श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 651–660
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 651–660
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अधि ० ५ सू०१३-१४ } भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६१७ अपि चैमेके ॥ १३ ॥
पदच्छेद - अपि च, एवम्, एके । सूत्रार्थ - ( अपि च एके ) और कोई शाखाबाले ' मृत्युमाप्नोति ' ' नेह नानास्ति किञ्चन ' ( एवम् ) इस प्रकार श्रुति वाक्यसे भेदकी निन्दा पूर्वक परमात्मा के अभेदका कथन करते हैं । अपि चैवं भेददर्शननिन्दापूर्वकमभेददर्शनमेवैके शाखिनः समामनन्ति - ' मनसैवेद-माप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( क ० ४ | ११ ) इति । तथाऽन्येऽपि ' मोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्म मे तत् ' ( श्वे ० १।१२ ) इति समस्तत्य भोग्यभोक्तृनियन्तृलक्षणस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मैकस्वभावतामधीयते ॥ १३ ॥
कथं पुनराकारवदुपदेशिनीष्वनाकारोपदेशिनीषु च ब्रह्मविषयासु श्रुतिषु सती-ष्वनाकारमेव ब्रह्मावधार्यते, न पुनर्विपरीतमिति? अत उत्तरं पठति-अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ १४ ॥
पदच्छेद - अरूपवत् एव हि तत्प्रधानत्वात् । सूत्रार्थ - ( अरूपवदेव ) रूप आदि आकार रहित ब्रह्मका ही अवधारण करना चाहिए, ( तत्प्रधानत्वात् ) क्योंकि ' अस्थूलम ' इत्यादि श्रुतिमें निर्विशेष ब्रह्म प्रधान है । * रूपाद्याकाररहितमेव ब्रह्मावधारयितव्यं न रूपादिमत् । कस्मात्? तत्प्रधान-त्वात् । ‘ अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम् ' ( बृह ० ३ | ८ | ८ ) ' अशब्दम स्पर्शमरूपमव्ययम् ' ( कठ ० ३ | १५ | मुक्ति ० २ | ७२ ) ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ' ( छा ० ८ | १४ | १ ), ' दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ' ( मुण्ड ०२।१।२ ), ' तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा सकता है, क्योंकि भेद उपासना के लिए है और अभेद में तात्पर्य है ॥ १२ ॥
और इसप्रकार भेद दर्शनकी निन्दा पूर्वक अभेद दर्शनका ही कोई शाखावाले श्रवण कराते हैं-- ' मनसैवेदमाप्तव्यं ' ( मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करना चाहिए, इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है । जो पुरुष इसमें भेद - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इसप्रकार अन्य शाखा-वाले भी ' भोक्ता भोग्यं ० ' ( मोक्ता [ जीव ] भोग्य [ जगत् ] और प्रेरक [ ईश्वर ] का विचार कर मेरेसे यह तीन प्रकारसे कहा हुआ वह सब ब्रह्म ही है ) इसप्रकार भोग्य, भोक्ता और नियन्तारूप सम्पूर्ण प्रपञ्च ब्रह्मक स्वरूप है, ऐसा अध्ययन करते हैं ॥ १३ ॥
परन्तु साकारका उपदेश करनेवाली और निराकारका उपदेश करनेवाली ब्रह्मविषयक श्रुतियों-के होनेपर निराकार ब्रह्मका ही कैसे अवधारण किया जाता है और उसके विपरीत नहीं? इसलिए इसका उत्तर कहते हैं-रूप आदि आकार रहित ही ब्रह्मका अवधारण करना चाहिए, रूप आदिसे युक्तका नहीं, किससे? इससे कि उसकी प्रधानता है । जैसे ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल है, न ह्रस्व है और न दीर्घं है ) ' अशब्दम ० ' ( वह शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित और अव्यय है ) ' आकाशो वै ० ' ( आकाश नाम और रूपात्मक प्रपञ्चका निर्वाहक है, वे नाम और रूप जिसके भीतर हैं वह ब्रह्म है ) ' दिव्यो ह्यमूर्त: ० ' ( वह निश्चय ही स्वयं प्रकाश, अमृत्तं, बाहर - भीतर विद्यमान तथा अज पुरुष है ) ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित, कार्यरहित, विजातीय द्रव्यसे रहित और अबाह्य है, यह आत्मा ही सबका सत्यानन्दी - दीपिका * दोनों प्रकारकी श्रुतियोंके होनेपर निर्विशेष ब्रह्मके ग्रहण करनेमें ' तत्परातत्परविरोधे तत्परं बलवत् ' ( तत्पर और अवत्पर वाक्योंके विरोध होनेपर तत्पर वाक्य बलवान् होता है ) यह न्याय
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६१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ ब्रह्म सर्वानुभू: ' ( बृह ० २ / ५ / १ ९ ) इत्येवमादीनि वाक्यानि निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मतत्त्वप्रधानानि नार्थान्तरप्रधानानीत्येतत्प्रतिष्ठापितं ' तत्तु समन्वयात् ' ( ब्रह्मसूत्र १ | १ | ४ ) इत्यत्र । तस्मा-देवजातीयकेषु वाक्येषु यथाश्रुतं निराकारमेव ब्रह्मावधारयितव्यम् । इतराणि त्वाकार-वद्ब्रह्मविषयाणि वाक्यानि, न तत्प्रधानानि । उपासनाविधिप्रधानानि हि तानि तेष्व-सति विरोधे यथाश्रुतमाश्रयितव्यम् । सति तु विरोधे तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बली-यांसि भवन्ति - इत्येष विनिगमनायां हेतुः । येनोभयीष्वपि श्रुतिषु सतीष्वनाकारमेव ब्रह्मावधार्यते, न पुनर्विपरीतमिति ॥ १४ ॥
का तर्ह्यकारवद्विषयाणां श्रुतीनां गतिरित्यत आह-प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ॥ १५ ॥
पदच्छेद - प्रकाशवत्, च, अवैयथ्यम् । [ क्वचित्पुस्तके ' प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ' इति पाठ: ] सूत्रार्थ – ( प्रकाशवत् ) जैसे सूर्य आदि प्रकाश वक्र अङ्गुलि आदि उपाधि वक्र - सा प्रतीत होता है, वैसे ब्रह्म ( च ) मी पृथिवी आदि उपाधिके सम्बन्धसे तत् तत् आकार - सा हो जाता है । वह आकार उपासनाके लिए है । ( अवैयथ्यम् ) अत । साकार विषयक श्रुतियाँ व्यथं नहीं हैं । यथा प्रकाशः सौरश्चान्द्रमसो वा वियद्व्याप्यवतिष्ठमानोऽङ्गुल्याद्युपाधिसंबन्धात्तेष्वृ-जुवादिभावं प्रतिपद्यमानेषु तद्भावमिव प्रतिपद्यते, एवं ब्रह्मापि पृथिव्याद्युपाधिसंबन्धात्त-दाकारतामिव प्रतिपद्यते, तदालम्बनो ब्रह्मण आकारविशेषोपदेश उपासनार्थो न विरुध्यते । एवमवैयर्थ्यमाकारवद्ब्रह्मविषयाणामपि वाक्यानां भविष्यति । नहि वेदवाक्यानां कस्य-चिदर्थवत्त्वं कस्यचिदनर्थवत्त्वमिति युक्तंप्रतिपत्तुम्, प्रमाणत्वाविशेषात् । नन्वेवमपि यत्पु-अनुभव करनेवाला ब्रह्म है ) इत्यादि वाक्य निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्व प्रधानक हैं, अन्य अर्थ प्रधानक नहीं हैं, ऐसा ' तत्तु समन्वयात् ' इस सूत्र में प्रतिष्ठापित किया गया है । इसलिए इसप्रकारके वाक्योंमें यथा-श्रुत निराकार ब्रह्मका ही अवधारण करना चाहिए । साकार ब्रह्मविषयक अन्य वाक्य तो साकार ब्रह्म प्रधान नहीं है, वे उपासना विधि प्रधान हैं । उनके विरोध न होनेपर यथाश्रुतका आश्रय करना चाहिए । विरोध होनेपर तो तत्प्रधान - निराकार प्रधान वाक्य अतत्प्रधान- निराकार अप्रधान वाक्योंसे बलवान् होते हैं, यही विनिगमनमें हेतु है, जिससे दोनों प्रकारकी श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर भी निराकार ब्रह्म ही अवधारित होता है, उससे विपरीत साकार ब्रह्म अवधारित नहीं होता ॥ १४ ॥
तब साकार ब्रह्मविषयक श्रुतियोंकी क्या गति होगी? इसपर कहते हैं— जैसे आकाशको व्याप्त कर अवस्थित हुया सूर्य अथवा चन्द्रमाका प्रकाश अङ्गुलि आदि उपाधिके सम्बन्धसे उन अङ्गुलि बादिमें सीधा, वक्र आदि भाव प्राप्त होनेपर तद्भाव - सा प्राप्त होता है, वैसे ब्रह्म भी पृथिवी आदि उपाधिके सम्बन्धसे उसके आकारताको प्राप्त - सा होता है । उसका आलम्बन उपासनाके लिए ब्रह्ममें आकार विशेषका उपदेश विरुद्ध नहीं है । इसप्रकार आकारवद् ब्रह्मविषयक वाक्य भी प्रयोजन रहित नहीं होंगे । वेद वाक्योंमें कोई सार्थक और कोई निरर्थक है, ऐसा समझना युक्त नहीं है, क्योंकि दोनोंमें प्रमाणत्व समान है । परन्तु ऐसा माननेपर भी जो पहले प्रतिज्ञा की गई है कि उपाधि योग भी ब्रह्म उमयलिङ्ग नहीं है, वह विरुद्ध है? नहीं ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका नियामक है । इसलिए ' अस्थूलम ' इत्यादि तत्पर- निराकार ब्रह्मपरक वाक्य ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादि अतत्पर - अनिराकार परक ( साकार ) वाक्योंसे बलवान् होते है । अतः नियामकके होनेसे निर्विशेष ब्रह्मका व्यवधारण करना चाहिए ॥ १४ ॥
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अधि ० ५ सू ० १६-१७ ] भाषानुवाद -सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६१ ९ रस्तात्प्रतिज्ञातम् - नोपाधियोगादप्युभयलिङ्गत्वं ब्रह्मणोऽस्तीति, तद्विरुध्यते । नेति क्रमः-उपाधिनिमित्तस्य वस्तुधर्मत्वानुपपत्तेः, उपाधीनां चाविद्याप्रत्युपस्थापितत्वात् । सत्या-मेव च नैसर्गिक्यामविद्यायां लोकवेदव्यवहारावतार इति तत्र तत्रावोचाम ॥१५ ॥
आह च तन्मात्रम् ॥ १६ ॥
पदच्छेद - आह, च, तन्मात्रम् । सूत्रार्थ - ( च ) इसलिए ' यथा सैन्धवघनः ' इत्यादि श्रुति ( तन्मात्रम् ) निर्विशेष ब्रह्मको ( आ ) कहती है । आह च श्रुतिश्चैतन्यमात्रं विलक्षणरूपान्तररहितं निर्विशेषं ब्रह्म - ' स यथा सैन्धव-घनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एबैवं वा भरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ' ( बृह ० ४।५।१३ ) इति । एतदुक्तं भवति नास्यात्मनोऽन्तर्बहिर्वा चैतन्यादन्यद्रूपमस्ति, चैतन्य-मेव तु निरन्तरमस्य स्वरूपम् । यथा सैन्धवघनस्यान्तर्बहिश्च लवणरंस एव निरन्तरो भवति, न रसान्तरं तथैवेति ॥ १६ ॥
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ १७ ॥
पदच्छेद - दर्शयति, च, अथो, अपि, स्मयंते । सूत्रार्थ - ' अयात आदेश: ' इत्यादि श्रुति निषेध मुखसे निर्विशेष ब्रह्मको ही ( दर्शयति ) दिख-लाती है । ( अथो ) तथा ( स्मयते ) ' बनादिमत्परं ब्रह्म ' इत्यादि स्मृतिमें ( अपि ) भी ऐसी ही उपदेश है । दर्शयति च श्रुतिः पररूपप्रतिषेधेनैव ब्रह्म, निर्विशेषत्वात् - ' अथात आदेशो नेति नेति ' ( बृह ० २ | ३ | ६ ) इति, ' अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ' ( के ० १।३ ) ' यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ' ( तै ० २ | ४ | १ ) इत्येवमाद्या । बाष्कलिना च बाध्वः पृष्टः सन्नवचनेनैव ब्रह्म प्रोवाचेति श्रूयते - ' स होवाचाधीहि भो इति स तूष्णीं बभूव तं ह द्वितीये वा तृतीये वा वचन उवाच ब्रूमः खलु त्वं तु न विजानासि । उपशान्तोऽयमात्मा ' इति । तथा स्मृतिष्वपि परप्रतिषेधे-हम कहते हैं— उपाधिनिमित्तक वस्तुका धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि उपाधियाँ अविद्याद्वारा उप-स्थापित हैं | नैसर्गिक ( स्वाभाविक ) अविद्याके होनेपर ही लौकिक और वैदिक व्यवहारोंका अवतार होता है, ऐसा हमने तत् तत् स्थलमें कहा है ॥ १५ ॥
' स यथा सैन्धवघनः ० ' ( जैसे लवण पिण्ड आन्तर और बाहरसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयी! वैसे ही यह आत्मा आन्तर - बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है ) इसप्रकार यह श्रुति विलक्षण रूपान्तरसे रहित चैतन्यमात्र निर्विशेष ब्रह्मको कहती है । तात्पर्य यह है - इस आत्माका आन्तर अथवा बाहर चैतन्यरूपसे अन्यरूप नहीं है, किन्तु चैतन्य हो इसका निरन्तर स्वरूप है । जैसे लवण पिण्डके आन्तर और बाहर लवण रस ही निरन्तर होता है, अन्य रस नहीं होता, वैसे ही | १६ | और ' अथात आदेशो ० ' ( इसके अनन्तर ब्रह्म मूर्त नहीं है और अमृतं मी नहीं है यह उपदेश है ) अन्यदेव ० ' ( वह विदित - कार्यसे अन्य और अविदित - कारणसे अन्य है ) और ' यतो वाचो ० ' ( जहाँसे मन सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती हैं ) इत्यादि श्रुति पररूप- आनत्मरूप प्रतिषेघसे ही ब्रह्मको दिखलाती है, क्योंकि वह निविशेषरूप है । वाष्कलिसे पूछे गये बाध्वने अवचनसे ही ब्रह्म-को कहा ' स होवाच ० ' ( उसने कहा - हे भगवन् बाध्व! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिए, ऐसा पूछे जाने पर वह तूणी रहा, द्वितीय अथवा तृतीय वार पूछनेपर उसने उससे कहा- हम कह रहे हैं, किन्तु तुम उसे नहीं जान रहे हो यह बात्मा उपशान्त- द्वैतरहित है ) ऐसी श्रुति है । इसप्रकार ' ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि ० ' ( जो ज्ञेय है उसे यथावत् कहूँगा जिसे जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त
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६२० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य नैवोपदिश्यते - ' ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ' ( गी ० १३।१२ ) इत्येवमाद्यासु । तथा विश्वरूपधरो नारायणो नारदमुवाचेति स्मर्यते-' माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं मां ज्ञातुमर्हसि ॥ ' इति ॥१७ ॥
अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ १८ ॥
पदच्छेद - अतः 1 एव च, उपमा, सूर्यकादिवत् । सूत्रार्थ - ( अतएव ) क्योंकि इस चैतन्यस्वरूप आत्माका पर प्रतिषेधसे उपदेश किया जाता है, इसलिए इसकी ( सूर्यकादिवत् ) जलगत सूर्यं प्रतिबिम्बके साथ ( उपमा ) उपमा दी जाती है । यत एव चायमात्मा चैतन्यरूपो निर्विशेषो वाङ्मनसातीतः परप्रतिषेधोपदेश्योऽत एव चास्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकों विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्य कादिवदित्युपमो-पादीयते मोक्षशास्त्रेषु - ' यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा ' इति । ' एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ' ( ब्र ० वि ० १२ ) इत्येवमादिषु ॥ १८ ॥
अत्र प्रत्यव स्थीयते -अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - अम्बुवत्, अग्रहणात्, तु, न, तथात्वम् । सूत्रार्थ - ( अम्बुवत् ) जैसे जलका सूयंसे पृथक् ग्रहण होता है, वैसे यहाँ उपाधिका पृथक् ( अग्रहणात् ) ग्रहण नहीं होता, इसलिए ( न तथात्वम् ) यह सूर्य दृष्टान्त युक्त नहीं है | * न जलसूर्यकादितुल्यत्वमिहोपपद्यते, तद्वदग्रहणात् । सूर्यादिभ्यो हि मूर्तभ्यः पृथग्भूतं विप्रकृष्टदेशं मूर्तं जलं गृह्यते, तत्र युक्तः सूर्यादिप्रतिबिम्वोदयः, न त्वात्मा मूर्ती होता है । वह अनादिमत् परब्रह्म न सत् - इन्द्रिय वेद्य और न असतु - परोक्ष कहा जाता है ) इत्यादि स्मृतियोंमें भी परके प्रतिषेधते हो उसका उपदेश किया जाता है । और विश्वरूप धारण करनेवाले नारायणने नारदसे कहा— ' माया ह्येषा ० ' ( हे नारद! यह माया मैंने रची है, जो कि तुम मुझे सर्वभूत गुणोंसे युक्त देखते हो इसप्रकार द्वैतयुक्त मुझे देखनेके लिए तुम योग्य नहीं हो ) ऐसी स्मृति है ॥१७ ॥
और क्योंकि यह आत्मा चैतन्यरूप, निर्विशेष, वाणी और मनका अविषय पर द्वैत प्रतिषेधसे उपदेश्य है, इसलिए इसमें उपाधि निमित्तक अपारमार्थिक संविशेषके अभिप्रायसे ' यथा ह्ययं ० ' ( जैसे यह ज्योतिःस्वरूप सूर्यं स्वतः एक होनेपर भी भिन्न - भिन्न जलोंमें प्रतिबिम्बित होता हुआ उपाधिसे अनेक प्रकारका भासता है, वैसे ही यह स्वयं प्रकाशरूप यज आत्मा शरीरोंमें उपाधिसे अनेक भिन्न-भिन्न आकाररूपसे मासता है ) और ' एक एव ० ' ( एक ही भूतात्मा प्रत्येक भूतमें अवस्थित होता हुआ जलगत चन्द्रप्रतिबिम्बके समान एकधा और अनेकधा दिखाई देता है ) इत्यादि मोक्षशास्त्रों में जलगत सूर्यं प्रतिबिम्बके समान उपमाका ग्रहण किया जाता है ॥ १८ ॥
इसमें शङ्का उठायी जाती है-यहाँ जलगत सूर्यं प्रतिबिम्ब वादिके साथ समानता उपपन्न नहीं होती, क्योंकि आत्माका उसके समान ग्रहण नहीं होता । मूर्तं सूर्यं आदिसे पृथग्भूतं दूर देशस्थ मूर्त जल सबसे गृहीत होता है, इसलिए उसमें सूर्य आदि प्रतिबिम्बका उदय होना युक्त है । परन्तु आत्मा मूर्त नहीं है और सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षी आत्मामें उक्त दृष्टान्तकी विषमताका प्रतिपादन करते हैं -- रूपादि युक्त सूर्यका रूप आदि युक्त जल में प्रतिबिम्ब युक्त है । परन्तु आत्मा तो रूपादि रहित, सर्वगत और सनसे अभिन्न
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अधि ० ५ सू ० २०-२१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६२१ नचास्मात्पृथग्भूता विप्रकृष्टदेशाश्चोपाधयः " सर्वगतत्वात्सर्वानन्यत्वाच्च । तस्मादयुक्तो -ऽयं दृष्टान्त इति ॥ १ ९ ॥ अत्र प्रतिविधीयते -वृद्धिहासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ॥ २० ॥
पदच्छेद - वृद्धिह्रासभाक्त्वम्, अन्तर्भावात् उभयसामञ्जस्थात्, एवम् । सूत्रार्थ - जैसे जलगत सूर्य प्रतिबिम्ब जलगत वृद्धि और हासका भागी - सा होता है ( एवम् ) वैसे निर्विशेष ब्रह्म भी उपाधिके ( अन्तर्भावात् ) अन्तर्भाव से ( वृद्धिह समाक्त्वम् ) आधिगत वृद्धि और ह्रासका मागी - सा होता है, इस प्रकार ( उमयसामञ्जस्यात् ) दृष्टान्त और दान्तिक दोनोंमें सामञ्जस्य है । युक्त एव त्वयं दृष्टान्तः, विवक्षितांशसंभवात् । नहि दृष्टान्तदाष्टान्तिकयोः क्वचित्कं-चिद्विवक्षितांशं मुक्त्वा सर्वसारूप्यं केन चिद्दर्शयितुं शक्यते । सर्वसारूप्ये हि दृष्टान्त-दान्तिक भावोच्छेद एव स्यात् । न चेदं स्वमनीषया जलसूर्यकादिद्दान्तप्रणयनम्, शास्त्रप्रणीतस्य त्वस्य प्रयोजनमात्रमुपन्यस्यते । किं पुनरत्र विवक्षितं सारूप्यमिति? तदु-च्यते - वृद्धिहासभाक्त्वमिति । जलगतं हि सूर्यप्रतिबिम्बं जलवृद्धौ वर्धते, जलहासे हसति, जलचलने चलति, जलभेदे भिद्यत इत्येवं जलधर्मानुयायि भवति नतु परमार्थतः सूर्यस्य तथात्वमस्ति । एवंपरमार्थतोऽविकृत मेकरूपमपि सद्ब्रह्म देहाद्युपाध्यन्तर्भावाद्भजत इवो-पाधिधर्मावृद्धिह्रासादीन् । एवमुभयोर्दृष्टान्तदाष्टन्तिकयोः सामञ्जस्यादविरोधः || २० || दर्शनाच्च ॥ २१ ॥
पदच्छेद - दर्शनात् च । सूत्रार्थ - प्रतिबिम्बरूप देहान्तरानुप्रवेश परब्रह्मका ' पुरश्चक्रे द्विपदः ' इत्यादि श्रुतियोंमें देखा जाता है, अतः निःशेष ब्रह्म सिद्ध है । * दर्शयति च श्रुतिः परस्यैव ब्रह्मणो देहादिपूपाधिष्वन्तरनुप्रवेशम् -'पुरश्चक्रे द्विपदः उपाधियाँ इससे पृथग्भूत और दूर देवस्थ नहीं हैं, क्योंकि आत्मा सर्वग और सबसे अभिन्न है । इस-लिए यह दृष्टान्त युक्त नहीं है ॥ १ ९ ॥ यहाँ इस शङ्कका समाधान किया जाता है -यह दृष्टान्त तो युक्त ही है, क्योंकि इसमें विवक्षितांशका संभव है । दृष्टान्त और दार्शन्तिकमें क्वचित् किञ्चित् विवक्षित अंशको छोड़कर सर्वरूपसे सादृश्य कोई भी नहीं दिखा सकता । सम्पूर्णरूप से सादृश्य होनेपर तो दृष्टान्त - दाष्टन्तिकभावका उच्छेद ही हो जायगा, और यह जल सूयंक आदि दृष्टान्त अपनी बुद्धिसे नहीं रचा गया है, किन्तु शास्त्र रचित इसके प्रयोजनमात्रका उपन्यास किया जाता है । यहाँ विवक्षित सारूप्य क्या है? उसे कहते हैं - वृद्धि और ह्रासका भागी होना सारूप्य है । जलगत सूर्यं प्रतिबिम्ब जलकी बृद्धि होनेपर बढ़ता है, जलके ह्रास होनेपर क्षीण होता है, जल के हिलने पर हिलता है, जलके भिन्न होनेपर भिन्न होता है, इस प्रकार जलके धर्मोका अनुयायी होता है, परन्तु परमार्थतः सूर्य वैसा नहीं है, वैसे परमार्थतः अविकृत, एकरूप होता हुआ भी ब्रह्म देह आदि उपाधिके अन्तर्भावसे वृद्धि और ह्रास आदि उपाधिके धर्मोंको मजता ( प्राप्त होता ) सा है । इस प्रकार दृष्टान्त और दान्तिक दोनोंके सामञ्जस्यसे अविरोध है ॥ २० ॥
' पुरश्चक्रे द्विपदः ० ' ( परमेश्वरने दो पैरोंवाले पुर- मनुष्यादि शरीर बनाये और चार पैरोंवाले सत्यानन्दी - दीपिका है, अत: उपाधियाँ उससे भिन्न और दूरस्थ नहीं हो सकतीं, इसलिए उसका माया द्वारा बुद्धि आदिमें प्रतिबिम्ब युक्त नहीं है ॥ १ ९ ॥
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६२२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ' ( बृह ० २/५/१८ ) इति । ' अनेन जीवे -नात्मनाऽनुप्रविश्य ' ( छा ० ६।३ । २ ) इति च । तस्माद्युक्तमेतत् - ' अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१८ ) इति । तस्मान्निर्विकल्पकैक लिङ्गमेव ब्रह्म नोभयलिङ्गं विपरीतलिङ्गं चेति सिद्धम् । अत्र केचिद् द्वे अधिकरणे कल्पयन्ति । प्रथमं तावत् - किं प्रत्यस्तमिताशेष-प्रपञ्चमेकाकारं ब्रह्मोत प्रपञ्चवदनेकाकारोपेतमिति । द्वितीयं तु - स्थिते प्रत्यस्तमित-प्रपञ्चत्वे किं सल्लक्षणं ब्रह्मोत बोधलक्षणमुतोभयलक्षणमिति? अत्र वयं वदामः-सर्वथाप्यानर्थक्यमधिकरणान्तर । रम्भस्येति । यदि तावदनेकलिङ्गत्वं परस्य ब्रह्मणो निराकर्तव्यमित्ययं प्रयास स्तत्पूर्वेणैव ' न स्थानतोऽपि ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।११ ) इत्यनेनाधिकरणेन निराकृतमित्युत्तरमधिकरणं ' प्रकाशवच्च ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१५ ) एतद्व्यर्थमेव भवेत् । नच सल्लक्षणमेव ब्रह्म न बोधलक्षणमिति शक्यं वक्तुम्, ' विज्ञानघन एव ' इत्यादि श्रुति-वैयर्थ्यप्रसङ्गात् । कथं वा निरस्तचैतन्यं ब्रह्म चेतनस्य जीवस्यात्मत्वेनोपदिश्येत? नापि बोधलक्षणमेव ब्रह्म न सल्लक्षणमिति शक्यं वक्तुम्, ' अस्तीत्येवोपलब्धव्यः ' ( कठ ० ६।१३ ) इत्यादिश्रुतिवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । कथं वा निरस्तसत्ताको बोधोऽभ्यु पगम्येत? नाप्युभयलक्षणमेव ब्रह्मेति शक्यं वक्तुम्, पूर्वाभ्युपगमविरोध-पशु शरीर बनाये । पहले वह पुरुष पक्षी ( लिङ्ग शरीरी ) होकर शरीर में प्रविष्ट हुआ ) ' अनेन जीवेन ० ' ( इस जीवरूपसे प्रवेश कर ) इसप्रकार श्रुति परब्रह्मका ही देह आदि उपाधियोंमें अनुप्रवेश दिखलाती है । इसलिए ' अतएव चोपमा सूर्यकादिवत् ' यह युक्त है । इससे सिद्ध हुआ कि निर्विशेष एक लिङ्ग ( आकारवाला ) ही ब्रह्म है न उमय लिङ्गवाला है और न विपरीत लिङ्गवाला है । यहाँ कोई दो अधिकरणोंकी कल्पना करते हैं- प्रथम तो यह कि सम्पूर्ण प्रपञ्चसे शून्य एक आकार ब्रह्म है अथवा प्रपञ्चसे युक्त अनेक आकार युक्त है । द्वितीय तो सर्व प्रपञ्च शून्य स्थित होनेपर क्या सद्रूप ब्रह्म है, वा बोधरूप है अथवा उभयरूप है? इसपर हम कहते हैं- - अन्य अधिकरणका आरम्भ सर्वथा अनर्थक है । यदि परब्रह्मका अनेक लिङ्गत्व निराकर्तव्य है. इसलिए यह प्रयास है, तो इसका ' न स्थान-तोऽपि ' इस पूर्व अधिकरणसे निराकरण हो गया है, इससे ' प्रकाशवच्च ' यह अग्रिम अधिकरण व्यथं ही होगा । ब्रह्म सद्रूप ही है ज्ञानरूप नही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' विज्ञानघन एव ' इत्यादि श्रुतियों में वैयथ्यं प्रसङ्ग आ जायगा । अथवा चैतन्य रहित ब्रह्म चैतन्य जीवका आत्मरूप से कैसे उपदिष्ट होगा । ब्रह्म ज्ञानरूप ही है सद्रूप नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ' अस्तीत्येवोप-लब्धव्यः ' ( है, इस प्रकार उपलब्धि करनी चाहिए ) इत्यादि श्रुतियोंका वैयथ्यं प्रसङ्ग होगा । जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसा बोध कैसे स्वीकार किया जायगा? इस प्रकार ब्रह्म उभय लक्षण ही है, इस प्रकार सत्यानन्दी - दीपिका * स्वसिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिए किसी एक देशीकी व्याख्याका ' अन्न केचिद् ' इत्यादिसे उत्थान करते हैं - वे पूर्वोक्त सूत्रोंमें दो अधिकरणोंकी कल्पला करते हैं ' न स्थानतोऽपि ( ब्रह्मसूत्र ३।२।११ ) तक इस एक अधिकरणसे ब्रह्ममें निष्प्रपञ्चत्व सिद्ध होनेपर ' ब्रह्मका क्या स्वरूप है? ऐसा सन्देह होनेपर ' प्रकाशवच्च ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१५ ) इत्यादि द्वितीय अधिकरण प्रवृत्त हुआ । ब्रह्म केवल सद्रूप ही नहीं है, किन्तु ज्ञानरूप भी है, क्योंकि ' सत्यं ज्ञानम्, ' सदेव सोम्य ० ' इत्यादि श्रुतियाँ द्विरूप ब्रह्ममें सार्थक हैं । ' सिद्धान्त -- ' आह च तन्मात्रम् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१६ ) ब्रह्म सद्रूप ही है, क्योंकि ज्ञान सत्तासे भिन्न है । इस प्रकार ' अत्र वयं वदामः ' इत्यादिसे दूसरे अधिकरणको दूषित करते हैं-द्वितीय अधिकरणका क्या ब्रह्मके अनेक रूपत्वका निरास प्रयोजन है वा ज्ञानरूपत्वका निरास अथवा सत्ताका निरास? इस प्रकार विकल्प कर सर्वथा अनर्थक्यका विस्तार दिखलाते हुए प्रथम विकल्प से ' यदि तावत् ' इत्यादिसे गतार्थता कहते हैं ।
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अधि ० ५ सू ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६२३ प्रसङ्गात् । सत्ताव्यावृत्तेन च बोधेन बोधव्यावृत्तया च सत्तयोपेतं ब्रह्म प्रतिजानानस्य तदेव पूर्वाधिकर णप्रतिषिद्धं सप्रपञ्चत्वं ब्रह्मणः प्रसज्येत । श्रुतत्वाददोष इति चेत् - न, एकस्यानेकस्वभावत्वानुपपत्तेः । अथ सत्तैव बोधो वोध एव च सत्ता, नानयोः परस्पर-व्यावृत्तिरस्तीति यद्युच्येत, तथापि किं सल्लक्षणं ब्रह्मोत बोधलक्षणमुतोभय लक्षणमित्ययं विकल्पो निरालम्बन एव स्यात् । सूत्राणि त्वेकाधिकरणत्वेनैवास्माभिर्नीतानि । * अपि च ब्रह्मविषयासु श्रुतिष्वाकारवदनाकार प्रतिपादनेन विप्रतिपन्नास्वनाकारे ब्रह्मणि परिगृहीतेऽवश्यं वक्तव्येतरासां श्रुतीनां गतिः । तादर्थ्येन प्रकाशवच्चेत्यादी नि सूत्राण्यर्थवत्तराणि संपद्यन्ते । यद्यप्याहुराकारवादिन्योऽपि श्रुतयः प्रपञ्चप्रविलय मुखे-नानाकारप्रतिप्रत्त्यर्था एव न पृथगर्था इति तदपि न समीचीनमिव लक्ष्यते । कथम्? ये हि परविद्याधिकारे केचित्प्रपञ्चा उच्यन्ते, यथा - युक्ता ह्यस्य हस्यः शता दशेत्ययं वै हरयोऽयं जै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च ' ( बृह ० २ | ५ | १ ९ ) इत्येवमादयस्ते भवन्ति प्रविलयार्थाः, ' तदेतद्ब्रह्मा पूर्व मन परमनन्तमबाह्यम् ( बृह ० २।५।१ ९ ) इत्युपसंहारात् । ये पुनरुपासनाविधानाधिकारे प्रपञ्चा उच्यन्ते, यथा ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूप: ' ( छा ० ३।१४।२ ) इत्येवमादयो न तेषां प्रविलयार्थत्वं न्याय्यम्, ' स क्रतुं कुर्वीत ' ( छा ० ३ | १४ | १ ) इत्येवं जातीयकेन प्रकृते नवोपासनविधिना तेषां संबन्धात् । श्रुत्या चैवंजातीय कानां भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि ' न स्थानतोऽपि इस सूत्र में पूर्व स्वीकार के साथ विरोध प्रसङ्ग होगा । सत्तासे रहित ज्ञान और ज्ञानसे रहित सत्ता से युक्त ब्रह्म है, ऐसी प्रतिज्ञा करनेवालेको पूर्व अधिकरण में प्रतिषिद्ध वही सप्रपञ्चत्व ब्रह्ममें प्रसक्त होगा अर्थात् प्रपञ्च युक्त ब्रह्म होगा । यदि कहो कि श्रुति प्रतिपादित होनेसे यह दोष नहीं है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि एकका अनेक स्वभाव नहीं हो सकता । यदि कहो कि सत्ता ही ज्ञान है और ज्ञान ही सत्ता है, इन दोनोंकी परस्पर व्यावृत्ति नहीं है, तो मी ब्रह्म सद्रूप है वा बोध रूप है अथवा उभयरूप है? यह विकल्प निराश्रय हो जायगा । सूत्रोंकी योजना तो हमने एक अधिकरणरूपसे कर ली है । और ब्रह्म-विषयक श्रुतियोंके साकार और निराकार ब्रह्मका प्रतिपादन करनेसे परस्पर विरोध होनेके कारण निराकार ब्रह्मके परिगृहीत होनेपर अन्य श्रुतियोंकी गति अवश्य कहनी चाहिए । और उस गतिके लिए ' प्रकाशवञ्च ' इत्यादि सूत्रोंका अधिक अर्थ संगत है । जो भी कहते हैं कि साकार वादिनी श्रुतियाँ प्रपञ्च विलयद्वारा निराकार ब्रह्मके ज्ञानके लिए ही हैं उनका पृथक् प्रयोजन नहीं है, वह भी समीचीन - सा देखने में नहीं आता । कैसे? ये जो परविद्या प्रकरणमें ' युक्ता ह्यस्य ० ' ( जैसे रथमें जुते अश्व हैं वैसे शरीररूप रथमें जोड़े हुए इसके इन्द्रियरूप अश्व शत और दश हैं, यह परमेश्वर ही हरि - इन्द्रियरूप अश्व है, यही दरा, सहस्र, अनेक और अनन्त है ) इत्यादि जो कोई विस्तारसे कहे जाते हैं, वे प्रविलयके लिए होते हैं, क्योंकि ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित, कार्यं रहित विजातीय द्रव्यसे रहित और अबाह्य है ) ऐसा उपसंहार है । परन्तु ' मनोमय: ० ' ( मनोमयः, प्राण शरीर और चैतन्यरूप है ) इत्यादि जो उपासना विधानके प्रकरणमें विस्तारसे कहे जाते हैं, वे प्रल-यार्थक हों यह युक्त नहीं है, कारण कि ' स क्रतुं कुर्वीत ' ( वह ध्यान करे ) इसप्रकारकी प्रकृत सत्यानन्दी -दीपिका * पर विद्याके प्रकरणमें ' युक्ता ह्यस्य ० ' इत्यादि आकार प्रतिपादक श्रुतियां यद्यपि प्रपञ्श्व प्रवि-लयद्वारा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि ' तदेतद्ब्रह्म ० ' इसप्रकार उपसंहारमें निर्वि-शेष ब्रह्म हो प्रतिपादित है, तो भी ' मनोमयः प्राण शरीर: ' इस तरह उपासना विधानके प्रकरणर्मे पठित श्रुतियाँ प्रपञ्चके प्रविलयके लिए नहीं हो सकतीं, कारण कि ईश्वरमें अनेक इन्द्रियोंका कथन
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६२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ गुणानामुपासनार्थत्वेऽवकल्यमाने न लक्षणया प्रविलयार्थत्वमवकल्पते । सर्वेषां च साधारणे प्रविलयार्थत्वे सति ' अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | २ | १४ ) इति विनिगमनकारणवचनमनवकाशं स्यात् । फलमप्येषां यथोपदेशं कचिद्दुरितक्षयः क्वचिदैश्वर्य प्राप्तिः कचित्क्रम मुक्तिरित्यवगम्यत एवेत्यतः पार्थगर्थ्यमेवोपासनावाक्यानां ब्रह्मवाक्यानां च न्याय्यं नैकवाक्यत्वम् । कथं चैषामेकवाकृतोत्प्रेक्ष्यत इति वक्तव्यम् । एकनियोगप्रतीतेः प्रयाजदर्शपूर्णमासवाक्यवदिति चेत् - न, ब्रह्मवाक्येषु नियोगा-भावत् । वस्तुमात्रपर्यवसायीनि हि ब्रह्मवाक्यानि न नियोगोपदेशी नीत्येतद्विस्तरेण प्रतिष्ठापितम् —'तत्तु समन्वयात् ' ( ब्रह्मसूत्र १1१1४ ) इत्यत्र । किंविषयश्चात्र नियोगोऽभि-प्रेयत इति वक्तव्यम् । पुरुषो हि नियुज्यमानः कुर्विति स्वव्यापारे कस्मिश्चिन्नियुज्यते । ननु द्वैतप्रपञ्चविलयो नियोगविषयो भविष्यति । अप्रविलापिते हि द्वैतप्रपञ्चे ब्रह्मतत्त्वा-वबोधो न भवति, अतो ब्रह्मतत्त्वावबोधप्रत्यनीकभूतो द्वैतप्रपञ्चः प्रविलाप्यः । यथा स्वर्गकामस्य यागोऽनुष्ठातव्य उपदिश्यत एवमपवर्गकामस्य प्रपञ्चप्रविलयः । यथाच तमसि व्यवस्थितं घटादितत्त्वमवबुभुत्समानेन तत्प्रत्यनीकभूतं तमः प्रविलाप्यत एवं ब्रह्मतत्त्वमवबुभुत्समानेन तत्प्रत्यनीकभूतः प्रपञ्चः प्रविलापयितव्यः । उपासना विधि के साथ उन साकार वाक्योंका सम्बन्ध है | श्रुति से अभिधावृत्तिसे इसप्रकारके गुण उपास-नार्थक संभव होनेपर उनका लक्षणावृत्तिसे प्रलयार्थत्व नहीं हो सकता । और यदि सब उपासना-साकार वाक्योंका साधारण प्रविलयार्थं माना जाय, तो ' अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ' यह विनि-गमन - नियामक कारण वचन अनवकाश हो जायगा । और उनका फल भी उपदेशके अनुसार कहीं-पर पाप क्षय, कहीं पर ऐश्वर्य प्राप्ति और कहीं पर क्रममुक्ति इसप्रकार अवगत होता है, इसलिए उपा-सना वाक्यों और ब्रह्मवाक्योंकी पृथक् अर्थता ( पृथक् पृथक् अर्थ ) युक्त है, एकवाक्यता ( एकार्थवत्ता ) नहीं । इनकी एकवाक्यताकी कल्पना किसप्रकारकी जाती है यह कहना चाहिए । यदि कहो कि प्रयाज और दर्शपूर्णभास वाक्योंके समान एक नियोगकी प्रतीति होनेसे एकवाक्यता है, तो ऐसा नहीं, क्योंकि ब्रह्मवाक्यों में नियोगका अभाव है । ब्रह्मवाक्य वस्तुमात्र पर्यवसायी हैं नियोगका उपदेश करने वाले नहीं हैं, ऐसा ' तत्तु समन्वयात् ' इस सूत्र में विस्तार से प्रतिष्ठापित किया गया है । यहाँ किविषयक नियोग अभिप्रेत है? यह कहना चाहिए, क्योंकि जो पुरुषको नियुक्त करता हुआ किसी अपने व्यापार में ' करो ' इसप्रकार नियुक्त करता है वह नियोग है । द्वैत प्रपञ्चका प्रविलय यहाँ नियोगका विषय होंगा, क्योंकि द्वैतप्रपञ्चके प्रविलापित किये विना ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान नहीं होता, इसलिए ब्रह्मतत्त्वके ज्ञान में प्रतिबन्धकीभूत द्वैतप्रपञ्चका प्रविलापन करना चाहिए । जैसे स्वर्गकामनावालेको यागका अनुष्ठान करना चाहिए, ऐसा उपदेश किया जाता है, वैसे मुमुक्षुके लिए प्रपञ्च प्रविका उपदेश किया जाता है । जैसे अन्धकारमें स्थित घटादि पदार्थोंको जानने की इच्छा करनेवाला उसके प्रतिबन्धकीभूत तमका प्रावलय करता है, वैसे ब्रह्मतत्त्वको जानने की इच्छा करने वालेको उस तत्त्व के प्रतिबन्धकीभूत सत्यानन्दी - दीपिका प्राणी भेदसे है । प्राणी अनन्त हैं, उनकी इन्द्रियाँ भी अनन्त हैं, ये सभी इन्द्रियाँ ईश्वरकी हैं, ऐसा मानकर ईश्वरकी अनन्त इन्द्रियाँ ' युक्ता ह्यस्य ' इत्यादि श्रुतिमें कही गई हैं । ' युक्ता ह्यस्य ' जीवभावको प्राप्त हुए ईश्वरके हरि - दश इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियाँ विषयोंका आहरण करती हैं अथवा विषय इन्द्रियोंका हरण करते हैं इसलिए हरि कहे जाते हैं । * साकार और निराकार प्रतिपादक श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर ब्रह्म निराकार ही है, इसमें ' अस्थूलम ' इत्यादि श्रुतियोंका निर्विशेष ब्रह्म में वालयं ही नियामक है । इसको कहने के लिए ' अरूप-वदेव कि तत्प्रधानत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१४ ) यह सूत्र सार्थक होता है ।
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अधि ० ५ ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६२५ * ब्रह्मस्वभावो हि प्रपञ्चोन प्रपञ्चस्वभावं ब्रह्म, तेन नामरूपप्रपञ्चप्रविलापनेन ब्रह्म-तत्वावबोधो भवतीति । अत्र वयं पृच्छामः कोऽयं प्रपञ्चप्रविलयो नाम? किमग्नि-प्रताप संपर्कात काठिन्यप्रविलय इव प्रपञ्चप्रविलयः कर्तव्य आहोस्विदेकस्मिंश्चन्द्रे तिमिरकृतानेकचन्द्रप्रपञ्चवदविद्याकृतो ब्रह्मणि नामरूपप्रपञ्चो विद्यया प्रविलापयितव्य इति? तत्र यदि तावद्विद्यमानोऽयं प्रपञ्चो देहादिलक्षण आध्यात्मिको बाह्यश्च पृथिव्यादि-लक्षणः प्रविलापयितव्य इत्युच्येत स पुरुषमात्रेणाशक्यः प्रविलापयितुमिति तत्प्रविलयो-पदेशोऽशक्यविषय एव स्यात् । एकेन चादिमुक्तेन पृथिव्यादिप्रविलयः कृत इतीदानीं पृथिव्यादिशून्यं जगदभविष्यत् । अथाविद्याध्यस्तो ब्रह्मण्येकस्मिन्नयं प्रपञ्चो विद्यया प्रविलाप्यत इति ब्रूयात्, ततो ब्रह्मवाविद्याध्यस्तप्रपञ्चप्रत्याख्यानेनावेदयितव्यम् । ' एक-मेवाद्वितीयं ब्रह्म ', ' तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि ' ( छा ० ६८ / ७ ) इति, तस्मिन्नवेदिते विद्या स्वयमेवोत्पद्यते, तया चाविद्या बाध्यते, ततश्चाविद्याध्यस्तः सकलोऽयं नामरूपप्रपञ्चः प्रपञ्चका प्रविलय करना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मस्वभाववाला प्रपञ्च है किन्तु प्रपञ्च स्वभाववाला ब्रह्म नहीं है । इस नाम, रूप प्रपञ्च के प्रविलापन से ब्रह्मतत्त्वका बोध होता है । सि ० - हम यहाँ पूछते हैं - यह प्रपञ्च प्रविलय क्या है? क्या जैसे अग्नि उष्णताके सम्पर्कसे घृतके काठिन्यका प्रविलय होता है, वैसे प्रपञ्चका प्रविलय करना चाहिए अथवा एक चन्द्रमामें नेत्र दोष कृत अनेक चन्द्र प्रपञ्चके समान ब्रह्ममें अविद्याकृत नामरूप प्रपञ्चका विद्यासे प्रविलय करना चाहिए | उनमें यदि कहो कि विद्यमान यह देह आदिरूप आध्यात्मिक प्रपञ्च और पृथिवी आदिरूप बाह्य प्रपञ्चका प्रविलय करना चाहिए, उसके प्रविलय करने में तो पुरुषमात्र असमर्थ है, इसलिए उसके प्रविलयका उपदेश अशक्य विष-यक ही होगा । और एक आदि मुक्त पुरुषसे पृथिवी आदिका प्रविलय किया गया होता, तो इस समय जगत् पृथिवी आदिसे शून्य होता । ऐसा यदि कहो कि एक ब्रह्ममें अविद्यासे अध्यस्त यह प्रपञ्च विद्या प्रविलापित किया जाता है, तो ' एकमेवाद्वितीयं ० ' ( एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ) ' तत्सत्यं ० ' ( वह सत्य है, वह आत्मा है वह तू है ) इसप्रकार अविद्या से अध्यस्त प्रपञ्चके प्रत्याख्यानसे ब्रह्म ही वेदितव्यं है । उस ब्रह्मका ज्ञान होनेपर विद्या स्वयं उत्पन्न होती है और उससे अविद्याका बाध होता है । उस अविद्या से अध्यस्त इस सम्पूर्ण नामरूपात्मक प्रपञ्चका स्वप्न प्रपञ्चके समान प्रविलय हो सत्यानन्दी - दीपिका * परन्तु प्रपञ्चका प्रविलय होनेपर ब्रह्मका भी लय हो जायगा, क्योंकि दोनोंका अभेद है? ऐसा नहीं, क्योंकि कार्यका स्वरूप कारण होता है किन्तु कारणका स्वरूप कार्य नहीं होता । इसलिए कार्यका लय होनेपर कारणका लय नहीं होता । जैसे घटके लयसे मृत्तिकाका लय नहीं होता, अतः प्रपञ्चके विलय से ब्रह्मका विलय नहीं होता । किञ्च सत्य प्रपञ्चके विलयमें विधि है अथवा कल्पित प्रपञ्चके विलय में? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि सत्य वस्तुको ज्ञानसे निवृत्ति नहीं होती, कारण कि दोनों का परस्पर विरोध नहीं है, अतः माकाश ग्रसन विधिके समान इस प्रपञ्चका लय अशक्य है । इस अनादि संसार में अभी तक कोई मुक्त हुआ है कि नहीं? प्रथम पक्ष ' एकेन ' आदिसे कहते 1 द्वितीय विकल्पमें तो शुकदेव आदिके मुक्ति प्रतिपादक शास्त्र से विरोध होगा । इससे सिद्ध होता है कि सत्य प्रपञ्चकी निवृत्ति ज्ञानसे नहीं होती है । * दूसरे विकल्पको भी ' अथाविद्याध्यस्तो ' इत्यादिसे दूषित करते हैं । ब्रह्मज्ञान और प्रपञ्च के विलय में जो विधि कहते हैं, क्या वह संज्ञात ब्रह्ममें है अथवा ज्ञात ब्रह्म में? प्रथम पक्षका ' अनावेदिते ' इत्यादि से समाधान किया गया हैं । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' आदि वेदान्त वाक्योंके श्रवणसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मका साक्षात्कार और अविद्याकृत प्रपञ्चका विलय सिद्ध है ।
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६२६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ स्वप्नप्रपञ्चवत्प्रविलीयते । अनावेदिते तु ब्रह्मणि ब्रह्मविज्ञानं कुरु प्रपञ्चप्रविलयं चेति शतकृत्वोऽप्युक्ते न ब्रह्मविज्ञानं प्रपञ्चप्रविलयो वा जायेत । नन्वावेदिते ब्रह्मणि तद्विज्ञान-विषयः प्रपञ्चविषयो वा नियोगः स्यात्, न, निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मत्वावेदनेनैवोभयसिद्धेः । रज्जुस्वरूपप्रकाशनेनैव हि तत्स्वरूपविज्ञानमविद्याध्यस्त सर्पादिप्रपञ्चप्रविलयश्च भवति । नच कृतमेव पुनः क्रियते । नियोज्योऽपि च प्रपञ्चावस्थायां योऽवगम्यते जीवो नाम, स प्रपञ्चपक्षस्यैव वा स्याद्ब्रह्मपक्षस्यैव वा? प्रथमे विकल्पे निष्प्रपञ्चब्रह्मतत्वप्रतिपादनेन पृथिव्यादिवज्जीवस्यापि प्रविलापितत्वात्कस्य प्रपञ्चविलये नियोग उच्येत? कस्य वा नियोगनिष्टतया मोक्षोऽवाप्तव्य उच्येत? द्वितीयेऽपि ब्रह्मवानियोज्यस्वभावं जीवस्य स्वरूपं जोवत्वं त्वविद्याकृतमेवेति प्रतिपादिते ब्रह्मणि नियोज्याभावान्नियोगाभाव एव । द्रष्टव्यादिशब्दा अपि परविद्याधिकार पठितास्तत्त्वाभिमुखीकरणप्रधाना न तत्त्वावबोध-विधिप्रधाना भवन्ति । लोकेऽपीदं पश्येदमाकर्णयेति चैचंजातीयकेषु निर्देशेषु प्रणिधान-मात्रं कुर्वित्युच्यते, न साक्षाज्ज्ञानमेव कुर्विति ज्ञेयाभिमुखस्यापि ज्ञानं कदाचिजायते कदाचिन्न जायते, तस्मात्तं प्रति ज्ञानविषय एव दर्शयितव्यो ज्ञापयितुकामेन । तस्मि दर्शिते स्वयमेव यथाविषयं यथाप्रमाणं च ज्ञानमुत्पद्यते । नच प्रमाणान्तरेणान्यथा-प्रसिद्धेऽर्थेऽन्यथाज्ञानं नियुक्तस्याप्युपपद्यते । यदि पुनर्नियुक्तोऽहमित्यन्यथा ज्ञानं कुर्यान्न तु तज्ज्ञानं, किं तर्हि? मानसी सा क्रिया । स्वयमेत्र चेदन्यथोत्पद्येत, भ्रान्तिरेव स्यात् । ज्ञानं तु प्रमाणजन्यं यथाभूतविषयं च न तन्नियोगशतेनापि कारयितुं शक्यते । जाता है | ब्रह्म अविदित होनेपर ' ब्रह्मज्ञान करो ' ' प्रपञ्चका प्रविलय करो ' ऐसा शतवार कहने पर मी ब्रह्मका विज्ञान अथवा प्रपञ्चका विलय नहीं होता । परन्तु ब्रह्मके विदित होनेपर उसके ज्ञान-विषयक वा प्रपञ्च प्रलयविषयक नियोग होगा । ऐसा नहीं, क्योंकि निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्वके विज्ञानसे ही दोनों सिद्ध होते हैं । रज्जुस्वरूपके प्रकाशसे ही रज्जुस्वरूपका ज्ञान और अविद्यासे अध्यस्त सर्प आदि प्रपञ्चका प्रविलय होता है, क्योंकि जो सिद्ध है उसको पुनः सिद्ध नहीं किया जाता । जो जीव प्रपश्चावस्था में नियोज्य अवगत होता है वह प्रपञ्च पक्षका ही है अथवा ब्रह्म पक्षका हो? प्रथम विकल्पमें प्रपञ्च रहित ब्रह्मतत्त्व के प्रतिपादनसे पृथिवी आदिके समान जीवका भी प्रविलय हो गया है, अतः किसका प्रपञ्चके प्रविलयमें नियोग कहा जाय अथवा किसको नियोगनिष्ठत्व से मोक्ष प्राप्तव्य कहा जाय । द्वितीय विकल्प में भी अनियोज्य स्वभाव ब्रह्म ही जीवका स्वरूप है और जीवत्व तो अविद्याकृत ही है, ऐसा प्रतिपादित होनेपर ब्रह्ममें नियोज्यके अभाव होनेसे नियोगका अभाव ही है । और परविद्या के प्रकरणमें पठित ' द्रष्टव्य ' आदि शब्दोंकी भी तत्त्वके अभिमुख करने में प्रधानता है वे तत्त्वज्ञानमें विधिप्रधान नहीं हैं । लोक व्यवहार में भी ' यह देखो, यह सुनो ' इस प्रकारके निर्देशोंमें ' ' एकाग्र मन करो ' ऐसा कहा जाता है ' साक्षात् ज्ञान करो ' ऐसा नहीं कहा जाना । ज्ञेयके अभिमुखको भी कभी ज्ञान उत्पन्न होता है और कभी नहीं उत्पन्न होता । इसलिए जो ज्ञान कराना चाहता है, उससे उस ( ज्ञानार्थी ) को ज्ञानका विषय ही दिखलाना चाहिए । उसके दिखलानेपर विषय और प्रमाणके अनुसार उसको स्वयं ही ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । अन्य प्रमाणसे अन्य प्रकारसे प्रसिद्ध अर्थमें नियुक्तको मी अन्यथाज्ञान नहीं होता । यदि ' मैं नियुक्त हूँ ' ऐसा समझकर अन्यथाज्ञान करे तो वह ज्ञान नहीं है, किन्तु वह मानसी क्रिया है । यदि स्वयं ही अन्यथा उत्पन्न हो तो वह भ्रान्ति ही होगी । सत्यानन्दी - दीपिका अतः पूर्व सिद्ध ब्रह्म में विधि नहीं । इस प्रकार विषयके अमावसे नियोगका अभाव कहकर अब आगे ' नियोज्योऽपि ' इत्यादिसे नियोज्यके अभावसे मो उसका अभाव कहते हैं ।