श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 661–670

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 661–670

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अधि ० ५ सू ० २१ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी- दीपिकासहित ६२७ नच प्रतिषेधशतेनापि वारयितुं शक्यते । नहि तत्पुरुषतन्त्रं वस्तुतन्त्रमेव हि तत् । अतोऽपि नियोगाभावः । किंचान्यन्नियोगनिष्ठतयैव पर्यवस्यत्याम्नाये यदभ्युपगतमनि-योज्य ब्रह्मात्मत्वं जीवस्य तदप्रमाणकमेव स्यात् । अथ शास्त्रमेवानियोज्यब्रह्मात्मत्व-मप्याचक्षीत तदवबोधे च पुरुषं नियुञ्जीत, ततो ब्रह्मशास्त्रस्यैकस्य द्वयर्थपरता विरु-द्धार्थपरता च प्रसज्येयाताम् । नियोगपरतायां च श्रुतहा निरश्रुतकल्पना कर्मफलवन्मो-क्षस्यादृष्टफलत्वमनित्यत्वं चेत्येवमादयो दोषा न केनचित्परिहर्तुं शक्याः । तस्मादव-गतिनिष्ठान्येव ब्रह्मवाक्यानि न नियोगनिष्ठानि । अतश्चैकनियोगप्रतीतेरेकवाक्यतेत्य-युक्तम् । * अभ्युपगम्यमानेऽपि च ब्रह्मवाक्येषु नियोगसद्भावे तदेकत्वं निष्प्रपञ्चोपदे-शेषु चासिद्धम् । नहि शब्दान्तरादिभिः प्रमाणैर्नियोगभेदेऽवगम्यमाने सर्वत्रैको नियोग इति शक्यमाश्रयितुम् । प्रयाजदर्शपूर्णमासवाक्येषु त्वधिकारांशेनाभेदाद्युक्तमेकत्वम्, नत्विह सगुणनिर्गुणचोदनासु कश्चिदेकत्वाधिकारांशोऽस्ति । नहि भारूपत्वादयो गुणाः प्रपञ्चप्रविलयोपकारिणः, नापि प्रपञ्चप्रविलयो भारूपत्वादिगुणोपकारी, परस्परविरोधि-त्वात् । नहि कृत्स्नप्रपञ्चप्रविलापनं प्रपञ्चैकदेशापेक्षणं चैकस्मिन्धर्मिणि युक्तं समावेश-यितुम् । तस्मादस्मदुक्त एव विभाग आकारवदनाकारोपदेशानां युक्ततर इति ॥२१ ॥

ज्ञान तो प्रमाण जन्य और यथाभूत विषयक होता है वह सौ नियोगोंसे मी नहीं कराया जा सकता, और सो प्रतिषेधोंसे भी उसका निवारण नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह पुरुषके अधीन नहीं है, वह तो वस्तुके अधीन है । इससे भी नियोगका अभाव है । और दूसरी बात यह है कि यदि वेद-वाक्योंका नियोग निष्ठारूपसे पर्यवसान होता है तो जो यह स्वीकार किया गया है कि जीव अनियोज्य ब्रह्मस्वरूप है, वह अप्रमाणक हो जायगा । यदि शास्त्र ही जीव को अनियोज्य ब्रह्मस्वरूप कहे और उसके ज्ञानमें पुरुषको नियुक्त करे, तो एक ब्रह्मशास्त्रमें दो अर्थकी प्रतिपादकता और विरुद्ध अर्थ प्रतिपादकता प्रसक्त होगी । और ब्रह्मशास्त्रका तात्पर्यं यदि नियोगमें है तो श्रुतकी हानि और अश्रुतकी कल्पना, कर्मफलके समान मोक्षफलमें अदृष्टफलत्व और अनित्यत्व आदि दोष किसीसे भी वारण नहीं किये जा सकते । इसलिए ब्रह्मवाक्य अवगति निष्ठ ही हैं नियोग निष्ठ नहीं हैं । अतः एक नियोगकी प्रतीतिसे उनको एक वाक्यता है यह कथन अयुक्त है । और ब्रह्म वाक्योंमें नियोगका सद्भाव स्वीकार किये जानेपर भी निष्प्रपञ्च उपदेशोंमें और सप्रपञ्च उपदेशों में उसका एकत्व असिद्ध है, क्योंकि अन्य शब्द आदि प्रमाणोसे नियोगका भेद अवगत होनेपर सर्वत्र एक नियोग है, ऐसा आश्रय नहीं किया जा सकता । प्रयाजवाक्य और दर्शपूर्णमासवाक्योंमें अधिकार अंशमें अभेद होनेसे एकत्व युक्त है । परन्तु यहाँ सगुण और निर्गुण विधि वाक्योंमें एकत्वका कोई अधिकारांश नहीं है । भारूपत्व. आदि गुण प्रपञ्चके प्रविलय करनेमें उपकारी नहीं हैं और न प्रपञ्च प्रविलय मारूपत्व आदि गुणोंका उपकारी है, क्योंकि वे परस्पर विरोधी हैं । एक घर्मी में सम्पूर्ण प्रपञ्चका प्रविलय और पञ्चके एक देशकी अपेक्षा, इन दोनोंका समावेश करना युक्त नहीं है । इसलिए साकार और निराकार उपदेशोंका हमसे कहा गया विभाग युक्ततर है ॥ २१ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका ** ब्रह्म वाक्योंमें नियोग स्वीकार करनेपर भी दोनों उपदेशों में एक नियोग नहीं हो सकता, क्योंकि भिन्न - भिन्न क्रिया वाचक शब्दोंसे भेद ही ज्ञात होता है । जैसे ' यजति ' ' ददाति ' वैसे प्रकृतमें ' वेद ' ' उपासीत ' यह शब्द भेद है, निर्गुण और सगुण यह रूपभेद, प्रकरण भेद, मुक्ति और मभ्युदय-रूप फल भेद, इन प्रामाणोंसे निर्गुण ज्ञान और सगुण उपासना विषयक नियोग भेद सिद्ध होता है, अतः दोनों वाक्योंमें एक नियोग असिद्ध है । इसलिए ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादि साकार श्रुतियोंका

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ( ६ प्रकृतैतावत्त्वाधिकरणम् । सू ० २२- ३० ) प्रकृतैतावत्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥ २२ ॥

पदच्छेद - प्रकृतैतावत्त्वम्, हि, प्रतिषेधति, ततः, ब्रवीति; च, भूयः । सूत्रार्थ - ( हि ) क्योंकि ( प्रकृतैतावत्त्वम् ) प्रकरणमें प्रतिपादित ब्रह्मके इयत्ता परिच्छिन्न मूर्त और अमूर्तरूपका ( प्रतिषेधति ) ' नेति नेति ' यह शब्द प्रतिषेध करता है | ( च ) और ( ततः ) उस प्रतिषेधसे आगे ( भूयः ) पुनः ( ब्रवीति ) ' अन्यत्परमस्ति ' इस प्रकार कहता है, इसलिए शून्यवादका प्रसङ्ग नहीं है । * ‘ द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च ' ( बृह ० २।३।१ ) इत्युपक्रम्य पञ्चमहाभूतानि द्वैराश्येन प्रविभज्यामूर्त रसस्य च पुरुषशब्दोदितस्य महारजनादीनि रूपाणि दर्शयित्वा पुनः पठ्यते - ' अथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्ति ' ( वृह ० २।३।६ ) इति । तत्र को s स्य प्रतिषेधस्य विषय इति जिज्ञासामहे? न ह्यत्रेदं तदिति विशेषितं किंचित्प्रति-षेध्यमुपलभ्यते । इतिशब्देन त्वत्र प्रतिषेध्यं किमपि समर्प्यते ' नेति नेति ' इतिपरत्वान्नञ्प्र-योगस्य । इतिशब्दश्चायं संनिहितालम्बन एवं शब्द समानवृत्तिः प्रयुज्यमानो दृश्यते- ' इति ह स्मोपाध्यायः कथयति ' इत्येवमादिषु । संनिहितं चात्र प्रकरणसामर्थ्याद्रूपद्वयं सप्रपञ्चं ब्रह्मणस्तच्च ब्रह्म यस्यैते द्वे रूपे । तत्र नः संशय उपजायते - किमयं प्रतिषेधो रूपे रूप-वच्चोभयमपि प्रतिषेधत्याहोस्विदेकतरम्? यदाप्येकतरं तदापि किं ब्रह्म प्रतिषेधति, रूपे ' द्वे वा ब्रह्मणो ० ' ( ब्रह्म के दो रूप हैं मूर्त और अमूर्त ) इस प्रकार उपक्रम कर पाँच महाभूत दो राशि में विभक्तकर पुरुषशब्दसे कथित अमूर्तसारके महारजन ( हरिद्रा - हल्दी के समान ) आदि रूप दिखलाकर ' अथात आदेशो ० ' ( अब इसके अनन्तर ' नेति नेति ' यह ब्रह्मका आदेश है ' नेति नेति ' इससे बढ़कर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है अतः ब्रह्म है ) इस प्रकार श्रुति पुनः कहती है । यहाँ इस प्रतिषेधका विषय ( प्रतिषेध्य ) क्या है, ऐसी हम जिज्ञासा करते हैं । क्योंकि यहाँ ' यह वह ' ऐसा विशे-षित कोई प्रतिषेध्य उपलब्ध नहीं होता । ' इति ' शब्द तो यहाँ किसी भी प्रतिषेध्यका समर्पण करता है, क्योंकि ' नेति ' नेति ' इसमें नञ् ( न ) प्रयोग ' इति ' परक है, और संनिहितका आलम्बन करनेवाला यह ' इति ' शब्द ‘ एवं ' शब्दका तुल्यार्थंक ' इति ह स्मोपाध्यायः ० ' ( ऐसा उपाध्यायने कहा ) इत्यादिमें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । और यहाँ प्रकरणकी सामर्थ्य से प्रपञ्च युक्त ब्रह्म के दो रूप सन्निहित हैं; जिसके ये दो रूप हैं वह ब्रह्म है । यहाँपर हमें संशय उत्पन्न होता है- क्या यह प्रतिषेध दो रूपों और रूपवत् इन दोनोंका प्रतिषेध करता है अथवा दोनोंमें एकका? यद्यपि एकका प्रतिषेध करता है तो सत्यानन्दी - दीपिका कल्पित आकार में और उसकी उपासनासे अभ्युदय आदिकी सिद्धिमें तात्पर्य है और ' अस्थूलम ० ' इत्यादि निर्गुण श्रुतियोंका ब्रह्मात्मतत्त्व की अवगति - ज्ञानमें तात्पर्य है, अतः हमारा कहा हुआ यह विभाग ही अधिक युक्त है || २१ ॥ * पृथिवी, जल और तेज ये तीन भूत मूर्त हैं । वायु और आकाश ये दो अमूर्त हैं । इस प्रकार दो राशियोंको कहकर दो अमूर्तं भूतोंका सार ' करणात्मा हिरण्यगर्भो य एष एतस्मिन्सूर्यमण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षिणि पुरुषः ' ( इस सूर्यमण्डल में जो यह इन्द्रियरूप हिरण्यगर्भ पुरुष है और दक्षिण नेत्रमें जो यह पुरुष है ) इसप्रकार पुरुष शब्दसे कहा गया है । उसका वासनामय विचित्र स्वरूप ‘ तद्यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वादिकं यथेन्द्रगोपः ' ( बृ ० २।३।६ ) ( जैसा हल्दी में रङ्गा हुआ वस्त्र, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र, जैसा इन्द्रगोप - वीरबहूटी ) इत्यादि उपमाओंसे कहा गया है ।

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अधि ० ६ सू ० २२ ] भाषानुवाद सत्यानन्दो - दो पिकासहित ६२ ९ परिशिनष्टि अहोस्विद्र प्रतिषेधति, ब्रह्म परिशिनष्टोति? तत्र प्रकृतत्वाविशेषादुभयमपि प्रतिषेधतीत्याशङ्कामहे । द्वौ चैतौ प्रतिषेधौ, द्वितिशब्दप्रयोगात् । तयोरेकेन सप्रपञ्चं ब्रह्मणो रूपं प्रतिषिध्यते, अपरेण रूपवद्ब्रह्मेति भवति मतिः । अथवा ब्रह्मैव रूप-वत्प्रतिषिध्यते, तद्वि वाङ्मनसातीतत्वादसंभाव्यमानसद्भावं प्रतिपेधार्हम् नतु रूप-प्रपञ्चः प्रत्यक्षादिगोचरत्वात्प्रतिषेधार्हः । अभ्यासस्त्वादरार्थ इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः -न तावदुभयप्रतिषेध उपपद्यते, शून्यवादप्रसङ्गात् । कंचिद्धि परमार्थमालम्व्यापरमार्थः प्रतिषिध्यते यथा रज्ज्वादिषु सर्पादयः । तच्च परिशिष्यमाणे कस्मिंश्चिद्भावेऽवकल्प्यते । उभयप्रतिषेधे तु कोऽन्यो भावः परिशिष्येत? अपरिशिष्यमाणे चान्यस्मिन्य इतरः प्रतिषेद्ध मारभ्यते प्रतिषेधुमशक्यत्वात्तस्यैव परमार्थत्वापत्तेः प्रतिषेधानुपपत्तिः । नापि ब्रह्मप्रतिषेध उपपद्यते, ' ब्रह्म ते वाणि ' ( बृह ० २ | १ | १ ) इत्याद्युपक्रमविरोधात् । ' असन्नेव स भवति । असदुद्ब्रह्मेति वेद चेत् ' ( तैसि ० २।६।१ ) इत्यादिनिन्दाविरोधात्, ' अस्तीत्येवो -पलब्धव्यः ' ( कठ ० ६।१.३ ) इत्यवधारणविरोधात् सर्ववेदान्तव्याकोपप्रसङ्गाच्च । वाङ्म-भी क्या ब्रह्मका प्रतिषेध करता है और दो रूपोंको अवशिष्ट रखता है, अथवा दो रूपोंका प्रतिषेव करता है और ब्रह्मको अवशिष्ट रखता है? पूर्वपक्षी - प्रकृतत्व के समान होनेसे यहाँ दोनों का प्रतिषेध करता है ऐसी हम आशङ्का करते हैं । ये दो प्रतिषेध हैं, क्योंकि ' नेति ' शब्दका दो वार प्रयोग है । उन दो शब्दों में एकसे प्रपञ्च युक्त ब्रह्म के रूपका प्रतिषेत्र किया जाता है और दूसरेसे रूपवद् ब्रह्मका, ऐसी मति होती है, अथवा रूपवद् ब्रह्मका ही प्रतिषेध होता है, क्योंकि वाणी और मनसे अतीत होने से उसका अस्तित्व नहीं हो सकता अतः वह प्रतिषेधके योग्य है, किन्तु रूपप्रपञ्च प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों का विषय होने से प्रतिषेधके योग्य नहीं है । ' नेति नेति ' यह अभ्यास ( दो वार कथन ) तो आदरके लिए है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं—- शून्यवादके प्रसङ्ग होनेसे दोनोंका प्रतिषेध उपपन्न नहीं होता, क्योंकि किसी परमार्थका आश्रयकर अपरमार्थका प्रतिषेध किया जाता है । जैसे रज्जु आदि -में सर्प आदिका । परन्तु वह किसी भावके परिशिष्ट होनेपर हो सकता है, किन्तु दोनों सबके प्रतिषेध होनेपर कौन अन्य भाव अवशिष्ट रहेगा? अन्य भावके अवशिष्ट न होनेपर जिस अन्य भावका प्रतिषेध आरम्भ किया जाता है, उसका प्रतिषेध न हो सकने के कारण उसीमें परमार्थत्व प्रसक्त होनेसे प्रति-tant अनुपपत्ति है, और ब्रह्मका भी प्रतिषेध युक्त नहीं है, क्योंकि ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' ( मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ ) इत्यादि उपक्रमसे विरोध होता है और ' असन्नेव ० ' ( यदि पुरुष ' ब्रह्म असत् है ' ऐसा जानता है, तो वह स्वयं असत् ही हो जाता है ) इत्यादि निन्दासे विरोध होता है और ' अस्तीत्येवो-सत्यानन्दी -दीपिका कोई लोग श्रुतिको उपलक्षण मानकर ' सूक्ष्म पाँच भूत अमूर्त हैं और पञ्चीकृत पाँच भूत मूर्त हैं ' इससे अमूर्तोंके रस कहनेसे करणोंमें पाँच भौतिकत्वकी सिद्धि करते हैं । और यहाँ ' नेति नेति ' इस प्रतिषेधक-का प्रतिषेध्य विकल्पकर माध्यमें दिखलाया गया है । निषेव श्रुतियोंसे ब्रह्मका जो निर्विशेषरूप सिद्ध किया गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि वे तो ब्रह्मका मी निषेध करते हैं, इसप्रकार दृष्टान्त संगतिसे पूर्वपक्ष करते हैं । पूर्वपक्षोने ' नेति नेति ' से रूपवद् ब्रह्म और दो रूपोंका निषेध किया है । परन्तु निरधिष्ठानक निषेध नहीं देखा जाता, अतः सबका निषेध युक्त नहीं है । इस अरुचिसे ' अथवा ' इत्यादि से कहते हैं । पूर्वपक्ष में ' तत्त्वमसि ' इस वाक्य स्थित ' तत् ' ( ब्रह्म ) पदार्थ के अभाव होनेसे अभेदकी असिद्धि है और सिद्धान्त में ' तत् ' पदार्थका अस्तित्व होनेसे अभेद सिद्ध है । * उपाधिके हट जाने अथवा निषेव किये जानेपर मो उपहितका निषेध नहीं हो सकता । जैसे मुखके आगेसे दर्पण आदिके हटाये जानेपर मुखका अभाव अथवा अप्रतीति नहीं होती, वैसे ही

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६३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० नसातीतत्वमपि ब्रह्मणो नाभावाभिप्रायेणाभिधीयते । नहि महता परिकरबन्धेन ' ब्रह्म-विदाप्नोति परम् ' ( तै ० २1१1१ ), ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २।१११ ) इत्येवमादिना वेदान्तेषु ब्रह्म प्रतिपाद्य तस्यैव पुनरभावोऽभिलप्येत । ' प्रक्षालनादि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' इति हि न्यायः । * प्रतिपादनप्रक्रिया त्वेषा- ' यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह ' ( तै ० २४५ ) इति । एतदुक्तं भवति वाङ्मनसातीतमविषयान्तःपाति प्रत्यगात्मभूतं नित्यशुद्धबुद्धमुक्त-स्वभावं ब्रह्मेति । तस्माद्ब्रह्मणो रूपप्रपञ्चं प्रतिषेधति परिशिनष्टि ब्रह्मेत्यभ्युपगन्तव्यम् । तदेतदुच्यते - प्रकृतैतावत्वं हि प्रतिषेधतीति । प्रकृतं यदेतावदियत्तापरिच्छिन्नं मूर्तीमूर्त लक्षणं ब्रह्मणो रूपं तदेष शब्दः प्रतिषेधति । तद्धि प्रकृतं प्रपञ्चितं च पूर्वस्मिन्ग्रन्थेऽधिदैव-तमध्यात्मं च तजनितमेव च वासनालक्षणमपरं रूपममूर्तर सभूतं पुरुषशब्दोदितं लिङ्गात्म व्यपाश्रयं महारजनाद्युपमाभिदर्शितम्, अमूर्तरसस्य पुरुषस्य चक्षुर्याद्यरूपयोगित्वानुप-पत्तेः । तदेतत्सप्रपञ्चं ब्रह्मणो रूपं संनिहितालम्बनेनेतिकरणेन प्रतिपेधकं न प्रत्युपनी-यत इति गम्यते । ब्रह्म तु रूपविशेषणत्वेन षष्ठ्या निर्दिष्टं पूर्वस्मिन्ग्रन्थे, न स्वप्रधानत्वेन । पलब्धव्यः ' ( है, इसप्रकार उसकी उपलब्धि करनी चाहिए ) इत्यादि अवधारणका विरोध है और सब वेदान्तों के विरोधका प्रसङ्ग आता है । ब्रह्म वाणी और मनका अविषय है, तो भी वह अभाव के अभिप्रायसे नहीं कहा जाता, क्योंकि ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( ब्रह्मवेत्ता परब्रह्मको प्राप्त होता है ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंसे वेदान्तोंमें महान् प्रयत्नसे ब्रह्मका प्रतिपादन कर पुन: उसीका अभाव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' प्रक्षालनाद्धि ० ' ( कीचड़को अङ्ग में लगाकर धोनेकी अपेक्षा उसका दूरसे ही अस्पर्श श्रेष्ठ है ) ऐसा ही न्याय है । ' यतो वाचो निवर्तन्ते ० ' ( जहाँ से मन सहित वांणी उसे न पाकर लौट आती हैं ) यह तो [ ब्रह्म के ] प्रतिपादन करनेकी प्रक्रिया है । तात्पर्य यह है कि ब्रह्म वाणी और मनसे अतीत है, इससे वह विषयोंके अन्तर्भूत नहीं है, अतः प्रत्यगात्मरूप, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव है । इसलिए श्रुति ब्रह्मके रूपप्रपञ्चका प्रतिषेध करती है और ब्रह्मको अवशिष्ट रखती है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए । इससे यह कहते हैं - ' प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ' प्रकृत ब्रह्मका जो इयत्तासे परिच्छिन्न मूर्त और अमूर्तरूप है उसका यह श्रुति प्रतिषेध करती है, क्योंकि उस प्रकृत अधिदैवत और अध्यात्मका पूर्वग्रन्थ में विस्तारसे वर्णन किया गया है, उससे उत्पन्न हुआ वासनालक्षण दूसरा रूप अमूर्तका सारभूत जो पुरुषशब्दसे कहा गया है और लिङ्गा-व्यपाश्रय है और महारजन आदि उपमाओंसे दिखलाया गया है, क्योंकि अमूर्तका सारभूत पुरुष चक्षुसे ग्राह्यरूपसे युक्त नहीं हो सकता । ब्रह्मका वह सप्रपञ्चरूप संनिहितका आश्रयण करनेवाले ' इति ' के द्वारा प्रतिषेधक ' नञ ' के प्रति विषय रूप से स्थापित किया जाता है, ऐसा ज्ञात होता है । ब्रह्म तो रूपके विशेषणरूप से षष्ठी द्वारा पूर्व ग्रन्थ में निर्दिष्ट है स्व प्रधानरूपसे नहीं । उसके दो रूपों का विस्तारपूर्वक सत्यानन्दी - दीपिका अविद्या और अविद्यासे कल्पित प्रपञ्चके प्रतिषेध करनेपर भी उपहित ब्रह्मका अभाव वा अप्रतीति नहीं हो सकती । अतः निर्विशेष ब्रह्म श्रुति सिद्ध है । * ' द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे ' इसप्रकार प्रधान होनेसे यहाँ दो रूप ही प्रकृत हैं, अतः उनका ही ' नेति नेति ' से प्रतिषेध है । ब्रह्म तो षष्ठी विभक्तिसे निर्दिष्ट होनेसे अप्रधान है । यदि षष्ठी विभक्तिसे निर्दिष्टका भी प्रधानरूपसे स्वीकार कर निषेध करें, तो ' राज्ञो भृत्यो नास्ति ' ( राजाका सेवक नहीं है ) यहाँपर सेवकके निषेधसे राजाका मी निषेध प्रसक्त होगा? अतः ब्रह्म निषेध्य नहीं है । शङ्का - प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे सिद्ध द्वैत्तका निषेध करनेपर उसके साथ विरोध होगा? समाधान -किन्तु मारम्भाधिकरण में प्रत्यक्ष आदिकी व्यावहारिक प्रमाणता स्थापन की गई है, पारमार्थिक नहीं,

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अधि ० ६ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६३१ प्रपञ्चिते च तदीये रूपद्वये रूपवतः स्वरूपजिज्ञासायामिदमुपक्रान्तम्- ' अथात आदेशो नेति नेति ' ( बृह ० २।३! ६ ) इति । तत्र कल्पितरूपप्रत्याख्यानेन ब्रह्मणः स्त्ररूपावेदनमिदमिति निर्णीयते । तदास्पदं हीदं समस्तं कार्य नेति नेतीति प्रतिषिद्धम् । युक्तं च कार्यस्य वाचा-रम्भणशब्दादिभ्यो ऽसत्त्वमिति नेति नेतीति प्रतिषेधनं नतु ब्रह्मणः सर्वकल्पनामूलत्वात् । न चात्रेयमाशङ्का कर्तव्या - कथं हि शास्त्रं स्वयमेव ब्रह्मणो रूपद्वयं दर्शयित्वा स्वयमेव पुनः प्रतिषेधति - ' प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' इति । यतो नेदं शास्त्रं प्रतिपाद्यत्वेन ब्रह्मणो रूपद्वयं निर्दिशति, लोकप्रसिद्धं त्विदं रूपद्वयं ब्रह्मणि कल्पितं परामृशांत प्रति-षेध्यत्वाय शुद्धब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनाय चेति निरवद्यम् । द्वौ चैतौ प्रतिषेधौ यथासंख्य-न्यायेन द्वे अपि मूर्तीमूर्ते प्रतिषेधतः । यद्वा - पूर्वः प्रतिषेधो भूतराशिं प्रतिषेधति, उत्तरो वासनाराशिम् । अथवा - ' नेति नेति ' ( बृह ० २/३/६ ) इति वीप्सेयमितीति यावत्किचिदुत्प्रे क्ष्यते तत्सर्वं न भवतीत्यर्थः । परिगणितप्रतिषेधे हि क्रियमाणे यदि नैतद्ब्रह्म किमन्य-ब्रह्म भवेदिति जिज्ञासा स्यात् । वीप्सायां तु सत्यां समस्तस्य विषयजातस्य प्रति-षेधादविषयः प्रत्यगात्मा ब्रह्मेति जिज्ञासा निवर्तते । तस्मात्प्रपञ्चमेव ब्रह्मणि कल्पितं प्रतिषेधति परिशिनष्टि ब्रह्मेति निर्णयः । * इतचैष एव निर्णयः यतस्ततः प्रतिषेधाद्भूयो वर्णन होनेसे रूपवत् के स्वरूपकी विज्ञासा होनेपर ' अथात आदेशो नेति नेति ' ऐसा उपक्रम किया गया है | यहाँ कल्पितरूपके प्रत्याख्यान द्वारा ब्रह्मका यह स्वरूप ज्ञान है, ऐसा निर्णय होता है, क्योंकि तद्वि-षयक यह समस्त कार्य ' नेति नेति ' इससे प्रतिषिद्ध है, और वाचारम्भण शब्द आदिसे कार्य असत् - मिथ्या है | अतः ' नेति नेति ' इससे उसका प्रतिषेव युक्त है किन्तु ब्रह्मका नहीं, क्योंकि वह सर्वकल्पनाओंका मूल है । यहाँ पर यह शङ्का नहीं करनी चाहिए कि स्वयं ही शास्त्र ब्रह्म के दो रूप दिखलाकर पुन । स्वयं ही ' प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' इसप्रकार उसका प्ररिषेध कैसे करता है, क्योंकि यह शास्त्र ब्रह्म के दो रूपों का प्रतिपाद्यरूपसे निर्देश नहीं करता, किन्तु लोक प्रसिद्ध और ब्रह्ममें कल्पित इन दोनों रूपों का प्रतिषेध्यत्व और शुद्ध ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादन करनेके लिए परामर्श करता है, इसप्रकार कोई दोष नहीं है । ये दो प्रतिषेव यथासंख्य न्यायसे मूर्त और अमूर्त दो रूपोंका प्रतिषेध करते हैं । अथवा पूर्व ( नेति ) प्रतिषेध भूतसमुदायका प्रतिषेध करता है और दूसरा प्रतिषेध वासना राशिका प्रतिषेध करता है । ' अथवा ' नेति नेति ' यह वीप्सा है, इससे जिस किसीकी कल्पनाकी जा सकती है, वह सब ब्रह्म नहीं है, ऐसा अर्थ है । क्योंकि परिगणित प्रतिषेध किये जानेपर यदि यह ब्रह्म नहीं है, तो क्या अन्य ब्रह्म है, ऐसी जिज्ञासा होगी । और वीप्सा होनेपर तो सम्पूर्ण विषय समुदायके प्रतिषेध होनेसे प्रत्यगात्मा ब्रह्म अविषय है, इस प्रकार जान लेनेपर जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है । इसलिए यह निषेध शास्त्र ब्रह्ममें कल्पित प्रपश्वका ही प्रतिषेध करता है और ब्रह्मका परिशेष ( अवशिष्ट ) करता है, ऐसा निर्णय है । और इससे मो यही निर्णय है, क्योंकि उस प्रतिषेधसे ' अन्यत्परमस्ति ' ( अन्य सत्यानन्दी - दीपिका अतः ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं ० ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे कार्यमात्रमें मिध्यात्व सिद्ध होता है | इसलिए पारमार्थिक दृष्टिसे ही कार्यमात्र में मिध्यात्वका उपपादन कर ' नेति नेति ' इससे निषेध किया गया है । किन्तु व्यावहारिक सत्ताको लेकर प्रत्यक्ष आदिका निषेध नहीं किया जाता, अतः कोई विरोध नहीं है । * यदि प्रपञ्च प्रतिषेधसे पृथक् ' अन्यत्परमस्ति ' यह आदेश ब्रह्मविषयक नहीं, तो ' सत्यस्य-सत्यमिति ' इसप्रकार प्रश्न और प्रतिवचन अनुपपन्न होंगे और शून्यवाद प्रसक्त होगा । यदि ब्रह्म पर्यन्त प्रतिषेध माना जाय तो यह प्रश्न और प्रतिवचन संगत होते हैं । इसलिए परमार्थं सब्रह्म पर्यन्त ही प्रतिषेध मानना युक्त है ॥ २२ ॥

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६३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ ब्रवीति --- ' अन्यत्परमस्ति ' ( बृह ० २ | ३ | ६ ) इति । अभावावसाने हि प्रतिषेधे क्रियमाणे किमन्यत्परमस्तीति ब्रूयात् । तत्रैषाक्षरयोजना - नेति नेतीति ब्रह्मादिश्य तमेवादेशं पुनर्निर्वक्ति । नेति नेतीत्यस्य कोऽर्थः? न ह्येतस्माद्ब्रह्मणो व्यतिरिक्तमस्तीत्यतो नेति नेतीत्युच्यते, न पुनः स्वयमेव नास्तीत्यर्थः । तच्च दर्शयति - अन्यत्परमप्रतिषिद्धं ब्रह्मा-स्तीति । यदा पुनरेवमक्षराणि योज्यन्ते नह्येतस्मादिति नेति नेति, नहि प्रपञ्चप्रतिषेध-रूपादादेशनादन्यत्परमादेशनं ब्रह्मणोऽस्तीति, तदा ' ततो ब्रवीति च भूय ' इत्येतन्नामधेय-विषयं योजयितव्यम् । अथ नामधेयम् - ' सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ' ( बृह ० २।१।२० ) इति हि ब्रवीतीति । तच्च ब्रह्मावसाने प्रतिषेधे समञ्जसं भवति । अभावावसाने तु प्रतिषेधे किं सत्यस्य सत्यमित्युच्येत? तस्माद्ब्रह्मावसानोऽयं प्रति-षेधो नाभावावसान इत्यध्यवस्यामः || २२ ॥ तदव्यक्तमाह हि ॥ २३ ॥

पदच्छेद - तत्, अव्यक्तम् आह हि । सूत्रार्थ - ( तदव्यक्तम् ) वह ब्रह्म अव्यक्त है, ( हि ) क्योंकि ( आह ) ' न चक्षुषा गृह्यते ' इत्यादि श्रुति ऐसा कहती है । यत्प्रतिषिद्धात्प्रपञ्चजातादन्यत्परं ब्रह्म तदस्ति चेत्कस्मान्न गृह्यत इति । उच्यते-तदव्यक्तमनिन्द्रियग्राह्यं सर्वदृश्यसाक्षित्वात् । आह ह्येवं श्रुतिः - ' न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ' ( मुण्ड ० ३ | १ | ८ ) ' स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यते ' ( वृ ० ३।९ ।२६ ) ' यत्तददेश्यमग्राह्यम् ' ( मुण्ड ० १ | १ | ६ ) ' यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृइयेऽनात्म्येऽ-निरुक्तेऽनिलयने ' ( तै ० २ | ७ | १ ) इत्याद्या | स्मृतिरपि - ' अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽय-मुच्यते ' ( म ० गी ० २।२५ ) इत्याद्या ॥ २३ ॥

परम है ) ऐसा श्रुति पुन: कहती है । प्रतिषेधका अभावमें पर्यवसान करनेपर तो श्रुति ' अन्यत्परमस्ति ' ऐसा क्यों कहती । यहाँ इसप्रकार अक्षर योजना है - ' नेति नेति ' इस प्रकार ब्रह्मका आदेशकर पुनः उसी आदेशका निर्वचन करती है । ' नेति नेति ' इसका क्या अर्थ है उस ब्रह्मसे अतिरिक्त कुछ नहीं है, अत: ' नेति नेति ' ऐसा कहा जाता है, ब्रह्म स्वयं ही नहीं है, ऐसा अर्थ नहीं है । मोर अन्य परम अप्रतिषिद्ध ब्रह्म है, ऐसा अवशिष्ट उस ब्रह्मको दिखलाती है । यदि इसप्रकार अक्षरोंकी योजना की जाय कि ' नेति नेति ' यह नहीं, यह नहीं, इस उपदेश से ब्रह्म उपदिष्ट नहीं है, प्रपञ्च प्रतिषेधरूप आदेश से ' अन्यत्परमस्ति ' यह आदेश ब्रह्मका नहीं है, तो ' ततो ब्रवीति च भूय: ' इस सूत्रांशकी नाम विषयक योजना करनी चाहिए । ' सत्यस्थ सत्यमिति ० ' ( सत्यका सत्य प्राण ही सत्य है, उनका ही यह सत्य है ) इसप्रकार नामधेयको श्रुति कहती है । और वह नामधेय, प्रतिषेधका ब्रह्म में पर्यवसान होने पर संगत होता है, और प्रतिषेधका अभाव में पर्यवसान होनेपर तो सत्यसा सत्य कौन कहा जायगा । इसलिए यह प्रतिषेधावसानक ब्रह्म है अभाव अवसानक नहीं है, ऐसा हम निश्चय करते हैं ॥ २२ ॥

प्रतिषिद्ध प्रपञ्च समूहसे अन्य जो परब्रह्म है यदि वह है तो गृहीत क्यों नहीं होता? कहते हैं-वह अव्यक्त है इन्द्रिय अग्राह्य है, क्योंकि वह सम्पूर्ण दृश्यका साक्षी है । और ' न चक्षुषा ० ' ( उस आत्मका न नेत्रसे ग्रहण किया जाता है, न वाणीसे, न अन्य इन्द्रियोंसे और न तप अथवा कर्मसे ही ) ' स एष ० ' ( नेति नेति, ऐसा कहकर मधुकाण्ड में निरूपण किया है वह आत्मा अग्राह्य है, क्योंकि उसका ग्रहण नहीं किया जाता ) ' यत्तददेश्यमग्राह्यम् ' ( यह जो अदृश्य और अग्राह्य है ) ' यदाह्येवैष ० ( जिस समय वह साधक इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वाच्य और निराधार ब्रह्म में अभय स्थिति प्राप्त करता है उस समय यह अमयको प्राप्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति इसप्रकार कहती है । और

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अधि ० ६ सू ० २४-२५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६३३ अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ २४ ॥

पदच्छेद - अपि च, संराधने, प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् । सूत्रार्थ - ( अपि ) और योगी लोग उस अव्यक्त आत्माको ( संराधने ) ध्यानके समय देखते हैं, ( प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ) क्योंकि ' कश्चिद्धीरः ' ' यं विनिद्रों ' इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे ऐसा अवगत होता है । अपि चैनमात्मानं निरस्तसमस्तप्रपञ्चमव्यक्तं संराधनकाले पश्यन्ति योगिनः । संराधनं व भक्तिध्यानप्रणिधानाद्यनुष्ठानम् । कथं पुनरवगम्यते - संराधनकाले पश्य-न्तीति । प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थः । तथा हि श्रुतिः - ' पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्विद्वीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद | वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ' ( क ० ४। १ ) इति । ' ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ' ( मु ० ३ | १ | ८ ) इति चैवमाद्या | स्मृतिरपि - ' यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः । ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥ योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ' इति चैवमाद्या ॥२४ ॥

ननु संराध्यसंराधकभावाभ्युपगमात्परापरात्मनोरन्यत्वं स्यादिति नेत्युच्यते-प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॥ २५ ॥

पदच्छेद - प्रकाशादिवत्, च, अवशेष्यम्, प्रकाशः, च, कर्मणि, अभ्यासात् । सूत्रार्थ - ( प्रकाशादिवत् ) जैसे प्रकाश आदि अङ्गुलि आदि उपाधिमें मिन्न - सा प्रतीत होने पर भी वस्तुतः एकरूप है, वैसे ( प्रकाशः ) परमात्मा भी ( कर्मणि ) ध्यान आदिमें भिन्न- सा माता हुआ ( अवशेष्यम् ) वस्तुतः एक रूप है, ( अभ्यासात् ) क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इत्यादि अभेद श्रुतिका अभ्यास है । यथा प्रकाशाकाशसवितृप्रभृतयोऽङ्गुलिकर कोदकप्रभृतिषु कर्मसूपाधिभूतेषु सवि-' अव्यक्तोऽयम् ० ' ( यह आत्मा अव्यक्त - इन्द्रियोंका अविषय, यह अचिन्त्य - मनका अविषय और यह विकार रहित कहा जाता है ) इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है ॥ २३ ॥

और समस्त प्रपञ्चसे शून्य, अव्यक्त इस आत्माको योगी लोग संराधन समय में देखते हैं । भक्ति, ध्यान, प्रणिधान आदिका अनुष्ठान संराधन है । परन्तु यह कैसे जाना जाता है कि योगी लोग उसे ध्यान कालमें देखते हैं? प्रत्यक्ष और अनुमानसे- श्रुति और स्मृतिसे [ ऐसा अवगत होता है ] ऐसा अर्थ है | जैसे कि ' पराञ्चि खानि ० ' ( स्वयम्भु ईश्वरने छिद्रोपलक्षित इन्द्रियोंको बहिर्मुखकर हिंसित कर दिया है, इससे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्मा को नहीं । जिसने अमृतत्व - मोक्षकी इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यागात्माको देख पाता है ) और ' ज्ञानप्रसादेन ० ' ( ज्ञान प्रसादसे पुरुष विशुद्ध चित्त हो जाता है और तभी वह ध्यान करते हुए उस निष्कल आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है ) इत्यादि श्रुति और ' यं विनिद्रा ० ' ( निद्रारहित-तमोगुण रहित, श्वासको जीतनेवाले, सन्तुष्ट और संयतेन्द्रिय पुरुष ध्यान करते हुए जिस ज्योतिको देखते हैं, उस योगलभ्य आत्माको नमस्कार है, उस सनातन भगवान्को योगी लोग सम्यग्रूपसे देखते हैं ) इत्यादि स्मृति भी है ॥ २४ ॥

परन्तु संराध्य और संराधकभाव स्वीकार करनेसे पर और अपर आत्माओं में भेद हो जायगा? नहीं, ऐसा कहते हैं-जैसे प्रकाश, आकाश, सविता आदि अङ्गुलि, कमण्डलु, जल आदि उपाधि भूत कम में विशेष मासते हैं, परन्तु अपने स्वाभाविक साधारणरूपको नहीं छोड़ते, वैसे ही यह आत्मभेद

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६३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० शेषा इवावभासन्ते, नच स्वाभाविकीमविशेषात्मतां जहति, एवमुपाधिनिमित्त एवाय-मात्मभेदः स्वतस्त्वैकात्म्यमेव । तथाहि-- वेदान्तेष्वभ्यासेनासकृजीवप्राज्ञयोरभेदः प्रतिपाद्यते ॥ २५ ॥

असोऽनन्तेन तथाहि लिङ्गम् ॥ २६ ॥

पदच्छेद - अतः, अनन्तेन, तथा, हि, लिङ्गम् । सूत्रार्थ - ( अतः ) भेदके औपाधिक होनेसे विद्यासे उसकी निवृत्ति अनन्त परमात्मा के साथ एक हो जाता है, क्योंकि ( तथाहि लिङ्गम् ) वैसा ही ' स यो ह वै ० ' इत्यादि श्रुति है । अतश्च स्वाभाविकत्वादभेदस्याविद्या कृतत्वाच्च भेदस्य होनेपर जीव ( अनन्तेन ) लिङ्ग - ज्ञापक है अर्थात् विद्ययाऽविद्यां विधूय जीवः परेणानन्तेन प्राज्ञेनात्मनैकतां गच्छति । तथाहि लिङ्गम् -'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मु ० ३।२।९ ) ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' ( बृह ० ४।४।६ ) इत्यादि ॥ २६ ॥

उभयव्यपदेशाखहि कुण्डलवत् ॥ २७ ॥

पदच्छेद – उभयव्यपदेशात्, तु, अहिकुण्डलवत् । सूत्रार्थ -- ( अहिकुण्डलवत् ) जैसे सर्परूपसे अभेद है और कुण्डल आदि रूपसे भेद है, वैसे ही ( उमयव्यपदेशात् ) ध्यातृ और ध्येयभावसे और ' तत्त्वमसि ' आदिसे जीव और ईश्वरमें भेद और अभेद दोनोंका व्यपदेश है । ( तु ) शब्द विलक्षणताका द्योतक है । तस्तिन्ने व संराध्यसंराधकभावे मतान्तरमुपन्यस्यति स्वमतविशुद्धये । क्वचिज्जीव-प्राज्ञयोर्भेदो व्यपदिश्यते ' ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ' ( मुण्ड ० ३।१1८ ) इति ध्यातृ-ध्यातव्यत्वेन द्रष्टृद्रष्टव्यत्वेन च । ' परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ' ( मु ० ३।२।८ ) इति गन्तृ-गन्तव्यत्वेन । ' यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति ' इति नियन्तृनियन्तव्यत्वेन च । कचित्तु तयोरेवाभेदो व्यपदिश्यते - ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ) ' अहं ब्रह्मास्मि ' ( बृह ० १।४।१० ) ' एष त आत्मा सर्वान्तरः ' ( बृह ० ३ | ४ | १ ) ' एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ' ( बृह ०३।७।३ ) इति । तत्रैव-मुभयव्यपदेशे सति यद्यभेद एवैकान्ततो गृह्यते भेदव्यपदेशो निरालम्बन एव स्यात् । उपाधि निमित्तक ही है स्वतः तो एक रूप ही है, क्योंकि वेदान्त वाक्यों में अभ्याससे अनेक वार जीव और प्राज्ञका अभेद प्रतिपादित किया जाता है ॥ २५ ॥

और इससे अभेदके स्वाभाविक होनेसे और भेदके अविद्याकृत होनेसे विद्या द्वारा अविद्याकी निवृत्तिकर जीव पर अनन्त प्राज्ञात्मा के साथ एकताको प्राप्त होता है, क्योंकि ' स यो ह बै ० ' ( जो उस परब्रह्मको जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है ) ' ब्रह्मैव ० ' ( ब्रह्म होकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि लिङ्ग- ज्ञापक है ॥ २६ ॥

उसी संराध्य- संराधकभावमें स्वमतकी विशुद्धिके लिए अन्य मतका उपन्यास करते है । ' ततस्तु तं पश्यते ० ' ( तो उससे वह ध्यान करता हुआ उस निष्कल आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है ) इस तरह कहीं पर ध्यातृ - ध्यातव्यरूपसे और द्रष्टृ - द्रष्टव्यरूपसे, और ' परात्परं ० ' ( परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ) इस प्रकार कहोंपर गन्तृ - गन्तव्यरूपसे, और ' यः सर्वाणि ० ' ( जो सब भूतों का उनके अन्तर रहकर नियमन करता है ) इस प्रकार कहीं पर नियन्तृ - नियन्तव्यरूपसे जीव और परमात्माके भेदका व्यपदेश किया जाता है । और ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ' एष त ० ' ( यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है ) और ' एष त ० ' ( वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ) इस प्रकार कहीं पर तो उन दोनों में अभेदका ही व्यपदेश किया जाता है । इस प्रकार वहाँ दोनोंके व्यपदेश होनेपर यदि एकान्तत अभेदका ही ग्रहण किया जाय तो भेद व्यपदेश निरालम्बन ही हो जायगा । अतः उमय व्यपदेशके दर्शनसे अहिकुण्डलके समान यहाँ तत्त्व होना युक्त है । जैसे ' सर्प ' इस प्रकार अभेद है

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अधि ० ६ सू ० २८-२९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६३५ अत उभयव्यपदेशदर्शनादद्दिकुण्डलवदत्र तत्त्वं भवितुमर्हति । यथाहिरित्यभेदः कुण्डला-भोगप्रांशुत्वादीनीति तु भेद एवमिहापीति ॥ २७ ॥

प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ २८ ॥

पदच्छेद - प्रकाशाश्रयवत्, वा, तेजस्त्वात् । सूत्रार्थ - ( वा ) अथवा ( प्रकाशाश्रयवत् ) जैसे प्रकाश और उसके आश्रय सूर्यं दोनोंमें अत्यन्त भेद नहीं है, ( तेजस्त्वात् ) क्योंकि दोनोंमें तेजस्त्व समान है, वैसे जीव और ईश्वरमें मी भेद और अभेद समझना चाहिए । * अथवा प्रकाशाश्रयवदेतत्प्रतिपत्तव्यम् । यथा प्रकाशः सावित्रस्तदाश्रयश्च सविता नात्यन्तभिन्नावुभयोरपि तेजस्त्वाविशेषात् । अथ च भेदव्यपदेशभाजौ भवत एवमिहापीति ॥ २८ ॥

पूर्ववद्वा ॥ २ ९ ॥ पदच्छेद - पूर्ववत्, वा । सूत्रार्थ - ( वा ) अथवा ( पूर्ववत् ) ' प्रकाशादिवच्चावैशेष्यम् ' इस सूत्र में पहले भेद काल्प-निक और अभेद पारमार्थिक कहा गया है, उसके समान यहाँ भी समझना चाहिए । * यथा वा पूर्वमुपन्यस्तं प्रकाशादिवच्चा वैशेष्यमिति तथैवैतद्भवितुमर्हति । तथा-ह्यविद्याकृतत्वाद्बन्धस्य विद्यया मोक्षउपपद्यते । यदि पुनः परमार्थत एव बद्धः कश्चिदात्मा-हिकुण्डलन्यायेन परस्यात्मनः संस्थानभूतः प्रकाशाश्रयन्यायेन चैकदेशभूतोऽभ्युपगम्येत ततः पारमार्थिकस्य बन्धस्य तिरस्कर्तुमशक्यत्वान्मोक्षशास्त्रवैयर्थ्यं प्रसज्येत, न चात्रोभाव-पिभेदाभेदौ श्रुतिस्तुल्यवद्व्यपदिशति । अभेदमेव हि प्रतिपाद्यत्वेन निर्दिशति, भेदं तु और कुण्डल - वलयाकार, आभोग वक्राकार, दीर्घाकार आदि तो भेद है, वैसे यहां भी दोनोंमें जीवरूपसे भेद और ब्रह्मरूपसे अभेद है ॥ २७ ॥

अथवा प्रकाश और उसके आश्रयके समान यह समझना चाहिए । जैसे सूर्यका प्रकाश और उसका आश्रय सूर्य अत्यन्त भिन्न नहीं हैं, क्योंकि दोनोंमें भी तेजस्त्व समान है, किन्तु दोनों ही भेद व्यपदेशके भागी होते हैं, वैसे यहाँ मी समझना चाहिए ॥ २८ ॥

अथवा प्रकाश आदिके समान जीव और परमात्माका अभेद जैसे पूर्व में कहा गया है, वैसे ही यह होना युक्त है, क्योंकि बन्धके अविद्याकृत होनेसे विद्यासे मोक्ष उपपन्न होता है । यदि पुनः परमार्थ-से ही अहिकुण्डल न्याय से परमात्माका संस्थानभूत अथवा प्रकाशाश्रय न्यायसे एक देश भूत कोई बद्ध जीवात्मा स्वीकार किया जाय, तो पारमार्थिक बन्धका तिरस्कार ( निवृत्ति ) न हो सकनेसे मोक्षशास्त्र व्यर्थं हो जायगा, और यहाँ भेद और अभेद इन दोनोंका श्रुति समानरूपसे व्यपदेश नहीं करती । श्रुति अभेदका ही प्रतिपाद्यरूपसे निर्देश करती है, और पूर्व प्रसिद्ध भेदका तो अन्य अर्थकी सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे तेजस्त्व समान धर्मको लेकर सूर्यके प्रकाश और सूर्यमें अभेद है और प्रकाशत्व और सूर्यत्वको लेकर दोनोंमें भेद भी है, वैसे आत्मत्वको लेकर जीव और परमेश्वरमें अभेद है और जीवत्व और ईश्वरत्वको लेकर दोनोंमें भेद भी है ॥ २८ ॥

* भेद और अभेद इन दोनों का एक स्थलमें स्वीकार करनेसे लोकमें उनकी विरोधकथा लुप्त हो जायगी, अतः श्रुतितो अभेदका ही प्रतिपाद्यरूपसे उपन्यास करती है और ब्रह्म सिद्धिकी विवक्षासे अज्ञानावस्था में लोक प्रसिद्ध भेदका अनुवादमात्र करती है ॥ २ ९ ॥

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६३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ पूर्वप्रसिद्धमेवानुवदत्यर्थान्तरविवक्षया । तस्मात्प्रकाशादिवच्चा वैशेष्यमित्येष एव सिद्धान्तः ॥ २ ९ ॥ प्रतिषेधाच्च ॥ ३० ॥

पदच्छेद - प्रतिषेधात् च । सूत्रार्थ --- ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिसे परमात्मासे भिन्न चेतनका और ' नेति नेति ' इत्यादि श्रुतिस्रे ब्रह्म से भिन्न दृश्यमान प्रपञ्चका प्रतिषेध होनेसे अद्वितीय ब्रह्म ही अवशिष्ट है । * इतश्चैष एव सिद्धान्तः । यत्कारणं परस्मादात्मनोऽन्यं चेतनं प्रतिषेधति शास्त्रम् -'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( बृह ० ३।७।२३ ) इत्येवमादि । ' अथात आदेशो नेति नेति ' ( बृह ० २।३।६ ) ' तदेतद्ब्रह्मा पूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् ' ( बृह ० २।५।१ ९ ) इति च ब्रह्मव्यतिरि-क्तप्रपञ्च निराकरणाद्ब्रह्ममात्र परिशेषाच्चैष एव सिद्धान्त इति गम्यते ॥ ३० ॥

( ७ पराधिकरणम् । सू ० ३१-३७ ) परमतः सेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३१ ॥

पदच्छेद – परम्, अतः, सेतूम्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः । सूत्रार्थ - ( अतः ) इस ब्रह्मसे ( परम् ) अन्य वस्तु है, क्योंकि ( सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदे-शेम्य: ) सेतु, उन्मान, सम्बन्ध और भेदके व्यपदेशोंसे ऐसा ज्ञात होता है । * यदेतन्निरस्तसमस्तप्रपञ्चं ब्रह्म निर्धारितम्, अस्मात्परमन्यत्तत्त्वमस्ति नास्तीति श्रुतिविप्रतिपत्तेः संशयः । कानिचिद्धि वाक्यान्यापातेनैव प्रतिभासमानानि ब्रह्मणोऽपि पर-मन्यत्तत्त्वं प्रतिपादयन्तीव । तेषां हि परिहारमभिधातुमयमुपक्रमः क्रियते । परमतो ब्रह्मणो-ऽन्यत्तत्त्वं भवितुमर्हति । कुतः? सेतुव्यपदेशादुन्मानव्यपदेशात्संबन्धव्यपदेशाद्भ े दव्यप-विवक्षासे अनुवाद करती है । इसलिए ' प्रकाशादिवच्चावैशेष्यम् ' ' प्रकाश आदिके समान अभेद है ' यही सिद्धान्त है ॥ २ ९ ॥ इससे भी यही सिद्धान्त है, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि शास्त्र परमात्मासे अन्य चेतनका प्रतिषेध करता है, और ' अथात ० ' ( अब इसके अनन्तर ‘ नेति नेति ' यह ब्रह्मका आदेश है ) और ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित, कार्य रहित विजातीय द्रव्यसे रहित और अबाह्य है ) इस प्रकार ब्रह्मसे व्यतिरिक्त प्रपञ्चका निराकरण होने से ब्रह्ममात्रका परिशेष होनेसे यही सिद्धान्त है, ऐसा ज्ञात होता है ॥ ३० ॥

समस्त प्रपञ्चसे शून्य इस ब्रह्मका जो निर्धारण किया गया है, इससे भिन्न अन्य तत्त्व है कि नहीं? इस प्रकार श्रुतियोंकी विप्रतिपत्तिसे संशय होता है । आपातत: कोई प्रतिभासमान वाक्य ब्रह्मसे मीन अन्य तत्त्वका प्रतिपादन - सा करते हैं, उनका ही परिहार कहने के लिए यह उपक्रम किया जाता है । पूर्वपक्षी - इस ब्रह्मसे पर अन्य तत्त्व हो सकता है । किससे? इससे कि सेतुका व्यपदेश, उन्मानका व्यपदेश, सम्बन्धका व्यपदेश और भेदका व्यपदेश है । ' अथ य आत्मा ० ' ( जो आत्मा है वह विधारक सत्यानन्दी - दीपिका * इस प्रकार निषेध वाक्योंका विचार करनेपर निष्प्रपञ्च चिदेकरस ब्रह्म ही ' तत् ' पदसे लक्षित सिद्ध होता है, यही सिद्धान्त है ॥ ३० ॥

* ' नेति नेति ' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्म अतिरिक्त वस्तुका प्रतिषेध किया गया है, परन्तु सेतु आदि श्रुति से अन्य वस्तुका अस्तित्व प्रतीत होता है, इस प्रकार आक्षेप संगति से ' परम ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं । यद्यपि द्युभ्वाद्यधिकरणमें सेतु शब्दको गौण मानकर विधारकरूपसे उसका व्याख्यान किया. गया है, तो भी उन्मान आदि श्रुतियोंके तात्पर्यको न समझकर पूर्वपक्षी शङ्का करते हैं । इससे