श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 641–650

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 641–650

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अधि ० २ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६०७ यत्रापि निरपेक्षा इव नाडीः सुप्तिस्थानत्वेन श्रावयति - ' आसु तदा नाडीषु सृप्तो मवति ' ( छा ० ८ | ६ | ३ ) इति, तत्रापि प्रदेशान्तरप्रसिद्धस्य ब्रह्मणोऽप्रतिषेधान्नाडीद्वारेणैव ब्रह्मण्येवावतिष्ठत इति प्रतीयते । न चैवमपि नाडीषु सप्तमी विरुध्यते, नाडीद्वारापि ब्रह्मोपसर्प - सृप्तएव नाडीषु भवति । यो हि गङ्गया सागरं गच्छति गत एव स गङ्गयां भवति । अपि चात्र रश्मिनाडीद्वारात्मकस्य ब्रह्मलोकमार्गस्य विवक्षितत्वान्नाडीस्तुत्यर्थं सृप्तिसंकीर्तनम् । ' नाडीपु सृप्तो भवति ' ( छा ० ८।६।३ ) इत्युक्त्वा ' तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति ' ( छा ० ८२६।३ ) इति ब्रुवन्नाडीः प्रशंसति, ब्रवीति च पाप्मस्पर्शाभावे हेतुम् -'तेजसा हि तदा संपन्नो भवति ' ( छा ० ८ | ६ | ३ ) इति । तेजसा नाडीगतेन पित्ताख्येनाभिव्याप्त करणो न बाह्यान्विषयानीक्षत इत्यर्थः । अथवा - तेजसेति ब्रह्मण एवायं निर्देशः, श्रुत्यन्तरे - ' ब्रह्मैव तेज एव ' ( बृह ० ४ ४ ७ ) इति तेजः-शब्दस्य ब्रह्मणि प्रयुक्तत्वात् । ब्रह्मणा हि तदा संपन्नो भवति नाडीद्वारेणातस्तं न कश्चन पाप्मा स्पृशतीत्यर्थः । ब्रह्मसंपत्तिश्च पाप्मस्पर्शाभावे हेतुः समधिगतः - सर्वे पाप्मानोऽतो निव-र्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ' ( छा ० ८ | ४ | १ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । एवं च सति प्रदेशान्तरप्रसिद्धेन ब्रह्मणा सुषुप्तिस्थानेनानुगतो नाडीनां समुच्चयः समधिगतो भवति । तथा पुरीततोऽपि ब्रह्मप्रक्रियायां संकीर्तनात्तदनुगुणमेव सुषुप्तिस्थानत्वं विज्ञायते - ' य एषोऽन्तर्हृदय आकाश-स्तस्मिन्छेते ' ( बृह ० २।१।१७ ) इति हृदयाकाशे सुषुप्तिस्थाने प्रकृत इदमुच्यते ' पुरीतति शेते ' ( बृह ० २।१।१ ९ ) इति । पुरीतदिति हृदयपरिवेष्टनमुच्यते । तदन्तर्वर्तिन्यपि हृदयाकाशे स्तथानुगमात् ' इस सूत्रमें प्राण में ब्रह्मत्वका निश्चय किया गया है । ' आसु तदा ० ' ( उस समय इन नाड़ियों में प्रविष्ट होता है ) ऐसी श्रुति जहाँ अन्यकी अपेक्षासे रहित - सी नाड़ियों में सुषुप्तिस्थानत्व श्रवण कराती है, वहाँ भी अन्य श्रुतियोंमें प्रसिद्ध ब्रह्मका प्रतिषेध न होने से नाड़ीद्वारा ब्रह्ममें ही जीव अवस्थित होता है ऐसा प्रतीत होता है, ऐसा होनेपर नाड़ियों में सप्तमी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि नाड़ीद्वारा मी ब्रह्ममें प्रवेश करता हुआ जीव नाड़ियोंमें ही प्रविष्ट होता है । जो गङ्गा द्वारा सागरमें जाता है वह गङ्गामें गया हुआ होता है । और यहाँ पर रश्मि - नाड़ी द्वारात्मक ब्रह्मलोकका मागं विवक्षित होनेसे नाड़ीकी स्तुति के लिए प्रवेश कथन है- ' नाडीषु सृप्तो भवति ( नाड़ियोंमें प्रविष्ट होता है ) ऐसा कहकर ' तं न कश्चन ० ' ( तब इसे कोई पाप स्पर्शं नहीं करता ) इसप्रकार कहती हुई श्रुति नाड़ीकी प्रशंसा करती है । और ' तेजसा हि ० ( और तेजसे व्याप्त हो जाता है ) इसप्रकार श्रुति पापं स्पर्शके अभावमें हेतु कहती है । नाड़ी-गत पित्त नामक तेजसे अभिव्याप्त इन्द्रियवाला वह बाह्य विषयोंको नहीं देखता ऐसा अर्थ है । अथवा ' तेजसा ' ( तेजसे ) यह ब्रह्मका ही निर्देश है, क्योंकि अन्य श्रुतिमें ' ब्रह्मैव तेज एव ' ( ब्रह्म ही है - तेज ही है ) इसप्रकार तेज शब्द ब्रह्ममें प्रयुक्त है, तब जीव नाड़ी द्वारा ब्रह्मके साथ सम्पन्न होता है । छतः इसे कोई पाप स्पर्शं नही करता ' ऐसा अर्थ है । और ' सर्वे ' पाप्मानो ० ' ( सम्पूर्णं पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पाप शून्य है ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मसंपत्ति पापस्पर्श के अभावमें हेतु समधिगत है । ऐसा होनेपर अन्य श्रुतियोंमें सुषुप्ति स्थानरूपसे प्रसिद्ध ब्रह्मके साथ अनुगत नाड़ी आदिका समुच्चय समधिगत - ज्ञात होता है । इसप्रकार पुरीतत्का मी ब्रह्मके प्रक-रणमें संकीर्तन होनेसे. ब्रह्म के अनुगण ही सुषुप्तिस्थानरूपसे ज्ञात होता है - ' य एषोऽन्तर्हृदयः ० ' ( यह जो हृदय के मीतर आकाश है उसमें शयन करता है ) इसप्रकार सुषुप्ति स्थानरूपसे प्रकृत हृदय आकाश के विषयमें ' पुरोतति शेते ' ( पुरीतत्में शयन करता है ) ऐसा कहा जाता है । हृदयके परि-वेष्टनको ' पुरीतत् ' कहा जाता है, उसके अन्तर्वर्ती मी हृदय आकशमें शयन करता हुआ पुरीतत् में

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६०८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ शयानः शक्यते पुरीतति शेत इति वक्तुम् । प्राकारपरिक्षिप्तेऽपि पुरे वर्तमानः प्राकारे वर्तत इत्युच्यते । हृदयाकाशस्य च ब्रह्मत्वं समधिगतम् -'दरह उत्तरेभ्यः ' ( ब्र ० सू ० १ | ३ | १४ ) इत्यत्र । तथा नाडीपुरी तत्समुच्चयोऽपि - ' ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ' ( बृह ० २ | १ | १ ९ ) इत्येकवा-क्योपादानादवगम्यते । सत्प्राज्ञयोश्च प्रसिद्धमेव ब्रह्मत्वम् । एवमेतासु श्रुतिषु त्रीण्येव सुषु-तिस्थानानि संकीर्तितानि - नाड्यः पुरीतद्ब्रह्म चेति । तत्रापि द्वारमात्रं नाड्यः पुरीतच्च, ब्रह्मैव त्वेकमनपायि सुषुप्तिस्थानम् । अपि च नाड्यः पुरीतद्वा जीवस्योपाध्याधार एव भवति, तत्रास्य करणानि वर्तन्त इति । न ह्युपाधिसंबन्धमन्तरेण स्वत एव जीवस्याधारः कश्चित्संभवति, ब्रह्माव्यतिरेकेण स्वमहिमप्रतिष्ठितत्वात् । ब्रह्माधारत्वमप्यस्य सुषुप्ते नैवाधाराधेयभेदाभिप्रायेणोच्यते, कथं तर्हि? तादात्म्याभिप्रायेण । यत आह - सता सोम्य तदा संपन्नो मवति स्वमपीतो भवति ' ( छा ० ६ | ८ | १ ) इति । स्वशब्देनात्माभिलप्यते, स्वरूप-मापन्नः सुप्तो भवतीत्यर्थः । अपि च न कदाचिजीवस्य ब्रह्मणा संपत्तिर्नास्ति, स्वरूपस्या-नपायित्वात् । स्वप्न जागरितयोस्तूपाधिसंपर्कवशात्पररूपापत्तिमिवापेक्ष्य तदुपशमात्सु-षुप्तेः स्वरूपापत्तिर्विवक्ष्यते ' स्वमपीतो भवति ' इति, अतश्च सुप्तावस्थायां कदादित्सता संपद्यते कदादिन्न संपद्यत इत्ययुक्तम् । अपि च स्थानविकल्पाभ्युपगमेऽपि विशेषविज्ञा-नोपशमलक्षणं तावत्सुषुप्तं न कंचिद्विशिष्यते । तत्र सति संपन्नस्तावत्तदेकत्वान्न विजानातीति युक्तम्, ' तत्केन कं विजानीयात् ' ( बृह ० २।४।१४ ) इति श्रुतेः । नाडीषु पुरीतति च शयानस्य न किंचिदविज्ञाने कारणं शक्यं विज्ञातुम्, भेदविषयत्वात्, ' यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत् ' ( वृ ० ४ | ३ | ३१ ) इति श्रुतेः । ननु भेदविषयस्याप्यतिदूरादिकारण-शयन कहता है ऐसा कहा जा सकता है । कोटसे घिरे हुए नगरमें रहता हुआ कोटमें रहता है ऐसा कहा जाता है, और ' दहर उत्तरेभ्यः ' इसमें हृदयाकाशको ब्रह्मत्व निश्चित किया गया है । तथा ' तामिः प्रत्यवसृप्य ' ( नाड़ियों द्वारा प्रवेशकर पुरीतत् में सोता है ) इस श्रुतिसे नाड़ी और पुरीतत्का समुच्चय बी एक वाक्य उपादानसे अवगत होता है । सत् बोर प्रान ब्रह्म है, यह प्रसिद्ध है । इसप्रकार इन श्रुतियोंमें नाड़ी, पुरीत और ब्रह्म ये तीन ही सुषुप्ति स्थान कहे गये हैं । उनमें भी नाड़ी और पुरीतत् द्वारमात्र हैं, एक अविनाशी ब्रह्म ही सुषुप्तिका स्थान है, और नाड़ियाँ अथवा पुरीतत् जीवको उपाधिका आधार ही है, क्यों उनमें इसके करण रहते हैं । उपाधि सम्बन्धके विना जीवका स्वतः. ही कोई आधार नहीं हो सकता, क्योंकि जीव ब्रह्मसे अभिन्न होनेसे स्वमहिमा में प्रतिष्ठित है, इस जीवका सुषुप्ति में ब्रह्माधारत्व भी आधार और आधेयके भेदके अभिप्रायसे नही कहा जाता है, किन्तु तादात्म्यके अभिप्राय से । क्योंकि ' सता सोम्य ' ( उस समय हे सोम्य? यह सत् के साथ सम्पन्न हो जाता है - यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) यह श्रुति ऐसा कहती है । स्वशब्दसे आत्मा कहा जाता है सोया हुआ अपने स्वरूपको प्राप्त होता है, यह अर्थ है, और कदाचित् मी जीवकी ब्रह्मके साथ संपत्ति न हो ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका स्वरूप अविनाशी है | स्वप्न और जाग्रत्में तो उपाधिके संपर्कवश भिन्नरूपताकी प्राप्ति - सी होती है, उसकी अपेक्षा करके सुषुप्ति में उसके उपशम होनेसे स्वरूपकी प्राप्ति ' स्वमपीतो भवति ' ( यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) इस प्रकार विवक्षित है । और इससे सुषुप्ति अवस्थामें कभी सत्से सम्पन्न होता है और कभी सम्पन्न नहीं होता, यह कथन युक्त नहीं है । यदि स्थान विकल्प स्वीकार भी किया जाय तो भी विशेष विज्ञानका अभावरूप सुषुप्तका कहीं भेद नहीं है । सुषुप्तिमें सत् के साथ सम्पन्न होकर उसके साथ एकत्व होनेसे नहीं जानता है, यह युक्त है, क्योंकि ' तत्केन कं विजानीयात् ० ' ( और वहाँ किसके द्वारा किसे जाने ) ऐसी श्रुति है । नाड़ियों और पुरीतत् में शयन करनेवाले जीवके अज्ञानमें किसी कारणको नहीं जाना जा सकता, कारण कि ' यत्र वाऽन्यदिव ० ' ( जहाँ जाग्रत् वा स्वप्नावस्थामें आत्मासे

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अधि ० २ ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६० ९ मविज्ञाने स्यात् । वाढम् एवं स्याद्यदि जीवः स्वनः परिच्छिन्नोऽभ्युपगम्येत - यथा विष्णु मित्रः प्रवासी स्वगृहं न पश्यति, न तु जीवस्योपाधिव्यतिरेकेण परिच्छेदो विद्यते । उपाधिगतमेवातिदूरादिकारणमविज्ञान इति यद्युच्येत, तथाप्युपाधेरुपशान्तत्वात्सत्येव संपन्नो न विजानातीति युक्तम् । * नच वयमिह तुल्यवन्नाङवादिसमुच्चयं प्रतिपाद-यामः । नहि नाड्यः सुप्तिस्थानं गुरीतद्वेत्यनेन विज्ञानेन किचित्प्रयोजनमस्ति नह्येत-द्विज्ञानप्रतिबद्धं किंचित्फलं श्रयते । नाप्येतद्विज्ञानं फलवतः कस्यचिदङ्गमुपदिश्यते, ब्रह्म त्वनपायि सुप्तिस्थानमित्येतत्प्रतिपादयामः । तेन तु विज्ञानेन प्रयोजनमस्ति जोवस्य ब्रह्मात्मत्वावधारणं स्वप्नजागरितव्यवहारविमुक्तत्वावधारणं च । तस्मादात्मैव सप्ति-स्थानम् ॥७ ॥

अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ८ ॥

पदच्छेद - अतः, प्रबोधः, अस्मात् । सूत्रार्थ - परमात्मा ही सुषुप्ति स्थान है, ( अत: ) अतएव ( अस्मात् ) परमात्मा से जीवका ( प्रबोध ० ) उत्थान स्वाप प्रकरण में ' सत आगम्य ' इत्यादि श्रुतियोंसे उपदिष्ट है । * यस्माच्चात्मैव सुप्तिस्थानगत एव च कारणान्नित्यवदेवास्मादात्मनः प्रबोधः स्वापाधिकारे शिष्यते - ' कुत एतदागात् ' ( बृह ० २।१।१६ ) इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनावसरे ' यथाग्नेः क्षुद्रा बिस्फुलिङ्गा व्युचरन्त्येवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणाः ' ( बृह ० २।१।२० ) इत्यादिना । ‘ सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे ' ( छा ० ६।१०।२ ) इति च । चिकल्प्यमानेषु तु सुषुप्ति-भिन्न अन्य सा होता है वहाँ अन्य - अन्यको देखता है ) यह श्रुति भेद विषयक है । परन्तु भेद विषयक अज्ञानमें मी अतिदूर आदि कारण होना चाहिए । ठीक ऐसा हो, यदि जीव स्वतः परिच्छिन्न स्वीकार किया जाय । जैसे प्रवासी विष्णुमित्र अपने घरको नहीं देखता । परन्तु जीवका उपाधिके विना परिच्छेद नहीं है । यदि कहो कि उपाधिगत अतिदूर आदि अज्ञानमें कारण हैं, तो मी उपाधि उपशान्त होनेसे सत् में ही सम्पन्न होता हुआ नहीं जानता यह युक्त है, और यहाँ हम ब्रह्मके समान नाड़ी आदि समुच्चयका पतिपादन नहीं करते, क्योंकि नाड़ियाँ और पुरीतत् सुषुप्तिस्थान हैं इस विज्ञानसे कोई प्रयोजन नहीं है, और इस विज्ञानसे प्रतिबद्ध कोई फल भी नहीं सुना जाता, और यह विज्ञान किसी फलवाले [ अङ्गी ] का बङ्गरूपसे भी उपदिष्ट नहीं है । अविनाशी ब्रह्म तो सुषुप्ति स्थान है यह प्रतिपादन करते हैं । इस विज्ञानसे तो जीवका ब्रह्मात्मत्व निश्चय और स्वप्न - जागरित व्यवहारसे विमुक्तत्व निश्चय प्रयोजन है । इसलिए आत्मा ही सुषुप्तिका स्थान है ॥ ७ ॥

क्योंकि परमात्मा हो सुषुप्ति स्थान है, इसी कारण से स्वाप प्रकरणमें ' कुत एतदागात् ० ' ( यह कहाँसे आया ) इस प्रश्नके प्रतिवचन ( उत्तर ) के अवसर में ' यथाऽग्ने: ० ' ( जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे समस्त प्राण ) इत्यादि श्रुति से इस आत्मासे नित्य-प्रतिदिन - सा जीवके प्रबोधका उपदेश किया जाता है । और ' सतं आगम्य ' ( ये सम्पूर्णं प्रजाएँ सत्से सत्यानन्दी - दीपिका * हम नाड़ी आदिका ब्रह्मके साथ समुच्चय नहीं मानते, किन्तु गुणप्रधानभाव मानते हैं अर्थात् ब्रह्म मुख्य सुषुप्तिस्थान है और नाड़ी आदि द्वार होनेसे गौण हैं, इस प्रकार सुषुप्तिस्थानके विकल्पका निराकरण कर अब ' न हि नाड्यः ' इत्यादिसे उसके फल आदिका मी खण्डन करते हैं || ७ || * ' सत आगम्य ' इत्यादि श्रुतिसे जीवका ब्रह्मसे ही उत्थान कहा गया है, कहीं भी नाड़ि आदिमें

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६१० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २.

स्थानेषु कदाचिन्नाडीभ्यः प्रतिबुध्यते कदाचित्पुरीततः कदाचिदात्मन इत्यशासिप्यत् ।

तस्मादप्यात्मैव सुप्तिस्थानमिति ॥८ ॥

( ३ कर्मानुस्मृतिशब्दविध्यधिकरणम् । सू ० ९ ) स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ९ ॥

पदच्छेद - स एव, तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः । सूत्रार्थ - ( स एव तु ) जो जीव सोता है वही उठता है, ( कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ) क्योंकि अवशेष कर्म, आत्माकी अनुस्मृति, शब्द और विधिसे ऐसा ही ज्ञात होता है । * तस्याः पुनः सत्संपत्तेः प्रतिबुध्यमानः किं य एव सत्संपन्नः स एव प्रतिबुध्यत उत स वाऽन्यो वेति चिन्त्यते । तत्र प्राप्तं तावत् - अनियम इति । कुतः? यदा हि जल-राशौ कश्चिज्जलबिन्दुः प्रक्षिप्यते, जलराशिरेव स तदा भवति, पुनरुद्धरणे च स एव जल-बिन्दुर्भवतीति दुःसंपादम् । तद्वत्सुप्तः परेणैकत्वमापन्नः संप्रसीदतीति न स एव -रुत्थातुमर्हति । तस्मात्स एवेश्वरो वाऽन्यो वा जीवः प्रतिबुध्यत इत्येवं प्राप्त इदमाह - स एव तु जीवः सुप्तः स्वास्थ्यं गतः पुनरुत्तिष्ठति, नान्यः । कस्मात्? कर्मानुस्मृतिशब्द-विधिभ्यः । विभज्य हेतुं दर्शयिष्यामि । कर्मशेषानुष्ठानदर्शनात्तावत्स एवोत्थातुमर्हति नान्यः । तथाहि - पूर्वेद्युरनुष्ठितस्य कर्मणोऽपरेद्युः शेषमनुतिष्ठन्दृश्यते । सामिकृतस्य कर्मणोऽन्यः शेषक्रियायां प्रवर्तितुमर्हति अतिप्रसङ्गात् । तस्मादेक एव आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्से आई हैं ) यह श्रुति भी है । सुषुप्तिस्थानोंके विकल्प होनेपर तो कभी नाडियोंसे, कमी पुरीतत्से और कमी परमात्मासे जीवका प्रबोध होता है, ऐसा उपदेश करती, उससे भी परमात्मा ही सुषुप्ति स्थान है ॥ ८ ॥

उस सत्संपत्तिसे पुन | जागनेवाला कौन है, क्या जो सत्सम्पन्न हुआ है वही जाग्रत होता है अथवा उससे वह अन्य है? ऐसा विचार किया जाता है । पूर्वपक्षी— उसमें अनियम है, ऐसा प्राप्त होता है । किससे? इससे कि जब जलराशिमें कोई जलबिन्दु प्रक्षिप्त किया जाता है तब वह जल-राशि हो हो जाता है, पुनः उद्धरण करनेपर वही जलबिन्दु है, ऐसा कहना कठिन है । उसीप्रकार सुप्त पुरुष परमात्मा के साथ एकत्वको प्राप्त हुआ अत्यन्त प्रसन्न होता है, अतः वही पुनः उत्थानके लिए युक्त नहीं है । इसलिए वही ईश्वर अथवा अन्य जीव प्रतिबुद्ध होता है | सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - वही जीव सुप्त - स्वास्थ्य ( स्वरूप प्राप्ति ) प्राप्तकर पुनः उठता है अन्य ' नहीं । किससे? कर्म, अनुस्मृति ( प्रत्यभिज्ञा ) शव्द और विधिसे । विभागकर हेतुको दिखलाऊँगा -कर्मशेषके अनुष्ठान दर्शनसे वही जीव उठनेके लिए युक्त है, अन्य नहीं । जैसे कि पूर्व दिनमें अनु-ष्ठित कर्मके अवशिष्ट अंशको दूसरे दिन अनुष्ठित करता हुआ देखा जाता है । एकसे आधे किये गये कमंकी शेष क्रियामें अन्य प्रवृत्त होने में समर्थ नहीं है, क्योंकि अतिप्रसङ्ग है । इसलिए एक ही पूर्व और अपर ( दूसरे ) दिन एक कर्मका कर्ता है, ऐसा ज्ञात होता है । इससे भी वही सुषुप्तिसे सत्यानन्दी- दीपिका जीवके उत्थानकी अपादनता नहीं कही गई है । इससे भी ब्रह्म ही जीवका मुख्य सुषुप्ति स्थान है । सुषुप्ति में जीवके उपाधिलकी अपेक्षा ब्रह्मके साथ जीवका अभेद कहा जाता है, इससे भेद औपाधिक है || ८ || * ब्रह्मसे जीवके उत्थानकी श्रुति होनेसे ब्रह्म ही सुषुप्तिस्थान है, यह ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिसे अन्यका भी उत्थान संभव है, अत: नाड़ी आदि सुषुप्तिस्थान हो सकते हैं । इसप्रकार ' अनियम ' आदि आक्षेप संगतिसे पूर्वपक्ष करते हैं । सिद्धान्ती - ' तस्याः ' आदिसे कहते हैं ।

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अधि ० ३ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६११ पूर्वेद्यरपरेद्युश्चैकस्य कर्मणः कर्तेति गम्यते । इतश्च स एवोत्तिष्ठति यत्कारणमतीतेऽहन्य-हमदोऽद्राक्षमिति पूर्वानुभूतस्य पश्चात्स्मरणमन्यस्योत्थाने नोपपद्यते । नान्यदृष्टमन्योऽ-स्मर्तुमर्हति । सोऽहमस्मीति चात्मानुस्मरणमात्मान्तरोत्थाने नावकल्पते । शब्देभ्यश्च तस्यैवोत्थानमवगम्यते । तथाहि - ' पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव ' ( बृह ० ४ । ३।१६ ) ‘ इमाः सर्वाः प्रजा महरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति ' ( छा ० ८।३।२ ) ' त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको दा यद्यद्भवन्ति तदा-भवन्ति ' ( छा ० ६।९ ।३ ) इत्येवमादयः शब्दाः स्वापप्रबोधाधिकारे पठिता नात्मान्तरोत्थाने सामञ्जस्यमीयुः । कर्मविद्याविधिभ्यश्चैवमेवावगभ्यते । अन्यथा हि कर्मविद्याविधयोऽन-र्थकाः ः स्युः । अन्योत्थानपक्षे हि सुप्तमात्रो मुच्यत इत्यापद्येत । एवं चेत्स्याद्वद - किं कालान्तर फलेन कर्मणा विद्यया वा कृतं स्यात्, अपि चान्योत्थानपक्षे यदि तावच्छरीरा-न्तरे व्यवहरमाणो जीव उत्तिष्ठेत् तत्रत्यव्यवहारलोपप्रसङ्गः स्यात्? अथ तत्र सुप्त उत्तिष्ठेत् कल्पनानर्थक्यं स्यात् । यो हि यस्मिञ्शरीरे सुप्तः स तस्मिन्नोत्तिष्ठत्यन्यस्मि-शरीरे सुप्तोऽन्यस्मिन्नुत्तिष्ठतीति कोऽस्यां कल्पनायां लाभः स्यात् । अथ मुक्त उत्तिष्ठे-दन्तवान्मोक्ष आपद्येत् । निवृत्ताविद्यस्य च पुनरुत्थानमनुपपन्नम् । एतेनेश्वरस्योत्थानं प्रत्युक्तम्, नित्यनिवृत्ताविद्यत्वात् । अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशौ च दुर्निवारावन्योत्थान-पक्षे स्याताम् । तस्मात्स एवोत्तिष्ठति नान्य इति । यत्पुनरुक्तम् - यथा जलराशौ उठता है, क्योंकि पूर्व दिनमें ' मैंने यह देखा था ' इसप्रकार पूर्व अनुभूतका पश्चात् स्मरण अन्यके उठनेपर उपपन्न नहीं होता, कारण कि अन्यसे दृष्ट पदार्थंका अन्य अनुस्मरण करनेके लिए युक्त नहीं है | इसप्रकार ' सोऽहम् ' ( वह मैं हूँ ) इसप्रकार अपना अनुस्मरण अन्य आत्माके उठनेपर संभव नहीं है | श्रुतियोंसे भी उसका ही उत्थान अवगत होता है, क्योंकि ' पुनः प्रतिन्यायं ० ' ( पुनः जिस प्रकार आया था और जहाँसे आया था वह प्रतियोनि जीव उस जागरित स्थानको लौट जाता है ) ' इमाः सर्वाः ० ' ( इसप्रकार यह सारी प्रजा प्रतिदिन जाती हुई उस ब्रह्मलोकको नहीं जानती ) ' त इह व्याघ्रो ० ' ( वे इस लोक में व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो - जो मी [ सुषुप्ति आदि पूर्व ] हुए होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ) इत्यादि सुषुप्ति और जागरितके प्रकरण में पठित श्रुतियाँ अन्य आत्माके उत्थान में संगत नहीं होंगी । कर्मविधि और विद्याविधि से भी ऐसा ही अवगत होता है, अन्यथा कर्मविधि और विद्याविधि अनर्थक हो जायँगी । अन्यके उत्थान पक्षमें . सोये हुए सभी मुक्त हो जायँगे, ऐसा प्रसक्त होगा । यदि ऐसा हो तो इसका उत्तर दो कि कालान्तरमें फल देनेवाले कर्म और विद्यासे क्या प्रयोजन होगा? और अन्य उत्थान पक्षमें यदि अन्य शरीरमें व्यवहार करनेवाला जीव [ इस शरीरमें ] उठे तो वहाँपर होनेवाले व्यवहारका लोप हो जायगा । यदि उसमें सोया हुआ उठे तो कल्पना व्यर्थ होगी, क्योंकि जो जिस शरीरमें सुप्त है वह उसमें नहीं उठता है अन्य शरीरमें सुप्त मन्यशरीरमें उठता है, तो इस कल्पनामें लाभ क्या होगा? यदि मुक्त जीव उठेगा तो अनित्य मोक्ष प्रसक्त होगा, क्योंकि निवृत्त अविद्यावालेका पुनरुत्थान अनुपपन्न है । इससे ईश्वरके उत्थानका निराकरण हुआ, क्योंकि वह नित्य निवृत्त अविद्यावाला है । अन्य उत्थानपक्षमें अकृताभ्यागम और कृतकर्मकी हानि दुर्निवार होगी, इसलिए वही उठता है अन्य नहीं । जो यह कहा गया है कि जैसे जलराशिमें प्रक्षित जलबिन्दु निकाला नहीं जा सकता, वैसे सत् ( ब्रह्म ) में सम्पन्न सत्यानन्दी -दीपिका * अनादि अनिर्वचनीय अविद्या आदि उपाधि भेदसे कल्पित जीव वस्तुतः परमात्मा से मिन्न नहीं है, किन्तु उपाधिके उद्भव और अभिभवसे वह उद्भूत - सा और अभिभव - सा प्रतीत होता है ।

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६१२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ प्रक्षिप्त जलविन्दुद्धा शक्यत एवं सति संपन्नो जीवो नोत्पतितुमर्हतीति तत्परि हियते युक्तं तत्र विवेककारणाभावाज्जलबिन्दोरनुद्धरणम्, इह तु विद्यते विवेककारणं कर्म चाविद्या चेति वैषम्यम् । दृश्यते च दुर्विवेचयोरप्यस्मज्जातीयैः क्षीरोदकयोः संसृ-योसेन विवेचनम् । अपि च न जीवो नाम कश्चित्परस्मादन्यो विद्यते यो जलबिन्दुरिव जलराशेः सतो विविच्येत । सदेव तूपाधिसंपर्काज्जीव इत्युपचर्यत इत्यसकृत्प्रपञ्चितम् । एवं सति यावदेकोपाधिगता बन्धानुवृत्तिस्तावदेकजीवव्यवहारः । उपाध्यन्तरगतायां तु बन्धानुवृत्तो जोवान्तरव्यवहारः । स एवायमुपाधिः स्वापप्रबोधयोवजाङ्करन्यायेनेत्यतः स एव जीवः प्रतिबुध्यत इति युक्तम् ॥ ९ ॥

( ४ मुग्धेऽर्ध संपत्त्यधिकरणम् । सू ० १० ) मुग्धेऽसंपत्तिः परिशेषात् ॥ १० ॥

पदच्छेद - मुग्धे, अर्धसंपत्तिः, परिशेषात् । सूत्रार्थ - ( मुग्धे ) मूर्च्छावस्था में जीवकी ( अर्धसंपत्ति: ) अर्ध सुषुप्ति है, क्योंकि ( परिशेषात् ) परिशेषसे ऐसा ही ज्ञात होता है । अस्ति मुग्धो नाम यं मूच्छित इति लौकिकाः कथयन्ति । स तु किमवस्थ इति परिक्षाया-मुच्यते - तिस्त्रस्तावदवस्थाः शरीरस्थस्य जीवस्य प्रसिद्धाः - जागरितं स्वप्नः सुषुप्तमिति । चतुर्थी शरीरादपसृप्तिः, नतु पञ्चमी काचिदवस्था जीवस्य श्रुतौ स्मृतौ वा प्रसिद्धास्ति । तस्माच्चतसृणामेवावस्थानामन्यतमावस्था मूर्च्छत्येवं प्राप्ते ब्रूमः - न तावन्मुग्धो जागरिता-हुआ जीव उठ नहीं सकता, उसका परिहार किया जाता है— विवेक ( भेद ) कारण के अभावसे वहाँ जलबिन्दुका अनुद्धरण युक्त है, परन्तु यहाँ तो विवेकके कारण कर्म और अविद्या हैं, अतः वैषम्य है । यद्यपि संसृष्ट जल और क्षोरका विवेचन हम लोगों से दुष्कर है, तो भी उनका हँससे विवेचन देखा जाता है । किञ्च जीव कोई परमात्मासे अन्य नहीं है जो जलराशिमें जलबिन्दुके समान सत्से विविक्त-पृथक् किया जाय । सद् ब्रह्म ही तो उपाधिके सम्बन्धसे जोव है, ऐसा उपचार किया जाता है । यह वार वार विस्तारसे कहा गया है । ऐसा होनेपर जबतक एक उपाधिगत बन्धको अनुवृत्ति है तब-. तक एक जीव व्यवहार होता है 1 । बन्धकी अनुवृत्ति अन्य उपाधिगत होनेपर अन्य जीव व्यवहार होता है सुषुप्ति और जागरितमें वहाँ यह उपाधि बोजाङ्करन्याय से है, इसलिए वही जोव प्रतिबुद्ध होता है, यह युक्त है ॥ ९ ॥

मुग्ध वह है जिसे लोग मूच्छित कहते हैं । उसकी अवस्था कौन - सी है? इस परीक्षा में कहा जाता है - शरीर में स्थित जोवको तीन अवस्थाएँ तो प्रसिद्ध हैं -- जागरित, स्वप्न और सुषुप्ति । चतुर्थ अवस्था शरीरसे उत्क्रान्ति है । जीवको कोई पाँचवीं अवस्था तो श्रुति, स्मृतिमें प्रसिद्ध नहीं है । इसलिए मूर्च्छा चार अवस्थाओं में से ही एक अवस्था है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका इसलिए उसका सुषुप्ति में उपाधिके लयसे लय और जाग्रत्में उपाधिके उद्भवसे उद्भव होता है । इस प्रकार उपाधिके उद्भवसे वही जीव उठता है । पूर्वपक्ष में तत्वज्ञान व्यर्थ है, क्योंकि सुषुप्तिसे जीवकी पुनरावृत्ति न होने से मुक्तिसिद्ध है, सिद्धान्तमें तो अज्ञात ब्रह्मरूपस्थितिका अज्ञानके बल से पूनः उत्थान अवश्यंभावी है, अतः अज्ञानकी निवृत्ति के लिए तत्त्वज्ञान अपेक्षित है ॥ ९ ॥

* तीन अवस्थाओंसे आत्माका विवेचन कर, अब मुच्छसे उसका विवेचन करते हैं - मूर्छा प्रसिद्ध अवस्थाओं के अन्तर्गत है अथवा उनसे भिन्न पाँचवी अवस्था है? इस प्रकार संशय होता है । उत्थित पुरुष में ' वही मैं हूँ ' इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञासे जैसे सुषुप्ति में विशेष ज्ञानका अभाव है, वैसे

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अघि ० ४ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो- दीपिकासहित ६१३ वस्थो भवितुमर्हति । नह्ययमिन्द्रियैर्विषयानीक्षते । स्यादेतत् - इषुकारन्यायेन मुग्धों भविष्यति । यथेषुकारो जाग्रदपीष्वासक्तमनस्तया नान्यान्विषयानीक्षत एवं मुग्धो मुस-लसंपातादिजनित दुःखानुभवव्यग्रमनस्तया जाग्रदपि नान्यान्विषयानीक्षत इति, न, अचेतयमानत्वात् । इषुकारो हि व्यापृतमना ब्रवीति- इषुमेवाहमेतावन्तं कालमुपलभमा-नोऽभूवमिति । मुग्धस्तु लब्धसंज्ञो ब्रवीति अन्धे तमस्यहमेतावन्तं कालं प्रक्षिप्तोऽभूवं न किंचिन्मया चेतितमिति । जाग्रतश्चैकविषयविषक्तचेतसोऽपि देहो विधियते, मुग्धस्य तु देहो धरण्यां पतति । 8 तस्मान्न जागर्तिः नापि स्वप्नान्पश्यति, निःसंज्ञकत्वात् । नापि मृतः, प्राणोष्मणोर्भावात् । मुग्धे हि जन्तौ मृतोऽयं स्यान्न वा मृत इति संशयाना ऊष्मास्ति नास्तीति हृदय देशमालभन्ते निश्चयार्थ प्राणोऽस्ति नास्तीति च नासिकादेशम् । यदि प्राणोष्मणोरस्तित्वं नावगच्छन्ति, ततो मृतोऽयमित्यध्यवसाय दहनायारण्यं नयन्ति । अथ तु प्राणभूष्माणं वा प्रतिपद्यन्ते ततो नायं मृत इत्यध्यवसाय संज्ञालाभाय भिषज्यन्ति । पुनरुत्थानाच्च न दिष्टं गतः । नहि यमं गतो यमराष्ट्रात्प्रत्यागच्छति । अस्तु तर्हि सुषुप्तः, निःसंज्ञत्वादमृतत्वाच्च, न, वैलक्षण्यातू । मुग्धः कदाचिच्चिरमपि मूच्छित जागरित अवस्थावाला नहीं हो सकता, क्योंकि यह इन्द्रियोंसे विषयोंका ईक्षण नहीं करता । परन्तु यहाँ ऐसी शङ्का होती है कि मूच्छित इषुकार न्यायसे होगा, जैसे इषुकार ( बाज बनानेवाला ) जागता हुआ मी बाण में आसक्तमनवाला है, इससे अन्य विषयोंको नहीं देखता, वैसे मूसल प्रहार आदिसे उत्पन्न हुए दु: ख अनुभवसे मनके व्यग्र होनेके कारण जागता हुआ मी [ मुन्ध ] अन्य विषयोंको नहीं देखता है, ऐसा नहीं है, क्योंकि वह अचेतयमान चेतनारहित है । किन्तु इषुकार तो व्यापृत मना होकर कहता है - मैं इतने काल पर्यन्त बाण को ही उपलब्ध करता हुआ था । मूच्छित तो चेतना प्राप्त कर कहता है-इतना समय तो मैं घोर अन्धकारमें पड़ा था मैंने कुछ भी नहीं जाना । एक विषयमें आसक्त चित्तवाले जाग्रत पुरुषका भी देह खड़ा रहता है, किन्तु मूच्छितका देह तो पृथिवीपर गिर जाता है । इसलिए मुग्ध जागता नहीं और स्वप्नों को भी नहीं देखता, क्योंकि वह चेतना रहित है । मृतक भी नहीं है, क्योंकि उसमें प्राण और गर्मी विद्यमान हैं, मुग्ध प्राणी के विषयमें यह मर गया है अथवा नहीं मरा, इस प्रकार संशय करते हुए लोग इसमें गर्मी है कि नहीं, यह निश्चय करनेके लिए हृदय मागका स्पर्श करते हैं । प्राण है कि नहीं, इस निश्चयके लिए नासिका देशका स्पर्श करते हैं । यदि प्राण और गर्मीका अस्तित्व अनुभव नहीं करते तो यह भर गया है, ऐसा निश्चयकर उसे जलाने के लिए जंगलमें ले जाते हैं । यदि उसमें प्राण और गर्मी प्राप्त करते हैं, तो यह मृत नहीं है, ऐसा निश्चय कर चेतना प्राप्त करने के लिए चिकित्सा करते हैं । पुनः उत्थान होनेसे मुग्ध मृत नहीं है, क्योंकि यमको प्राप्त कर पुनः यमलोक से लौटकर नहीं आता । तब मुग्ध सुषुप्त हो, क्योंकि वह चेतना रहित और अमृत ( मरा नहीं ) है । ऐसा नहीं, क्योंकि दोनोंमें वैलक्षण्य है । मुग्ध प्राणी कभी चिरकालतक उच्छ्वास नहीं लेता, उसका शरीर काँपता है, मुख भयानक और नेत्र विस्फारित होते हैं । किन्तु सुषुप्त तो प्रसन्न सत्यानन्दी - दीपिका मूर्च्छामें भी है, इस समान लिङ्गसे मूर्छा सुषुप्ति ही है । सिद्धान्ती - प्रसिद्ध इन चार अवस्थाओंसे मूर्छा पृथक् अवस्था है । उनमेंसे प्रथम जागरितका ' न तवात् ' इत्यादि माध्यसे निवारण करते हैं । इषुकारमें इन्द्रिय जन्य ज्ञान और देह धारण आदि हैं, किन्तु मूच्छित में दोनों नहीं हैं, इसलिए इषुकार उदारहण विषम है । * जैसे सुषुप्ति में विशेष ज्ञानका अभाव है, वैसे मूर्च्छा में भी है, इस प्रकारकी दोनों में समानता होनेपर भी लक्षणों और निमित्तोंके भेदसे इन दोनोंका परस्पर भेद है । इस तरह समानता और

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६१४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ नोच्छ्वसिति, सवेपथुरस्य देहो भवति, भयानकं च वदनं विस्फारिते नेत्रे । सुषुप्तस्तु प्रसन्नवदनस्तुल्यकारं पुनः पुनरुच्छ्वसिति, निमीलिते अस्य नेत्रे भवतः, न चास्य देहो वेपते । पाणिपेषणमात्रेण च सुषुप्तमुत्थापयन्ति, नतु मुग्धं मुद्गरघातेनापि । निमित्तभे-दश्च भवति मोहस्वापयोः, मुसलसंपातादिनिमित्तत्वान्मोहस्य, श्रमादिनिमित्तत्वाच्च स्वापस्य । नच लोकेऽस्ति प्रसिद्धिर्मुग्धः सुप्त इति । परिशेषादर्धसंपत्तिमुग्धतेत्यवग-च्छामः । निःसंज्ञत्वात्संपन्न इतरस्माद्वैलक्षण्यादसंपन्न इति ॥ कथं पुनरर्धसंपत्तिमुग्ध-तेति शक्यते वक्तुम्? यावता सुप्तं प्रति तावदुक्तं श्रुत्या - ' सता सोम्य तदा संपन्नो भवति ' ( छा ० ६ | ८ | १ ) इति, ' अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति ' ( बृह ० ४।३।२२ ), ' नैतं सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतम् ' ( छा ० ८ | ४ | १ ) इत्यादि । * जीवे हि सुकृतदुष्कृतयोः प्राप्तिः सुखित्वदुःखित्वप्रत्ययोत्पादनेन भवति । न च सुखित्वप्रत्ययो दुःखित्वप्रत्ययो वा सुषुप्ते विद्यते, मुग्धेऽपि तौ प्रत्ययौ नैव विद्येते । तस्मादुपाध्युपश-मात्सुषुप्तवन्मुग्धेऽपि कृत्स्न संपत्तिरेव भवितुमर्हति नार्धर्सपत्तिरिति । अत्रोच्यते -- न ब्रूमो मुग्धेऽर्धसंपत्तिर्जीवस्य ब्रह्मणा भवतीति । किं तर्हि? अर्धेन सुषुप्तपक्षस्य भवति मुग्ध-त्वमर्धेनावस्थान्तरपक्षस्येति ब्रूमः । दर्शिते च मोहस्य स्वापेन साम्यवैषम्ये । द्वारं चैतन्म-रणस्य । यदाऽस्य सावशेषं कर्म भवति, तदा वाङ्मनसे प्रत्यागच्छतः । यदा तु निरवशेषं कर्म भवति, तदा प्राणोष्माणावपगच्छतः । तस्मादर्ध संपत्ति ब्रह्मविद इच्छन्ति । यत्तूक्तम्-वदन और समकालमें पुनः पुनः उच्छ्वास लेता है, उसके नेत्र निमोलित होते हैं, उसका शरीर काँपता नहीं है, हाथ के स्पर्शमात्रसे उसे लोग उठाते हैं । परन्तु मुग्धको तो मुद्गरके प्रहारसे मी नहीं उठा सकते । मूर्च्छा और सुषुप्ति के कारण भी भिन्न - भिन्न होते हैं, क्योंकि मूर्च्छाका मूसल प्रहार आदि निमित्त हैं और सुषुप्तिका परिश्रम आदि निमित्त हैं । और लोकमें यह प्रसिद्ध नहीं है कि मुग्ध सुप्त है, इसलिए परिशेषसे मूर्च्छा अर्धं सुषुप्ति है, ऐसा हम समझते हैं । चेतना रहित होने से वह सम्पन्न है और सुषुप्तसे वैलक्षण्य होनेसे असम्पन्न है । परन्तु मूर्च्छा अर्धं सुषुप्ति है, यह कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! उस समय सत्के साथ सम्पन्न होता है ) ' अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति ' ( यहाँ सुषुप्ति में चोर अचोर होता है ) और ( इस सेतुरूप आत्माका दिन - रात अतिक्रमण नहीं करते । इसे न जरा न मृत्यु, न शोक और न सुकृत अथवा दुष्कृत हो प्राप्त हो सकते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सुप्तके प्रति ऐसा कहा गया है । जीवमें सुखित्व और दुःखित्व प्रतीति की उत्पत्ति से सुकृत और दुष्कृतकी प्राप्ति होती है, सुखित्व प्रत्यय अथवा दुःखित्व प्रत्यय सुषुप्तके विद्यमान नहीं हैं, इस प्रकार मुग्धमें भी वे दोनों प्रत्यय नहीं हैं । इसलिए सुषुप्तके समान मुग्धमें भी उपाधिके उपशम होने से सम्पूर्ण सुषुप्ति होनी चाहिए, अधं सुषुप्ति नहीं । इस पर कहते हैं— मूर्च्छामेिं जोवकी ब्रह्मके साथ अद्ध सम्पत्ति होती है, ऐसा हम नहीं कहते, किन्तु हम ऐसा कहते हैं कि मुग्धत्व अर्ध पक्ष में और अर्ध अन्य अवस्था पक्षमें होता है । मूर्च्छाका सुषुप्तिसे साम्य और वैषम्य दिखलाया गया है । यह मरणका द्वार है । जब इस मूच्छितका 2 अवशेष कर्म होता है तब वाणी और मन अपने स्थान में लौट आते हैं और जब इसका अवशेष कर्म नहीं होता है तब प्राण और औष्ण्य चले जाते हैं । इसलिए ब्रह्मवेत्ता मूर्च्छाको अर्धं सुषुप्ति कहते हैं । और जो यह कहा गया है कि कोई पाँचवीं अवस्था सत्यानन्दी - दीपिका विलक्षणतासे मूर्च्छा आधि सुषुप्ति है । मुग्ध सुषुप्ति के सब धर्मोसे असम्पन्न होनेसे सुषुप्त नहीं है, इसी प्रकार मृतावस्थाके सब धर्मोसे रहित होने से वह मृतक भी नहीं है । इसलिए मूर्च्छा कुछ अंश में सुसुप्तिके सम होनेसे अर्धं सुषुप्ति ही है । इस पर पूर्वंसक्षी ' कथं पुनः ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं । * चेतना आदि रहित सुषुप्तिके आधे धर्मोके समान मूच्छित सुषुप्ति के आधे धर्मोसे

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अधि ० ५ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६१५ न पञ्चमी काचिदवस्था प्रसिद्धास्तीति - नैष दोषः कादाचित्कीयमवस्थेति न प्रसिद्धा स्यात् । प्रसिद्धा चैषा लोकायुर्वेदयोः । अर्धसंपत्त्यभ्युपगमाच्च न पञ्चमी गण्यत इत्यनवद्यम् ॥ १० ॥

( ५ उभयलिङ्गाधिकरणम् । सू ० ११-२१ ) न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्ग सर्वत्र हि ॥ ११ पदच्छेद - न, स्थानतः, अपि, परस्य, उमयलिङ्गम्, सर्वत्र, हि । सूत्रार्थ - ( स्थानतः ) स्वभाव से अथवा उपाधिभेदसे भी ( परस्य ) लिङ्गम् ) सविशेष और निर्विशेष दो रूप उपपन्न ( न ) नहीं होते, ( हि ) क्योंकि इत्यादि सब उपनिषदों में निर्विशेष ब्रह्मका ही उपदेश है । * येन ब्रह्मणा सुषुप्त्यादिषु जीव उपाध्युपशमात्संपद्यते, ॥ पर ब्रह्ममें ( उभय-( सर्वत्र ) ' अशब्दम् ' तस्येदानीं स्वरूपं श्रुतिवशेन निर्धार्यते । सन्त्युभयलिङ्गाः श्रुतयो ब्रह्मविषयाः - ' सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः ' ( छा ० ३।१४ । २ ) इत्येवमाद्याः सविशेषलिङ्गाः । ' अस्थूलमनण्वहस्वमदीर्घम् ' ( बृह ० ( ३८८ ) इत्येवमाद्याश्च निर्विशेषलिङ्गाः । किमासु श्रुतिषूभयलिङ्गं ब्रह्म प्रतिपत्तव्यमु तान्यतरलिङ्गम्? यदाप्यन्यतरलिङ्गं, तदापि किं सविशेषमुत निर्विशेषमिति मीमांस्यते । तत्रोभयलिङ्गश्रुत्यनुग्रहादुभयलिङ्गमेव ब्रह्मेत्येवं प्राप्ते ब्रमः - न तावत्स्वत एव परस्य ब्रह्मण उभयलिङ्गत्वमुपपद्यते । न ह्येकं वस्तु स्वत एवं रूपादिविशेषोपेतं तद्विपरीतं चेत्यवधारयितुं शक्यं, विरोधात् । अस्तु तर्हि स्थानतः पृथिव्याद्युपाधियोगादिति, . तदपि नोपपद्यते - नह्युपाधियोगादप्यन्यादृशस्य वस्तुनोऽन्यादृशः स्वभावः संभवति । प्रसिद्ध नहीं है । यह दोष नहीं है, क्योंकि यह अवस्था कादाचित्क होनेसे भले प्रसिद्ध न हो परन्तु लोक और आयुर्वेद ग्रन्थोंमें यह प्रसिद्ध है । अर्ध संपत्ति स्वीकार होनेसे पाँचवीं अवस्था नहीं गिनी जाती, इसलिए कोई दोष नहीं है । १० । सुषुप्ति आदि उपाधिके उपशान्त होनेसे जीव जिस ब्रह्मके साथ सम्पन्न होता है, अब उसका स्वरूप श्रुतिकी सामथ्यसे निर्धारित किया जाता है । ब्रह्मविषयक श्रुतियाँ दो लिङ्गवाली हैं- ' सर्व कर्मा ० ' ( समस्त विश्व इसका कर्म है, सब दोषोंसे रहित इसका काम है, सब गन्ध इसका सुखकर है, और वह सर्वरस है ) इत्यादि श्रुति सविशेष लिङ्गक है । और ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है और न दीर्घं है ) इत्यादि श्रुति निर्वेशेष लिङ्गक है! क्या इन श्रुतियोंमें दोनों लिङ्गवाला ब्रह्म समझना चाहिए अथवा दोनोंमें एक लिङ्गवाला? यदि दोनोंमें एक लिङ्गवाला समझा जाय तो भी क्या वह सविशेष है अथवा निर्विशेष, ऐसा विचार किया जाता है । उसमें दोनों लिङ्गवाली श्रुतियों के अनुग्रहसे दोनों लिङ्गवाला ब्रह्म समझना चाहिए । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं — परब्रह्मका स्वतः उमर्यालिङ्गत्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि स्वतः ही एक वस्तु रूप आदि विशेष युक्त और रूप आदि विशेष रहित हो, इसप्रकार विरोध होनेसे अवधारण नहीं किया जा सकता । यदि कहो कि स्थानत: --- पृथिवी आदि उपाधिके योगसे ऐसा हो, तो वह भी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि सत्यानन्दी - दीपिका सम्पन्न होता है और कंपन आदि धर्मोके साम्य होनेसे आधा मरण पक्षमें है, इस प्रकार मूर्छा अर्ध-सुषुप्ति कही गई है । पूर्वपक्ष में प्रसिद्ध अवस्थाओंसे पृथक् आत्माका मूर्च्छासे विवेक करनेके लिए की असिद्धि फल है, सिद्धान्तमें वह पृथक् निश्चित है ॥ १० ॥

* पूर्व अधिकरणोंमें स्वप्न आदि अवस्थाओंकी उक्ति से उनसे अलिप्त स्वप्रकाश ब्रह्मात्मक उद्देश्यरूप ' त्वम् ' पदार्थका परिशोधनकर अब विधेय ' तत् ' पदार्थका परिशोधन आरम्भ करते हुए पहले उसका निर्विशेषरूप कहते हैं ॥ ११ ॥

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६१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ नहि स्वच्छः सन्स्फटिकोऽलक्तकाद्युपाधियोगादस्वच्छो भवति, भ्रममात्रत्वादस्वच्छता-भिनिवेशस्य, उपाधीनां चाविद्याप्रत्युपस्थापितत्वात् । अतश्चान्यतर लिङ्गपरिग्रहेऽपि समस्तविशेषरहितं निर्विकल्पकमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यं, न तद्विपरीतम् । सर्वत्र हि ब्रह्म-स्वरूपप्रतिपादनपरेषु वाक्येषु ' अशब्दम स्पर्शमरूपमव्यम् ( क ० ३।१५ | मुक्तिको ० २०७२ ) इत्येवमादिष्वपास्तसमस्तविशेषमेव ब्रह्मोपदिश्यते ॥ ११ ॥

न भेदादिति चेन्न प्रत्येक मतद्वचनात् ॥ १२ ॥

पदच्छेद - न भेदात् इति चेत्, न, प्रत्येकम्, अतद्वचनात् । सूत्रार्थ - सभी वेदान्त वाक्योंसे निर्विशेष ब्रह्म ही उपदिष्ट है, ( न ) यह कथन युक्त नहीं है, ( भेदात् ) क्योंकि ' चतुष्पाद् ब्रह्म ' इसप्रकार श्रुतिमें भेदका कथन है । ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो, तो नहीं, क्योंकि ( प्रत्येकम् ) प्रत्येक उपाधि में ( अतद्वचनात् ) ' यश्चायमस्यां ' इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्म अभेदका ही श्रवण है । अथापि स्याद्यदुक्तं निर्विकल्पमेकलिङ्गमेव ब्रह्म, नास्य स्वतः स्थानतो वोभयलिङ्ग-त्वमस्तीति, तन्नोपपद्यते । कस्मात्? भेदात् । भिन्ना हि प्रतिविद्यं ब्रह्मण आकारा उपदिश्यन्ते । चतुष्पाद्ब्रह्म षोडशकलं ब्रह्म वामनीत्वादिलक्षणं ब्रह्म त्रैलोक्यशरीर-वैश्वानरशब्दोदितं ब्रह्मेत्येवं जातीयकाः । तस्मात्सविशेषत्वमपि ब्रह्मणोऽभ्युपगन्तव्यम् । ननूक्तं नोभयलिङ्गत्वं ब्रह्मणः संभवतीति, अयमप्यविरोधः, उपाधिकृतत्वादाकारभेदस्य । अन्यथा हि निर्विषयमेव भेदशास्त्रं प्रसज्येतेति चेत् - नेति ब्रूमः कस्मात्? प्रत्येक मतद्व-चनात् । प्रत्युपाधिभेदं ह्यभेदमेव ब्रह्मणः श्रावयति शास्त्रम् - ' यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजो-मयोऽमृतमयः पुरुषो यश्वायमध्यात्मं शरीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ' ( बृह ० २५ । १ ) इत्यादि । अतश्च न भिन्नाकारयोगो ब्रह्मणः शास्त्रीय इति शक्यते वक्तुम्, भेदस्योपासनार्थत्वादभेदे तात्पर्यात् ॥ १२ ॥

उपाधि योग भी अन्य प्रकारकी वस्तुका अन्य प्रकारका स्वभाव संभव नहीं है, स्वभावतः स्वच्छ होता हुआ स्फटिक अलक्तक ( लाख ) आदि उपाधिके योगसे अस्वच्छ नहीं हो जाता, उसमें अस्वच्छ का अभिनिवेश भ्रममात्र है, कारण कि उपाधियाँ अविद्यासे उपस्थापित होती हैं । अतः अन्यतर लिङ्गका परिग्रह करनेपर भी समस्त विशेषोंसे रहित निर्विशेष ही ब्रह्म समझना चाहिए उससे विपरीत नहीं । क्योंकि ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादन परक ' अशब्दमस्पर्शम ० ' ( वह शब्दरहित, स्पर्शरहित और रूप रहित अव्यय है ) इत्यादि वाक्योंमें सर्वत्र समस्त विशेष रहित ब्रह्म ही उपदिष्ट है ॥ ११ ॥

मले ही ऐसा हो, परन्तु जो यह कहा गया है कि ब्रह्म निर्विशेष एक लिङ्ग ही है और वह स्वतः अथवा उपाधिसे उभय लिङ्ग नहीं है, वह उपपन्न नहीं होता, किससे भेदसे । प्रत्येक विद्या में ब्रह्मके आकार भिन्न भिन्न ही उपदेश किये जाते हैं । जैसे ' ब्रह्म चतुष्पाद है, ब्रह्म सोलह कालाओं-वाला है, ब्रह्म वामनीयत्व आदिरूप है, ब्रह्म त्रैलोक्य शरीरवाला है और ब्रह्मवैश्वानर शब्दसे कथित है ' इसप्रकारके आकार ब्रह्म के उपदिष्ट हैं । इसलिए ब्रह्म सविशेष है ऐसा मी स्वीकार करना चाहिए | परन्तु यह जो कहा गया है कि ब्रह्म उमय लिङ्गवाला नहीं हो सकता । यह भी विरोध नहीं है, क्योंकि आकार भेद उपाधिकृत है, अन्यथा भेदशास्त्र निर्विषयक ही प्रसक्त होगा । सिद्धान्ती -ऐसा यदि कहो, तो नहीं, ऐसा हम कहते हैं । किससे? इससे कि प्रत्येक में ' अतद्वचन - ऐसा नहीं ' ऐसा वचन है । ' यश्चायमस्यां ० ' ( इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और शरीरमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि यह अत्मा है ) इत्यादि शास्त्र प्रत्येक उपाधि भेदमें ब्रह्म अभेदका ही श्रवण कराता है । इसलिए ब्रह्ममें भिन्न आकारका योग शास्त्रीय है, ऐसा नहीं कहा जा