श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 591–600

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 591–600

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अधि ० ८ सू ० १६-१७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५५७ करणमधिष्ठात्रीणां देवतानां न भोक्तृत्वमस्मि शरीरेऽवकल्पते । इको हायमस्मि शरीरे शारीरो भोक्ता प्रतिसंधानादिसंभवादवगम्यते ॥ १५ ॥

वस्य च नित्यत्वात् ॥ १६ ॥

पदच्छेद - तस्य च नित्यत्वात् । सूत्रार्थ - ( च ) और ( तस्य ) जीवके स्वकर्मोपार्जित शरीर में कर्तृत्व और मोक्तृत्व द्वारा ( नित्यत्वात् ) नित्य होने से देवताओं में भोक्तृत्व नहीं है । * तस्य च शारीरस्यास्मि शरीरे भोक्तृत्वेन नित्यत्वं पुण्यपापोपलेप संभवात्सुख-दुःखोपभोगसंभवाच्च, न देवतानाम् । ता हि परस्मिन्नैश्वर्ये पदेऽवतिष्ठमाना न हीने-S स्मिशरीरे भोक्तृत्वं प्रतिलब्धुमर्हन्ति । श्रुतिश्च भवति – ' पुण्यमेवासुं गच्छति न ह वै देवान्पापं गच्छति ' ( बृह ० १/५/२० ) इति । शारीरेणैव च नित्यः प्राणानां संबन्ध उत्क्रान्त्या-दिषु तदनुवृत्तिदर्शनात् ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूकामन्तं सर्वे प्राणा अनुत्क्रामन्ति ' ( बृह ० ४।४।२ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तस्मात्सतीष्वपि करणानां नियन्त्रीषु देवतासु न

शारीरस्य भोक्तृत्वमपगच्छति । करणपक्षस्यैव हि देवता, न भोक्तृपक्षस्येति ॥ १६ ॥

( ८ इन्द्रियाधिकरणम् । सू ० १७-१९ ) त इन्द्रियाणि तद्वयपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ १७ ॥

पदच्छेद – ते, इन्द्रियाणि, तद्वयपदेशात्, अन्यत्र, श्रेष्ठात् । सूत्रार्थ - ( श्रेष्ठात् ) मुख्यप्राणडे ( अन्यत्र ) अन्य ( ते ) वागादि ( इन्द्रियाणि ) इन्द्रिय शब्दसे कहे जाते हैं, ( तद्वयपदेशात् ) क्योंकि ' एतस्माज्जायते प्राण: ' इत्यादि श्रुतिसे उसका भेदसे व्यपदेश है । मुख्यश्चैक इतरे चैकादश प्राणा अनुक्रान्ताः । तत्रेदमपरं संदिह्यते - किं मुख्य स्यैव जीवात्मा के साथ ही प्राणोंका सम्बन्ध श्रवण कराती है । और प्रत्येक करणमें अधिष्ठातृ देवताओं के अनेक होनेसे उनका इस शरीर में मोक्तृत्व नहीं हो सकता, क्योंकि इस शरीरमें यह एक ही जीवात्मा प्रतिसंधान आदिके संभवसे भोक्ता अवगत होता है ॥ १५ ॥

और वह जीव इस शरीर में मोक्तारूपसे नित्य है, क्योंकि उसमें पुण्य पापके सम्बन्धका संभव है और सुख, दुःखके उपभोगका संभव है, किन्तु देवताओं में नहीं, कारणकि वे परम ऐश्वयं पदपर अवतिष्ठमान होते हुए इस दूषित शरीरमें मोक्तृत्व प्राप्त करनेके लिए योग्य नहीं हैं ' पुण्यमेवामु ० ' ( प्राजापत्य पदमें स्थित देवताओं को पुण्यही प्राप्त होता है पाप प्राप्त जीवात्माके साथ प्राणोंका नित्य सम्बन्ध है, क्योंकि ' तमुत्कामन्तं ० ' प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रान्त होनेके अनन्तर उसके पीछे श्रुतियोंसे उत्क्रान्ति आदिमें उनकी अनुवृत्ति देखी जाती है । इसलिए पर भी जीवका भोक्तृत्व हटता नहीं, क्योंकि करण पक्षके ही देवता हैं और मुख्य प्राण एक और अन्य एकादश प्राण अनुक्रान्त हैं । सत्यानन्दी -दीपिका * अदृष्टद्वारा जीव इन्द्रियोंका अधिष्ठाता है, इसलिए रथ नहीं होता ) यह श्रुति है | और ( उसके उत्कान्त होने के अनन्तर सब प्राण उत्क्रमण करते हैं ) इत्यादि इन्द्रियोंके नियामक देवताओंके होंने मोक्तृपक्षके नहीं हैं ॥ १६ ॥

उन एकादश प्राणोंके विषयमें स्वामीके समान भोक्ता है, देवता तो प्रकाशके समान इन्द्रियों के उपकारक होनेसे सारथीके समान अधिष्ठाता हैं, इससे देवता करण-पक्ष हैं और जीव मोक्तृपक्षका है । ' चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ' यह श्रुति साधनमात्रका प्रति-पादन करती है, इसलिए इन श्रुतियोंका ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' इत्यादि देवताधिष्ठात्री श्रुतिके साथ विरोध नहीं है ॥ १६ ॥

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५५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ५ पा ० ४ प्राणस्य वृत्तिभेदा इतरे प्राणा आहोस्वित्तत्त्वान्तराणीति । किं तावत्प्राप्तम्? मुख्यस्यै-वेतरे वृत्तिभेदा इति । कुतः? श्रुतेः । तथा हि श्रुतिमुख्यमितरांश्च प्राणान्संनिधाप्य मुख्यात्मतामितरेषां ख्यापयति - ' हन्ताऽस्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन् ' ( बृह ० - १।५।२१ ) इति । प्राणैकशब्दत्वाच्चैकत्वाध्यवसायः । इतरथा ह्यन्याय्यमनेकार्थत्वं प्राणशब्दस्य प्रसज्येत, एकत्र वा मुख्यत्वमितरत्र वा लाक्षणिकत्वमापद्येत । तस्माद्यथैक-स्यैव प्राणस्य प्राणाद्याः पञ्च वृत्तय एवं वागाद्या अप्येकादशेति । एवं प्राप्ते ब्रूमः -तत्त्वान्तराण्येव प्राणाद्वागादीनीति । कुतः? व्यपदेशभेदात् । कोऽयं व्यपदेशभेदः? ते प्रकृताः प्राणाः, श्रेष्ठं वर्जयित्वाऽवशिष्टा एकादशेन्द्रियाणीत्युच्यन्ते । श्रुतावेव व्यपदेश-दर्शनात् । ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' ( मु ० २।१।३ ) इति होवजातीयकेषु प्रदेशेषु पृथक्प्राणो व्यपदिश्यते, पृथक्चेन्द्रियाणि । ननु मनसोऽप्येवं सति वर्जनमिन्द्रिय-त्वेन प्राणवत्स्यात्, ' मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' इति पृथग्व्यपदेशदर्शनात् । सत्यमेतत् - हसूतौ त्वेकादशेन्द्रियाणीति मनोऽपोन्द्रियत्वेन श्रोत्रादिवत्संगृह्यते, प्राणस्य त्विन्द्रियत्वं न श्रुतौ स्मृतौ वा प्रसिद्धमस्ति । व्यपदेशभेदश्चायं तत्त्वभेदपक्ष उपपद्यते । तत्त्वैकत्वे तु स एवैकः सन्प्राण इन्द्रियव्यपदेशं लभते न लभते चेति विप्रतिषिद्धम् । तस्मात्तत्त्वान्तर-भूता मुख्यादितरे ॥ १७ ॥

कुतश्च तत्त्वान्तरभूताः? भेदश्रुतेः ॥ १८ ॥

सूत्रार्थ - ' अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः ' इत्यादि श्रुतिमें प्राणका इन्द्रियोंसे पृथक् श्रवण है, अतः वागादि इन्द्रियाँ प्राणसे पृथक् तत्त्व हैं । यह दूसरा सन्देह किया जाता है कि क्या अन्य प्राण मुख्यप्राणके ही वृत्तिभेद हैं अथवा अन्य तत्त्व हैं? तो क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - अन्य प्राण मुख्यप्राणके ही वृत्तिभेद हैं, किससे? श्रुतिसे । जैसे कि ' हन्तास्यैव ० ' ( अच्छा, हम सब इसी प्राणके रूप हो जायँ - ऐसा निश्चयकर वे वागादि सब इसीके रूप हो गये ) यह श्रुति मुख्य और अन्य प्राणोंको एक दूसरेके समीप स्थापित कर अन्य प्राणों-का मुख्यप्राणरूपत्व ख्यापन करती है । इस प्रकार उन सबको उद्देश्य कर ' प्राण ' इस एक शब्दका प्रयोग होनेसे उनके एकत्वका निश्चय होता है । अन्यथा प्राणशब्दको अनेकार्थत्व अन्याय ( वाक्यभेद ) प्रसक्त होगा अथवा एकमें मुख्यत्व और अन्य में लाक्षणिकत्व प्रसक्त होगा । इसलिए जैसे एक ही प्राणकी प्राण आदि पाँच वृत्तियाँ हैं वैसे ही वाक् आदि एकादश भी प्राणकी ही वृत्तियाँ हैं सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वाक् आदि मुख्यप्राणसे अन्य ही तत्त्व हैं । किससे? व्यपदेश-के भेदसे । यह व्यपदेश भेद क्या है? श्रेष्ठको ( प्राणको ) छोड़कर वे अवशिष्ट प्रकृत प्राण एकादश इन्द्र हैं, ऐसे कहे जाते हैं, क्योंकि श्रुतिमें ही ऐसा व्यपदेश भेद देखा जाता है । ' एतस्माजायते प्राणो ० ' ( उससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं ) इस प्रकारके श्रुतिवाक्यों में प्राणका पृथक् व्यपदेश किया जाता है और इन्द्रियों का पृथक् । परन्तु ऐसा होनेपर मन भी प्राणके समान इन्द्रिय नहीं होना चाहिए | क्योंकि ' मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' इस प्रकार पृथक् व्यपदेश देखने में आता है | यह ठीक है, किन्तु स्मृतिमें तो ' एकादशेन्द्रियाणि ' इससे मनका भी श्रोत्र आादिके समान इन्द्रियरूप से संग्रह किया जाता है | परन्तु प्राण इन्द्रिय है, ऐसा श्रुति ७ और स्मृतिमें प्रसिद्ध नहीं है । यह व्यपदेश-भेद तत्त्वभेद पक्षमें उपपन्न होता है । तत्त्व ( पदार्थ ) के एक होनेपर तो ' वह प्राण एक होता हुआ इन्द्रिय व्यपदेशको प्राप्त होता है नहीं होता है ' ऐसा विरुद्ध है । इसलिए अन्य - वागादि इन्द्रियां मुख्य-प्राणसे अन्य तत्त्वभूत हैं ॥ १७ ॥ और वागादि इन्द्रिय तत्त्वान्तरभूत क्यों हैं?

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अधि ० ८ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५५ ९ भेदेन वागादिभ्यः प्राणः सर्वत्र श्रूयते — ' ते ह वाचमूचुः ' ( बृह ० १ ३ | २ ) इत्युपक्रम्य वागादीन सुरपादमविध्वस्तानुपन्यस्य, उपसंहृत्य वागादिप्रकरणम् ' अथहेममासन्यं प्राणमूचुः ' इत्यसुरविध्वंसिनो मुख्यस्य प्राणस्य पृथगुपक्रमणात् । तथा ' मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकु-रुत ' इत्येवमाद्या अपि भेदश्रुतय उदाहर्तव्याः । तस्मादपि तत्त्वान्तरभूता मुख्यादितरे ॥ १८ ॥

कुतश्च तत्त्वान्तरभूताः? वैलक्षण्याच्च ॥ १ ९ ॥ पदच्चेद - वैलक्षण्यात्, च । सूत्रार्थ - और सुषुप्ति में प्राणकी स्थिति है और वाग् आदि इन्द्रियोंकी नहीं है, इस वैलक्षण्यसे मी वागादि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणसे भिन्न तत्त्व हैं । वैलक्षण्यं च भवति मुख्यस्येतरेषां च । सुप्तेषु वागादिषु मुख्य एको जागर्ति स एव चैको मृत्युनाऽनाप्त आप्तास्त्वितरे । तस्यैव च स्थित्युक्तातिभ्यां देहधारणपतनहेतुत्वं नेन्द्रियाणाम् । विषयालोचनहेतुत्वं चेन्द्रियाणां न प्राणस्येत्येवंजातीयको भूयाँलक्षणभेदः प्राणेन्द्रियाणाम् । तस्मादप्येषां तत्त्वान्तरभावसिद्धिः । यदुक्तम्- ' त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन् ' ( बृह ० १/५/२१ ) इति श्रुतेः प्राण एवेन्द्रियाणीति तदयुक्तम्, तत्रापि पौर्वापर्यालोचनाद्भ ेद-प्रतीतेः । तथा हि - ' वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दध्रे ' ( बृ ० १।५२१ ) इति वागादीनोन्द्रियाण्य-नुक्रम्म ' तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तस्माच्छ्राम्यत्येव वाकू ' इति च श्रमरूपेण मृत्युना ग्रस्त-त्ववागादीनामभिधाय ' अथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणः ' ( बृ ० १ | ५ | २३ ) इति पृथक्प्राणं मृत्युनानभिभूतं तमनुक्रामति । ' अयं वै नः श्रेष्ठ ': ( बृ ० १/५/२१ ) इति च श्रेष्ठतामस्यावधार-प्राणका वागादिसे सर्वत्र भेदसे श्रवण होता है, ' ते ह वाचमूचुः ' ( देवताओंने वाणी से कहा ) इस प्रकार उपक्रम कर असुरोंसे पाप विद्ध वाक् आदि इन्द्रियोंको कहकर और वाक् आदिके प्रकरणको समाप्तकर ' अथ हेममासन्यं ० ' ( अनन्तर मुखस्थ इस प्राणको कहा ) इस प्रकार असुरोका विध्वंस करनेवाले मुख्य प्राणका पृथक् उपक्रम है । उसी प्रकार ' मनो वाचं ० ' ( मन, वाक् और प्राण उनको प्रजापतिने अपने लिए किया > ) इत्यादि श्रुतियाँ भी उदाहरणरूपसे देनी चाहिएँ । इससे भी अन्य-वाक् आदि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणसे भिन्न तत्त्व हैं ॥ १८ ॥

और वागादि इन्द्रिय अन्य तत्त्व क्यों हैं? मुख्य प्राण और अन्यों ( वागादि ) में वैलक्षण्य भी है । वाक् आदि इन्द्रियोंके सुषुप्त होनेपर अकेला मुख्य प्राण जागता है और वही एक मृत्युसे व्याप्त नहीं होता और अन्य प्राण तो आक्रान्त होते हैं । वही स्थिति और उत्क्रान्तिसे देह धारण और पतनका हैतु है, किन्तु इन्द्रियाँ नहीं हैं । इन्द्रियाँ विषयके ज्ञानमें निमित्त हैं, किन्तु प्राण नहीं है इस प्रकारका प्राण और इन्द्रियोंमें महान् लक्षणभेद है, इससे मी वे अन्य तत्त्व सिद्ध होते हैं । जो यह कहा गया है कि ' वे एतस्यैव ० ' ( वे सब . उसके ही रूप हुए ) इस श्रुतिसे इन्द्रियाँ प्राण ही हैं, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि वहाँ भी पूर्वापरके पर्यालोचनसे भेद प्रतीत होता है । जैसे कि ' वदिष्याम्येवाहमिति ० ' ( वाकमे व्रत किया कि ' मैं बोलती ही रहूंगी ' ) इस प्रकार वाक् आदि इन्द्रियोंका अनुक्रम कर ' तानि मृत्युः ० ' ( मृत्युने श्रम होकर उनको व्याप्त किया, इससे वाणी श्रान्त ही होती है ) इस प्रकार वाक आदि इन्द्रियाँ श्रमरूप मृत्युसे ग्रस्त होती हैं, ऐसा कहकर ‘ अर्थममेव ० ' ( परन्तु यह मध्यम प्राण मृत्युसे. आक्रन्त नहीं होता ) इस प्रकार श्रुति मृत्युसे अनभिभूत उस प्राणका पृथक अनुक्रम करती है । ' अयं नै ' ( निश्चत यही हममें श्रेष्ठ है ) इस प्रकार श्रुति उसकी श्रेष्ठताका अवधारण करती है । इसलिए उसके साथ विरोध न होनेसे h

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५६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०२ पा ०४ यति । तस्मात्तदविरोधेन वागादिषु परिस्पन्दलाभस्य प्राणायत्तत्वं तद्रूपभवनं वागादीना मिति मन्तव्यं, न तादात्म्यम् । अत एव च प्राणशब्दस्येन्द्रियेषु लाक्षणिकत्वसिद्धिः । तथा च श्रुतिः - ' त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन् । तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणाः ' ( बृह ०१।५।२१ ) इति मुख्यप्राणविषयस्यैव प्राणशब्दस्येन्द्रियेषु लाक्षणिकीं वृत्तिं दर्शयति । तस्मात्तस्वान्तराणि प्राणाद्वागादीनीन्द्रियाणीति ॥ १ ९ ॥ ( ९ संज्ञामूर्ति क्लृप्त्यधिकरणम् । सू ० २०-२२ ) संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २० ॥

पदच्छेद - संज्ञामूर्तिवलृप्तिः, तु, त्रिवृत्कुर्वतः, उपदेशात् । सूत्रार्थ -- ( तु ) पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है । ( त्रिवृत्कुर्वतः ) ' तासां त्रिवृतम् ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित त्रिवृत् कर्ता परमेश्वर ही, ( संज्ञामूर्तिक्लृप्ति:) संज्ञा - नाम, मूर्ति - रूपका व्याकर्ता है जीव नहीं, ( उपदेशात् ) क्योंकि ' व्याकरवाणि ' इत्यादि श्रतिमें उसमें ही व्याकरण कर्तृत्व का उपदेश है । * सत्प्रक्रियायां तेजोबन्नानां सृष्टिमभिधायोपदिश्यते— ' सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमा-स्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति । तासां त्रिबृतमेकैकां करवाणीति ' ( छा ० ६।३।२ ) । तत्र संशय - किं जीवकर्तृकमिदं नामरूपव्याकरणमाहोस्वित्परमेश्वरक-र्तृकमिति । तत्र प्राप्तं तावत् - जीवकर्तृकमेवेदं नाम रूपव्याकरणमिति । कुतः? ‘ अनेन जीवे-नात्मना ' इति विशेषणात् । यथा लोके चारेणाहं पर सैन्यमनुप्रविश्य संकलयानीत्येवंजाती-के प्रयोगे चारकर्तृकमेव सत्सैन्य संकलनं हेतुकर्तृत्वाद्राजाऽऽत्मन्यध्यारोपयति संकल-घाक् आदिमें स्व व्यापार लाभ प्राणके अधीन है, ऐसा वाक् आदिका प्राण रूप होना है, ऐसा समझना चाहिए, तादात्म्य नहीं । अतएव प्राण शब्द इन्द्रियोंमें लाक्षणिक सिद्ध होता है । जैसे कि ' त एत-स्यैव ० ' ( वे सब इसीके रूप हो गये, अतः वे इसीके नामसे ' प्राण ' इस प्रकार कहे जाते हैं ) यह श्रुति मुख्यप्राण विषयक प्राण शब्दकी इन्द्रियोंमें लाक्षणिक वृत्ति दिखलाती है, इससे वाक् आदि इन्द्रियाँ प्राणसे पृथक् तत्त्व हैं ॥ १ ९ ॥ · सत्के प्रकरण में तेज, जल और अन्नकी सृष्टि कहकर " सेयं देवतैक्षत ० ' ( उस सत् नामक देवताने ईक्षण किया ' मैं इस जीवरूपसे ' इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेशकर नाम और रूपकी अभि-व्यक्ति करूँ और उनमेंसे एक - एक देवताको त्रिवृत् त्रिवृत् करूँ ) इस प्रकार उपदेश किया जाता है । यहाँ संशय होता है कि क्या यह नाम, रूपका व्याकरण जीवकर्तृक है अथवा पमेश्वर कर्तृक है? पूर्वपक्षी - यहाँ यह प्राप्त होता है कि यह नाम - रूपका व्याकरण ( रचना ) जीव कतृक है, किससे? इससे कि ' अनेन जीवेनात्मना ० ', ( इस जीव रूपसे ) ऐसा विशेषण है । जैसे लोकमें ' चार ( दूत ) द्वारा पर सैन्यमें प्रवेशकर मैं गणना करूँ ' इस प्रकारके प्रयोगमें सैन्य गणना चार कर्तृक होती हुई भी सत्यानन्दी - दीपिका * उत्पत्ति और उत्पादना ( उत्पन्न करना ) ये दोनों क्रमसे कार्य और कर्ताके व्यापाररूपसे प्रसिद्ध हैं । उसमें गत दो पादोंसे जगत् उत्पत्ति श्रुति विषयक विरोधका परिहार किया गया है । अब उत्पादन श्रुति विरोधका परिहार किया जाता है । उसमें मी सूक्ष्म भूत विषयक उत्पादन तो परमेश्वर कृत ही है, इसमें सब श्रुतियाँ समन्वित हैं । परन्तु स्थूल भूतोंके उत्पादनमें श्रुतियोंका विरोध है, उनके निराकरणके लिए इस अधिकरणका आरम्भ है । किञ्च नाम और रूपके भेदसे इन्द्रियाँ प्राणसे भिन्न हैं, यह कहा गया । अब प्रसङ्ग संगति से स्थूल नाम, रूप कर्तृक विचार किया जाता है । पूर्वपक्षमें जीव ही भूतोंका स्रष्टा है, और सिद्धान्तमें ब्रह्म सबका स्रष्टा है ।

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अधि ० ९ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५६१ यानीत्युत्तमपुरुषप्रयोगेण, एवं जीवकर्तृकमेव सन्नामरूपव्याकरणं हे तुकर्तृत्वादेवतात्मन्य-ध्यारोपयति व्याकर वाणीत्युत्तमपुरुषप्रयोगेण । अपि च डित्थडवित्थादिषु नामसु घट-शरावादिषु च रूपेषु जीवस्यैव व्याकर्तृत्वं दृष्टम् । तस्माज्जीवकर्तृकमेवेदं नामरूपव्या-करणमित्येवं & प्राप्तेऽभिधत्ते - ' संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु ' इति । तुशब्देन पक्षं व्यावर्तयति । संज्ञा-मूर्तिक्लप्तिरिति नामरूपव्याक्रियेत्येतत् त्रिवृत्कुर्वत इति परमेश्वरं लक्षयति, त्रिवृत्करणे तस्य निरपवादकर्तृत्वनिर्देशात् । येयं संज्ञाक्लृप्तिमूर्तिक्लुप्तिश्चाग्निरादित्यश्चन्द्रमा विद्यु-दिति " तथा कुशकाशपलाशादिषु पशुमृगमनुष्यादिषु च प्रत्याकृति प्रतिव्यक्ति चानेक प्रकारा, सा खलु परमेश्वरस्यैव तेजोबन्नानां निर्मातुः कृतिर्भवितुमर्हति । कुतः? उप-देशात् । तथा हि — ' सेयं देवतैक्षत ' इत्युपक्रस्य ' व्याकरवाणि ' इत्युत्तमपुरुषप्रयोगेण परस्यैव ब्रह्मणो व्याकर्तृत्वमिहोपदिश्यते । ननु जीवेनेति विशेषणाजीवकर्तृकत्वं व्याकरणस्याध्य-वसितम् -- नैतदेवम्, जीवेनेत्येतदनुप्रविश्येत्यनेन संबध्यत आनन्तर्यात्, न व्याकर-वाणीत्यनेन । तेन हि संबन्धे व्याकरवाणीत्ययं देवताविषय उत्तमपुरुष औपचारिकः कल्प्येत । नच गिरिनदीसमुद्रादिषु नानाविधेषु नामरूपेष्वनीश्वरस्य जीवस्य व्याकरण-सामर्थ्य मस्ति, येष्वपि चास्ति सामर्थ्यं तेष्वपि परमेश्वरायत्तमेव तत् । नच जीवो नाम परमेश्वरादत्यन्तभिन्नः, चार इव राशः, आत्मनेति विशेषणात् उपाधिमात्र निबन्धनत्वाच्च प्रयोजक कर्ता होने से राजा ' मैं गणना करूँ ' इस प्रकार उत्तम पुरुषके प्रयोगसे उसका अपनेमें अध्यारोप करता है, वैसे नाम, रूपका व्याकरण जीव कर्तृक होते हुए मी प्रयोजक कर्ता होने से देवता ' व्याकरवाणि ' ( व्याकरण करूं ) इस प्रकार उत्तमपुरुषके प्रयोगसे उसका अपने में अध्यारोप करता है । और डित्थ डवित्थ आदि नामोंमें और घट शराव आदि रूपोंमें जीवका ही व्याकरण कर्तृत्व देखा गया है । इसलिए यह नाम, रूप व्याकरण जीव - कर्तृक ही है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं-' संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु ' । ' तु ' शब्द से पूर्वपक्षको व्यावृत्ति करते हैं । ' संज्ञा मूर्तिक्लृप्ति ' नाम और रूपका व्याकरण ' त्रिवृत्कुर्वत ' यह परमेश्वरको लक्षित सूचित करता है, क्योंकि त्रिवृत्करणमें निरपवाद उसका ही कर्तृरूप से निर्देश है | अग्नि, आदित्य, चन्द्रमा, विद्युत् इस प्रकार जो यह नामका व्याकरण तथा कुश, काश, पलाश आदिमें और पशु, मृग, मनुष्य आदिमें प्रत्येक जाति और प्रत्येक व्यक्तिमें अनेक प्रकारका जो यह रूप व्याकरण है वह तेज, जल और अन्नके निर्माता परमेश्वरकी हो कृति हो सकती है । किससे? उपदेशसे । जैसे कि ' सेयं देवतैक्षत ' ( उस देवताने ' ईक्षण किया ) इस प्रकार उपक्रम कर ‘ व्याकरवाणि ' ( व्याकरण करूं ) इस तरह उत्तमपुरुषके प्रयोगसे परब्रह्मका ही व्याकरणकर्तृत्व यहाँ उपदेश किया जाता है । परन्तु ' जीवेन ' इस विशेषणसे व्याकरण जीव कर्तृक निश्चित किया गया है । यह ऐसा नहीं है, क्योंकि ' जीवेन ' इसका ' अनुप्रविश्य ' ( अनुप्रवेशकर ) इसके साथ सम्बन्ध है, परन्तु आनन्तर्य होनेके कारण ' व्याकरवाणि ' इससे सम्बन्धित नहीं है । उससे सम्बन्ध होनेपर ' व्याकरवाणि ' यह देवता विषयक उत्तमपुरुष गौपचारिक कल्पना करना पड़ेगा । और गिरि, नदी, समुद्र आदि नाना प्रकारके नाम और रूपोंके व्याकरण करनेकी अनीश्वर जीवमें सामथ्यं नहीं है, और जिनमें भी सामथ्यं है, उनमें भी वह परमेश्वर के अधीन ही है, और जैसे दूत राजासे अत्यन्त मिन है, वैसे जीव परमेश्वरसे अत्यन्त भिन्न नहीं है । क्योंकि ' आत्मना ' यह विशेषण है, और सत्यानन्दी - दीपिका * तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) प्रत्येकके तीन - तीन भाग हुए । एक भाग अपना और दो भाग अन्यके, इस प्रकार ' त्रिवृत्करण ' सिद्ध होता है । यह पञ्चीकरणका भी उपलक्षण समझना चाहिए । पदका अन्वय पदार्थको योग्यताके अधीन होता है, अतः जीवरूपसे उनमें अनुप्रवेशकर में

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५६२ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ जीवभावस्य । तेन तत्कृतमपि नामरूपव्याकरणं परमेश्वरकृतमेव भवति । परमेश्वर एव च नामरूपयोव्र्याकर्तेति सर्वोपनिषत्सिद्धान्तः, ' आकाशो ह वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तस्मात्परमेश्वरस्यैव त्रिवृत्कुर्वतः कर्म नामरूपयो-र्व्याकरणम् । त्रिवृत्करणपूर्वकमेवेदमिह नामरूपव्याकरणं विवक्ष्यते, प्रत्येकं नामरूप-व्याकरणस्य तेजोवन्नोत्पत्तिवचनेनैवोक्तत्वात् । तच्च त्रिवृत्करणमग्न्यादित्यचन्द्रविद्युत्सु श्रुति दर्शयति-- ' यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य ' ( छा ० ६।४।१ ) इत्यादिना । तत्राग्निरितीदं रूपं व्याक्रियते, सति च रूपव्याकरणे विषयप्रतिलम्भादग्नि-रितीदं नाम व्याक्रियते । एवमेवादित्यचन्द्र विद्युत्स्वपि द्रष्टव्यम् । अनेन चाग्न्याद्युदाहर-णेन भीमाम्भसतैजसेषु त्रिष्वपि द्रव्येष्वविशेषेण त्रिवृत्करणमुक्तं भवति, उपक्रमोपसंहा रयोः साधारणत्वात् । तथाह्यविशेषणैवोपक्रमः - ' इमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति ' ( छा ० ६ | ३ | ४ ) इति । अविशेषेणैव चोपसंहारः -- ' यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपम् ' इत्येवमादिः, ' यदविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानां समास इति ' ( छा ० ६।४।६।७ ) एव मन्तः ॥ २० ॥

तासां तिसृणां देवतानां वहिस्त्रिवृत्कृतानां सतीनामध्यात्ममपरं त्रिवृत्करण-मुक्तम्- ' इमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका मवति ' ( छा ० ६।४।७ ) इति । तदि-दानीमाचार्यो यथाश्रुत्येवोपदर्शयत्याशङ्कितं कंचिद्दोषं परिहरिष्यन्-जीवभाव तो केवल उपाधि निमित्तक है । इसलिए उससे जीव कृत नाम, रूप व्याकरण भी परमेश्वर कृंत ही होता है । और ' आकाशो बै ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाहक है ) इत्यादि श्रुतियोंसे परमेश्वर ही नाम और रूपका व्याकर्ता है, यह सब उपनिषदों का सिद्धान्त है । इसलिए नाम, रूपका व्याकरण त्रिवृत् करनेवाले परमेश्वरका ही कर्म है । यहाँ यह नाम, रूपका व्याकरण त्रिवृत्करण पूर्वक ही विवक्षित है, कारण कि प्रत्येक नाम, रूपका व्याकरण तेज, जल और अन्नकी उत्पत्ति वचनसे ही उक्त है । उस त्रिवृत्करणको अग्नि, आदित्य, चन्द्र और विद्युतमें ' यदग्ने रोहितं ० ' ( अग्निका जो रोहितरूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्लरूप है वह जलका है और जो कृष्णरूप है वह अन्नका है ) इत्यादिसे श्रुति दिखलाती है । उसमें ' अग्नि ' यह रूपका व्याकरण किया जाता है, रूपके व्याकरण होनेपर विषयके उपलम्भसे ' अग्नि ' यह नामका व्याकरण है । इसी प्रकार आदित्य, चन्द्र और विद्युत् में भी समझना चाहिए । और इन अग्नि आदि उदाहरणोंसे पार्थिव, जलीय और तेजस तीनों द्रव्यों में भी समानरूपसे त्रिवृत्करण उक्त होता है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहार उन तीनोंमें साधारण है । जैसे कि ' इमास्तिस्रो ० ' ( ये तीन देवता प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत् होते हैं ) इस प्रकार यह समानरूपसे उपक्रम है, और समानरूपसे यह उपसंहार है ' यदु रोहित ० ' ( जो कुछ रोहित - सा है वह तेजका रूप है ) इस प्रकार यह आदि है और ' यदविज्ञात ० ' ( तथा जो कुछ अविज्ञात - सा है वह इन देवताओंका ही समुदाय है ) यह अन्त है ॥ २० ॥

' इमास्तिस्रो ० ' ( ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत् होता है ) इसप्रकार बाह्य पदार्थमें त्रिवृत्कृत उन तीन देवताओंका दूसरा आध्यात्मिक त्रिवृत्करण कहा गया है । सत्यानन्दी - दीपिका ( पर देवता ) ही स्थूल नाम और रूपको ' व्याकरवाणि ' व्यक्त करूंगा, ऐसा अन्वय तो युक्त है । परन्तु जीवद्वारा उनको ' व्याकरवाणि ' व्यक्त करूँगा. यह अन्वय युक्त नहीं है । इसलिए ' व्याकरवाणि ' यह उत्तम पुरुषका प्रयोग परदेवता विषयक ही है, जीव विषयक नहीं ॥ २० ॥

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अघि ० ९ सू ० २१-२२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ५६३ मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ २१ ॥

पदच्छेद - मांसादि, भौमम्, यथाशब्दम्, इतरयोः, च । सूत्रार्थ - ( मांसादि ) माँस, पुरीष आदि ( मौमम् ) त्रिवृत्कृत अन्नात्मक भूमिके कार्य हैं ( च ) और इसी प्रकार ( यथाशब्दम् ) ' मूत्रं लोहितम् ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार ( इतरयोश्च ) मूत्र, आदि जल आदि कार्य हैं । * भूमेस्त्रिवृत्कृतायाः पुरुषेणोपभुज्यमानाया मांसादिकार्य यथाशब्दं निष्पद्यते । तथा हि श्रुतिः - ' अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्यविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्य-मस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ' ( छा ० ६ | ५ | १ ) इति । त्रिवृत्कृता भूमिरेवैषा व्रीहियवाद्यन्न-रूपेणाद्यत इत्यभिप्रायः । तस्याश्च स्थविष्ठं रूपं पुरीषभावेन बहिर्निर्गच्छति, मध्यम-मध्यात्मं मांसं वर्धयति, अणिष्ठं तु मनः । एवमितरयोरते जसोर्थथाशब्दं कार्यमव -गन्तव्यम् — एवं मूत्रं लोहितं प्राणश्चापां कार्यम् । अस्थि मज्जा वाक्तेजस इति ॥ २१ ॥

अत्राह - यदि सर्वमेव त्रिवृत्कृतं भूतभौतिकमविशेषश्रुतेः ' तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेके-कामकरोत् ' इति । किं कृतस्तर्ह्ययं विशेषव्यपदेश: - ' इदं तेज इमा आप इदमन्नम् ' इति? तथा ' अध्यात्ममिदमन्नस्याशितस्य कार्यं मांसादि? इदमेषां पीतानां कार्यं लोहितादि? इदं तेज-सोऽशितस्य कार्यमस्थ्यादि ' इति? अत्रोच्यते-वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ २२ ॥

पदच्छेद - वैशेष्यात्, तु, तद्वादः, तद्वादः । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्कित दोषकी निवृत्ति करता है । पृथिवी आदिका त्रिवृत्करणत्व समान होनेपर भी ( वैशेष्यात् ) पृथिवी आदिके आधिक्यसे ( तद्वादः ) यह पृथिवी है, यह जल है इत्यादि व्यवहार होता है । सूत्रस्थ द्वितीय तद्वाद: ' पद अध्यायको समाप्तिका सूचक है अब आचार्य मशङ्कित किसी एक दोषके परिहारकी इच्छा करते हुए उसको श्रुति के अनुसार ही दिखलाते हैं-पुरुषद्वारा त्रिवृत्कृत उपभोग की हुई भूमिका मांस आदि कार्यं श्रुतिके अनुसार निष्पन्न होता है । जैसे कि ‘ अन्नमशितं ० ' ( खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है, उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग है वह मल है, जो मध्यम माग है वह माँस और जो अत्यन्त सूक्ष्म है वह मन हो जाता है ) यह श्रुति है । यह त्रिवृत्कृत भूमि ही व्रीहि, यव आदि अन्नरूपसे खाई जाती है, ऐसा अभिप्राय है । उसका स्थूलतमरूप पुरीषभाव से बाहर निकलता है, मध्यमरूप अध्यात्म माँसको बढ़ाता है और अत्यन्त सूक्ष्म तो मन है । इस प्रकार अन्य - जल और तेजका भी श्रुतिके अनुसार कार्यं समझना चाहिए | इस प्रकार मूत्र, लोहित ( रक्त ) और जल के कार्य हैं और हड्डी, मज्जा और वाक् तेजके कार्यं हैं ॥ २१ ॥

यहाँ कहते हैं - तासां ० ' ( उसमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत् त्रिवृत किया ) इस सामान्य श्रुति यदि भूत- मौतिक सभी त्रिवृत्कृत हैं, तो ' इदं तेज ० ' ( यह तेज, यह जल और यह अन्न है ) और ' अध्यात्म-मिदमन्न ० ' ( शरीरमें जो माँस आदि है वह खाये हुए अन्नका कार्य है, यह लोहित आदि पीये हुए जलका कार्य है और यह अस्थि आदि खाये हुए तेज ( घृत तेल आदि ) का कार्य है ) इस श्रुतिमें यह विशेष व्यपदेश क्यों किया है? इसपर कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका * प्रत्येक त्रिवृत्कृत भूमि आदि स्थूल, मध्यम और सूक्ष्मरूपसे तीन - तीन प्रकारके हैं, और वायुरूप प्राण जलका कार्य कहा गया है वह औपचारिक समझना चाहिए । प्राणकी प्राय । जलके अधीन स्थिति होने से वह जलका कार्य कहा गया है, अतः कोई विरोध नहीं है ॥ २१ ॥

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५६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० २ पा ० ४ * तुशब्देन चोदितं दोषमपनुदति । विशेषस्य भावो वैशेष्यम्, भूयस्त्वमिति यावत् । सत्यपि त्रिवृत्करणे क्वचित्कस्यचिद्भूतघातोर्भूयस्त्वमुपलभ्यते ' अम्नस्तेजोभूयस्त्व-मुदकस्याब्भूयस्त्वं पृथिव्या अन्नभूयस्त्वम् ' इति । व्यवहारप्रसिद्धयर्थं चेदं त्रिवृत्करणम् । व्यव-हारश्च त्रिवृत्कृतरज्जुव देकत्वापत्तौ सत्यां न भेदेन भूतत्रयगोचरो लोकस्य प्रसिध्येत् । तस्मात्सत्यपि त्रिवृत्करणे वैशेष्यादेव तेजोबन्नविशेषवादों भूतभौतिकविषय उपपद्यते । तद्वादस्तद्वाद इति पदाभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्तिं द्योतयति ॥ २२ ॥

इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यापाकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥

तु शब्द से शङ्कित दोषका निराकरण करते हैं । विशेषका माव वैशेष्य है अर्थात् भूयस्त्व है । त्रिवृत्करण होनेपर भी ' अग्नेस्तेजोभूयस्त्वम् ० ' ( अग्निमें तेजो भूयस्त्व है, उदकमें जल भूयस्त्व है और पृथिवीमें अन्न भूयस्त्व है ) इस प्रकार कहीं पर किसी भूत धातुका भूयस्त्व उपलब्ध होता है । यह त्रिवृत्करण व्यवहार प्रसिद्धि के लिए है । त्रिवृत्कृत रज्जुके समान एकत्वका प्रसङ्ग होनेपर लोकमें भूतत्रय-विषयक भेद से व्यवहार सिद्ध न होगा । इसलिए त्रिवृत्करण होनेपर भी भूत- भौतिक विषयक तेज, जल, अन्न ऐसा विशेषवाद वैशेष्यसे ही उपपन्न होता है । ' तद्वादः तद्वाद: ' यह पदका अभ्यास - पुनः कथन अध्यायकी परिसमाप्तिको सूचित करता है ॥ २२ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके द्वितीयाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥ ४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * अतएव यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्ममें जो वेदान्तका तात्पर्य है, उसका स्मृति, न्याय, मतान्तर और श्रुतियोंके साथ कोई विरोध नहीं है ॥ २२ स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी- दीपिका ' के द्वितीयाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥ ४ ॥

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित अथ तृतीयोऽध्यायः । [ तृतीये साधनाख्याध्याये प्रथमपादे गत्यागति चिन्ता - बैराग्य निरूपणविचारश्च ] साधन नामक इस तृतीय अध्यायके प्रथम पादमें जीवकी संसार गति आगतिका विचार और वैराग्य निरूपण विचार किया जाता है । ( १ तदन्तरप्रतिपत्त्यधिकरणम् । सू ० १-७ ) तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॥१ ॥

पदच्छेद - तदन्तरप्रतिपत्ती, रंहति, संपरिष्वक्तः, प्रश्ननिरूपणाभ्याम् । सूत्रार्थ - ( तदन्तरप्रतिपत्तौ ) जीव अन्य देहकी प्राप्ति में देहके बीजभूत सूक्ष्म भूतोंसे ( संप-रिष्वक्तः ) वेष्टित होकर धूम आदि मागं द्वारा स्वर्गलोक में ( रंहति ) जाता है, ( प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ) क्योंकि ' वेत्थ यथा ' यह प्रश्न है और ' इति तु पञ्चम्यामा ० ' यह निरूपण - प्रतिवचन है । * द्वितीयेऽध्याये स्मृतिन्यायविरोधो वेदान्त विहिते ब्रह्मदर्शने परिहृतः । पर-पक्षाणां चानपेक्षत्वं प्रपञ्चितम् । श्रुतिविप्रतिषेधश्च परिहृतः । तत्र च जीवव्यतिरिक्तानि तत्त्वानि जीवोपकरणानि ब्रह्मणो जायन्त इत्युक्तम् । अथेदानीमुपकरणोपहितस्य जीवस्य संसारगतिप्रकारस्तदवस्थान्तराणि ब्रह्मतत्त्वं विद्याभेदाभेदौ गुणोपसंहारानुपसंहारौ सम्यग्दर्शनात्पुरुषार्थसिद्धिः सम्यग्दर्शनोपायविधिप्रभेदो मुक्तिफलानियमश्चेत्येतदर्थ-जातं तृतीयेऽध्याये निरूपयिष्यते प्रसङ्गागतं च किमप्यन्यत् । तत्र प्रथमे तावत्पादे पञ्चा-ग्निविद्यामाश्रित्य संसारगतिप्रभेदः प्रदर्श्यते वैराग्यहेतोः, ' तस्माज्जगुप्सेत् ' इति चान्ते श्रवणात् । जीवो मुख्यप्राणसचिवः सेन्द्रियः समनस्कोऽविद्याकर्म पूर्व प्रज्ञा परिग्रहः पूर्व-देहं विहाय देहान्तरं प्रतिपद्यत इत्येतदवगतम् । ' अथैनमेते प्राणा अमिसमायन्ति ' इत्येव -मादेः ‘ अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते ' ( बृह ० ४ | ४ | १ - ४ ) इत्येवमन्तात्संसारप्रकरणस्था-च्छन्दात् धर्माधर्मफलोपभोगसंभवाच्च । स किं देहबीजैर्भूतसूक्ष्मैरसंपरिष्वक्तो द्वितीय अध्याय में वेदान्त प्रतिपादित ब्रह्म दर्शनमें स्मृति और न्यायके विरोधका परिहार किया गया है । परपक्ष अनपेक्षित है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन और श्रुतिविरोधका परिहार किया गया है, और उनमें जीवसे व्यतिरिक्त जीवके उपकरण तत्त्व ब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, यह कहा गया है । अब उपकर-पति जीवक संसार गतिका प्रकार उसकी अन्य अवस्थाएँ, ब्रह्मतत्त्व, विद्याका भेद और अभेद, गुणों का उपसंहार और अनुपसंहार, सम्यग्ज्ञानसे पुरुषार्थकी सिद्धि, सम्यग्ज्ञानके उपायविधिका भेद और मुक्तिफलका अनियम, इस विषय समुदायका तृतीय अध्यायमें निरूपण किया जायगा और प्रसंगसे आया हुआ कुछ अन्य भी कहा जायगा । वहाँ प्रथम पादमें पञ्चाग्नि विद्याका आश्रय कर ' तस्माज्जु गुप्सेत् ' ( उससे - गमनागमन में दुःख होनेसे स्वर्ग आदिमें घृणा करे ) इस प्रकार अन्तमें श्रवणसे संसार गतिका प्रभेद वैराग्यकें लिए दिखलाया जाता है | मुख्यप्राण सचिव जीव इन्द्रिय, मन, अविद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा जन्मान्तर संस्कारोंके साथ पूर्वं देहका त्यागकर अन्य देहको प्राप्त होता है, यह अव-गत हुआ । क्योंकि ' अथैनमेते ० ' ( मरण समय में ये वाक् आदि इन्द्रियां जीवके प्रति हृदय में एकत्रित हो जाती हैं ) यहाँसे लेकर ' अन्यन्नवतरं ० ' ( अन्य अधिक सुन्दर और कल्याणतर रूप देहकी रचना करता है ) यहाँ तक संसार प्रकरणस्थ श्रुति है तथा धर्म और अधर्मके फल उपभोगका संभव भी है । वह जीव क्या सत्यानन्दी - दीपिका * वेदान्तार्थंके व्यविरुद्ध सिद्ध होनेपर उसके साधनभूत ज्ञानके विषयमें विचार उपस्थित होता है, इससे द्वितीय और तृतीय अध्याय में हेतुहेतुमद्भाव - कार्यकारण भाव संगति है, इस प्रकार लिङ्गो -पाधि जीवके प्राण आदि उपकरण सिद्ध होनेपर उस उपाधिवाले जीवको संसारगति आदिका विचार

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५६६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ गच्छत्याहोस्वित्सं परिष्वक्त इति चिन्त्यते । किं तावत्प्राप्तम्? असंपरिष्वक्त इति । कुतः? करणोपादानवद्भूतोपादानस्याश्रुतत्वात् । ' स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानः ' ( बृह ० ४।४।१ ) इति त्र तेजोमात्रा शब्देन करणानामुपादानं संकीर्तयति, वाक्यशेषे चक्षुरादिसंकीर्त -नात् । नैर्वभूतमात्रोपादानसंकीर्तनमस्ति । सुलभाश्च सर्वत्र भूतमात्राः । यत्रैव देह आरब्धव्यस्तत्रैव सन्ति, ततश्च तासां नयनं निष्प्रयोजनम् । तस्मादसंपरिष्वक्तो यातीति । एवं प्राप्ते पठत्याचार्यः -- ' तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः ' इति । तद-न्तरप्रतिपत्त देहबीजैभूतसूक्ष्मैः संपरिष्वक्तो रंहति गच्छतीत्यवगन्तव्यम् । कुतः? प्रश्ननिरूपणाभ्याम् । तथा हि प्रश्नः -- ' ' वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( छा ० ५ | ३ | ३ ) इति निरूपणं च प्रतिवचनं पर्जन्यपृथिवीपुरुषयोषित्सु पञ्चस्वग्निषु श्रद्धासोमवृष्ट्यन्नरेतोरूपाः पञ्चाहुतीदर्शयित्वा ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( छा ० ५ / ९ / १ ) इति । तस्मादद्भिः परिवेष्टितो जीवो रंहति व्रजतीति गम्य-ते । नन्वन्या श्रुतिर्जलूकावत्पूर्वदेहं न मुञ्चति यावन्न देहान्तरमाक्रमतीति दर्शयति ' तद्यथा देहके बीजभूत सूक्ष्म भूतोंसे असम्बन्धित होकर जाता है अथवा सम्बन्धित? इसपर विचार किया जाता है । तब क्या प्राप्त होता है? असम्बन्धित होकर जाता है । किससे? इससे कि इन्द्रियोंके ग्रहणके समान भूतों का ग्रहण श्रुत नहीं है । स एतास्तेजो मात्रा: ० ' ( वह इन [ प्राणोंको ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहणकर हृदयमें ही अनुक्रान्त होता है ) यहाँ ' तेजोमात्रा ः ' शब्द से श्रुति करणोंका ग्रहण कहती है, क्योंकि वाक्यशेषमें चक्षु आदिका कथन है । इसप्रकार भूतमात्राओंके ग्रहणका कथन नहीं है और भूतमात्रा सर्वत्र सुलभ हैं । जहाँ देहका आरम्भ होना चाहिए वहाँ ही वे हैं, उससे उनको साथ ले जाना निष्प्रयोजन है, इसलिए जीव असम्बन्धित होकर ही जाता है । ऐसा प्राप्त होनेपर आचार्य कहते हैं- ' तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः ' तदन्तरप्रतिपत्तौ - देहसे अन्य देहकी प्राप्तिमें देह के कारण सूक्ष्मभूतों से सम्बन्धित होकर जाता है, ऐसा समझना चाहिए, किससे? इससे कि ऐसा प्रश्न और निरूपण है | जैसे कि ' वेत्थ यथा ० ' ( प्रहाण हे श्वेतकेतु! क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन करनेपर जल ( सोम, घृत आदि रस ) ' पुरुष ' - शरीर संज्ञाको कैसे प्राप्त होता है ) यह प्रश्न है, और स्वर्गं, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँच अग्नियोंमें श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न और शुक्ररूप ये पांच आहु-तियाँ दिखलाकर ' इति तु पञ्चम्यामा ० ' ( इसप्रकार पाँचवी आहुतिके प्रक्षेप होनेपर जल ' पुरुष ' शब्द-वाची होता है ) ऐसा निरूपण - प्रतिवचन है । इसलिए जीव जलसे परिवेष्टित होकर जाता है, ऐसा ज्ञात होता है । परन्तु ' तद्यथा तृणजलायुका ० ' ( उसमें - देह संचारमें जैसे तृणजलायुका - घासका कोट विशेष ) सत्यानन्दी - दीपिका होता है अतः गत पाद और इस पादमें कार्यकारणभाव सम्बन्ध है । इस अध्यायके प्रथमपादमें वैराग्यका निरूपण है, जैसे स्वगं, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँचोंका अग्निरूपसे ध्यान करना चाहिए, यह पञ्चाग्नि विद्या है, जिससे कमद्वारा गमन और आगमनरूप अनर्थ होता है, इससे कर्म-फलमें घृणा करनी चाहिए, ऐसी पञ्चाग्निविद्याके उपसंहारमें श्रुति है । यह सब वैराग्यके लिए दिख-लाया गया है । द्वितीय पादमें स्वप्न आदि अवस्थाओंकी उक्तिसे ' त्वम् ' पदका अर्थ और ब्रह्मतत्त्व कहा गया है । तृतीय पादमें ' तत् " त्वम् ' का ऐक्य और उसके लिए उपासनाका विचार है । चतुर्थपादमें सम्यग्दर्शनके साधन संन्यास आदि, मुक्तिरूपफलका स्वर्गं आदिके समान तारतम्य नियमका अभाव अर्थात् जैसे स्वर्गं आदि फलमें तारतम्य होता है, वैसे मुक्तिरूप फलमें नहीं होता । प्रसङ्गसे प्राप्त कुछ अन्य देहात्मदूषण भी कहा जायगा । * जीव इस देहको त्यागकर दूसरे देहकी प्राप्तिमें देहके कारणभूत सूक्ष्मभूतों से सम्बद्ध होकर