श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 631–640

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 631–640

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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५ ९ ७ निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥ २ ॥

पदच्छेद - निर्मातारम्, च, एके, पुत्रादयः, च । सूत्रार्थ - ( च ) और ( एके ) कुछ शाखावाले स्वप्नमें ( निर्मातारम् ) कामोंका निर्माता परमात्मा है, ऐसा कहते हैं, यहाँ ( पुत्रादयः ) पुत्र आदि काम शब्दसे अभिप्रेत हैं, क्योंकि श्रुतिमें काम शब्दसे उनका कथन है । * अपि चैके शाखिनोऽस्मिन्नेव संध्ये स्थाने कामानां निर्मातारमात्मानमाम-नन्ति - ' य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ' ( कठ ० ५१८ ) इति । पुत्रादयश्च तत्र कामा अभिप्रेयन्ते - काम्यन्त इति । ननु कामशब्देनेच्छाविशेषा एवोच्येरन्, न, ' शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व ' ( क ० १।२३ ) इति प्रकृत्यान्ते ' कामानां त्वा काममाजं करोमि ' ( ० १२४ ) इति प्रकृतेषु तत्र तत्र पुत्रादिषु कामशब्दस्य प्रयुक्तत्वात् । प्राज्ञं चैनं निर्मातारं प्रकरणवाक्यशेषाभ्यां प्रतीमः । प्राज्ञस्य हीदं प्रकरणम् ' अन्यत्र धर्मादन्यन्ना-और कुछ शाखावाले इसी स्वप्नावस्था में ' य एष सुप्तेपु ० ' ( इन्द्रिय आदिके सुप्त होनेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थों की रचना करता हुआ जागता रहता है ) इसप्रकार कामोंका निर्माता आत्माको मानते हैं । वहाँ पुत्र आदि कामयन्दसे अभिप्रेत हैं, क्योंकि उनकी कामना की जाती है । परन्तु कामशब्दसे इच्छाविशेष ही कहने चाहिए? ऐसा नहीं, क्योंकि ' शतायुषः ० ' ( हे नचिकेता! तू सौ वर्षकी आयुवाले पुत्र और पौत्र माँग ले ) ऐसा प्रस्तुत कर अन्त में ' कामानां ० ' ( मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ ) इसप्रकार तत् तत् स्थानमें प्रकृत पुत्रं बादिमें काम शब्दको प्रयुक्त किया गया है । इसके निर्माता इस प्राज्ञको हम प्रकरण और वाक्यशेषसे प्रतीत करते हैं । क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( वह धर्मसे पृथक् और अधर्मसे पृथक् है ) इत्यादि यह सत्यानन्दी - दीपिका साधन है उसका इस पादमें निरूपण किया जाता है । इसप्रकार हेतुहेतुमद्भाव संगति से द्वितीयपादका आरम्भ है । इस पादके ' न स्थानतोऽपि ' इस ११ सूत्र के पहले उद्देश्यरूपसे प्रथम जिज्ञासित ' त्वम् ' पदार्थका अवस्थामोंद्वारा विवेचन है । तदनन्तर पाद समाप्ति पर्यन्त ' तत् ' पदार्थका विवेचन है । यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ' तत्त्वमसि ' इस वाक्य में ' तत् ' ' त्वम् ' यहाँपर ' त्वम् ' को उद्देश्य कर ' तत् ' का विधान किया गया है, इसलिए उद्देश्यरूपसे ' त्वम् ' का प्रथम विवेचन है और विधेयरूपसे प्रतिपादित ' तत् ' का अनन्तर । गत पादमें जीवकी गति और आगतिके विचारसे जाग्रदवस्थाका निरूपण किया गया है । अब उस क्रमसे ' त्वम् ' पदार्थमें स्वयं ज्योतिष्ठत्व सिद्ध करनेके लिए स्वप्नावस्थाका निरूपण किया जाता है । जाग्रदवस्था के अनन्तर होनेवाली स्वप्नावस्था श्रुतिमें प्रतिपादित है, उसको उद्देश्यकर रथ आदिका अभाव और उसकी सृष्टि दोनों कहे गये हैं । इसको ' तत्र ' आदिसे कहते हैं । ' आरम्भण ' अधिकरण में प्रपञ्चमात्रमें पारमार्थिकत्वका निषेध किया गया है । परन्तु पूर्वं पक्ष में स्वप्नसृष्टि सत्यरूप है, क्योंकि ' अथ रथान् ' इत्यादि श्रुति है । तथा उपक्रम और उपसंहारसे कर्ता मी एक ही है । यहाँ संध्य स्वप्नावस्थाको कहा जाता है । पूर्वपक्ष में जाग्रत् अवस्थाके समान स्वप्नसे भी जीवके लिए विवेक असिद्ध है और सिद्धान्त में स्वप्न प्रतीतिमात्र होनेसे विवेक सिद्ध है, जिससे जीवमें स्वयं प्रकाशत्व सिद्ध होता है ॥ १ ॥

* " स्वप्नार्थाः सत्याः प्राज्ञनिर्मित्तत्वात् आकाशादिवत् " ( स्वप्नके पदार्थ सत्य हैं, क्योंकि प्राज्ञसे निर्मित हैं, जैसे आकाश आदि ) इसप्रकार श्रुति और अनुमानसे स्वप्न सृष्टि जागरित सृष्टिके समान सत्य सिद्ध होती है ॥ २ ॥

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५ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ धर्मात् ' ( क ० २।१४ ) इत्यादि, तद्विषय एव च वाक्यशेषोऽपि - ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ' ( क ० ५/८ ) इति । प्राज्ञकर्तृका च सृष्टिस्तथ्यरूपा समधिगता जागरिताश्रया, तथा स्वप्नाश्रयाऽपि सृष्टिर्भवितुमर्हति । तथा च श्रुतिः - ' अथो खल्वा हुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्तः ' ( बृह ० ४ | ३ | १४ ) इति स्वप्नजागरितयोः समानन्यायतां श्रावयति । तस्मात्तथ्यरूपैव संध्ये सृष्टिरिति ॥२ ॥

एवं प्राप्ते प्रत्याह-मायामात्रं तु कात्स्नर्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३ ॥

पदच्छेद - मायामात्रम्, तु, कात्स्न्र्त्स्न्येन, अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्षको व्यावृत्ति करता है, ( मायामात्रम् ) स्वप्न सृष्टि मायामात्र है, क्योंकि ( कार्त्स्न्येन ) देश, काल आदि समस्त धर्मोसे ( अनभिव्यक्त स्वरूपत्वात् ) अभिव्यक्त स्वरूप नहीं है । * तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । नैतदस्ति यदुक्तं संध्ये सृष्टिः पारमार्थिकीति । मायैव संध्ये सृष्टिर्न परमार्थ गन्धोऽप्यस्ति । कुतः? कात्स्न्येनानभिव्यक्तस्त्ररूपत्वात् । नहि कार्त्स्न्येन परमार्थवस्तुधर्मेणाभिव्यक्तस्वरूपः स्वप्नः । किं पुनरत्र कार्यमभिप्रेतं देशकालनिमित्त संपत्तिरबाधश्च । नहि परमार्थवस्तुविषयाणि देशकालनिमित्तान्यबाधश्च स्वप्ने संभाव्यन्ते । न तावत्स्वप्ने रथादीनामुचितो देशः संभवति । नहि संवृते देहदेशे रथादयोऽवकाशं लभेरन् । स्यादेतत् - बहिर्देहात्स्वप्नं द्रक्ष्यति, देशान्तरितद्रव्यग्रहणात् । दर्शयति च श्रुतिर्बहिर्देहात्स्वप्नम् — ' बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा । सो ईयतेऽमृतो यत्र कामम् ' प्राज्ञका ही प्रकरण है । और ' तदेव शुक्रं ० ' ( वह शुद्ध है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है उसमें सब लोक आश्रित हैं, कोई भी उसका उलङ्घन नहीं कर सकता ) यह वाक्यशेष भी तद्विषयक ही है । जैसे प्राज्ञकर्तृक जाग्रत् आश्रय सृष्टि सत्यरूपसे निश्चित की गई है, वैसे स्वप्न आश्रय सृष्टि मी हो सकती है । इसीप्रकार ' अथ खल्वाहुः ० ' ( इससे अवश्य ही कोई ऐसा कहते हैं कि यह ( स्वप्न स्थान ) इसका जागरित देश ही है, क्योंकि जिन पदार्थोंको यह जागनेपर देखता है, उन्होंको सोया हुआ भी देखता है ) यह श्रुति स्वप्न और जाग्रदवस्थाको समान रीतिका श्रवण कराती है, इसलिए स्वप्न में सत्यरूप ही सृष्टि है ॥ २ ॥

ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण कहते हैं-तु शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । जो यह कहा गया है कि स्वप्नमें सृष्टि पारमार्थिक है, यह नहीं है, स्वप्न में सृष्टि माया ही है उसमें तो परमार्थका गन्ध - लेय भी नहीं है । किससे? इससे कि उसका सर्वात्मना स्वरूप अभिव्यक्त नहीं है । समस्त परमार्थं वस्तुके धर्मसे स्वप्न अभिव्यक्तस्वरूप नहीं है । परन्तु यहाँ कात्स्यसे क्या अभिप्रेत है? देश, काल, निमित्तरूप संपत्ति और अबाध अभि-प्रेत हैं । परमार्थं वस्तु विषयक देश, काल, निमित्त और अबाध स्वप्नमें संभाव्य नहीं है । रथ आदि का स्वप्न में उचित देश संभव नहीं, क्योंकि संकीर्ण देह देशमें रथ आदि अवकाश प्राप्त नहीं कर सकेंगे । यह शङ्का होती है कि देहसे बाहर स्वप्न देखेमा, कारण कि देशसे व्यवधान वाले पदार्थोंका ग्रहण होता है I । और ' बहिष्कुलायाद ० ' ( वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है, जहाँ वासना होती वहां चला जाता है ) यह श्रुति देहसे बाहर स्वप्न दिखलाती है और ऐसी स्थिति, गति मौर सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ स्वप्नरथादयः प्रातीतिकाः जाग्रद्रथादौ क्लृप्तसामग्रीं विना दृष्टत्वात् शुक्तिरुप्यादिवत् ' ( स्वप्न रथ आदि प्रातिभासिक हैं, क्योंकि जागरित रथ आदिमें क्लृप्त सामग्री के बिना देखे जाते हैं,

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अधि ० १ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५ ९९ ( बृह ० ४।३।१२ ) इति । स्थितिगतिप्रत्ययभेदश्च नानिष्क्रान्ते जन्तौ सामञ्जस्यमनुवीतेति-नेत्युच्यते, नहि सुप्तस्य जन्तोः क्षणमात्रेण योजनशतान्तरितं देशं पर्येतुं विपर्येतुं च ततः सामर्थ्य संभाव्यते । क्वचिच्च प्रत्यागमनवर्जितं स्वप्नं श्रावयति - कुरुष्वहमद्य शयानो निद्रयाऽभिप्लुतः स्वप्ने पञ्चालानभिगतश्चास्मिन्प्रतिबुद्धश्चेति । देहाच्चेद पेयात्पञ्चालेष्वेव प्रतिबुध्येत तानसावभिगत इति कुरुष्वेव तु प्रतिबुध्यते, येन चायं देहेन देशान्तर -मनुवानो मन्यते तमन्ये पार्श्वस्थाः शयनदेश एव पश्यन्ति । यथाभूतानि चायं देशान्त-राणि स्वप्ने पश्यति न तानि तथाभूतान्येव भवन्ति । परिधावंश्चेत्पश्ये जाग्रद्वद्वस्तुभूतमर्थ -माकलयेत् । दर्शयति च श्रुतिरन्तरेव देहे स्वप्नम् - स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ' इत्युपक्रम्य ‘ स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ' ( बृह ० २।१।१८ ) इति । अतश्च श्रुत्युपपत्तिविरोधाद्वद्दिष्कुलायश्रुति-गौंणी व्याख्यातव्या - बहिरिव कुलायादमृतश्चरित्वेति । यो हि वसन्नपि शरीरे न तेन प्रयोजनं करोति स बहिरिव शरीराद्भवतीति । स्थितिगतिप्रत्ययभेदोऽप्येवं सति विप्रलम्भ एवाभ्युपगन्तव्यः । कालविसंवादोऽपि च स्वप्ने भवति - रजन्यां सुप्तो वासरं भारते वर्षे मन्यते । तथा मुहूर्तमात्रवर्तिनि स्वप्ने कदाचिद्वहुवर्षपूगानतिवाहयति । निमित्तान्यपि च स्वप्ने न बुद्धये कर्मणे वोचितानि विद्यन्ते । करणोपसंहाराद्धि नास्य रथादिग्रहणाय चक्षुरादीनि सन्ति । रथादिनिर्वर्तनेऽपि कुतोऽस्य निमेषमात्रेण सामर्थ्य दारूणि वा । बाध्यन्ते चैते रथादयः स्वप्नदृष्टाः प्रबोधे । स्वप्न एव चैते सुलभबाधा प्रतीतिका भेद जीवके शरीरसे बाहर निकले विना संगत नहीं हो सकता । नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि सुप्त जीव में सैकड़ों योजनोंसे व्यवहित देशको क्षणमात्रमें प्राप्त करने और वहाँसे लौटकर आनेकी सामर्थ्यं की संभावना नहीं की जा सकती, और कहीं ' मैं इसी कुरुदेशमें सोता हुआ निद्रासे अभिभूत होकर स्वप्नमें पंचाल देशोंमें गया था और पुनः यहींपर जाग गया ' इसप्रकार [ प्रबुद्ध पुरुष ] प्रत्यागमनके विना [ पाश्वस्थ लोगोंको ] स्वप्न सुनाता है । यदि देहसे निकल गया होता तो पंचाल देशों में जागता, क्योंकि यह उन देशोंमें गया था, किन्तु कुरुदेशमें ही जाग्रत् होता है, तो जिस देहसे यह अपनेको अन्य देश व्याप्त मानता है, उस देहको अन्य समीपस्थ लोग शयनदेश में ही देखते हैं । यह जिसप्रकारके देशा-न्तरोंको स्वप्नमें देखता है वे उसी प्रकारके नहीं होते । यदि दौड़ता हुआ ( पदार्थ ) देखे तो जागरितके समान यथार्थं अर्थको ग्रहण करना चाहिए, और ' स यत्रैतत् ० ' ( जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे विच-रता है ) ऐसा उपक्रम कर ' स्वे शरीरे ० ' ( यह अपने शरीरमें यथेच्छ विचरता है ) इसप्रकार श्रुति शरीरके भीतर ही स्वप्न दिखलाती है । अत: श्रुति और उपपत्तिसे विरोध होनेसे ' बहिष्कुलाय ' यह श्रुति गौणी है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए - ' मानो देहसे बाहर अमृतधर्मा भ्रमण कर ' जो शरीरमें रहता हुआ भी उससे प्रयोजन नहीं रखता वह शरीरसे बाहर - सा होता है । ऐसा होनेपर स्थिति, गति और प्रत्यय-भेदका भी विभ्रम ही स्वीकार करना चाहिए । स्वप्न में काल विरोध भी होता है, रातको सोया हुआ भारतवर्ष में दिन मानता है । इस प्रकार मुहूर्त मात्रवत्ति स्वप्न में बहु वर्षं समुदायका अतिवहन करता है और स्वप्न में ज्ञान अथवा कर्मके लिए उचित निमित्त भी विद्यमान नहीं होते, क्योंकि इन्द्रियों के उपसंहार होनेसे रथ आदि ग्रहण करनेके लिए इसे चक्षु आदि भी नहीं हैं । इस प्रकार निमेषमात्र में सत्यानन्दी - दीपिका जैसे शुक्तिरजत आदि ) इससे वे मायामात्र हैं - अविद्याका परिणाममात्र हैं, और कात्स्म्यं देश, काल, निमित्त और अबाध यथार्थं वस्तु विषयक होते हैं, शुक्तिरजतके समान प्रातिभासिक स्वप्न पदार्थों में नहीं होते । जिन पदार्थोंको स्वप्नमें जैसे देखता है वे वैसे नहीं होते, स्वप्न में वृक्ष आदि पदार्थ दौड़ते हुए दिखाई देते हैं किन्तु होते स्थिर हैं, अतः स्वप्न पदार्थ जागरितके समान सत्य नहीं है || ३ ||

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६०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ भवन्ति, आद्यन्तयोर्व्यभिचारदर्शनात् । रथोऽयमिति हि कदाचित्स्वप्ने निर्धारितः क्षणेन मनुष्यः संपद्यते, मनुष्योऽयमिति निर्धारितः क्षणेन वृक्षः । स्पष्टं चाभावं रथा-दीनां स्वप्ने श्रावयति शास्त्रम् - ' न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति ' ( बृह ० ४ | ३ | १० ) इत्यादि । तस्मान्मायामात्रं स्वप्नदर्शनम् ॥३ ॥

सूचक हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ४ ॥

पदच्छेद - सूचकः, च, हि, श्रुतेः, आचक्षते, च, तद्विदः । सूत्रार्थ - ( सूचकः ) स्वप्न भविष्यत् के शुभ और अशुभका सूचक है, ( हि ) क्योंकि ( श्रुतेः ) ' यदा कर्मसु ' इत्यादि श्रुतिसे ऐसा अवगत होता है ( च ) और ( तद्विद: ) स्वप्न शास्त्रवेत्ता भो ( आचक्षते ) स्वप्नको शुभाशुभका सूचक ही कहते हैं । * मायामात्रत्वात्तर्हि न कश्चित्स्वप्ने परमार्थ गन्धोऽस्तीति- नेत्युच्यते, सूचकश्च हि स्वप्नो भवति भविष्यतोः साध्वसाधुनोः । तथा हि श्रूयते - ' यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्न निदर्शनं ' ( छा ० ५२८ ) तथा ' पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति ' इत्येवमादिभिः स्वप्नैरचिरजीवित्वमावेद्यत इति श्रावयति । आचक्षते. च स्वप्नाध्यायविदः - ' कुञ्जरारोहणादीनि स्वप्ने धन्यानि खरयानादीन्यधन्यानि ' इति । मन्त्र-देवताद्रव्यविशेषनिमित्ताश्च केचित्स्वप्ना, सत्यार्थगन्धिनो भवन्तीति मन्यन्ते । तत्रापि भवतु नाम सूच्यमानस्य वस्तुनः सत्यत्वं, सूचकस्य तु स्त्रोदर्शनादेर्भवत्येव वैतथ्यं बाध्य-रथ आदि निर्माणके लिए इसे सामथ्यं अथवा लकड़ी कहाँ हैं? स्वप्न दृष्ट ये रथ आदि पदार्थं जाग्रत् होनेपर वाधित हो जाते हैं, स्वप्नमें इनके बाध सुलभ होते हैं, कारण कि स्वप्नके आदि और अन्तमें इनका व्यभिचार देखनेमें आता है, यह रथ है, ऐसा कभी स्वप्नमें निश्चित हुआ पदार्थ क्षणमें मनुष्य हो जाता है, यह मनुष्य है, ऐसा निर्धारित हुआ क्षणमें वृक्ष हो जाता है, इसलिए ' न तत्र रथा ० ' ( उस स्वप्नावस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले अश्व आदि हैं और न मागं ही हैं ) इत्यादि शास्त्र स्वप्न में रथ आदिका अभाव स्पष्ट श्रवण कराता है । इससे स्वप्न दर्शन मायामात्र है ॥ ३ ॥

मायामात्र होनेसे तो फिर स्वप्नमें परमार्थका कोई गन्ध भी नहीं है, नहीं, ऐसा कहते हैं-स्वप्न भविष्यके शुभ और अशुभका सूचक होता है । जैसे कि ' यदा कर्मसु ० ' ( पुरुष जिस समय काम्य कर्मोंमें स्वप्न में स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नके दर्शन होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ) यह श्रुति है । तथा ' कृष्ण दान्तवाले कृष्ण पुरुषको स्वप्न में देखता है वह स्वप्न दृष्ट उस स्वप्न द्रष्टाको मार डालता है ' इत्यादि स्वप्नोंसे अल्प जीवित्व सूचित होता है, ऐसा श्रुति श्रवण कराती है । और स्वप्न शास्त्रवेत्ता कहते हैं कि स्वप्नमें हाथीपर आरोहण आदि धन्य- शुभ हैं और गर्दमपर सवारी आदि अन्य - अशुभ हैं । और मन्त्र, देवता, द्रव्यविशेष निमित्तक कोई कोई स्वप्न सत्य अर्थसे युक्त होते हैं, ऐसा मानते हैं । स्वप्न में भी सूचित हुई वस्तु मले ही सत्य हो, परन्तु सूचक स्त्री दर्शन आदि तो असत्य ही होते हैं, क्योंकि वे बाध्यमान हैं, ऐसा अभिप्राय है । इससे स्वप्न में मायामात्रत्व उपपन्न सत्यानन्दी -दीपिका * यद्यपि मन्त्र के प्रभावसे, देवताके अनुग्रहसे अथवा ओषधि आदिके सेवन से स्वप्न सत्यके सूचक होते हैं और वे सत्य होते हैं, तो भी स्वप्न पदार्थं सत्य नहीं होते? क्योंकि वे बाधित होते हैं । जैसे रज्जुसर्प, शुक्तिरजत आदि सत्यमय तथा हर्षके सूचक होनेपर भी बाधित होने से प्रतीतिमात्र हैं । और जो इस पादके प्रथम सूत्र में ' सन्ध्ये सृष्टिराह हि ' इसके अनुसार ' अथ रथान्स्थयोगान्पथः सृजते ’ इस श्रुतिसे स्वप्न सृष्टिको सत्य कहा गया है वह श्रुति कथन गौण है, वह केवल निमित्तमात्रको ७

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अधि ० १ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६०१ मानत्वादित्यभिप्रायः । तस्मादुपपन्नं स्वप्नस्य मायामात्रत्वम् । यदुक्तम्- ' आह हि ' इति, तदेवं सति भाक्तं व्याख्यातव्यम् । यथा लाङ्गलं गवादीनुद्वहतीति निमित्तमात्रत्वादेवमुच्यते, नतु प्रत्यक्षमेव लाङ्गलं गवादीनुद्रहति । एवं निमित्तमात्रत्वात्सुप्तो रथादीन्सृजते स हि कर्तेति चोच्यते नतु प्रत्यक्षमेव सुप्तो रथादीन्सृजति । निमित्तत्वं त्वस्य रथादिप्रतिभान-निमित्तमोदत्रासादिदर्शनात्तन्निमित्तभूतयोः सुकृतदुष्कृतयोः कर्तृत्वेनेति वक्तव्यम् । * अपि च जागरितेविषयेन्द्रियसंयोगादादित्यादिज्योतिर्व्यतिकराच्चात्मनः स्वयंज्योतिष्ट्रं दुर्विवेचन मिति तद्विवेचनाय स्वप्न उपन्यस्तः । तत्र यदि रथादिसृष्टिवचनं श्रुत्या नीयेत, तदा स्वयंज्योतिष्टुं न निर्णीतं स्यात् । तस्माद्रयाद्यभाववचनं श्रुत्या, रथादि सृष्टिवचनं तु भक्त्येति व्याख्येयम् । एतेन निर्माणश्रवणं व्याख्यातम् । यदप्युक्तम्- ' प्राज्ञमेनं निर्मातार-मामनन्ति ' इति - तदप्यसत् श्रुत्यन्तरे ' स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपिति ' ( बृह ४।३।९ ) इति जीवव्यापारश्रवणात् । इहापि य एष सुप्तेषु जागर्ति ' ( क ० ५।८ ) इति प्रसिद्धानुवादाजीव एवायं कामानां निर्माता संकीर्त्यते । तस्य तु वाक्यशेषेण तदेव शुकं तद्ब्रह्मेति जीवभावं व्यावर्त्य ब्रह्मभाव उपदिश्यते - ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।९ ।४ ) इत्यादि -वदिति न ब्रह्मप्रकरणं विरुध्यते । न चास्माभिः स्वप्नेऽपि प्राज्ञव्यवहारः प्रतिषिध्यते है I । जो यह कहा गया है कि ' आह हि ' ( क्योंकि श्रुति कहती है ) ऐसा होनेपर श्रुति और युक्तिसे स्वप्नके मायामात्रयत्व सिद्ध होनेपर वह गौण है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । जैसे हल बैल आदिका वहन करता है, ऐसा निमित्तमात्रसे कहा जाता है । परन्तु हल प्रत्यक्षरूपसे बैल आदिका वहन नहीं करता, वैसे ही निमित्तमात्रसे सुप्त पुरुष रथ आदिका निर्माण करता है और वही कर्ता है, ऐसा कहा जाता है, परन्तु सुप्तपुरुष प्रत्यक्षरूपसे रथ आदिका निर्माण नहीं करता । इसका निमित्तत्व तो रथ आदिकी प्रतीतिसे उत्पन्न हषं और त्रास आदिके दर्शनसे उनके निमित्तरूप सुकृत और दुष्कृतके कर्तृरूपसे हैं, ऐसा कहना चाहिए । और जाग्रत् में विषय इन्द्रियोंके संयोगसे और आदित्य बादि ज्योति के संकरसे आत्मामें स्वयं ज्योतिष्टुका विवेचन दुष्कर है, अतः उसके विवेचनके लिए स्वप्नका उपन्यास किया गया है । उसमें यदि रथ आदि सृष्टि वचन श्रुतिसे ( मुख्यवृत्तिसे ) तत्परक लिया जाय, तो आत्माका स्वयं ज्योतिष्टु निर्णीत नहीं होगा । इसलिए रथ आदि अभाव वचव मुख्य-वृत्तिसे और रथ आदि सृष्टि वा गौण वृत्ति से है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । इससे निर्माण श्रुतिका व्याख्यान हुआ । और जो यह कहा गया है कि इस प्राज्ञको स्वप्नका निर्माता कहते हैं, वह मी युक्त नहीं है, क्योंकि ' स्वयं ' विहत्य ० ' ( स्वयं ही इस स्थूल शरीरको अचेतकर तथा स्वयं अपने वासनामय देहको रचकर, अन्तःकरण वृत्ति प्रकाशसे तथा स्वयं ज्योतिः स्वरूपसे उस वासनामयको विषय करता हुआ शयन करता है ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें जीव व्यापारका श्रवण है । और ' य एष ० ' ( जो यह इन्द्रियों के सुप्त होनेपर जागता है ) यहाँ भी प्रसिद्धके अनुवादसे यह जीव ही कामोंका निर्माता कहा जाता है । किन्तु उसका ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ' ० ( वही शुक्र है और वह ब्रह्म है ) इस वाक्यशेषसे जीवभाव व्यावृत्तकर ' तत्त्वमसि ' इत्यादिके समान ब्रह्मभाव उपदेश किया जाता है, इससे ब्रह्म प्रकरणका विरोध नहीं है । और हम स्वप्नमें भी प्राज्ञके व्यापारका प्रतिषेध नहीं करते हैं, क्योंकि वह सत्यानन्दी - दीपिका लेकर कहा गया है । अतः स्वप्न भोक्ता पुण्य, पाप द्वारा स्वप्न सृष्टिका निमित्तमात्र है, अतः उस सुप्तका स्वप्नकर्तृत्व गौण है । * ' अन्नायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' यह श्रुति स्वप्नको लेकर आत्मामें स्वयं ज्योतिष्ट्रका प्रति पादन करती है । रथ आदि सृष्टि वचन रथ आदि सृष्टि परक नहीं है, क्योंकि एक ही श्रुतिमें रथ

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ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 636 का मूल पृष्ठ
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६०२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ तस्य सर्वेश्वरत्वात्सर्वास्ववस्थास्वधिष्ठातृत्वोपपत्तेः । पारमार्थिकस्तु नायं संध्याश्रयः सर्गी वियदादिसर्गवदित्येतावत्प्रतिपाद्यते ॥ नच वियदादिसर्गस्याप्यात्यन्तिकं सत्यत्व-मस्ति । प्रतिपादितं हि ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ' ( ब्र ० सू ० २।१।१४ ) इत्यत्र समस्तस्य प्रपञ्चस्य मायामात्रत्वम् । प्राक्तु ब्रह्मात्मत्वदर्शनाद्वियदादिप्रपञ्चो व्यवस्थितरूपो भवति ।. संध्याश्रयस्तु प्रपञ्चः प्रतिदिनं बाध्यत इति, अतो वैशेषिकमिदं संध्यस्य मायामात्रत्वमुदितम् ॥ ४ ॥

परामिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ५ ॥

पदच्छेद - पराभिध्यानात्, तु, तिरोहितम्, ततः, हि, अस्य, 1 सूत्रार्थ - ( तु ) परन्तु ( अस्य ) जीवका ( तिरोहितम् ) अविद्या आदिसे आवृत्त ऐश्वथं ( पराभिध्यानात् ) परमात्मके ध्यास से अभिव्यक्त होता है, ( ततोहि ) क्योंकि ( बन्धविपर्ययौ ) ईश्वर-ज्ञान न होनेसे जीवका बन्ध और ज्ञान होनेसे मोक्ष होता है । ऐसा ' ज्ञात्वा देव ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतिपादित है । अथापि स्यात्परस्यैव तावदात्मनोंऽशो जीवोऽग्नेरिव विस्फुलिङ्गः, तत्रैवं सति यथाग्निविस्फुलिङ्गयोः समाने दहनप्रकाशनशक्ती भवतः, एवं जीवेश्वरयोरपि ज्ञानैश्वर्य-शक्ती, ततश्च जोवस्य ज्ञानैश्वर्यवशात्सां कल्पिकी स्वप्ने रथादिसृष्टिर्भविष्यतीति । अत्रोच्यते-सत्यपि जीवेश्वरयोरंशांशिभावे प्रत्यक्षमेव जीवस्येश्वरविपरीतधर्मत्वम् । किं पुनर्जीवस्ये-श्वरसमानधर्मत्वं नात्त्येव? न नास्त्येव, विद्यमानमपि तत्तिरोहितमविद्यादिव्यवधानात् । तत्पुनस्तिरोहितं सत्परमेश्वरमभिध्यायतो यतमानस्य जन्तोर्विधूतध्वान्तस्य तिमिरतिर-स्कृतेव दृक्शक्तिरौषधवीर्यादीश्वर प्रसादात्संसिद्धस्य कस्यचिदेवाविर्भवति, न स्वभावत एव सर्वेषां जन्तूनाम् । कुतः ततो हीश्वराद्धेतोरस्य जीवस्य बन्धमोक्षौ भवतः । ईश्वर-सबका ईश्वर होनेसे सब अवस्थाओं में भी अधिष्ठाता हो सकता है । परन्तु आकाश आदि सृष्टिके समान यह स्वप्न आश्रय सृष्टि पारमार्थिक नहीं है, केवल इतना ही प्रतिपादित किया जाता है । और आकाश आदि सृष्टि भी आत्यन्तिक सत्य नहीं है, क्योंकि ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ' इस सूत्रमें सम्पूर्णं प्रपञ्चमें मायामात्रत्व प्रतिपादित है । ब्रह्मात्मत्व ज्ञानके पूर्व आकाश आदि प्रपञ्च व्यव: स्थितरूप होता है, और स्वप्न आश्रय प्रपञ्च तो प्रतिदिन बाधित होता है । अतः स्वप्नमें यही विशेष मायामात्रत्व कहा गया है ॥ ४ ॥

परन्तु ऐसा भी हो कि जैसे विस्फुलिङ्ग अग्निका अंश है, वैसे ही जीव परमात्माका अंश है । ऐसा होनेपर जैसे अग्नि और विस्फुलिङ्गमें दहन और प्रकाशन शक्ति समान है, वैसे जीव और ईश्वरमें भी ज्ञान और ऐश्वर्यशक्ति समान होगी, उससे जीवके ज्ञान और ऐश्वयंके बलसे स्वप्न में सांकल्पिकी रथ आदि सृष्टि हो जायगी । इसपर कहते हैं - जीव और ईश्वरका अंशांशिभाव होनेपर भी प्रत्यक्ष-रूपसे जीव में ईश्वरसे विपरीत धर्म हैं, तो क्या जीवमें ईश्वरके समान धर्म नहीं हैं? नहीं है, ऐसा नहीं, क्योंकि समान धर्मं विद्यमान होता हुआ भी अविद्याके व्यवधानसे वह तिरोहित है । परन्तु वह तिरोहित होता हुआ भी परमेश्वरका ध्यान करनेवाले यत्नशील विनष्ट अज्ञान निष्पाप किसी एक सिद्ध पुरुषमें ईश्वर के प्रसादसे वह पुनः आविर्भूत होता है, जैसे ओषधके बलसे किसी एक प्राणीकी रतौंधी से तिरकृत दृक्शक्ति आविर्भूत होती है । स्वभावसे सभी प्राणियोंकी ज्ञान ऐश्वयं शक्ति आविर्भूत सत्यानन्दी -दीपिका आदिका अभाव और रथ आदि सृष्टि परस्पर विरूद्ध हैं, अतः रथ आदि अभाव वचन मुख्य है और रथ आदि सृष्टि वचन गौण है ॥ ४ ॥

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अधि ० १ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६०३ स्वरूपापरिज्ञानान्द्रधः, तत्स्वरूपपरिज्ञानात्तु मोक्षः । तथा च श्रुतिः - ' ज्ञात्वा देवं सर्व-पाशापहानिः क्षीणैक्लेशैजन्ममृत्युप्रहाणिः । तस्यामिध्यानात्तृतोयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ' ( ० १११ ) इत्येवमाद्या ॥ ५ ॥

देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ६ ॥

पदच्छेद - देहयोगात्, वा, सः, अपि । सूत्रार्थ - ( सोऽपि ) जीवके ऐश्वयंका वह तिरोभाव भी ( देहयोगात् ) देह आदिके योगसे होता है । ( वा ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है । कस्मात्पुनर्जीवः परमात्मांश एवं संस्तिरस्कृतज्ञानैश्वर्यो भवति? युक्तं तु ज्ञान-श्वर्ययोरतिरस्कृतत्वं विस्फुलिङ्गस्येव दहनप्रकाशनयोरिति — उच्यते - सत्यमेवैतत्, सोऽपि तु जीवस्य ज्ञानैश्वर्यतिरोभावो देहयोगाद्देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदना दियोगा-द्भवति । अस्ति चात्रोपमा -- यथाऽग्नेर्दहन प्रकाशन संपन्न स्याप्यरणिगतस्य दहन-प्रकाशने तिरोहिते भक्तो यथा वा भस्मच्छन्नस्य, एवमविद्या प्रत्युपस्थापितनामरूपकृत-देहाद्युपाधियोगात्तदविवेकभ्रमकृतो जीवस्य ज्ञानैश्वर्यतिरोभावः । वाशब्दो जीवेश्वर-योरन्यत्वाशङ्काव्यावृत्त्यर्थः । नन्वन्य एव जीव ईश्वरादस्तु तिरस्कृत ज्ञानैश्वर्यत्वात्, किं देहयोगकल्पनया? नेत्युच्यते- नान्यत्वं जीवस्येश्वरादुपपद्यते, ' सेयं देवतैक्षत ' ( छा ० ६।३।२ ) इत्युपक्रम्य ' अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य ' ( छा ० ६।३।२ ) इत्यात्मशब्देन जीवस्य नहीं होती । किससे? ' ततो हि ' ईश्वररूप हेतुसे, अस्य - जीवका बन्ध और मोक्ष होता है । ईश्वर स्वरूपका परिज्ञान न होनेसे बन्ध और उसके स्वरूप परिज्ञानसे मोक्ष होता है । क्योंकि ' ज्ञात्वा देवं ० ' ( ' यह मैं हूँ ' इसप्रकार परमात्माका ज्ञान होनेपर अविद्या आदि सम्पूर्णं क्लेशों का नाश हो जाता है और क्लेशोंका क्षय हो जानेपर जन्म मृत्युकी निवृत्ति हो जाती है । तथा उसका ध्यान करनेसे शरीर-पातके अनन्तर [ विराट् और हिरण्यगर्भकी अपेक्षा ] कारण ब्रह्मरूप सर्वैश्वर्यमयी तृतीय अवस्थाकी प्राप्ति होती है और पुनः आप्तकाम होकर कैवल्य पदको प्राप्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति है ॥ ५ ॥

परमात्माका अंश होता हुआ मी जीव तिरस्कृत ज्ञानैश्वर्यवान् पुनः क्यों होता है? प्रत्युत जैसे विस्फुलिङ्गके दहन और प्रकाशन अतिरस्कृत हैं, वैसे ईश्वरांय जीवके ज्ञान और ऐश्वयं अतिरस्कृत होने चाहिए । कहते हैं - यह सत्य है, किन्तु जीवका ' सोऽपि ' ज्ञानेश्वयं तिरोभाव मी देहयोगात्-देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय, वेदना आदिके योगसे होता है । यहाँ दृष्टान्त भी है - जैसे दहन और प्रकाश सम्पन्न होते हुए मी अरणिगत अग्निके दहन और प्रकाशन तिरोहित होते हैं, अथवा जिस प्रकार भस्मसे आच्छादित अग्निके दहन और प्रकाश तिरोहित होते हैं, उसी प्रकार अविद्या से प्रत्युपस्थापित ( खड़े किए हुए ) नाम और रूपसे होनेवाली देह आदि उपाधिके साथ सम्बन्ध होने से जीवके उपाधिके अविवेकभ्रमसे होनेवाले ज्ञान और ऐश्वयं तिरोहित होते हैं । ' वा ' शब्द जीव और ईश्वरमें अन्यत्व शङ्का व्यावृत्ति के लिए है । परन्तु जोव ईश्वरसे अन्य ही है, क्योंकि उसके ज्ञान और ऐश्वर्यं तिरस्कृत हैं. देहयोगकी कल्पनासे क्या प्रयोजन? नहीं, ऐसा कहते हैं— जीवमें ईश्वरसे अन्यत्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि ' सेयं देवतैक्षत ' ( उस देवताने ईक्षण किया ) इस प्रकार आरम्भ सत्यानन्दी - दीपिका * यदि स्वप्न में प्रतीयमान प्रकाश सत्य हो, तो जाग्रत् के समान आत्माका स्वप्रकाशत्व स्पष्ट प्रतीत नहीं होगा । स्वप्नको प्रातिभासिक माननेपर तो उसमें सूर्य आदि बाह्य प्रकाश और इन्द्रिय आदिके न होने से भी जो स्वप्न पदार्थों का अवभास होता है वह स्वयं ज्योतिः स्वरूप आत्मा से होता है । ' अथ स्थान्स्थयोगान्सृजते ' यह साम्यवचन स्वप्न में सत्यत्व के अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि उसी श्रुति में

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६०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ परामर्शात् । ' तत्सत्यं स आत्मा तत्वमसि श्वेतकेतो ' ( छा ० ६।९ ।४ ) इति च जीवायोपदिश-तीश्वरात्मत्वम् । अतोऽनन्य एवेश्वराजीवः सन् देहयोगात्तिरोहितज्ञानैश्वर्यो भवति । अतश्च न सांकल्पिकी जीवस्य स्वप्ने रथादिसृष्टिर्घटते । * यदि च सांकल्पिकी स्वप्ने रथादिसृष्टिः स्यान्नैवानिष्टं कश्चित्स्वप्नं पश्येत् । नहि कश्चिदनिष्टं संकल्पयते । यत्पुन-रुक्तम् -- जागरितदेशश्रुतिः स्वप्नस्य सत्यत्वं स्थापयतीति न तत्साम्यवचनं सत्यत्वाभि-प्रायं, स्वयंज्योतिष्ट्रविरोधात् श्रुत्यैव च स्वप्ने रथाद्यभावस्य दर्शितत्वात् । जागरित-प्रभववासना निर्मितत्वात्तु स्वप्नस्य तत्तुल्यनिर्भासत्वाभिप्रायं तत् । तस्मादुपपन्नं स्वप्नस्य मायामात्रत्वम् ॥ ६ ॥

( २ तदभावाधिकरणम् । सू ० ७-८ ) तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ७ ॥

पदच्छेद -- तदभावः, नाडीषु, तच्छ्रुतेः, आत्मनि च । सूत्रार्थ - ( तदभावः ) प्रकृत स्वप्नंका अभावरूप सुषुप्ति ( नाडीषु ) नाड़ियों में प्रवेशके द्वारा ( आत्मनि ) आत्मामें होती है, ( तच्छ्रुतेः ) क्योंकि तत् तत् श्रुतियों में ऐसा ही कहा गया है । * स्वप्नावस्था परीक्षिता, सुषुप्तावस्थेदानीं परीक्ष्यते । तत्रैताः सुषुप्तिविषयाः श्रुतयो भवन्ति । क्वचिच्छ्र यते - ' तद्यत्रैतत्सुतः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा कर ' अनेन जीवेना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे ही उन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम, रूपका व्याकरण करूं ) इस प्रकार आत्मशब्दसे जीवका परामर्श है । ' तत्सत्यं ० ' ( वह सत्य है, वह आत्मा है, हे श्वेतकेतु! वह तू है ) यह श्रुति जोवको ईश्वरात्मत्व उपदेश करती है । अत: जीव ईश्वरसे अनन्य होता हुआ ही देह सम्बन्धसे तिरोहित ज्ञानेश्वर्यवान् होता है । इससे जीवको स्वप्नमें संकल्पसे जन्य रथ आदि सृष्टि नहीं घटती है । और यदि स्वप्नमें संकल्प जन्य रथ आदि सृष्टि हो, तो कोई भी अनिष्ट स्वप्न नहीं देखे, क्योंकि कोई भी अनिष्ट संकल्प नहीं करता । और जो यह कहा गया है कि जागरित देश श्रुति स्वप्नमें सत्यत्वका कथन करती हैं, किन्तु वह साम्य वचन स्वप्नमें सत्यत्वके अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि आत्मामें स्वयं ज्योतिष्ट से विरोध होता है और श्रुतिसे ही स्वप्नमें आदिका अभाव दिखलाया गया है । जाग्रत्में उत्पन्न हुई वासनासे निर्मित होनेके कारण स्वप्नका जाग्रत् के समान अवभास होता है, इस अभिप्रायसे वह साम्य वचन है । इसलिए स्वप्न में माया-मात्रत्व युक्त है ॥ ६ ॥

स्वप्नावस्थाकी परीक्षा हो चुकी, अब सुषुप्ति अवस्थाकी परीक्षा की जाती है । यहाँ सुषुप्ति विषयक ये श्रुतियाँ हैं । कहीं ' तद्यत्रैतत्सुप्तः ० ' ( जिस समय समस्त करणवृत्तिका उपसंहार कर जीव सोता है उस समय में [ बाह्य विषय संपर्क जनित कालुष्य रहित होनेसे ] संप्रसन्न होता हुआ स्वप्न-सत्यानन्दी - दीपिका ' न तन्त्र रथा ० ' इस प्रकार रथ आदिका अभाव भी कहा गया है । यह जो जाग्रत् और स्वप्नका साम्य वचन श्रुतिमें है, उसका यह अभिप्राय है कि जाग्रत् अवस्थाके पदार्थोंके जैसे स्वप्न में पदार्थ मान होते हैं, परन्तु वे सत्य नहीं है, अतः स्वप्न मायामात्र है ॥ ६ ॥

* जीवात्मा स्वयं ज्योतिःस्वरूप है, इस निर्णय के लिए स्वप्नावस्थाका निरूपण किया गया है । ' वह ब्रह्म है ' अब इसके लिए सुषुप्ति अवस्थाका प्रतियोगि- अनुयोगिभाव संगति से विचार किया जाता है । ' तद्यत्रैतत्सुप्तः ' इस श्रुतिमें सुषुप्तिका स्थान नाड़ी प्रतिपादित है, और ' तामिः प्रत्यवसृप्य ' इस श्रुतिसे सुषुप्तिका स्थान नाड़ी और पुरीतत् कहा गया है, इसप्रकार ' तासु तदा भवति ' इसमें पुरीतत्

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अधि ० २ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६०५ नाडीषु सृप्तो मवति ' ( छा ० ८ | ६ | ३ ) इति । अन्यत्र तु नाडीरेवानुक्रम्य श्रूयते - — ' ताभिः प्रत्यवसृष्य पुरीतति शेते ' ( बृह ० २।१।१ ९ ) इति । तथान्यत्र नाडीरेवानुक्रम्य - ' तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति ' ( कौषी ० ४ । १ ९ ) इति । तथान्यत्र - ' य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते ' ( बृह ० २।१।१७ ) इति । तथान्यत्र ' सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति ' ( छा ० ६।८।१ ) इति । तथा ' प्राज्ञेनात्मना संप-रिक्को न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् ' ( बृह ० ४ | ३ | २१ ) इति च । तत्र संशयः - किमेतानि नाडयादीनि परस्परनिरपेक्षाणि भिन्नानि सुषुप्तिस्थानान्या होस्वित्परस्परापेक्षयैकं सुषुप्तिस्थानमिति । किं तावत्प्राप्तम्? भिन्नानीति, कुतः? एकार्थत्वात् । नोकार्थानां क्वचित्परस्परापेक्षत्वं दृश्यते व्रीहियवादीनाम् । नाडयादीनां त्वेकार्थता सुषुप्तौ दृश्यते-' नाडीषु सृप्तो भवति ' ( छा ० ८ | ६ | ३ ) ' पुरीतति शेते ' ( बृह ० २।१।१ ९ ) इति च तत्र तत्र सप्तमीनिर्देशस्य तुल्यत्वात् । ननु नैवं सति सप्तमीनिर्देशो दृश्यते- ' सता सोम्य तदा संपन्नो मवति ' ( छा ० ६।८।१ ) इति, नैषः दोषः, तत्रापि सप्तम्यर्थस्य गम्यमानत्वात् । वाक्यशेषो हि तत्रायतनैषी जीवः सदुपसर्पतीत्याह- ' अन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते ' ( छा ० ६।८।२ ) इति । प्राणशब्देन तत्र प्रकृतस्य सत उपादानात् । आयतनं च सप्तम्यर्थः । सप्तमीनिर्दे-को नहीं जानता, क्योंकि उस समय यह इन नाडियोंमें प्रविष्ट होता है ) ऐसी श्रुति है । अन्यत्र तो ' तामिः प्रत्यवसृप्य ० ' ( उन नाड़ियों द्वारा पुरीतत् में बुद्धिके साथ जाकर वह शरीर में व्याप्त होकर शयन करता है ) इसप्रकार नाड़ीका अनुक्रमणकर सुना जाता है । इसप्रकार अन्यत्र नाड़ीका अनु-क्रमणकर ' तासु तदा भवति ० ' ( उन नाड़ियों में तब होता है जब कि सुप्त कोई स्वप्न नहीं देखता, अनन्तर वह इस प्राणमें ही एक होता है ) ऐसी श्रुति है । इसीप्रकार अन्यत्र ' य एषो ० ' ( जो यह हृदयमें आकाश है उसमें सोता है ) ऐसी श्रुति है । इसीप्रकार अन्यत्र ' सता सोम्य ० ' ( उस समय हे सोम्य! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) ऐसी श्रुति है । तथा ' प्राज्ञेनात्मना ० ' ( इसीप्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और नभीतरका ) ऐसी श्रुति है । उसमें संशय होता है- क्या ये नाड़ी आदि परस्पर निरपेक्ष होकर भिन्न भिन्न सुषुप्ति स्थान हैं अथवा परस्पर अपेक्षासे एक सुषुप्ति स्थान है, तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - भिन्न स्थान हैं, किससे? इससे कि एकार्थत्व है । एकार्थक व्रीहि, यव आदिका कहीं परस्पर सापेक्षत्व नहीं देखा जाता है । नाड़ी आदिकी एकार्थता तो सुषुप्ति में देखी जाती है - ' नाडीषु सृप्तो भवति ' ' पुरीतति शेते ' इसप्रकार तत् तत् श्रुतिमें सप्तमीका निर्देश तुल्य है । परन्तु ' सता सोम्य ० ' ( उस समय, हे सोम्य! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है ) यहाँ ' सत् में ' ऐसा सप्तमीका निर्देश नहीं देखा जाता । यह दोष नहीं है, क्योंकि वहाँ पर भी सप्तमी अथं गम्यमान है । उसमें ' आयतना-मिलाषी जीव सत् में प्रविष्ट होता है ' इसप्रकार वाक्यशेष मी कहता है । क्योंकि ' अन्यन्त्र ० ' ( अन्यत्र स्थान न प्राप्तकर प्राणका ही आश्रय लेता है ) इसप्रकार वहाँ प्राण शब्दसे प्रकृत सत्का ग्रहण है. सत्यानन्दी - दीपिका और परमात्मा जीवके सुषुप्तिस्थान प्रतिपादित हैं, मोर ' य एषोऽन्तर्हृदयः ' ' सता सोम्य ' प्राज्ञे-नात्मना ' इत्यादि श्रुतियोंमें केवल परमात्मा सुषुप्तिस्थान कहा गया है । इसप्रकार नाड़ी, पुरीतत् और परमात्मा इन तीनों में सप्तमी विभक्ति समान है, अतः संशय होता है कि क्या ये तीनों परस्परकी अपेक्षा रहित भिन्न भिन्न सुषुप्तिके स्थान हैं अथवा परस्परकी अपेक्षया एक सुषुप्ति स्थान है? * पूर्वपक्षमें जीवके सुषुप्तिस्थानका विकल्प होनेसे ब्रह्मक्यका अनिर्णय फल है और सिद्धान्तमें नाड़ी द्वारा पुरीतत्में जाकर हृदयके भीतर ब्रह्ममें ही शयन करता है, इसप्रकार ब्रह्मेक्य निर्णय फल है ।

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६०६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ शोऽपि तत्र वाक्यशेषे दृश्यते - ' सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामहे ' ( छा ० ६।९ ।२ ) इति । सर्वत्र च विशेषविज्ञानोपरमलक्षणं सुषुप्तं न विशिष्यते । तस्मादेकार्थत्वान्नायादीनां विकल्पेन कदाचित्किचित्स्थानं स्वापायोपसर्पतीति । * एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते तदभावो नाडीष्वात्मनि चेति । तदभाव इति तस्य प्रकृतस्य स्वप्नदर्शनस्याभावः सुषुप्तमित्यर्थः । नाडीष्वात्मनि चेति समुच्चयेनैतानि नाड्यादीनि स्वापायोपसर्पति न विकल्पेनेत्यर्थः । कुतः? तच्छ्रुतेः । तथा हि- सर्वेषामेव नाड्यादीनां तत्र तत्र सुषुप्तिस्थानत्वं श्रूयते तच्च समुच्चये संगृहीतं भवति । विकल्पे ह्येषां पक्षे बाधः स्यात् । नन्वेकार्थत्वाद्विकल्पो नाड्या-दीनां व्रीहियवादिवदित्युक्तम्, नेत्युच्यते - नये कविभक्तिनिर्देशमात्रेणैकार्थत्वं विकल्पश्चा-पतति । नानार्थत्वसमुच्चययोरप्येकविभक्तिनिर्देशदर्शनात्प्रासादे शेते पर्यङ्क शेत इत्ये-वमादिषु । तथेहापि नाडीषु पुरीतति ब्रह्मणि च स्वपितीत्येतदुपपद्यते समुच्चयः । तथा च श्रुतिः - ' तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वष्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति ' ( कौषी ० ४।१ ९ ) इति समुच्चयं नाडीनां प्राणस्य सुषुप्तौ श्रावयत्येकवाक्योपादानात् । प्राणस्य च ब्रह्मत्वं समधिगतम् – ' प्राणस्तथानुगमात् ' ( ब्र ० सू ० १।१।२८ ) इत्यत्र । और सप्तमीका अर्थं आयतन है । और ' सति संपद्य ० ' ( सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि सत्को प्राप्त हो गये ) इस तरह वहां सप्तमी निर्देश मी वाक्यशेषमें देखा जाता है । विशेष विज्ञानका उपरमरूप सुषुप्त सर्वत्र समान है । इसलिए नाड़ी आदि एकार्थक होनेसे जीव विकल्पसे कभी किसी स्थानमें शयन के लिए प्रवेश करता है । ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है - ' तदभावो नाडीष्वात्मनि चेति ' तदभाव उस प्रकृत स्वप्न दर्शनका अभाव सुषुप्ति है, ऐसा अर्थ है । नाड़ी और आत्मामें - इन नाड़ी बादिमें समुच्चयसे जीव शयनके लिए प्रवेश करता है विकल्पसे नहीं, यह अर्थ है । किससे? उसकी श्रुति होनेसे । जैसे कि सभी नाड़ी आदिका तत् तत् श्रुतियोंमें सुषुप्ति - स्थानत्व श्रवण होता है । वह समुच्चय होनेपर संगृहीत होता है, विकल्प होनेपर इनका पक्षमें बाध होगा । परन्तु ऐसा कहा गया है कि एकार्थक होनेसे व्रीहि यव आदिके समान नाड़ी आदिका विकल्प है । नहीं, ऐसा कहा जाता है - एक समान विभक्तिके निर्देश मात्रसे एकार्थत्व और विकल्पका प्रसंग नहीं होता, क्योंकि नानार्थत्व और समुच्चयमें भी एक विभक्तिका निर्देश ' प्रासादमें सोता है पलङ्गपर शयन करता है ' इत्यादिमें दर्शन होता है, इसीप्रकार यहाँ भी नाड़ियोंमें, पुरीतत् में और ब्रह्ममें सोता है, इसप्रकार समुच्चय उपपन्न होता है । और ' तासु तदा ० ' ( उन नाड़ियोंमें, जीव तब होता है जब सोया हुआ किसी स्वप्नको नहीं देखता, अनन्तर इस प्राणमें एक रूप होता है ) इसत्रकार यह श्रुति नाड़ियों और प्राणका सुषुप्ति में समुच्चय श्रवण कराती है, क्योंकि एक वाक्यसे ग्रहण है, और ' प्राण-सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्ती — समुच्चयसे ही एक सुषुप्ति स्थान है । यदि विकल्प मानें तो जिस समय नाड़ियों में सुषुप्तिस्थान होगा उस समय पुरीतत् आदि सुषुप्तस्थान नहीं होंगे, ऐसी परिस्थिति में पुरीतत् आदिको सुषुप्तिस्थानत्व प्रतिपादक श्रुतिका बाध होगा । और जैसे ' महलमें सोता है, पलङ्ग पर सोता है ' यहाँ महलका प्रयोजन पलङ्गका धारण है, और पलङ्गका प्रयोजन शयन है । इसप्रकार प्रयोजन भिन्न - भिन्न होनेपर भी दोनोंमें सप्तमी विभक्ति है, और साक्षात् अथवा परम्परासे शयन के साधन होनेसे दोनोंमें समुच्चय भी है, वैसे यहाँ भी पुरीतत् आदि नाड़ियों द्वारा जीवका संचार होनेसे ब्रह्ममें ही शयन है और ' तासु तदा भवति ' इस एक श्रुतिवाक्यसे प्राण और नाड़ियोंका ग्रहण भी है, इससे भी इनका समुच्चय है । यहाँ सप्तमीका अर्थ आधार है निरपेक्ष नहीं है, इसलिए समुच्चयका सप्तमी श्रुतिसे बाघ नहीं है ।