श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 611–620
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 611–620
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अधि ० २ सू ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५७७ त्यये कृतस्येप्रादेः कर्मणः फलोपभोगेनोपक्षये सति सानुशया एवेममवरोहन्ति । केन हेतुना? दृष्टस्मृतिभ्यामित्याह । तथा हि प्रत्यक्षा श्रुतिः सानुशयानामवरोहं दर्शयति- ' तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशी ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्धयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ' ( छा ० ५।१०।७ ) इति चरणशब्देनानुशयः सूच्यत इति वर्णयिष्यति । * दृष्टश्वायं जन्मनैव प्रतिप्राण्युच्चावत्ररूप उपभोगः प्रविभज्यमान आकस्मिकत्वासंभवादनुशयस-द्भावं सूचयति, अभ्युदय प्रत्यवाययोः सुकृतदुष्कृतहेतुत्वस्य सामान्यतः शास्त्रेणावगमि-तत्वात् । स्मृतिरपि ' वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्टाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेश-जातिकुलरूपायुः श्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते ' इति सानुशयानामेवावरोहं दर्शयति । कः पुनरनुशयो नामेति? केचित्तावदाहुः - स्वर्गार्थस्य कर्मणो भुक्तफलस्यावशेषः कश्चिदनुशयो नाम, भाण्डानुसारिस्नेहवत् । यथाहि स्नेहभाण्डं रिच्यमानं न सर्वा-त्मना रिच्यते भाण्डानुसार्येव कश्चित्स्नेहशेषोऽवतिष्ठते तथाऽनुशयोऽपीति । ननु कार्य-विरोधित्वाददृष्टस्य न भुक्तफलस्यावशेषावस्थानं न्याय्यम् । नायं दोषः, नहि सर्वात्मना भुक्तफलत्वं कर्मणः प्रतिजानीमहे । ननु निरवशेषकर्मफलोपभोगाय चन्द्रमण्डलमा-रूढः । बाढम्, तथापि स्वल्पकर्मावशेषमात्रेण तत्रावस्थातुं न लभ्यते । यथा किल ही इस लोकमें अवरोहण करते हैं । किस हेतुसे? दृष्टश्रुति और स्मृतिसे, ऐसा कहते हैं । जैसे कि ' तद्य इह ० ' ( उन अनुशयी जीवोंमें जो यहाँ पुण्यकर्मवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरण ( पाप कर्म ) वाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं । वे श्वानयोनि, सूकरयोनि अथवा चण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ) यह प्रत्यक्ष श्रुति अनुराय सहित जोवोंका अवरोहण दिखलाती है । यहाँ चरणशब्दसे अनुशय ( कमं ) सूचित होता है, ऐसा वर्णन करेंगे । और जन्मसे ही प्रत्येक प्राणीमें मिन भिन्न रूपसे विभक्त हुआ यह उपयोग देखा गया है, वह आकस्मिकत्वके असंभव से अनुशयके सद्भावको सूचित करता है, क्योंकि अभ्युदय और प्रत्यवाय ( हानि, दुःख ) के सुकृत और दुष्कृत हेतु हैं यह सामान्य रीतिसे शास्त्रद्वारा अवगत होता है । ' वर्णा आश्रमाश्च ० ' ( वर्ण और आश्रम -वाले, अपने कर्म में निष्ठा रखनेवाले मरणानन्तर कर्मफलका अनुभव कर उससे शेष कर्म द्वारा-अनुशय नामक कर्म द्वारा विशिष्ट देश, जाति, कुल, रूप, आयु, ज्ञान, आचार, वित्त, सुख और मेघावाले होकर जन्म प्राप्त करते हैं ) यह स्मृति भी अनुशय सहित जीवोंका अवरोहण दिखलाती है । परन्तु वह अनुशय क्या है? कोई तो भाण्डाके अनुसारी स्नेह - तेल आदिके समान स्वर्गके लिए किया गया कर्म जिसका फल भोग लिया गया है, उसका कुछ अवशेष अनुशय है । जैसे तैलका माण्डा खाली होता हुआ सर्वात्मना खाली नहीं होता, माण्डाके अनुसारी कुछ अवशिष्ट स्नेह रह जाता है, वैसे अनुराय मी जीवके साथ अवस्थित रहता है, ऐसा कहते हैं । परन्तु कार्य - फल विरोधी होनेसे भुक्त फल अदृष्टकी अवशेष अवस्थिति न्याय - युक्त नहीं है । यह दोष नहीं है, क्योंकि कर्म सर्वात्मना भुक्त फल है, हम ऐसी प्रतिज्ञा नहीं करते । परन्तु सम्पूर्ण कर्मफलोपभोगके लिए जीव चन्द्र मण्डलमें आरूढ हुआ है, ठीक, हुआ है, तो मी स्वल्प कर्मके अवशेष से वहाँ अवस्थिति प्राप्त नहीं सत्यानन्दी - दीपिका * सूत्रस्थ ' दृष्ट ' शब्दका श्रुतार्थं कहकर अब उसका ' दृष्ट ' इत्यादिसे अन्य अर्थं कहते हैं । ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ' ( पुण्य कर्मसे सुखी और पाप कर्मसे दुःखी होता है ) इत्यादि शास्त्रसे सुख और दुःखके हेतु धर्म और अधर्म ज्ञात होते हैं । इससे ' जन्मारभ्यदृष्टो भोगः '
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५७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ कश्चित्सेवकः सकलैः सेवोपकरणै राजकुलमुपसृप्तश्चिरप्रवासात्परिक्षीणबहूपकरणश्छत्र-पादुकादिमात्रावशेषो न राजकुलेऽवस्थातुं शक्नोति । एवमनुशयमात्रपरिग्रहो न चन्द्र-मण्डलेऽवस्थातुं शक्नोतीति । न चैतद्युक्तमिय, नहि स्वर्गार्थस्य कर्मणो भुक्तफलस्या-वशेषानुवृत्तिरुपपद्यते, कार्यविरोधित्वादित्युक्तम् । नन्वेतदप्युक्तम् - न स्वर्गफलस्य कर्मणो निखिलस्य भुक्तफलत्वं भविष्यतीति । तदेतदपेशलम् -स्वर्गार्थं किल कर्म स्वर्ग-स्थस्यैव स्वर्गफलं निखिलं न जनयति स्वर्गच्युतस्यापि कंचित्फललेशं जनयतीति । न शब्दप्रमाणकानामीदृशी कल्पनाऽवकल्पते, स्नेहभाण्डे तु स्नेहलेशानुवृत्तिर्दृष्टत्वादुप-पद्यते । तथा सेवकस्योपकरणलेशानुवृत्तिश्च दृश्यते, नत्विह तथा स्वर्गफलस्य कर्मणो लेशा-नुवृत्तिर्दृश्यते, नापि कल्पयितुं शक्यते, स्वर्गफलत्वशास्त्रविरोधात् । * अवश्यं चैतदेवं विशे-प्रम् । न स्वर्गफलस्येष्टादेः कर्मणो भाण्डानुसारि स्नेहवदे कदे शोऽनुवर्तमानोऽनुशय इति । यदि हि येन सुकृतेन कर्मणेष्टादिना स्वर्गमन्वभूवंस्तस्यैव कश्चिदेकदेशोऽनुशयः कल्प्ये-त, ततो रमणीय एवैकोऽनुशयः स्यान्न विपरीतः ॥ तत्रेयमनुशयविभागश्रुतिरुपरुध्येत् —'तद्य — ' तथ इह रमणीयचरणा अथ य इह कपूय चरणाः ' ( छा ० ५/१०/७ ) इति । तस्मादामुष्मिकफले कर्मजात कर सकता । जैसे कोई एक सेवक सेवाके सम्पूर्ण उपकरणोंसे राजकुलमें जाय वहाँ उसके बहुत - से उपकरण चिरप्रवाससे नष्ट हो जाँय और छत्र पादुका शेष रह जाँय तो वह राजकुलमें अवस्थित होने के लिए समर्थ नहीं होता । उसी प्रकार अनुशय मात्र परिग्रहवाला चन्द्रमण्डल में अवस्थित नहीं हो सकता । परन्तु यह युक्त - सा प्रतीत नहीं होता, क्योंकि स्वर्गके लिए किया गया कर्म जो भुक्त फल हैं, उसके अवशेषकी अनुवृत्ति फलकी विरोधी होनेसे उपपन्न नहीं होती, ऐसा कहा गया है । परन्तु यह भी कहा गया है कि स्वर्ग फलवाला समस्त कर्म भुक्त फल नहीं होता । यह मी अयुक्त है कि स्वर्गके लिए किया गया कर्म स्वर्गस्थ को ही सम्पूर्ण स्वर्गफल उत्पन्न नहीं करता, किन्तु स्वगंसे च्युत हुएको भी कुछ फल लेश उत्पन्न करता है । परन्तु श्रुति प्रमाण माननेवालोंके लिए ऐसी कल्पना नहीं हो सकती । स्नेहभाण्डामें तो स्नेहलेशकी अनुवृत्ति देखने में आने से कल्पना युक्त है, और उसी-प्रकार सेवकमें भी उपकरण लेशकी अनुवृत्ति देखने में आती है । परन्तु उसी प्रकार यहाँ तो स्वगं फलवाले कर्मके लेशकी अनुवृत्ति नहीं देखी जाती, और उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, कारण कि स्वर्गं फल प्रतिपादक शास्त्रसे विरोध होता है । अवश्य ही यह इसीप्रकार जाननेयोग्य है – स्वर्गफलवाले इष्ट आदि कर्मका भाण्डानुसारी स्नेहके समान अनुवर्तमान एक देश अनुशय नहीं है, यदि जिस इष्ट आदि सुकृत कर्म द्वारा जीवने स्वर्गका अनुभव किया उसका ही कोई एक देश अनुराय कल्पना करें तो केवल एक ' रमणीय ' ही अनुशय होगा, उससे विपरीत-' कपूय ' नहीं होगा । तब ' तद्य इह रमणीयचरणा अथ य इह कपूयचरणाः ' यह अनुशय विभागकी श्रुति बाधित हो जायगी । इसलिए परलोकमें फल देनेवाले सब कर्मोंके उपभुक्त हो सत्यानन्दी - दीपिका कर्महेतुकः, मोगत्वात्, स्वर्ग भोगवत् ' ( जन्म से लेकर देखा गया मोग कर्म हेतुक है, भोग होने से स्वर्गयोग के समान ) इसप्रकार अनुमान से भी अनुशय सिद्ध होता है । विपक्षमें मोगके हेतु कर्मके न होनेसे भोगोंमें दृष्ट वैलक्षण्य आकस्मिक होगा, इसलिए अनुराय अवश्य मानना चाहिए । * अब भगवान् भाष्यकार ' तस्मात् ' इत्यादिसे स्वाभिमत अनुशयको कहते हैं । ' जीवमनुशेते-इत्यनुशयः: ' ' स्वर्ग में फल देनेवाले कर्मोंको फलोपभोग से समाप्तकर उनसे भिन्न इस लोक में फल देनेवाले जो कर्म समुदाय है वह अनुशय है । उसके साथ ही जीव अवरोहण करता है । जन्मके आरम्भसे ही
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अधि ० २०८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित. ५७ ९ उपभुक्तेऽवशिष्ट मैहिकफलं कर्मान्तरजातमनुशयस्तद्वन्तोऽवरोहन्तीति । यदुक्तम्-यत्किचेत्यविशेषपरामर्शात्सर्वस्येह कृतस्य कर्मणः फलोपभोगेनान्तं प्राप्य निरनुशया अवरोहन्तीति - नैतदेवम्, अनुशयसद्भावस्यावगमितत्वात् । यत्किंचिदिह कृतमामुष्मि-कफलं कर्मारब्धभोगं तत्सर्वं फलोपभोगेन क्षपयित्वेति गम्यते । यदप्युक्तम् - प्रायणम--विशेषादनारब्धफलं कृत्स्नमेव कर्माभिव्यनक्ति, तत्र केनचित्कर्मणाऽमुष्मिलोके फल-मारभ्यते केनचिदस्मिन्नित्ययं विभागो न संभवतीति- तदप्यनुशय सद्भावप्रतिपादने-नैव प्रत्युक्तम् । अपि च केन हेतुना प्रायणमनारब्धफलस्य कर्मणोऽभिव्यञ्जकं प्रतिज्ञायत इति वक्तव्यम् । आरब्धफलेन कर्मणा प्रतिबद्धस्येतरस्य वृत्त्युद्भवानुपपत्तेस्तदुपश-मात्प्रायणकाले बृत्युद्भवो भवतीति यद्युच्येत ततो वक्तव्यम् - यथैव तर्हि प्राक्प्रायणा-दारब्धफलेन कर्मणा प्रतिबद्धस्येतरस्य वृत्त्युद्भानुपपत्तिरित्येवं प्रायणकालेऽपि विरुद्ध-फलस्यानेकस्य कर्मणो युगपत्फलारम्भासंभवाद्वलवता प्रतिबद्धस्य दुर्बलस्य वृत्त्युद्भः वानुपपत्तिरिति । न ह्यनारब्धफलत्वसामान्येन जात्यन्तरोपभोग्यफलमप्यनेकं कर्मैक स्मिन्प्रायणे युगपदभिव्यक्तं सदेकां जातिमारभत इति शक्यं वक्तुम्, प्रतिनियतफलत्व-विरोधात् । नापि कस्यचित्कर्मणः प्रायणेऽभिव्यक्तिः कस्यचिदुच्छेद इति शक्यते वक्तुम्, ऐकान्तिकफलत्वविरोधात् । नहि प्रायश्चित्तादिभिर्हेतुभिर्विना कर्मणामुच्छेदः संभाव्यते । जानेपर इस लोकमें फल देनेवाले अवशिष्ट जो अन्य कर्म समुदाय वह अनुशय है उस कर्मवाले अव-रोहण करते हैं । जो यह कहा गया है कि ' यत्किञ्च ' इस अविशेष के परमाशंसे यहाँ किये गये सबं कर्मोंका फलोपभोगसे अन्त प्राप्तकर अनुयय रहित होकर अवरोहण करते हैं, यह ऐसा नहीं है, क्योंकि अनुशयका सद्भाव अवगमित है । जो कुछ यहाँ आमुष्मिक ( परलोक ) फलवाला कर्म किया गया है और आरब्ध भोगवाला कर्म है उन सबका फलके उपभोगसे क्षपणकर, ऐसा अर्थ अवगत होता है । और जो यह कहा गया है कि मरण अविशेष - समानरूपसे अनारब्ध फलवाले सभी कर्मों की अभिव्यक्ति करता है, तब किसी एक कर्म से परलोकमें फल आरम्भ किया जाता है, और किसी कर्म से इस लोक में, यह विभाग असंभव है । उसका मी अनुशय सद्भावके प्रतिपादनसे निराकरण किया गया है, और मरण अनारब्ध फलवाले कर्मका अभिव्यञ्जक है, ऐसी प्रतिज्ञा किस हेतुसे की जाती है, यह कहना चाहिए । यदि कहो कि जिसका फल आरब्ध हो गया है ऐसे कर्मसे प्रतिबद्ध अन्य कर्मकी वृत्ति ( फल ) का उद्भव अनुपपन्न होने से उसके शान्त होनेपर मरणकालमें वृत्तिका उद्भव होता है, तो उसपर कहना चाहिए-तब तो जैसे मरणके पूर्व जिसका फल आरब्ध है ऐसे कमसे प्रतिबद्ध अन्य कर्मके वृद्ध की अनुपि है, वैसे ही मरणकालमें भी विरुद्ध फलवाले अनेक कर्मोंमें युगपत् फलका आरम्भ असंभव होनेसे बलवान् कर्म से प्रतिबद्ध दुर्बलके वृत्युद्भवको अनुपपत्ति है, अन्य जाति में उपभोग्य फलवाले अनेक कर्म मी एक मरणकालमें युगपत् अभिव्यक्त होते हुए अनारब्ध फलत्व सामान्य धर्मसे एक जातिका आरम्भ करें, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रतिनियत फलत्वका विरोध है अर्थात् प्रत्येक कर्मका भिन्न - भिन्न फल है उससे विरोध है, और मरणकालमें किसी एक कर्मकी अभिव्यक्ति हो और किसी कर्मका उच्छेद, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि ऐकान्तिक फलत्वका विरोध है । प्रायश्चित् आदि हेतु विना कर्मों का उच्छेद संभाव्य नहीं है । ' कदाचित्सुकृतं कर्म ० ' ( किसी समय संसारमें सत्यानन्दी - दीपिका - विलक्षण मोग देखने में आता है, इस प्रत्यक्ष लिङ्ग अनुगृहीत ऐहिक अनुशय कर्म विशेष प्रतिपादक ' तद्य इह रमणीयचरणाः, कपूयचरणाः ' इस श्रुति के साथ विरोध होनेसे ' यत्किञ्च ' और ' यावत्सं पातम् ' ये सामान्य शब्द केवल परलोक विषयक कर्मको कहते हैं, ऐसा संकोच करना युक्त है । मरण भी सभी कर्मोंका अभिव्यञ्जक नहीं है, क्योंकि ' रमणीयचरणाः, कपूयचरणा: ' इस अनुशय प्रतिपादक श्रुतिके साथ विरोध होता है ।
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५८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ * स्मृतिरपि विरुद्धफलेन कर्मणा प्रतिबद्धस्य कर्मान्तरस्य चिरमवस्थानं दर्शयति-' कदाचित्सुकृतं कर्म कूटस्थमिह तिष्ठति । मज्जमानस्य संसारे यावदुःखाद्विमुच्यते ' इत्येवंजाती-यका । यदि च कृत्स्नमनारब्धफलं कर्मैकस्मिन्द्रायणेऽभिव्यक्तं सदेकां जातिमारभेत, ततः स्वर्गनरकतिर्यग्योनिष्वधिकारानवगमाद्धर्माधर्मानुत्पत्तौ निमित्ताभावान्नोत्तरा जातिरुपपद्येत । ब्रह्महत्यादीनां चैकैकस्य कर्मणोऽनेकजन्मनिमित्तत्वं स्मर्यमाणमुपरुध्येत । नच धर्माधर्मयोः स्वरूपफलसाधनादिसमधिगमे शास्त्रादतिरिक्तं कारणं शक्यं संभा-वयितुम् । नच दृष्टफलस्य कर्मणः कारर्यादेः प्रायणमभिव्यञ्जकं संभवतीत्यव्या-पिकाऽपीयं प्रायणस्याभिव्यञ्जकत्वकल्पना । प्रदीपोपन्यासोऽपि कर्मबलाबलप्रदर्शने -नैव प्रतिनीतः । स्थूलसूक्ष्म रूपाभिव्यक्त्यनभिव्यक्तिवच्चेदं द्रष्टव्यम् । यथाहि प्रदीपः समानेऽपि संनिधाने स्थूलं रूपमभिव्यनक्ति न सूक्ष्मम् । एवं प्रायणं समानेऽप्य-नारब्धफलस्य कर्मजातस्य प्राप्तावसरत्वे बलत्रतः कर्मणो वृत्तिमुद्भावयति, न दुर्बलस्येति । तस्माच्छ्रुतिस्मृतिन्यायविरोधाद श्लिष्टोऽयमशेषकर्माभिव्यक्त्यभ्युपगमः । * शेषकर्म सद्भावेऽनिर्मोक्षप्रसङ्ग इत्ययमध्यस्थाने संभ्रमः सम्यग्दर्शनादशेषकर्मक्षय-मग्न हुए पुरुषका सुकृत कमं तब तक कूटस्थ रहता है जब तक वह दुःखसे विमुक्त होता है ) इस प्रकारकी स्मृति भी विरुद्ध फलवाले कर्मसे प्रतिबद्ध अन्य कर्मको चिर अवस्थिति दिखलाती है । यदि अनारब्धफलवाले सब कर्म एक मरण समयमें अभिव्यक्त होते हुए एक जाति - जन्म उत्पन्न करें, तो स्वर्ग, नरक, सर्पादि योनियों में अधिकारके अप्राप्त होनेसे धर्म और अधर्मका उत्पत्ति न होनेपर निमित्तके अभाव से उत्तर जन्म उपपन्न नहीं होगा । और ब्रह्महत्या आदि एक - एक कर्म अनेक जन्मका निमित्त है यह स्मृति वाक्य बाधित हो जायगा । धर्म और अधर्मकेारूप, फल, साधन आदिके ज्ञानके लिए शास्त्र से भिन्न कारणकी संभावना नहीं की जा सकती । मरण दृष्टफलवाले कार्यादि कर्मका अभिव्यञ्जक नहीं हो सकता और मरणमें यह अभिव्यञ्जकत्व कल्पना अव्यापक भी है । प्रदीपके उपन्यासका भी कर्मके बलाबल के प्रदर्शनसे ही निराकारण किया गया है । स्थूल और सूक्ष्म रूपकी अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्तिके समान इसे जानना चाहिए । जैसे सन्नि के समान होनेपर भी प्रदीप स्थूलरूपको अभिव्यक्त करता है सूक्ष्मको नहीं, अनारब्ध फलवाले कर्म समुदायको समान अवसर प्राप्त होनेपर भी मरण बलवान् कर्मकी वृत्ति ( व्यापार ) का उद्भव करता है दुर्बल के वृत्तिका नहीं । इसलिए श्रुति ( रमणीयचरणाः ) स्मृति ( ततः शेषेण ) और न्याय ( प्रबलप्रतिबन्धात् ) के विरोध होने से अशेष कर्मकी अभिव्यक्तिका यह स्वीकार असम्बद्ध - अयुक्त है । शेषकर्मके सद्भाव होनेपर मोक्षाभाव प्रसङ्ग होगा, यह संभ्रम भी अनवसर है, क्योंकि सम्यग्दर्शनसे समस्त कर्मक्षय होता है, ऐसो श्रुति है । सत्यानन्दी - दीपिका * मरण समानरूपसे सभी कर्मोंको अभिव्यक्त करता है, इसमें ' यदि ' इत्यादिसे अन्य दोष कहते हैं । " श्वसूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् । चण्डालपुल्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ” ( ब्रह्मघ्नश्वान, सूकर, गर्दभ, ऊँठ, बैल, बकरी - भेड़, मृग, पक्षी, चण्डाल और पुल्कस ( जूँ ) की योनिको प्राप्त करता है ) इत्यादि स्मृतिसे विरोध होने के कारण सब कर्म एक जन्म उत्पन्न नहीं कर सकते । अनेक कर्म एक जन्म देते हैं अथवा ब्रह्महत्यादि एक कर्म अनेक जन्मोंको देता है, इस विषयमें तो केवल शास्त्र ही प्रमाण है । * शेष कर्मोंके अस्तित्वसे मोक्ष नहीं होगा, इसलिए यावत् कर्मोद्वारा फलोपभोगके लिए एक जन्म स्वीकार करना चाहिए, उसके समाप्त होनेपर स्वतः ही मुक्ति सिद्ध होगी, यह ऐक भविक कथन अनवसर है, क्योंकि ' श्लीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ' ( ब्रह्मात्माका साक्षात्कार होनेपर उस
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अधि ० २ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५८१ श्रुतेः । तस्मात्स्थितमेतदेवानुशयवन्तोऽवरोहन्तीति । ते चावरोहन्तो यथेतमनेवं चाव-रोहन्ति । यथेतमिति यथागतमित्यर्थः । अनेवमिति तद्विपर्ययेणेत्यर्थः । धूमाकाशयोः पितृयाणेऽध्वन्युपात्तयोरवरोहे संकीर्तनाद्यथेतंशब्दाच्च यथागतमिति प्रतीयते । राज्या-द्यसंकीर्तनाद भ्राद्यपसंख्यानाच्च विपर्ययोऽपि प्रतीयते ॥ ८ ॥
चरणादिति चेनोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥९ ॥
पदच्छेद - चरणात् इति चेत्, न, उपलक्षणार्था, इति, कार्ष्णाजिनिः । सूत्रार्थ - ( चरणात् ) ' रमणीयचरणा: ' इत्यादि श्रुति चरण चारित्र्यसे योनिकी प्राप्ति कहती है, अनुशयसे नहीं ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि ( कार्ष्णाजिनिः ) कार्ष्णा-जिनि आचार्य चरणश्रुतिको ( उपलक्षणार्थतेति ) अनुशयका उपलक्षणार्थं मानते हैं । * अथापि स्यात् - या श्रुतिरनुशय सद्भावप्रतिपादनायोदाहृता - ' तद्य इह रमणीय-चरणाः ' ( छा ० ५ | १० | ७ ) इति सा खलु चरणाद्योन्यापत्तिं दर्शयति, नानुशयात् । अन्यच्च-रणमन्योऽनुशयः । चरणं चारित्रमाचारः शीलमित्यनर्थान्तरम् । अनुशयस्तु भुक्तफला-त्कर्मणोऽतिरिक्तं कर्माभिप्रेतम् । श्रुतिश्च कर्मचरणे भेदेन व्यपदिशति - ' यथाकारो यथाचारी तथा भवति ' ( बृह ० ४/४/५ ) इति, ' यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि, इससे यह सिद्ध हुआ कि अनुशय सहित ही जीव अवरोहण करते हैं । वे अवरोहण करनेवाले जिस मार्ग से गये थे उससे और उससे विपरीत मागंसे अवरोहण करते हैं । ' यथेतम् ' जैसे गये थे वैसे, ऐसा अर्थ हैं, ' अनेवम् ' उसके विपर्ययसे ऐसा अर्थ है, धूम और आकाश जो पितृयाण मांगते गृहोत हैं, उनका अवरोहणमें कथन होनेसे और ' यथेतम् ' इस शब्दसे जैसे गये थे वैसे, ऐसा प्रतीत होता है । रात्रि आदिका संकीर्तन न होनेसे और अभ्र आदिका ग्रहण होनेसे विपर्यय भी प्रतीत होता है ॥ ८ ॥
यह भी हो - ' तद्य इह रमणीयचरणा: ' इस प्रकार यह जो श्रुति ७ अनुराय के सद्भावके प्रति-पादन के लिए उदाहृत है, वह चरणसे योनिकी प्राप्तिको दिखलाती है, अनुशय से नहीं । चरण भिन्न है और अनुशय भिन्न है । चरण, चारित्र, आचार और शील ये एकार्थक पर्याय शब्द हैं । अनुराय तो भुक्तफल कर्म से भिन्न कर्म अभिप्रेत है और ' यथाकारी यथाचारी तथा भवति ' ( जैसा कर्म और जैसा आचरण करता है वैसा ही वह होता है ) और ' यान्यनवद्यानि ० ' ( जो अनिन्द्य कर्म उन्हीं का सत्यानन्दी - दीपिका ब्रह्मवित् कर्म क्षीण हो जाते हैं ) ' ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ' ( भ ० गी ० ४।३७ ) ( वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममयकर देती है ) इत्यादि श्रुति और स्मृति तत्त्वज्ञानसे यावत् कर्मोंका क्षय कहती हैं । इसलिए अज्ञानी जीव अनुशय सहित लौटते हैं । लौटनेका मागं इस प्रकार है-' तस्मिन्यावत्सं पातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते ' ( छा ० ५/१०/५, ६, ७ ) ( चन्द्र मण्डलमें कर्मोंके क्षय होनेतक रहकर वे पुनः इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं । वे पहले आकाश-को प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वे घूम होते हैं और धूम होकर अभ्र ( वाष्प ) होते हैं, वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है, तब वे जीव इसलोकमें धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं । इसप्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्टप्रद है । उस अन्नको जो - जो मक्षण करता है और जो - जो वीर्यं सेचन करता है, तद्रूप ही वह अनुरायी जीव हो जाता है । उन अनुशयी जीवोंमें जो पुण्यशाली होते हैं वे शीघ्र हो उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं ) ॥ ८ ॥
* “ अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च ज्ञानं च शीलमेतद्विदुर्बुधाः ॥ "
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५८२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ' ( तै ० १।११।२ ) इति च । तस्माच्चरणाद्योन्या-पत्तिश्रुतेर्नानुशयसिद्धिरिति चेत् । नैष दोषः । यतोऽनुशयोपलक्षणार्थैवैषा चरणश्रतिरिति काष्र्णाजिनिराचार्यो मन्यते ॥ ९ ॥
नर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥१० ॥
पदच्छेद - अनर्थक्यम्, इति " चेत्, न, तदपेक्षत्वात् । सूत्रार्थ - चरणश्रुति अपने मुख्य अर्थंका त्यागकर अनुशंयको कहेगी तो चरणश्रुति में ( अनार्थक्यम् ) मनर्थक्य प्रसक्त होगा, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, ( तद-पेक्षत्वात् ) क्योंकि कर्मोंको आचारकी अपेक्षा है, अतः चरणश्रुति 6 सार्थक है । स्यादेतत्- कस्मात्पुनश्चरणशब्देन श्रौतं शीलं विहाय लाक्षणिकोऽनुशयः प्रत्या-य्यते? ननु शीलस्यैव श्रौतस्य विहितप्रतिषिद्धस्य साध्वसाधुरूपस्य शुभाशुभयोन्या-पत्तिः फलं भविष्यति । अवश्यं च शीलस्यापि किंचित्फलमभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा ह्यानर्थक्यमेव शीलस्य प्रसज्येतेति चेत् - नैष दोषः । कुतः? तदपेक्षत्वात् । इष्टादि हि कर्मजातं चरणापेक्षम् । नहि सदाचारहीनः कश्चिदधिकृतः स्यात्, ' आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः ' इत्यादिस्मृतिभ्यः । पुरुषार्थत्वेऽप्याचारस्य नानर्थक्यम् । इष्टादौ हि कर्मजाते फल-मारभमाणे तदपेक्ष एवाचारस्तत्रैव कंचिदतिशयमारस्यते । कर्म च सर्वार्थकारीति श्रुतिस्मृति प्रसिद्धिः । तस्मात्क मैव शोलोपलक्षितम तुरायभूतं योन्यापत्तौ कारणमिति का-जितम् । नहि कर्मणि संभवति शीलाद्योन्यापत्तिर्युक्ता । पारयमाणो जानुभ्यां रहितुमर्हतीति ॥ २० ॥
सेवन करना चाहिए दूसरोंका नहीं । हम गुरुजनों के जो शुभ आचरण चाहिए ) इसका श्रुति कम और चरणका भेदसे व्यपदेश करती है प्राप्तिको प्रतिपादक श्रुति से अनुशयको सिद्धि नहीं होतो, ऐसा यदि कहो, यह चरण श्रुति अनुशयके उपलक्षणके लिए है, ऐसा कार्ष्णाजिनि आचार्य यह हो; परन्तु चरण शव्दसे श्रुति प्रतिपादित शीलका त्याग नहि पद्भ्यां पलायितुं हैं तुझे उन्होंका सेवन करना । इसलिए चरण से योनिकी तो यह दोष नहीं हैं, क्योंकि मानते हैं ॥ ८ ॥
कर लाक्षणिक अनुशयकी प्रतीति किस प्रकार की जाती है? परन्तु श्रौत विहित वा प्रतिषिद्ध, साधु अथवा असाधुरूप श्रीलका ही शुभाशुभ योनिकी प्राप्ति रूप फल होगा । शीलका भी अवश्य कुछ फल स्वीकार करना चाहिए अन्यथा शीलमें आनर्थक्य ही प्रसक्त होगा? ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है I । किससे? इससे कि - उसकी अपेक्षा है । इष्ट आदि कर्म समुदायको चरणकी अपेक्षा है । ' आचारहीनं न पुनन्ति वेदा: ' ( अचार हीनको वेद - यज्ञादि कर्म पवित्र नहीं करते ) इत्यादि स्मृतियोंसे सदाचार हीन कोई अधिकृत नहीं होता । पुरुषार्थत्व - पुरुष संस्कारत्वमें भी आचार अनर्थक नहीं है । क्योंकि इष्ट आदि कर्मसमुदायके. फलके आरम्भ करनेपर उनकी अपेक्षा रखनेवाला आचार उनमें ही कुछ अतिशय विशेष आरम्भ करता है । कर्म तो सर्व अर्थ करनेवाला है ऐसी श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्धि है । इसलिए कर्म ही शीलसे उपलक्षित अनुशयरूप होकर जन्मको प्राप्ति में कारण है, यह काष्र्णाजिनिका मत है । और सत्यानन्दी - दीपिका ( सब भूतों में कर्म, मन और वाणीसे अद्रोह, अनुग्रह और ज्ञानको पण्डित लोग शील जानते-कहते हैं ) इसप्रकार स्मृतिमें भी अद्रोह आदि आचार कहा गया है । शास्त्रका अर्थ ज्ञानरूप शील सब कर्मोंका अङ्ग कहा गया है उसका बोधक चरणपद है, वह अपने अङ्गी श्रौत आदि कर्मोंका उप-लक्षक है । कर्मको उत्तरारस्था ही तो धर्माधर्मरूप अपूर्व है । इसप्रकार कर्म - चरण में लक्षणासे तद-भिन्न अपूर्व नामक अनुशयको सिद्धि होती है । यह आचाय कार्ष्णाजिनिका मत है ॥ ९ ॥
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अधि ० ३ सू ० ११-१२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५८३ सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ११ ॥
पदच्छेद्र – सुकृतदुष्कृते, एव, इति, तु, बादरिः । सूत्रार्थ - ( तु ) परन्तु चरणशब्दका अर्थं तो ( सुकृतदुष्कृते एव ) सुकृत और दुष्कृत ही है, ( इति ) ऐसा ( बादरि: ) बादरि आचार्यका मत * बादरिस्त्वाचार्यः सुकृतदुष्कृते एव चरणशब्देन प्रत्याय्येते इति मन्यते । चरणमनुष्ठानं कर्मेत्यनर्थान्तरम् । तथा हि अविशेषेण कर्ममात्रे चरतिः प्रयुज्यमानो दृश्यते । यो हीष्टादिलक्षणं पुण्यं कर्म करोति तं लौकिका आचक्षते - धर्मं चरत्येष महात्मेति । आचारोपि च धर्मविशेष एव । भेदव्यपदेशस्तु कर्मचरणयोर्ब्राह्मणपरिव्राज-कन्यायेनाप्युपपद्यते । तस्माद्रमणीयचरणाः प्रशस्तकर्माणः, कपूयचरणा निन्दितकर्माण इति निर्णयः ॥ ११ ॥
( ३ अनिष्टादिकार्यधिकरणम् । सू ० १२-२१ ) अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ १२ ॥
पदच्छेद - अनिष्टादिकारिणाम् अपि च, श्रुतम् । सूत्रार्थ - ( अनिष्टादिकारिणामपि ) ' ये वे के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति ' इत्यादि श्रुतिसे अनिष्ट आदि कर्म करनेवालोंका भी ( श्रुतम् ) चन्द्रलोक गमन श्रुत है । * इष्टादिकारिणञ्चन्द्रमसं गच्छन्तीत्युक्तम् । ये त्वितरेऽनिष्टादिकारिणस्तेऽपि किं कर्मके सम्भव होनेपर शीलसे जन्म प्राप्ति युक्त नहीं है । पैरोंसे पलायन करनेमें समर्थं हुआ पुरुष घुटनोंसे पलायन नहीं करता है ॥ १० ॥
परन्तु चरणशब्दसे सुकृत और दुष्कृत ही प्रतीत होते हैं, ऐसा बादरि आचार्य मानते हैं । चरण, अनुष्ठान और कर्म ये एकार्थवाची शब्द हैं । जैसे कि ' चर् ' धातु अविशेषरूप से कर्ममात्रमें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । इससे जो इष्ट आदिरूप पुण्य कर्म करता है उसको लोग ऐसा कहते हैं कि यह महात्मा धर्मका आचरण करता है और आचार भी धर्मं विशेष है । कर्म और चरणमें भेदव्यपदेश तो ' ब्राह्मणपरिव्राजक ' न्यायसे भी उपपन्न होता है । इसलिए ' रमणीयचरणाः ' प्रशस्त कर्मवाले और ' कपूयचरणाः ' निन्दित कर्मवाले, ऐसा निर्णय है ॥ ११ ॥
इष्ट आदि कर्म करनेवाले चन्द्रलोक में जाते हैं, ऐसा कहा गया है । परन्तु इनसे भिन्न जो सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि अक्रोध आदिरूप शील जो साधारण धर्म है वह यज्ञ आदि विशेष कमसे भिन्न है, तो भी चरण शब्द और आचारशब्द मुख्यरूपसे कर्मवाची हैं, शीलवाची नहीं, अतः यहाँ लक्षणाका अवसर नहीं है । यह आचार्य बादरिका मत ही मुख्य सिद्धान्त है । यदि कर्म ही आचार है, तो ' यथाकारी यथाचारी ' यह भेदव्यपदेश क्यों है? यह तो ' ब्राह्मणपरिव्राजक ' न्यायसे समझना चाहिए । जहाँ सामान्यवाची शब्दका विशेषार्थं पदकी संनिधिसे अन्य अर्थ प्राप्त होता है वहाँ यह न्याय प्राप्त होता है । अतः प्रकृतमें कर्म और चरणका परस्पर अभेद होनेपर भी इसी न्यायसे किसी प्रकार भेद कथन होता है, वहां कर्म सामान्यवाची ' यथाकारी ' शब्दसे ' यान्यनवद्यानि कर्माणि ' इसका ग्रहण है और ' यथाकारी ' उपपद रहित ' यथा आचारी ' शब्दसे ' अस्माकं तु सुचरितानि ' इसका ग्रहण है, इससे सदाचार भासता है । इसप्रकार पुण्य और पापरूप कर्म ही अनुशय है, उससे आगति अवश्यंभावी है । इसके अनुसन्धान करनेसे वैराग्य होनेपर ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके साधनों में प्रवृत्ति होती है ॥ ११ ॥
* इसप्रकार इष्ट आदि कारियोंकी गति और आगतिके विचारसे वैराग्यका निरूपणकर अब
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५८४ ब्रह्मसूत्र -- शाङ्करभाष्य [ अ ०३ पा ० १ चन्द्रमसं गच्छन्त्युत न गच्छन्तीति चिन्त्यते । तत्र तावदाहुः - इष्टादिकारिण एव चन्द्रमसं गच्छन्तीत्येतन्न । कस्मात्? यतोऽनिष्टादिकारिणामपि चन्द्रमण्डलं गन्तव्य-त्वेन श्रुतम् । तथा ह्यविशेषेण कौषीतकिनः समामनन्ति - ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ( कौषी ० १ २ ) इति । देहारम्भोऽपि च पुनर्जायमानानां नान्तरेण चन्द्रप्राप्तिमवकल्पते, पञ्चम्यामाहुतावित्याहुतिसंख्या नियमात् । तस्मात्सर्व एव चन्द्रमसमासीदेयुः । इष्टादिकारिणामितरेषां च समानगतित्वं न युक्तमिति चेत्-न, इतरेषां चन्द्रमण्डले भोगाभावात् ॥ १२ ॥
संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॥ १३ ॥
पदच्छेद - संयमने, तु, अनुभूय, इतरेषाम्, आरोहावरोहो, तद्गतिदर्शनात् । सूत्रार्थ - ( तु ) पूर्वपक्षको निवृत्तिके लिए है । ( संयमने ) यमालय में ( अनुभूय ) यम-यातनाका अनुभवकर इस लोकमें लौटते हैं, इसप्रकार ( इतरेषाम् ) अनिष्ट आदि कारियोंके ( आरो-हावरोही ) आरोह और अवरोह होते हैं, ( तद्गतिदर्शनात् ) क्योंकि ' अयं लोको नास्ति ' इत्यादि श्रुति में उनकी गतिका दर्शन होता है । तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । नैतदस्ति - सर्वे चन्द्रमसं गच्छन्तीति । एतत् कस्मात्? यतो-भोगायैव चन्द्रारोहणं न निष्प्रयोजनम् । नापि प्रत्यवरोहा यैव - यथा कश्चिवृक्षमारोहति पुष्पफलोपादानायैव, न निष्प्रयोजनं, नापि पतनायैव । भोगश्चानिष्टादिकारिणां चन्द्रमसि ष्ट आदि कर्म करनेवाले हैं, क्या वे भी चन्द्रलोकमें जाते हैं अथवा नहीं जाते, इसपर विचार किया जाता है । इस विषय में पूर्वपक्षी कहते हैं - इष्ट आदि कर्म करनेवाले हो चन्द्रलोकमें जाते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है, किससे? इससे कि अनिष्ट आदि कर्म करनेवालोंका भी चन्द्रलोकमें गन्तव्यरूपसे श्रवण होता है । जैसे कि कौषीतकी शाखावाले अविशेषरूपसे ' ये वै के ० ' ( जो कोई इस लोकसे प्रायण करते हैं वे सब चन्द्रमण्डलमें ही जाते हैं ) ऐसा कहते हैं । पुनर्जन्म पानेवालोंकी देहोत्पत्ति भी चन्द्रलोक प्राप्तिके विना नहीं हो सकती, क्योंकि ' पञ्चम्यामाहुतौ ' ( पाँचवीं आहुतिमें ) इसप्रकार आहुति संख्याका नियम है, इसलिए सभी चन्द्रलोकको प्राप्त होने चाहिए । यदि कहो कि इष्ट आदि कारी और इनसे अन्योंकी समान गति युक्त नहीं है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्योंके चन्द्रमण्डलमें भोगका अभाव है ॥ १२ ॥
' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । यह नियम नहीं है कि सब चन्द्रमण्डलमें जाते हैं । यह किससे? इससे कि भोगके लिए ही चन्द्रमण्डल में आरोहण होता है निष्प्रयोजन नहीं, और केवल लौटने के लिए भी नहीं । जैसे कोई पुष्प और फलोंके ग्रहण करनेके लिए ही वृक्षपर चढता है न निष्प्रयोजन और न पठनके लिए ही, और यह कहा गया है कि अनिष्ट आदि कारियों का चन्द्र-सत्यानन्दी - दीपिका अनिष्ट आदि कारियोंकी गति और आगतिके विचारसे ' अनिष्ठादि ० ' इत्यादि सूत्रद्वारा वैराग्यका निरूपण करते हैं । ' ये बै के ० ' यह कौषीतकी श्रुति समानरूपसे सबका चन्द्रलोक गमन कहती है । ' वैवस्वतं सङ्गमनं जनानाम् ' ( यमलोक पापीजनोंका गम्यस्थान है ) इससे तो अनिष्ट आदि कारियों-को चन्द्र लोकका दर्शन भी प्राप्त नहीं होता । अतः ' ये त्वितरे ' आदिसे संशय करते हैं । पूर्वपक्ष में पुण्यवान्की ही चन्द्रलोकमें गति है, यह नियम न होनेसे पुण्य व्यर्थं है और पापसे वैराग्यका अदृढ-फलत्व है । सिद्धान्तमें अनिष्टकारियोंको चन्द्रलोक- दर्शन भी नहीं होता, अतः पुण्यका अर्थवत्व और वैराग्यका दृढफलत्व है ॥ १२ ॥
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अधि ० ३ सू ० १४-१५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५८५ नास्तीत्युक्तम् । तस्मादिष्टादिकारिण एव चन्द्रमसमारोहन्ति, नेतरे । ते तु संयमनं यमा-लयमवगाह्य स्वदुष्कृतानुरूपा यामीर्यातना अनुभूय पुनरेवेमं लोकं प्रत्यवरोहन्ति । एवं-भूतौ तेषामारोहावरोहौ भवतः । कुतः? तद्गतिदर्शनात् । तथाहि यमवचन सरूपा श्रुतिः प्रयताम निष्टादिकारिणां यमवश्यतां दर्शयति-- ' न सांपरायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं विक्षमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ' ( कठ ० २६ ) इति । ' वैवस्वतं संगमनं जनानाम् ' इत्येवंजातीयकं च बह्न ेव यमवश्यताप्राप्तिलिङ्गं भवति ॥१३ ॥
स्मरन्ति च ॥ १४ ॥
पदच्छेद - स्मरन्ति च । सूत्रार्थ - और स्मृतिकार भी ऐसा ही कहते हैं । अपि च मनुव्यासप्रभृतयः शिष्टाः संयमने पुरे यमायत्तं कपूयकर्म विपाकं स्मरन्ति नाचिकेतोपाख्यानादिषु ॥ १४ ॥
अपि च सप्त ॥ १५ ॥
पदच्छेद - अपि च, सप्त । सूत्रार्थ - ( अचि च ) और भी पौराणिक लोग ( सप्त ) रौरव आदि सात नरक पाप कर्म फलके उपभोगकी भूमि कहते हैं । * अपि च सप्त नरका रौरवप्रमुखा दुष्कृतफलोपभोगभूमित्वेन स्मर्यन्ते पौरा-णिकैः, तान निष्टादिकारिणः प्राप्नुवन्ति । कुतस्ते चन्द्रं प्राप्नुयुरित्यभिप्रायः ॥ १५ ॥
मण्डल में भोग नहीं है । इसलिए इष्ट आदि कारी ही चन्द्रमण्डलमें आरोहण करते हैं अन्य नहीं । वे अनिष्ट आदि कारी तो संयमन यमालय में प्रवेशकर अपने दुष्कृतोंके अनुसार यमकी यातनाका अनु-भवकर फिर भी इस लोकमें लौटते हैं । इसप्रकार उनका आरोह और अवरोह होता है । किससे? उनकी गतिके दर्शन होनेसे । जैसे कि ' न सांपरायः प्रतिमाति ० ' ( वित्त मोहसे मूढ, प्रमाद करनेवाले उस अज्ञको परलोकका साधन नहीं सूझता । स्त्री, पुत्र आदि विशिष्ट यह लोक है, परलोक नहीं है, ऐसा माननेवाला पुरुष बारम्बार मेरे वशको प्राप्त होता है ) इसप्रकार यमवचन रूप श्रुति मरकर जानेवाले अनिष्ट आदि कारियोंको यमकी अधीनता दिखलाती है । और ' वैवस्वतं संगमनं जनानाम् ' ( यमलोक पापीजनोंका गम्य स्थान है ) इसप्रकारके भी बहुत ही यमकी अधीनताकी प्राप्ति के लिङ्ग बोधक श्रुति वाक्य हैं ॥ १३ ॥
और मनु, व्यास आदि शिष्टोंने संयमन - यमलोक में पापकर्मीका विपाक यमके अधीन है, इस-प्रकार नाचिकेतोपाख्यान - आदिमें स्मरण किया है ॥ १४ ॥
और रौरव प्रमुख सात नरक पाप फलके उपभोगकी भूमिरूपसे पौराणिक लोग स्मरण करते हैं । उनको अनिष्ट आदि कारी प्राप्त करते हैं 1 । वे चन्द्रलोकको कैसे प्राप्त करें? ऐसा अभिप्राय है ॥ १५ ॥
सत्यानन्दी- दीपिका * रौरव, महारौरव, वह्नि, वैतरणी, कुम्भी, तामिस्रा और अन्धतामिस्रा इस प्रकार सात मुख्य नरक हैं । जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन पुराणोंमें है । ' कूटसाक्षी तथाऽसम्यक्पक्षपातेन यो वदेत् । यश्चान्यदनृतं वक्ति स नरो याति रौरवम् ॥ भ्रूणहा पुरहर्ता च गोध्नश्च मुनिसत्तमाः! यान्ति ते नरके घोरे यश्वोच्छ्वासनिरोधकः ॥ ' जो झूठी साक्षी दे, तथा पक्षपातसे ठीक - ठीक न बोले और भी जो मिथ्या बोलता हो, वह मनुष्य रौरवमें जाता है । भ्रूणहत्या करनेवाला, ग्रामका हरण करनेवाला, गोघ्त और जो उच्छ्वासका
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५८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ ननु विरुद्धमिदम् - यमायत्ता यातनाः पापकर्माणोऽनुभवन्तीति । यावता तेषु रौरवादिष्वन्ये चित्रगुप्तादयो नानाधिष्ठातारः स्मर्यन्त इति । नेत्याह-तत्रापि च तद्वयापारादविरोधः ॥ १६ ॥
पदच्छेद - तत्र, अपि च, तद्व्यापारात्, अविरोधः । सूत्रार्थ - ( तत्रापि ) उन रौरव आदि नरकोंमें भी ( तद्वयापारात् ) यम प्रयुक्त शासन होनेसे ( अविरोधः ) विरोध नहीं है ।
तेष्वपि तप्तसु नरकेषु तस्यैव यमस्याधिष्ठातृत्वव्यापाराभ्युपगमादविरोधः ।
यमप्रयुक्ता एव हि ते चित्रगुप्तादयोऽधिष्ठातारः स्मर्यन्ते ॥ १६ ॥
विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ १७ ॥
पदच्छेद - विद्याकर्मणोः, इति, तु, प्रकृतत्वात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है । ' अर्थतयोः पथोनं ' इत्यादि श्रुति में ' एतयोः ' शब्दसे ( विद्याकर्मणोः ) विद्या और कर्मका ग्रहण होता है, ( प्रकृतत्वात् ) क्योंकि वे ही देवयान और पितृयाणरूपसे प्रकृत हैं । पञ्चाग्निविद्यायाम् ' वेत्थ यथाऽसौ लोको न संपूर्यते ' ( छा ० ५।३।३ ) इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनावसरे श्रूयते - ' अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति । जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न संपूर्यते ' ( छा ० ५ | १० | ८ ) इति । तत्रैतयाः पथोरिति विद्याकर्मणोरित्येतत् । कस्मात्? प्रकृतत्वात् । विद्याकर्मणी हि देव-यानपितृयाणयोः पथोः प्रतिपत्तौ प्रकृते । ' तद्य इत्थं विदुः ' ( छा ० ५ | १० | १ ) इति विद्या, तया प्रतिपत्तव्यो देवयानः पन्थाः प्रकीर्तितः । ' इष्टापूर्ते दत्तम् ' ( छा ० ५/१०/३ ) इति कर्म, तेन प्रतिपत्तव्यः पितृयाणः पन्थाः प्रकीर्तितः । तत्प्रक्रियायाम् — अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन ' परन्तु यह विरुद्ध है कि पापकर्म करनेवाले यमके अधीन यातनाका अनुभव करते हैं, क्योंकि उन रौरव आदि नरकोंमें अन्य चित्रगुप्त आदि अनेक अधिष्ठाता स्मरण किये जाते हैं । नहीं, ऐसा कहते हैं-उन सात नरकोंमें भी उस यमके ही अधिष्ठातृरूपसे व्यापार स्वीकृत है, अतः विरोध नहीं है, क्योंकि वे चित्रगुप्त आदि यमसे प्रयुक्त हो अधिष्ठातृरूपसे स्मरण किये जाते हैं ॥ १६ ॥
पञ्चाग्नि विद्यामें ' वेत्थ यथाऽसौ ० ' ( प्रवाहण - यह लोक जिस कारण पूर्ण नहीं होता, क्या वह तू जानता है? ) इस प्रश्नके प्रतिवचन - उत्तरके अवसरमें ' अर्थतयोः पथोर्न ० ' ( जो इन - अचि और धूममेंसे किसी एक मार्गद्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने - जानेवाले प्राणी होते हैं । ' उत्पन्न होओ और मरो ' ' यही उनका तृतीय स्थान होता है । इसी कारण यह लोक नहीं मरता ) ऐसी श्रुति है । उसमें ' एतयोः पथोः ' ( उन दोनों मार्गों के विद्या और कर्मके ) यह अभिप्राय है, किससे? इससे कि वे प्रकृत हैं । विद्या और कर्म ही देवयान और पितृयाण मागंकी प्राप्तिमें प्रकृत हैं, ' तद्य इत्थं विदुः ' ( वे जो कि इसप्रकार जानते हैं ) यह विद्या है, उससे प्राप्तव्य देवयान मार्ग कहा गया है ' इष्टापूर्ते दत्तम् ' ( इष्ट, पूतं और दत्त ) यह कर्म है, उससे प्राप्तव्य पितृयाण मागं कहा गया है । उसके प्रकरणमें ‘ अथैतयोः पथोः ० ' ( इन दोनों मार्गों में किसी एक मी मागंसे नहीं ) इसप्रकार श्रुत सत्यानन्दी - दीपिका निरोधक है, हे मुनिश्रेष्ठ! वे घोर नरक में जाते हैं ) इस प्रकार अनिष्ट आदि कर्म करनेवाले इन नरकोंको प्राप्त होते हैं ॥ १५ ॥