श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 601–610

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 601–610

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अधि १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित तृणजलायुका ं ( बृह ० ४ | ४ | ३ ) इति । तत्राप्यप्परिवेष्टितस्यैव जीवस्य कर्मोपस्थापितप्रति--पत्तव्यदेहविषयभावनादीर्घभावमात्रं जलूकयोपमीयत इत्यविरोधः । एवं श्रुत्युक्ते देहा-न्तरप्रतिपत्तिप्रकारे सति याः पुरुषमतिप्रभवाः कल्पना व्यापिनां करणानामात्मनश्च देहान्तरप्रतिपत्तौ कर्मवशादवृत्तिलाभस्तत्र भवति । केवलस्यैवात्मनो वृत्तिलाभस्तत्र भवति । इन्द्रियाणि तु देहवदभिनवान्येव तत्र तत्र भोगस्थान उत्पद्यन्ते । मन एव वा केवलं भोगस्थानमभिप्रतिष्ठते । जीव एवोल्लुत्य देहा देहान्तरं प्रतिपद्यते शुक इव वृक्षा-द्वृक्षान्तरम्, इत्येवमाद्याः, ताः सर्वा एवानादर्तव्याः श्रुतिविरोधात् ॥ १ ॥

इसप्रकार अन्य श्रुति जलूका - कीटके समान जबतक जीव अन्य देहको प्राप्त नहीं होता तबतक पूर्व देहका त्याग नहीं करता, ऐसा दिखलाती है । उसमें भी जलसे परिवेष्टित जीवके कसे उपस्थापित प्राप्त करने योग्य देहविषयक भावनाका दीर्घमावमात्र जलूकासे उपमित है, अतः कोई विरोध नहीं है । इसप्रकार अन्य देहकी प्राप्तिका प्रकार श्रुतिसे उक्त होनेपर जो पुरुषबुद्धिसे उत्पन्न हुई कल्पनाएँ हैं- - आत्मा और इन्द्रियाँ व्यापक हैं, अन्य देहके प्राप्त होनेपर कर्मवश उसमें वृत्तिलाभ होता है । उस देहमें केवल आत्माका ही वृत्तिलाभ होता है, इन्द्रियाँ तो देहके समान तत् तत् भोगवस्थानमें नवीन ही उत्पन्न होती हैं । अथवा केवल मन ही मोग स्थानके प्रति जाता है । अथवा जैसे शुक एक वृक्षसे कूदकर अन्य वृक्षको प्राप्त होता है, वैसे जोव ही एक देहसे कूदकर अन्य देहको प्राप्त करता है, इत्यादि सभी कल्पनाएँ अनादरणीय हैं, क्योंकि श्रुतिके साथ उनका विरोध है ॥ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका जाता है कि नहीं? यह प्रश्न उठता है, क्योंकि इन्द्रियोंको साथ ले जाने में तो ' स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः ' यह श्रुति प्रमाण है । परन्तु सूक्ष्मभूतों को साथ ले जाने में कोई श्रुति नहीं है, कारण कि सूक्ष्म भूत सर्वत्र सुलभ हैं । इसलिए जीव सूक्ष्मभूतोंके विना ही जाता है । पूर्वपक्षमें निराश्रय प्राणकी गति न होनेसे वैराग्य असिद्ध है और सिद्धान्तमें तो भूताश्रय प्राणोंकी गति होने से वैराग्य सिद्ध है । ' राजा प्रहाण - श्वेतकेतु! ‘ वेत्थ यथा ० ' श्वेतकेतु - मैं नहीं जानता, तब राजाने उद्दालकसे इसका उत्तर कहा-' असौ वा लोको गौतमाग्निः ' ( हे गौतम! यह स्वर्गलोक अग्नि है ) यहाँ अग्निहोत्र में हवन किया गया दधि आदि जल यजमानके साथ संलग्न होकर स्वर्गलोक प्राप्तकर सोम नामक दिव्य देहरूपसे स्थित ( प्राप्त ) होता है । कर्मफलके अन्तमें वही सोमरूप दिव्यशरीर द्रवीभूत होकर पर्जन्यमें बहुत होता है । अनन्तर वह जल वृष्टिरूपसे अन्न आदिमें आता है । पुनः वही अन्न भक्षण करनेसे पुरुषमें जाता है । वही जल पुरुषद्वारा शुक्ररूपसे स्त्रीके गर्भ में आहुत होता है, इसप्रकार आप ( जल ) मनुष्यरूप होता है । इसप्रकार प्रश्नोत्तर से यह सिद्ध होता है कि जीव सूक्ष्मभूतों से वेष्टित होकर जाता है । * ‘ तद्यथातृणजलायुका ' यहाँ कर्मोंसे उपस्थापित प्राप्तव्य देव आदि देह है, उसे ' मैं देव हूँ ' इत्यादि भावनाद्वारा प्राप्तकर जीव पूर्वं देहका त्याग करता है अर्थात् मावी देह विषयक भावनाको लेकर यह कीटका उदाहरण है, इससे कोई विरोध नहीं है । यद्यपि आत्मा व्यापक ब्रह्मरूप है, उसमें गति आदिका असंभव है, तो भी घटाकाशके समान परिच्छिन्न उपाघिकी गति आदिको लेकर उसमें गति आदिका वर्णन है, यह पञ्चाग्निविद्यामें कहा गया है । उससे विरोध होने के कारण अन्य सभी कल्पनाएँ अनादरणीय हैं । उनमें ' व्यापिनां ' इससे सांख्योंकी कल्पना है कि केवल अन्य देहमें कर्मोंके बलसे इन्द्रिय समुदाय व्यक्त होकर अपना - अपना कार्य करता है । बौद्धोंकी कल्पना – केवल आलय विज्ञान ( निर्विकल्पज्ञान ) सन्तानरूप आत्मा है, उसका अन्य देहमें शब्द आदि विषयक सविकल्प ज्ञान नामक वृत्तिलाम होता है । ' इन्द्रियाणि ' इत्यादि भाष्यसे काणादोंकी कल्पना है । ' जीव एव ' इत्यादिसे दिगम्बर जैनोंकी कल्पना है । चार्वाक कहते हैं कि जीवित देह ही आत्मा है, उसके भस्म

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५६८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ नन्दाहृताभ्यां प्रश्नप्रतिवचनाभ्यां केवलाभिरद्भिः संपरिष्वक्तो रहतीति प्राप्नो-ति, अपशब्दश्रवणसामर्थ्यात् । तत्र कथं सामान्येन प्रतिज्ञायते सर्वैरेव भूतरूक्ष्मैः संपरिष्वक्त रहतीति? अत उत्तरं पठति-व्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ २ ॥

पदच्छेद- व्यात्मकत्वात्, तु, भूयस्त्वात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थ है । ( व्यात्मकत्वात् ) त्रिवृत्करण श्रुति से अन्य दो भूतोंके मेलनसे जल व्यात्मक है, अतः जलसे अन्य दो भूतोंका गमन सम्बन्ध सिद्ध है | ( भूयस्त्वात् ) कारण कि तेज आदिकी अपेक्षा से शरीरमें जल भूयस्त्व है । * तुशब्देन चोदितामाशङ्कामुच्छिनत्ति । ज्यात्मिका ह्यापः, त्रिवृत्करणश्रुतेः । ता-स्वारम्भिका स्वभ्युपगतास्त्रितरदपि भूतद्वयमवश्यमभ्युपगन्तव्यं भवति । व्यात्मकश्च देहत्रयाणामपि तेजोवन्नानां तस्मिन्कार्योपलब्धेः पुनश्च त्र्यात्मकस्त्रिधातुत्वात्त्रिभिर्वात पित्तश्लेष्मभिः । न स भूतान्तराणि प्रत्याख्याय केवलाभिरद्भिरारब्धुं शक्यते । तस्माद्-भूयस्त्वापेक्षोऽयमापः पुरुषवचस इति । प्रश्नप्रतिवचनयोर प्रशब्दो न कैवल्यापेक्षः । सर्व-देहेषु हि रसलोहितादिद्रवद्रव्यभूयस्त्वं दृश्यते । ननु पार्थिवो धातुर्भूयिष्ठो देहेषूपलक्ष्यते, नैष दोषः, इतरापेक्षयाप्यपां बाहुल्यं भविष्यति । दृश्यते च शुक्रशोणितलक्षणेऽपि देह-बीजे द्रवबाहुल्यम् । कर्म व निमित्तकारणं देहान्तरारम्भे । कर्माणि चाग्निहोत्रादीनि सोमाज्यपयः प्रभृतिद्रवद्रव्यव्यपाश्रयाणि, कर्मसमवायिन्यश्चापः श्रद्वाशब्दोदिताः सह कर्मभिद्य लोकाख्येऽग्नौ हूयन्त इति वक्ष्यति । तस्मादप्यषां बाहुल्य प्रसिद्धिः । बाहुल्या-च्चाशब्देन सर्वेषामेव देहबीजानां भूतसूक्ष्माणामुपादानमिति निरवद्यम् ॥२ ॥

परन्तु उदाहृत प्रश्न और प्रतिवचन द्वारा केवल जलसे परिवेष्टित जीव जाता है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि जलशब्द के श्रवणकी सामर्थ्य है, तो सभी सूक्ष्म भूतोंसे परिवेष्टित होकर जाता है, ऐसा सामान्यरूपसे प्रतिज्ञा कैसे की है? इससे उत्तर कहते हैं -तु शब्दसे पूर्वोक्त शङ्काका उच्छेद करते हैं - — त्रिवृत्करण श्रुतिसे जल त्र्यात्मक है, उस जलको देहका आरम्भक स्वीकार करनेपर अन्य दो भूत- तेज और पृथिवी में भी आरम्भकत्व अवश्य स्वीकार करना चाहिए | और देह व्यात्मक है, क्योंकि तेज, जल और अन्न तीनोंका भी उसमें कार्य उपलब्ध होता है । पुनः भी देह व्यात्मक है, कारण कि वात, पित्त और कफसे त्रिधातु है । अन्य भूतोंका प्रत्या-ख्यान ( त्याग ) कर केवल जलसे वह आरब्ध नहीं हो सकता । इसलिए ' जल पुरुषात्मक होता है ' ऐसा जो प्रश्न और प्रतिवचनमें जल शब्द है वह केवल जलकी अपेक्षा से नहीं है किन्तु भूयस्त्वकी अपेक्षासे है, क्योंकि सब देहों में रस- लोहित आदि द्रवीभूत द्रव्योंका बाहुल्य देखा जाता है । परन्तु पार्थिव धातु भी देहों में अधिकतर उपलब्ध होता है? यह दोष नहीं है, कारण कि अन्योंकी अपेक्षासे जल बहुत होगा । शुक्रशोणितरूप देहके कारणमें मी द्रव बाहुल्य देखने में आता है । अन्य ( स्वर्गीय ) देहके आरम्भमें कर्म निमित्तकारण हैं । अग्निहोत्र आदि कर्म सोम, घृत, पय आदि द्रव द्रव्यके आश्रित होते हैं, और कर्म सम्बन्धी जल श्रद्धाशब्दसे कहा गया है, वह कमोंके साथ स्वर्गलोक नामक अग्निमें हुत किया जाता है, ऐसा आगे कहेंगे । इससे भी जलका बाहुल्य प्रसिद्ध है । और बाहुल्य होनेसे अप् - जल शब्दसे सभी देहके बीज सूक्ष्मभूतोंका ग्रहण है, यह निर्दोष है ॥२ ॥

सत्यानन्दी- दीपिका

होनेपर पुनः गमन आदि नहीं होते । इत्यादि सभी कल्पनाएँ श्रुति विरुद्ध हैं ॥१ ॥

* खाये, पीये गये अन्न और जलका पारिपाक यह तेजका कार्य है । स्नेह और स्वेद आदि

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अधि ० १ सू ० ३-४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५६ ९ प्राणगतेश्व ॥ ३ ॥

पदच्छेद -- प्राणगतेः च । सूत्रार्थ - और ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति ' इस श्रुति में जीवके साथ इन्द्रियों की गति प्रति-पादित है, इससे भी जीव सूक्ष्म भूतोंसे परिवेष्टित जाता है | प्राणानां च देहान्तरप्रतिपत्तौ गतिः श्राव्यते- ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनू -स्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति ' ( बृह ० ४ । ४ । २ ) इत्यादिश्रुतिभिः । सा च प्राणानां गतिर्ना-श्रयमन्तरेण संभवतीत्यतः प्राणगतिप्रयुक्ता तदाश्रयभूतानामपामपि भूतान्तरोपसृष्टानां गतिरर्थादवगम्यते । नहि निराश्रयाः प्राणाः क्वचिद्गच्छन्ति दर्शनात् ॥३ ॥

अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॥ पदच्छेद - अग्न्यादिगतिश्रुतेः, इति चेत्, न, माक्तत्वात् । सूत्रार्थ ( अग्न्यादिगतिश्रुतेः ) ' अग्नि वागप्येति ' इत्यादि श्रुतिमें गमन प्रतिपादित है, इससे जीवके साथ इन्द्रियाँ नहीं जाती । ( इति चेन्न युक्त नहीं है, ( माक्तत्वात् ) क्योंकि ' तमुत्क्रामन्तं ' इत्यादि श्रुतियोंके साथ गति प्रतिपादक श्रुति गौण है । तिष्ठन्ति वा जीवतो ४ ॥ वाग् आदिका अग्नि आदिमें ) ऐसा यदि कहो तो यह विरोध होनेसे अग्नि आदिमें स्यादेतत् - नैव प्राणा देहान्तरप्रतिपत्तौ सह जीवेन गच्छन्ति, अग्न्यादिगतिश्रुतेः । तथा हि श्रुतिर्मरणकाले वागादयः प्राणा अग्न्यादीन्देवान्गच्छन्तीति दर्शयति- ' यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्यारिंग वागप्येति वातं प्राणः ' ( बृह ० ३।२।१३ ) इत्यादिनेति चेत् —न, भाक्तत्वात् । वागादीनामग्न्यादिगतिश्रुतिगणी, लोमसु केशेषु चादर्शनात् । ' ओषधीलोंमानि वनस्पती-न्केशाः ' ( बृह ० ३।२।१३ ) इति हि तत्राम्नायते । नहि लोमानि केशाश्चोत्प्लुत्यौषधीर्वनस्प तींश्च गच्छन्तीति संभवति । नच जीवस्य प्राणोपाधिप्रत्याख्याने गमनमवकल्प्यते । नापि और अन्य देहकी प्राप्तिमें ' तमुकामस्तं ० ' ( उस जीवके उत्क्रान्त होनेके अनन्तर प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रान्त होनेके अनन्तर सब प्राण - इन्द्रियाँ उत्क्रमण करते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्राणों की गति सुनाई जाती है । प्राणोंकी वह गति आश्रयके विना उपपन्न नहीं हो सकती, अतः प्राणों-की गतिसे प्रयुक्त प्राणोंके आश्रयभूत अन्य भूतोंसे सम्बद्ध जलकी भी गति अर्थतः अवगत होती है । क्योंकि निराश्रय प्राण न कहीं जाते हैं अथवा न कहीं रहते हैं, कारण कि जीवित देहमें प्राण साश्रय देखनेमें आते हैं ॥ ३ ॥

ऐसा हो, परन्तु प्राण देहान्तर प्राप्ति में जीवके साथ नहीं जाते, क्योंकि अग्नि आदिमें गति -श्रुति है | जैसे ' यत्रास्य ० ' ( जिस समय इस मृत पुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है और प्राण वायुमें लीन हो जाता है ) इत्यादिसे श्रुति मरण कालमें वाणी आदि प्राण अग्नि आदि देवोंको प्राप्त होते हैं, ऐसा दिखलाती है । यदि ऐसा कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि वह गोण है । वाक् आदि इन्द्रियोंकी अग्नि आदि गतिश्रुति गौण है, कारण कि लोम और केशों में ऐसा देखनेमें नहीं आता । ' ओषधीर्लोमानि ० ' ( लोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं ) ऐसी वहाँ श्रुति है । लोम और केश कूदकर व्योषधि और वनस्पतिको प्राप्त होते हैं, ऐसा संभव नहीं हैं । इसलिए जीवका सत्यानन्दी -दीपिका जलका कार्य है और गन्ध आदि पृथिवीका कार्य है, इसलिए देह व्यात्मक है । परन्तु इस देहमें प्राण और अवकाश रूप कार्योंकी भी साथ - साथ उपलब्धि होती हैं, अतः देह पाँच भूतात्मक है । इस अरुचिसे भाष्यमें ' पुनश्च ' इत्यादिसे दूसरी व्याख्या करते हैं ॥ २ ॥

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५७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ प्राणैर्विना देहान्तर उपभोग उपपद्यते । विस्पष्टुं च प्राणानां सह जीवेन गमनमन्यत्र श्राक्तिम् । अतो वागाद्यधिष्ठात्रीणामग्न्यादिदेवतानां वागाद्युपकारिणीनां मरणकाल उपकारनिवृत्तिमात्रमपेक्ष्य वागादयोऽग्न्यादीन्गच्छन्तीत्युपचर्यते ॥ ४ ॥

प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ ५ ॥

पदच्छेद – प्रथमे, अश्रवणात्, इति चेत्, न, ताः, एव, हि, उपपत्तेः । सूत्रार्थ - द्युलोक आदि पाँच अग्नियोंमें ( प्रथमे ) प्रथम द्युलोक नामक अग्निमें ( मश्रवणात् ) ' तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नी ' इत्यादि श्रुतिसे श्रद्धाका आहुतित्व श्रवण है जलका नहीं है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो, तो यह युक्त नहीं है, ( हि ) क्योंकि ' आपो हास्मै ' इत्यादि श्रुतिसे जल ही लक्षित होता है । ( उपपत्तेः ) कारण कि ऐसे प्रश्न और प्रतिवचनकी उपपत्ति है । * स्यादेतत् - कथं पुनः ' पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो मवन्ति ' ( छा ० ५।३।३ ) इत्येत-निर्धारयितुं पार्यते? यावता नैव प्रथमेऽग्नावपां श्रवणमस्ति । इह हि द्युलोकप्रभृतयः पञ्चा-ग्नयः पञ्चानामाहुतिनामाधारत्वेनाधीताः तेषां च प्रमुखे ' असौ वाव लोको गौतमाझि ' ( छा ० ५।४।१ ) इत्युपन्यस्य ‘ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति ' ( छा ० ५।४।२ ) इति श्रद्धा हौम्यद्रव्य-त्वेनावेदिता । न तत्रापो हौम्यद्रव्यतया श्रताः । यदि नाम पर्जन्यादिषूत्तरेषु चतुर्ष्वग्नि-ravi हौम्यद्रव्यता परिकल्प्येत, परिकल्प्यतां नाम, तेषु होतव्यतयोपात्तानां सोमादीनामन्ब-हुलत्वोपपत्तेः । प्रथमेत्वग्नौ श्रुतां श्रद्धां परित्यज्याश्रुता आपः परिकल्प्यन्त इति साहसमे-तत् । श्रद्धा च नाम प्रत्ययविशेषः, प्रसिद्धिसामर्थ्यात् । तस्मादयुक्तः पञ्चम्यामाहुतावपां पुरुषभाव इति चेत् - नैष दोषः, यतस्तत्रापि प्रथमेऽग्नौ ता एवापः श्रद्धाशब्देनाभि-प्राण उपाधि परित्याग करनेपर गमन नहीं हो सकता और प्राणोंके विना अन्य देहका उपभोग मी उपपन्न नहीं होता । और प्राणोंका जीवके साथ गमन अन्यत्र ( तमुत्क्रामन्तं ) विस्पष्ट सुनाया गया है | अतः वाणी आदिके अधिष्ठातृ और वाक् आदिके उपकारक अग्नि आदि देवताओंके मरण - कालमें उपकारकी निवृत्ति मात्रकी अपेक्षासे वाक् आदि अग्नि आदिमें लीन होते हैं, ऐसा उपचार किया गया है || ४ || यह शङ्का होती है— जब प्रथम अग्निमें जलका श्रवण नहीं है, तो ' पञ्चम्यामा ० ' ( पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है ) यह निर्धारण किस प्रकार हो सकता है? क्योंकि यहाँ द्युलोक आदि पाँच अग्नियां पांच आहुतियोंके आधाररूपसे अधीत हैं । उनमें से प्रथममें ' असौ वाव ० ' ( हे गौतम! यह द्युलोक अग्नि है ) ऐसा उपन्यासकर ' तस्मिन्नेतस्मिन्न ० ' ( इस द्युलोकरूप अग्निमें देव-यजमान श्रद्धाका हवन करते हैं ) इसप्रकार श्रद्धा होम्यद्रव्यरूपसे प्रतिपादित है, किन्तु वहाँ होम्यद्रव्य-रूपसे जल श्रुत नहीं है । यदि पर्जन्य आदि उत्तर चार अग्नियोंमें जलकी होम्यद्रव्यरूपसे कल्पना करे तो भले कल्पना करे, क्योंकि उनमें हवनीयरूपसे गृहीत सोम आदिमें जलके आधिक्यकी उप-पति है । किन्तु प्रथम अग्निमें तो श्रुत श्रद्धाका परित्यागकर अश्रुत जलकी कल्पना करते हो, यह केवल साहस है । इस प्रकार प्रसिद्धिकी सामथ्यसे श्रद्धा प्रत्यय - विश्वास विशेष है, इसलिए पाँचवी आहुतिमें जल का पुरुष भाव युक्त नहीं है । ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि वहाँ भी प्रथम अग्निमें श्रद्धा सत्यानन्दी - दीपिका * अब वह जल पुरुषसंज्ञक किसप्रकार होता है, इसका आक्षेप पूर्वक ' प्रथम ' इत्यादिसे समाधान करते हैं । यद्यपि प्रथम अग्निमें साक्षात् जलका श्रवण नहीं है, तो भी प्रश्न और प्रति-वचनकी उपपत्तिसे जलका ही ग्रहण है, क्योंकि ' पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक किसप्रकार होता

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अधि ० १ सू ०५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५७१ प्रेयन्ते । कुतः? उपपत्तेः । एवं ह्यादिमध्यावसानसंगानादनाकुलमेतदेकवाक्यमुपप-द्यते । इतरथा पुनः पञ्चम्यामाहुतावषां पुरुषवचस्त्वप्रकारे पृष्ठे प्रतिवचनावसरे प्रथमा-हुतिस्थाने यद्यनपो हौम्यद्रव्यं श्रद्धां नामावतारयेत्ततोऽन्यथा प्रश्नोऽन्यथा प्रतिवचन-मित्येकवाक्यता न स्यात् । ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' इति चोपसंहर-नेतदेव दर्शयति । * श्रद्धाकार्य च सोमवृष्ट्यादि स्थूलीभवदब्बहुलं लक्ष्यते । सा च श्रद्धाया अप्वे युक्तिः । कारणानुरूपं हि कार्यं भवति । नच श्रद्धाख्यः प्रत्ययो मनसो जीवस्य वा धर्मः सन्धर्मिणो निष्कृष्य होमायोपादातुं शक्यते पश्वादिभ्य इव हृदया-दीनीत्याप एव श्रद्धाशब्दा भवेयुः । श्रद्धाशब्दश्चाप्सूपपद्यते, वैदिकप्रयोगदर्शनात्-‘ श्रद्धा वा आपः ' इति । तनुत्वं श्रद्धासारूप्यं गच्छन्त्य आपो देहबीजभूता इत्यतः श्रद्धा-शब्दाः स्युः । यथा सिंहपराक्रमो नरः सिंहशब्दो भवति । श्रद्धापूर्वक कर्म समवायाच्चाप्सु श्रद्धाशब्द उपपद्यते, मञ्चशब्द इव पुरुषेषु । श्रद्धा हेतुत्वाच्च श्रद्धाशब्दोपपत्तिः, ' आपो हास्मै श्रद्धां संनमन्ते पुण्याय ' कर्मणे ' इति श्रुतेः ॥५ ॥

शब्दसे वहो जल अभिप्रेत है । किससे? इससे कि ऐसी उपपत्ति है । इसप्रकार आदि, मध्य और अन्तमें संगान - एकार्थता होनेसे विना आयासके ही यह एक वाक्य उपपन्न होता है । अन्यथा पाँचवीं आहुति में ' जल पुरुष संज्ञक किसप्रकार होता है '? ऐसा प्रश्न करनेपर प्रतिवचन के अवसर में यदि प्रथम आहुति के स्थानमें जलसे भिन्न हौम्यद्रव्यरूपसे श्रद्धाको ले आओ, तो प्रश्न एक प्रकारका और प्रतिवचन अन्य प्रकारका इसप्रकार एक वाक्यता नहीं होगी । ' इति तु ' ( ऐसे पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है ) इस तरह उपसंहार करती हुई श्रुति यही दिखलाती है, और श्रद्धाके कार्य सोम, वृष्टि आदि उत्तरोत्तर स्थूल होते हुए जलभूयस्त्व देखने में आते हैं । वही श्रद्धाके जल होने में युक्ति है । कारण के अनुरूप ही कार्य होता है । जैसे पशु आदिसे हृदय आदि अवयव निकालकर होमके लिए ग्रहण किये जा सकते हैं, वैसे श्रद्धा नामक प्रत्यय - विश्वास मन अथवा जीवका धर्मं होते हुए धर्मीसे निकालकर होमके लिए ग्रहण नहीं किया जा सकता, इसलिए जल श्रद्धा शब्द वाच्य होना चाहिए, और श्रद्धा शब्द जलमें उपपन्न होता है, क्योंकि ' श्रद्धा वा आपः ' ( निश्चय श्रद्धा जल है ) इसप्रकार वैदिक प्रयोग देखने में आता है । श्रद्धाका सूक्ष्मत्व सादृश्य जीवके साथ जानेवाले देहके बीजभूत जलमें है, इसलिए जलमें श्रद्धाशब्दका प्रयोग होता है । जैसे सिंह पराक्रम वाला पुरुष [ गौणरूपसे ] सिंहशब्द वाच्य होता है | श्रद्धा पूर्वक कर्ममें जलका सम्बन्ध होनेसे भी श्रद्धाशब्द जलमें उपपन्न होता है । जैसे पुरुषोंमें मञ्चराब्द उपपन्न होता है । ' आपो हास्मै ० ' ( निश्चय, इस यजमानके पुण्य कर्मके लिए जल श्रद्धा उत्पन्न करता है ) इसप्रकार श्रुतिसे श्रद्धाका हेतु होने से जलमें श्रद्धाशब्दकी उपपत्ति होती है ॥५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका है ' | यह प्रश्न है । इसके अनुसार ही उत्तर देना उचित है । इसलिए प्रथम अग्निमें भी श्रद्धाशब्दसे जल ही अभिप्रेत है, अन्यथा प्रश्न और प्रतिवचनमें अन्तर होनेसे एकवाक्यता सिद्ध नहीं होगी । किश्च यदि श्रद्धा शब्दसे जल ग्राह्य नहीं है तो जिन पर्जन्य आदि चार अग्नियोंमें जल श्रुत है उनके. विषयमें प्रश्न होता कि चौथी अग्नि में बहुत जल पुरुषात्मक किस प्रकार होता है? पाँचवी आहुति के विषयमें प्रश्न नहीं होता, अतः उपक्रम और उपसंहारसे यहाँ श्रद्धाशब्दसे जलका ही ग्रहण करना चाहिए । * ' तस्याः श्रद्धाहुतेः सोमः सम्भवति ' ( उस श्रद्धारूप आहुतिसे सोम उत्पन्न होता है ) इत्यादिसे श्रद्धा - सोम आदि पूर्व- पूर्वके परिणाम कहे गये हैं । इसलिए द्रवीभूत पदार्थका परिणाम होनेसे श्रद्धा जल है | ' मञ्चाः क्रोशन्ति ' ( मञ्च क्रोशण करते हैं ) जैसे यहाँ लक्षणासे मञ्चस्थ पुरुष बोलते हैं, यह अर्थ होता है, वैसे जलमें भी श्रद्धाका लाक्षणिक प्रयोग होता है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 606

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५७३ • ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ६ ॥

पदच्छेद - अश्रुतत्वात् इति चेत्, न, इष्टादिकारिणाम्, प्रतीतेः । सूत्रार्थ - श्रद्धा शब्दित जलके पुरुषवचस्त्व होनेपर भी जलसे वेष्टित जीव जाता है, यह युक्त नहीं है, ( श्रुतत्वात् ) क्योंकि जल आदिके समान जीव श्रुत नहीं है । ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( इष्टादिकारिणां प्रतीतेः ) क्योंकि ' अथ य इमे ' इत्यादि वाक्यशेषसे इष्टापूतं कर्म कारियोंकी प्रतीति होती है । अथापि स्यात्प्रश्नप्रतिवचनाभ्यां नामापः श्रद्धादिक्रमेण पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषा-कारं प्रतिपद्येरन् नतु तत्संपरिष्वक्ता जीवा रहेयुः, अश्रुतत्वात् । न ह्यत्रापामिव जीवानां श्रावयिता कश्चिच्छन्दोऽस्ति । तस्माद्रंहति संपरिष्वक्त इत्ययुक्तमिति चेत्-नैष दोषः, कुतः? इष्टादिकारिणां प्रतीतेः । ' अथ य इमे ग्राम इष्टापूत दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति ' ( छा ० ५ | १० | ३ ) इत्युपक्रम्येष्टादिकारिणां धूमादिना पितृयाणेन पथा चन्द्रप्राप्तिं कथयति – ' आकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा ' ( छा ० ५/१०१४ ) इति । त वेहापि प्रतीयन्ते ' तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ' ( छा ० ५।४।२ ) इति, श्रुतिसामान्यात् । तेषां चाग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादिकर्म -साधनभूता दधिपयः प्रभृतयो द्रवद्रव्यभूयस्त्वात्प्रत्यक्षमेवापः सन्ति । ता आहवनीये हुताः सूक्ष्मा आहुत्योऽपूर्वरूपाः सत्यस्ता नष्टादिकारिण आश्रयन्ति । तेषां च शरीरं नैधनेन विधानेनान्त्येऽग्नावृत्विजो जुह्वति - ' असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ' इति । * ततस्ताः श्रद्धापूर्वक कर्मसमवायिन्य आहुतिमय्य आपोऽपूर्वरूपाः सत्यस्ता निष्टादि-कारिणो जीवान्परिवेष्ट्यामुं लोकं फलदानाय नयन्तीति यत्तदत्र जुहोतिनाभिधीयते-प्रश्न और प्रतिवचनसे पांचवीं आहुतिमें श्रद्धा आदि क्रमसे जल पुरुषाकार प्राप्त करे, ऐसा मी हो, परन्तु उस जलसे परिवेष्टित जीव गमन नहीं करेंगे, क्योंकि अश्रुत है । यहाँ जलके समान जीवोंका श्रवण करानेवाली कोई श्रुति नहीं है । इसलिए जलसे परिवेष्टित होकर जीव जाता है यह अयुक्त है । ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, किससे? इससे कि इष्टादि कारियोंकी प्रतीति है । ' अथ य इमे ० ' ( तथा जो ये गृहस्थ लोग ग्राममें इष्ट पूर्त और दत्त इस प्रकार कर्म करते हैं वे धूमा-मिमानी देवताको प्राप्त होते हैं ) ऐसा उपक्रम कर ' आकाशाच्चन्द्रमसमेष ० ' ( वे आकाशसे चन्द्रलोकमें जाते हैं, यह चन्द्रमा राजा सोम है ) इस प्रकार श्रुति इष्ट आदि कर्म करनेवालोंकी धूम आदि पितृ-याणमार्गंसे चन्द्रमाकी प्राप्ति कहती है । ' तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ ० ' ( उस द्युलोक अग्निमें देवगण श्रद्धाका होम करते हैं, उस आहुति से सोम राजा उत्पन्न होता है ) इस सामान्य श्रुतिसे वे ही यहाँ भी प्रतीत होते हैं, और उन जीवोंके अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि कर्मोके साधन भूत दधि, पय आदि द्रवी -भूत द्रव्यके आधिक्यसे प्रत्यक्ष ही जल है । आहवनीय अग्निमें हूत वे सूक्ष्म आहुतियाँ अपूर्वरूप होती हुई उन इष्ट आदि कर्म करनेवालोंका आश्रयण करती हैं । ऋत्विज लोग उनके शरीरको मरणके विधान से अन्त्य अग्निमें ' असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ' ( यह स्वर्गलोकको जावे ) ऐसा कहकर होम करते हैं । इसके अनन्तर श्रद्धापूर्वक कर्मके साथ सम्बद्ध आहुतिमय वह जल अपूर्वरूप होता हुआ उन इष्ट आदि कर्म करनेवाले जीवोंको परिवेष्टित कर फल देनेके लिए उस लोकको ले जाता है, इस प्रकार जो सत्यानन्दी -दीपिका # जीवके साथ आहुतिमय जलके गमनमें दूसरी श्रुति भी है- अग्निहोत्र प्रकरण में राजा जनकने याज्ञवल्क्यसे छः प्रश्न किये हैं- ' न त्वेनैनयोः सायं प्रातराहुत्योस्त्वमुत्क्रान्ति न गतिं न प्रतिष्ठां न तृप्तिं न पुनरावृत्ति न लोकं प्रत्युत्थायिनं वेत्थ ' ( इन सायं और प्रातःकालकी आहुतियोंमें उत्क्रान्ति,

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अधि ० १ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित - ५७३ ' श्रद्धां जुह्वति ' ( बृह ०६।२ / ९ ) इति । तथा चाग्निहोत्रे षट् प्रश्नीनिर्वचन रूपेण वाक्यशेषेण ' ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतः ' इत्येवमादिनाग्निहोत्राहुत्योः फलारम्भाय लोकान्तरप्राप्तिः प्रदर्शिता । तस्मादाहुतीमयीभिरद्भिः संपरिष्वक्ता जीवा रंहन्ति स्वकर्मफलोपभोगायेति श्लिष्यते ॥ ६ ॥

कथं पुनरिदमिष्टादिकारिणां स्वकर्मफलोपभोगाय रंहणं प्रतिज्ञायते? यावता तेषां धूमप्रतीकेन वर्त्मना चन्द्रमसमधिरूढानामन्नभावं दर्शयति - ' एष सोमो राजा तदेवा-नामन्नं तं देवा मक्षयन्ति छा ० ५।१०।४ ) इति । ' ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ' ( बृह ० ६ | २ | १६ ) इति च समानविषयं श्रुत्यन्तरम् । नच व्याघ्रादिभिरिव देवैर्भक्ष्यमाणानामुपभोगः संभवतीति, अत उत्तरं पठति-भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ७ ॥

पदच्छेद - भाक्तम्, वा, अनात्मवित्त्वात्, तथा, हि, दर्शयति । सूत्रार्थ - ( वा ) शब्द शङ्कानिरासार्थं है, इष्ट आदि कर्मकारियोंमें अन्नत्व ( भाक्तम् ) गौण है, अन्यथा ' स्वगंकामो यजेत ' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा । ( अनात्मवित्त्वात् ) अतः अनात्मवित् होनेसे उनमें देवोंके उपयोग योग्य अन्नत्व विवक्षित है, ( तथाहि दर्शयति ) वैसा ही ' अथ योऽन्याम् ' इत्यादि श्रुति दिखलाती है । वाशब्दश्चोदित दोषव्यावर्तनार्थः । भाक्तमेषामन्नत्वं न मुख्यम् । मुख्ये ह्यन्नत्वे ‘ स्वर्ग-कामो यजेत ' इत्येवंजातीयकाधिकारश्रुतिरुपरुध्येत । चन्द्रमण्डले चेदिष्टादिकारिणामुपभोगो कहा गया है उसीको यहाँ ' श्रद्धां जुह्वति ' ( श्रद्धाको होम करते हैं ) इस श्रुति द्वारा ' हु ' धातुसे अभिधान किया है । उसी प्रकार अग्निहोत्र में छः प्रश्नोंके निर्वचनरूप ' ते वा एते ० ' ( वे ये दो हुत आहुतियाँ उत्क्रमण करती हैं ) इत्यादि वाक्यशेषसे दो अग्निहोत्र आहुतियोंमें फलारम्भके लिए अन्य लोककी प्राप्ति दिखलाई गई है । इसलिए आहुतिमय जलसे परिवेष्टित जीव अपने कर्मफलोपभोगके लिए जाते हैं, यह युक्त है ॥ ६ ॥

परन्तु इष्ट आदि कर्म करनेवालोंके अपने कर्मफलके उपभोगके लिए गमन विषयक प्रतिज्ञा कैसे की जाती है । क्योंकि ' एष सोमो राजा ० ' ( यह सोम राजा है, यह देवताओंका अन्न है, देवता लोग उसका मक्षण करते हैं ) इस प्रकार यह श्रुति धूम प्रतीक मागंसे उन चन्द्रलोकमें आरुढ हुओंका अन्नभाव दिखलाती है, और ' ते चन्द्रं प्राप्यान्नं ० ' ( वे चन्द्रमाको प्राप्तकर अन्न हो जाते हैं, वहाँ जैसे ऋत्विग्गण सोम राजाको ' आप्यायस्व अपक्षीयस्व ' ऐसा कहकर मक्षण करते हैं, वैसे इनका देवगण भक्षण करते हैं ) यह समान विषयक दूसरी श्रुति है । व्याघ्र आदिसे भक्ष्यमाणोंके समान देवोंसे मक्ष्यमाणोंका उपभोग नहीं हो सकता, अतः उत्तर कहते हैं-वा शब्द शङ्कित दोषको व्यावृत्तिके लिए है । इन इष्ट आदि कारियों में अन्नत्व गौण है मुख्य नहीं, मुख्य अन्नत्व हो तो ' स्वमकामो यजेत ' इसप्रकारकी अधिकारश्रुति बाधित हो जायगी । सत्यानन्दी - दीपिका गति, प्रतिष्ठा, तृप्ति, पुनरावृत्ति और उत्पन्न होनेवाला लोक क्या तुम नही जानते? ) उन प्रश्नोंका निर्वाचन भी ' राज्ञैव ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतः ततः पृथिव्यां पुरुषे योषिति च पुरुषरूपेणो-तिष्ठत: ' ( राजने कहा कि वे ये हुत आहुतियाँ उत्क्रमण करती हैं, वे अन्तरिक्षद्वारा द्युलोकमें जाती हैं, वे आहवनीय द्युलोक में प्रतिष्ठा करती हैं, वे द्युलोकको तृप्त करती हैं, वहाँ से पुनः लोटती हैं, अनन्तर पृथिवीमें, पुनः पुरुषमें, उससे स्त्री में बहुत हुई पुरुषरूपसे उत्थान करती हैं ) इस प्रकार वाक्यशेषसे निश्चित होता है । इससे यह सिद्ध होता है कि आहुतिमय जलसे परिवेष्टित जीव कर्म फलोपभोगके लिए गमन करता है ॥ ६ ॥

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५७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ५ पा ० १ न स्यात्किमर्थमधिकारिण इष्टाद्यायासबहुलं कर्म कुर्युः । अन्नशब्द श्चोपभोगहेतुत्वसामा न्यादनन्नेऽप्युपचर्यमाणो दृश्यते, यथा विशोऽन्नं राज्ञां पशवोऽन्नं विशामिति । तस्मा-दिष्टस्त्रीपुत्रमित्रभृत्यादिभिरिव गुणभावोपगतैरिष्टादिकारिभिर्यत्सुखविहरणं देवानां तदेवैषां भक्षणमभिप्रेतं न मोदकादिवच्चर्वणं निगरणं वा । ' न ह वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ' ( छा ० ३।६।१ ) इति च देवानां चर्वणादिव्यापारं वारयति । तेषां चेष्टादिकारिणां देवान्प्रति गुणभावोपगतानामप्युपभोग उपपद्यते राजोपजीविना-मिव परिजनानाम् | अनात्मवित्त्वाच्चेष्टादिकारिणां देवोपभोग्यभाव उपपद्यते । तथा हि श्रुतिरनात्मविदां देवोपभोग्यतां दर्शयति- ' अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽ-हमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम् ' ( वृ ० १ | ४ | १० ) इति । स चास्मिन्नपि लोक इष्टादिभिः कर्मभिः प्रीणयन्पशुवद्देवानामुपकरोत्यमुष्मिन्नपि लोके तदुपजीवी तदादिष्टं फलमुपभुञ्जनः पशुवदेव देवानामुपकरोतीति गम्यते ॥ ॐ अनात्मवित्त्वात्तथा हि दर्श-यतीत्यस्यापरा ब्याख्या - अनात्मविदो होते केवलकर्मिण इष्टादिकारिणो न ज्ञानकर्म-समुच्चयानुष्ठायिनः । पञ्चाग्निविद्यामिहात्मविद्येत्युपचरन्ति, प्रकरणात् । पञ्चाग्निविज्ञा-नविहीनत्वाच्चेदमिष्टादिकारिणां गुणवादेनान्नत्वमुद्भाव्यते पञ्चाग्निविज्ञानप्रशंसायै । पञ्चाग्निविद्या हीह विधित्सिता, वाक्यतात्पर्यावगमात् । तथा हि श्रुत्यन्तरं चन्द्रमण्डले यदि इष्ट आदि कारियोंका चन्द्रमण्डलमें उपभोग न हो, तो अधिकारी अधिक परिश्रम साध्य इष्ट आदि कर्म किसलिए करेंगे, और अन्न शब्द ' उपभोग हेतुत्व ' है, इस सामान्यधर्मं से अन्न भिन्न में भी उपचयंमाण- उपचरित होता हुआ देखा जाता है । जैसे ' वैश्य राजाओं का अन्न है, पशु वैश्योंका अन्न है ' ऐसा कहते हैं । इसलिए इष्ट, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेवक आदिके समान गौणनावको प्राप्त हुए इष्ट आदि कारियों से जो देवताओं का सुख विहरण है वही इनका यहाँ मक्षण अभिप्रेत है, किन्तु मोदक आदिके समान चवंण चबाना अथवा निगलना अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि ' न ह वै देवा ० ' ( देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ) यह श्रुति देवोंके चर्वण आदि व्यापारका निषेध करती है । देवोंके प्रति गुणभावको प्राप्त हुए इन इष्ट आदि कारियों का भी राजाके आश्रित जीवन निर्वाह करनेवाले परिजनोंके समान उपभोग उपपन्न होता है और अनात्मवित् होनेसे इष्ट आदि कारियोंमें देवोंका उपभोग्यत्व भी उपपन्न होता है । जैसे कि ' अथ योऽन्यां ० ' ( और जो अन्य देवताकी ' यह अन्य है और मैं अन्य हूँ ' इस प्रकार उपासना करता है वह नहीं जानता, जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है ) यह श्रुति अनात्मवेत्ताओंकी देवोपभोग्यता दिखलाती है अर्थात् जैसे पशु मनुष्यों का भोग्य है, वैसे अज्ञ जीव देवोंका उपकारक होता है । वह इस लोक में मी इष्ट आदि कर्मोंद्वारा देवोंको प्रसन्न करता हुआ पशुके समान देवोंका उपकारक होता है और परलोकमें भी उनका उपजीवी होकर उनसे आदिष्ट फलका उपभोग करता हुआ पशुके समान देवोंका उपकारक होता है, ऐसा ज्ञात होता है । ' अनात्मवित्त्वात्तथाहि दर्शयति ' इस सूत्रांशकी यह दूसरी व्याख्या है -केवल कर्मी ये इष्ट आदि कारी अनात्मवित् ही हैं वे उपासना और कर्मके समुच्चयका अनुष्ठान करनेवाले नहीं हैं । यहाँ प्रकरणसे पञ्चाग्नि विद्याको गोणरूपसे आत्मविद्या कहते हैं । पञ्चाग्नि विद्या रहित होनेसे इष्ट आदि कारी देवोंके अन्न हैं, ऐसा पञ्चाग्नि विद्याकी प्रशंसाके लिए सत्यानन्दी- दीपिका * गौतम और प्रवाहण संवादात्मक वाक्योंका पर्यालोचन करनेसे यही सिद्ध होता है कि यहाँ पञ्चाग्निविद्याका अभिधान ही इष्ट है । अतः आहुतिमय जलसे परिवेष्टित होकर जीव जाता है । इसप्रकार गतिके पर्यालोचनसे वैराग्य होता है ॥ ७ ॥

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अधि ० २ ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५७५ भोगसद्भावं दर्शयति - ' स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ( प्र ० ५।४ ) इति । तथान्यदपि श्रुत्यन्तरम् ' अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोके आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वममिसंपद्यन्ते ' ( बृह ० ४।३।३३ ) इतीष्टादिकारिणां देवैः सह संवसतां भोगप्राप्तिं दर्शयति । एवं भाक्तत्वादन्न भाववचन-स्येष्टादिकारिणोऽत्र जीवा रंहन्तीति प्रतीयते । तस्माद्रंहति संपरिष्वक्त इति युक्त-मेवोक्तम् ॥ ७ ॥

( २ कृतात्ययाधिकरणम् । सू ० ८-११ ) कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च ॥ ८ ॥

पदच्छेद — कृतात्यये, अनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम्, यथेतम्, अनेवम्, च । सूत्रार्थ - ( कृतात्यये ) कर्मोंके उपभोगके अनन्तर ( अनुशयवान् ) उन कर्मोंसे अतिरिक्त कर्म युक्त होकर जीव इस लोकमें आता है, ( दुष्टस्मृतिभ्याम् ) क्योंकि ' तद्य इह रमणीयचरणा ' और ' प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ' इत्यादि श्रुति और स्मृति हैं । और ( यथेतम् ) जिस धूम आदि मार्गंसे वे गये थे उससे अथवा ( अनेवम् च ) उससे विपरीत वक्ष्यमाण बभ्र आदि मार्गद्वारा इस लोकमें आते हैं । * इष्टादिकारिणां धूमादिना वर्त्मना चन्द्रमण्डलमधिरूढानां भुक्तभोगानां ततः प्रत्यवरोह आम्नायते - ' तस्मिन्यावत्सं पात मुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतम् ' ( छा ० . ५/१०/५ ) इत्यारभ्य यावत् ' रमणीयचरणा ब्राह्मणादियोनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः श्वादियोनि ' मिति । तत्रेदं विचार्यते - किं निरनुशया भुक्तकृत्स्नकर्माणोऽवरोहन्त्या होस्वित्सानुशया इति । किं तावत्प्राप्तम्? निरनुशया इति, कुतः? यावत्संपातमिति विशेषणात् । संपा-तशब्देनात्र कर्माशय उच्यते - संपतन्त्यनेनास्माल्लोकादमुं लोकं फलोपभोगायेति । गुणवादसे कहा गया है । यहाँ पञ्चाग्नि विद्याका ही विधान करना अभीष्ट है, क्योंकि वाक्यका तात्पर्यं ऐसा ही अवगत होता है । जैसे कि ' स सोमलोके ० ' ( सोम लोकमें विभूति का अनुभवकर वह पुनः लौट आता है ) यह दूसरी श्रति चन्द्रमण्डलमें मोगका सद्भाव दिखलाती है । उसीप्रकार ' अथ ये शतं ० ' ( जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं वह गन्धवं लोकका एक आनन्द है, तथा जो गन्धर्व लोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्म देवोंका, जो कि कर्मोंके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है ) वह दूसरी श्रुति भी देवोंके साथ वास करनेवाले इष्ट आदि कारियोंकी भोग प्राप्ति दिख-लाती है । इसप्रकार अन्नभाव वचन गौण होनेसे यहाँ इष्ट आदि कारी जीव जाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है । इसलिए ' रहित संपरिष्वक्तः ' ( जीव परिवेष्टित जाता है ) यह ठीक ही कहा गया है ॥ ७ ॥

धूम आदि मार्गद्वारा चन्द्रमण्डलमें आरूढ इष्ट आदि कारी भुक्त भोगियोंका वहाँसे प्रत्याव-रोहण श्रुतिमें कहा गया है - ' तस्मिन्यावत् ० ' ( वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे पुनः इसी मार्ग से जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं ) यहाँसे आरम्भकर ' रमणीय आचरणवाले ब्राह्मण आदि योनिको प्राप्त होते हैं और पाप आचरणवाले श्वान आदि योनिको प्राप्त होते हैं ' यहाँ तक । उसमें यह विचार किया जाता है कि जिन्होंने सम्पूर्ण कर्मोंका उपभोग कर लिया है, वे अनुशय ( कर्म ) रहित अवरोहण करते हैं अथवा अनुशय सहित? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - अनुशय रहित अव-रोहण करते हैं, किससे? इससे कि ' यावत्सं पातम् ' ( संपात पर्यंन्त ) ऐसा विशेषण है । यहाँ संपातशब्दसे कर्माशय कहा जाता है, क्योंकि इस लोकसे उस लोक में कर्मफलके उपभोगके लिए इस कर्मसे जाते सत्यानन्दी - दीपिका * अब गतिके अनन्तर होनेवाली आगतिका ' कृतात्यये ' इत्यादिसे निरूपण किया जाता है । जो यह कहा गया है कि जलसे परिवेष्टित होकर जीव जाता है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि स्वगंसे बव-

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५७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ यावत्संपात मुषित्वेति च कृत्स्नस्य तस्य कृतस्य तत्रैव भुक्ततां दर्शयति । ' तेषां यदा तत्प-र्यवैति ' ( बृह ० ६।२।१६ ) इति च श्रुत्यन्तरेणैष एवार्थः प्रदर्श्यते । स्यादेतत् - यावदमु-मिलोक उपभोक्तव्यं कर्म तावदुपभङक्त इति कल्पयिष्यामीति 1 । नैवं कल्पयितुं शक्यते, यत्किंचेत्यन्यत्र परामर्शात् । ' प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मणे ' ( बृह ० ४।४।६ ) इति ह्यपरा श्रुतिर्यत्किचेत्यविशेषपरामर्शेन कृत्स्नस्येह कृतस्य कर्मणस्तत्र क्षयिततां दर्शयति । * अपि च प्रायणमनारब्धफलस्य कर्मणोऽभि-व्यञ्जकम् । प्राक्प्रायणादारब्धफलेन कर्मणा प्रतिबद्धस्याभिव्यक्त्यनुपपत्तेः । तच्चाविशे-पाद्यावत्किचिदनारब्धफलं तस्य सर्वस्याभिव्यञ्जकम् । नहि साधारणे निमित्ते नैमित्ति-कमसाधारणं भवितुमर्हति न ह्यविशिष्टे प्रदीपसंनिधौ घटोऽभिव्यज्यते न पट इत्यु-पपद्यते । तस्मान्निरनुशया अवरोहन्तीत्येवं प्राप्ते ब्रूमः - कृतात्ययेऽनुशयवानिति । येन कर्मवृन्देन चन्द्रमसमारूढाः फलोपभोगाय तस्मिन्नुपभोगेन क्षयिते तेषां यदम्मयं शरीरं चन्द्रमस्युपभोगायारब्धं तदुपभोगक्षयदर्शन शोकाग्नि संपर्कात्प्रविलीयते । सवि-तृकिरणसंपर्कादिव हिमकरका: हुतभुगर्चिः संपर्कादिव च घृतकाठिन्यम् । ततः कृता-हैं । ' यावत्संपात मुषित्वा ' ( संपात पर्यंन्त रहकर ) यह श्रुति उसके सम्पूर्ण कृत कर्मोंकी वहीं भुक्तता दिखलाती है । ' तेषां यदा ० ' ( जब उनके कमं क्षीण हो जाते हैं तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं ) इस अन्य श्रुति से भी यही अर्थ दिखलाया जाता है । ऐसा हो, परन्तु जब तक उस लोकमें उपभोग योग्य कर्म हैं तब तक जीव उनका उपभोग करेगा, मैं ऐसी कल्पना करूँगा । तो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि ' यत्किञ्च ० ' ( जो कुछ ) ऐसा अन्यत्र परामर्श है । ' प्राप्यान्तं ० ' ( इस लोक में यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्त कर उस लोकसे कर्म करनेके लिए पुन: इस लोक में आ जाता है ) यह दूसरी श्रुति ' यत्किञ्च ' इस अविशेष ( सम्पूर्ण ) परामशंसे यहाँ किये गये समस्त कर्मोंका वहाँ क्षयित्व दिखलाती है, और मरण भी अनारब्ध फलवाले कर्मोंका अभिव्यञ्जक है, क्योंकि मरणसे पूर्व आरब्ध फलवाले कर्मसे प्रतिबद्ध कर्मकी फलके लिए अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । और विशेष न होनेसे वह मरण जिस किस कर्मका फल खारम्भ नहीं हुआ है उस समस्त कर्मोंका अभिव्यञ्जक है, कारण कि साधारण निमित्तके होनेपर नैमित्तिक असाधारण नहीं हो सकता । प्रदीपकी अविशिष्ट ( सामान्य ) संनिधिमें घट अभिव्यक्त होता और पट नहीं, यह उपपन्न नहीं है । इससे जीव अनुशय रहित अवरोहण करते हैं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' कृतात्ययेऽनुशयवान् ' ( कर्मके क्षय होनेपर अनु-शयवान् ) जिस कर्म समूहसे फलके उपभोगके लिए चन्द्रमण्डलमें आरूढ हुए उस कर्म समुदायका उपभोगद्वारा क्षय होने पर उनका उपभोगके लिए चन्द्र - मण्डलमें जो जलमय शरीर आरब्ध हुआ है, वह उपभोगके क्षयदर्शन से उत्पन्न शोकाग्निके सम्पर्क से विलीन हो जाता है । जैसे सूर्य किरणों के सम्पर्क से हिम और करक, जैसे अग्निकी ज्वालाओंके सम्पर्कसे घृतका काठिन्य विलीन हो जाता है । इसलिए ' कृतात्यये ० ' किये गये इष्ट आदि कर्मफलके उपभोगसे उपक्षय होनेपर अनुशय सहित जीव सत्यानन्दी - दीपिका रोहण करनेवालोंके कर्मका अभाव होनेसे तत्सम्बन्धित जलका मी अभाव है, इस प्रकार आक्षेप-संगति पूर्वपक्ष है । * इसलिए स्वर्ग आदि लोकोंमें सम्पूर्ण कर्मोंके उपभोगद्वारा क्षय होनेपर अनुशय रहित केवल आचरणद्वारा इस लोकमें जीवोंका अवरोहण होता है । इससे आगति अनियमित सिद्ध होती है । पूर्वपक्ष में कर्मका अभाव होनेसे वैराग्यकी दृढता भी नहीं हो सकती । सिद्धान्त में कर्मकी सत्ता होने से आगति में नियम है, इससे वैराग्यकी हृढता है ।