श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 671–680

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 671–680

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अघि ० ७ सू ० ३१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६३७ देशाच्चेति । सेतुव्यपदेशस्तावत्- ' अथ य आत्मा स सेतुर्विधृति: ' ( छा ० ८ | 8 | १ ) इत्यात्मशब्दा-भिहितस्य ब्रह्मणः सेतुत्वं संकीर्तयति । सेतुशब्दच हि लोके जलसंतान विच्छेद करे मृद्दार्वादिप्रचये प्रसिद्धः, इह च सेतुशब्द आत्मनि प्रयुक्त इति लौकिक सेतोरिवात्मसेतोर-न्यस्य वस्तुनोऽस्तित्वं गमयति, ' सेतुं तीर्त्वा ' ( छा ० ८ | ४ | २ ) इति च तरतिशब्दप्रयोगात् । यथा लौकिकं सेतुं तीर्त्वा जाङ्गलमसेतुं प्राप्नोत्येवमात्मानं सेतुं तीर्त्वाऽनात्मानमसेतुं प्राप्नो तीति गम्यते । उन्मानव्यपदेशश्च भवति - तदेतद्ब्रह्म चतुष्पादष्टाशकं षोडशकलमिति । यच्च लोक उन्मितमेतावदिदमिति परिच्छिन्नं कार्षापणादि, ततोऽन्यद्वस्त्वस्तीति प्रसि-द्धम् । तथा ब्रह्मणोऽप्युन्मानात्ततोऽन्येन वस्तुना भवितव्यमिति गम्यते । तथा संबन्धव्यपदे-शोऽपि भवति - ' सता सोम्य तदा संपन्नो मवति ' ( छा ० ६।८1१ ) इति ' शारीर आत्मा ' ( तै ० २ | ३ | १ ) ' प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्त: ' ( वृह ० ४ | ३ | २१ ) इति च । मितानां च मितेन संबन्धो दृष्टो यथा नाराणां नगरेण । जीवानां च ब्रह्मणा संबन्धं व्यपदिशति सुषुप्तौ । अतस्ततः परमन्यदमित मस्तीति गम्यते । भेदव्यपदेशश्चैनमेवार्थं गमयति । तथाहि - ' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिर-सेतु है ) इस प्रकार सेतु व्यपदेश आत्मशब्द से अभिहित ब्रह्म सेतु है ऐसा कहता है । और लोकमें सेतु शब्द जल प्रवाहका विच्छेद करनेवाले मृत्तिका, लकड़ी आदिके समूह में प्रसिद्ध है । यहाँ तो सेतु-शब्द आत्मामें प्रयुक्त है, इसलिए वह लोकिक सेतुके समान आत्मसेतु से अन्य वस्तुके अस्तित्वका ज्ञान कराता है | क्योंकि ' सेतुं तीर्त्वा ' ( सेतुको तैरकर ) इस प्रकार ' तरति ' शब्दका प्रयोग है । जैसे लौकिक सेतुको तैरकर असेतु जाङ्गल ( वायु प्रधान ) स्थल को प्राप्त होता है, वैसे ही आत्मसेतुको तैरकर असे अनात्माको प्राप्त होता है, ऐसा ज्ञात होता है । उन्मानका मी व्यपदेश है - ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह ब्रह्म चार पाद वाला, आठखुर वाला और सोलह अवयव वाला है ) लोकमें जो उन्मित है - यह इतना है इस प्रकार परिच्छिन्न जो कार्षापण आदि है उससे अन्य वस्तु है, ऐसा प्रसिद्ध है । उसी प्रकार ब्रह्मके उन्मान से भी उससे अन्य वस्तु होनी चाहिए, ऐसा ज्ञात होता है । तथा ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! उस समय सत्के साथ सम्पन्न होता है ) और ' शारीर आत्मा ० ' ( अन्नमय में स्थित यही आत्मा है ) ' प्राज्ञेनात्मना ० ' ( यह पुरुष प्राज्ञात्मा के साथ संसृष्ट हुआ है ) इस प्रकार सम्बन्धका व्यपदेश होता है । और मित्रों- परिच्छितों का-परिच्छिन्न के साथ सम्बन्ध देखा जाता है, जैसे मनुष्यों का नगर के साथ । और श्रुति सुषुप्ति में जीवों का ब्रह्मके साथ सम्बन्ध कहती है, इसलिए उससे यह अन्य अमित - अपरिच्छिन्न है, यह ज्ञात होता है । भेदव्यपदेश भी इसी अर्थका बोध कराता है, क्योंकि ' अथ य एषो ० ' ( तथा यह जो आदित्य मण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय - सा पुरुष दिखाई देता है ) इस तरह आदित्य आधारवाले ईश्वरका सत्यानन्दी - दीपिका पूर्वपक्ष में उन्मान आदि श्रुतियोंके मुख्य होने से द्वैत सिद्ध होता है । सिद्धान्तमें तो तत् पद लक्ष्य अद्वितीय ब्रह्मकी सिद्धि फल है | ' ब्रह्म सद्वयं सेतुत्वात् लौकिकसेतुवत् ' ' ब्रह्म सद्वितीय है, क्योंकि है, जैसे लौकिक सेतु ' इस अनुमानसे ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तु सिद्ध होती है । और ' सेतुं तीर्त्वा ' इत्यादि श्रुति से भी ऐसा ज्ञात होता है । • प्रकाशवत्, अनन्तवत्, ज्योतिष्मत् और आयतनवत् ये चार ब्रह्मके पाद हैं । चार दिशाएँ - कलाएँ यह प्रकाशवत् पाद है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यु और समुद्र यह अनन्तवानुपाद है । अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और विद्युत् यह ज्योतिष्मान् पाद है । चक्षु, श्रोत्र, वाक् और मन यह आयतन-वान् पाद है | इसप्रकार ब्रह्म चतुष्पाद है । प्रत्येक पादके दो भाग होने से ब्रह्म के आठ खुर होते हैं,

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६३८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ ण्मयः पुरुषो दृश्यते ' ( छा ० १२६ / ६ ) इत्यादित्याधारमीश्वरं व्यपदिश्य ततो भेदेनाक्ष्याधार-मीश्वरं व्यपदिशति - ' अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' ( छा ० १।७।५ ) इति । अतिदेशं चास्यामुना रूपादिषु करोति - ' तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णो यन्नाम तन्नाम ' ( छा ० १।७१५ ) इति । सावधिकं चेश्वरत्वमुभयोर्व्यपदिशति - ' ये चामुष्मात्प-राञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च ' ( छा ० ११६/८ ) इत्येकस्य । ' ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां च ' ( छा ० १ || ६ ) इत्येकस्य । यथेदं मांगधस्य राज्यमिदं वैदेहस्येति एवमेतेभ्यः सेत्वादिव्यपदेशेभ्यो ब्रह्मणः परमस्तीति ॥ ३१ ॥

एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते-सामान्यात्तु ॥ ३२ ॥

पदच्छेद - सामान्यात्, तु । सूत्रार्थ - परन्तु जैसे लौकिक सेतुजलका व्यवस्थापक है, वैसे ब्रह्म जगत् मर्यादाका व्यवस्था-पक है, इसप्रकार सादृश्यसे ब्रह्ममें सेतुत्व उपदिष्ट है । तुशब्देन प्रदर्शितां प्राप्तिं निरुणद्धि । न ब्रह्मणोऽन्यत्किंचिद्भवितुमर्हति प्रमाणाभा-वात् । न ह्यन्यस्यास्तित्वे किंचित्प्रमाणमुपलभामहे । सर्वस्य हि जनिमतो वस्तुजातस्य जन्मादि ब्रह्मणो भवतीति निर्धारितम् । अनन्यत्वं च कारणात्कार्यस्य । नच ब्रह्मव्यतिरिक्तं व्यपदेश कर उसके अनन्तर ' अथ य एष ० ' ( तथा यह जो नेत्रोंके अन्तर्गत पुरुष दिखाई देता है ) इस प्रकार भेदसे नेत्र आधारवाले ईश्वरका व्यपदेश करती है । और ' तस्यैतस्य ० ' ( उस इस पुरुषका वही रूप है जो उस आदित्यान्तर्गत पुरुषका रूप है, जो उसके पर्व हैं वही इसके पर्व हैं, जो उसका नाम है वही इसका भी नाम है ) इस प्रकार अक्षिस्थ पुरुषका इस आदित्यस्थ पुरुषके साथ रूप आदिमें अतिदेश करती है । और ' ये चामुष्मात् ० ' ( जो इस आदित्य लोकसे ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामनाएँ हैं उनका शासन करता है ) इसप्रकार एकका, और ' ये चैतस्मात् ० ' ( जो इस अध्यात्म आत्मासे नीचेके लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है ) इसप्रकार दूसरेका, इस तरह दोनोंका ईश्वरत्व मर्यादित व्यपदेश करती है । जैसे यह मगधका राज्य है और यह वैदेहका । इस तरह इन सेतु आदि व्यपदेशोंसे ब्रह्मसे अन्य वस्तु है ॥ ३१ ॥

ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है-सिद्धान्ती - तु शब्द से प्रदर्शित प्राप्तिका निरोध करते हैं - ब्रह्मसे अन्य कुछ भी नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाणका अभाव है । अन्यके सद्भावमें हमें कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता । उत्पत्तिमत् सम्पूर्ण वस्नु समुदायका जन्म आदि ब्रह्मसे होता है, ऐसा निर्धारित है । कारणसे कार्य अनन्य होता सत्यानन्दी - दीपिका और प्रत्येक पादके उक्त चार - चार भाग होनेसे ब्रह्म सोलह अवयवों वाला है । जैसे सोलह पणोंका कार्षापण होता है । इसप्रकार ब्रह्म परिच्छिन्न होनेसे द्वैतसहित है, और सुषुप्ति में जीवके साथ ग्रामके समान सम्बन्धी होनेसे भी ब्रह्म द्वैतसहित है । आधारभेदसे भी वस्तुका भेद होता है । आधार, अति-देश और अवधिरूपसे भेद तीन प्रकारका कहा गया है । नेत्र और आदित्य मण्डलंका आधाररूपसे कथन है | नेत्रस्थ पुरुषका जो नाम आदि है वही आदित्यस्थ पुरुषका है, यह अतिदेश है । इसी प्रकार एक आदित्य लोकसे ऊपरलोकों और देव कामनाओंका शासक है और दूसरा इससे नीचें लोकों और मनुष्य कामनाओंका शासक है । इसप्रकार शासकत्वकी सीमा निर्धारित है । इसतरह सेतु, सम्बन्ध, उन्मान और भेदके कथनसे ब्रह्म से मिन अन्य कोई अपरिच्छिन्न वस्तु है ॥ ३१ ॥

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अधि ० ७ सू ० ३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६३ ९ किंचिदजं संभवति, ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६ | २ | १ ) इत्यवधारणात् । एकविज्ञानेन च सर्वविज्ञानप्रतिज्ञानान्न ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वमवकल्पते । ननु सेत्वादिव्यपदेशा ब्रह्मव्यतिरिक्तं तत्त्वं सूचयन्तीत्युक्तम्, नेत्युच्यते - सेतुव्यपदेशस्ता-वन्न ब्रह्मणो बाह्यस्य सद्भावं प्रतिपादयितुं क्षमते । सेतुरात्मेति द्याह, न ततः परम-स्तीति । तत्र परस्मिन्नसति सेतुत्वं नावकल्पत इति परं किमपि कल्प्येत । न ' चैत-न्न्याय्यम्, हठो ह्यप्रसिद्धकल्पना । अपि च सेतुव्यपदेशादात्मनो लौकिक सेतुनिदर्श-नेन सेतुबाह्यवस्तुतां प्रसञ्जयता मृद्दारुमयतापि प्रासङ्ख्यत, न चैतन्न्याय्यम्, अज-त्वादिश्रुतिविरोधात् । सेतुसामान्यात्तु सेतुशब्द आत्मनि प्रयुक्त इति श्लिष्यते । जग तस्तन्मर्यादानां च विधारकत्वं सेतु सामान्यमात्मनः । अतः सेतुरिव सेतुरिति प्रकृत आत्मा स्तूयते । सेतुं तीर्त्वात्यपि तरतेरतिक्रमासंभवात्प्राप्नोत्यर्थ एव वर्तते । यथा व्याकरणं तीर्ण इति प्राप्त इत्युच्यते नातिक्रान्तस्तद्वत् ॥ ३२ ॥

बुद्धयर्थः पादवत् ॥ ३३ ॥

पदच्छेद – बुद्ध्यर्थं, पादवत् । सूत्रार्थ - ( पादवत् ) जैसे ब्रह्म के प्रतीक मनकी उपासना के लिए वाणी आदिकी पादरूपसे कल्पना की गई है, वैसे ' चतुष्पाद् ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतिमें उन्मानकी ( बुद्ध्यर्थः ) उपासना के लिए कल्पना की गई है । * यदप्युक्तम् - उन्मानव्यपदेशादस्ति परमिति, तत्राभिधीयते - उन्मानव्यप-देशोऽपि न ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वप्रतिपत्त्यर्थः । किमर्थस्तर्हि? बुद्धयर्थः, उपास-है | और ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) इस अवधारणसे ब्रह्मसे अतिरिक्त कोई अज नहीं हो सकता । और एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा होनेके कारण ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तुका अस्तित्व नहीं हो सकता । परन्तु यह जो कहा गया है कि सेतु यदि व्यपदेश ब्रह्मसे अतिरिक्त तत्त्व - पदार्थको सूचित करते हैं । नहीं, ऐसा कहते हैं - सेतु - व्यपदेश तो ब्रह्मसे बाह्य वस्तुके सद्भावके प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि ' सेतुरात्मा ' ( आत्मा सेतु है ) ऐसा कहा है । पुनः ' उससे अन्य है ' ऐसा नहीं कहा है । वहाँ अन्यके न होनेपर सेतुत्व नहीं हो सकता, इससे किसी भी एक अन्यकी कल्पना करनी चाहिए, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अप्रसिद्धकी कल्पना केवल दुराग्रहमात्र है । और सेतु व्यपदेशसे लौकिक सेतु दृष्टान्तद्वारा आत्मामें सेतुसे बाह्य वस्तुका प्रसङ्ग लानेवाला मृण्मयता तथा काष्ठमयताका भी प्रसङ्ग लायेगा, परन्तु यह न्याय नहीं है, क्योंकि ' आत्मा मज है ' इत्यादि प्रतिपादक श्रुतिसे विरोध होता है । सेतु सामान्य से तो आत्मामें सेतु शब्द प्रयुक्त है, यह सङ्गत है । जगत् और उसकी मर्यादाओंका विधारकत्व सेतु सादृश्य आत्मामें है, अतः सेतुके समान सेतु, इसप्रकार प्रकृत आत्माकी स्तुति की जाती है । ' सेतुं तीर्त्वा ० ' ( सेतु तैर कर ) इसमें मी ' तृ ' धातु अतिक्रमणरूप अर्थके सम्भव न होनेसे प्राप्तकरणरूप अर्थ में है । जैसे ' व्याकरण तैर गया ' अर्थात् व्याकरणको प्राप्त हुआ है, ऐसा कहा जाता है, अतिक्रान्त हुआ, ऐसा नहीं कहा जाता है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए ॥ २ ॥

यह मी जो कहा गया है कि उन्मान व्यपदेश से ब्रह्मसे अन्य है, उसपर कहते हैं - उन्मान व्यपदेश भी ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तुके अस्तित्वकी प्रतिपत्तिके लिए नहीं है, तो किसके लिए है? ' दुद्ध्यर्थः ' उपासनाके लिए है । चार पैरवाला, आठ खुरवाला और सोलह अवयवोंवाला इसप्रकारकी बुद्धि सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे ब्रह्मके अध्यात्म प्रतीक मनके वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र यह चार पाद और अधि-देव प्रतीक आकाश अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएं यह चार पाद उपासना के लिए कल्पित हैं,

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६४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ नार्थ इति यावत् । चतुष्पादष्टाशकं षोडशकलमित्येवंरूपा बुद्धिः कथं नु नाम ब्रह्मणि स्थिरा स्यादिति - विकारद्वारेण ब्रह्मण उन्मानकल्पनैव क्रियते । न ह्यविकारे ऽनन्ते ब्रह्मणि सर्वैः पुंभिः शक्या बुद्धिः स्थापयितुम्, मन्दमध्यमोत्तम बुद्धित्वात्पुंसामिति । पादवत् । यथा मन आकाशयोरध्यात्ममधिदैवतं च ब्रह्मप्रतीकयोराम्ना तयोश्चत्वारो वागादयो मनः संबन्धिनः पादाः कल्प्यन्ते चत्वारश्चाग्न्यादय आकाशसंबन्धिनः आध्या-नाय तद्वत् । अथवा, पादवदिति - यथा कार्षापणे पादविभागो व्यवहारप्राचुर्याय कल्प्यते । नहि सकलेनैव कार्यापणेन सर्वदा सर्वे जना व्यवहर्तुमीशते, क्रयविक्रये परिमाणानियमात्तद्वदित्यर्थः ॥ ३३ ॥

स्थानविशेषः त्प्रकाशादिवत् ॥ ३४ ॥

पदच्छेद- स्थानविशेषात्, प्रकाशादिवत् । सूत्रार्थ - ( प्रकाशादिवत् ) प्रकाश आदिके समान ( स्थानविशेषात् ) उपाधिके योगसे ब्रह्ममें सम्बन्ध और भेदव्यपदेश उपचरित होते हैं । इह सूत्रे द्वयोरपि संबन्धभेदव्यपदेशयोः परिहारो विधीयते । यदप्युक्तम्-संबन्धव्यपदेशाद्भेदव्यपदेशाच्च परमतः स्यादिति - तदप्यसत्, यत एकस्यापि स्थानविशेषापेक्षयैतौ व्यपदेशावुपपद्येते । संबन्धव्यपदेशे तावदयमर्थः - बुद्धयाधु-पाधिस्थानविशेषयोगादुद्भूतस्य विशेषविज्ञानस्योपाध्युपशमे य उपशमः स परमात्मना संबन्ध इत्युपाध्यपेक्षयैवोपचर्यते, न परिमितत्वापेक्षया । तथा भेदव्यपदेशोऽपि ब्रह्मण उपाधिभेदापेक्षयोपचर्यते, न स्वरूपभेदापेक्षया । प्रकाशादिवदित्युपमोपादानम् । ब्रह्ममें किस प्रकार स्थिर होगी, इसलिए विकार द्वारा ब्रह्म में उन्मानकी कल्पना की जाती है, क्योंकि विकार रहित अनन्त ब्रह्म में सब पुरुष बुद्धिकी स्थापना करनेमें समर्थ नहीं हैं, कारण कि पुरुष मन्द, मध्यम और उत्तम बुद्धिवाले हैं । पादवत् - पादके समान । जैसे मन और आकाश जो आध्यात्म और अधिदैवत ब्रह्मके प्रतीक रूपसे श्रुतिमें पठित हैं । उसमें मन सम्बन्धी वाक् आदि चार पाद और आकाश सम्बन्धी अग्नि आदि चार पाद ध्यानके लिए कल्पित किये जाते हैं, वैसें । अथवा पादवत्-पादके समान । जैसे कार्षापण में पाद- विभाग व्यवहार प्राचुर्यके लिए कल्पित किया जाता है, क्योंकि समस्त कार्षापणसे ही सभी लोग सर्वदा व्यवहार नहीं कर सकते, कारण कि क्रय और विक्रय में परि-माणका नियम नहीं है, वैसे ही, ऐसा अर्थ है ॥ ३३ ॥

इस सूत्र में सम्बन्ध व्यपदेश और भेदव्यपदेश इन दोनोंका भी परिहार कहा जाता है । यह भी जो कहा गया है कि सम्बन्धव्यदेश और भेदव्यपदेश से ब्रह्मसे अन्य होना चाहिए । वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्थानविशेषकी अपेक्षासे एक में भी ये व्यपदेश उपपन्न होते हैं । सम्बन्धव्यपदेश में यह अर्थ - अभिप्राय है- बुद्धि आदि उपाधिरूप स्थान विशेषके योगसे आविर्भूत विशेष विज्ञानका उपाधिके उपशम - लय होनेपर जो उपशम होता है वह परमात्मा के साथ सम्बन्ध है, इसप्रकार उपाधिकी अपेक्षा-से उपचार किया जाता है, परिमितत्वकी अपेक्षासे नहीं है । इसप्रकार ब्रह्ममें भेदव्यपदेश भी उपाधि-की अपेक्षासे उपचरित है, स्वरूपभेदकी अपेक्षासे नहीं है । प्रकाशादिवत् -- प्रकाशादिके समान सत्यानन्दी - दीपिका वैसे बुद्धि आदि उपाधि से ब्रह्म में उन्मान उपासना के लिए कल्पित है । अथवा जैसे व्यवहार के लिए कार्षापण ( मुद्रा ) में पाद - विभागकी कल्पना की जाती है, वैसे उपासना के लिए ब्रह्ममें उन्मानकी कल्पना की जाती है ॥ ३३ ॥

* ' सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ' ( छा ० ६1८1१ ) इत्यादि श्रुतिमें सम्बन्ध व्यपदेश से ब्रह्म से भिन्न वस्तु है, और ' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्यमयः पुरुषो दृश्यते ' ( छा ० १।६।६ )

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अधि ० ७ सू ० ३५-३६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६४१ यथैकस्य प्रकाशस्य सौर्यस्य चान्द्रमसस्य वोपाधियोगादुपजात विशेषस्योपाध्युपशमा-त्संबन्धव्यपदेशो भवत्युपाधिभेदाच्च भेदव्यपदेशः । यथा वा सूचीपाशाकाशादिषूपा-ध्यपेक्षयैवैतौ संबन्धभेदव्यपदेशौ भवतस्तद्वत् ॥ ३४ ॥

उपपत्तेश्च ॥ ३५ ॥

पदच्छेद – उपपत्तेः च । सूत्रार्थ - सम्बन्ध और भेदव्यपदेश मुख्य नहीं हैं, क्योंकि ( उपपत्तेः ) ' स्वमपीतो भवति ' इत्यादि श्रुतिसे ऐसी ही उपपत्ति होती है । * उपपद्यते चात्रेदृश एव संबन्धो नान्यादृशः, ' स्वमपीतो भवति ' ( छा ०६ / ८ / १ ) इति हि स्वरूपसंबन्धमेनमामनन्ति, स्वरूपस्य चानपायित्वात् । न नरनगरन्यायेन संबन्धो घटते । उपाधिकृतस्वरूपतिरोभावात्तु - ' स्वमपीतो भवति ' ( छा ० ६ ८ १ ) इत्युपपद्यते । तथा भेदोऽपि नान्यादृशः संभवति, बहुतरश्रुतिप्रसिद्धैकेश्वरत्वविरोधात् । तथाच श्रुतिरेक-स्याप्याकाशस्य स्थानकृतं भेदव्यपदेशमुपपादयति ' योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाश: ' ( छा ० ३ । १२।७ ), ‘ योऽयमन्तः पुरुष आकाश: ' ( छा ०३ | १२ | ८ ), ' योऽयमन्तर्हृदय आकाशः ' ( छा०३।१।२।९ ) इति ॥ ३५ ॥

तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३६ ॥

पदच्छेद -- तथा, अन्य प्रतिषेधात् । सूत्रार्थ - जैसे सेतुत्व आदि व्यपदेशोंसे अन्य वस्तुकी अप्रतिपत्ति है, ( तथा ) वैसे ही ' आत्मै-वाघस्तात् ' इत्यादि श्रुति वाक्योंसे ( अन्यप्रतिषेधात् ) अन्य वस्तुके प्रतिषेध होनेसे अद्वितीय ब्रह्म हो अवधारित होता है । यह उपमाका ग्रहण है । जैसे सूर्य अथवा चन्द्रमा के एक प्रकाश में उपाधिके योगसे उत्पन्न हुए विशेष-का उपाधिके उपशमसे सम्बन्ध व्यपदेश और उपाधिभेदसे भेदव्यपदेश होता है । अथवा जैसे सुईके छिद्र, पाश, आकाश आदिमें उपाधिकी अपेक्षा से ही ये सम्बन्ध व्यपदेश और भेदव्यपदेश होते हैं, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए ॥ ३४ ॥

और यहाँपर इसप्रकारका सम्बन्ध उपपन्न होता है अन्य प्रकारका नहीं, क्योंकि ' स्वमपीतो ति ' ( अपने को ही अपीत प्राप्त होता है ) इस प्रकार श्रुति इस स्वरूप सम्बन्धको कहती है, कारण कि स्वरूप अनिवाशी है, अतः नर - नगर न्याय से सम्बन्ध नहीं घटता । उपाधिकृत स्वरूपके तिरो-भावसे ' स्वमपीतो भवति ' यह उपपन्न होता है । इसप्रकार भेद भी अन्य प्रकारका सम्भव नहीं है, क्योंकि अधिकतर श्रुतियोंसे प्रसिद्ध अद्वितीय ईश्वरत्वका विरोध होता है । और ' योऽयं बहिर्धा ο ' ( जो भी यह पुरुष - देहसे बाहर आकाश है ) ' योऽयमन्तः ० ' ( जो यह पुरुष - देहके भीतर आकाश है ) और ' योऽयम ० ' ( जो यह हृदयके आन्तर आकाश है ) इसप्रकार श्रुति एक आकाशमें भी स्थानकृत भेद व्यपदेशका उपपादन करती है ॥ ३५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका इत्यादि श्रुतिमें भेदव्यपदेश से ब्रह्म से अन्य वस्तु है | ऐसा ( ब्रह्मसूत्र ३।२।३१ ) में सिद्ध किया गया है | परन्तु वह युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिकी अपेक्षासे दोनों व्यपदेश होते हैं ॥ ३४ ॥

* ' स्वमपीतो भवति ' इस श्रुतिसे जीव और ब्रह्मका स्वरूप सम्बन्ध होता है । वस्तुतः जीव ब्रह्म ही हैं, अत: उपाधि कृत जीवस्वरूपके लयसे यह सम्बन्ध भी उपचरित होता है । जैसे एक आकाशमें उपाधिकृत भेदव्यपदेश है, वैसे ही एक ब्रह्ममें भी बुद्धि आदि उपाधिकृत भेदव्यपदेश है, अतः दोनों मुख्य नहीं हैं ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 676

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६४२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ एवं सेत्वादिव्यपदेशान्परपक्ष हेतू नुन्मथ्य संप्रति स्वपक्षं हेत्वन्तरेणोपसंहरति । तथान्यप्रतिषेधादपि न ब्रह्मणः परं वस्त्वन्तरमस्तीति गम्यते, तथा हि - ' स एवाधस्तात् ' ( छा ० ७।२५।१ ), ‘ अहमेवाधस्तात् ' ( छा ० ७ | २५/३ ), ' आत्मैवाधस्तात् ' ( छा ० ७।२५।२ ), ' सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद ' ( बृह ० २।४।६ ), ' ब्रह्मैवेदं सर्वम्, ' ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( छा ० ७।२५।२ ), ‘ नेह नानास्ति किंचन ' ( बृह ० ४ | ४ | १ ९ ), ' यस्मात्परं नापरमस्ति किंचित् ' ( वे ० ३।९ ), ' तदेतद्ब्रह्मापूर्वमन परमनन्तरमबाह्यम् ' ( बृह ०२ | ५ | १ ९ ) इत्येवमादिवाक्यानि स्वप्रकरणस्थान्य-न्यार्थत्वेन परिणेतुमशक्यानि ब्रह्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरं वारयन्ति । सर्वान्तरश्रुतेश्च न परमात्मनोऽन्योऽन्तरात्माऽस्तीत्यवधार्यते ॥ ३६ ॥

अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३७ ॥

पदच्छेद - अनेन, सर्वगतत्वम्, आयामशब्दादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( अनेन ) सेतु बादि व्यपदेशोंमें मुख्यत्व और अन्य वस्तुत्वके निषेधसे ब्रह्ममें ( सर्वगतत्वम् ) सर्वगतत्व सिद्ध होता है, और ( आयामशब्दादिभ्यः ) ' आकाशवत्सर्वं गतश्च नित्यः ' इसप्रकार व्यापक वाचक शब्द आदिसे भी ब्रह्ममें सर्वगतत्व सिद्ध होता है । * अनेन सेत्वादिव्यपदेशनिराकरणेनान्यप्रतिषेधसमाश्रयणेन च सर्वगतत्वमप्यात्मनः सिद्धं भवति । अन्यथा हि तन्न सिध्येत् । सेत्वादिव्यपदेशेषु हि मुख्येष्वङ्गीक्रियमाणेषु परि-च्छेद आत्मनः प्रसज्येत, सेत्वादीनामेवमात्मकत्वात् । तथाऽन्यप्रतिषेधेऽप्यसति, वस्तु वस्त्वन्तराव्यावर्तत इति परिच्छेद एवात्मनः प्रसज्येत । सर्वगतत्वं चास्यायामशब्दा-दिभ्यो विज्ञायते । आयामशब्दो व्याप्तिवचनः शब्दः । ' यावान्वा भयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृय उक्त रीतिसे परपक्ष के हेतुभूत सेतु आदि व्यपदेशोंका उन्मथनकर अब स्वपक्षका अन्य हेतु से उपसंहार करते हैं । इसीप्रकार अन्य प्रतिषेधसे भी ब्रह्मसे पर अन्य वस्तु नहीं है, ऐसा ज्ञात होता है | जैसे कि ' स एवाधस्तात् ' ( वही नीचे है ) ' अहमेवाधस्तात् ' ( मैं ही नीचे हूँ ) ' आत्मैवाधस्तात् ' ( आत्मा ही नीचे है ) ' सर्वं तं ० ' ( सभी उसे परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है ) ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( ब्रह्म ही यह सब है ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( आत्मा ही यह सब है ) ' नेह नानस्ति-किञ्चन ' ( इस ब्रह्ममें नाना कुछ भी नहीं है ) ' यस्मात्परं ० ' ( जिस पुरुषसे उत्कृष्ट अन्य कुछ मी नहीं है ) ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित • कार्यरहित, अन्तररहित और अबाह्य है. ) इत्यादि स्वप्रकरण स्थित वाक्य अन्य अर्थरूपसे नहीं लिये जा सकते, वे ब्रह्मसे व्यतिरिक्त अन्य वस्तुका निवारण करते हैं, और सर्वान्तर श्रुतिसे मी ऐसा अवधारण होता है कि परमात्मासे अन्य अन्तरात्मा नहीं है । ३६ ॥ इससे - सेतु आदि व्यपदेशोंके निराकरण और अन्य वस्तु के प्रतिषेधके आश्रयणसे आत्मा में सर्व-गतत्व भी सिद्ध होता है, अन्यथा वह सिद्ध न होगा । सेतु आदि व्यपदेश मुख्यार्थं ( मृन्मयत्वादि ) अङ्गीकार किये जाय तो आत्मा में परिच्छिन्नत्व प्रसक्त होगा, क्योंकि सेतु आदि एवमात्मक - परि-च्छिन्नात्मक हैं । इसीप्रकार अन्य वस्तु के प्रतिषेध न होनेपर एक वस्तु अन्य वस्तुसे व्यावृत्त होती है, इससे भी आत्मामें परिच्छिन्नत्व ही प्रसक्त होगा । आत्मामें सर्वगतत्व आयामशब्द आदिसे विज्ञात होता है । आयामशब्द व्याप्तिवाचक शब्द है । ' यावान्वा ० ' ( जितना यह भौतिक आकाश है उतना ही यह हृदयान्तर्गत आकाश है ) ' आकाशवत् ० ' ( आत्मा आकाशके समान सर्वंगत और नित्य है ) सत्यानन्दी - दीपिका * इसप्रकार श्रुति, स्मृति और ' अधिष्ठानेनाध्यस्तं जगत् व्याप्तं, अध्यस्तत्वात् रज्वाव्याप्त-सर्पवत् ' अधिष्ठान से अध्यस्त जगत् व्याप्त है, अध्यस्त होनेसे, रज्जुसे व्याप्त सपके समान ' इस न्यायसे मी आत्मा सर्वगतत्व सिद्ध होता है ॥ ३७ ॥

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अधि ० ८ सू ० ३८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६४३ आकाशः ' ( छा ० ८।१।३ ), ( आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ', ' ज्यायान्दिवः ' ( छा ० ३।१४।३ ) ' ज्याया-नाकाशात् ’, ‘ नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ' ( भ ० गी ०२।२४ ) इत्येवमादयो हि श्रुति-स्मृतिन्यायाः सर्वगतत्वमात्मनोऽवबोधयन्ति ॥ ३७ ॥

( ८ फलाधिकरणम् । सू ० ३८-४१ ) फलमत उपपत्तेः ॥ ३८ ॥

पदच्छेद - फलम्, अतः, उपपत्तेः । सूत्रार्थ - ( फलम् ) कर्मका फल ( अतः ) इस ईश्वरसे ही सबको प्राप्त होता है, ( उपपत्तेः ) क्योंकि इसप्रकार उपपन्न होता है । * तस्यैव ब्रह्मणो व्यावहारिक्यामीशित्रीशितव्य विभागावस्थायामयमन्यः स्व-भावो वर्ण्यते । यदेतदिष्टानिष्टव्यामिश्रलक्षणं कर्मफलं संसारगोचरं त्रिविधं प्रसिद्धं जन्तू-नाम्, किमेतत्कर्मणो भवत्याहोस्विदीश्वरादिति भवति विचारणा । तत्र तावत्प्रतिपाद्यते-फलमत ईश्वराद्भवितुमर्हति । कुतः? उपपत्तेः । स हि सर्वाध्यक्षः सृष्टिस्थितिसंहा-रान्विचित्रान्विदधद्देशकालविशेषाभिज्ञत्वात्कर्मिणां कर्मानुरूपं फलं संपादयतीत्युप-पद्यते । कर्मणस्वनुक्षणविनाशिनः कालान्तरभावि फलं भवतीत्यनुपपन्नम्, अभा-वाद्भावानुत्पत्तेः । स्यादेतत्- कर्म विनश्यत् स्वकालमेव स्वानुरूपं फलं जनयित्वा विनश्यति, तत्फलं कालान्तरितं कर्त्रा भोक्ष्यत इति । तदपि न परिशुध्यति, प्राग्भोक्तृ-संबन्धात्फलत्वानुपपत्तेः । यत्कालं हि यत्सुखं दुःखं वाऽऽत्मना भुज्यते यस्यैव लोके ' ज्यायान्दिवः ' ( आत्मा द्युलोकसे बड़ा है ) ' ज्यायानाकाशात् ' ( आत्मा आकाशसे बड़ा है ) ' नित्यः सर्वगतः ० ' ( यह आत्मा नित्य, सवंगत स्थाणु, अचल और सनातन है ) इत्यादि श्रुति, स्मृति और न्याय आत्मामें सर्वगतत्व अवबोधित करते हैं ॥ ३७ ॥

उसी ब्रह्मका व्यावहारिक ईशितृ - ईचितव्यरूप विभाग अवस्थामें यह अन्य स्वभाव फल हेतुत्व वर्णन किया जाता है । जीवोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रितरूप संसार विषयक विविध जो यह कर्मफल प्रसिद्ध है, क्या यह कमसे होता है अथवा ईश्वरसे? ऐसा विचार होता है । उसपर सिद्धान्ती प्रति-पादन करते हैं — फल अत: - ईश्वरसे होना चाहिए । किससे? इससे कि ऐसी उपपत्ति होती है । वह ईश्वर कर्माध्यक्ष, विचित्र सृष्टि, स्थिति और संहारका कर्ता है, क्योंकि देश विशेष और काल विशेषका अभिज्ञाता है, इसलिए वह कर्म कर्ता जीवों को कर्मके अनुसार फलका संपादन करता है, यह उपपन्न होता है । प्रतिक्षण में विनाश शील कमसे कालान्तरभावी फल होता है, यह अनुपपन्न है, क्योंकि अभावसे भावको उत्पत्ति नहीं हो सकती । यह हो, परन्तु विनष्ट होता हुआ कर्म अपनी स्थितिकालमें अपने अनुरूप कर्मफल उत्पन्नकर विनष्ट हो जाता है और कर्ता कालान्तर में उस कर्मफलको मोगेगा । वह भी परिशुद्ध ( दोषरहित ) नहीं है, क्योंकि मोक्ता के सम्बन्धसे पहले फलत्व अनुपपन्न है, कारण कि जिस कालमें जो सुख अथवा दुःख आत्मासे उपभुक्त होता है वही लोकमें फलरूपसे प्रसिद्ध है । सत्यानन्दी - दीपिका # इसप्रकार ' तत् ' पदके लक्ष्यार्थका संशोधनकर अब ' तत् ' पदका वाच्यार्थ ' फलमत उपपत्ते: ' इस सूत्र कहते हैं । पूर्वपक्ष में ' तत् ' पदके वाच्य फलदाता ईश्वरकी असिद्धि होनेके कारण ' तत् ' पदके लक्ष्यार्थकी भी स्वतः असिद्धि है, सिद्धान्तमें उसकी सिद्धि है, इसप्रकार दोनोंमें भेद है । यद्यपि ब्रह्म में सर्वगतत्व के समान फलदातृत्व भी व्यवहारदशा में हो सकता है, तो भी कर्ममें फल-दातृत्व होने से ईश्वरमें फलदातृत्व अयुक्त है । इसप्रकार आक्षेपसंगति से पूर्वपक्ष है । सिद्धान्ती-

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६४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० २ फलत्वं प्रसिद्धम् । नह्यसंबद्धस्यात्मना सुखस्य दुःखस्य वा फलत्वं प्रतियन्ति लौकिकाः । अथोच्येत -- मा भूत्कर्मानन्तरं फलोत्पादः । कर्मकार्यादपूर्वात्फलमुत्पत्स्यत इति, तपि नोपपद्यते, अपूर्वस्याचेतनस्य काष्ठलेोष्टसमस्य चेतनेनाप्रवर्तितस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः, तद्-स्तित्वे च प्रमाणाभावात् । अर्थापत्तिः प्रमाणमिति चेत् - न, ईश्वर सिद्धेरर्थापत्तिक्षयात् । श्रुतत्वाच्च ॥ ३ ९ ॥ पदच्छेद - श्रुतत्वात् च । सूत्रार्थ - और ' स वा एष महानज ' इत्यादि श्रुतिसे ईश्वरमें फलदातृत्व श्रुत होनेसे ईश्वर ही फलदाता है । * न केवलमुपपत्तेरेवेश्वरं फलहेतुं कल्पयामः, किं तर्हि? श्रुतत्वादपीश्वरमेव फलहेतुं मन्यामहे । तथा च श्रुतिर्भवति -- ' स वा एष महानज आत्मान्नादो वसुदानः ' ( बृह ० ४ | ४ | २४ ) इत्येवं जातीयका ॥ ३ ९ ॥ धर्म जैमिनिरत एव ॥ ४० ॥

पदच्छेद - धर्मम्, जैमिनि:, अतः, एव । सूत्रार्थ - जिस श्रुति और उपपत्तिसे सिद्धान्ती ईश्वरको फलदाता मानते हैं, ( अतएव ) उसी श्रुति और उपपत्ति ( जैमिनिः ) जैमिनि आचार्य ( धर्मम् ) धर्मको - यागादिको फलदाता मानते हैं । * जैमिनिस्त्वाचार्यो धर्मं फलस्य दातारं मन्यते । अत एव हेतोः श्रुतेरुपपत्तेश्च । आत्मासे असम्बद्ध सुख अथवा दुःखको फलरूपये लोग नहीं जानते हैं । यदि ऐसा कहा जाय कि कर्मके अनन्तर फलकी उत्पत्ती मत हो, परन्तु कर्म जन्य अपूर्व से फल उत्पन्न हो जायगा? तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चेतनसे अप्रवर्तित काष्ठ और लोष्टके समान अचेतन अपूर्वकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, और उसके अस्तित्वमें प्रमाण भी नहीं है । यदि कहो कि अर्थापत्ति प्रमाण है, तो यह युक्त. नहीं है, क्योंकि ईश्वरकी सिद्धिसे अर्थापत्तिका क्षय हो जायगा ॥ ३८ ॥

हम केवल उपपत्ति - युक्तिसे ईश्वरको फलका हेतु नहीं कहते हैं, किन्तु श्रुति प्रतिपादित होने से भी ईश्वरको ही फलका हेतु हम मानते हैं । क्योंकि ' स वा एष महानज ० ' ( वह यह महान् अज आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला और कर्मफल देनेवाला है ) इसप्रकारकी श्रुति है ॥ ३ ९ ॥ जैमिनि आचार्य तो ' अत एव ' - इसी हेतु से श्रुति और उपपत्तिसे धर्मको फलदाता मानते हैं । और यही अर्थं ' स्वर्गकामो यजेत ' ( स्वर्गकी कामनावाला याग करे ) इत्यादि वाक्योंमें सुना जाता सत्यानन्दी- दीपिका कर्मफलका दाता ईश्वर है, क्योंकि ' स्वर्गादिकं विशिष्टदेशकालकर्माभिज्ञातृकम्, कर्मफलत्वात्, सेवा-फलवत् ' ( स्वर्गादि विशिष्ट देश, काल और कर्मके अभिज्ञद्वारा प्राप्त होता है, क्योंकि फल है, जैसे सेवाफल ) यह उपपत्ति अनुमान है । याग आदि क्रिया जो क्षणिक कर्म है, क्या वह अपने नाशके अनन्तर फल उत्पन्न करता है अथवा अपना फल उत्पन्नकर नष्ट होता है वा अपूर्वसे फल सिद्ध होता है? प्रथम पक्ष तो अयुक्त है, क्योंकि कर्मका नाश अभावरूप है, अतः अमावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती । शेष दो विकल्पोंका समाधान ' स्यादेतत् ' आदिसे करते हैं ॥ ३८ ॥

* ' कृतात्ययेऽनुशयवान् ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ११८ ) इस सूत्र में उदाहृत ' तद्य इह रमणीयचरणाः ' इत्यादि श्रुति और स्मृति वाक्योंसे यदि अपूर्वं सिद्ध होता है, तो उन वाक्योंसे ईश्वरमें फलदातृत्व भी स्वीकार करना चाहिए । ऐसा भगवान् सूत्रकार ' श्रुतत्वाच्च ' से कहते हैं ॥ ३ ९ ॥ * यह पूर्वपक्ष सूत्र है । ' यजेत ' इस विध्यात्मक लिङ्गार्थका यागविषय है, उसके भावावगमसे

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अधि ० ८ सू ० ४१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६४५ श्रूयते तावदयमर्थः ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्येवमादिषु वाक्येषु । तत्र च विधिश्रुतेर्विषयभावोप-गमाद्यागः स्वर्गस्योत्पादक इति गम्यते । अन्यथा ह्यननुष्ठातृको याग कापद्येत तत्रास्योपदे-शवैयर्थ्यं स्यात् । नन्वनुक्षणविनाशिनः कर्मणः फलं नोपपद्यत इति, परित्यक्तोऽयं पक्षः - नैष दोषः, श्रुतिप्रामाण्यात् । श्रुतिश्चेत्प्रमाणं यथाऽयं कर्मफलसंबन्धः श्रुत उपपद्यते तथा कल्प-यितव्यः । न चानुत्पाद्यं किमप्यपूर्वं कर्म विनश्यत्कालान्तरितं फलं दातुं शक्नोति । अतः कर्मणो वा सूक्ष्मा काचिदुत्तरावस्था फलस्य वा पूर्वावस्थाऽपूर्वं नामास्तीति तर्क्यते । उप-पद्यते चायमर्थ उक्तेन प्रकारेण । ईश्वरस्तु फलं ददातीत्यनुपपन्नम्, अविचित्रस्य कारणस्य विचित्रकार्यानुपपत्ते वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गादनुष्ठान वैयर्थ्यापत्तेश्च । तस्माद्धर्मादेव फलमिति । पूर्व तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् ॥ ४१ ॥

पदच्छेद — पूर्वम्, बादरायणः, हेतुव्यपदेशात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शङ्कानिवृत्त्यर्थं है, ( बादरायणः ) बादरायण आचार्य तो ( पूर्वम् ) पूर्वोक्त ईश्वरको फलदाता मानते हैं, क्योंकि ( हेतुव्यपदेशात् ) ' एष ह्येव साधु कमं कारयति ' ' अन्नादो वसुदानः ' ' लभते च ततः कामान् ' इत्यादि श्रुति और स्मृतिमें ईश्वरका हेतुरूपसे व्यपदेश है । * बादरायणस्त्वाचार्यः पूर्वोक्तमेवेश्वरं फलहेतुं मन्यते । केवलात्कर्मणोऽपूर्वाद्वा केवल फलमित्ययं पक्षस्तुशब्देन व्यावत्येते । कर्मापेक्षादपूर्वापेक्षाद्वा यथा तथाऽस्त्वी श्वरात्फलमिति सिद्धान्तः । कुतः? हेतुव्यपदेशात् । धर्माधर्मयोरपि हि कारयितृत्वे-है, क्योंकि उसमें विधि श्रुतिके विषयभावकी अवगति से ' याग स्वर्गका उत्पादक है ' ऐसा ज्ञात होता है, अन्यथा अनुष्ठाता न होनेवाला याग होगा, तो ऐसा होनेपर यागका उपदेश व्यर्थ होगा । परन्तु अनु-क्षण विनाशी कर्मसे फल उपपन्न नहीं होता, अतः यह पक्ष परित्यक्त है । यह दोष नहीं है, क्योंकि श्रुति प्रमाण है । यदि श्रुतिप्रमाण हो तो जिस प्रकार यह श्रुति प्रतिपादित कर्मफल सम्बन्ध उपपन्न हो उसीप्रकार कल्पना करनी चाहिए, और किसी अपूर्वको उत्पन्न किये विना विनष्ट होता हुआ कर्म कालान्तरमें फल देने में समर्थ नहीं होता, अतः कर्मकी कोई एक सूक्ष्म उत्तरावस्था अथवा फलको पूर्वावस्था अपूर्व नामक है, ऐसा तर्क किया जाता है । और यह अर्थ उक्त प्रकारसे उपपन्न होता है । ईश्वर फल देता है, यह अनुपपन्न है, क्योंकि अविचित्र कारणका विचित्र कार्य अनुपपन्न है, और ' वैषम्य और नैघृण्य ' प्रसंग और अनुष्ठान वैयर्थ्यापत्ति होती है, इसलिए धर्मसे ही फल होता है || ४० ॥ बादरायण आचार्यं तो पूर्वोक्त ईश्वरको ही फलका हेतु मानते हैं । केवल कर्मसे अथवा केक्ल अपूर्व से फल होता है, इस पक्ष की ' तु ' शब्द व्यावृत्ति करता है, कर्मकी अपेक्षावाले अथवा अपूर्वकी अपेक्षावाले ईश्वरसे यथा स्यात् तथा फल होता है, यह सिद्धान्त है । किससे? इससे कि हेतुरूपसे व्यपदेश है । धर्म और अधर्मके भी कारयतृरूप से और फलदातृरूपसे ईश्वर हेतु कहा गया है-सत्यानन्दी - दीपिका याग स्वर्गका साधन है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि यदि याग पुरुषके इष्ट स्वर्गका साधन न हो तो प्रेरणा उपपन्न नहीं होगी, इसलिए अपूर्व द्वारा कमसे फल होता है । अब ' ईश्वरस्तु ' इत्यादि सिद्धान्तको दूषित करते हैं— क्या ईश्वर कर्मकी अपेक्षाके विना ही फल देता है अथवा किसीकी अपेक्षासे? प्रथम पक्षमें ' अविचित्रस्य ' इत्यादिसे कहते हैं । द्वितीय पक्षमें - जैसे स्थिति - स्थापक-संस्कारमात्रसे चटाईमें वेष्टन होता है, वैसे ही कर्म जन्य अपूर्वसे फल सिद्ध होता है, तो ईश्वरका क्या प्रयोजन है । अतः धर्मसे ही फल होता है, यह जैमिनि आचार्यका मत है ॥ ४० ॥

* यदि चन्दन, कण्टक आदि दृष्ट पदार्थोंसे सुख आदिका सम्भव है, तो धर्म और अधर्मके स्वीकार करनेका क्या प्रयोजन? यदि कहो कि श्रुति और स्मृतिके बलसे इनकी अपेक्षा है, तो श्रुति

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६४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ नेश्वरो हेतुर्व्यपदिश्यते, फलस्य च दातृत्वेन ' एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते । एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते ' इति । स्मर्यते चायमर्थो भगव-द्गीतासु - ' यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्या तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधा-म्यहम् । स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लमते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान् ' ( ७।२१ ) इति । सर्ववेदान्तेषु चेश्वरहेतुका एव सृष्टयो व्यपदिश्यन्ते । तदेव चेश्वरस्य फलहेतुत्वं यत्स्वकर्मानुरूपाः प्रजाः सृजतीति । विचित्रकार्यानुपपत्त्यादयोऽपि दोषाः कृतप्रयत्नापेक्षत्वादीश्वरस्य न प्रसज्यन्ते ॥ ४१ ॥

इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीय पादः ॥ २ ॥

तृतीयाध्याये तृतीयः पादः । [ अत्र परापरब्रह्मविद्यागुणोपसंहारविवरणम् । ] इस पादमें पर और अपर ब्रह्मविद्याके गुणोंके उपसंहारका विवरण है । ( १ सर्ववेदान्तप्रत्ययाधिकरणम् । सू ० १४ ) सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥ १ ॥

पदच्छेद -- सर्ववेदान्तप्रत्ययम्, चोदनाद्यविशेषात् । सूत्रार्थ - ( सर्ववेदान्तप्रत्ययम् ) सब वेदान्तों में विहित उपासना भिन्न नहीं है, ( चोदनाद्य-विशेषात् ) क्योंकि चोदना आदिकी अविशेषता समानता - एकता है । * व्याख्यातं विज्ञेयस्य ब्रह्मणस्तत्त्वम्, इदानीं तु प्रतिवेदान्तं विज्ञानानि भिद्यन्ते न वेति विचार्यते । ननु विज्ञेयं ब्रह्म पूर्वापरादिभेदरहितमेकरसं सैन्धवधनवदवधारितं, तत्र ' एष ह्येव ० ' ( यही जिसे ऊपर ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है और यही जिसे नीचे ले जाना चाहता है उससे असाधु कर्म कराता है ) और यह अर्थ ' यो यो ० ' ( जो जो सकामी भक्त जिस जिस विग्रहकी श्रद्धासे पूजा करना चाहता है, उस उस भक्तकी मैं उसके प्रति अचल श्रद्धा उत्पन्न करता हूँ | तथा वह उस श्रद्धा से युक्त हुआ उस देवताके आराधनकी चेष्टा करता है और उस देवतासे मेरेद्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगोंको निःसन्देह प्राप्त होता है ) इस प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा गया है । इसप्रकार सम्पूर्ण वेदान्तोंमें ईश्वर हेतुक सृष्टियोंका व्यपदेश । जो प्रजाओंका अपने कर्म अनुरूप सृजन करता है वही ईश्वरमें फल हेतुत्व है । जीवकृत प्रयत्नकी अपेक्षा होनेसे ईश्वरको विचित्र कार्य अनुपपत्ति आदि दोष भी प्रसक्त नहीं होते हैं ॥ ४१ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य- माषानुवाद के तृतीयाध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥२ ॥

विज्ञेय ब्रह्मके तत्त्वका व्याख्यान किया जा चुका है । अब प्रत्येक वेदान्तमें विज्ञान ( उपासना ) भिन्न है अथवा नहीं? इसका विचार किया जाता है । परन्तु पूर्वापर आदि भेदसे रहित, सैन्धवघनके सत्यानन्दी -दीपिका और स्मृति प्रसिद्ध ईश्वरकी अपेक्षा क्यों नहीं हो । यदि ईश्वरकी अपेक्षा नहीं है, तो ईश्वर प्रतिपादक श्रुति, स्मृति बाधित होंगी । इसलिए ईश्वरकी अपेक्षाके विना केवल कर्म अथवा अपूर्व से ही फल हो, यह अयुक्त है । अत: कर्मफलदाता ईश्वर है । इसप्रकार ' तत् ' पदवाच्य ईश्वरके सिद्ध होनेपर ' तत् ' पदका लक्ष्यार्थं मी सिद्ध हुआ समझना चाहिए । इसलिए श्रुति, स्मृति और युक्ति युक्त होनेसे यह सिद्धान्त दोष रहित है ॥ ४१ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के तृतीयाध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥२ ॥

* गत पादमें ' तत् ' और ' त्वम् ' पदार्थका निरूपण किया गया है । अब अन्तःकरण शुद्धिद्वारा