श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 71–80

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 71–80

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३७ प्रधानाद चेतनात्, अणुभ्योऽभावात्, संसारिणो वा उत्पत्यादि संभावयितुं शक्यम् । न च स्वभावतः, विशिष्ट देशकालनिमित्तानामिहोपादानात् । एतदेवानुमानं संसारिख्यति-रिक्तेश्वरास्तित्वादिसाधनं मन्यन्त ईश्वरकारणिनः । नन्विहापि तदेवोपन्यस्तं जन्मादि-सूत्रे । न वेदान्तवाक्य कुसुमग्रथनार्थत्वात्सूत्राणाम् । वेदान्तवाक्यानि हि सूत्रैरुदाहृत्य विचार्यन्ते । वाक्यार्थविचारणाध्यवसाननिर्वृत्ता हि ब्रह्मावगतिः, नानुमानादिप्रमाणान्तर-अन्यसे - अचेतन प्रधानसे, परमाणुओंसे, अभाव - शून्यसे अथवा संसारी ( हिरण्यगर्भ ) से उत्पत्ति आदिकी सम्भावना नहीं की जा सकती और इसी प्रकार स्वभावसे भी उत्पत्ति आदिकी सम्भावना नहीं हो सकती, क्योंकि यहाँ कर्यार्थीद्वारा विशिष्ट देश, काल और निमित्तका ग्रहण है । ईश्वरको जगत्का कारण माननेवाले ( नैयायिक ) इसी अनुमानको संसारी ( जीव ) से व्यतिरिक्त ईश्वरके अस्तित्व आदिमें साधन मानते हैं । तो इस जन्मादि सूत्र में भी उसी अनुमानका उपन्यास किया गया है? नहीं, क्योंकि सूत्र वेदान्त वाक्यरूपी पुष्पोंको गूंथनेके लिए हैं । सूत्रोंद्वारा वेदान्त वाक्यों-का उदाहरण देकर विचार किया जाता है । वाक्यार्थं विचारद्वारा निश्चित तात्पर्य से ब्रह्मावगति ( ब्रह्मज्ञान ) निष्पन्न होती है अनुमान आदि अन्य प्रमाणोंसे निष्पन्न नहीं होती । जगत् के जन्म-सत्यानन्दी - दीपिका महान् पटो जायते ' ( महान् पट उत्पन्न होता है ) यह उत्पत्तिरूप है । धर्म, लक्षण और अवस्था भेदसे परिणाम तीन प्रकारका है, वह उत्पत्तिरूप है । जैसे मृत्तिका, सुवर्ण आदि धर्मीका घट, कटक आदि धर्मं परिणाम उत्पत्ति रूप है, एवं घट आदि उत्पन्न होते हैं यह लक्षणरूप परिणाम उत्पत्तिरूप है । घट आदिमें नवीनत्व व पुरानत्व भेद अवस्थापरिणाम है वह भी उत्पत्तिरूप है । अपक्षय - अवयवोंका ह्रास नाश है । इसप्रकार इन छः भाव विकारोंका जन्म, स्थिति तथा लय इन तीनोंमें अन्तर्भाव हो जाता है | परन्तु इसको सूत्रका मूल माननेसे जगत्की कारणता ब्रह्ममें सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि उत्पन्न हुए महाभूतोंके स्थितिकालमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे भौतिक पदार्थोंमें जन्म आदि छः विकारोंको देखकर यास्कमुनिने उपर्युक्त निरुक्त वाक्यकी रचना की है । इससे केवल छ: भावविकारोंवाले भूतोंकी सिद्धि हो सकती है । इसलिए ' जन्मादि ' सूत्र ब्रह्मका लक्षणरूप है और ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ’ श्रुति मूलक है । अतः जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण ब्रह्म है । * ' अनेककर्तृमोक्तृसंयुक्त ' इत्यादि पूर्वोक्त चार विशेषणोंसे युक्त इस जगत् के उत्पत्ति आदि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसम्पन्न ईश्वरसे होते हैं अन्यसे नहीं । इसपर भगवान् भाष्यकार ' प्रधानादचेतनात् ' इत्यादिसे कुछ मतोंका संक्षेपसे उल्लेख करते हैं - सांख्यमत में जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण प्रधान है । परन्तु प्रधान जड़ है, अतः उससे इस विचित्र जगत् के उत्पत्ति आदि अभम्भव हैं । शून्यवादी इस जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण शून्य मानते हैं । परन्तु शून्य अभावरूप है और यह विचित्र रचनात्मक जगत् भावरूप है, अतः अभावसे भावके उत्पत्ति आदि कदापि नहीं हो सकते । यदि मानें तो अतिप्रसङ्ग हो जायगा अर्थात् बालूसे भी तेलकी उत्पत्ति हो जायगी, और ' नासतो विद्यते भाव: ' ( म ० गी ० २।१६ ) ( असत् का अस्तित्व नहीं होता ) ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छा ० ६।२।१ ) ( हे सोम्य! आरम्भ में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' कथमसतः सज्जायेतेति ' ( छा ० ६।२।२ ) ( भला असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ) इस प्रकार श्रुति आदि प्रमाणोंसे शून्यसे जगत् के उत्पत्ति आदि बाधित हैं । नैयायिक - इस विचित्र जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण अनेक और विचित्र परमाणु हैं । परन्तु जड़ परमाणु इस विचित्र जगत्को रचनामें स्वयं प्रवृत्त नहीं

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IIII ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ निर्वृत्ता । सत्सु तु वेदान्तवाक्येषु जगतो जन्मादिकारणवादिषु तदर्थग्रहणदाययानु-मानमपि वेदान्तवाक्याविरोधि प्रमाणं भवन्न निवार्यते श्रुत्यैव च सहायत्वेन तर्कस्याभ्यु-पेतत्वात् । * तथा हि- ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' ( बृह ० २४ / ५ ) इति श्रुतिः ' पण्डितो मेधावी गन्धारा-आदिके कारणका प्रतिपादन करनेवाले वेदान्त वाक्यों [ यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ] के विद्यमान होनेपर उनके अर्थ ग्रहणकी दृढ़ता के लिए वेदान्तं वाक्योंका अविरोधी अनुमान भी यदि प्रमाण होता हो तो उसका निवारण नहीं किया जाता, क्योंकि श्रुतिने ही सहायकरूपसे तर्क- अनु-मानको स्वीकार किया है । जैसे ' श्रोतव्यः ' ( आत्मा श्रोतव्य व मन्तव्य है ) यह श्रुति है । और सत्यानन्दी - दीपिका हो सकते, अतः वे कारण नहीं हैं । इसीप्रकार हिरण्यगर्भ भी इस विचित्र जगत् के उत्पत्ति आदि करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् ' ( श्वेता ६।१२ ) इत्यादि श्रुति ब्रह्मा मी अन्य जीवोंके समान उत्पत्ति आदि कहती है । चार्वाक अभिमत स्वभाव मी जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह जड़ है । फलार्थी पुरुष देश, काल ओर निमित्तकी अपेक्षा करता है, जैसे धान्यार्थी विशेष देश, वर्षा आदि काल और विशेष बीज आदिको अपेक्षा करता है, वैसे ही सर्वज्ञ ईश्वर भी जीवोंको तत् तत् कर्मका फल देने के लिए विशेष देश, काल ओर निमित्तको अपेक्षा करता है, परन्तु ऐसा जड़ समुदाय में सम्भव नहीं है । अतः इस विलक्षण जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण परमेश्वर ही है । जनत् के उत्पत्ति आदिके कारणरूपसे श्रुति सिद्ध ईश्वरको नैयायिक अनुमान प्रमाणसे सिद्ध करते हैं - ' जगत् चेतनकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत् ' ' जैसे घट कार्य है और वह चेतन कुम्हार कर्तासे निर्मित है, वैसे ही यह जगत् भी कार्य है, अत वह भी चेतन कर्ता द्वारा निर्मित होना चाहिए, वह चेतन कर्ता जीव आदिसे भिन्न सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसम्पन्न ईश्वर है । वैशेषिक मतमें प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण हैं, शब्द प्रमाण को वे अनुमानरूपसे अर्थका बोधक मानते हैं । इसी आशयको ' एतदेवानुमानं ' इत्यादिसे कहा गया है । * परन्तु ‘ यतो व इमानि भूतानि जायन्ते ' इस श्रुतिका अनुमानमें अन्तर्भाव कर सूत्रकारने ' जन्मादि ' सूत्र में भी अनुमानका ही उपन्यास किया है, यथा ' जगज्जन्मादि सर्वज्ञ ईश्वरकर्तृकं कार्यत्वात् ' जगत् कार्य है, अतः उसके जन्मादिका कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर है । परन्तु नैयायिकका यह अनुमान तभी सिद्ध हो सकता है जब हेतु और साध्यका व्याप्तिज्ञान प्रत्यक्षसे सिद्ध हो । प्रत्यक्ष आदि प्रमाण अतीन्द्रिय पदार्थके ज्ञानमें असमर्थ हैं, अतः अतीन्द्रिय पदार्थका ज्ञान श्रुतिसे ही होता है, इसलिए भगवान् सूत्रकारने ' तत्तु समन्वयात् ' ( ब्र ० सू ० १ १/४ ) इत्यादि सूत्रोंसे उनके तात्पर्यका विचार किया है, इसलिए यहाँ ' जन्मादि ' सूत्रमें भी ' यतो वा इमनि भूतानि ' इत्यादि श्रुतियोंका स्वतन्त्ररूपसे विचार किया गया है अनुमानका नहीं । ब्रह्मज्ञान भी ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( बृह ० ३।९ ।२६ ) ( उस उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुषको मैं पूछता हूँ ) इत्यादि वेदान्त वाक्योंसे गम्य है अनुमानादिसे नहीं, इसलिए ' अयमात्मा ब्रह्म, तत्त्वमसि,, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्त वाक्यार्थके विचारसे तात्पर्यका निश्चय होनेपर ही ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है । * ' यतो वा इमानि ' इत्यादि वेदान्त वाक्यार्थकी दृढ़ताके लिए सहायकरूपसे अनुमान प्रमाण भी स्वीकृत है, जैसे “ जगत् अभिननिमित्तोपादानकं कार्यात्वात् ऊर्णनाभ्यारब्धतन्त्वादिवत् अथवा ईश्वरघटसंयोगवत् " जैसे मकड़ीसे उत्पन्न तन्तु आदि कार्य है और उसके प्रति अभिन्ननिमित्तो-पादान कारण मकड़ी है, वैसे जगत् भी कार्य होनेसे अभिन्ननिमित्तोपादान कारण वाला है, वह

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अधि ० २ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ३ ९ नेवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद ' ( छान्दो ० ६ | १४ | २ ) इति च पुरुषबुद्धिसाहाय्यमात्मनो दर्शयति । * न धर्मजिज्ञासायामिव श्रुत्यादय एव प्रमाणं ब्रह्मजिज्ञासायाम्, किंतु श्रुत्या-दयोऽनुभवादयश्च यथासंभवमिह प्रमाणम्; अनुभवावसानत्वाद्भूतवस्तुविषयत्वाच्च ‘ पण्डितो ० ' ( जैसे पण्डित और मेधावी ( बुद्धिमान् ) गन्धार ( कन्धार ) देशको ही प्राप्त करता है, - वैसे ही यहां आचार्यवान् पुरुष सत्को जानता है ) यह श्रुति. भी अपने प्रति पुरुष बुद्धिको सहायक दिखलाती है । धर्मजिज्ञासाके समान ब्रह्मजिज्ञासामें केवल श्रुति आदि ही प्रमाण नहीं हैं, किन्तु सत्यानन्दी - दीपिका कारण ईश्वर है अथवा जैसे ईश्वर और घटका संयोग कार्य है उसके प्रति अभिन्ननिमित्तोपादन कारण ईश्वर है । प्रथम दृष्टान्त वेदान्त में प्रसिद्ध है, दूसरा उदाहरण नैयायिकोंके लिए है, क्योंकि वे ईश्वरको केवल निमित्तकारण मानते हैं । जिससे वस्तु उत्पन्न हो उसमें ही लीन हो वह उपादान कारण । उपादानकारणसे भिन्न कारण निमित्त कहे जाते हैं । यथा मृत्तिकासे उत्पन्न हुआ घट उसीमें लीन होता है, अतः मृत्तिका घटके प्रति उपादानकारण है और कुम्हार आदि निमित्तकारण हैं । परन्तु जगद्रूरूप कार्यके प्रति उपादान और निमित्तकारण एक ही है । इसमें ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ' तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ' ( मुण्ड ० २।१।१ ) ( हे सोम्य! उसी प्रकार अक्षरसे विविध भाव उत्पन्न होते हैं तथा उसमें ही लीन होते हैं, वह सत्स्व-रूप ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं । संसारके प्रति ईश्वरको केवल निमित्तकारण माननेवाले नैयायिकों का मत उक्त अनुमान तथा श्रुतिसे खण्डित हुआ समझना चाहिए । ' सः कर्ता सर्वज्ञः जगत्कारणत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा कुलाल: ' जगत्का कारण होनेसे वह कर्ता सर्वज्ञ है, जो जगत्का कारण नहीं है वह सर्वज्ञ भी नहीं, यथा कुलाल । यह अनुमान ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः ' इस श्रुत्यर्थ की दृढ़ता ( संशय तथा विपर्ययकी निवृत्ति ) के लिए है । श्रुतार्थमें यदि संशय अथवा विपर्यय उत्पन्न हो तो वे तर्कसे निवृत्त करने चाहिएँ, इस विषय में “ श्रोतव्यं श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः । मत्वा च सततं ध्येय एते दर्शन हेतवः || ” ( श्रुति वाक्योंका श्रवण करना चाहिए और श्रुतार्थका तर्कोंसे मनन करना चाहिए मननकर उसका ध्यान करना चाहिए, क्योंकि ये ज्ञानोत्पत्ति हेतु हैं ) यह श्रुति प्रमाण है । * जैसे डाकू किसी पुरुषको आँखोंपर पट्टी बाँधकर गन्धार देशसे दूर किसी अरण्यमें छोड़ दें, तब कोई कृपालु पुरुष उसके आर्तनादकों सुनकर वहाँ आ पहुँचे । उसकी पट्टो खोलकर उसे स्वदेश जानेका मार्ग बतादे, तो वह देश भ्रष्ट पण्डित - बताए मार्गके समझने में चतुर तथा मेधावी ( धारण शक्ति सम्पन्न तर्क कुशल ) पुरुष स्वदेशको ही पहुच जाता है, वैसे ही अविद्याने अपने विलासद्वारा जिस पुरुषको आनन्दस्वरूप स्वात्भासे दूर हटाकर इस संसाररूप भयावह वन में फेंक दिया है । दुःखोंसे घबड़ाए उस आतंपुरुषको कोई दयालु ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ' तू संसारी नहीं है ' अपितु ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) अर्थात् ' तू ब्रह्म है ' इसप्रकार आत्माके यथार्थं स्वरूपका ज्ञानोपदेश करता है । यदि वह श्रोता उपदेश ग्रहण करनेमें समर्थ तथा तर्क कुशल है तो झटिति आत्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्राप्तकर संसारदुःखोंसे मुक्त हो जाता है । इसतरह ' आत्मा वा अरे श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इत्यादि श्रुति अपने अर्थं समझानेके लिए पुरुष के बुद्धिरूप तर्ककी सहायकरूपसे अपेक्षा दिखलाती है । शंका - वेद प्रतिपादित होनेसे जैसे धर्ममें मनन आदिकी अपेक्षा नहीं है, वैसे ब्रह्ममें भी नहीं होनी चाहिए, किन्तु युक्त तो यह है कि धर्मके समान ब्रह्मको भी श्रुति, लिङ्ग आदिकी अपेक्षा हो? इसका समाधान – ' न ' इत्यादि भाष्यसे किया जाता है ।

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४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ब्रह्मज्ञानस्य । कर्तव्ये हि विषये नानुभवापेक्षा स्तीति श्रुत्यादीनामेव प्रामाण्यं स्यात्, पुरुषा-धीनात्मलाभत्वाच्च कर्तव्यस्य । कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्यं लौकिकं वैदिकं च कर्म, यथाश्वेन गच्छति, पद्भ्यामन्यथा वा न वा गच्छतीति । 8 तथा ' अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति, नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति ', ' उदिते जुहोति ' अनुदिते जुहोति ' इति विधिप्रतिषे-धाचात्रार्थवन्तः स्युः, विकल्पोत्सर्गापवादाश्च । न तु वस्त्वेवं नैवमरित नारतीति वा विक-ल्प्यते । विकल्पनास्तु पुरुषबुद्धयपेक्षाः । न वस्तुयाथात्म्यज्ञानं पुरुषबुद्धयपेक्षम् । किं तर्हि? श्रुति आदि तथा अनुभव आदि यथासंभव उसमें प्रमाण हैं, क्योंकि ब्रह्मज्ञान सिद्ध वस्तु विषयक और ब्रह्म साक्षात्कार पर्यन्त अवधिवाला है । कर्तव्य धर्मके विषयमें अनुभवकी अपेक्षा नहीं है, किन्तु उसमें तो श्रुति आदि ही प्रमाण हैं । इससे अतिरिक्त धर्मकी उत्पत्ति पुरुषके अधीन है । इसलिए लौकिक तथा वैदिक कर्म करने, न करने अथवा अन्यथा करने में पुरुष समर्थ - स्वतन्त्र है । जैसे कि अश्वसे जाता है, पैदल जाता है अथवा अन्य प्रकारसे जाता है अथवा नहीं हो जाता । वैसे ही ' अतिरात्रमें षोडशीका ग्रहण करे ' ' अतिरात्र में षोडशीका ग्रहण न करे ' ऋग्वेदी ' सूर्य उदय होनेपर अग्निहोत्र करे ' यजुर्वेदी ' सूर्योदयसे पहले अग्निहोत्र करे ' इसप्रकार विधि, प्रतिषेध, विकल्प, उत्सर्गं तथा अपवाद यहां धर्ममें सार्थक होते हैं । परन्तु सिद्ध वस्तु इसप्रकार है अथवा इसप्रकार नहीं है, अथवा नहीं है, ऐसे विकल्प नहीं किये जा सकते हैं, विकल्प तो पुरुष बुद्धिकी अपेक्षासे होते हैं । सिद्ध वस्तुका यथार्थ ज्ञान पुरुष बुद्धिकी अपेक्षा नहीं करता, किन्तु वह तो सिद्ध वस्तुके अधीन है । एक सत्यानन्दी - दीपिका * वेद प्रतिपादकता यद्यपि ब्रह्म और धर्म दोनोंमें समान है, तथापि जिज्ञास्य धर्म और जिज्ञास्य ब्रह्ममें महान् अन्तर है । ब्रह्ममें श्रुति प्रमाणसे अतिरिक्त ब्रह्मवेत्ताओंका ब्रह्म साक्षात्काररूप अनुभव भी प्रमाण है । किञ्च भाष्यस्थ आदि पदसे मनन निदिध्यासनका भी प्रमाणरूपसे ग्रहण है । मोक्ष लिए श्रुति प्रतिपादित ब्रह्मज्ञानका पर्यवसान ब्रह्म साक्षात्कार है । ब्रह्मज्ञानका प्रत्यगभिन्न सिद्ध ब्रह्म विषय है और ब्रह्म साक्षात्कार फल है । ' मन्तव्य: ' इसप्रकार श्रुति प्रतिपादित मनन ज्ञानकी दृढ़ता के लिए अत्यन्त अपेक्षित है । परन्तु धर्ममें श्रुति आदि प्रमाणसे अतिरिक्त मनन आदिकी अपेक्षा बिल्कुल नहीं है, क्योंकि धर्म अतीन्द्रिय होनेसे नित्य परोक्ष है । वेद आदि विहित शुभ क्रियाओंसे उत्पन्न अदृष्टविशेष पुण्य ( धर्मं ) है और निषिद्ध क्रियाओंसे उत्पन्न अदृष्ट विशेष पाप ( अधर्म ) है । भट्ट - प्रस्थान तथा प्रभाकर - प्रस्थान इस भेदसे पूर्वमीमांसादर्शनमें दो प्रस्थान ( मतं ) हैं । कुमारिलभट्टके मत में याग, दान आदि क्रियाएँ धर्माधर्मं हैं और पुण्य, पापको लक्षणाद्वारा गांणरूपसे धर्माधर्मं कहा गया है । प्रभाकरमत में पुण्य, पापको ही धर्माधर्म कहा गया है, इनका साधन होनेसे याग, दान आदि क्रियाओंको भी गौणरूपसे धर्माधर्मं कहा गया है । ' व्यवहारे भट्ट-न्याय: ' ( व्यवहारमें भट्टन्याय मान्य है ) । इस न्यायके अनुसार भगवान् भाष्यकारने याग आदिको धर्म मानकर ' कर्तुमकर्तुम् ' इत्यादि कहा है । * अब धर्म विधि आदिको दिखाया जाता है- ' यजेत ' ( याग करे ) यह विधि है 1 । ' न सुरां पिबेत् ( सुरा न पीवे ) यह प्रतिषेध है । ' ब्रीहिभिर्यवैर्वा यजेत ' ( धान्य से अथवा यवोंसे होम करे ) यह सम्भावित विकल्प है । ' अतिरात्र नामक यागमें षोडशी नामक पात्रका ग्रहण करे ' ' अति-रात्र में षोडशीपात्रका ग्रहण न करे ' यह इच्छा अधीन विकल्प है । ' मा हिंस्यात् ' ( हिंसा न करे ) यह उत्सर्ग है । सामान्य वाक्यको उत्सर्ग कहा जाता है, क्योंकि वह विशेष वाक्यसे बाधित होता है ।

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अधि ० २ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४१ वस्तुतन्त्रमेव तत् । नहि स्थाणावेकस्मिन्स्थाणुर्वा पुरुषोऽन्यो वेति तत्त्वज्ञानं भवति । तत्र पुरुषोऽन्यो वेति मिथ्याज्ञानम्, स्थाणुरेवेति तत्त्वज्ञानं, वस्तुतन्त्रत्वात् । एवं भूतवस्तु-विषयाणां प्रामाण्यं वस्तुतन्त्रम् । तत्रैवं सति ब्रह्मज्ञानमपि वस्तुतन्त्रमेव, भूतवस्तुविषय-त्वात् । ननु भूतवस्तुत्वे ब्रह्मणः प्रमाणान्तरविषयत्वमेवेति वेदान्तवाक्यविचारणान-र्थिकैव प्राप्ता । नः इन्द्रियाविषयत्वेन संबन्धाग्रहणात् । स्वभावतो विषयविषयाणीन्द्रि-याणि न ब्रह्मविषयाणि । सति हीन्द्रियविषयत्वे ब्रह्मण इदं ब्रह्मणा संबद्धं कार्यमिति गृह्येत । कार्यमात्रमेव तु गृह्यमाणं किं ब्रह्मणा संबद्धं किमन्येन केनचिद्वा संबद्धमिति न शक्यं निश्चेतुम् । तस्माज्जन्मादिसूत्रं नानुमानोपन्यासार्थम् । किं तर्हि? वेदान्तवाक्य-स्थाणुमें स्थाणु है, पुरुष है अथवा अन्य है, ऐसा ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं होता । उसमें पुरुष है अथवा अन्य कुछ है, यह मिथ्या ज्ञान है । स्थाणु ही है यह यथार्थ ज्ञान है, क्योंकि वह वस्तु अधीन है; उसीप्रकार सिद्ध वस्तु विषयक ज्ञानोंका प्रामाण्य वस्तुके अधीन है । ऐसा होनेपर ब्रह्मज्ञान भी वस्तु के अधीन है, क्योंकि वह भी सिद्ध वस्तु विषयक है । यदि यह शंका हो कि सिद्ध वस्तु होने से ब्रह्म अन्य प्रमाणका विषय ही है, इससे तो वेदान्तवाक्योंके विचारकी निष्फलता प्राप्त होती है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्म इन्द्रियोंका विषय नहीं है, अतः अन्य प्रमाणोंसे उसका जगद्रूप कार्यके साथ सम्बन्धका ग्रहण नहीं होता । इन्द्रियाँ स्वभावसे विषयविषयक हैं, ब्रह्मविषयक नहीं हैं । ब्रह्म इन्द्रियों का विषय होता तो यह जगद्रूप कार्य ब्रह्मके साथ सम्बद्ध है, ऐसा गृहीत होता । परन्तु कार्यमात्र अर्थात् यह जगद्रूप कार्य ही इन्द्रियोंसे गृहीत होता है, तो क्या वह ब्रह्मके साथ सम्बद्ध है अथवा किसी अन्यके साथ सम्बद्ध है, ऐसा निश्चय नहीं किया जा सकता । इसलिए ' जन्मादि ' सूत्र अनुमान उपन्यासके लिए नहीं है, किन्तु वेदान्तवाक्योंके प्रदर्शनके लिए है । सत्यानन्दी - दीपिका ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' ( अग्नीषोमीय पशुका आलभन करे ) यह अपवाद है, क्योंकि यह विशेष वाक्य है । इसप्रकार विधि, प्रतिषेध, विकल्प, उत्सर्ग तथा अपवाद धर्ममें सार्थक होते हैं । शास्त्रके अनुसार पुरुष बुद्धिकी अपेक्षा न करनेवाले सब विकल प्रमारूप होते हैं । परन्तु लोकमें पुरुष बुद्धि-की अपेक्षा रखनेवाले सब विकल्प अप्रमारूप होते हैं । * सिद्ध ब्रह्म केवल श्रुति प्रतिपाद्य है । इसपर पूर्व पक्षी आक्षेप करता है - ' ब्रह्म प्रत्यक्षादि -गोचरं धर्मविलक्षणत्वात् घटादिवत् ' " धर्मसे विलक्षण होनेके कारण ब्रह्म प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका विषय है जैसे घटादि । ” अतः ' जगज्जन्मादि ब्रह्मकारणकं कार्यत्वात् ' ' जगत्का जन्मादि ब्रह्मकारणक है, क्योंकि वह कार्य है ' यह अनुमान ' जन्मादि ' सूत्रमें विचार करने योग्य है । श्रुति नहीं, इसलिए ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका विचार निष्फल है, क्योंकि सिद्ध वस्तु प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणसे ग्राह्य है । सिद्धान्ती - क्या ' यत्कार्यं तद्ब्रह्मजम् ' जो कार्य है वह ब्रह्मसे जन्य हैं ' यह अनुमान ब्रह्मका साधक है अथवा ' यत्कार्यं तत्सकारणकम् ' ' जो कार्य है वह सकारणक हैं ' यह ब्रह्मका साधक है? प्रथम अनुमान तो नहीं हो सकता, क्योंकि व्याप्ति असिद्ध है । परन्तु ब्रह्म तो घट आदिके समान इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इस विषय में ' पराचि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः ' ( कठ ० २।१।१ ) ‘ न चक्षुषा गृह्यते ' ( जो ब्रह्म चक्षुसे गृहीत नहीं होता ) ' यन्मनसा न मनुते ' ( केन ० १।५ ) ( जो मनसे मनन नहीं किया जाता ) इत्यादि श्रुति प्रमाण है, अतः उसका प्रत्यक्ष प्रमाणसे व्याप्ति ज्ञान भी नहीं हो सकता । शंका - ब्रह्म भले ही इन्द्रियोंका विषय न हो, परन्तु व्याप्तिज्ञान तो होगा

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४२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ प्रदर्शनार्थम् । किं पुनरतद्वेदान्तवाक्यं यत्सूत्रेणेह लिलक्षयिषितम्? ' भृगुर्वै वारुणि: वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति ' इत्युपक्रम्याह - ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व | ( तैत्ति ० ३।१ ) । तस्य च निर्णयवाक्यम्- ' आनन्दा देव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानिं जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ' ( तैत्ति ० ३।६ ) | अन्यान्यप्येवंजातीयकानि वाक्यानि नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावसर्वज्ञ स्वरूप कारणविषयाप्युदाहर्तव्यानि ॥ २ ॥

वे कौनसे वेदान्तवाक्य हैं, जिनका सूत्रद्वारा ब्रह्म के लक्षणरूपसे यहाँ विचार करना इष्ट है? " भृगुर्वै वारुणिः ' ( वारुणि भृगु अपने पिता वरुणके पास गया और कहा हे भगवन्! ब्रह्मका उपदेश कीजिए ) ऐसा उपक्रमकर कहते हैं— ' यतो वा इमानि ० ', ( जिससे ये समस्त भूत- भौतिक उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिससे जीवित रहते हैं, लय होते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसकी जिज्ञासा कर वह ब्रह्म है ) इस सामान्य कारण विषयक श्रुतिवाक्यका निर्णय वाक्य यह है- ' आनन्दाद्धयेव ० ' ( निस्सन्देह आनन्दसे ही ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर आनन्दसे ही जीवित रहते हैं और लय होते हुए आनन्दमें ही प्रविष्ट होते हैं ) । नित्य, शुद्ध, बुद्ध तथा मुक्तस्वभाव सर्वज्ञ स्वरूप कारण ( ब्रह्म ) विषयक इसप्रकारके [ स्वरूप तथा तटस्थ लक्षणके निर्देशक ] अन्य उपनिषद् - वाक्य भी उदाहरणरूपसे देने चाहिएँ ॥ २ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका ही? समाधान --- यदि इन्द्रियोंसे ब्रह्मका ज्ञान होता तो जगद्रूप कार्यं ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ है, ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होता । जैसे मृत्तिकाका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है तो घट मृत्तिका जन्य है, यह भी सर्वानुभव सिद्ध है । किन्तु यहाँ केवल जगद्रूप कार्यं ही इन्द्रियोंसे उपलब्ध होता है ब्रह्म नहीं, क्योंकि वह अतीन्द्रिय है, अतः सुतरां उसमें व्याप्तिज्ञान असिद्ध है । ' यत्कार्यं तत्सकारणकम् ' इससे केवल सामान्यरूपसे कार्य कारणवाला है यह सिद्ध होता है, किन्तु यह जगद्रूप कार्य ब्रह्मसे जन्य है अथवा किसी अन्य कारणसे, यह निश्चय नहीं होता । वह कारण विषयक निश्चय तो केवल श्रुतिसे ही हो सकता है । इसलिए ' जन्मादि ' सूत्र अनुमान उपन्यासके लिए नहीं है, अपितु वेदान्त वाक्योंके दिखलाने के लिए है | अतः इस सूत्र में ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' यह श्रुतिवाक्य विचारका विषय है । श्रुत्यर्थकी दृढ़ता के लिए गौणरूपसे अनुमान भी विचारणीय है । * यहाँ प्रथम सूत्रमें विशिष्ट अधिकारीके लिए ब्रह्म विचारकी प्रतिज्ञा की गई है, और द्वितीय सूत्रमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेवालोंके लिए ब्रह्मका लक्षण कहा गया है । परन्तु ' जन्मादि ' सूत्रमें तथा ' यतो वा इमानि ' इस श्रुतिवाक्य में केवल सामान्य कारणका ज्ञान होता है कि इस द्वैतप्रपञ्चका कोई कारण है, क्या वह प्रधान, परमाणु अथवा अन्य है? ऐसी कारण विषयक जिज्ञासा बनी रहती है, उसकी निवृत्ति के लिए विशेष कारण विषयक ' आनन्दाद्धयेव ' यह निर्णय वाक्य उद्धृत किया गया है । इससे यह निर्णय हो जाता है कि सारे जगत्का कारण आनन्द है और वह ब्रह्मस्वरूप है, जड़ प्रधान आदि नहीं । इन श्रुतिवाक्योंसे ब्रह्मके दो लक्षण प्रतीत होते हैं - एक स्वरूप और दूसरा तटस्थ । ‘ स्वरूपं सत् व्यावर्तकं स्वरूपलक्षणम् ' " जो लक्षण स्वलक्ष्यका स्वरूप होता हुआ स्वलक्ष्यको अन्य अलक्ष्योंसे पृथक् ज्ञापित करे वह स्वरूपलक्षण है । " जैसे- ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' सत्य, ज्ञान और अनन्त ' ये ब्रह्मके स्वरूप भूत होते हुए लक्ष्य ब्रह्मका अलक्ष्य - असत्, जड़ और दुःखरूप प्रपञ्चसे पृथक् ज्ञान कराते हैं, अतः सत्य आदि ब्रह्मके स्वरूप लक्षण हैं । * ' कादाचित्कत्वे सति व्यावर्तकं तटस्थ

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अधि ० ३ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४३ ( शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् सू ० ३ ) जगत्कारणत्वप्रदर्शनेन सर्वज्ञं ब्रह्मेत्युपक्षिप्तं, तदेव द्रढयन्नाह -जगत्की कारणता दिखलाने से ब्रह्म सर्वज्ञ है अर्थतः प्राप्त हुआ है, अब उसे दृढ़ करते हुए कहते हैं-शास्त्रयोनित्वात् ॥ ३ ॥

सूत्रार्थ - ऋग्वेद आदि शास्त्रका कारण होनेसे ब्रह्म सर्वज्ञ है । अथवा ब्रह्म केवल ऋग्वेद आदि शास्त्र प्रमाणक है अर्थात् ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपके ज्ञानमें ऋग्वेदादि शास्त्र ही प्रमाण है । * महत ऋग्वेदादेः शास्त्रस्याने कविद्यास्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत्सर्वार्थावद्योतिनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म । * नहीदृशस्य शास्त्रस्यर्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वि अनेक विद्या स्थानोंसे उपकृत दीपकके समान सब अर्थोंका प्रकाशन करनेमें समर्थ और सर्वज्ञके समान महान् ऋग्वेदादि शास्त्रका योनि ( कारण ) ब्रह्म है । ऐसे ऋग्वेदादि रूप सर्वगुण-सत्यानन्दी - दीपिका लक्षणम् ' " जो लक्षण स्वलक्ष्यमें कभी रहकर अपने लक्ष्यका अन्य अलक्ष्योंसे पृथक् बोध कराता है वह तटस्थ लक्षण है । " जन्म, स्थिति और लयकी कारणता ब्रह्म में सदा नहीं रहती, केवल मायाकी अधिष्ठानता कालमें रहती है, अतः इनकी कारणता ब्रह्ममें कदाचित् है और सांख्य नैयायिक आदि मत में प्रधान, परमाणु आदि जो अलक्ष्य हैं उनसे भी ब्रह्मका पृथक् रूपसे ज्ञान कराता है । इसलिए कदाचित् ही व्यावर्तक होनेसे जन्म, स्थिति तथा लयकी कारणता ब्रह्मका तटस्थ लक्षण है । अतः ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिवाक्य तथा ' जन्मादि ' सूत्र ब्रह्मके तदस्थ लक्षण हैं । ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्र में ' यतः ' शब्द ' आनन्दादयेव ' इस श्रुति अनुसार है । ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृह ० ३।९ ।२८ ) ( ब्रह्म विज्ञान तथा आनन्दस्वरूप है ) इत्यादि अन्य शाखाओं में स्थित वाक्य भी इस अधिकरणके विषय हैं । इसप्रकार सब शाखाओंमें तटस्थ लक्षण और स्वरूप लक्षण घटित वाक्य जिज्ञास्य ब्रह्म में समन्वित हैं । ' ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ' ( ज्ञानके विना मुक्ति नहीं होती ) ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' इत्यादि श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानसे हो मोक्ष होता है और वह वेदान्तवाक्योंके विचार करनेसे होता है, इसलिए ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके लिए वेदान्त - वाक्योंका विचार करना चाहिए । पूर्वपक्ष में ब्रह्मस्वरूपकी असिद्धिसे मुक्ति असिद्ध है, सिद्धान्त में उसकी सिद्धि हैं ॥ २ ॥

‡ ' जन्माद्यस्य यत: ' इस सूत्र में भगवान् सूत्रकारने तटस्थ लक्षणका निर्देश किया है । ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुतिवाक्य भी तटस्थ लक्षणके प्रतिपादक ही हैं । इसी अर्थाभिप्रायको रामानुजादि अर्वाचीन भाष्यकारोंने मी स्वीकार किया है । परन्तु भगवान् भाष्यकार शङ्कराचार्य तटस्थ लक्षणको बतलाते हुए तटस्थ लक्षण प्रतिपादक सूत्रका मी स्वरूप लक्षणमें तात्पर्य बतला रहे हैं और ‘ यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुति - वाक्योंका स्वरूपलक्षणमें पर्यवसान करते हैं, इसका तात्पर्य यह है कि तटस्थ लक्षणसे लक्ष्यका सामान्य परिचय होता है, परन्तु उसका इदम् इत्थंरूपसे ज्ञान स्वरूप लक्षणके अधीन है, इसलिए जहाँ तक इदम्, इत्थंरूपसे निश्चय नहीं होता वहाँ तक वाक्यका तात्पर्य होना चाहिए । इस अभिप्राय से भगवान् भाष्यकारने तटस्थ लक्षण वाक्योंका उपलक्षणरूपसे स्वरूप लक्षण परक तात्पर्य वर्णन किया है । इससे वैदेशिक विद्वानों तथा तदनुयायी भारतीय विद्वानोंने भाष्यकारपर जो कुछ आक्षेप किया है, वह संप्रदाय तथा मायका भली - भाँति परिशीलन न होनेके कारण है ।

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४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ 2222 तस्य सर्वज्ञादन्यः संभवोऽस्ति । यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात्पुरुषविशेषात्संभवति, यथा व्याकरणादि पाणिन्यादेज्ञेयैकदेशार्थमपि, स ततोऽप्यधिकतर विज्ञान इति प्रसिद्ध लोके । 4-शम्पन्न शास्त्रकी उत्पत्ति सर्वज्ञको छोड़कर किसी अन्यसे नहीं है । जो जो विस्तारार्थ शास्त्र जिस पुरुष -विशेष से विरचित है, जैसे पाणिनि आदिके ज्ञेयका एक अंशरूप अर्थसे युक्त व्याकरण आदि शास्त्र है, वह ( पुरुषविशेष ) उस स्वविरचित शास्त्र से अधिकतर ज्ञानवान होता है, यह लोकमें प्रसिद्ध है, सत्यानन्दी - दीपिका * जिसप्रकार अध्येता वेदोंके पूर्वक्रम ( आनुपूर्वी आदि ) का स्मरणकर मन्त्रोंका उच्चारण करते हैं । इसीप्रकार मायाकी सहायता से आवरण रहित अनन्त, सर्वज्ञ परमेश्वर पूर्वकल्पके क्रमानुसार वेदों तथा उनके अर्थोंका एक साथ ही ज्ञानकर उनकी अभिव्यक्ति करता है, इसलिए वेद पौरुषेय ( पुरुष प्रणीत ) नहीं है । जहाँ अर्थज्ञान पूर्वक वाक्यज्ञान वाक्य रचनामें कारण हो वहाँ पौरुषेयत्व माना जाता है, जैसे महाभारत आदि ग्रन्थ पौरुषेय ( पुरुष प्रणीत ) माने जाते हैं । ईश्वरको युगयुत् अर्थज्ञान और वाक्यज्ञान होता है, इसलिए वेद पौरुषेय नहीं हैं । वेद अपौरुषेय हैं और उनका तथा सबका कर्ता ब्रह्म सर्वज्ञ है । यह प्रतिपादन करना पूर्वसूत्र तथा इस सूत्र ( अधिकरण ) का ' विषथ है । वेदोंका कारण ब्रह्म सर्वज्ञ है, यह सिद्ध करनेके लिए वेदोंमें ' महान् ' आदि विशेषण दिये गए हैं 1 । जिन वेदोंमें चारों वर्णों, चारों आश्रमोंकी यथायोग्य गर्भाधान से लेकर श्मशान पर्यन्त समस्त क्रियाओंका ब्रह्ममुहूर्त से लेकर प्रदोष पर्यन्त कर्तव्य क्रियाओंका नित्य, नैमित्तक, काम्य तथा प्रायश्चित्त कर्मोंका प्रतिपादन है और जिन वेदोंके अन्तिम भाग ( उपनिषदों ) में निःश्रेयसरूप ब्रह्म-तत्त्वकी प्राप्ति के लिए शिष्यों के कल्याणका शासन ( उपदेश ) है, इसलिए ऋग्वेद आदि मुख्य-वृत्ति से शास्त्र कहे गए हैं । वेद मूलक होने के कारण न्याय, मीमांसा आदि दर्शन ग्रंथोंमें भी गौण-वृत्तिसे शास्त्र शब्दका प्रयोग होता है । वेद चार, + पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, शिक्षा, कल्प, + पुराण - वेदों में संक्षेपसे सृष्टि आदिका जो वर्णन है, उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए वेदार्थ निर्णय में पुराण उपकारक होते हैं । ' सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशोमन्वन्तराणि च । वंशानु-चरितश्चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ ' " सृष्टि, प्रलय, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित ये पाँच जिसमें वर्णित हों वह पुराण कहलाता है । न्याय -- -प्रमाण, प्रमेय आदिके परिज्ञानार्थ न्यायशास्त्रको अपेक्षा रहती है । प्रमाण, प्रमेयादिका निरूपण करते हुए न्याय वेदार्थ निर्णय में सहायक है 1 । मीमांसा -स्वतः प्रमाण होते हुए भी जहाँ जहाँ वेदार्थ में सन्देह होता है, उसका निर्णय करते हुए यह शास्त्र वेदार्थका उपकारक हैं । इसके समर्थन में वार्तिककारकी उक्ति भी है- “ धर्मे प्रतीयमाने वेदेन करणात्मना । इतिकर्तव्यताभागं मीमांसा पूरयिष्यतीति ॥ " धर्मशास्त्र - वेदमें संक्षेपसे धर्म और ब्रह्मतत्वका जो विवेचन है, उसका विस्तृत वर्णन करते हुए धर्मशास्त्र उपकारक है I शिक्षा – इसके द्वारा वर्ण, स्वर, मात्रा, साम सन्तानका संस्कार होता है, अतः संस्कार-द्वारा शिक्षा वेदार्थ में सहायक है । कल्पसूत्र - इसे श्रौतसूत्र भी कहा जाता है । इसमें संक्षेपसे वेदमें आधान आदिसे लेकर अश्वमेध पर्यन्त कर्मोंका वर्णन है । उनका क्रम वेदान्तरों तथा शाखान्तरोंमें कहा गया है । इसमें अङ्गका क्रमबद्ध निरूपण किया गया है, इसलिए क्रमानुष्ठानों में श्रौतसूत्र की अपेक्षा रहती है । व्याकरण - -- पाणिनीय प तथा अत्रिव्याकरण प्रकृति, प्रत्यय विभागको कहते हुए साधु, असाधु विवेचनद्वारा पदका संस्कारक होकर व्याकरण वेदार्थमें उपकारक है । निरुक्त-जैसे लौकिक शब्दोंका अर्थज्ञान करानेके लिए अर्णव, नानार्थरत्नमाला, अमरकोश आदि प्रसिद्ध हैं,

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अधि ० ३ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४५ किमु वक्तव्यमनेकशाखाभेदभिन्नस्य देवतिर्यङ्मनुष्य वर्णाश्रमादिप्रविभागहेतोर्ऋग्वेदाद्या-ख्यस्य सर्वज्ञानाकरस्याप्रयत्नेनैव लीलान्यायेन पुरुषनिःश्वासवद्यस्मान्महतो भूताद्योनेः संभवः, ‘ अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः ' ( बृह ० २/४/१० ) इत्यादिश्रुतेः तस्य महतो भूतस्य निरतिशयं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिमत्त्वं चेति । इति प्रथमवर्णकम् ॥ * अथवा यथोक्त-मृग्वेदादि शास्त्रं योनिः कारणं प्रमाणमस्य ब्रह्मणो यथावत्स्वरूपाधिगमे । शास्त्रादेव प्रमाणा-जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्माधिगम्यत इत्यभिप्रायः । शास्त्रमुदाहृतं पूर्वसूत्रे - ' यतो वा तो अनेक शाखा भेदसे भिन्न देव, मनुष्य, पशु, वर्ण, आश्रम आदि विभागका जो हेतु हैं और सर्वज्ञान के भण्डार हैं ऐसे ऋग्वेद आदि नामक वेदोंकी अनायास ही लीलान्यायसे पुरुष निःश्वासकी तरह जिस महान् ( अपरिच्छिन्न ) सद्रूप कारणसे उत्पत्ति होती है, क्योंकि ' अस्य महतो ० ( इस अपरिच्छिन्न सद्रूप ब्रह्मका जो निःश्वास है वह ऋग्वेद है ) इत्यादि श्रुति है । उस महान् सद्रूप ब्रह्म के निरतिशय सर्वज्ञत्व तथा सर्वशक्तिमत्त्वके विषय में तो कहना ही क्या है । अथवा पूर्वोक्त ऋग्वेद आदि शास्त्र इस ब्रह्मके सत्यानन्दी - दीपिका व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये चौहह विद्यास्थान कहे जाते हैं । पुराण आदिसे वेदोंकी व्याख्या होती है और उनका गम्भीर अर्थ स्पष्ट होता है, अतः ये वेदार्थ ज्ञान कराने में सहायक कारण माने जाते हैं । ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ( वेदार्थको न जाननेवाला वेद प्रतिपादित उस महान् तत्त्वको नहीं जानता ) । इससे यह सिद्ध होता है कि मनु आदिने वेदोंकी स्वतः प्रमाणता स्वीकार की है । जैसे प्रदीप अपनी प्रकाशात्मक शक्तिसे बाह्य पदार्थों का प्रकाशक है, वैसे ही वेद भी गुप्त तथा प्रकट सब पदार्थोंका बोध करानेमें समर्थ है, इसलिए वेद स्वत: प्रमाण है अर्थात् वेद अपनी प्रमाणतामें अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रखता है, जैसे सूर्य अपनी सिद्धिमें अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं रखता । वेद अचेतन होनेपर भी सर्वार्थं प्रकाशक होनेसे सर्वज्ञकल्प है । सर्वज्ञकल्प वेदोंका कारण ब्रह्म है । * वेद काण्व, आश्वलायन, माध्यंदिन, कौथुम, पिप्पलाद, शौनक, ऐतरेय, तैत्तिरेय आदि अनेक शाखाओंमें विभक्त हैं । देव, मनुष्य, पशु तथा वर्ण आश्रम आदिको व्यवस्था एवं कर्म आदिके यथावत् स्वरूपका प्रतिपादन, इन सबका बिशद् वर्णन वेदोंमें है, क्योंकि वेद ज्ञानकी राशि हैं । ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः ' ( बृह ० २ | ४ | १० ) ( ' ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इस महान् सद्रूप ब्रह्मके निःश्वास हैं ) इस श्रुतिसे सिद्ध होता है कि जैसे निःश्वास पुरुषकी स्वाभाविक क्रिया है, वैसे ही वेदोंकी रचना मी ईश्वरकी निःश्वासकी भाँति स्वाभाविक क्रिया है अर्थात् ईश्वरको वेदोंकी अभिव्यक्तिमें किञ्चदपि प्रयास नहीं होता । सर्वज्ञ परमेश्वर अपने सत्य- संकल्पसे सृष्टि के आरम्भ में पहले ब्रह्मा आदिके अन्तःकरणमें वेदोंका आविर्भाव ( अभिव्यक्ति ) करता है । अनन्तर वे ही वेद हमें आचार्य परम्परासे उपलब्ध होते हैं । इससे सुतरां वेदोंका कर्ता ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्ति सम्पन्न सिद्ध होता है । तात्पर्य यह है कि ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् ' सर्वज्ञ ईश्वर द्वारा पूर्व कल्पके अनुसार वेदोंका स्मरण करना ही वेदोंकी मानो नई रचना है, यह प्रथम वर्णक है । वैसे ही वैदिक पदार्थोंका कोश निघन्टु है । उसमें तीन काण्ड हैं, नैघन्दुक ३ अध्याय, नैगमिक १ अध्याय और देवता काण्ड १ अध्याय । उसपर यास्कमुनिका भाष्य है, जो निरुक्त नामसे प्रसिद्ध है । इसमें १२ अध्याय हैं । इसके आगे परिशिष्ट दो और अध्याय हैं । छन्द – चारों वेदोंमें गायत्री आदि छन्दोबद्ध मन्त्र होते हैं । वे पिङ्गलनाग विरचित छन्दोविधि शास्त्रद्वारा जाने जाते हैं । ज्योतिष -- याग आदि कममें समयका निर्धारण करते हुए ज्योतिष शास्त्र वेदका उपकारक है ।

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४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि । किमर्थं तहींदं सूत्रम्? यावता पूर्वसूत्र एवैवंजातीयकं शास्त्रमुदाहरता शास्त्रयोनित्वं ब्रह्मणो दर्शितम् । उच्यते तत्र पूर्वसूत्राक्षरेण स्पष्टुं शास्त्रस्यानुपादाना जन्मादि केवलमनुमानमुपन्यस्तमित्याशङ्कयेत, तामाशङ्कां निवर्तयितु-मिदं सूत्रं प्रववृते शास्त्रयोनित्वादिति ॥ ३ ॥

( समन्वयाधिकरणम् सू ० ४ ) * कथं पुनर्ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वमुच्यते, यावता ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य-मतदर्थानाम् ' ( जै ० सू ० १।२1१ ) इति क्रियापरत्वशास्त्रस्य प्रदर्शितम् । अतो वेदान्तानामा-नर्थक्यम्; अक्रियार्थत्वात् । कर्तृदेवतादिप्रकाशनार्थत्वेन वा क्रियाविधिशेषत्वम्; उपास-यथार्थस्वरूपके ज्ञानमें योनि - कारण - प्रमाण हैं । शास्त्र प्रमाणसे ही यह अधिगत होता है कि जगत् के जन्मादिका कारण ब्रह्म है, यह अभिप्राय है । पूर्वसूत्र में ' थतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि शास्त्र उदाहृत है । जब पूर्वसूत्र ( जन्मादि ही ( यतो वा ) इसप्रकार शास्त्रका उदाहरण देते हुए सूत्रकारने ब्रह्म शास्त्र - योनि ( प्रमाणक ) है, ऐसा दिखलाया है, तो फिर इस सूत्रका प्रयोजन ही क्या है? कहते हैं - वहाँ पूर्वसूत्रके अक्षरों ( अर्थों ) से शास्त्रका स्पष्ट ग्रहण नहीं किया गया है, इसलिए जगत्के जन्मादिका केवल अनुमानरूपसे उपन्यास किया है, कोई ऐसी शङ्का करे तो उस शङ्काकी निवृत्तिके लिए ' शास्त्रयोनित्वात् ' यह सूत्र प्रवृत्त हुआ है ॥ ॥ ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक है, पुनः यह कैसे कहते हो? क्योंकि ' आम्नायस्य ० ( वेद क्रियार्थक हैं, क्रियासे भिन्न सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद वाक्य अनर्थक हैं अर्थात् प्रयोजन रहित हैं ) इसप्रकार शास्त्र क्रियापरक दिखलाया गया है, इससे अक्रियार्थक होनेके कारण वेदान्त वाक्य प्रयोजन रहित हैं । अथवा कर्ता तथा देवता आदिका प्रकाशनरूप प्रयोजनवाले होनेसे वेदान्त - वाक्य क्रिया विधि सत्यानन्दी - दीपिका * भगवान् भाष्यकारने ' शास्त्रयोनित्वात् ' इस सूत्र की दो व्याख्याएँ की हैं । प्रथम वर्णक ( प्रथम व्याख्या ) से ब्रह्मका लक्षण कहा गया है कि जगत् तथा ऋग्वेद आदि वेदोंका कारण ब्रह्म है और वह सर्वज्ञ है | इसमें क्या प्रमाण है? क्योंकि ' लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिर्न तु प्रतिज्ञामात्रेण ' ( वस्तुकी सिद्धि लक्षण और प्रमाणसे होती है केवल प्रतिज्ञासे नहीं ) इसलिए दूसरी व्याख्यासे ब्रह्म में ‘ यतो वा इमानि ' ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' इत्यादि श्रुति प्रमाण दिखलाकर जिज्ञासाको पूर्ण किया है । शङ्का – जब ( जन्मादि ) इस पूर्वसूत्र में ' यतो वा इमानि ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका उदाहरण देकर ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक कहा गया है, तो फिर ' शास्त्रयोनित्वात् ' इस नवीन सूत्रकी रचना क्यों की गई? इसका समाधान ' उच्यते ' इत्यादिसे कहते हैं । * ' जन्माद्यस्य यत । ' इस पूर्वसूत्र में शास्त्र पदका ग्रहण न होनेसे ऐसी शंका हो सकती है कि ' जन्मादि ' सूत्रमें जगत् के जन्मादि ' जगत् सकर्तृकं कार्यत्वात् घटादिवत् ' इस अनुमानसे सकर्तृक सिद्ध होते हैं । परन्तु उसका कर्ता कौन है? ऐसा प्रश्न पुनः उठता है, तो इसके समाधानमें ' जगत् सर्वज्ञ-ईश्वरकर्तृकं कार्यत्वात् भूम्यादिवत् ' ' जैसे भूमि आदि कार्य हैं, अतः वह सर्वज्ञ ईश्वर कर्तृक हैं, वैसे ही जगद्रूप कार्य मी सर्वज्ञ ईश्वर कर्तृक है " यह दूसरा अनुमान ही स्वतन्त्ररूपसे विचार करने योग्य है वेदान्त - वाक्य नहीं । इसप्रकारकी शंका निवृत्त्यर्थं भगवान् सूत्रकारने शास्त्रयोनित्वात् ' इस नवीन सूत्रकी रचना को है अर्थात् यहाँ वेदान्त - वाक्य ही विचारके विषय हैं अनुमान नहीं । पूर्वपक्ष में ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व अनिश्चित है, सिद्धान्तमें वह निश्चित है ॥ ३ ॥