प्राग्वृत्ति-जिसका व्यापार बाहर उच्छ्वास आदि देहधारण कर्म है । अपान - अर्वाग्वृत्ति- जिसका व्यापार मीतर आकर्षण और निश्वास कर्म है । व्यान इन दोनोंकी सन्धिमें वर्तमान होता हुआ वीर्यवान् कर्मका हेतु है । उदान ऊर्ध्वं वृत्तिवाला और उत्क्रान्ति आदि ( गति, आगति ) का हेतु है । जो सब अङ्गों में समानरूपसे अन्नरसों को ले जाता है वह समान है, इसप्रकार कार्यभेदकी अपेक्षा यह वृत्तिभेद है । ऐसे मनके समान प्राण मी पांच वृत्तिवाला है । जैसे मनकी पाँच वृत्तियाँ है, वैसे प्राणकी भी पाँच वृत्ति हैं, यह अर्थ है । श्रोत्र आदि निमित्तसे शब्द आदि विषयक मनकी पाँच वृत्तियाँ प्रसिद्ध हैं । परन्तु ' कामः संकल्पः ' इत्यादि श्रतिमें पठित काम, संकल्प आदि वृत्तियोंका यहाँ ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनके ग्रहणसे पाँच संख्या से अधिक हो जायंगी । परन्तु यहाँ मी श्रोत्र आदि निरपेक्ष भूत और भविष्यत् आदि विषयक अन्य भी मनकी वृत्तियाँ हैं, इसप्रकार पाँच संख्या से अधिकता समान है, यदि ऐसा हो तो ' पर मतसे अविरुद्ध अनुमत होता है ' इस न्यायसे यहाँ भी योगशास्त्रमें प्रसिद्ध मनकी पाँच वृत्तियों का ग्रहण किया जाता है – ' प्रवण ० ' ( प्रमाण - प्रमिति, विपर्यय ( भ्रम ) विकल्प ( शश-विषाणादिज्ञान ) निद्रा और स्मृति ) अथवा अनेक वृत्तिवाला होनेसे मन प्राणका दृष्टान्त है, ऐसा समझना चाहिए । अथवा ' प्राण भी जीवका उपकरण है पाँच वृत्तिवाला होनेसे मनके समान ' ऐसी योजना करनी चाहिए ॥ १२ ॥
सत्यानन्दी -दीपिका * काम आदि वृत्तिके समान शब्द आदि विषयक मनकी वृत्तिरूप ज्ञानमें पश्चत्य संख्याका नियम नहीं है, इससे प्राण और मनका उपमानोपमेय भाव नहीं हो सकता, इस अरुचि से ' नन्वत्रापि ' इत्यादिसे अन्य पक्षका ग्रहण किया गया है । ' प्रमाण ० ' यह उपमान योगमतको मानकर कहा गया है । परन्तु सिद्धान्तमें भ्रम और निद्रा ये अविद्याकी वृत्ति हैं मनकी नहीं । इस अरुचिसे सिद्धान्ती ' बहु-
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५५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ ( ६ श्रेष्ठाणुत्वाधिकरणम् । सू ० १३ ) अणुश्च ॥ १३ ॥
पदच्छेद - अणुः च । सूत्रार्थ - मुख्य प्राण अणु - सूक्ष्म और परिच्छिन्न है । * अणुश्चायं मुख्यः प्राणः प्रत्येतव्यः, इतरप्राणवत् । अणुत्वं चेहापि सौक्ष्म्यपरि-च्छेदौ, न परमाणुतुल्यत्वम्, पञ्चभिर्वृत्तिभिः कृत्स्नशरीरव्यापित्वात्, सूक्ष्मः प्राणः उत्कान्तौ पार्श्वस्थेनानुपलभ्यमानत्वात् परिच्छिन्न श्चोत्कान्ति गत्या गतिश्रुतिभ्यः । ननु विभुत्वमपि प्राणस्य समाम्नायते -- ' समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एमिस्त्रिभि-र्लोकैः समोऽनेन सर्वेण ' ( बृह ० १।३।२२ ) इत्येवमादिप्रदेशेषु । समष्टिव्यष्टिरूपेण हैरण्यगर्भेण प्राणात्मनैवैतद्विभुत्वमाम्नायते, समः प्लुषिणेत्यादिना साम्यचचनेन प्रतिप्राणिवर्तिनः प्राणस्य तस्माददोषः ॥ १३ ॥
( ७ ज्योतिराद्यधिकरणम् । सू ० १४-१६ ) ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ १४ पदच्छेद - ज्योतिराद्यधिष्ठानम्, तु, तदामनंनात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्ष के निरासार्थं है, ( ज्योतिराद्यधिष्ठानम् ) आदि देवताके अधीन चेष्टा होतो है, ( तदामननात् ) क्योंकि ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' तदुच्यते - आधिदैविकेन नाध्यात्मिकेन । अपि च परिच्छेद एव प्रदर्श्यते ॥ चक्षु आदि इन्द्रियों इत्यादि श्रुतियाँ है । * ते पुनः प्रकृताः प्राणाः किं स्वमहिम्नैव स्वस्मै स्वस्मै कार्याय प्रभवन्त्याहोस्विद्देव-ताधिष्ठिताः प्रभवन्तीति विचार्यते- -तत्र प्राप्तं तावत् यथा स्वकार्यशक्तियोगात्स्वमहिम्नैव और यह मुख्य प्राण अन्य प्राणोंके समान अणु सूक्ष्म समझना चाहिए, यहाँ भी अणुत्व सूक्ष्म और परिच्छिन्न है, परमाणु तुल्य नहीं है । प्राण सूक्ष्म है, क्योंकि पाँच वृत्तियोंद्वारा सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त और उत्क्रान्तिके समयमें पार्श्वस्थ लोगोंसे उपलब्ध नहीं होता । परिच्छिन्न भी है, क्योंकि उत्क्रान्ति, गति और मागतिकी श्रुतियाँ हैं । परन्तु ' समः प्लुषिणा ' ( पूतिका ( मच्छरसे सूक्ष्म जन्तु ) के समान, मच्छर के समान, हाथीके समान, इन तीन लोकोंके समान और इस सबके समान ) इत्यादि. स्थलों में प्राणकी विभुत्व प्रतिपादिक श्रुति है । सिद्धान्ती - उसपर कहते हैं - आधिदैविक समष्टि - व्यष्टिरूप हिरण्यगर्भकी प्राणरूपसे ही यह विभुत्व श्रुति है, आध्यात्मिकरूपसे नहीं । और ' पूतिकाके समान ' इत्यादि साम्य - वचनसे प्रत्येक प्राणी में वर्ती प्राणको परिच्छिन्न ही दिखलाया जाता है, इसलिए दोष नहीं है ॥ १६ ॥
क्या वे प्रकृत प्राण अपनी महिमासे ही अपने अपने कार्यके लिए समर्थ होते हैं, अथवा सत्यानन्दी -दीपिका वृत्तित्वमात्रेण ' आदिसे अपना मत अभिव्यक्त करते हैं । इस प्रकार प्राण और वायुकी भेद और भेद श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है ॥ १२ ॥
* गत अधिकरणमें प्राणकी उत्पत्ति और स्वरूप कहकर अब परिमाणको अतिदेशसे कहते हैं-' अणवश्च ' इस सूत्रमें और ' प्राणाः सर्वे अनन्ताः ' इस श्रुतिमें उपासनाके लिए इन्द्रियोंमें अनन्तता प्रतिपादित है और यहाँ प्राणका विभुत्व आधिदैविक है, इससे यहाँ पुनरुक्ति नहीं है । टीकाकार कहते हैं कि वहाँ प्रसङ्गसे सांख्यके आक्षेपका निराकरण है और यहाँ श्रुति विरोधका परिहार है, अतः पुनरुक्ति नहीं है । इसलिए सूक्ष्म और परिच्छिन्न श्रुतियोंका विभुत्व श्रुतिसे विरोध न होनेसे ब्रह्ममें समन्वय है ॥ १३ ॥
गत अधिकरणमें प्राण में आध्यात्मिक और आधिदैविक विभागसे अणुत्व और विभुत्व की
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अधि ० ७ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५५५ प्राणाः प्रवर्तेरन्निति । अपि च देवताधिष्ठितानां प्राणानां प्रवृत्तावभ्युपगम्यमानायां तासा-मेवाधिष्ठात्रीणां देवतानां भोक्तृत्वप्रसङ्गाच्छारीरस्य भोक्तृत्वं प्रलीयेत, अतः स्वमहि-नैवैषां प्रवृत्तिरिति । एवं प्राप्त इदमुच्यते- ' ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु ' इति । तुशब्देन पूर्व-पक्षो व्यावर्त्यते । ज्योतिरादिभिरग्न्याद्यभिमानिनीभिर्देवताभिरधिष्ठितं वागादि कारण-जातं स्वकार्येषु प्रवर्तत इति प्रतिजानीते । हेतुं व्याचष्टे - तदामननादिति । तथाह्याम-नन्ति - ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' ( ऐत ० २।४ ) इत्यादि । अग्नेश्चायं वाग्भावो मुख-प्रवेशश्च देवतात्मनाऽधिष्ठातृत्वमङ्गीकृत्योच्यते । नहि देवतासंबन्धं प्रत्याख्यायाग्नेर्वाचि मुखे वा कश्चिद्विशेषसंबन्धो दृश्यते । तथा ' वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् ' ( ऐत ० २।४ ) इत्येवमाद्यपि योजयितव्यम् । तथाऽन्यत्रापि ' वागेव ब्रह्मणचतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च ' ( छा ० ३।१८।३ ) इत्येवमादिना वागादोनामग्न्यादिज्योतिष्ट् वादिवच-नैतमेवार्थे द्रढयति । स वै वाचमेव प्रथनामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ' देवता अधिष्ठित होते हुए समर्थ होते हैं? इसपर विचार किया जाता है । पूर्वपक्षी - अपनी कार्य-शक्तिके योग से अपनी महिमासे ही प्राण अपने कार्यमें प्रवृत्त होने चाहिए, क्योंकि देवतासे अधिष्ठित प्राणोंकी प्रवृत्ति स्वीकार करनेपर उन अधिष्ठातृ देवताओंको ही मोक्तृत्व प्रसंग होनेसे शारीरका भोक्तृत्व लुप्त हो जायगा, अतः अपनी महिमासे ही इनकी प्रवृत्ति है, ऐसा यहाँ प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है - ' ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु ' ' तु ' शब्दसे पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति की जाती है I । ज्योति आदिसे अग्नि आदि अभिमानी देवताओंसे अधिष्ठित वाणी आदि करण समुदाय अपने कार्यमें प्रवृत्त होता है, ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं । हेतुका व्याख्यान करते हैं - ' तदामननात् ' इसीप्रकार ' अग्निर्वाग्भूत्वा ० ' ( अग्नि वाक् होकर मुखमें प्रविष्ट हुई ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । अग्निका यह वाक्भाव और मुख प्रवेश देवतारूपसे अधिष्ठातृत्व अङ्गीकारकर कहा जाता है, क्योंकि देवता-सम्बन्धका निराकरणकर अग्निका वाणी अथवा मुखमें कोई विशेष सम्बन्ध दिखाई नहीं देता । इसी प्रकार ' वायुः प्राणो भूत्वा ० ' ( वायु प्राण होकर नासिका में प्रविष्ट हुआ ) इत्यादिकी भी योजना करनी चाहिए । इसीप्रकार अन्यत्र भी ' वागेव ० ' वाणी ही ब्रह्माका चतुर्थ पाद है, वह अग्निरूप ज्योतिसे दोप्त होता है और अपना कार्य करता है ) इत्यादिसे वाक् आदि अग्नि आदि ज्योति हैं, आदि वचनसे इसी अर्थको श्रुति दृढ करती है । ' स ह बै ० ' ( उसे प्रसिद्ध प्राणने उद्गीथ कर्म में प्रधान वाग्देवताको मृत्यु ( अनृतवदन आदि ) से पार पहुँचाया । वह वाक् जब मृत्युसे मुक्त हुई तब वह अग्नि हो सत्यानन्दी - दीपिका व्यवस्था की गई है । अब प्रसंगसंगति से आध्यात्मिक प्राणोंकी स्वकार्यमें प्रवृत्ति अधिदैविक देवताके अधीन है अथवा नहीं? ऐसा सन्देह होता है, क्योंकि ' वाचा हि नामान्यभिवदति चक्षुषा रूपाणि पश्यति ' ( वाणीसे नामोंका उच्चारण करता है और चक्षुसे रूप देखता है ) इसप्रकार अन्वयव्यतिरेक युक्त तृतीया श्रुतिसे वाग् आदिकी स्वतन्त्र प्रवृत्तिका निषेध है, और ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' इत्यादि श्रुति अचेतन अग्नि आदिका उपादान कारण कहती है । परन्तु अग्नि यादि उनके अधिष्ठातृ देवता हैं, ऐसा नहीं कहती । किञ्च जीव अधिष्ठाता विद्यमान है, और अनेक देवताओंके अधिष्ठाता होनेपर परस्पर विरोधसे कोई भी कार्य नहीं हो सकेगा । इसलिए इन्द्रियाँ अपने कार्यमें स्वतन्त्र प्रवृत्त होतों हैं । सिद्धान्ती - ' एवं प्राप्त इदमुच्यते ' आदिसे सिद्धान्त कहते हैं । मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः चक्षुरादित्यम् ' ( मृत पुरुषकी वाणी अग्नि में, प्राण वायु में और चक्षु आदित्यमें लीन होते हैं ) इत्यादि श्रुति भी अग्नि आदि और वाक् आदिका अधिष्ठात्रविष्ठेय-
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५५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ५ पा ० ४ ( बृह ० १।३।१२ ) इति चैवमादिना वागादीनामग्न्यादिभावापत्तिवचनेनैतमेवार्थं द्योतयति । सर्वत्र चाध्यात्माधिदैवर्ताविभागेन वागाद्यग्न्याद्यनुक्रमणमनयैव प्रत्यासत्या भवति । स्मृ-तावपि - ' वागध्यात्ममिति प्राहुर्ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः । वक्तष्यमधिभूतं तु वह्निस्तत्राभिदैवतम् । ' इत्यादिना वागादीनामग्न्यादिदेवताधिष्ठितत्वं सप्रपञ्चं दर्शितम् । यदुक्तम् - स्वकार्थशक्ति-योगात्स्वमहिम्नैव प्राणाः प्रवर्तेरन्निति, तदयुक्तम्, शक्तानामपि शकटादीनामनडुहाद्य-घिष्ठितानां प्रवृत्तिदर्शनात् । उभयथोपपत्तौ चागमाद्वागादीनां देवताधिष्ठितत्वमेव निश्चीयते ॥ १४ ॥
यदप्युक्तम्- देवतानामेवाधिष्ठात्रीणां भोक्तृत्वप्रसङ्गो न शारीरस्येति, तत्परिहियते-प्राणवता शब्दात् ॥१५ ॥
पदच्छेद - प्राणवता, शब्दात् । सूत्रार्थ - ( प्राणवता ) प्राणवान् जीवके साथ इन्द्रियोंका स्वस्वामिभाव सम्बन्ध है, अतः वही मोक्ता है, ( शब्दात् ) क्योंकि इसमें ' स चाक्षुषः पुरुषो ' इत्यादि श्रुति है । * सतीष्वपि प्राणानामधिष्ठात्रीषु देवतासु प्राणवता कार्यकरणसंघातस्वामिना शारीरेणैवैषां प्राणानां संबन्धः श्रुतेरवगम्यते । तथा हि श्रुतिः - ' अथ यत्रैतदाकाशमनुवि-षण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणम् ' ( छा ० ८।१२।४ ) इत्येवंजातीयका शारीरेणैव प्राणानां संबन्धं श्रावयति । अपि चानेकत्वात्प्रति-गई ) इत्यादि श्रुतिवाक् आदिमें अग्नि आदि भावकी प्राप्ति वचनसे इसी अर्थको सूचित करती है । और सर्वत्र अध्यात्म और अधिदैवत विभागसे वाणी आदि और अग्नि आदि अनुक्रमण इस प्रत्यासत्ति-सम्बन्धसे होता है । स्मृतिमें भी ' वागध्यात्ममिति ० ' ( तत्त्वदर्शी ब्राह्मण वाणीको आध्यात्म कहते हैं, वक्तव्यको अधिभूत और उसमें अग्निको अधिदैवत कहते हैं ) इत्यादिसे वाक् आदि अग्नि आदि देवताओंसे अधिष्ठित हैं, ऐसा विस्तार पूर्वक दिखलाया गया है । जो यह कहा गया है कि प्राण अपनी कार्यशक्तिके योगसे अपनी ही महिमासे प्रवृत्त होंगे, यह अयुक्त
होनेपर भी बैल आदि अधिष्ठित होकर उनमें प्रवृत्ति देखी जाती है ।
मी आगमसे वाणी आदिमें देवता अधिष्ठितत्व निश्चित होता है ॥ १४
जो यह कहा गया है कि अधिष्ठातृ देवताओंको भोक्तृत्व प्रसंग परिहार किया जाता है-प्राणोंके अधिष्ठातृ देवताओंके होनेपर भी प्राणवान् कार्यकरण प्राणोंका सम्बन्ध श्रुति से अवगत होता है । जैसे कि ' अथ यत्रैतद ० ' उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसे रूप ग्रहण के जानता है कि मैं इसे सूँघूँ वह आत्मा है, उसे गन्ध ग्रहणके लिए सत्यानन्दी - दीपिका है, क्योंकि रथ आदि समर्थ दोनों प्रकारसे उपपत्ति होनेपर ॥ होगा और जीवको नहीं, उसका संघातके स्वामी जीवसे ही इन ( जिसमें यह चक्षु कृष्णतारासे लिए नेत्रेन्द्रिय है, जो ऐसा घ्राण है ) इसप्रकारकी श्रुति भाव सम्बन्ध दिखलाती है । रथ आदिकी बैल आदि अधिष्ठित होनेपर प्रवृत्ति देखी जाती है और .. दूध आदि अधिष्ठित न होते हुए भी दधि आदि रूपसे प्रवृत्त होते देखे जाते हैं । यद्यपि इस तरह दोनों प्रकारसे प्रवृत्तिका संभव है, तो भी वाणी आदि श्रुति प्रमाणसे अग्नि आदि देवताओंसे अघि-ष्ठित होकर ही अपने कार्यमें प्रवृत्त होते हैं ॥ १४ ॥
* ' जिस मैंने रूपको देखा वही मैं श्रवण करता हूँ ' इत्यादि प्रतिसंधानसे इस शरीर में एक ही जीवात्मा मोक्ता सिद्ध होता है । इसप्रकारका अनुसंधान अनेक भोक्ता माननेपर सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिए इस शरीरमें अनेक देवता भोक्ता नहीं हो सकते ॥ १५ ॥