श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 621–630

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

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अधि ० ३ सू०१७-१८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी -दीपिका सहित ५८७ इति श्रुतम् । एतदुक्तं भवति - ये न विद्यासाधनेन देवयाने पथ्यधिकृताः, नापि कर्मणा पितृयाणे, तेषामेष क्षुद्रजन्तु लक्षणोऽसकृद्दावर्ती तृतीयः पन्था भवतीति । तस्मादपि नानि-ष्टादिकारिभिश्चन्द्रमाः प्राप्यते । स्यादेतत् - तेऽपि चन्द्रविम्बमारुह्य ततोऽवरुह्य क्षुद्रजन्तुत्वं प्रतिपत्स्यन्त इति । तदपि नास्ति, आरोहानर्थक्यात् । अपि च सर्वेषु प्रयत्सु चन्द्रलोकं प्राप्नुवत्स्वसौ लोकः प्रयद्भिः संपूर्येतेत्यतः प्रश्नविरुद्धं प्रतिवचनं प्रसज्येत । तथाहि प्रतिवचनं दातव्यं यथाऽसौ लोको न संपूर्यते । अवरोहाभ्युपगमादसं पूर्णापपत्तिरिति चेत् - न, अश्रुतत्वात् । सत्यमवरोहादध्य संपूरणमुपपद्यते श्रुतिस्तु तृतीयस्थानसंकीर्तने-नासंपूरणं दर्शयति- ' एतत्तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न संपूर्यते ' ( छा ० ५1१०1८ ) इति, तेनाना-रोहादेवासंपूरणमिति युक्तम्, अवरोहस्येष्टादिकारिष्वप्यविशिष्टत्वे सति तृतीयस्थानो-क्त्यानर्थक्यप्रसङ्गात् । तुशब्दस्तु शाखान्तरीयवाक्यप्रभवामशेष गमनाशङ्का मुच्छिनत्ति । एवं सत्यधिकृतापेक्षः शाखान्तरीयेवाक्ये सर्वशब्दोऽवतिष्ठते - ये वै केचिदधिकृता अस्मा-लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्तीति ॥ १७ ॥

यत्पुनरुक्तम् - देहला भोपपत्तये सर्वे चन्द्रमसं गन्तुमर्हन्ति, पञ्चम्यायाहुतावि-त्याहुति संख्या नियमादिति, तत्प्रत्युच्यते-न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ १८ ॥

पदच्छेद – न, तृतीये, तथा, उपलब्धेः । सूत्रार्थ - ( तृतीये ) तृतीय मार्ग में प्रविष्ट पापी लोगों की देह प्राप्तिके लिए आहुति संख्याका नियम ( न ) नहीं है, ( तथोपलब्धेः ) क्योंकि ' जायस्व म्रियस्व ' इत्यादि श्रुतिमें वैसा हो उपलब्ध होता है । * न तृतीये स्थाने देहलाभाय पञ्चसंख्यानियम आहुतीनामादर्तव्यः । कुतः? तथो-पलब्धेः । तथाह्यन्तरेणैवाहुति संख्या नियमं वर्णितेन प्रकारेण तृतीय स्थान प्राप्तिरुपलभ्यते-है । तात्पर्य यह है - जो विद्यासाधनद्वारा देवयान मार्गमें अधिकृत नहीं हैं और न कर्मद्वारा पितृ-याण मार्ग में अधिकृत हैं, उनको ही यह क्षुद्र जन्तुरूप बारम्बार आवृत्तिरूप तृतीय मार्ग होता है । इससे भी अनिष्ट आदि कारियोंद्वारा चन्द्रलोक प्राप्त नहीं किया जाता । परन्तु यह हो कि वे मी चन्द्रलोकमें आरूढ होकर उससे अवरोहण कर क्षुद्रजन्तुत्वको प्राप्त होंगे । वह भी नहीं है, क्योंकि ऐसा होने में आरोहण अनर्थक है, और सब मरकर जानेवाले चन्द्रलोकको प्राप्त होनेपर तो यह लोक मरकर जानेवालोंसे भर जायगा, उससे प्रश्नके विरुद्ध उत्तर प्रसक्त होगा । वैसे ही उत्तर देना चाहिए जैसे यह लोक नहीं मरता । यदि कहो कि अवरोहके स्वीकार करनेसे असम्पूर्णताकी उपपत्ति हो जायगी, तो यह युक्त नही है, क्योंकि अश्रुत है । यह ठीक है कि अवरोहसे असम्पूर्णता उपपन्न होती है । परन्तु ' एतत्तृतीयं स्थानम् ० ' ( यह तृतीय स्थान है उससे यह लोक नहीं भरता ) यह श्रुति तो तृतीय स्थानके कथनसे असम्पूर्णता दिखलाती है । उस अनारोहसे ही असम्पूर्ण है, यह युक्त है । क्योंकि इष्टयादि कारियोंका भी अवरोह समान होनेपर तृतीय स्थानकी उक्तिमें आनथंक्य प्रसङ्ग होगा । ' तु ’ शध्द तो अन्य शाखाके वाक्यसे उत्पन्न हुई सबके गमनकी आशङ्काका उच्छेद करता है । ऐसा होनेपर ‘ ये वै केचिदधिकृता ' ( जो कोई अधिकृत हुए इस लोकसे प्रायण करते हैं वे सब चन्द्रलोक जाते हैं ) इसप्रकार अन्य शाखा के वाक्य में सर्व शब्द चन्द्रलोक में अधिकृतकी अपेक्षासे अवस्थित है ॥ १७ ॥

जो पुनः यह कहा गया है कि देह लाभ उपपत्तिके लिए सब चन्द्रलोमें जा सकते हैं, क्योंकि ' पाँचवीं आहुति ' ऐसा आहूति संख्याका नियम है । उसके प्रति कहा जाता है- -तृतीय मार्ग में देहलाभ के लिए आहुतिकी पाँच संख्याका नियम आदरणीय नहीं है । किससे?

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५८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ ‘ जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम् ' ( छा ० ५ १०१८ ) इति । अपि च पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुष-वचसो भवन्ति ' ( छा ० ५।३।३ ) इति मनुष्यशरी रहेतुत्वेनाहुति संख्या संकीर्त्यते, न कोटपत-ङ्गादिशरीरहेतुत्वेन, पुरुषशब्दस्य मनुष्यजातिवचनत्वात् । अपि च पञ्चम्यामाहुतावपां पुरुष वचस्त्वमुपदिश्यते, नापञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवचस्वं प्रतिषिध्यते, वाक्यस्य द्वयर्थ-तादोषात् । तत्र येषामारोहावरोहौ संभवतस्तेषां पञ्चम्यामाहुती देह उद्भविष्यति, अन्येषां तु विनैवाहुति संख्यया भूतान्तरोपसृष्टाभिरद्भिदेह आरप्स्यते ॥ १८ ॥

स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - स्मर्यंते, अपि, च, लोके । सूत्रार्थ - ( च ) और ( लोके ) लोक में ( अपि ) मी इसप्रकार ( स्मर्यते ) स्मरण किया जाता है । अपि च स्मर्यते लोके - द्रोणधृष्टद्युम्नप्रभृतीनां सीताद्रौपदीप्रभृतीनां चायोनिजत्वम् । तत्र द्रोणादीनां योषिद्विषयैका हुतिर्नास्ति । धृष्टद्युम्नादीनां तु योषित्पुरुषविषये द्वे अप्या-हुती न स्तः । यथा च तत्राहुतिसंख्यानियमानादरो भवत्येवमन्यत्रापि भविष्यति । बला-काप्यन्तरेणैव रेतः सेकं गर्भ धत्त इति लोकरूढिः ॥१ ९ ॥ इससे कि वैसे ही उपलब्धि होती है । जैसे कि ' जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम् ' इसप्रकार आहुति संख्या नियमके विना हो वर्णित प्रकारसे तृतीय स्थानकी प्राप्ति उपलब्ध होती है । और ' पञ्चम्यामा-हुतापः ० ' ( पाँचवीं आहुतिमें अप् ( जल ) पुरुष संज्ञक होता है ) यह मनुष्य शरीर के हेतुरूपसे आहुति संख्या कही गई है । कीट, पतङ्ग आदि शरीरके हेतुरूपसे नहीं, क्योंकि पुरुष शब्द मनुष्य जातिवाचक है, और पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है, ऐसा उपदेश किया जाता है, किन्तु पांचवीं आहुतिके न होनेपर जल पुरुष संज्ञक नहीं होता, ऐसा प्रतिषेध नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसा होनेसे वाक्यमें दो अर्थ होनेका दोष होगा । उस ( चन्द्रमण्डल ) में जिनका आरोह, अवरोह संभव है उनका शरीर पाँचवीं आहुतिमें उत्पन्न होगा । अन्योंका शरीर तो आहुति संख्या के विना ही अन्य भूतोंसे सम्बद्ध जलसे आरम्भ होगा ॥ १८ ॥

और लोक ( महाभारत आदि ) में मी द्रोण, धृष्टद्युम्न आदि तथा सोता, द्रौपदी आदिका अयोनिजत्व स्मरण किया जाता है । उनमेंसे द्रोण आदिको स्त्री विषयक एक आहुति नहीं है और धृष्टद्युम्न आदिकी तो स्त्री और पुरुष विषयक दो आहुति नहीं हैं । जैसे उनमें आहुति संख्या नियम-का आदर नहीं है, वैसे अन्यत्र ( अनिष्ट आदि कारीकी देहोत्पत्ति में ) भी होगा । बलाका मी शुक्र-सिंचनके विना ही गर्भ धारण करती है । इसप्रकार लोक प्रसिद्धि है ॥ १ ९ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुष वचसो भवन्ति ( पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है ) यह विधि और पांचवीं आहुतिके विना जल पुरुष संज्ञक नहीं होता यह निषेध, इसप्रकार एकवाक्य के दो अर्थं मानने से वाक्य भेद होता है । इसलिए पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है, इसमें तात्पर्य है मनुष्य देहमात्रकी उत्पत्ति में भी आहुति संख्याका नियम नहीं है । यह आहुति संख्याका नियम तो चन्द्रलोक में जाने और लौटने वालोंके लिए है । चन्द्रलोक में पञ्चाग्नि विद्या और इष्ट आदि कर्म रहित भी नहीं जाते, वे विशेष कर्मके बलसे मनुष्य शरीर त्यागके अनन्तर भी मनुष्य शरीर ग्रहण करते हैं, उनका देह भी आहुति संख्या नियमके विना ही अन्य भूतों से सम्बन्धित जलसे आरम्भ होता है ॥ १८ ॥

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अधि ० ४ सू ० २०-२२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५८ ९ दर्शनाच्च ॥ २० ॥

पदच्छेद – दर्शनात् च । सूत्रार्थ - क्योंकि लोक में ऐसा ही देखनेमें आता है । अपि च चतुर्विधे भूतग्रामे जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जलक्षणे स्वेदजोद्भिज्जयो-रन्तरेणैव प्राम्यधर्ममुत्पत्तिदर्शनादाहुतिसंख्यानादरो भवति । एवमन्यत्रापि भविष्यति २० ननु तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव वीजानि भवन्ति ' भाण्डजं जीवजमुद्भिज्जम् ' ( छा ० ६।३।१ ) इत्यत्र त्रिविध एव भूतग्रामः श्रूयते, कथं चतुर्विधत्वं भूतग्रामस्य प्रतिज्ञातमिति? अत्रोच्यते-तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ २१ ॥

पदच्छेद - तृतीयशब्दावरोधः, संशोकजस्य । सूत्रार्थ - ( संशोकजस्य ) संयोकज - स्वेदज प्राणियोंका ( तृतीयशब्दावरोधः ) तृतीयशब्द से उद्भिज्जशब्दसे उपसंग्रह होनेसे विरोध नहीं है । * ' आण्डजं जीवजमुद्भिज्जम् ' ( छा ० ६ | ३ | १ ) इत्यत्र तृतीयेनोद्विजशब्देनैव स्वेद-जोपसंग्रहः कृतः प्रत्येतव्यः, उभयोरपि स्वेदजोद्धिजयोर्भूम्युदको द्भेदप्रभवत्वस्य तुल्य-त्वात् । स्थावरोद्भेदात्तु विलक्षणो जङ्गमोद्भेद इत्यन्यत्र स्वेदजोद्भिजयोर्भेदवाद इत्यविरोधः ॥ २१ ॥

( ४ साभाव्यापत्त्यधिकरणम् । सू ० २२ ) सामान्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ २२ ॥

पदच्छेद - सामाव्यापत्तिः, उपपत्तेः । सूत्रार्थ- - इस लोक में लौटते समय उन जीवोंको ( सामाव्याप्तिः ) आकाश आदि से साम्यकी प्राप्ति होती है, ( उपपत्तेः ) क्योंकि ऐसा ही उपपन्न होता है । इष्टादिकारिणश्चन्द्रमसमारुह्य तस्मिन्यावत्संपामुषित्वा ततः सानुशया अवरोह-और चार प्रकारके भूत समूहमें जरायुज, आण्डज, स्वेदज, और उद्भिज्जरूपमें से स्वेदज और उद्भिज्जमें ग्राम्य धर्मं ( स्त्री पुरुष संपर्क ) के विना ही उत्पत्ति देखनेसे आहुति संख्याका आदर नहीं है, उसी प्रकार अन्यत्र ( अनिष्ट आदि कारीकी देहोत्पत्ति में ) भी होगा ॥ २० ॥

परन्तु ‘ तेषां खल्वेषां ० ' ( उन पक्षी आदि प्रसिद्ध प्राणियोंके ठीन ही बीज होते है - आण्डज, जीवज ( जरायुज ) और उद्भिज्ज ) इस श्रुतिमें तीन प्रकारका ही भूत समुदाय सुना जाता है, वो फिर यहाँ भूत समुदाय चार प्रकारका है, ऐसी प्रतिज्ञा किस प्रकार की गई है? ' आण्डजं जीवजमुद्भिज्जम् ० ' ( आण्डज - पक्षी आदि, जीवज - मनुष्य आदि इसमें तृतीय उद्भिज्जशब्द से ही स्वेदजका उपसंग्रह किया गया समझना चाहिए, उद्भिज्ज इन दोनोंमें मी भूमि और उदकका भेदन कर उत्पन्न होना तुल्य है । जङ्गमका उद्भेद विलक्षण है । इसप्रकार स्वेदज और उद्भिज्जका भेदवाद इसलिए विरोध नहीं है ॥ २१ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * स्वेदज और उद्भिज्जका भेद कथन तो ' आण्डजानि च जारुजानि जानि च ' ( ऐत ० ५1३ ) ( आण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्जं ) इस इसपर कहते हैं-और उद्भिज्ज - वृक्षादि ) क्योंकि स्वेदज और स्थावरके उद्भेदसे तो अन्यत्र [ वर्णित ] है, च स्वेदजानि च उद्भि-ऐतरेय श्रुतिमें स्पष्ट है । इसलिए छान्दोग्य और ऐतरेय श्रुति प्रतिपादित तीन तथा चार संख्यामें कोई विरोध नहीं है । चतुर्विध भूतोंका विचार प्रसंगसे किया गया है, इसलिए यह सिद्ध हुआ कि अनिष्ट आदि कारियोंकी चन्द्रलोक-प्राप्ति नहीं होती ॥ २१ ॥

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५ ९ ० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ न्तीत्युक्तम् । अथावरोहप्रकारः परीक्ष्यते । तत्रेयमवरोह श्रुतिर्भवति- ' अथैतमेवाध्वानं पुनर्नि वर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति ' ( छा ० ५/१०/५ ) इति । तत्र संशयः - किमाकाशदिस्वरूपमेवावरोहन्तः प्रतिपद्यन्ते किं वाकाशादिसाम्यमिति । तत्र प्राप्तं तावत् - आकाशादिस्वरूपमेव प्रतिपद्यन्त इति । कुतः? एवं हि श्रुतिर्भवति । इतरथा लक्षणा स्यात् । श्रुतिलक्षणाविशये च श्रुतिय य्या न लक्षणा । तथा च ' वायुर्भूत्वा धूमो भवति ' इत्येवमादीन्यक्षराणि तत्तत्स्वरूपोपप-त्तावाञ्जस्येनावकल्पन्ते । तस्मादाकाशादिस्वरूपप्रतिपत्तिरिति । एवंप्राप्ते ब्रूमः - आका-शादिसाम्यं प्रतिपद्यन्त इति । चन्द्रमण्डले यदम्मयं शरीरमुपभोगार्थमारब्धं तदुपभोगक्षये सति प्रविलीयमानं सूक्ष्ममाकाशसमं भवति, ततो वायोर्वशमेति, ततो धूमादिभिः संपृच्यत इति । तदेतदुच्यते- ' यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुम् ' ( छा ० ५/१०/५ ) इत्येवमादिना । कुत एतत्? उपपत्तेः । एवं ह्येतदुपपद्यते । नह्यन्यस्यान्यभावो मुख्य उपपद्यते । आकाशस्वरूपप्रतिपत्तौ च वाय्वादिक्रमेणावरोहो नोपपद्यते । विभुत्वांश्चाकाशेन नित्यसंबद्धत्वान्न तत्सादृश्यापत्तेर-यह कहा गया है कि इष्ट आदि कारी चन्द्रलोक में आरोहणकर वहाँपर कर्मफलोपभोग पर्यन्त रहकर वहाँसे अनुराय सहित अवरोहण करते हैं । अब अवरोह प्रकारकी परीक्षा की जाती है । वहाँ ' अथैतमेवाध्वानं ० ' ( कर्मफल भोगानन्तर पुनः इसी मागंसे जिस प्रकार गये थे उसीप्रकार लौटते हैं । वे पहले आकाशको प्रात होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वह घूम होता है और धूम होकर अभ्र होता है, अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है ) यह अवरोह श्रुति है । उसमें संशय होता है- क्या अवरोहण करनेवाले आकाश आदि स्वरूपको ही प्राप्त होते हैं, अथवा आकाश आदिके साम्यको? उसमें आकाश आदि स्वरूपको ही प्राप्त होते हैं, ऐसा प्राप्त होता है । किससे? इससे कि ऐसी ही श्रुति है । अन्यथा लक्षणा होगी । श्रुति और लक्षणा के संशय में श्रुतिका ग्रहण उचित है लक्षणाका नहीं । उसोप्रकार ' वायुर्भूत्वा धूमो भवति ' ( वायु होकर घूम होता है ) इत्यादि अक्षर मी तत् वत् स्वरूपकी प्राप्तिमें अनायास ही उपपन्न होते हैं, इससे आकाश बादि स्वरूपको प्राप्ति है । सि ० - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- आकाश आदिके सादृश्यको प्राप्त होते हैं । चन्द्र-मण्डलमें जो जलमय शरीर उपभोगके लिए आरम्भ हुआ था वह उपभोग के क्षय होनेपर प्रविलीन होता हुआ आकाशके समान सूक्ष्म होता है, अनन्तर वायुके वश अधीन होता है उसके पश्चात् धूम आदिसे सम्बद्ध होता है । वह ' यथेतमकाशम् ' ( जिस प्रकार गये थे उसीप्रकार लौटते हैं प्रथम आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाशसे वायुको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे कहा जाता है । यह किससे? उप-पत्तिसे । यह ऐसा ही उपपन्न होता है । अन्यका अन्यभाव मुख्य उपपन्न नहीं होता, और आकाश स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर वायु आदि क्रमसे अवरोह उपपन्न नहीं होता । आकाश विभु होनेसे और उसके साथ नित्य सम्बद्ध होनेसे आकाश के सादृश्य प्राप्तिसे भिन्न उसका सम्बन्ध नहीं सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वमें ' तृतीयं स्थानम् ' इस स्थान शब्दको दो मार्गके उपक्रम सामथ्यसे तृतीय मार्गका उपलक्षक कहा गया है । परन्तु यहाँ ऐसी श्रुति नहीं है । इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे पूर्वपक्ष है । * ' समानो भावो रूपं येषां ते सभावास्तेषां मावः सामान्यं सारूप्यं सादृश्यम् । ' समान एक सा भाव धर्म है जिनका वे सभाव हैं उनका भाव सामान्य सादृश्य है, क्योंकि उसकी उपपत्ति है यह सूत्रका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है, उसको आगे स्पष्ट करते हैं । ' यथेतमकाशमाकाशाद्वायुम् ' चन्द्र मण्डलमें फलोपभोगके अनन्तर वह अनुशयी जीव आकाश तुल्य सूक्ष्म होता है, अनन्तर पिण्डीकृत

पृष्ठ 625

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अधि ० ५ सू ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित ५ ९ १ • न्यस्तत्संबन्धो घटते । श्रुत्यसंभवे च लक्षणाश्रयणं न्याय्यमेव । अत आकाशादितुल्य-तापत्तिरेवात्राकाशादिभाव इत्युपचर्यते ॥ २२ ॥

( ५ नातिचिराधिकरणम् । सू ० २३ ) नातिचिरेण विशेषात् ॥ २३ ॥

पदच्छेद - न, अतिचिरेण विशेषात् । सूत्रार्थ - जीव ( नातिचिरेण ) स्वल्पकाल ही आकाश आदिके साथ समानरूपसे रहकर वृष्टिद्वारा पृथिवी में प्रवेश करता है, ( विशेषात् ) क्योंकि ' अतो वै दुर्निष्प्रपतरम् ' इत्यादि श्रुतिमें विशेष देखने में आता है । * तत्राकाशादिप्रतिपत्तौ प्राग्ग्रीह्यादिप्रतिपत्तेर्भवति विशयः - किं दीर्घं कालं पूर्वपूर्व-सादृश्येनावस्थायोत्तरोत्तरसादृश्यं गच्छन्त्युताल्पमल्पमिति । तत्रानियमः, नियमकारिणः शास्त्रस्याभावादिति । एवं प्राप्त इदमाह - नातिचिरेणेति । अल्पमल्पं कालमाकाशादिभावे-नावस्थाय वर्षधाराभिः सहेमां भुवमापतन्ति । कुत एतत्? विशेषदर्शनात् । तथाहि व्रीह्यादिभावापत्तेरनन्तरं विशिनष्टि - ' अतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरम् ' ( छा ० ५/१०/६ ) इति । तकार एकश्छान्दस्यां प्रक्रियायां लुप्तो मन्तव्यः ।. दुर्निष्प्रपततरं दुर्निष्क्रमतरं दुःखतरम-स्माद्द्वीह्यादिभावान्निःसरणं भवतीत्यर्थः । तदत्र दुःखं निष्प्रपतनं प्रदर्शयन्पूर्वेषु सुखं निष्प्रपतनं दर्शयति । सुखदुःखताविशेषश्चायं निष्प्रपतनस्य कालाल्पत्वदीर्घत्वनिमित्तः । तस्मिन्नवधौ शरीरानिष्पत्तेरुपभोगासंभवात् । तस्माद्व्रीह्यादिभावापत्तेः प्रागल्पेनैव का लेनवरोहः स्यादिति ॥२३ ॥

घटता है । और श्रुति असंभवमे लक्षणाका आश्रयण उचित ही है । अतः आकाश आदि सादृश्य प्राप्ति ही यहाँ आकाश आदि भाव है, ऐसा उपचार किया जाता है ॥ २२ ॥

यहाँ व्रीहि आदि भावकी प्राप्तिके पूर्व आकाश आदिकी प्राप्तिमें संशय होता है, क्या दीर्घ दोघं काल पूर्व- पूर्व सादृश्यसे अवस्थित होकर उत्तरोत्तर सादृश्यको प्राप्त होते हैं अथवा अल्प- अल्प काल? उसमें नियम नहीं है, क्योंकि नियम करनेवाला शास्त्र नहीं है । ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं— ' नातिचिरेण ' अल्प - अल्प काल आकाश आदिरूपसे अवस्थित होकर वृष्टि धाराओं के साथ इस पृथिवीपर आ गिरते हैं । यह किससे विशेषदर्शन से । जैसे कि व्रीहि आदि भाव प्राप्ति के अनन्तर ' अतो वै खलु ० ' ( इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्ट प्रद है ) इस प्रकार विशेष कहते हैं । इसमें एक ' त ' छान्दस प्रक्रियामें लुप्त हुआ समझना चाहिए । दुर्निष्प्रपततर- दुर्निष्क्रमतर इस व्रीहि आदि मावसे निःसरण दुःखतर होता है, ऐसा अर्थ है । यहाँ वह वचन दुःख पूर्वक नि.सरण दिखलाता हुआ पूर्वभादों में सुख पूर्वक निःसरण दिखलाता है । निष्क्रमण में सुखत्व यौर दुःखत्वका यह विशेष कालके अल्पत्व और दीर्घत्व निमित्तक है, क्योंकि उस अवधि में शरीर की निष्पत्ति - उत्पत्ति न होनेसे उपभोग का असंभव है । इसलिए व्रीहि आदि भाव प्राप्तिसे पूर्व अल्पकालमें ही अवरोहण होना चाहिए ॥२३ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका अतिसूक्ष्म लिङ्गोपहित होकर वायु द्वारा इतस्तत होता हुआ वायु सम होकर फिर धूमरूप होता है, वहाँसे अभ्ररूप पुनः मेघरूप होकर वृष्टिद्वारा पृथिवीपर आकर व्रीहि, यह आदिरूप होता है, यह श्रुति का सिद्धान्त अर्थ है । अवरोह में विविध भूत साम्य होनेका अनुसंधान करने से वैराग्य होता है || २२ || * अनुशयी जीवका आकाश आदिसे सादृश्य कहकर अब विलम्ब और अविलम्ब गतिके विषयमें विचार करते हैं । पूर्वपक्ष में अधिक काल आकाश आदि सादृश्यसे जीव रहता है, सिद्धान्तमें बल्प- अल्प काल, ' अतो वै खलु ' इस श्रुतिमें विशेषरूपसे कहा गया है कि व्रीहि आदि भावमें आनेपर

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५ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ ( ६ अन्याधिष्ठिताधिकरणम् सू ० २४-२७ ) अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ २४ ॥

पदच्छेद - अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् । सूत्रार्थ - अनुशयी जीव पूर्वके समान ( अन्याधिष्ठितेषु ) अन्य जीवोंसे अधिष्ठित व्रीहि आदि में केवल सम्बन्धित होते हैं, ( पूर्ववदभिलापात् ) क्योंकि आकाश आदि माबके सम न कथन है । * तस्मिन्नेवावरोहे प्रवर्षणानन्तरं पठ्यते -'त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलभाषा इति जायन्ते ' ( छा ० ५।१०।६ ) इति । तत्र संशयः - किमस्मिन्नवधौ स्थावरजात्यापन्नाः स्थावर-सुखदुःखभाजोऽनुशयिनो भवन्त्या होस्वित्क्षेत्रज्ञान्तराधिष्टितेषु स्थावरशरीरेषु संश्लेष-मात्रं गच्छन्तीति । किं तावत्प्राप्तम्? स्थावरजात्यापन्नास्तत्सुख दुःखभाजोऽनुशयिनो भव न्तीति । कुत एतत्? जनेर्मुख्यार्थत्वोपपत्तेः, स्थावरभावस्य च श्रुतिस्मृत्योरुपभोगस्थानत्व-प्रसिद्धेः, पशुहिंसादियोगाच्चेष्टादेः कर्मजातस्यानिष्टफलत्वोपपत्तेः, तस्मान्मुख्यमेवेदमनु-शयिनां व्रीह्यादिजन्म, श्वादिजन्मवत् । यथा श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनि वेति मुख्यमेवानुशयिनां श्वादिजन्म तत्सुखदुःखान्वितं भवति । एवं बीह्यादिजन्मापीति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - अन्यैर्जीवैरधिष्टितेषु ब्रह्मादिषु संसर्गमात्रमनुशयिनः प्रतिपद्यन्ते न उसी अवरोह के विषय प्रवर्षण - वृष्टिके अनन्तर पढा जाता है - ' त इह ० ( तब वे जीव इस लोक में धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उदड़रूप होकर उत्पन्न होते हैं ) उसमें संशय होता है कि क्या अनुशयी जीव इस अवधि में स्थावर जाति प्राप्त हुए स्थावरके सुख दुःखके भागी होते हैं अथवा अन्य जीवों से अधिष्ठित स्थावर शरीरोंमें केवल संश्लेष- संसगंमात्र प्राप्त करते हैं? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - अनुशयी जीव स्थावर जातिको प्राप्त होते हुए उसके सुख दुःखके भागो होते हैं । यह किससे? इस कि इसमें ' जन् ' धातुका मुख्यार्थ उपपन्न होता है । और स्थावरभाव श्रुति और स्मृतिमें उपभोगका स्थानरूपसे प्रसिद्ध है, पशु हिंसादिके योग से इष्ट आदि कर्म समूहमें निष्ट फलत्व उपपन्न होता है । इसलिए अनुशयी जीवोंका यह व्रीहि आदि रूपसे जन्म श्वान आदि जन्म के समान मुख्य ही है, जैसे श्वयोनि, सूकरयोनि अथवा चण्डालयोनि इस प्रकार अनुशयी जीवों का श्वान आदि जन्म मुख्य ही है और उसके सुख - दु: ख से अन्वित होते हैं, वैसे व्रीहि आदि जन्म भी । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - अनुशयी जीव अन्य जीवोंसे अधिष्ठित व्रीहि आदिमें संसर्गमात्र प्राप्त करते हैं, किन्तु उनके सुख - दुःखके भागी नहीं होते । पूर्ववत् -- आकाश आदि भावके सत्यानन्दी - दीपिका यहाँ से निकलना दुष्कर होता है, क्योंकि अन्नरूपमें, भक्षण करनेवालेमें, स्त्रीगर्भमें जानेपर अधिक समय लगता है । इस श्रुति वचनसे सिद्ध होता है कि आकाशभावसे लेकर पृथिवी में आने तक अल्प-अल्प काल में अवरोहण होता है । व्रीहि आदि भावसे निर्गमन में विलम्ब होता है, इस प्रकारके अनुसंधानसे वैराग्य होता है ॥ २३ ॥

* ' जायन्ते ' ( जन्म लेते हैं ) इस श्रुति के होनेसे और पूर्व अधिकरण में आकाश आदिसे वृष्टि पर्यन्त सादृश्यके कथनसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । ' स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति ' ( अन्य स्थाणु-भावको प्राप्त होते हैं ) और ' शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ' ( शरीरसे उत्पन्न कर्मदोष से मनुष्य स्थावरत्वको प्राप्त होता हैं ) इस प्रकार श्रुति और स्मृति में स्थावरभाव कर्मफलके उपभोगका स्थान कहा गया है, क्योंकि ' न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' यह सामान्य श्रुति हिंसाका निषेध करती है और ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' इस विशेष श्रुतिवाक्यसे यज्ञमें पशु हिंसाका विधान है । इन श्रुतियोंका

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अधि ० ६ सू ० २४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५ ९ ३ तत्सुखदुःखभाजो भवन्ति, पूर्ववत् । यथा वायुधूमादिभावोऽनुशयिनां तत्संश्लेषमात्रम्, एवं व्रीह्यादिभावोऽपि जातिस्थावरैः संश्लेषमात्रम् । कुत एतत्? तद्वदेवेहाप्यभि-लापात्, कोऽभिलापस्य तद्वद्भावः? कर्मव्यापारमन्तरेण संकीर्तनम् । यथाकाशादिषु प्रवर्षणान्तेषु न कंचित्कर्मव्यापारं परामृशत्येवं व्रीह्यादिजन्मन्यपि तस्मान्नास्त्यत्र सुखदुःखभाक्त्वमनुशयिनाम् । यत्र तु सुखदुःखभाक्त्वमभिप्रैति, परामृशति तत्र कर्मव्यापारम् - रमणीयचरणाः कपूयचरणा इति च । अपि च मुख्येऽनुशयिनां व्रीह्यादि-जन्मनि व्रीह्यादिषु लूयमानेषु कण्ड्यमानेषु पच्यमानेषु भक्ष्यमाणेषु च तदभिमानिनोऽनु-शयिनः प्रवसेयुः । यो हि जीवो यच्छरीरमभिमन्यते स तस्मिन्पीड्यमाने प्रवसतीति प्रसिद्धम् । तत्र व्रीह्यादिभावाद्रे तः सिग्भावोऽनुशयिनां नाभिलप्येत । अंतः संसर्गमात्र-मनुशयिनामन्याधिष्ठितेषु व्रीह्यादिषु भवति । एतेन जनेर्मुख्यार्थत्वं प्रतिब्रूयादुपभोग-स्थानत्वं च स्थावरभावस्य । नच वयमुपभोगस्थानत्वं स्थावरभावस्यावजानीमहे । भवत्वन्येषां जन्तूनाम पुण्यसामर्थ्येन स्थावरभावमुपगतानामेतदुपभोगस्थानम्, चन्द्र-मसस्त्ववरोहन्तोऽनुशयिनो न स्थावरभावमुपभुञ्जत इत्याचक्ष्महे ॥ २४ ॥

समान । जैसे अनुशयी जीवोंका वायु, धूम आदि भाव उनके साथ केवल संसर्गमात्र है, वैसे ही व्रीहि आदि भाव स्थावर जातिके साथ संसगंमात्र है । यह किससे? इससे कि उसके समान यहाँ भी कथन है । अभिलापका उसके समान माव किया है? कर्मव्यापार ( फल ) के विना कथन । जैसे आकाश आदिसे लेकर वृष्टि पर्यंन्त श्रुति किसी भी कर्मव्यापारका परामर्श नहीं करती, वैसे व्रीहि आदि जन्ममें भी । इसलिए वहाँ अनुशयी सुख - दुःखके भागी नहीं हैं । जहाँ तो सुख दुःखका मागित्व श्रुतिको अभिप्रेत है वहाँ ' रमणीयचरणाः कपूयचरणा: ' इस प्रकार कर्म व्यापार ( फल ) का परामर्श करती है, और अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि जन्म मुख्य होनेपर तो व्रीहि आदिके काटनेपर, कूटे जानेपर, पकाये जानेपर और मक्षण किये जानेपर उनके अभिमानी अनुशयी जीवोंका प्रवास होना चाहिए, क्योंकि जो जीव जिस शरीरका अभिमानी होता है वह उस शरीर के पीड़ित किये जानेपर प्रवास करता है, यह प्रसिद्ध है । और वहाँ अनुशयियों के व्रीहि आदि मावसे रेतः सिञ्चन भावका कथन नहीं होना चाहिए । अतः अनुशयी जीवोंका अन्य जीवोंसे अधिष्ठित व्रीहि आदिमें संसर्गमात्र होता है । इससे ' जन् ' धातुके मुख्यार्थत्व और स्थावरभावके उपभोग स्थानत्वका निराकरण करना चाहिए । स्थावर-मावके उपयोग स्थानत्वकी हम अवज्ञा ( इनकार ) नहीं करते । किन्तु अपुण्यके सामथ्यसे स्थावर-मावको प्राप्त हुए अन्य जीवोंको वह उपभोगका स्थान हो, परन्तु हम ऐसा कहते हैं कि चन्द्रलोकसे अवरोहण करनेवाले अनुशयी जीव स्थावरभावका उपभोग नहीं करते ॥ २४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका अपना - अपना कार्यं है, इससे इष्ट व्यादि कारीको भी पशु हिंसा आदि पापके योगसे स्थावरभाव होता है, अत: उनके सुख - दुःखके भागी होते हैं । * ‘ यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ' ( छा ० ५।१०।६ ) ( जो - जो अनुशयी सम्बन्धित उस अन्नको मक्षण करता है और जो - जो रेतका स्त्री में सिञ्चन करता है, तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ) इस वाक्यशेष में व्रीहि आदिमें प्रविष्ट अनुशयी जीवोंका अन्नद्वारा वीयंके आधान कर्ता पुरुष से जो योग कहा गया है, उसकी अन्यथा अनुपपत्तिसे मी ' त इह व्रीहियवा ' जायन्ते ' यह जन्म-श्रुति गौण है । दूसरी बात यह भी है कि यदि श्रुतिको अनुशयी जीवोंका मुख्यरूपसे व्रीहि आदि भाव अभिप्रेत होता, तो व्रीहि आदि देहका नाश होनेपर देहीका उत्क्रमण अवश्य होता है, तो फिर ‘ यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ' इस श्रुतिवाक्यसे विरोध होगा । इससे यहाँ केवल सम्बन्धमात्र

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५ ९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० १ अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ २५ ॥

पदच्छेद - अशुद्धम्, इति चेत्, न, शब्दात् । सूत्रार्थ - अग्निष्टोम आदि याग पशुहिंसा आदिके योगसे ( अशुद्धम् ) अशुद्ध है, ( इति चेन्न ) ऐसा यहि कहो तो युक्त नहीं है, ( शब्दात् ) क्योंकि वह श्रुति प्रमाणक है । * यत्पुनरुक्तम् - पशुहिंसादियोगादशुद्ध माध्वरिकं कर्म, तस्यानिष्टमपि फल-मवकल्पत इत्यतो मुख्यमेवानुशयिनां व्रीह्यादिजन्मास्तु, तत्र गौणी कल्पनाऽनर्थकेति, तत्परिहियते - न, शास्त्रहेतुत्वाद्धर्माधर्मविज्ञानस्य । अयं धर्मोऽयमधर्म इति शास्त्रमेव विज्ञाने कारणम्, अतीन्द्रियत्वात्तयोः, अनियत देशकालनिमित्तत्वाच्च - यस्मिन्देशे काले निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते स एव देशकालनिमित्तान्तरेष्वधर्मो भवति, तेन शास्त्रा-ते धर्माधर्मविषयं विज्ञानं न कस्यचिदस्ति । शास्त्राच्च हिंसानुग्रहाद्यात्मको ज्योति-टोमो धर्म इत्यवधारितः, स कथमशुद्ध इति शक्यते वक्तुम्? ननु ' न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' इति शास्त्रमेव भूतविषयां हिंसामधर्म इत्यवगमयति । बाढम्, उत्सर्गस्तु सः । . अपवादः - ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' ( यजु ० ) इति । उत्सर्गापवादयोश्च व्यवस्थितविषय-त्वम् । तस्माद्विशुद्धं कर्म वैदिकम्, शिष्टैरनुष्ठीयमानत्वादनिन्द्यमानत्वाच्च । तेन न तस्य प्रतिरूपं फलं जातिस्थावरत्वम् । नच श्वादिजन्मवदपि व्रीह्यादिजन्म भवितुमर्हति । तद्धि कपूयचरणानधिकृत्योच्यते, नैवमिह वैशेषिकः कश्चिदधिकारोऽस्ति । अतश्चन्द्र-मण्डलस्खलितानामनुशयिनां व्रीह्यादिसंश्लेषमात्रं तद्भाव इत्युपचर्यते ॥ २५ ॥

जो यह कहा गया है कि पशु हिंसादिके योग से यज्ञकर्म अशुद्ध है, उसका अनिष्ट फल भी हो सकता है, इससे अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि जन्म मुख्य ही हो तो उसमें गौणी कल्पना अनर्थक होगी, अब उसका परिहार किया जाता है— नहीं, क्योंकि धर्म और अधर्मविज्ञान शास्त्रहेतुक है । यह धर्म है और यह अधर्म है इस विज्ञानमें शास्त्र ही कारण है, क्योंकि वे दोनों अतीन्द्रिय हैं और उनके देश, काल और निमित्त अनियमित हैं, जिस देश, काल और निमित्तमें जिस धर्मका अनुष्ठान किया जाता है वही अन्य देश, काल और निमित्तमें अधमं हो जाता है, इससे शास्त्रज्ञानके विना धर्माधर्मविषयक ज्ञान किसीको नहीं होता । हिंसा अनुग्रह आदि रूप ज्योतिष्टोम धर्मरूपसे शास्त्रसे निश्चित हुआ है, वह अशुद्ध है, ऐसा कैसे कहा जा सकता है । परन्तु ' न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' यह शास्त्र ही भूतविषयक हिंसा अधमं है, ऐसा अवगत कराता है । ठीक है, किन्तु वह तो उत्सगं है । और ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' ( अग्नीषोमीय पशुका आलमन करे ) यह अपवाद है । उत्सर्ग और अप-वादका विषय व्यवस्थित ( भिन्न - भिन्न ) है । इसलिए वैदिक कर्म विशुद्ध है, क्योंकि शिष्ट पुरुष उसका अनुष्ठान करते हैं और वह निन्दा करने योग्य नहीं है । इससे स्थावररूपसे प्रतिकूल जन्म उसका फल नहीं है । वान आदि जन्म के समान भी व्रीहि आदि जन्म नहीं हो सकता, क्योंकि जैसे वह ( श्वानादि-जन्म ) कपूयचरणोंका अधिकार कर कहा जाता है, वैसे यहाँ ( व्रीहि आदि रूपसे जन्ममें ) कोई विशेष अधिकार नहीं है । इसलिए चन्द्रमण्डलसे स्खलित - गिरनेवाले अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि भाव - व्रीहि आदि संसर्गमात्र है, ऐसा उपचार किया जाता है ॥ २५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका अभिप्रेत है | अतः चन्द्रलोकसे अवरोहण करनेवाले अनुशयी जीव स्थावर सम्बन्धी सुख - दुःखका उपभोग नहीं करते ॥ २४ ॥

' हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' यह उत्सगं है, ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' यह अपवाद - बाधक शास्त्र बाघ होता है । यदि ऐसा न माना जाय तो यह अपवादशास्त्र

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अधि ० ६ सू ० १६-१७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५ ९ ५ रेतः सिग्योगोऽथ ॥ २६ ॥

पदच्छेद - रेतः सिग्योगः, अथ । सूत्रार्थ - व्रीहि आदि मावके अनन्तर अनुशयी जीवोंका रेतः सिग्भाव होता है, क्योंकि ' यो रेतः सिञ्चति ' इत्यादि श्रुतिमें ऐसा कहा गया है । इतश्च व्रीह्यादिसंश्लेषमात्रं तद्भावो यत्कारणं व्रीह्यादिभावस्यानन्तरमनुशयिनां रेतः-सिग्भाव आम्नायते - ' यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ' ( छा ० ५।१०।६ ) इति । नचात्र मुख्यो रेतः सिग्भावः संभवति । चिरजातो हि प्राप्तयौवनो रेतः सिग्भवति । कथमिवा-नुपचरितं तद्भावमद्यमानान्नानुगतोऽनुशयी प्रतिपद्यते? तत्र तावदवश्यं रेतः सिग्योग एव रेतः सिग्भावोऽभ्युपगन्तव्यः । तद्ववीह्यादिभावोऽपि व्रीह्यादियोग एवेत्यविरोधः ॥२६ ॥

योनः शरीरम् || २७ ॥ पदच्छेद - योने:, शरीरम् । सूत्रार्थ - ( योने:) योनिमें वीयं सेचनके अनन्तर उस योनिसे सुख दुःख फलोपभोगके लिए ( शरीरम् ) योग्य शरीर उत्पन्न होता है, क्योंकि ' रमणीयचरणाः ' इत्यादि शास्त्र कहता है । * अथ रेतः सिग्भावस्यानन्तरं योनौ निषिक्ते रेतसि योनेरधिशरीरमनुशयिनामनु-शयफलोपभोगाय जायत इत्याह शास्त्रम् - ' तद्य इह रमणीयचरणा: ' ( छा ० ५।१०।७ ) इत्यादि ।

तस्मादप्यवगम्यते नावरोहे व्रीह्यादिभावावसरे तच्छरीरमेव सुखदुःखान्वितं भवतीति ।

तस्माद् व्रीह्यादिसंश्लेषमात्रमनुशयिनां तज्जन्मेति सिद्धम् ॥ २७ ॥

इति श्रीमच्छंकर भगवत्पूज्यपादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१ ॥

और इस हेतुसे भी व्रोहि आदि भाव व्रीहि आदि संश्लेष- संसर्ग मात्र है, क्योंकि ' यो यो ह्यन्न-मति ० ' ( जो जो अनुशयी सम्बन्धित उस अन्नका भक्षण करता है, जो जो वीर्यका सेचन ( आधान ) करता है, उसका रूप हो वह अनुशयी जीव होता है ) इस प्रकार व्रीहि आदि भावके अनन्तर अनुशयी-जीवोंकी रेतः सिग्माव श्रुति है । और यहाँ रेतः सिग्माव मुख्य नहीं हो सकता, क्योंकि चिरकालसे उत्पन्न और प्राप्त यौवनवाला रेतः सिग् ( वीय्यंका आधान कर्ता ) होता है । खाये हुए अन्नके साथ अनुगत हुआ अनुशयी जीव आधान क्रियाके कर्ताका भाव उपचारके विना किस प्रकार प्राप्त करेगा? इससे वहाँ रेतः सेचन कर्ताके साथ सम्बन्ध हो रेतः सिग्माव है, ऐसा अवश्य स्वीकार करना चाहिए । इसी प्रकार व्रीहि आदि भाव भी व्रीहि आदिके साथ सम्बन्ध ही है, इसलिए विरोध नहीं है ॥ २६ ॥

रेतः सिग्भाव — रेतः सेचन कर्ता के साथ सम्बन्ध होनेके अनन्तर योनिमें वीयं प्रक्षेप होनेपर अनुशयी जीवोंका अनुराय - कर्म फलोपभोगके लिए योनिके आश्रित शरीर उत्पन्न होता है, इस प्रकार ' तद्य इह रमणीयचरणाः ० ' ( उन अनुशयी जोवों में जो पुण्यशाली हैं ) इत्यादि श्रुति कहती है । इससे भी ऐसा अवगत होता है कि अवरोह होनेपर व्रीहि आदि भावके अवसरमें उस अनुशयी जीवका सुख दुःखसे अन्वित शरीर ही नहीं होता है । इसलिए अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि जन्म व्रीहि आदि संश्लेषमात्र है, ऐसा सिद्ध हुआ ॥ २७ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करमाध्य - भाषानुवादके तृतीयाध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥१ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका अनवकाश होनेसे व्यर्थं सिद्ध होगा । इसलिए शास्त्र विहित होनेसे यागमें पशु हिंसा निषिद्ध नहीं है । वस्तुतः राग आदिसे प्राप्त हिंसाकी निवृत्तिके लिए ' न हिंस्यात् ० ' यह सामान्य श्रुति है, इसलिए इसका ' अग्नीषोमीयं ० ' इस विशेष श्रुतिके साथ कोई विरोध नहीं है ॥ २५ ॥

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५ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ तृतीयाध्याये द्वितीयः पादः । [ अत्र पादे तत्त्वं पदार्थपरिशोधनविचारः ] ॥ इस पादमें तत्त्वम् पदार्थ परिशोधनका विचार है ॥ ( १ संध्याधिकरणम् । सू ० १-६ ) संध्ये सृष्टिराह हि ॥ १ ॥

पदच्छेद - संध्ये, सृष्टिः, आह हि । सूत्रार्थ - ( संध्ये ) स्वप्नावस्था में ( सृष्टि: ) सृष्टि व्यावहारिक सत्य है, ( हि ) क्योंकि ( आह ) ' अथ रथान् ' यह श्रुति ऐसा ही कहती है । * अतिक्रान्ते पादे पञ्चाग्निविद्यामुदाहृत्य जीवस्य संसारगतिप्रभेदः प्रपञ्चितः । इदानीं तु तस्यैवावस्थाभेदः प्रपञ्च्यते । इदमामनन्ति - ' स यत्र प्रस्वपिति ' ( बृह ०४ | ३ | ९ ) इत्युपक्रम्य ' न तन्त्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान्स्थयोगान्पथः सृजते ' ( बृह ०४ | ३ | १० ) इत्यादि । तत्र संशयः- किं प्रबोध इव स्वप्नेऽपि पारमार्थिकी सृष्टिराहोस्विन्मायामयीति? तत्र तावत्प्रतिपद्यते - संध्ये तथ्यरूपा सृष्टिरिति । संध्यमिति स्वप्नस्थानमाचष्टे, वेदे प्रयोगदर्शनात् ' संध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम् ' ( बृह ० ४ | ३ | ९ ) इति । द्वयोर्लोकस्थानयोः प्रबोध-संप्रसादस्थानयोर्वा संधौ भवतीति संध्यम् । तस्मिन्संध्ये स्थाने तथ्यरूपैव सृष्टिर्भवितु-मर्हति । कुतः? यतः प्रमाणभूता श्रुतिरेवमाह - ' अथ रथान्स्थयोगान्पथः सृजते ' ( बृह ० ४।३।१० ) इत्यादि । स हि कर्ता ' इति चोपसंहारादेवमेवावगम्यते ॥१ ॥

गत पादमें पश्चाग्नि विद्याका उदाहरण देकर जीवकी संसार गतिका प्रभेद विस्तार से कहा गया है | अब तो उसकी ही भिन्न - भिन्न अवस्थाएँ विस्तारपूर्वक कही जाती हैं । ' स तत्र प्रस्वपिति ' ( वह जहाँ सोता है ) इस प्रकार उपक्रम कर ' न तन्त्र स्था ० ' ( उस अवस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले अश्व आदि हैं और न मार्ग ही हैं, परन्तु वह रथ, रथमें जोते जानेवाले अश्व आदि और रथके मार्गों की रचना कर लेता है ) इत्यादि श्रुति कहती है । उसमें संशय होता है- क्या जाग्रत् के समान स्वप्न में भी पारमार्थिक ( व्यावहारिक ) सृष्टि है अथवा मायामयी? पूर्वपक्षी - स्वप्नावस्था में तथ्यरूप सृष्टि है, वहां ऐसा प्राप्त होता है । संध्य स्वप्नावस्थाको कहते हैं, क्योंकि ' संध्यं तृतीयं स्वप्न-स्थानम् ' ( तृतीय स्वप्न स्थान संध्य है ) इस प्रकार वेदमें प्रयोग देखनेमें आता है । दो. लोक स्थान अथवा प्रबोध और सुषुप्ति अवस्थाकी जो संधिमें होता है, वह संध्य कहा जाता है । उस संध्य अवस्था में सत्यरूप ही सृष्टि हो सकती है । किससे? इससे कि ' अथ रथान् ० ( वह रथ, रथमें जोते जानेवाले अश्व और रथके मार्गोंकी रचना करता है ) इत्यादि प्रमाण भूत श्रुति ऐसा कहती है, क्योंकि ' स हि कर्ता ' ( वही कर्ता है ) और इस प्रकारके उपसंहारसे ऐसा ही अवगत होता है ॥ १ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * कर्म करनेवालोंका गति और आगतिरूप संसार दुर्वार है । इस प्रकार विचार करने से वैराग्य होता है, जो तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिमें परम्परया साधन है ॥ २७ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के तृतीयाध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥ १ ॥

* गत पादमें वैराग्य सिद्धिके लिए पश्चाग्नि विद्याके उदाहरणसे गति और आगतिका विशेष विचार किया गया है । अब वैराग्यद्वारा साध्य ' तत् त्वम् ' पदार्थका विवेक जो वाक्यार्थ ज्ञानका